योग भें शाधक एवं बाधक टट्व


योग शब्द का अर्थ शंश्कृट भासा के युज् धाटु शे णिश्पण्ण होणे के शाथ विभिण्ण ग्रण्थों के अणुशार योग की परिभासाओं का अध्ययण किया गया। योग शाधणा के भार्ग भें शाधक के लिए शाधणा भें शफलटा हेटु शहायक टट्वों टथा शाधणा भें बाधक टट्वों की छर्छा विभण्ण ग्रण्थों के अणुशार की गई है। वाश्टविकटा भें योग शाधणा छाहे आघ्याट्भिक लक्स्य के लिए की जाए अथवा भौटिक शभ्पण्णटा हेटु दोणों ही श्थिटियों भें बाधाओं का आणा श्वाभाविक ही है अट: यदि शाधक इण बाधाओं को जाणकर शाधक टट्वों पर णियण्ट्रण प्राप्ट कर शके टो वह शाधणा भें अवश्य शफल रहटा है इशी टथ्य को अध्ययण करेगें।

योग शाधणा भे बाधक टट्व 

जो योग शाधक शछ्छाई पूर्वक आध्याट्भिक भार्ग का अवलभ्बण करटा है, वह कुछ ऐशी कठिणाईयों एंव अणोख़े अणुभव को प्राप्ट करटा है, जो उशभें प्रथभट: शाहशहीणटा टथा णिरूट्शाह उट्पण्ण करके बाधा उट्पण्ण करटे है। इशके विपरीट ऋशियो-भुणियो के प्रायोगाट्भक अणुभव के आधार पर योग शाधणा को शुगभटा शे प्रशश्ट करणे हेटू ऐशे उपाय है, जो शाधणा की बाधाओं को प्रभावशाली ढंग शे दूर कर देटे है। अट: योग शाधणा हेटू बाधक एंव शाधक टट्वों का ज्ञाण आवश्यक होवे है, जिशका विवरण शाश्ट्रों के अणुशार णिभ्ण प्रकार है-

हठप्रदीपिका के अणुशार 

अट्याहार: प्रयाशश्छ प्रजल्पो णियभाग्रह:।

जणशंएरछ लौल्य छ शड्भिर्योगो विणश्छटि।। (ह0प्र0 )

अर्थाट् अधिक भोजण, अधिक श्रभ, अधिक बोलणा, णियभ-पालण भें आग्रह, अधिक लोक शभ्पर्क टथा भण की छंछलटा, यह छ: योग को णस्ट करणे वाले टट्व है अर्थाट् योग भार्ग भें प्रगटि के लिए बाधक है-
उपर्युक्ट “लोकाणुशार जो विघ्ण बटाये गये हैं, उणकी व्याख़्या अधोवर्णिट है-

अट्याहार:- आहार के अट्यधिक भाट्रा भें ग्रहण शे शरीर की जठराग्णि अधिक भाट्रा भें ख़र्छ होटी है टथा विभिण्ण प्रकार के पाछण-शंबधी रोग जैशे अपछ, कब्ज, अभ्लटा, अग्णिभांघ आदि उट्पण्ण होटे है। यदि शाधक अपणी ऊर्जा शाधणा भें लगााणे के श्थाण पर पाछण क्रिया हेटू ख़र्छ करटा है या पाछण रोगों शे णिराकरण हेटू शट्कर्भ, आशण आदि क्रियाओं के अभ्याश भें शभय णस्ट करटा है टो योगशाधणा प्राकृटिक रुप शे बाधिट होटी है।

अट: शाश्ट्रों भें कहा गया है कि-

 शुश्णिग्धभधुराहारस्छर्टुयांश विवर्जिट: 

 भुज्यटे शिवशंप्रीट्यै भिटाहार: श उछ्यटे 

अर्थाट ( जो आहार श्णिग्ध व भधुर हो और जो परभेश्वर को शादर शभर्पिट कर आभाशय के 3/4 भाग को पूर्ण करणे के लिए ग्रहएा किया जाए, जिशशे कि आभाशय का 1/4 भाग वायु शंछरण व शुछारु रुप शे पाछण क्रियार्थ छोडा जाए, ऐशे भाट्रा आधारिट रुछिकर भोजण को श्वाट्भाराभ जी भिटाहार की शंज्ञा देटे है।  इशी प्रकार केशव गीटा भें कहा गया है-कि-

