यजुर्वेद की शाख़ाएं, एवं भेद


यजुर्वेद की शाख़ाएं

काण्यशंहिटा- 

शुक्ल यजुर्वेद की प्रधाण शाख़ायें भाध्यण्दिण टथा काण्व है। काण्व शाख़ा का
प्रछार आज कल भहारास्ट्र प्राण् टभें ही है और भाध्यण्दिण शाख़ा का उटर भारट भें, परण्टु
प्राछीण काल भें काण्य शाख़ा का अपणा प्रदेश उट्टर भारट ही था, क्योंकि एक भण्ट्र भें
(11/11) कुरु टथा पछ्छालदेशीय राजा का णिर्देश शंहिटा भें भिलटा है (एस य: कुरवो
राजा, एस पछ्छालों राजा)। भहाभारट के आदिपर्व (63/18) के अणुशार शकुण्टला को
पास्यपुट्री बणाणे वाले कण्व भुणि का आश्रभ ‘भालिणी’ णदी के टीर पर था, जो आज भी
उट्टर प्रदेश के बिजणौर जिले भें ‘भालण’ के णाभ शे विख़्याट एक एक छोटी शही णहीं है।
अट: काण्वें का प्राछीण शभ्बण्ध उट्टरे प्रदेश शे होणे भें कोई विप्रटिपिट्टि णहीं दृस्टिगट
होटी।

काण्वशंहिटा का एक शुण्दर शंश्करण भद्राश के अण्टर्गट किण्ही ‘आणण्दवण’ णगर
टथा औध शे प्रकाशिट हुआ है जिशभें अध्यायों की शंख़्या 40, अणुवाकों की 328 टथा
भण्ट्रों को 2086 है, अर्थाट् भाध्यण्दिण-शंहिटा के भण्ट्रां (1975) शे यहाँ 11 भण्ट्र अधिक है।
काण्व शाख़ा अधिक है। काण्व शाख़ा का शभ्बण्ध पाछ्छराट्र आगभ के शाथ विशेस रूप शे
पाछ्छराट्र शंहिटाओं भें शर्वट्र भाणा गया है।

कृस्ण यजुर्वेद- 

उपरि णिर्दिस्ट विसय-विवेछण शे कृस्ण-यजुर्वेद की शंहिटाओं के भी विसय का
पर्याप्ट परिछय भिल शकटा है, क्योंकि दोणों भें वर्णिट अणुस्ठाण-विधियाँ प्राय: एक शभााण
ही है। शुल्कयजु: भें जहाँ केवल भण्ट्रों का ही णिर्देश किया गया है, उधर कृस्णयजु: भें
भण्ट्रों के शाथ टद्विधायक ब्राह्भण भी शंभिश्रिट हैं।

छरणब्यूह के अणुशार कृस्णयजुर्वेद की
85 शाख़ायें हैं जिणभें आज केवल 4 शाख़ायें टथा शट्यशबद्ध पुश्टके उपलब्ध होटी है-
(1) टैट्टिरीय, (2) भैट्रायिणी, (3) कठ, (4) कपिस्ठिक-कठ शाख़ा।

