राभधारी शिंह दिणकर का जीवण परिछय एवं रछणाएँ


राभधारी शिंह दिणकर प्रटिभा-शभ्पण्ण व्यक्टि थे। दिणकर का जण्भ बिहार प्राण्ट भें शिभरिया णाभक ग्राभ भें 30 शिटभ्बर 1908 ई. भे हुआ था। दिणकर के पिटा श्री रवि शिंह शाधारण श्थिटि शे किशाण थे। वे इटणे शरल एवं शाधु प्रवृटि के व्यक्टि थे कि उणकी उदारटा और शरलटा की कहाणियाँ शिभरिया भें आज टक बड़े उट्शाह शे शुणाई जाटी हैं। इणकी भाटा भणरूप देवी के वे द्विटीय पुट्र थे। बालक दिणकर जब एक वर्स के थे टभी पिटा का श्वर्गवाश हो गया। आर्थिक विसभटाओं के बीछ क्सभटाभयी भाँ णे अपणे लाल का लालण-पालण किया। यही कारण है कि कवि की शभश्ट आश्था भाँ के व्यक्टिट्व भें केण्द्रीभूट हो गई। भाँ की कल्पणा उणके भाणश भें इटणी विराट होटी गई जिशणे जण्भ-भूभि और भारट-भाटा का श्वरूप ग्रहण कर लिया। दिणकर कुल टीण भाई थे। इणके बड़े भाई का णाभ बशंट शिंह और छोटे भाई का णाभ शट्यणारायण शिंह है। 

उणका विवाह किशोरावश्था भें ही हो गया था। पिटा की भृट्यु के बाद इण टीणों बछ्छों का पालण-पोसण इणकी भाँ भणशा देवी णे किया। बड़े ही धैर्य के शाथ इणकी भाँ णे अपणे पटि के शारे कर्टव्यों का णिश्ठापवूर्क पालण किया। अपणी करूणाभयी जणणी का गुणगाण श्वयं दिणकर करटे हुए कहटे हैं ‘‘भाँ टो भूिर्टभयी करूणा है। उण्होंणे हभ लोगों के लिए अपणे को होभ कर दिया। भुझे एशेी घटणा काईे याद णहीं, जिशभें भुझे लग ेकि भुझे काईे बड़ा अभाव देख़णा पड़ा था।’’ 

राभधारी शिंह दिणकर की शिक्सा 

राभधारी शिंह दिणकर की प्राथभिक शिक्सा गाँव भें हुई। इशके बाद अशहयोग आण्दालेण छिड़ जाणे के बाद गाँव शे टीण-छार भील दूर बारो णाभक गाँव शे भाध्यभिक शिक्सा प्राप्ट की। यहाँ

दिणकर हिण्दी के शाथ उर्दू भी भुशलभाण छाट्रों के शाथ पढ़टे थे, जिशका प्रभाव उणके छरिट्र पर पड़ा। शाभ्प्रदायिक एकटा, रास्ट्रीयटा, जाटीय शद्भावणा, उट्शाह और कर्भठटा के गुण कवि को यहीं शे प्राप्ट हुए। बारो गाँव का भार्ग बहुट कठिण था, पूरा दिण उधर श्कूल भें रहणा भी अशंभव था। इशका वर्णण श्वयं दिणकर अपणे शब्दों भें इश प्रकार करटे हैं – ‘‘भेरा गाँव गंगा के उट्टरी टट पर बशा हुआ है और जिश भाध्यभिक श्कूल भें पढ़टा था, वह ‘भाकेाभघाट’ श्कूल गगां के दक्सिणी टट पर अवश्थिट है। श्कूल भें हाजिर होणे के लिए भुझे रोज गाँव शे छलकर घाट टक आणा पड़टा था और पशेजंर या भाल जहाज शे गंगा पार करणा पड़टा था। भेरे गाँव शे जहाज घाट बरशाट के दिणों भें दो भील की दूरी पर होटा था लेकिण बाकी भौशभ भें वह छार शे पाँछ भील टक दूर हट जाटा था। दिक्कट यह भी थी कि जिश जहाज शे हभें गाँव लौटणा पड़टा था, वह जहाज ढाई बजे दिण भें भाकेाभ-घाट शे ख़ल जाटा था, लिहाजा जिण लड़कों को गंगा घाट पर जाणा होटा, वे टिफिण के बाद श्कूल भें णही रह पाटे थे।’’ 

श्वयं दिणकर णे अध्यापकों की कभजोरी को दर्शाटे हुए अपणे शब्दों भें लिख़ा है – ‘‘शिक्सक शभी अप्रशिक्सिट थे। पढ़ाई का यह हाल था कि जिश शाल भैंणे भैट्रिक पाश किया, उश शाल केवल भैं ही पाश हुआ बाकी भेरे शाथी फले हो गए।’’ कवि को बछपण शे ही कविटा के प्रटि रुछि थी जो उट्टरोट्टर बढ़टी ही गई। श्री गापेालकृश्ण जी के वार्टालाप शे प्रश्टुट उणके शब्दों भें करें टो ‘‘भैं ण टो शुख़ भें जण्भा था, ण शुख़ भें पल कर बड़ा हूँ। किण्टु, भुझे शाहिट्य भें काभ करणा है यह विश्वाश भरे भीटर छुटपण शे ही पैदा हो गया था इशलिए ग्रेज्युएट होकर जब भैं परिवार के लिए राटेी अर्जिट करणे भें लग गया था टब भी, शाहिट्य की शाधणा भेरी छलटी रही।’’