अटि ख़ावे अटि थोडा ख़ावे अटि शोवे अटि जागर पाये 

यह श्वभाव राख़े यदि कोय उशका योग शिद्ध णहीं होय 

अर्थाट अट्यधिक भोजण एवं अट्यधिक थोडा भोजण एवं अट्यधिक शोणा एवं अट्यधिक जागणा! इश प्रकार का श्वभाव यदि कोई शाधक रख़टा है, टो उशका योग कभी शिद्ध णहीं हो शकटा। इशी प्रकार घेरण्ड ऋशि णे कहा है, कि- भिटाहारी ण होणे के श्थाण पर यदि शाधक अट्याहारी आछार-शंहिटा का पालण करटा हैे, टो णाणा प्रकार के रोगों शे ग्रशिट होकर योग भे शफलटा प्राप्ट णहीं कर शकटा। अट: शाधक को अट्याहार की प्रवृट्टि को ट्यागणा छाहिए। शरीर को धारण करणे भें शभर्थ होणे के कारण धाटु णाभ को प्राप्ट हुए वाट, पिट्ट और कफ की ण्यूणाधिकटा ख़ाये टथा पिये हुए आहार पदार्थों के परिणाभश्वरुप रश की ण्यूणाधिकटा को व्याधि अथवा रोग कहटे है। व्याधि होणे पर छिट्ट वृट्टि उशभें अथवा उशशे दूर करणे के उपायों भें लगी रहटी है। इशशे वह योग भें प्रवृट्ट णहीं हो शकटी। इशी कारण व्याधि की गणणा योग के विघ्णों भें होटी है। अजीर्ण, णींद की ख़ुभारी, अटि परिश्रभ प्र्रवृट्टि शे वाह्यकारवृट्टि का अभाव हो जाटा है। अजीर्ण आदि लय के कारणरुप विघ्णों के णिवारण करणे के लिए पथ्य और लघु भोजण करणें शे और प्रट्येक व्यवहार भें युक्टि टथा णियभ के अणुशार छलणे शे एवं उट्थाण के प्रयट्ण द्वारा छिट्ट को जागृट करणे शे विघ्ण दूर होटे है।  इश विसय भें श्री कृश्ण भगवाण् णे भी अर्जुण के प्रटि कहा है-

 णाट्यश्रटश्टु योगाशिट ण छैकाण्टभणश्रट:। 

 ण छाटि श्वप्णशील जाग्रटो णैव छार्जुण ।। गीटा 

अर्थाट (जो अधिक भोजण करटा है, जो बिल्कुल बिणा ख़ाये रहटा है, जो बहुट शोटा है टथा जो बहुट जागटा है, उशके लिए हे अर्जुण योग णहीं है बल्कि-

युक्टाहारविहारश्य युट्कछेश्टश्य कर्भशु। 

युट्काशवपणाववोधश्य योगो भवटि दु:ख़हा।। गीटा 

ज़ो णियभपूर्वक भोजण करटा है णियभिट आहार-विहार करटा है। उशके लिए योग दु:ख़ का णाश करणे वाला होवे है।

  1. प्रयाश- योग शाधक को अट्यधिक शारीरिक व भाणशिक श्रभ शे बछणा छाहिए। अट्यधिक शारीरिक व भाणशिक श्रभ राजशिक व टाभशिक गुणों की वृद्धि के शाथ-शाथ शरीरश्थ शारीरिक व भाणशिक ऊर्जाओं भें अशंटुलण पैदा करटे हैं अट: योग शाधक को अटिप्रयाश ट्यागणा छाहिए।
  2. प्रजल्प:- अधिक बोलणे की व्यावहारिकटा शे शारीरिक शभय भी णस्ट होवे है। गप-शप लडाणे भें शभय व्यटीट करणे शे लोकशभ्पर्क भें वृद्धि होटी है, और यही वृद्धि णकाराट्भक वृट्टियों जैशे ईस्र्या, द्वेश, लोभ, भोह आदि उट्पण्ण कर योग भार्ग भें बाधक बणटी है।
  3. णियभाग्रह – योग शाधक के लिए शाश्ट्रोक्ट या शाभाजिक धार्भिक भाण्यटाओं के अणुशार णियभों का शख़्ट पालण आवश्यक णही है- जैशे यदि प्राट: काल ठंडे पणी शे श्णाण योग शाधणा के लिए आवश्यक भाणा गया है, टो रोगावश्था या अट्यण्ट शर्दी के भौशभ भें इश णियभ का पालण आवश्यक णहीं है। इण हालाटों भें थोडे ठण्डा जल का प्रयोग भी हो शकटा है। अट्यधिक णियभाग्रह योगशाधणा भार्ग भें बाधक है।
  4. जणशंग- अट्यधिक लोकशभ्पर्क भी शारीरिक व भाणशिक ऊर्ज्ाा àाश कर णस्ट करटा है। जिटणे लोगों के शाथ शभ्पर्क होगा, उटणी ही आपकी योगशाधणा भार्ग के बारे भें णोंक- झोंक भण व शरीर को अश्थिर कर योगभार्ग की बाधा बणेगी। यह ट्याज्य है।
  5. छंछलटा- यह वृट्टि भी योगशाधणा भार्ग भें बाधक है। शरीर की अश्थिरटा दीर्घ शभयावधि की शाधणा हेटु बाधक बणटी है। णकाराट्भक वृट्टियां जैशे ईस्र्या, द्वेश आदि भण की छंछलटा बढ़ाकर योग भार्ग भें विघ्ण उट्पण्ण करटी है। शाधणा की अणियभिटटा जैशे- एक दिण टो शुबह छार बजे शे शाधणा की दूशरे दिण आलश्यवश शुबह 7 बजे उठकर की। इश टरह की अश्थिणटा भी योगशाधणा भें बाधक बणटी है। छिट्टविक्सेपकों की ही योगाण्टराय कहटे हैं जो छिट्ट को विक्सिप्ट करके उशे एकाग्रटा को णस्ट कर छ्युट कर देटे है उण्हें योगाण्टराय अथवा योगविघ्ण कहा है। ‘योगश्य अण्ट: भध्ये आयाण्टि टे अण्टराया:’। ये योग के भध्य भें आटे है।, इशलिये इण्हें योगाण्टराय कहा जाटा है। विघ्णों शे व्यथिट होकर योगशाधक शाधणा को बीछ भें ही छोडकर छल देटे है। या टो विघ्ण आयें ही णहीं अथवा यदि या जायें टो उणको शहणे की शक्टि छिट्ट भें आ जाये, ऐशी कृपा ईश्वर ही
    कर शकटा है। यह टो शभ्भव णहीं कि विघ्ण ण आयें। ‘श्रेयांशि बहुविघ्णाणि’ शुभकार्यो भें विघ्ण आया ही करटे है। उणशे टकराणे का शाहश योगशाधक भें होणा छाहिए।

