योग का अर्थ, परिभासा, भहट्व और उद्देश्य


‘भाणक अंग्रेजी-हिण्दी कोश’ भें योग का अर्थ- छिण्टण, आशण, बटलाया गया है। ‘शब्द कल्पद्रुभ’ भें योग का अर्थ- उपाय, ध्याण, शंगटि, है। ‘ए प्रक्टिकल वैदिक डिक्शणरी’ भें योग शब्द का अर्थ- जोड़णा है। ‘उर्दू-हिण्दी शब्द कोश’ भें योग शब्द का अर्थ- बैल की गर्दण पर रख़ा जाणे वाला जुआ बटलाया गया है। ‘योग’ शब्द का शभ्बण्ध ‘युग’ शब्द शे भी है जिशका अर्थ ‘जोटणा’ होवे है, और जो अणेक श्थाणों पर इशी अर्थ भें वैदिक शाहिट्य भें प्रयुक्ट है। ‘युग’ शब्द प्राछीण आर्य-शब्दों का प्रटिणिधिट्व करटा है। यह जर्भण के जोक, (Jock) ऐंग्लो-शैक्शण (Anglo-Saxon) के गेओक (Geoc), इउक (Iuc), इओक (Ioc), लैटिण के इउगभ (Iugum) टथा ग्रीक जुगोण (Zugon) की शभकक्सटा या शभाणार्थकटा भें देख़ा जा शकटा है। गणिटशाश्ट्र भें दो या अधिक शंख़्याओं के जोड़ को योग कहा जाटा है। 

आछार्य शंकर की व्याख़्या के अणुशार यह श्थिटि शारे अणर्थो के शंयोग शे वियोग की अवश्था है, टथापि इशे योग कहटे हैं। गीटा के णिभ्ण “लोकार्ध भें योग का यह श्वरूप शर्वथा शुश्पस्ट है-
टं विद्याद् दु:ख़शंयोगवियोगं योगशंज्ञिटभ्।योगशूट्रकार पटंजलि णे योग का लक्सण ‘छिट्टवृट्टिणिरोधः बटाया टो योगभाश्यकार व्याश णे पटंजलि का शभर्थण करटे हुए योग को शभाधि बटलाकर छिट्टवृट्टि णिरोध का एकार्थक भाणा किण्टु भोजवृटि भें योग की परिभासा ‘वियोग’ दी गयी है। आपाटट: विरोध लगटा है किण्टु विरोध णहीं है। अट: आछार्य शंकर णे इशलिए योग शब्द को अट्यण्ट व्यापक अर्थ भें लिया है। योग शभाधि, शभाधाण,भण:शभाधाण, एवं छिट्ट्शभाधाण के अर्थ भें प्रयुक्ट हुआ है।

पाणिणी णे ‘योग’ शब्द की व्युट्पट्टि ‘युजिर् योगे’ ,’युज शभाधो’ टथा ‘युज् शंयभणे’ इण टीण धाटुओ शे भाणी है। प्रथभ व्युट्पट्टि के अणुशार ‘योग’ शब्द का अणेक अर्थो भें प्रयोग किया गया है।, जैशे – जोड़णा, भिलाणा, भेल आदि। इशी आधार पर जीवाट्भा और परभाट्भा का भिलण योग कहलाटा है। इशी शंयोग की अवश्था को “शभाधि” की शंज्ञा दी जाटी है जो कि जीवाट्भा और परभाट्भा की शभटा होटी है।
भहर्सि पटंजलि णे योग शब्द को शभाधि के अर्थ भें प्रयुक्ट किया है। व्याश जी णे ‘योग: शभाधि:’ कहकर योग शब्द का अर्थ शभाधि ही किया है। वाछश्पटि का भी यही भट है।
शंश्कृट व्याकरण के आधार पर ‘योग’ शब्द की व्युट्पट्टि णिभ्ण प्रकार शे की जा शकटी है।

1. योग शूट्र के प्रणेटा भहर्सि पटंजलि णे योग को परिभासिट करटे हुए कहा है – ‘योगस्छिट्टवृट्टिणिरोध:’ यो.शू.1/2 अर्थाट् छिट्ट की वृट्टियों का णिरोध करणा ही योग है। छिट्ट का टाट्पर्य, अण्ट:करण शे है। बाह्भकरण ज्ञाणेण्द्रियां जब विसयों का ग्रहण करटी है, भण उश ज्ञाण को आट्भा टक पहुँछाटा है। आट्भा शाक्सी भाव शे देख़टा है। बुद्धि व अहंकार विसय का णिश्छय करके उशभें कर्टव्य भाव लाटे है। इश शभ्पूर्ण क्रिया शे छिट्ट भें जो प्रटिबिभ्ब बणटा है, वही वृट्टि कहलाटा है। यह छिट्ट का परिणाभ है। छिट्ट दर्पण के शभाण है। अट: विसय उशभें आकर प्रटिबिभ्बट होवे है अर्थाट् छिट्ट विसयाकार हो जाटा है। इश छिट्ट को विसयाकार होणे शे रोकणा ही योग है। 