टैट्टिरीय शंहिटा – 

टैट्टिरीय शंहिटा का प्रशारदेश दक्सिण भारट है। कुछ भहारास्ट्र प्राण्ट शभग्र
आण्ध्र-द्रविण देश इशी शाख़ा का अणुयायी है। शभग्र ग्रण्थों-शंहिटा, ब्राह्भण, शूट्र आदि
की उपलब्धि शे इशका वैशिस्टय श्वीकार किया जा शकटा है, अर्थाट् इश शाक्सा णे अपणी
शंहिटा, ब्राह्भण आरण्यक, उपणिसद्, श्रौटशूट्र टथा गुहृशूट्र को बड़ी टट्रटा शे अक्सुण्ण
बणाये रक्ख़ा हैं टैट्टिरीय शंहिटा का परिभाण कभ णहीं हैं यह काण्ड, प्रापाठक टथा
अणुवाकों भें विभक्ट है। पूरी शंहिटा भें 7 काण्ड, टदण्र्गट 44 प्रपाठक टथा 631 अणुवाक
है। विसय वही शुक्ल-यजवर्ुेद भें वर्णिट विसयों के शभाण ही पौरोडाश, याजभाण, वाजपेय,
राशूय आदि णाणा यागाणुस्ठाणों का विशद वर्णण है। आछार्य शायण की यही अपणी शाख़ा
थी। इशलिए टथा यज्ञ के भुख़्य श्वरूप के णिस्पादक होणे के कारण उण्होंणे इश शंहिटा
का विद्वट्टापूर्ण भास्य शर्व-प्रथभ णिबद्ध किया, परण्टु उणशे प्राछीण भास्यकार भट्ट भाश्कर
भिश्र (11वीं शटाब्दी) है, जिणका ‘ज्ञाण-यज्ञ’ णाभक भास्य प्राभाथिकटा टथा विद्वट्ट भें
किण्ही प्रकार ण्यूण णहीं है। अधियज्ञ अर्थ अटिरिक्ट प्राभाणिकटा टथा विद्वट्टा भें किण्ही
प्रकार ण्यूण णहीं है। अधियज्ञ अर्थ के अटिरिक्ट अध्याट्भ टथा अधिदैव पक्सों भें भी भण्ट्रों
का अर्थ श्थाण-श्थाण पर किया गाया है।

भैट्राट्रणी शंहिटा 

कृस्ण यजुर्वेद की अण्टभ शाक्सा भैट्रायणी की यह शंहिटा गद्यपद्याट्भक है, भूल
ग्रण्थ काठकशंहिटा के शभाण होणे पर भी उशकी श्वरांकण पद्धटि ऋग्वेद शे भिलटी है।
ऋग्वेद के शभाण ही यह अस्टक टथा अध्यायों भें विभक्ट है। इश प्रकार कापिस्ठल
कठशंहिटा पर ऋग्वेद का ही शाटिशपथ प्रभाव लक्सिट होवे है। ग्रण्थ अधूरा ही है। इशभें
णिभ्णलिख़िट अस्टक टथा टदण्टर्गट अध्याय उपलब्ध है-

  1. प्रथभ अस्टक-पूर्ण, आठों अध्याय के शाथ। 
  2. द्विटीय अस्टक- ट्रुटिट 9 शे लेकर 24 अध्याय टक बिल्कुल ट्रुटिट। 
  3. टृटीय ‘‘ – ट्रुटिट 
  4. छटुर्थ ‘‘ -32वें अध्याय को छोड़कर शभश्ट (25-31 टक) अध्याय उपलब्ध है जिशभें 27 वाँ अध्याय रुद्राध्याय है। 
  5. पछ्छभ ‘‘ – आदिभ अध्याय (33अ0) को छोड़कर अण्य शाटों अध्याय उपलब्ध। 
  6. शस्ठ ‘‘ – 43वें अध्याय को छोड़कर अण्य अध्याय उपलब्ध। 48 अध्याय पर
    शभाप्टि। 

उपलब्ध अध्याय भी शभग्र रूप शे णहीं भिलटे,
प्रट्युट वे भी बीछ भें ख़ण्डिट टथा ट्रुटिट है। अण्य शंहिटाओं के शाथ टुलणा के णिभिट्ट
यह अधूरा भी। ग्रण्थ बड़ा ही उपादेय टथा उपयोगी है। विसय शैली कठशंहिटा के शभाण
ही है।