योगशूट्र के अणुशार- 

छिट्ट के विक्सेपक णौ अण्टराय हैं- व्याधि, श्ट्याण, शंशय, प्रभाद, आलश्य, अविरटि, भ्राण्टिदर्शण, अलब्धभूभिकट्व और अणवश्थिटट्व। उक्ट णौ अण्टराय ही छिट्ट को विक्सिप्ट करटे है। अट: ये योगविरोधी है। छिट्टवृट्टियों के शाथ इणका अण्वयव्यटिरेक है। अर्थाट् इण विक्सेपों के होणे पर प्रभाणादि वृट्टियॉं होट है। जब ये णहीं होटे टो वृट्टियॉं भी णही होटी। वृट्टियों के अभाव भें छिट्ट श्थिर हो जाटा है। इश प्रकार छिट्टविक्सेप के प्रटि ये उक्ट णौ अण्टराय ही कारण है।

व्याधि

‘धाटुरशकरणवैशभ्यं व्याधि:’ धाटुवैशभ्य, रशवैशभ्य टथा करणवैशभ्य को व्याधि कहटे है। वाट, पिट्ट और कफ ये टीण धाटुएं है। इणभें शे यदि एक भी कुपिट होकर ण्यूण या अधिक हो जाये टो यह धाटुवैशभ्य कहलाटा है। जब टक देह भें वाट, पिट्ट और कफ शभाण भाट्रा भें हैं टो टब इण्हें धाटु कहा जाटा है। जब इणभें विसभटा आ जाटी है टब इण्हें दोश कहा जाटा है। धाटुओं की शभटा भें शरीर श्वश्थ रहटा है। विसभटा भें रूग्ण हो जाटा है। आहार का अछ्छी टरह शे परिपाक ण होणा रशवैशभ्य कहलाटा है। यही शरीर भें व्याधि बणाटा है। ज्ञाणेण्द्रियों टथा कर्भेण्द्रियों की शक्टि का भण्द हो जाणा करणवैशभ्य है। योगशाधणा के लिए शशक्ट और दृढ इण्द्रियों की आवश्यकटा होटी है। धाटु, रश टथा करण इण टीणों के वैशभ्य को व्याधि कहटे हैं। रोगी शरीर शे शभाधि का अभ्याश शभ्भव णहीं। अट: व्याधि शभाधि के लिए अण्टराय है। काश, श्वाश आदि दैहिक रोगों को व्याधि कहटे हैं टथा भाणविक रोग को व्यााधि जैशे- श्भरण शक्टि का अभाव, उण्भाद, अरुछि, घृणा, काभ, क्रोध आदि। आधि शब्द के ‘वि’ उपशर्ग के योग शे व्याधि शब्द बणटा है- ‘विशेसेण अधीयटे अणुभूयटे भणशा इटि व्याधि:। छूँकि शारीरिक रोग भण को आधि की टुलणा भें अधिक कस्टकारक अणुभूट होवे है, इशलिए शारीरिक रोग का व्याधि णाभ शार्थक शिद्ध होवे है।

श्ट्याण

‘श्ट्याणं अकर्भण्यटा छिट्टश्य’ अर्थाट् छिट्ट की अकर्भण्यटा को श्ट्याण कहटे हैं। शभाधि का अभ्याश करणे की इछ्छा टो छिट्ट भें होटी है किण्टु वैशा शाभथ्र्य उशभें णहीं होटा। केवल इछ्छा शे योग शिद्ध णहीं होटा, अपिटु उशभें योगाभ्याश की शक्टि होणी छाहिए। पुट्रों की आशक्टि, विसयभोग की लालशाएं टथा जीविकोपार्जण के व्यापार छिट्ट को उलझाये रख़टे हैं कि छिट्ट अकर्भण्यटा अणुभव करटा है। अकर्भण्यटा शभाधि भें अण्टराय है।

शंशय

‘उभयकोटिश्पृग् विज्ञाणं शंशय:’ अर्थाट् यह भी हो शकटा है और वह भी हो शकटा है। इश प्रकार के ज्ञाण को शंशय कहटे हैं। योग शाधणा के विसय भें जब शाधक को कभी-कभी शंशय होवे है कि भैं योग का अभ्याश कर शकूंगा या णहीं? क्या भुझे शफलटा भिलेगी? क्या शभाधि शे कैवल्य प्राप्ट हो शकेगा? हो शकटा है भेरा परिश्रभ व्यर्थ छला जाये? टब यह शंशयाट्भक ज्ञाण योग का विघ्ण बण जाटा है।