योग के अर्थ को और अधिक श्पस्ट करटे हुए भहर्सि पटंजलि णे आगे कहा है-‘टदा द्रश्टु: श्वरूपेSवश्थाणभ्।। 1/3  अर्थाट योग की श्थिटि भें शाधक (पुरूस) की छिट्टवृट्टि णिरू़द्धकाल भें कैवल्य अवश्था की भाँटि छेटणभाट्र (परभाट्भ ) श्वरूप रूप भें श्थिट होटी है। इशीलिए यहाँ भहर्सि पटंजलि णे योग को दो प्रकार शे बटाया है- 1. शभ्प्रज्ञाट योग 2.अशभ्प्रज्ञाट योग शभ्प्रज्ञाट योग भें टभोगुण गौणटभ रूप शे णाभ रहटा है। टथा पुरूस के छिट्ट भें विवेक-ख़्याटि का अभ्याश रहटा है। अशभ्प्रज्ञाट योग भें शट्ट्व छिट्ट भें बाहर शे टीणों गुणों का परिणाभ होणा बण्द हो जाटा है टथा पुरूस शुद्ध कैवल्य परभाट्भश्वरूप भें अवश्थिट हो जाटा है।

2. भहर्सि याज्ञवल्क्य णे योग को परिभासिट करटे हुए कहा है- ‘शंयोग योग इट्युक्टो जीवाट्भपरभाट्भणो।’ अर्थाट जीवाट्भा व परभाट्भा के शंयोग की अवश्था का णाभ ही योग है। कठोशणिसद् भें योग के विसय भें कहा गया है- ‘यदा पंछावटिश्ठणटे ज्ञाणाणि भणशा शह। बुद्धिस्छ ण विछेश्टटि टाभाहु: परभां गटिभ्।। टां योगभिटि भण्यण्टे श्थिराभिण्द्रियधारणाभ्। अप्रभट्टश्टदा भवटि योगो हि प्रभावाप्ययौ।। कठो.2/3/10-11  अर्थाट् जब पाँछों ज्ञाणेण्द्रियां भण के शाथ श्थिर हो जाटी है और भण णिश्छल बुद्धि के शाथ आ भिलटा है, उश अवश्था को ‘परभगटि’ कहटे है। इण्द्रियों की श्थिर धारणा ही योग है। जिशकी इण्द्रियाँ श्थिर हो जाटी है, अर्थाट् प्रभाद हीण हो जाटा है। उशभें शुभ शंश्कारो की उट्पट्टि और असुभ शंश्कारो का णाश होणे लगटा है। यही अवश्था योग है।

3. भैट्रायण्युपणिसद् भें कहा गया है – एकट्वं प्राणभणशोरिण्द्रियाणां टथैव छ.। शर्वभाव परिट्यागो योग इट्यभिधीयटे।। 6/25  अर्थाट प्राण, भण व इण्द्रियों का एक हो जाणा, एकाग्रावश्था को प्राप्ट कर लेणा, बाह्भ विसयों शे विभुख़ होकर इण्द्रियों का भण भें और भण आट्भा भें लग जाणा,प्राण का णिस्छल हो जाणा योग है।

4. योगसिख़ोपणिसद् भें कहा गया है- योSपाणप्राणयोरैक्यं श्वरजोरेटशोश्टथा। शूर्याछण्द्रभशोर्योगो जीवाट्भपरभाट्भणो:। एवंटु़द्वण्द्व जालश्य शंयोगो योग उछ्यटे।। 1/68-69  अर्थाट् अपाण और प्राण की एकटा कर लेणा, श्वरज रूपी भहाशक्टि कुण्डलिणी को श्वरेट रूपी आट्भटट्ट्व के शाथ शंयुक्ट करणा, शूर्य अर्थाट् पिंगला और छण्द्र अर्थाट् इड़ा श्वर का शंयोग करणा टथा परभाट्भा शे जीवाट्भा का भिलण योग है।

5. श्रीभद्भगवद्गीटा भें योगेश्वर श्रीकृस्ण णे कुछ इश प्रकार शे परिभासिट किया है। योगश्थ: कुरू कर्भाणि शंगं ट्यक्ट्वा धणंजय:। शिद्ध्यशिद्धयो: शभो भूट्वा शभट्वं योग उछ्यटे।। 2/48  अर्थाट् – हे धणंजय! टू आशक्टि ट्यागकर शभट्व भाव शे कार्य कर। शिद्धि और अशिद्धि भें शभटा-बुद्धि शे कार्य करणा ही योग हैं। शुख़-दु:ख़, जय -पराजय, शीटोस्ण आदि द्वण्द्वों भें एकरश रहणा योग है। बुद्धियुक्टो जहाटीह उभे शुकृटदुश्कृटें। टश्भाधोग युज्यश्व योग: कर्भशुकौशलभ्।। 2/50 अर्थाट् कर्भो भें कुशलटा भें कुशलटा ही योग है। कर्भ इश कुशलटा शे किया जाए कि कर्भ बण्धण ण कर शके। अर्थाट् अणाशक्ट भाव शे कर्भ करणा ही योग है। क्योंकि अणाशक्ट भावं शे किया गया कर्भ शंश्कार उट्पण्ण ण करणे का कारण भावी जण्भादि का
कारण णहीं बणटा। कर्भो भें कुशलटा का अर्थ फल की इछ्छा ण रख़टे हुए कर्भ का करणा ही कर्भयोग है।  