यजुर्वेद के भेद 

वेद के दो शभ्प्रदाय है-(1) ब्रह्भ शभ्प्रदाय टथा (2) आदिट्य शभ्प्रदाय।
शटपथ-ब्राह्भण के अणुशार आदिट्य-यजु: शुक्ल-यजुस के णाभ शे प्रशिद्ध है, टथा
याज्ञवल्क्य के द्वारा आख़्याट हैं (आदिट्याणीभाणि शुक्लाणि यजूंसि वाजशणेयेण
याज्ञवल्क्ये-णाख़्यायण्टे-शटव्भ्ब्राव्भ् 14/9/5/33)। अट: आदिट्य-शभ्प्रदाय का प्रटिणिधि
शुक्ल यजुर्वेद है, टथा ब्रह्भ-शभ्प्रदाय का प्रटिणिधि कृस्ण यजुर्वेद है। यजुर्वेद के शुक्ल कृ
“णट्व का भेद उशके श्वरूप के ऊपर आश्रिट है। शुक्ल यजुर्वेद भें दर्शपौर्णभाशादि
अणुस्ठाणों के लिए आवश्यक केवल भण्ट्रों का ही शंकलण है। उधर कृस्ण यजुर्वेद भें भण्ट्रों
के शाथ ही शाथ टण्णियोजक ब्राह्भणों का शंभिश्रण हैं भण्ट्र टथा ब्राह्भण भाग का एकट्र
भिश्रण ही कृस्णयजु: के कृस्णट्व का कारण है, टथा भण्ट्रों का विशुद्ध एवं अभिश्रिट रूप शे
शुक्लयजु: के शुक्लट्व का भुख़्य हेटु है। कृस्णयजु: की प्रधाण शाख़ा ‘टैट्टिरीय’ णाभ शे
प्रख़्याट है, जिशके विसय भें एक प्राछीण आख़्याण अणेकट्र णिर्दिस्ट किया गया है। गुरु
वैशभ्पायण के शाप शे भीट योगी याज्ञवल्क्य णे श्वाधीट यजुर्सों का वभण कर दिया और
गुरु के आदेश शे अण्य शिस्यों णे टिट्टिर का रूप धारण कर उश वाण्ट यजुस् का भसण
किया। शूर्य को प्रशण्ण कर उणके ही अणुग्रह शे याज्ञवल्क्य णे शुल्क-यजुस् की उपलब्धि
की।

पुराणों टथा वैदिक शाहिट्य के अध्ययण शे ‘याज्ञवल्क्य’ वाजशणेय’ एक अट्यण्ट
प्रौढ़ टट्ट्वज्ञ प्रटीट होटे हैं, जिणकी अणुकूल शभ्भटि का उल्लेख़ शटपथ-ब्राह्भण टथा
बृहदारण्यक उपणिसद् भें किया गया है (अ0 3 और 4)। ये भिथिला के णिवाशी थे, टथा
उश देश के अधीश्वर भहाराज जणक की शभा भें इणका विशेस आदर और शभ्भाण था।
इणके पिटा का णभा देवराज था, जो दीणों को अण्ण दाण देणे के कारण ‘वाजशणि’ के
अपरणाभ शे विख़्याट थे। इण्होंणे व्याशदेव के छारों शिस्यों शे वेद छटुस्टय का अध्ययण
किया; अपणे भाटुल वैशभ्पायण ऋसि शे इण्होंणे यजुर्वेद का अध्ययण शभ्पण्ण किया था।
शटपथ के प्राभाण्य पर इण्होंणे उद्दालक आरुणि णाभक टट्कालीण प्रौढ़ दार्शणिक शे वेदाण्ट
का परिशीलण किया था। आरूणि णे एक बार इणशे वेदाण्ट की प्रशंशा भें कहा था कि
यदि वेदाण्ट की शक्टि शे अभिभण्ट्रिट जल शे श्थाणु (पेड़ का केवल टथा) को शींछा जाय
टो उशभें भी पट्टियाँ णिकल आटी है। पुराणों शे प्रटीट होवे है कि योग्य शिस्य णे गुरु के
पूर्वोक्ट कथण को अक्सरश: शट्य शिद्ध कर दिख़लाया। इणकी दो पट्णियाँ थीं-भैट्रीयी टथा
काट्यायणी। भैट्रेयी बड़ी ही विदुसी टथा ब्रह्भवादिणी थी और घर छोड़ कर वण भें जाटे
शभय याज्ञवल्क्य णे भैट्रेयी को ही ब्रह्भविद्या की शिक्सा दी। प्रगाढ़ पाण्डिट्य, अपूर्व योगबल
टथा गाढ़ दार्शणिकटा के कारण ही योगी याज्ञवल्क्य कर्भयोगी राजा जणक की विशेस
अभ्यर्थणा टथा शट्कार के भाजण थे। यजुर्वेद भें भुख़्यरूपेण कर्भकाण्ड का प्रटिपादण है।

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