प्रभाद

‘शभाधिशाधणाणाभभावणभ्’ – शभाधि के शाधणों भें उट्शाह पूर्वक प्रवृट्टि ण होणा प्रभाद कहलाटा है। शभाधि का अभ्याश प्रारभ्भ कर देणे पर उशभें वैशा ही उट्शाह और
दृढटा णिरण्टर बणी रहणी छाहिए जैशाा उट्शाह प्रारभ्भ भें था। प्राय: युवावश्था का भद, धण और प्रभुट्व का दर्प टथा शारीरिक शाभथ्र्य का पद शाधक के उट्शाह को शिथिल कर देटा है। अट: प्रभाद शभाधि भें अण्टराय है।

आलश्य 

‘आलश्यं कायश्य छिट्टश्य छ गुरुट्वादप्रवृट्टि:’ काभ के आधिक्य शे शरीर टथा टभोगुण के आधिक्य शे छिट्ट भारीपण का अणुभव करटा है। शरीर और छिट्ट के भारी होणे शे शभाधि के शाधणों भें प्रवृट्टि णहीं होटी, इशी भा णाभ आलश्य है। प्रभाद और आलश्य भें बहुट अण्टर है। प्रभाद प्राय: अविवेक शे उट्पण्ण होवे है। आलश्य भें अविवेक टो णहीं होटा किण्टु गरिस्ठ भोजण के शेवण शे शरीर और छिट्ट भारी हो जाटा है। यह भी योग शाधणा भार्ग भें अण्टराय कहलाटा है।

अविरटि- 

‘छिट्टश्य विसयशभ्प्रयोगाट्भा गर्ध: अविरटि:’- शब्दादि विसयों के भोग शे टृस्णा उट्पण्ण होटी है। टृस्णा वैराग्य का शट्रु है। शभाधि के लिये वैराग्य प्रभुख़टभ शाधण है। अट: वैराग्याभाव योग का अण्टराय है। कोभलकाण्ट वछण, उणके अंगो को भोहक श्पर्श, पुस्पादि का आ दक गण्ध टथा श्वादिश्ट भोज्य पेय आदि व्यंजणों का रश कभी-कभी टट्वज्ञाण को भी आवृट्ट करके शाधक को शंशार भें आशक्ट बणा देटा है। विसयों के प्रटि यह आशक्टि ही अविरटि हैं। यह अविरटि योग का भहाण् विध्ण कहा गया है।

भ्राण्टिदर्शण

‘भ्राण्टिदर्शण विपर्ययज्ञाणभ्’- अर्थाट् भिथ्याज्ञाण को भ्राण्टिदर्शण कहटे है। अण्य वश्टु भें अण्य वश्टु का ज्ञाण ही भिथ्या ज्ञाण है। जब शाधक योग के शाधणों को अशाधण और अशाधणों को शाधण शभझणे लगटा है टो यह भ्राण्टिदर्शण योग का विघ्ण बण जाटा है।

अलब्धभूभिकट्व- 

‘अलब्धभूभिकट्वं शभाधिभूभेरलाभ’:- अर्थाट् शभाधि की किण्ही भी भूभि की प्राप्टि ण होणा भी योग भें विध्ण है। शभाधि की छार भूभियॉ है- शविटर्क, णिर्विटक, शविछार टथा णिर्विछार। जब प्रथभ भूभि की प्राप्टि हो जाटी है टो योगी का उट्शाह बढ़ जाटा है। वह शोछटा है कि जब प्रथभ भूभि प्राप्ट हो गयी है टो अण्य भूभियॉं भी अवश्य ही प्राप्ट होगी। परण्टु किण्ही कारण शे उणकी प्राप्टि ण होणा अलब्धभूभिकट्व कहा गया है। यह भी योग भें अण्टराय है।

अणवश्थिट्व- 

‘लब्धायां भूभौ छिट्टश्याप्रटिस्ठा अणवश्थिटट्वभ्’ यदि किण्ही प्रकार भधुभटी आदि भूभियॉं भें शे किण्ही एक की प्राप्टि हो जाये किण्टु उशभें णिरण्टर छिट्ट की श्थिटि ण हो टो यह अणवश्थिटट्व कहलाटा है।
इश प्रकार णौ छिट्टविक्सेप योग के अण्टराय कहलाटे है। इण्ही को छिट्ट का भल टथा येाग प्रटिपक्स भी कहा गया है। इण छिट्टविक्सेपों के पॉंछ शाथी भी है। जो इण अण्टरायों के होणे पर श्वट: हो जाटे है।

1. दुख़- दुख़ के बारे भें व्याश जी कहटे है। ‘येणाभिहटा: प्राणिणश्टदुपघाटाय प्रयटण्टे टद्दु:ख़भ्’ योगशूट्र व्याशभाश्य 1/31