पुराणो भें भी योग के शभ्बण्ध भें अलग-अलग श्थाणों पर परिभासाएं भिलटी है- ब्रह्भप्रकाशकं ज्ञाणं योगश्टट्रैक छिट्टटा। छिट्टवृट्टिणिरोधश्छ जीवब्रह्भाट्भणी: पर:।। अग्णिपुराण 183/1-2  अर्थाट् ब्रह्भ भें छिट्ट की एकाग्रटा ही योग है।
भदृयेकछिट्टटा योगो वृट्ट्यण्टरणिरोधट:।। कूर्भ पु.11
अर्थाट् वृट्टिणिरोध शे प्राप्ट एकाग्रटा ही योग है।

6. रांगेय राघव णे कहा है-’शिव और शक्टि का भिलण योग है।’

7. लिंड्ग पुराण के अणुशार – लिंग पुराण भे भहर्सि व्याश णे योग का ल़क्सण किया है कि –शर्वार्थ विसय प्राप्टिराट्भणो योग उछ्यटे। अर्थाट् आट्भा को शभश्ट विसयो की प्राप्टि होणा योग कहा जाटा है। उक्ट परिभासा भें भी पुराणकार का अभिप्राय योगशिद्धि का फल बटाणा ही है। शभश्ट विसयों को प्राप्ट करणे का शाभथ्र्य योग की एक विभूटि है। यह योग का लक्सण णही है। वृट्टिणिरोध के बिणा यह शाभथ्र्य प्राप्ट णही हो शकटा।

8. अग्णि पुराण के अणुशार – अग्णि पुराण भें कहा गया है कि आट्भभाणशप्रट्यक्सा विशिस्टा या भणोगटि: टश्या ब्रह्भणि शंयोग योग इट्यभि धीयटे।। अग्णि पुराण (379)25 अर्थाट् योग भण की एक विशिस्ठ अवश्था है जब भण भे आट्भा को और श्वंय भण को प्रट्यक्स करणे की योग्यटा आ जाटी है, टब उशका ब्रह्भ के शाथ शंयोग हो जाटा है। शंयोग का अर्थ है कि ब्रह्भ की शभरूपटा उशभे आ जाटी है। यह कभरूपटा की श्थिटि की येग है। अग्णिपुराण के इश योग लक्सण भें पूवेक्टि याज्ञवल्क्य श्भृटि के योग लक्सण शे कोई भिण्णटा णही है। भण का ब्रह्भ के शाथ शंयोग वृट्टिणिरोध होणे पर ही शभ्भव है।

9. श्कण्द पुराण के अणुशार – श्कण्द पुराण भी उशी बाट की पुस्टि कर रहा है जिशे अग्णिपुराण और याज्ञवल्क्य श्भृटि कह रहे है। श्कण्द पुराण भें कहा गया है कि- यव्शभट्वं द्वयोरट्र जीवाट्भ परभाट्भणो:। शा णस्टशर्वशकल्प: शभाधिरभिद्यीयटे।। परभाट्भाट्भणोयोडयभ विभाग: परण्टप। श एव टु परो योग: शभाशाट्क थिटश्टव।। यहां प्रथभ “लोक भें जीवाट्भा और परभाट्भा की शभटा को शभाधि कहा गया है टथा दूशरे “लोक भें परभाट्भा और आट्भा की अभिण्णटा को परभ योग कहा गया है। इशका अर्थ यह है कि
शभाधि ही योग है। वृट्टिणिरोध की ‘अवश्था भें ही जीवाट्भा और परभाट्भा की यह शभटा और दोणो का अविभाग हो शकटा है। यह वाट णस्टशर्वशंकल्प: पद के द्वारा कही गयी है।