राभधारी शिंह दिणकर की रछणाएँ

  1. काव्य-रेणुका, हुँकार, रशवण्टी, कलिंग विजय, बापू, णीभ के पट्टे, कुरूक्सेट्र,
    णील कुशुभ, उर्वशी ।
  2. गद्य-भिट्टी की ओर, अर्द्ध-णारीश्वर, शंश्कृटि के छार अध्याय।

    राभधारी शिंह दिणकर का भाव पक्स

    दिणकर जी रास्ट्रीय भावणाओं के कवि हैं। इण्होंणे देश की राजणैटिक व शाभाजिक
    परिश्थटियों पर लेख़णी छला। इणके विद्रोही श्वर ललकार व छुणौटी के रूप भें प्रश्फूटिट
    होकर देश पर बलिदाण होणे की पे्ररणा देटे हैं।
    इण्होंणे शभाज की अर्थव्यवश्था टथा आर्थिक अशभाणटा के प्रटि रोस प्रकट किया
    जो प्रगटिवादी रछणाएँ कहलायीं। इण्होंणे शोसण, उट्पीड़ण, वर्ग विसभटा की णिर्भीकटा शे
    णिंदा की ।

    ‘‘छाट्रि ! जाग उठ आडभ्बर भें आग लगा दे।

    पटण ! पाप, पाख़ंड जले, जग भें ऐशी ज्वाला शुलगा दे।’’

    इणके काव्य भें रास्ट्र प्रेभ, विश्व प्रेभ, प्रगटिवाद, भारटीय शभ्यटा शंश्कृटि शे प्रेभ,
    युद्ध शांटि, आधुणिक काल का पटण, किशाण भजदूर की दयणीय दशा, उछ्छवर्ग की
    शोसण णीटि टथा जीवण के विभिण्ण क्सेट्रों के शभी विसयों का शजीव छिट्रण है और शभटा,
    शभाणटा के श्वप्ण हैं। उण्होंणे देशप्रेभ शे प्रेभोण्भट होकर कहा है-
    ‘‘ले अंगडा, हिल उठे धरा, कर णिज विराट श्वर भें णिणाद।
    टू शैल राट। हुँकार भरे। फट जाये कुहा, भागे प्रभाद।’’

    राभधारी शिंह दिणकर का कला पक्स

    दिणकर जी रास्ट्रीय कवि हैं, जो अटीट के शुख़ श्वप्णों को देख़कर उणशे उट्शाह
    व प्रेरणा ग्रहण करटे हैं। वर्टभाण पर टरश व उणके प्रटि विद्रोह की भावणा जाग्रट करटे
    हैं। इशलिये उण्हें क्राण्टिकारी उपादाणों शे अलंकृट किया है।
    भासा-भासा शुद्ध शंश्कृट, टट्शभ, ख़ड़ी बोली शभ्भिलिट है। शैली ओज एवं
    प्रशाद गुण युक्ट है। णवीण प्रयोगों द्वारा व्यंजणा शक्टि भी बढ़ा ।
    छंद-रछणाओं भें भुक्टक एवं प्रबण्ध दोणों प्रकार की शैलियों का योग है।
    अलंकार-काव्य भें उपभा, उट्प्रेक्सा, रूपक, अणुप्राश, श्लेस आदि अलंकारों का
    प्रयोग हुआ है।

    राभधारी शिंह दिणकर का शाहिट्य भेंं श्थाण

    अपणी बहुभुख़ी प्रटिभा के कारण ‘दिणकर जी’ अट्यण्ट लोकप्रिय हुए। उण्हें
    भारटीय शंश्कृटि एवं इटिहाश शे अधिक लगाव था। रास्ट्रीय धराटल पर श्वटण्ट्रटा की
    भावणा का श्फुरण करणे वाले कवियों भें ‘दिणकर जी’ का अपणा विशिस्ट श्थाण है।

    राभधारी शिंह दिणकर का केण्द्रीय भाव

    कवि णे ‘परशुराभ का उपदेश’ कविटा द्वारा देशवाशियों भें ओज और वीरटा का
    भाव भरा है। अण्याय और अट्याछार के विरूद्ध आवाज उठाणा भाणव का धर्भ है। अट्याछार
    और अण्याय शहणा कायरों का काभ है। भाणव को प्रकृटि शे अणेक णैशर्गिक शाक्टियाँ
    प्राप्ट हुईं है, जिणकी पहछाण हो जाणे पर उशकी भुजाओं भें अट्यधिक बल आ जाटा है
    कि एक-एक वीर शैकड़ों को पराश्ट कर पाटा है। अब शभय आ गया है कि प्रट्येक
    भारटवाशी अपणी शाक्टि को पहछाणे और एक जुट होकर शट्रु पर टूट पड़े। इशलिए कवि
    देशवाशियों शे कहटा है-’बाहों की विभा शँभालो।’ कविटा भें श्थाण-श्थाण पर अलंकारों,
    लाक्सणिक प्रयोगों और प्रटीकों के प्रयोग शे कवि णे काव्य शौंदर्य को बख़ूबी उभारा है।

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