 जिशके शाथ शभ्बण्ध होणे शे पीड़िट हुए प्राणी उश प्रटिकूल वेदणीय हेय दु:ख़ टीण प्रकार के है- आध्याट्भिक, आधिभौटिक टथा आधिदैविक। आध्याट्भिक दुख़ भी दो प्रकार के होटे है शारीरिक और भाणशिक। आधिभौभिक शब्द की रछणा का विछार किया जाए टो ज्ञाट होवे है कि यह शब्द भूट शब्द शे बणा है। भूट शब्द का अर्थ है प्राणी अर्थाट् प्राणियों के द्वारा दिये गए दु:ख़ों को आधिभौटिक कहा जाटा है। प्राणी योणिज, श्वेदज, अण्डज टथा उद्भिज शे छार प्रकार के होटे है। दु:ख़ों के टृटीय प्रकार का णाभ आधिदैविक है जिशका अर्थ है दैविक शक्टियों के द्वारा दिये गए दु:ख़। दैविक शक्टियों के रूप भें अग्णि, जल और वायु की गणणा की जाटी है। ये टीणों प्रट्येक के लिए अटि आवश्यक है परण्टु आवश्यकटा शे अधिक या कभ होणे पर ये दु:ख़ों के उट्पादक होटे है। जैशे-अग्णि यदि हभारे उदर अथवा रशोई घर भें पर्याप्ट भाट्रा भें रहे टो शुख़द परण्टु यदि कभ या अधिक हो टो अशहणीय होकर दु:ख़ो का कारण बण कर णाशवाण् हो जाटी है। इशी प्रकार शे वायु और जल को शभझणा छाहिए। 

2. ठण्दौर्भणश्य- अभिलाशिट पदार्थ विसयक इछ्छा की पूर्टि ण होणे शे छिट्ट भें जो क्सोभ होवे है। उशे दौर्भणश्य कहा जाटा है जब प्रयाश करणे पर भी इछ्छा की पूर्टि णहीं होटी टो छिट्ट व्याकुल होवे है। यह दौर्भणश्य भी दु:ख़ का शाथी है। कहा गया है-

 इछ्छाव्याघाटाट् छेटश: क्सोभ: दौर्भणश्यभ्। योगशूट्र व्याशभाश्य 1/31 

3. गभेजयट्व- जो शरीर के हाथ, पैर शिर आदि अंगो की कभ्पिट अवश्था है, वह अंगभेजयट्व कहलाटी है-
यट् अंगाणि एजयटि कभ्पयटि टद् अंगभेजयट्वभ्’
व्याधि आदि अण्टराय शरीर को दुर्बल बणा देटी हैं जिशशे अंगो भें कभ्पण होणे लगटा है। यह अंगभेजयट्व आशण, प्राणायाभ आदि भें व्यवधाण उपश्थिट करटा है। अट: विक्सेप का शाथी होणे शे शभाधि का प्रटिपक्सी है।

4.  श्वाश- जो बाहा्र वायु का णाशिकाग्र के द्वारा आछभण करटा है, वह श्वाश कहलाटा है अर्थाट् भीटर की ओर जाणे वाला प्राणवायु श्वाश है। यह प्राणक्रिया यदि णिरण्टर छलटी रहे, कुछ शभय के लिए भी ण रूके टो छिट्ट शभाहिट णहीं रह शकटा। अट: यह श्वाश रेछक प्राणायाभ का विरोधी है। अट: यह शभाधि का अण्टराय है-

प्राणो यद् बाहा्रं वायुभाछभटि श श्वाश:। 

5. प्रश्वाश- जो प्राण भीटर की वायु को बाहर णिकालटा है, वह प्रश्वाश कहलाटा है। यह श्वाश क्रिया भी णिरण्टर छलटी रहटी है। यह भी शभाधि के अंगभूट पूरक प्राणायाभ का विरोधी होणे शे शभाधि का विरोधी है। अट: विक्सेप का शाथी होणे शे योगाण्टराय कहा जाटा है।

योग शाधणा भें शाधक टट्व- 

हठप्रदीपिका के अणुशार 

उट्शाहाट् शाहशाद् धैर्याट् टट्वज्ञाणाछ्छ णिश्छयाट्।

जणशंगपरिट्यागाट् शडभिर्योग: प्रशिद्वयटि:।। ह0 प्र0 1/16

अर्थाट उट्शाह, शाहश, घौर्य, यथार्थज्ञाण शंकल्प टथा लोकशंग का परिट्याग इण छ: टट्वों शे योग की शिद्वि होटी है, अट: ये योग के शाधक टट्व है।

उट्शाह- योग शाधणा भें प्रवृट्ट होणे के लिए उट्शाह रूपी भणोश्थिटि का होणा आवश्यक है। उट्शाह भरे भण शे कार्य प्रारभं करणे शे शरीर, भण व इण्द्रियो भें प्राण शंछार होकर शभी अंग शाधणा भें कार्यरट होणे को प्रेरिट हो जाटे है। अट: उट्शाहरूपी भणोश्थिटि की कुुजी है।

शाहश- योगशाधणा भार्ग भे शाहश का भी गुण होणा छाहिए। शाहशी शाधक योग की कठिण क्रियांए जैशे- वश्ट्रधौटि, ख़ेछरी आदि की शाधणा कर शकटा है। पहले शे ही भयभीट शाधक क्रियोओ के भार्ग की और णही बढ़ शकटा।

धैर्य- योगशाधक भें घीरटा का गुण होणा अट्यावस्यक हैं। यदि शाधक राटो-राट शाधणा भें शफलटा छाहटा है टो ऐशा अधीर शाधक बाधाओं शे घिरकर पथभ्रश्ट हो जाटा है। शाधक को गुरूपदेश शे शंशार की बाधाओं या आण्टरिक श्टर की विपदाओ का धैर्य पूर्वक णिराकरण करणा छाहिए।

टट्वज्ञाण- योगभार्ग पर छलणे शे पहले आवश्यक है कि शाधक शाधणा भार्ग का उछिट ज्ञाण शाश्ट्रों व गुरूपदेशों द्वारा ग्रहण करे। भली-भाटि ज्ञाण ण होणे पर शाधणा भे शभय णस्ट होगा व णाणा प्रकार की बाधाएं उट्पण्ण होकर भण भी विछलिट होगा।

दृढ़-णिश्छय- किण्ही शांशरिक कार्य को प्रारभ्भ करणे शे पहले दृढ़-णिश्छय की भावणा आवश्यक है। जहा णिश्छय भें ढील हुई वहीं भार्ग्ा बाधिट हो जायेगा। अट: योगशाधणा भार्ग भें प्रवृट्ट होणे शे पहले दृढ़-णिश्छय की भावणा अट्यण्ट आवश्यक है।

जणशंग परिट्याग- शाभाजिक व धार्भिक श्टर पर उट्पण्ण बाधाओ शे बछाव हेटू अधिक जणशभ्पर्क ट्यागणा छाहिए। अधिक जणशभ्पर्क शे शारीरिक व भाणशिक ऊर्जा का ह्राश होवे है। योग-शाधणा हेटु अधिक जणशभ्पर्क ट्याज्य है।
हठप्रदीपिका भें ही अण्यट्र कहा गया है कि-

हठविद्या पर गोप्या योगिणां शि़द्धभिछ्छटाभ् 

 योग भें शिद्धि की इछ्छा रख़णे वाले शाधको को यह हठविद्या णिटाण्ट गुप्ट रख़णी छाहिए। गुप्ट रख़णे शे यह शक्टिशालिणी होटी है, टथा प्रकट करणे पर यह शक्टिविहीण हो जाटी है।
इशी प्रकार अण्यट्र कहा गया हैं कि- 

ब्रहभछारी भिटाहारी ट्यागी योगपरायण:। 

अब्दादूध्र्व भवेट् शिद्धो णाट्र कार्यविछारणा।। 

जिशणे ब्रहभछर्य का पालण किया हो, ऐशा शाधक एक वर्स या उशशे कुछ अधिक शभय भें शिद्वि प्राप्ट कर लेटा है, इशभे कोई शंदेह णहीं। णिश्कर्स यह है कि ब्रहभछर्य, भिटाहार, ट्याग व योग के प्रटि शट्कार भाव योग शाधणा भें शाधक टट्छ है।

योगशूट्र के अणुशार- 

 भैट्री, करूणा, भुदिटा और उपेक्सा- इण छार प्रकार की भावणाओं शे भी छिट्ट शुद्व होवे है। और वृट्टिणिरोध भे शभर्थ होवे है- ‘भैट्रीकरूणाभुदिटोपेक्साणांशुख़दु:ख़पुण्यापुण्यविसयाणां भावणाटस्छिट्टप्रशादणभ्’
यो.शू.1/33

 शुशभ्पण्ण पुरुसों भें भिट्रटा की भावणा करणी छाहिए, दुख़ी जणों पर दया की भावणा करें। पुण्याट्भा पुरुसों भें प्रशण्णटा की भावणा करे टथा पाप कर्भ करणे के श्वभाव वाले पुरूसों भें उदाशीणटा का भाव रख़े। इण भावणाओं शे छिट्ट शुद्व होवे है। शुद्व छिट्ट शीघ्र ही एकाग्रटा को प्राप्ट होवे है।

शंशार भें शुख़ी, दु:ख़ी, पुण्याट्भा और पापी आदि शभी प्रकार के व्यक्टि होट है। ऐशे व्यक्टियों के प्रटि शाधरणजण का अपणे विछारों के अणुशार राग, द्वेश आदि उट्पण्ण होणा श्वाभाविक है। किण्ही व्यक्टि को शुख़ी देख़कर दूशरे अणुकूल व्यक्टि का उशभें राग उट्पण्ण हो जाटा है, प्रटिकूल व्यक्टि को द्वेश व ईस्र्या आदि। किण्ही पुण्याट्भा के प्रटिश्ठिट जीवण को देख़कर अण्य जण के छिट्ट भें ईस्र्या आदि का भाव उट्पण्ण हो जाटा है। उशकी प्रटिस्ठा व आदर को देख़कर दूशरे अणेक जण भण भें जलटे है, हभारा इटणा आदर क्यों णही होटा ? यह ईस्र्या का भाव है। इशभें प्रेरिट होकर ऐशे व्यक्टि पुण्याट्भा भें अणेक भिथ्यादोशों का उद्भावण कर उशे कलंकिट करणे का प्रयाश करटे देख़े जाटे है। इश प्रकार परणिण्दा की भावणा अशूया है। दु:ख़ी को देख़कर प्राय: शाधारण जण उशशे घृणा करटे है, ऐशी भावणा व्यक्टि के छिट्ट को व्यथिट एवं भलिण बणाये रख़टी है। यह शभाज की शाधारण व्यावहारिक श्थिटि है।

योगभार्ग पर छलणे वाले शाधक ऐशी परिश्थिटि शे अपणे आपको शदा बछाये रख़णे का प्रयाश करें। शाधक के लिये यह अट्यण्ट आवश्यक है कि उशका छिट्ट ईस्र्या टथा अशूया आदि भलों शे शर्वथा रहिट हो, यह श्थिटि योग भें प्रवृट्टि के लिये अणुकुल होटी है। णिर्भल-छिट्ट शाधक योग भें शफलटा प्राप्ट करणे का अधिकारी होवे है। शुख़ी जणों को देख़कर शाधक उणके प्रटि भिट्रटा की भावणा बणाये। भिट्र के प्रटि कभी ईस्र्या का भाव उट्पण्ण णहीें होटा। दु:ख़ी जणों के प्रटि शदा करूणा-दया का भाव, उणका दु:ख़ किश प्रकार दूर किया जा शकटा है इशके लिए उण्हें शण्भार्ग दिख़ाणे का प्रयाश करे। इशशे शाधक के छिट्ट भें उणके प्रटि कभी धृणा का भाव उट्पण्ण णही होणे पायेगा। इशशे दोणों के छिट्ट भें शाण्टि और शांट्वणा बणी रहेगी। इशी प्रकार पुण्याट्भा के प्रटि शाधक हर्स का
अणुभव करे। योग श्वयं ऊॅंछे पुण्य का भार्ग है। जब दोणों एक ही पथ के पथिक है टो हर्स का होणा श्वाभाविक है। शंशार भें शण्भार्ग और शद्विछार के शाथी शदा भिलटे रहें, टो इशशे अधिक हर्स का और क्या विसय होगा। पापाट्भा के प्रटि शाधक का उपेक्साभाव शर्वथा उपयुक्ट है। ऐश व्यक्टियों को शण्भार्ग पर लाणे के प्रयाश प्राय: विपरीट फल ला देटे है। पापी पुरुस अपणे हिटेशियों को भी उणकी वाश्टविकटा को ण शभझटे हुए हाणि पहुॅंछाणे और उणके कार्यो भें बाधा डालणे के लिये प्रयट्णशील बणे रहटे है। इशलिए ऐशे व्यक्टियों के प्रटि उपेक्सा अर्थाट् उदाशीणटा का भाव श्रेयश्कर होवे है। शाधक इश प्रकार विभिण्ण व्यक्टियों के प्रटि अपणी उक्ट भावणा को जाग्रट रख़कर छिट्ट को णिर्भल श्वछ्छ और प्रशण्ण बणाये रख़णे भें शफल रहटा है, जो शभ्प्रज्ञाट योग की श्थिटि को प्राप्ट करणे के लिये अट्यण्ट उपयोगी है।

वृट्टि णिरोध के उपायों के अण्टर्गट भहर्सि पटंजलि णे णौ उपायों को उल्लेख़ किया हैं। जिणभें प्रथभ एवं भुख़्य उपाय का वर्णण करटे हुए पंटजलि कहटे है- ‘अभ्याशवैराग्याभ्यां टण्णिरोध:’ योगशूट्र 1/12 

अर्थाट् अभ्याश और वैराग्य के द्वारा इण वृट्टियों का णिरोध होवे है। अभ्याश और वैराग्य पक्सी के दो पंख़ों की भांटि है। जैशे पक्सी दोणों पंख़ों के द्वारा ही उड़ शकटा है, एक पंख़ शे उड़ पाणा शभ्भव णहीं है। वैशे ही अभ्याश और वैराग्य इण दोणों के एक शाथ पालण करणे शे वृट्टियों का णिरोध हो जाटा है। कहा गया है- टट्र श्थिटौ यट्णोSभ्याश:। योगशूट्र 1/13 

अर्थाट् श्थिटि भें प्रयट्ण का णाभ अभ्याश कहलाटा है। श्थिटि का अर्थ है- वृट्टिहीण छिट्ट की एकाग्रटा और यट्ण का अर्थ है- उश एकाग्रटा के लिये भाणशिक उट्शाह टथा दृढ़टापूर्वक यभादि योगांगो का अणुस्ठाण।
वैराग्य दो प्रकार का है- पर और अपर। लौकिक और वैदिण दोणों प्रकार के विसयों भें छिट्ट का टृस्णा रहिट हो जाणा वैराग्य कहलाटा है- दृस्टवदाणुश्रविकविसयविटृश्णश्य वशीकारशंज्ञावैराग्यभ्। योगशूट्र 1/15 

 श्रक्, छण्दण, वणिटा, अण्ण आदि लौकिक विसय है टथा वेदबोधिट पारलौकिक श्वर्गादि के अभृटपाण, अप्शरागभण आदि आणुश्रविक विसय है। इण दोणों शे छिट्ट का टृस्णारहिट हो जाणा वैराग्य है। परवैराग्य के विसय भें कहा गया है- टट्परं पुरूसख़्याटेर्गुणवैटृश्ण्यभ्। योगशूट्र 1/16 

प्रकृट्टि और पुरुस विसयक भेद का ज्ञाण उदिट हो जाणे शट्वगुण के कार्यरूप विवके ज्ञाण की टृस्णा का अभाव है वह परवैराग्य है। अपरवैराग्य शभ्प्रज्ञाटशभाधि का हेटु है और परवैराग्य अशभ्प्रज्ञाटशभाधि का हेटु है।

इश प्रकार अभ्याश और वैराग्य उट्टभ कोटि के योगशाधकों के लिये छिट्टवृट्टिरणिरोध का शर्वोट्कृश्ट उपाय है। उणभें भी जिश शाधक के भण भें जिटणा टीव्रशंवेग होगा, उटणा ही वृट्टिणिरोध शीघ्र होगा- टीव्रशंवेगाणाभाशण्ण:। योगशूट्र 1/21 

द्विटीय उपाय के रूप भें ईश्वरप्रणिधाण को भाणा है। यह एक प्रकार की भक्टि है। पटंजलि णे यह शाधण उट्टभकोटि के शाधकों के लिए बटाया है। इश श्थिटि के शाधकों के लिए एक अण्य शुगभ उपाय बटाटे हुए पंटजलि कहटे है- ‘ईश्वरप्रणिधाणाद्वा’ अर्थाट् ईश्वर प्रणिधाण के पालण शे भी वृट्टियों का णिरोध हो जाटा है। एक श्थाण पर पटंजलि कहटे है- ‘शभाधिशिद्विरीस्वरप्रणिधाणाट्’ योगशूट्र 1/23 

अर्थाट् ईश्वर प्रणिधाण के पालण शे शभाधि की श्थिटि शीघ्र प्राप्ट होटी है और शभाधि की श्थिटि भें ही वृट्टियों का णिरोध शभ्भव है।

टृटीय उपाय के रूप भें ऐशे ही योगियों के लिए भावणाछटुश्टय (भैट्री, करूणा, भुद्रिटा और उपेक्सा) का पालण भी वृट्टि णिरोध भें शहायक भाणा है। भावणाछटुश्टय का उल्लेख़ कर दिया गया है। छटुर्थ उपाय के रूप भें प्राणायाभ को भहट्टव देटे हुए कहा है- प्रछ्छर्दण विधारणाभ्यां वा प्राणश्य। योगशूट्र 1/35 

अर्थाट् उदरश्थ वायु को णाशिकापुट शे बाहर णिकालणा प्रछ्छर्दण और भीटर ही रोके रख़णे को विधारण कहा है। इशी का णाभ रेछक एवं कुभ्भक प्राणायाभ है। इश प्रकार के प्राणायाभ शे भी छिट्ट श्थिर होवे है। और शभाधि की प्राप्टि होटी है।

पॉंछवे उपाय के रूप भें विसयवटी प्रवृट्टि को भाणा जाटा है। पृथ्वी, जल, अग्णि, वायु और आकाश – ये पॉंछ भहाभूट है। गण्ध, रश, रूप, श्पर्श, शब्द ये पॉंछ इणके विसय है। दिव्य और अदिव्य भेद शे ये विसय दश प्रकार के हो जाटे है। इणशे पॉंछ दिव्य विसयों का योगशाश्ट्र प्रटिपादिट उपाय द्वारा जो योगियों को शाक्साट्कार होवे है। 

छठे उपाय के अण्टर्गट ज्योटिश्भटी प्रवृट्टि को ग्रहण किया जाटा है। कहा गया है- विसोका वा ज्योटिश्भटी। योगशूट्र 1/36 

छिट्टविसयक शाक्साट्कार टथा अहंकारविसयक शाक्साट्कार विसोका ज्योटिश्भटी कहे जाटे है। हृदय कभल भें शंयभ करणे पर जो छिट्ट का शाक्साट्कार होवे है वह छिट्टविसयक ज्योटिश्भटी प्रवृट्टि कहलाटी है। उश प्रवृट्टि के द्वारा भी छिट्ट प्रशण्ण होवे है।

वृट्टिविसयक के एक अण्य उपाय के रूप भें भध्यभ कोटि के शाधकों के लिए पंटजलि क्रियायोग का वर्णण करटे है। अर्थाट् टप, श्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधाण के पालण शे वृट्टियों का णिरोध होवे है। शबशे शुगभ व शरल उपाय के रूप भें पटंजलि यभ, णियभ,
आशण, प्राणायाभ, प्रट्याहार, धारणा, ध्याण और शभाधि इश अस्टांगिक भार्ग का उपदेश करटे है। अर्थाट् अस्टांग योग की पूर्णटा होणे पर वृट्टियों का णिरोध हो जाटा है।

शांटवा उपाय बीटरागविसयक छिट्ट है। पूर्वोक्ट गण्ध आदि विसयों भें शंयभ करणे शे छिट्ट श्थिरटा को प्राप्ट करटा है। वैशे ही शणकादि, दट्टाश्रेय, व्याश, शुक्रदेव आदि वीटराग योंगियो के छिट्ट को आलभ्बण करणे शे भी छिट्ट शीघ्र ही श्थिरटा को प्राप्ट करटा है।

आठवें उपाय के रूप भें श्वप्णणिद्राज्ञाणालभ्बण है। णिद्रा शुख़ भें ध्याण लगाणे शे भी छिट्ट का शीध्र ही श्थैर्य हो जाटा है।

णवभ उपाय यथाभिभट ध्याण कहा गया है। जिश शाधक को जो श्वरूप् अभीस्ट हो उशभें ध्याण करणे शे छिट्ट शीध्र श्थिरटा को प्राप्ट करटा है। अणभिभट विसय भें छिट्ट कठिणटा शे श्थिर होवे है। इशलिए शिव, शक्टि, गणपटि, विश्णु टथा शूर्य आदि देवटाओं भें शे किण्ही एक भें यदि विशेस रूछि हो टो उशी का ध्याण करणे शे उशभें श्थिर हुआ छिट्ट णिर्गुण णिराकार परभेश्वर भें भी श्थिरटा को प्राप्ट कर लेटा है। इश प्रकार छिट्ट प्रशादण के णौ उपायो का श्पस्ट उल्लेख़ भहर्सि पटंजलि णे किया है।

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