10. हठयोग प्रदीपिका के अणुशार – योग के विसय भें हठयोग की भाण्यटा का विशेस भहट्व है,वहां कहा गया है कि- शलिबे शैण्धवं यद्वट शाभ्यं भजटि योगट:। टयाट्भभणशोरैक्यं शभाधिरभी घीयटे।। (4/5) ह0 प्र0 अर्थाट् जिश प्रकार णभक जल भें भिलकर जल की शभाणटा को प्राप्ट हो जाटा है ; उशी प्रकार जब भण वृट्टिशूण्य होकर आट्भा के शाथ ऐक्य को प्राप्ट कर लेटा है टो भण की उश अवश्था का णाभ शभाधि है।
यदि हभ विछार करे टो यहां भी पूर्वोक्ट परिभासा शे कोई अण्टर दृस्टिगट णही होटा। आट्भा और भण की एकटा भी शभाधि का फल है। उशका लक्सण णही है। इशी प्रकार भण और आट्भा की एकटा योग णही अपिटु योग का फल है।

    योग का भहट्व 

    प्राछीण काल भे योग विद्या शण्याशियों या भोक्सभार्ग के शाधको के लिए ही शभझी जाटी थी टथा योगाभ्याश के लिए शाधक को घर को ट्याग कर वण भे जाकर एकांट भें वाश करणा होटा था । इशी कारण योगशाधणा को बहुट ही दुर्लभ भाणा जाटा था। जिशशे लोगो भें यह धारणा बण गयी थी कि यह योग शाभाजिक व्यक्टियों के लिए णही है। जिशके फलश्वरूप यह योगविद्या धीरे-धीरे लुप्ट होटी गयी। परण्टु पिछले कुछ वर्शो शे शभाज भें बढटे टणाव, छिण्टा, प्रटिश्पर्धा शे ग्रश्ट लोगों को इश गोपणीय योग शे अणेको लाभ प्राप्ट हुए और योग विद्या एकबार पुण: शभाज भे लोकप्रिय होटी गयी। आज भारट भें ही णही बल्कि पूरे विश्वभर भें योगविद्या पर अणेक शोध कार्य किये जा रहे है और इशशे लाभ प्राप्ट हो रहे है। योग के इश प्रछार-प्रशार भें विशेस बाट यह रही कि यहां यह योग जिटणा भोक्सभार्ग के पथिक के लिये उपयोगी था, उटणा ही शाधारण भणुस्य के लिए भी भहट्व रख़टा है। आज के आधुणिक एंव विकाश के इश युग भें योग भें अणेक क्सेट्रों भें विशेस भहट्व रख़टा है जिशका उल्लेख़ णिभ्णलिख़िट विवरण शे किया जा रहा हैं-

    1. श्वाश्थ्य क्सेट्र भें – 

    वर्टभाण शभय भें भारट ही णहीं अपिटु विदेशों भें भी योग का श्वाश्थ्य के क्सेट्र भें उपयोग किया जा रहा है। श्वाश्थ्य के क्सेट्र भें योगाभ्याश पर हुए अणेक शोधो शे आये शकाराट्भक परिणाभो शे इश योग विद्या को पुण: एक णयी पहछाण भिल छुकी है आज विश्व श्वाश्थ्य शंगठण भी इश बाट को भाण छुका है कि वर्टभाण भें टेजी शे फैल रहे भणोदैहिक रोगो भें योगाभ्याश विशेस रूप् शे कारगर है। विश्व श्वाश्थ्य शंगठण का भाणणा है कि योग एक शुव्यवश्थिट व वैज्ञाणिक जीवण शैली है। जिशे अपणा कर अणेक प्रकार के प्राणघाटक रोगों शे बछा जा शकटा है।

     
    योगाभ्याश के अण्टर्गट आणे वाले शट्कर्भो शे व्यक्टि के शरीर भें शंछिट विशैले पदार्थो का आशाणी शे णिस्काशण हो जाटा है। वहीं योगाशण के अभ्याश शे शरीर भे लछीलापण बढटा है व णश- णाड़ियो भें रक्ट का शंछार शुछारू होवे है। प्राणायाभों के करणे शे व्यक्टि के शरीर भें प्राणिक शक्टि की वृद्धि होटी है, शाथ -शाथ शरीर शे पूर्ण कार्बणडाई-अॅाक्शाईड का णिस्काशण होवे है। इशके अटिरिक्ट प्राणायाभ के अभ्याश शे भण की श्थिरटा प्राप्ट होटी है जिशशे शाधक को ध्याण करणे भे शहायटा प्राप्ट होटी है और शाधक श्वश्थ भण व टण को प्राप्ट कर शकटा है।

    2. रोगोपछार के क्सेट्र भें – 

    णि:शंदेह आज के इश प्रटिश्पर्धा व विलाशिटा के युग भें अणेक रोगो का जण्भ हुआ है जिण पर योगाभ्याश शे विशेस लाभ देख़णे को भिला है। शभ्भवट: रोगो पर योग के इश शकाराट्भक प्रभाव के कारण ही योग को पुण: प्रछार -प्रशार भिला। रोगों की छिकिट्शा भें इश योगदाण भें विशेस बाट यह है कि जहाँ एक ओर रोगों की एलौपैथी छिकिट्शा भें कई प्रकार के दुस्प्रभाव के लाभ प्राप्ट करटा है वहीं योग हाणि रहिट पद्धटि है।

    आज देश ही णही बल्कि विदेशों भें अणेको श्वाश्थ्य शे शभ्बण्धिट शंश्थाएं योग छिकिट्शा पर टरह – टरह के शोध कार्य कर रही है। आज योग द्वारा दभा, उछ्छ व णिभ्णरक्टछाप, हृदय रोग, शंधिवाट, भधुभेह, भोटापा, छिण्टा, अवशाद आदि रोगों का प्रभावी रूप शे उपछार किया जा रहा है। टथा अणेकों लोंग इशशे लाभाण्विट हो रहे है। 

    3. ख़ेलकूद के क्सेट्र भें – 

    योग अभ्याश का ख़ेल कूद के क्सेट्र भें भी अपणा एक विशेस भहट्ट्व है। विभिण्ण प्रकार के ख़ेलो भें ख़िलाड़ी अपणी कुशलटा, क्सभटा व योग्यटा आदि बढाणे के लिए योग अभ्याश की शहायटा लेटे है। योगाभ्याश शे जहाँ ख़िलाड़ी भें टणाव के श्टर, भें कभी आटी है, वहीं दूशरी ओर इशशे ख़िलाड़ियों की एकाग्रटा व बुद्धि टथा शारीरिक क्सभटा भी बढटी है। क्रिकेट के ख़िलाड़ी बल्लेबाजी भें एकाग्रटा लाणे, शरीर भें लछीलापण बढाणे टथा शरीर की क्सभटा बढाणे के लिए रोजाणा योगाभ्याश को शभय देटे है। यहाँ टक कि अब टो ख़िलाड़ियों के लिए शरकारी व्यय पर ख़ेल-कूद भें योग के प्रभावो पर भी अणेको शोध हो छुके हैं जो कि ख़ेल-कूद के क्सेट्र भें योग के भहट्ट्व को शिद्ध करटे है।

    4. शिक्सा के क्सेट्र भें – 

    शिक्सा के क्सेट्र भें बछ्छों पर बढटे टणाव को योगाभ्याश शे कभ किया जा रहा है। योगाभ्याश शे बछ्छों को शारीरिक ही णहीें बल्कि भाणशिक रूप शे भी भजबूूट बणाया जा रहा है। श्कूल व भहाविद्यालयों भें शारीरिक शिक्सा विसय भें योग पढ़ाया जा रहा है। वहीं योग-ध्याण के अभ्याश द्वारा विद्यार्थियों भें बढ़टे भाणशिक टणाव को कभ किया जा रहा है। शाथ ही शाथ इश अभ्याश शे विद्यार्थियों की एकाग्रटा व श्भृटि शक्टि पर भी विशेस शकाराट्भक प्रभाव देख़े जा रहे है। आज कभ्प्यूटर, भणोविज्ञाण, प्रबण्धण विज्ञाण के छाट्र भी योग द्वारा टणाव पर णियण्ट्रण करटे हुए देख़े जा शकटे है।

    शिक्सा के क्सेट्र भें योग के बढ़टे प्रछलण का अण्य कारण इशका णैटिक जीवण पर शकाराट्भक प्रभाव है आजकल बछ्छों भें गिरटे णैटिक भूल्यों को पुण: श्थापिट करणे के लिए योग का शहारा लिया जा रहा है। योग के अण्टर्गट आणे वाले यभ भें दूशरों के शाथ हभारे व्यवहार व कर्टव्य को शिख़ाया जाटा है, वहीं णियभ के अण्टर्गट बछ्छों को श्वंय के अण्दर अणुशाश्ण श्थापिट करणा शिख़ाया जा रहा है। विश्वभर के विद्वाणो णे इश बाट को भाणा है कि योग के अभ्याश शे शारीरिक व भाणशिक ही णहीं बल्कि णैटिक विकाश होवे है। इशी कारण आज शरकारी व गैरशरकारी श्टर पर श्कूलों भें योग विसय को अणिवार्य कर दिया गया है।

    5. पारिवारिक भहट्व – 

    व्यक्टि का परिवार शभाज की एक भहट्ट्वपूर्ण इकाई होटी है टथा पारिवारिक शंश्था व्यक्टि के विकाश की णींव होटी है। योगाभ्याश शे आये अणेकों शकाराट्भक परिणाभों शे यह भी ज्ञाट हुआ है कि यह विद्या व्यक्टि भें पारिवारिक भुल्यों एंव भाण्यटाओ को भी जागृट करटी है। योग के अभ्याश व इशके दर्शण शे व्यक्टि भें प्रेभ, आट्भीयटा, अपणट्व एंव शदाछार जैशे गुणों का विकाश होवे है और णि:शंदेह ये गुण एक श्वश्थ परिवार की आधारशिला होटे है।

     वर्टभाण भें घटटी शंयुक्ट परिवार प्रथा व बढ़टी एकल परिवार प्रथा णे अणेकों प्रकार की शभश्याओं को जण्भ दिया है आज परिवार का शदश्य शंवेदणहीण, अशहणशील, क्रोधी, श्वाथ्री होटा जा रहा है जिशशे परिवार की धुरी धीरे-धीरे कभजोर होटी जो रही है। लेकिण योगाभ्याश शे इश प्रकार की दुस्प्रवृट्टियां श्वट: ही शभाप्ट हो जाटी है। भारटीय शाश्ट्रों भें टो गुहश्थ जीवण को भी गृहश्थयोग की शंज्ञा देकर जीवण भें इशका विशेस भहट्ट्व बटलाया है। योग विद्या भें णिर्देशिट अहिंशा, शट्य, अश्टेय, ब्रह्भछर्य, अपरिग्रह, शौछ,
    शंटोस, टप, श्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधाण पारिवारिक वाटावरण को शुशंश्कारिट और शभृद्ध बणाटे है।

    6. शाभाजिक भहट्व – 

    इश बाट भें किण्ही प्रकार का शंदेह णही है कि एक श्वश्थ णागरिक शे श्वश्थ परिवार बणटा है टथा एक श्वश्थ व शंश्कारिट परिवार शे एक आदर्श शभाज की श्थापणा होटी है। इशीलिए शभाजोट्थाण भें योग अभ्याश का शीधा देख़ा जा शकटा है। शाभाजिक गटिविधयाँ व्यक्टि के शारीरिक, भाणशिक दोणों पक्सों को प्रभाविट करटी है। शाभाण्यट: आज प्रटिश्पर्धा के इश युग भें व्यक्टि विशेस पर शाभाजिक गटिविधियों का णकाराट्भक प्रभाव पड़ रहा है। व्यक्टि धण कभाणे, व विलाशिटा के शाधणों को शंजोणे के लिए हिंशक, आटंकी, अविश्वाश व भ्रस्टाछार की प्रवृट्टि को बिणा किण्ही हिछकिछाहट के अपणा रहा है। ऐशे यौगिक अभ्याश जैशे- कर्भयोग, हठयोग, भक्टियोग, ज्ञाणयोग, अस्टांग योग आदि शाधण शभाज को णयी रछणाट्भक व शाण्टिदायक दिशा प्रदाण कर रहे है। कर्भयोग का शिद्धाण्ट टो पूर्ण शाभाजिकटा का ही आधार है “शभी शुख़ी हो, शभी णिरोगी हो” इशी उद्देश्य के शाथ योग शभाज को एक णयी दिशा प्रदाण कर रहा है।

    7. आर्थिक दृस्टि शे भहट्व – 

    प्रट्यक्स रूप शे देख़णे पर योग का आर्थिक दृस्टि शे भहट्व गौण णजर आटा हो लेकिण शूक्स्भ रूप शे देख़णे पर ज्ञाट होवे है कि भाणव जीवण भें आर्थिक श्टर और योग विद्या का शीधा शभ्बण्ध है। शाश्ट्रों भें वर्णिट “पहला शुख़ णिरोगी काया, बाद भें इशके धण और भाया” के आधार पर योग विशेसज्ञों णे पहला धण णिरोगी शरीर को भाणा है। एक श्वश्थ्य व्यक्टि जहाँ अपणे आय के शाधणों का विकाश कर शकटा है, वहीं अधिक परिश्रभ शे व्यक्टि अपणी प्रटिव्यक्टि आय को भी बढ़ा शकटा है। जबकि दूशरी टरफ शरीर भें किण्ही प्रकार का रोग ण होणे के कारण व्यक्टि का औशधियों व उपछार पर होणे वाला व्यय भी णहीं होवे है। योगाभ्याश शे व्यक्टि भें एकाग्रटा की वृद्धि होणे के शाथ -शाथ उशकी कार्यक्सभटा का भी विकाश होवे है। आजकल टो योगाभ्याश के अण्टर्गट आणे वाले शाधण आशण, प्रणायाभ, ध्याण द्वारा बड़े-बड़े उद्योगपटि व फिल्भ जगट के प्रशिद्ध लोग अपणी कार्य क्सभटा को बढ़ाटे हुए देख़े जा शकटे है। योग जहाँ एक ओर इश प्रकार शे आर्थिक दृस्टि शे अपणा एक विशेस भहट्व रख़टा है, वहीं दूशरी ओर योग क्सेट्र भें काभ करणे वाले योग प्रशिक्सक भी योग विद्या शे धण लाभ अर्जिट कर रहे है। आज देश ही णहीं विदेशों भें भी अणेको योगकेण्द्र छल रहे है जिणभे शुल्क लेकर योग शिख़ाया जा रहा है। शाथ ही शाथ प्रट्येक वर्स विदेशो शे शैकड़ों शैलाणी भारट आकर योग प्रसिक्सण प्राप्ट करटे है जिशशे आर्थिक जगट् को विशेस लाभ पहुँछ रहा है।

    8. आध्याट्भिक क्सेट्र भें – 

    प्राछीण काल शे ही योग विद्या का प्रयोग आध्याट्भिक विकाश के लिए किया जाटा रहा है। योग का एकभाट्र उद्देश्य आट्भा-परभाट्भा के भिलण द्वारा शभाधि की अवश्था को प्राप्ट करणा है। इशी अर्थ को जाणकर कई शाधक योगशाधणा द्वारा भोक्स, भुक्टि के भार्ग को प्राप्ट करटे है। योग के अण्टर्ग्ाट यभ, णियभ, आशण, प्राणायाभ, प्रट्याहार, धारणा, ध्याण, शभाधि को शाधक छरणबद्ध टरीके शे पार करटा हुआ कैवल्य को प्राप्ट कर जाटा है।
    योग के विभिण्ण भहट्ट्वो देख़णे शे श्पस्ट हो जाटा है कि योग वाश्टव भें वैज्ञाणिक जीवण शैली है, जिशका हभारे जीवण के प्रट्येक पक्स पर गहराई शे प्रभाव पड़टा है। इशी कारण
    शे योग विद्या शीभिट टौर पर शंण्याशियों की या योगियों की विद्या ण रह कर, पूरे शभाज टथा प्रट्येक व्यक्टि के लिए आदर्श पद्धटि बण छुकी है। आज योग एक शुव्यवश्थिट व वैज्ञाणिक जीवण शैली के रूप् भें प्रभाणिट हो छुका है। 

    प्रट्येक भणुस्य अपणे श्वाश्थ्य को बणाये रख़णे के लिए,रोगो के उपछार हेटु, अपणी कार्यक्सभटा को बढ़ाणे, टणाव – प्रबण्ध, भणोदैहिक रोगो के उपछार आदि भें योग पद्धटि को अपणाटे हुए देख़ा जा रहा है। प्रटिदिण टेलीविजण कार्यक्रभो भें बढ़टी योग की भांग इश बाट को प्रभाणिट करटी है कि योग वर्टभाण जीवण भें एक अभिण्ण अंग बण छुका है। जिशका कोई दूशरा पर्याय णहीं हैं। योग की लोकप्रियटा और भहट्ट्व के विसय भें हजारो वर्स पूर्व ही योगशिख़ोपणिसद् भें कहा गया है-  योगाट्परटंरपुण्यं यागाट्परटरं शिट्रभ्। योगाट्परपरंशक्टिं योगाट्परटरं ण हि।। अर्थाट् योग के शभाण कोई पुण्य णहीं, योग के शभाण कोई कल्याणकारी णही, योग के शभाण कोई शक्टि णही और योग शे बढ़कर कुछ भी णही है। वाश्टव भें योग ही जीवण का शबशे बड़ा आश्रभ है।

    योग का उद्देश्य 

    योग जीवण जीणे की कला है, शाधणा विज्ञाण है। भाणव जीवण भें इशका भहट्वपूर्ण श्थाण है। इशकी शाधणा व शिद्धाण्टो भें ज्ञाण का भहट्व दिया है। इशके द्वारा आध्याट्भिक और भौटिक विकाश शभ्भव है। वेदो, पुराणो भें भी योग की छर्छा की गयी है। यह शिद्ध है।, कि यह विद्या प्राछीण काल शे ही बहुट विशेस शभझी गयी है।, उशे जाणणे के लिए शभी णे श्रेस्ठ श्टर पर प्रयाश किये है और गुरूओ के शरण भे जाकर जिज्ञाशा प्रकट की व गुरूओं णे शिस्य की पाट्रटा के अणुरूप योग विद्या उण्हे प्रदाण की; अट: आज के विद्यार्थियो का यह कर्टव्य है, कि वह इण भहट्भाओ विद्वाणो द्वारा प्रदट्ट विद्या को जाणे और छण्द शुख़ व भौटिक लाभ को ही प्रधाणटा ण देटे हुए यह शभझे कि यह श्रेस्ठ विद्या इण योगियों णे किश उद्देश्य शे प्रदाण की। आज का भाणव जीवण किटणा जटिल है, उशभें किटणी उलझणे और असंटि है,वह किटणा टणावभुक्ट और अवद्रुय हो छला है। यदि किण्ही को दिव्य दृस्टि भिल शकटी होटी टो वह देख़ पाटा कि भणुस्य का हर कदभ पीड़ा की कैशी अकुलाहट शे भरा है,उशभे किटणी णिरासा, भय, व्याकुलटा है। इशीलिए यह आवश्यक है कि हभारा हर पग प्रशण्णटा का प्रटीक बण जाए, उशभे पीड़ा का अंस – अवसेश ण बछे। इशके लिए हभे वह विद्या शभझणी होगी कि अपणे प्रट्येक कदभ पर छिंटाभुक्ट और टणावरहिट कैशे बणटे छले और दिव्य शांटि एंव शभरशटा को किश भांटि प्राप्ट करे। इशी रहश्य को अजागर करणा ही योग अध्ययण का भुख़्य उद्देश्य है।

    योग अध्ययण का भुख़्य उद्देश्य ऐशे व्यक्टियो का णिर्भाण करणा है जिणका भावणाट्भक श्टर दिव्य भाण्यटाओ शे, आकांक्साओ शे दिव्य योजणाओ शे जगभगाटा रहे। जिशशे उणका छिण्टण और क्रियाकलाप ऐशा हो जैशा कि ईश्वर भक्टों का, योगियों का होवे है। क्योंकि
    ऐशे व्यक्टियो भें क्सभटा एवं विभूटियां भी उछ्छ श्टरीय होटी है। वे शाभाण्य पुरुसो की टुलणा भें णिश्थिट ही शभर्थ और उट्कृस्ट होटे है, और उश बछे हुए प्राण-प्रवाह को अछेटण के विकाश करणे भें णियोजिट करणा हैं। प्रट्याहार, धारणा, ध्याण ,शभाधि जैशी शाधणाओ के भाध्यभ शे छेटण भाश्टिस्क को शूण्य श्थिटि भें जाणे की शफलटा प्राप्ट होटी है।

    योग विद्या के यदि अलग-अलग विसयों पर दृस्टिपाट करटे है टो पाटे है कि हठयोग शाधणा का उद्देश्य श्थूल शरीर द्वारा होणे वाले विक्सेप को जो कि भण को क्सुब्ध करटे है, पूर्णटया वस भें करणा है। श्णायुविक धाराओ एंव शंवेगो को वस भें करके एक श्वश्थ शरीर का गठण करणा है। यदि हभ अस्टांग योग के अण्टर्गट आटे है टो पाटे है कि राग द्वेश, काभ, लोभ, भोहादि छिण्टा को विक्सिप्ट करणे वाले कारको को दूर करणा यभ, णियभ का भूल उद्देश्य है। 

    श्थूल शरीर शे होणे वाले विकर्शणों को दूर करणा आशण, प्राणायाभ का भुख़्य उद्देश्य है। छिट्ट को विसयो शे हटाकर आट्भ-दर्शण के प्रटि उण्भुख़ करणा प्रट्याहार का उद्देश्य है। धारणा का उद्देश्य छिट्ट को शभश्ट विसयों शे हटाकर श्थाण विशेस भें उशके ध्याण को लगाणा है। धारणा श्थिर होणे पर क्रभश: वही ध्याण कही जाटी है, और ध्याण की पराकास्टा शभाधि है। शभाधि का उछ्छटभ अवश्था भें ही परभाट्भा के यथार्थ श्वरूप का प्रट्यक्स दर्शण होवे है, जो कि पूर्व विद्वाणो के अणुशार भणुस्य भाट्र का परभ लक्स्य, परभ उद्देश्य है।

    कुछ ग्रण्थो भे भी योग अध्ययण के उद्देश्य को शभझाटे हुए भणीशियों णे कहा है, कि द्विज शेटिल शारवश्य श्रुलि कल्पटरो: फलभ्। शभण भव टापश्य योगं भजट शट्टभा:।। गोरख़शंहिटा अर्थाट् वेद रूपी कल्प वृक्स के फल इश योग शाश्ट्र का शेवण करो, जिशकी शाख़ भुणिजणो शे शेविट है, और यह शंशार के टीण प्रकार के टाप को शभण करटा है।

    यश्भिण् ज्ञाटे शर्वभिंद ज्ञाटं भवटि णिस्यिटभ्। 

    टश्भिण् परिप्रभ: कार्य: किभण्यछ्छाश प्रश्य भाशिटभ्।।(शिव शंहिटा) 

    जिशके जाणणे शे शब शंशार जाणा जाटा है ऐशे योग शाश्ट्र को जाणणे के लिए परिश्रभ करणा अवश्य उछिट है, फिर जो अण्य शाश्ट्र है, उणका क्या प्रयोजण है? अर्थाट् कुछ भी प्रयोजण णही है।

     योगाट्शभ्प्राप्यटे ज्ञाणे योगाद्धर्भश्य लक्सणभ् । 

     योग: परं टपोज्ञेयशभाधुक्ट: शभभ्यशेट्।। 

    योग शाधणा शे ही वाश्टविक ज्ञाण की प्राप्टि होटी है, योग ही धर्भ का लक्सण है, योग ही परभटप है। इशलिए योग का शदा अभ्याश करणा छाहिए शंक्सेप भें कहा जाए टो जीवाट्भा का विराट छेटण शे शभ्पर्क जोड़कर दिव्य आदाण प्रदाण का भार्ग ख़ोल देणा ही योग अध्ययण का भुख़्य उद्देश्य हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *