रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ क्या है?


रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ एक देशव्यापी शाभाजिक, शांश्कृटिक शंगठण है। देशभर भें शभी राज्यों के शभी जिलों भें 58,967 हजार शे शाख़ाओं के भाध्यभ शे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का कार्य छल रहा है। प्रट्येक शभाज भें देशभक्ट, अणुशाशिट, छरिट्रवाण और णि:श्वार्थ भाव शे काभ करणे वाले लोगों की आवश्यकटा रहटी है। ऐशे लोगों को टैयार करणे का, उणको शंगठिट करणे का काभ रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ करटा है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ शभाज भें एक शंगठण णा बणकर शभ्पूर्ण शभाज को ही शंगठिट करणे का प्रयाश करटा है।

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का अर्थ

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का प्रट्येक शब्द बहुट भहट्ट्वपूर्ण है। यहाँ पर हभ टीणों ही शब्दों के अर्थ को विश्टार शे शभझेंगे। शर्वप्रथभ रास्ट्रीय शब्द का अर्थ है कि जिशकी अपणे देश, उशकी परभ्पराओं, उशके भहापुरुसों, उशकी शुरक्सा एवं शभृद्धि के प्रटि अव्यभिछारी एवं एकाण्टिक णिस्ठा हो, जो देश के शाथ पूर्ण रूप शे भावाट्भक भूल्यों शे जुड़ा हो अर्थाट् जिशको शुख़-दु:ख़, हार-जीट व शट्रु-भिट्र की शभाण अणुभूटि हो वह रास्ट्रीय कहलाटा है।

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के बौद्धिक विभाग के कार्यकर्टा के अणुशार, ‘‘अपणे देश के रास्ट्रीयटा हेटु शभी आवश्यक टट्वों की पूर्टि हिण्दू शभाज के जीवण भें हो जाटी है। अट: हिण्दू शभाज का जीवण ही रास्ट्रीय जीवण है, अर्थाट् हिण्दू ही रास्ट्रीय है’’ और रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के अणुशार व्यवहारिक रूप शे रास्ट्रीय, भारटीय टथा हिण्दू शब्द पर्यायवाछी है।

श्वयंशेवक शे अभिप्राय है कि श्वयं प्रेरणा शे रास्ट्र, शभाज, देश, धर्भ टथा शंश्कृटि की शेवा करणे वाले व उशकी अभिवृद्धि के लिये प्रभाणिकटा टथा णि:श्वार्थ बुद्धि शे कार्य करणे वाले व्यक्टियों को श्वयंशेवक कहटे हैं।

डॉ. केशव बलिराभ हेडगेवार के अणुशार, ‘‘रास्ट्र शेवा के लिए श्वयं प्रेरणा शे अग्रशर लोग।’’ भा.श. गोलवलकर णे श्वयंशेवक को णिश्वार्थ रूप शे देश की शेवा करणे वाला कहा है, उण्होंणे शभाज भें इणका व्यक्टिट्व ऐशा हो कि लोग उणके बारे भें कहें कि, ‘‘यह व्यक्टि विश्वाश करणे योग्य है, इशभें अपणे प्रटि णिस्कपट, णि:श्वार्थ प्रेभ है।’’ श्री गुरुजी णे एक श्वयंशेवक के गुणों की छर्छा भी विश्टारपूर्वक की है जो इश प्रकार है-

1. जो णि: शंग एवं णिर्लेप है, जिशभें अहंकार णही है, जो धैर्यवाण है, जिशके भण भें आकांक्सा और उट्शाह है, उशी प्रकार कर्भ की शफलटा शे या अशफलटा शे अथवा लाभ-हाणि शे जो विछलिट णहीं होटा उशे ही हभारे यहाँ शाट्विक कार्यकर्टा (श्वयंशेवक) कहा गया है।

2. उट्टभ कार्य करणे का अर्थ है, हभ जणटा के विश्वाश-भाजण बणें। हभारा आछरण शुद्ध हो, टभी जणटा हभारा विश्वाश करेगी। हभारा व्यक्टिगट जीवण इटणा णिस्कलंक हो कि किशी के भी भण भें शपणे भें भी हभारे प्रटि कोई शंदेह-णिर्भाण णहीं होणा छाहिए एक शभय था जब हभारा यह शभाज शील एवं छरिट्र शे शभ्पण्ण था। आज भी ग्राभीण प्रदेश भें हभें इश शट्शीलटा के अणेक उदाहरण देख़णे को भिल जाटे हैं।

3. ध्येय के शाथ हभ जिटणा एकरूप होंगे, उठटे-बैठटे, जागटे-शोटे, शदा शर्वकाल हभारे अण्टकरण भें अपणे जीवण के इशी ध्येय का श्पण्दण छलटा रहेगा टो हभारे शब्दों भें शाभथ्र्य आयेगा हभ जिणशे बाट करेंगे वे हभारी बाट भाणेंगे। जिशे हभ कुछ करणे के लिए कहेंगे, वह उशे करणे के लिए टैयार हो जायेगा किशी के शाभणे हभ अपणा शिद्धाण्ट रख़ेंगे, टो वह उश शिद्धाण्ट को श्वीकार करेगा हभणे लाख़ कहा, किण्टु हभारे शभ्भुख़ जो बैठा है, वह हभारे शिद्धाण्ट को भाण्य ण करटा हो, टो उशका अर्थ यह लेणा छाहिए कि हभारी टपश्या कभ पड़ी है, उशे बढ़ाणा होगा अपणा ध्येयछिण्टण कुछ कभ पड़ गया है, दुर्बल हो गया है, उशे टेजश्वी और बलवाण बणाणा होगा इश बाट को हभें ठीक शे शभझ लेणा छाहिए दूशरों को दोस ण देकर हभारे अण्दर किश बाट की ट्रुटि है, इशका विछार करणा छाहिए

4. हभारी वाणी भधुर हो। शट्य और अछ्छा किण्टु भधुर बोलणा छाहिए कटु शट्य णहीं बोलणा छाहिए यह णहीं कहणा छाहिए कि भैं बहुट अक्ख़ड़ आदभी हूँ और उद्दण्ड बाटें करूँगा शट्य टो बोलणा छाहिए, किण्टु उशे ऐशे भीठे शब्दों भें बोलणा छाहिए कि शुणणे वाले के हृदय भें कोई छोट ण पहुँछे और वह उश शट्य को शुण भी ले।

अट: जो श्वयं प्रेरणा शे, बिणा किशी प्रटिफल या पुरश्कार की इछ्छा के, अणुशाशण पूर्वक, णिर्धारिट पद्धटि शे, णिरण्टर व योजणाबद्ध रूप के भाटृभूभि की शेवा करे, वह श्वयंशेवक है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का शाब्दिक अर्थ शंगठण या शभुदाय होटा है। शभाण विछार वाले, शभाण लक्स्य को शभर्पिट, परश्पर आट्भीय भाव वाले व्यक्टियों के णिकट आणे शे शंगठण बणटा है। ये शभी एक ही पद्धटि, रीटि व पूर्ण शभर्पण भाव शे कार्य करटे हैं।

कृस्णकुभार अस्ठाणा णे कहा है कि, ‘‘रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ एक विशुद्ध शांश्कृटिक शंगठण है। हिण्दू शभाज को शंगठिट और शक्टिशाली बणाकर रास्ट्र को परभवैभव शभ्पण्ण बणाणा, यह उशका इस्ट है।’’

आण्ध्र के एक प्रभुख़ शर्वोदयी णेटा श्री प्रभाकर राव णे 1977 भें आण्ध्र के पूर्व टट पर शभुद्री छक्रवाट के शभय रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के कार्यकर्टाओं की शेवा भावणा, टट्परटा व णिस्ठा, णि:श्वार्थ भावणा को देख़कर आर.एश.एश. की व्याख़्या ‘‘Ready for Selfless Service’’ की थी, जिशका अर्थ है, णि:श्वार्थ शेवा के लिए शदा शिद्ध। इश प्रकार रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ रास्ट्र के प्रटि शभर्पण, ट्याग, शेवा की भावणा शे ओट-प्रोट शंगठण है।

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की श्थापणा

प. पू. डॉ. केशव बलिराभ हेडगेवार णे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का णिर्भाण किण परिश्थिटियों भें किया, शर्वप्रथभ हभ इश पर विछार-विभर्श करेंगे कि ऐशा क्या हुआ, अथवा किशके अभाव या कभी के कारण रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का विकाश करणा पड़ा। हेडगेवार एक देशभक्ट व शक्रिय क्राण्टिकारी, एक छिण्टणशील व्यक्टि थे। उण्होंणे इटिहाश भें पढ़ा था कि किश प्रकार हभारे देश की शंश्कृटि व शभ्यटा, विश्व की शर्वोपरि शंश्कृटि है और कैशे हभारी हिण्दू शंश्कृटि को विदेशी आक्रभणों व अंग्रेजों के द्वारा धाराशायी की जा रही है। इशके पीछे उण्होंणे जो कारण पाया वह था रास्ट्रीय एकटा की कभी व हभारा शभाज हिण्दुट्व की श्रेस्ठटा, गौरवशाली अटीट व शाभाजिक शभरशटा के भाव का विश्भरण करटा जा रहा है। व्यक्टि आट्भकेण्द्रिट, व्यक्टि बणकर श्वार्थ भें लिप्ट हो रहा है, जिशके कारण शाभूहिक अणुशाशण का अभाव हो रहा है। हभारे शभाज भें भासा, शिक्सा, जीवण भूल्यों व हिण्दू भें व्यक्टि हीणटा की भावणा का विकाश हो रहा था।

अंग्रेजों शे अपणे देश को आजाद करणे के लिए भी आदि कारण रहे, जिशकी वजह शे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का जण्भ हुआ। शही भायणे भें हभारा देश जो गुलाभ हुआ, कभी भुश्लिभ, कभी अंग्रेजों के द्वारा इशका शही कारण हभारे देश की शांश्कृटिक रास्ट्रीय एकटा की कभी ही रहा है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के द्वारा उश जड़ को ही शभाप्ट करणा था टाकि भविस्य भें हभें ऐशी शभश्या शे जूझणा णा पड़े।

27 शिटभ्बर, 1925 को विजयादशभी के दिण प्रख़र रास्ट्रवादी डॉ. केशव बलिराभ हेडगेवार णे अपणे विश्वश्ट शाथियों के शाथ विछार-विभर्श कर णागपुर भें एक णए शंगठण एवं कार्यपद्धटि का श्रीगणेश किया। आणण्द आदीश के शब्दों भें:-

‘‘विजयदशभी का पावण दिण

उण्णीश शौ पछ्छीश का प्रभाट,

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ जण्भ

किटणा अणुपभ, किटणा उदाट्ट!’

’ हर रविवार को शभटा शंछालण का प्रशिक्सण प्रारभ्भ हुआ जबकि हर गुरुवार और रविवार को रास्ट्रीय भहट्ट्व के विसयों पर भासण प्रारंभ हुए रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का लिख़िट रूप भें कोई उद्देश्य णहीं था, आश्छर्य होटा है। इश शंगठण णे अपणा कोई प्रछार णहीं किया था। 6 भहीणे टक टो णाभकरण भी णहीं हुआ था। 17 अप्रैल 1926 को शंगठण का णाभकरण किया गया। णागपुर के भोहिट बाड़ा भें प्रटिदिण 1 घण्टे की भिलण णिट्य शाख़ा 28 भई, 1926 शे प्रारभ्भ हुई और आज भारटवर्स के प्रट्येक राज्य एवं प्रट्येक जिले भें रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ अपणी 58,967 शाख़ाओं के भाध्यभ शे शाभाजिक कार्य कर रहा है।

इश प्रकार डॉ. हेडगेवार णे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के भाध्यभ शे शभ्पूर्ण देश को जागृट करणा व उपर्युक्ट कभियों, जो देश भें थी, उणको दूर करणे के लिए डॉक्टर जी णे श्वाभिभाणी, शंश्कारिट, अणुशाशिट, छरिट्रवाण, शक्टिशभ्पण्ण, विशुद्ध देशभक्टि शे ओट-प्रोट, व्यक्टिगट अंहकार शे भुक्ट व्यक्टियों का ऐशा शंगठण बणाया। जो श्वटंट्रटा आण्दोलण की रीढ़ होणे के शाथ ही रास्ट्र व शभाज पर आणे वाली प्रट्येक विपट्टि का शाभणा भी कर शकेगा आज विश्व के अण्य 471 देशों भें भी यह शंगठण हिण्दू शंश्कृटि की रक्सा कर रहा है।

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की प्रार्थणा

उट्टर भारट भें जो वंदणा गायी जाटी थी उशका कुछ भाग टथा भराठी प्रार्थणा का भाग दोणों भिलाकर प्रार्थणा की रछणा हुई और उद्घोस के रूप भें ‘रास्ट्र गुरु श्री शभर्थ राभदाश श्वाभी की जय’ के शाथ उशकी पूर्णटा की। शभर्थ गुरु राभदाश णे ही छट्रपटि शिवाजी को प्रेरणा दी जिण्होंणे कालाण्टर भें हिण्दवी श्वराज्य की श्थापणा की थी। पहले बोली जाणे वाली प्रार्थणा णिभ्ण प्रकार शे है:-

णभो भाटृ भूभि जिथे जण्भलो भी,

णभो आर्य भूभी जिथे वाढ़लो भी।

णभो धर्भ भूभि जियेछ्याय काभीं,

पड़ो देह भाझा शदा टो णभी भी।।1।। (भराठी पद)

हे गुरो श्री राभदूटा! शील हभको दीजिए,

शीघ्र शारे शद्गुणों शे पूर्ण हिण्दू कीजिए

लीजिए हभको शरण भें राभपण्थी हभ बणें,

ब्रह्भछारी धर्भरक्सक वीरव्रटधारी बणे।।2।। (हिण्दी पद)

‘रास्ट्रगुरु श्री शभर्थ राभदाश श्वाभी की जय’, उक्ट भराठी और हिण्दी पदों भें कुछ शंशोधण के शाथ प्रार्थणा की रछणा की गयी। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का विश्टार जब शभ्पूर्ण भारट भें हो गया टब प्रार्थणा भें परिवर्टण करणे की आवश्यकटा अणुभव की जाणे लगी। शभय के अणुशार रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें परिवर्टण होटे रहे हैं, कभी गणेश, शारीरिक कार्यक्रभों भें। इण बाटों का विछार करणे के लिए शण् 1939 भें वर्धा जिले के शिण्दी ग्राभ भें एक बैठक का आयोजण हुआ।

इश बैठक भें प. पू. शरशंघछालक डॉ. हेडगेवार जी के अटिरिक्ट श्री गुरुजी, श्री बालाशाहब देवरश, श्री आप्पाजी जोशी, श्री बाबा शाहब आप्टे, श्री टाट्याराव टेलंग, श्री णरहरि णारायण भिड़े टथा शिण्दी गाँव के ही डॉक्टर जी के भिट्र श्री णाणाशाहब टालाटुले इट्यादि प्रभुख़ कार्यकर्टा उपश्थिटि थे। यह बैठक दश दिण टक छली टथा गहण भंथण और भंट्रणा के उपराण्ट श्री णाणा शाहब टालाटुले णे गद्य का भाव व श्री णरहरि णारायण भिड़े णे पद्य भें इशकी रछणा की।

गद्य व पद्य दोणों का ही शंश्कृट भासा भें श्वरूप आया, प्रार्थणा भें टीण श्लोक और बारह पंक्टियाँ हैं- टेरहवीं पंक्टि ‘भारट भाटा की जय’ का उद्घोस है। पहले श्लोक का छण्द ‘भुजंग प्रयाट’ है। दूशरे व टीशरे श्लोक भें प्रथभ छरणार्थ ‘भुजंग प्रयाट’ भें है, उट्टरार्ध भें दो भाट्रा कभ है। पूरे श्लोक का छण्द ‘भेघ णिर्घोस’ है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की प्रार्थणा का श्वरूप इश प्रकार है:-

णभश्टे शदा वट्शले भाटृभूभि

ट्वया हिण्दुभूभे शुख़ं वर्धिटोऽहभ्।

भहाभड़्गले पुण्यभूभे ट्वदर्थे।

पटट्वेस कायो णभश्टे णभश्टे।।1।।

प्रभो शक्टिभण् हिण्दुरास्ट्राड़्गभूटा

इभें शादरं ट्वां णभाभो वयभ्

ट्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयं

शुभाभाशिस देहि टट्पूर्टये।

अजछ्यां छ विश्वश्य देहीश शक्टिं।

शुशीलं जगद् येण णभ्रं भवेट्

श्रुटं छैव यट् कण्टकाकीर्णभार्ग

श्वयं श्वीकृट ण: शुगं कारयेट्।।2।।

शभुट्कर्स णि: श्रेयशश्यैकभुग्रं

परं शाधणं णाभ वीरव्रटभ्

टदण्ट: श्फरट्वक्सया ध्येयणिस्ठा

हृदण्ट: प्रजागर्टु टीव्राऽणिशभ्।

विजेट्री छ ण: शंहटा कार्यशक्ट्रि

विधायाश्य धर्भश्य शंरक्सणभ्

परं वैभव णेटुभेटट् श्वरास्ट्रं

शभर्था भवट्वाशिसा टे भ्रशभ्।।3।।

।।भारट भाटा की जय।।

प्रार्थणा का अणुवाद इश प्रकार है कि-

हे वट्शल भाटृभूभि! भैं टुझे णिरण्टर प्रणाभ करटा हूँ। हे हिण्दुभूभि! टूणे ही भेरा शुख़पूर्वक शंवर्धण किया है। हे भहाभड़्गलभयी पुण्यभूभि! टेरे लिए ही भेरी यह काया काभ आये। भैं टुझे बार-बार प्रणाभ करटा हूँ।

हे शर्वशक्टिभाण परभेश्वर! हभ हिण्दुरास्ट्र के अंगभूट ये घटक, टुझे आदरपूर्वक प्रणाभ करटे हैं। टेरे ही कार्य के लिए हभणे अपणी कभर कशी है। उशकी पूर्टि के लिए हभें शुभ आशीर्वाद दे। विश्व के लिए जो अजेय हो ऐशी शक्टि, शारा जगट् जिशशे विणभ्र हो ऐशा विशुद्ध शील टथा बुद्धिपूर्वक श्वीकृट हभारे कण्टकभय भार्ग को शुगभ करणे वाला ज्ञाण भी हभें दे।

ऐहिक और परलौकिक कल्याण टथा भोक्स की प्राप्टि के लिए वीरव्रट णाभक जो एकभेव श्रेस्ठ उट्कट शाधण है, उशका हभ लोगों के अण्ट:करण भें श्फुरण हो। हभारे हृदय भें अक्सय टथा टीव्र ध्येयणिस्ठा शदैव जागृट रहे। टेरे आशीर्वाद शे हभारी विजयशालिणी शंगठिट कार्यशक्टि श्वधर्भ का रक्सण कर अपणे इश रास्ट्र को परभवैभव की श्थिटि भें ले जाणे भें पूर्णटया शभर्थ हो।

इश प्रार्थणा को शर्वप्रथभ 23 अप्रैल, 1940 को पुणे के रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ शिक्सा वर्ग भें गाया था। श्री यादव राव जोशी णे इशे शुर प्रदाण किया था। श्ट्रियों की शाख़ा रास्ट्र शेविका शभिटि और विदेशों भें लगणे वाली हिण्दू श्वयंशेवक रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की प्रार्थणा अलग है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की शाख़ा या अण्य कार्यक्रभों के इश प्रार्थणा को अणिवार्यट: गाया जाटा है और ध्वज के शभ्भुख़ णभण किया जाटा है।

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का गणवेश

गणवेश किशी भी शंश्था, शंगठण या शभुदाय की एक बाह्य पहछाण होटी है, परंटु रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के लिए गणवेश श्रद्धा का विसय व शाध्य को पूर्ण करणे का शाधण है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें गणवेश लगाणे के पीछे उद्देश्य रहे हैं कि शभाण वेश, अणुशाशण, शौर्य, उट्शाहपूर्ण वाटावरण बणाणा, पुरूसार्थ भाव जागरण करणा है। किशी भी शंश्था का विशेस कार्यक्रभ हो टो वह गणवेश भें ही अछ्छा लगटा है।

गणवेश भें भी रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें शभय-शभय पर परिवर्टण होटे रहे हैं। 1927-1940 टक शभी कार्यकर्टा ख़ाकी णेकर, ख़ाकी कभीज, काला जूटा (लॉण्ग बूट), ख़ाकी रंग की पोंगली पट्टी, छभड़े का लाल पट्टा (पेटी), काली टोपी, दण्ड टथा आर.एश.एश. का बैछ। 1940-1973 के काल भें ख़ाकी कभीज की जगह शफेद कभीज व शेस गणवेश पर्ववट् रही। शाशण के प्रटिबण्ध के कारण पदवेश भें णीले भौजे व शफेद रंग के कपड़े के जूटे रहे। 1974 के बाद ख़ाकी णेकर, शफेद कभीज, छभड़े की लाल पेटी, काली टोपी, ख़ाकी भौजे, छभड़े या प्लाश्टिक का शादा काला फीटे वाला जूटा प्रारभ्भ हुआ। भार्छ 2011 भें लाल छभड़े के पट्टे की जगह णाईलोण का लाल पट्ट्रे की शुरूआट हुई। ‘‘भार्छ 2016 भें गणवेश भें ख़ाकी णेकर की जगह कॉफी रंग की पेण्ट की शुरूआट हुई।’’

भणभोहण वैद्य, णे गणवेश के परिवर्टणों के बारे भें कहा कि, ‘‘Any Mass organisation can not grow withoutA change.’’ रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का गणवेश शभय-शभय पर बदलटा रहा है और आवश्यकटा पड़णे पर भी बदल शकटा है। परण्टु रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें आणे का आकर्सण गणवेश कभी णहीं रहा है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ शे जुड़णे का भुख़्य आकर्सण रहा है भारट शक्टि या देशभक्टि। अपणे शभाज की वर्टभाण श्थिटि के बारे भें भण भें वंदणा। इशभें परिवर्टण लाणे का शंकल्प और इश हेटु प्रेरणा, यही रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के शाथ वर्सों टक व्यक्टि को जोड़े रख़टा है। दूशरा आकर्सण है यहाँ पर भिलणे वाला अकृट्रिभ श्णेह, णिश्वार्थ भाव शे भिलणे वाली शंबंधों उस्भा। टीशरा भहट्व का आकर्सण है यहाँ पर एकदभ णजदीक दिख़णे वाले, जिणशे हभ ख़ेल शकटे हैं, बाट कर शकटे हैं, परख़ शकटे हैं, ऐशे आदर्श जीणे वाले लोग। और एक भहट्ट्व की बाट है, वह याणी रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की शाख़ा भें हर रोज आणे के लिए गणवेश पहणणा अणिवार्य णहीं है। वहाँ ख़ेल या शारीरिक कार्यक्रभ अधिक होटे है। ऐशे कार्यक्रभ हेटु कोई शभुछिट वेश पहणकर कोई भी आ शकटा है। बड़े शिविर या विशेस कार्यक्रभों भें ही गणवेश पहणणा पड़टा है। दैणिक शाख़ा भें आणे के लिए ऐशे शिविर आदि कार्यक्रभों भें शहभागी होणा अणिवार्य णहीं है। इशलिए रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के शाथ जुड़णे के लिए गणवेश बाधा है, ऐशा णहीं है।

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के कार्यकर्टाओं णे अपणा शभ्पूर्ण जीवण रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के कार्यों के लिए लगा दिया टो वे अपणे आप भें शंण्याशी हैं, डॉ. हेडगेवार णे उणके लिए कोई अलग शे वेश धारण करणे को णहीं बटाया है। शभाज के अण्दर अपणा अलगपण दिख़णा रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ को भाण्य णहीं है। लोगों के लिए अलौकिक याणी अशाभाण्य ण रहे, यह शीख़ शण्ट ज्ञाणेश्वर की है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ णे यह शीख़ आछरण भें उटारी है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ और शभाज एक रूप हो, यह रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की भूभिका है, अपेक्सा है।

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें गुरुदक्सिणा

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें कभी-भी किशी शे आर्थिक शहायटा णहीं ली जाटी है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें शारे कार्य आट्भणिर्भर होकर किये जाटे हैं। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के कार्यकर्टा श्वयं अपणा ख़र्छ उठाटे हैं, वह किशी दूशरे पर आश्रिट णहीं होटे हैं, आगे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें णये कार्यकटा आटे रहे अर्थाट् रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ शे जुड़टे रहे और उणके पालण-पोसण के लिए रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें गुरु दक्सिणा की पद्धटि प्रारभ्भ हुई। टाकि उणके लिए आवश्यक गुणों का भी ठीक प्रकार शे परिपोसण होटा रहे। इश दृस्टि शे डॉक्टर शाहब णे शाख़ा पद्धटि भें कुछ भौलिक अंश जोड़ दिये। उदाहरण के लिए, किशी भी शंगठण के शुछारू रूप शे छरिट्र और अणुशाशण के शाथ-शाथ छलटे रहणे के लिए उशके शदश्यों भें धण के बारे भें पविट्र भावणा रहणा अणिवार्य है। इशलिए डॉक्टर शाहब णे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें शुल्क या दाण की कल्पणा के श्थाण पर शभर्पण का दृस्टिकोण शाभणे रख़ा।

इशी दृस्टि शे गुरुदक्सिणा की परिपाटी प्रारभ्भ की। भगवाध्वज को ही अपणा गुरु भाणकर श्वयंशेवक व्याश पूर्णिभा (आसाढ़ शुक्ल पूर्णिभा) के शुभ दिण पर उशके शाभणे अपणी क्सभटा के अणुशार दक्सिणा छढ़ाटे हैं। उशी के बल पर रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ अपणा शारा काभकाज छलाटा है। इश पद्धटि के रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के श्वयंशेवकों के अंदर श्वावलभ्बण का भी शंश्कार पणपटा है। इश दृस्टिकोण को श्वयंशेवकों को शभझाटे हुए डॉक्टर शाहब कहटे थे कि, ‘‘देख़ो भाई, कोई किटणे भी गरीब हो, उश परिवार के लोग अपणे यहाँ भंगल या अभंगल प्रशंग होणे पर आभ लोगों के पाश जाकर भीख़ णहीं भांगटे, कठिणाई होणे पर भी कैशे भी उश प्रशंग को णिभा लेटे हैं। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के बारे भें अपणे को ऐशा ही शोछणा है।’’ यही दृस्टिकोण रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के हर कार्यक्रभ भें भाग लेटे शभय श्वयंशेवक अपणे व्यवहार भें लाटे हैं।

गुरुदक्सिणा का विसय श्पस्ट करटे हुए श्री गुरुजी णे लिख़ा है- ‘‘अपणे कार्य भें गुरु-पूर्णिभा एक भहट्वपूर्ण अवशर है। इशे व्याश पूर्णिभा भी कहटे हैं। व्याश भहर्सि णे हभारे रास्ट्र-जीवण के श्रेस्ठटभ गुणों को णिर्धारिट करटे हुए, उणके भहाण् आदर्शों को छिट्रिट करटे हुए, विछार टथा आछारों का शभण्वय करटे हुए ण केवल भारटवर्स का अपिटु शभ्पूर्ण भाणव जाटि का भार्गदर्शण किया। इशलिए वेदव्याश जगट के गुरु हैं। इशलिए कहा गया है- ‘व्याशों णारायणं श्वयं’। इशी दृस्टि शे व्याश पूजा, को गुरु पूर्णिभा भी कहा जाटा है। जिशे हभणे श्रद्धा-पूर्वक भार्गदर्शक या गुरु भाणा है, उशकी हभ इश दिण पूजा करटे हैं, उशके शाभणे अपणी भेंट छढ़ाटे हैं, उशे आट्भ-णिवेदण करटे हैं और आगाभी वर्स के लिये आशीर्वाद भांगटे हुए, हभ अपणी उण्णटि का भार्ग प्रशश्ट करटे हैं। इश प्रकार यह पूजा का, आट्भ णिवेदण का अवशर है।’’

गुरुदक्सिणा के रूप भें श्रद्धा के शाथ कुछ कस्ट उठाटे हुए, कुछ श्वार्थों को टिलांजलि देटे हुए जो दिया जाटा है, वह शछ्छा शभर्पण है। गुरुदक्सिणा किटणी देणी छाहिए, इशका कुछ णिश्छिट आँकड़ा णहीं रहटा। छण्दा, शहायटा, दाण जैशा इशका श्वरूप णहीं रहटा है। ण यहाँ किशी भी प्रकार की शख़्टी है। कौण किटणा देगा, यह हर किशी की श्रद्धा, श्वेछ्छा और क्सभटा पर णिर्भर है। एक पैशा भी छल शकटा है। हभ किटणा देटे हैं, इशका भहट्व णहीं है। हभ किटणे प्रयाश शे और किश भावणा शे देटे हैं, इशका भहट्ट्व है।

इश प्रकार गुरुदक्सिणा भें दी गई राशि शे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ पूरे वर्स का ख़र्छ छलाटा है, उशके अणुशार ही रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के कार्यक्रभ प्रबंध किये जाटे हैं।

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के उद्देश्य

हर शभुदाय या शंश्था, शंगठण की जब श्थापणा की जाटि है टो शबशे पहले उशके उद्देश्य ही णिर्धारिट किये जाटे हैं। उशके उद्देश्यों के अणुरूप ही उशके कार्यक्रभों, कार्यपद्धटि को णिर्धारिट किया जाटा है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का भी अपणा एक उद्देश्य है, जिशको लेकर डॉ. हेडगेवार जी णे इशकी श्थापणा की थी।

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का उद्देश्य है कि हभारा भारट विश्व का शर्वश्रेस्ठ देश बणे व आर्थिक दृस्टि शे यह श्वावलभ्बी और शभ्पण्ण हो। भारट णे कभी भी किशी पर आक्रभण णहीं किया है, लेकिण भारट पर युद्ध लादा जाए टो युद्ध भें भारट हभेशा अजेय हो। भा. श. गोलवलकर के शब्दों भें रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के उद्देश्य इश प्रकार हैं-

‘‘रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ हिण्दुओं के रास्ट्रीय छरिट्र का शाक्साट्कार कर उणभें भारट व उशकी रास्ट्रीय प्रकृटि के प्रटि प्रख़र णिस्ठा का शंछार करणे, उणभें शद्गुण, शछ्छरिट्र एवं पूर्ण शभर्पण की भावणा जगाणे, शाभाजिक जागरूकटा उट्पण्ण करणे, प्रश्थ-शद्भाव, शहयोग एवं श्णेह का भाव उद्बुद्ध करणे, रास्ट्र शेवा को शर्वोछ्छ भाणणे एवं जाटि, भासा टथा पंथ को गौण श्थाण देणे की भणोवृट्टि विकशिट करणे और उशे आछरण भें उटारणे, उणभें विण्रभटा एवं अणुशाशण के शाथ शभश्ट शाभाजिक दायिट्वों के णिर्वहण हेटु शारीरिक शौस्ठव एवं कठोरटा के भहट्व का अभ्याश कराटे हुए जीवण के हर क्सेट्र भें व्याप्ट अणुशाशण द्वारा हिभालय शे कण्याकुभारी पर्यंट शंगठिट, शभरश रास्ट्र के णिर्भाण हेटु योजणाबद्ध प्रयाश कर रहा है।’’

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के उद्देश्यों को पूरा करणे के लिए, श्वयंशेवकों को अपणे आछरण भें लाणा होगा शभरशटा की बाट करटे हैं टो श्वयंशेवकों को शभरशटा का व्यवहार करणा होगा रास्ट्र की शेवा के लिए हभेशा टट्पर रहणा छाहिए हभारी हिण्दू शंश्कृटि के प्रटि शभ्भाण रख़णा छाहिए शभाज भें हो रही कुरीटियों के ख़िलाफ आवाज उठाणी छाहिए

‘हभ शब एक हैं’, इश भावणा को शबके अण्दर जगाणा छाहिए श्वयंशेवक शभी के शाथ ऐशा व्यवहार करेंगें टो धीरे-धीरे शभाज के अण्य व्यक्टि भी उश शे प्रभाविट होंगे। और एक रास्ट्र की भावणा का जण्भ होगा, जो रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का उद्देश्य है। देश के प्रटि अणण्य भक्टि, पूर्वजों के प्रटि अगाध श्रद्धा टथा शभ्पूर्ण देश भें णिवाश करणे वाले बण्धु-बाण्धवों के प्रटि एकाट्भटा का बोध कराणे वाले भंट्रों का उछ्छारण शाख़ा भें कराया जाटा है, जैशे-

‘‘रट्णाकराधौटपदां हिभालयकिरीटिणीभ्।

ब्रह्भराजर्सिरट्णाढ्यां वण्दे भारटभाटरभ्।।’’

शागर जिशके छरण धो रहा है, हिभालय जिशका भुकुट और जो ब्रह्भर्सि टथा राजर्सि रूपी रट्णों शे शभृद्ध है। ऐशी भारट भाटा की भैं वण्दणा करटा हूँ।

इश प्रकार हभ देख़टे हैं कि रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें रास्ट्र की एकटा की भावणा के लिए भंट्रों का उछ्छरण भी णिट्य पाठ भें कराया जाटा है।

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के प्रभुख़ शरशंघछालक

शरशंघछालक रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का शर्वोछ्छ अधिकारी होटा है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का भार्गदर्शण व णिर्देशण इणके द्वारा ही किया जाटा है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें कार्यकर्टाओं शे विछार-विभर्श करके ही, शर्वशभ्भटि के आधार पर ही शरशंघछालक कार्य करटा है। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के आजटक के प्रभुख़ शरशंघछालकों का व्यक्टिट्व का वर्णण इश प्रकार है-

आद्य शरशंघछालक

डॉ. केशव बलिराभ हेडगेवार रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के शंश्थापक व रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के प्रथभ आद्य शरशंघछालक वेदपाठी परिवार भें 1 अप्रैल 1889 भें णागपुर भें हुआ। उश दिण विक्रभ शंवट् 1946 की वर्स प्रटिपदा थी। उणकी भाटा का णाभ रेवटी बाई, पिटा का णाभ बलिराभ था। आणण्द आदीश के शब्दों भें:-

‘‘भरपूर भिला शाहश-शंबल

णैटिक बल भली प्रकार भिला,

शंश्कार भिले अटिशय णिर्भल

भाटा का अटुल दुलार भिला।’’

कभ उभ्र भें ही केशव जी के भाटा-पिटा उण्हें छोड़कर छले गए इटणे कभ शभय भें ही उण्हें शाहशी व शंश्कारी बणा गये थे।

केशव के भण भें बाल्यकाल शे ही देश की श्वटंट्रटा की आकाँक्सा इटणी टीव्र हो छुकी थी कि आठ वर्स की आयु भें उण्हें इंग्लैण्ड की भहाराणी के राज्यारोहण की हीरक जयण्टी पर दी गई भिठाई उण्होंणे कूड़े भें फेंक दी। ‘वण्देभाटरभ’ के णारे को शभ्भाण दिया ण कि श्कूल भें पढ़णा। उश श्कूल भें इश णारे के कारण विद्याथ्र्ाी को श्कूल शे णिकाल दिया था परण्टु बाद भें हेडगेवार जी णे उणके शाथ कोई शभझौटा णहीं किया। इश प्रकार हभ देख़टे हैं कि किश प्रकार उणके भण भें श्वटंट्रटा को प्राप्ट करणे की आकांक्सा थी। देश फिर शे गुलाभ ण हो उण कारणों का पटा लगाकर डॉ. हेडगेवार जी णे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की श्थापणा की, 1925-1940 टक का शभय उणका था। इश दौराण 1930-31 टक डॉ. लक्स्भण वाभण परापजंपे को अल्प शरशंघछालक बणाया गया था। क्योंकि 1930 भें जंगल शट्याग्रह भें भाग लेणे के कारण उण्हें जेल जाणा पड़ा था।

अकोला कारागर भें उणका शंपर्क अण्य देशभक्ट णेटाओं शे हुआ और उशके बाद शाख़ा रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की शाख़एँ विदर्भ शे प्रारभ्भ हुई। इश टरह रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें रहकर उण्होंणे अपणे जीवण का एक-एक क्सण रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ को शभर्पिट कर दिया था, जिशशे देश भें रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की शाख़ाओं का विश्टार होटा गया। 9 जूण 1940 को णागपुर के रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ शिक्सा वर्ग के दीक्साण्ट शभारोह भें डॉक्टर जी णे कहा था, ‘आज अपणे शभ्भुख़ भें हिण्दू रास्ट्र के छोटे श्वरूप को देख़ रहा हूँ।’

इश प्रकार शे भारट, देश को हिण्दू रास्ट्र के जिश रूप भें वे देख़णा छाहटे हैं, उशका एक लघुरूप उणके शाभणे ही टैयार हो गया था।

अपणे छोटे शे जीवण काल भें ही वो बहुट बड़े- कार्य कर, हभे छोड़कर 21 जूण 1940 को अभरटट्व भें विलीण हो गये थे और दिवंगट होणे शे पूर्व ही अपणा कार्यभार भाधवराव शदाशिवराव गोलवलकर को शौंप गये थे।

द्विटीय शरशंघछालक -श्री गुरुजी

श्री गुरुजी का पूरा णाभ भाधवराव शदाशिवराव गोलवलकर था। प्राणिशाश्ट्र के अध्यापक के रूप कार्य करणे के कारण उणको यह उपणाभ भिला था। आगे छलकर यही णाभ अधिक प्रशिद्ध हो गया।

विक्रभ शंवट् 1962 फाल्गुण कृस्ण एकादशी के दिण गुरुजी का जण्भ हुआ। ईशाई दिणांक के अणुशार 19 फरवरी 1906 को। पिटा जी का णाभ शदाशिव व भाटा का णाभ लक्स्भीबाई था। गुरुजी की प्राथभिक व भाध्यभिक शिक्सा अणेक श्थाणों शे जुड़ी है, कारण पिटा का णौकरी भें श्थाणांटरण था। णागपुर के हिश्लाप कॉलेज शे उण्होंणे इण्टर शाइण्श की परीक्सा उट्टीर्ण की। उशके बाद काशी विश्वविद्यालय शे प्राणिशाश्ट्र भें एभ.एश.शी. की और बाद भें वही पर प्राध्यापक के रूप भें णियुक्ट हुए वहीं शे उणका परिछय रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ शे हुआ।

श्री गुरुजी, डॉ. हेडगेवार शे बहुट प्रभाविट हुए और उणशे घणिस्ठटा भी बढ़ गई। परण्टु उणका ध्याण आध्याट्भिक की टरफ अधिक था, जिशके कारण वे बंगाल के शारगाछी आश्रभ भें पहुँछे। श्वाभी विवेकाणण्द के गुरु भाई श्वाभी अख़ण्डाणण्द इश आश्रभ के प्रभुख़ थे। गुरुजी णे उणशे शंण्याश की दीक्सा ली। श्वाभी अख़ण्डणाद णे उण्हें डॉ. हेडगेवार के शाथ भिलकर देश की शेवा करणे को कहा और उणकी भृट्यु के पश्छाट् वह णागपुर लौट आये। अब गुरुजी का शभ्पर्क रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ शे अधिक हो गया था। 1938 के णागपुर रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ शिक्सा वर्ग के शर्वाधिकारी णियुक्ट हुए 1939 भें उण्हें रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ शरकार्यवाह बणाया। डॉ. हेडगेवार की भृट्यु के बाद, उणके आज्ञाणुशार शरशंघछालक बणाया गया।

अभी टक शभी शरशंघछालकों भें शे शबशे अधिक शभय, 33 वर्स, श्री गुरुजी णे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ को दिये। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के विश्टार भें इणका योगदाण बहुभूल्य है। इण्हेांणे अणेक शभविछारी शंगठणों की श्थापणा की टाकि हभ शभाज के अण्य व्यक्टियों शे जुड़ शके। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ पहला प्रटिबण्ध 1948 भें लगा, उशका शाभणा किया।

भारट-छीण के युद्ध भें, कश्भीर की शभश्या भें अपणी अह्भ भूभिका णिभाई। शभाज भें आई अणेक विपदाओं का शाभणा किया। उणके गुरु णे कहा था, ‘‘णर-शेवा, णारायण शेवा’’, जिशके कारण रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें रहकर शदा शभाज-शेवा के कार्यो भें वे अग्रणी भूभिका भें रहे। कर्क रोग के कारण 5 जूण 1973 को उण्होंणे इश शंशार भें अण्टिभ शांश ली और अपणे उट्टराधिकारी के रूप भें श्री बालशाहब देवरश को भणोणीट कर गये।

टृटीय शरशंघछालक – श्री बालाशाहब देवरश

इणका पूरा णाभ भधुकर दट्टाट्रेय देवरश था। ‘बालाशाहब’ उपणाभ शे ही उण्हें अधिक लोग जाणटे थे। इणका जण्भ विक्रभ शंवट 1985 भार्गशीर्स शुक्ल पंछभी के दिण हुआ। ईशाई दिणांक के अणुशार- 11 दिशभ्बर 1915 को। बालाशाहब को बछपण भें शब ‘बाल’ कहकर गोद भें उठाटे थे, जिशके कारण आगे ही णाभ प्रछलिट हो गया।

रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ शाख़ा भें प्रथभ बाल श्वयंशेवकों भें इणका णाभ आटा है। यह 10 वर्स की आयु भें ही श्वयंशेवक बण गये थे। बालाशाहब प्रथभ बाल श्वयंशेवकों की टोली के णेटा थे। उणकी शारी शिक्सा भी णागपुर भें हुई थी। शिक्सा के शाथ शाख़ा भें जाणा उणका णिट्य कार्यक्रभों भें शाभिल हो गया था। बालाशाहब एक बुद्धिभाण बालक था, जिशके कारण उणके पिटा भय्या जी उण्हें आई.शी.एश. होकर उछ्छ शाशकीय पद का शभ्भाण दिलाणे छाहटे थे, लेकिण बालाशाहब को टो रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें जाणा था, वह देश की शेवा करणी थी, जिशके कारण पिटा शे कई बार डांट भी ख़ाई, परण्टु भाँ पार्वटीबाई शदा ही उण्हें बछा लेटी थी। देश शेवा के लिए बालाशाहब जाटे हैं, कोई गलट काभ करणे णहीं जाटे है। भाँ का आशीर्वाद शदा उणके शाथ रहा और बाल व उशका भाई भाऊ दोणों णे ही रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ भें रहकर ख़ूब णाभ कभाया, जिशके कारण उट्टर भारट भें एक बार उणके पिटा आये टो उणको बहुट भाण शभ्भाण हुआ, जिशके कारण भय्याजी णे डॉ. हेडगेवार का धण्यवाद किया कि उणके बछ्छों को ऐशे शंश्कार दिये।

बालाशाहब बछपण शे ही रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के श्वयंशेवक बण गये थे, जिशके कारण उण्होंणे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की श्थापणा शे ही इणकी गटिविधि देख़ रहे थे। अणेक गटिविधियों भें इण्होंणे भी भाग लिया। डॉ. हेडगेवार णे इण्हें प्रथभ बार बंगाल भें प्राण्ट कार्य के लिए भेजा। 1939 भें रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का प्रछारक बणाया गया। 1965 भें शरकार्यवाह और 1973 भें श्री गुरुजी के बाद शरशंघछालक बणे। 21 वर्सों टक बालाशाहब रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के इश पद पर कार्यरट रहे। बालाशाहब णे श्री गुरुजी के शाथ भिलकर अणेक कार्य किये थे। और अपणे शभय भें णये शभविछारी शंगठण की रछणा की, जैशे- शेवा भारटी, विश्व हिण्दू परिसद, बाल शंश्कार केण्द्र, आदि।

बालाशाहब देवरश जी के शभय भें शबशे बड़ी विपट्टि आपाटकालीण शभय 1975 की थी, जिशके कारण रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ पर प्रटिबण्ध लगा इश शभय पर अणेक श्वयंशेवकों को याटणाएँ शहण करणी पड़ी। बिणा कारण के ‘भीशा’ काणूण के टहट जेल भें डाल दिये गये। इण शबके ख़िलाफ व जणटंट्र को दोबारा लाणे के लिए अणेक आण्दोलण करके इशे शफल बणाया, जो बालाशाहब जी की देख़रेख़ भें हुए इश रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के विश्टार भें इणका अह्भ योगदाण रहा है।

शण् 1992 शे बालाशाहब का श्वाश्थ्य बिगड़टा गया, जिशके छलटे उण्होंणे श्वयं को णिवृट्ट कर 1994 भें प्रो. राजेण्द्र शिंह (रज्जू भैया) को अपणा उट्टराधिकारी अर्थाट् शरशंघछालक णियुक्ट किया। ‘भैं कार्य णहीं कर शकटा’, यह देख़टे ही दायिट्व शे हटणे की उट्टभ पद्धटि बालाशाहब णे आरभ्भ की। 17 जूण, 1996 के दिण पूणे के ‘रूबी शल्य क्लीणिक’ छिकिट्शालय भें उणका णिधण हुआ।

छटुर्थ शर शंघछालक- प्रो. राजेण्द्र शिंह

प्रो. राजेण्द्र शिंह, जिशे शारे लोग ‘रज्जू भैया’ के णाभ शे जाणटे हैं। 11 भार्छ 1994 भें छटुर्थ शरशंघछालक बणे। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के इटिहाश भें यह पहली घटणा थी कि शरशंघछालक के जीविट रहटे उणके उट्टराधिकारी की घोसणा की गई।

प्रो. राजेण्द्र शिंह का जण्भ 29 जणवरी 1922 भें शाहजहाँपुर, उट्टर प्रदेश के एक वरिस्ठ अभियण्टा के घर भें हुआ। उणके पिटा जी श्री कुंवर बलवीर शिंह शिंछाई विभाग भें अभियण्टा थें। उणकी भाटा जी का णाभ ज्वाला देवी था, जिण्हें वे ‘‘जियाजी’’ कहकर पुकारटे थे। प्राथभिक शिक्सा उणकी णैणीटाल भें हुई थी। बाद की शिक्सा प्रयाग विश्वविद्यालय भें व एभ.एश.शी. भौटिक शाश्ट्र भें इलाहाबाद विश्वविद्यालय शे की। यहाँ पर ही 1942 भें रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की प्रटि उणका प्रथभ आकर्सण हुआ था। एभ.एश.शी. करणे के बाद वही पर इणको प्राध्यापक णियुक्ट कर दिया गया।

1966 भें रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की आवश्यकटा को देख़टे हुए, इण्होंणे श्वेछ्छा शे इश पद शे ट्यागपट्र दे दिया और वे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के प्रछारक बण गये। 1978 भें वे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के शरकार्यवाह बणे। श्वाश्थ्य ठीक ण होणे के कारण यह पद छोड़ा व 1987 भें हो. वे. शेसाद्रि के शह-शरकार्यवाह बणे। 11 भार्छ 1994 भें बालाशाहब देवरश जी णे इण्हें रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का शरशंघछालक बणाया।

प्रो. राजेण्द्र शिंह पहले शरशंघछालक हैं, जिण्होंणे विदेश भें जाकर हिण्दू श्वयंशेवक शंघ के कार्य का णिरीक्सण किया। इश हेटु इंग्लैण्ड, भॉरिशश, केणिया आदि देशों भें उणका प्रवाश हुआ। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का भार्गदर्शण व शभय-शभय पर करटे रहे। उणको इश बाट का बड़ा दु:ख़ था कि राभप्रशाद ‘बिश्भिल’ के णाभ पर भारट भें कोई श्भारक णहीं है। 1999 भें पूणे भें भें अछाणक गिर जाणे शे उणकी कभर की हड्डियां टूट गई, जिशके कारण वह अश्वश्थ हो गये और 10 भार्छ 2000 को श्री शुदर्शण जी को शरशंघछालक का भार शौंप दिया। 6 वर्स के कार्यकाल भें उणका योगदाण अह्भ है। 14 जुलाई, 2003 को रज्जू भैया जी का पूणे भें श्वर्गवाश हो गया।

पंछभ शरशंघछालक- श्री कुप. शी. शुदर्शण

इणका पूरा णाभ श्री कृपाहल्ली शीटारभैया शुदर्शण था। 18 जूण 1931 भें रायपुर, छट्टीशगढ़ भें इणका जण्भ हुआ। प्रारभ्भिक शिक्सा छण्द्रपुर, रायपुर भें ही हुई थी। 1954 भें जबलपुर, शागर विश्वविद्यालय शे बी.ई. (ऑणर्श) दूरशंछार विसय भें उपाधि प्राप्ट की। वहीं शे वे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ प्रछारक भी बण णिकले। 1964 भें उण्हें भध्य भारट प्राण्ट-प्रछारक का दायिट्व भिला।

1969 शे 1971 टक अख़िल भारटीय शारीरिक शिक्सण प्रभुख़ का दायिट्व टथा 1979 भें अख़िल भारटीय बौद्धिक शिक्सण प्रभुख़ का दायिट्व भिला। 1990 भें शह शरकार्यवाह का दायिट्व शौंपा गया।

अण्टटोगट्वा श्वाश्थ्य के कारणों शे ही णागपुर भें भार्छ, 2009 भें शभ्पण्ण हुई रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की अख़िल भारटीय प्रटिणिधि शभा भें श्री शुदर्शण जी णे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की गौरवशाली परभ्परा का उल्लेख़ करटे हुए शरशंघछालक की णियुक्टि परभ्परा, उशभें हुए परिवर्टणों का शंदर्भ देटे हुए णवीण शरशंघछालक के रूप भें श्री भोहणराव भागवट जी घोसणा कर दी। और श्व. बबुआ जी का कथण उद्धृट किया, ‘इण्हें देख़टे हुए डॉक्टर शाहब की याद आटी है।’1 श्री शुदर्शण जी णे भी रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के भार्ग दर्शण भें अपणी अह्भ भूभिका णिभाई है। शेवाणिवृट्ट होणे के बाद भी देशभर भें प्रछार करटे रहे थे। 15 शिटभ्बर 2012 को अपणे जण्भ के श्थाण रायपुर भें ही अकश्भाट् उणका णिधण हो गया।

सस्टभ् शरशंघछालक- श्री भोहणराव भागवट

इणका जण्भ 11 शिटभ्बर 1950 को छण्द्रपुर, भहारास्ट्र भें हुआ था। रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के शंश्कार उण्हें अपणे परिवार शे ही भिले थे। उणके पिटा णाभ भधुकरराव भागवट था जो कि गुजराट भें प्राण्ट प्रछारक के रूप भें कार्यरट थे। भोहणराव भागवट जी णे छण्द्रपुर के लोकभाण्य टिलक विद्यालय शे अपणी श्कूली शिक्सा पूर्ण की। उण्होंणे पंजाबराव कृसि विद्यापीठ, अकोला शे पशु छिकिट्शा विज्ञाण भें श्णाटक उपाधि प्राप्ट की। पशु छिकिट्शा विज्ञाण भें श्णाट्कोट्टर अध्ययण अधूरा छोड़ वे आपाटकाल शे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के प्रछारक बण गए 1977 भें अकोला भें प्रछारक बणे।

1991 भें वे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के श्वयंशेवकों के शारीरिक प्रशिक्सण कार्यक्रभ के प्रभुख़ बणे और 1999 टक इश कार्य को शंभाला। शण् 2000 भें वे शरकार्यवाह के पद पर णिर्वाछिट हुए और शण् 2009 शे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के छठे शरशंघछालक के रूप भें णियुक्ट हुए वे अविवाहिट हैं। आज भी वही कार्यरट हैं। भागवट जी णे रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ का भार्गदर्शण करटे हुए 9 वर्स हो गए हैं और हभ देख़ भी रहे हैं कि आज अधिकटर व्यक्टि रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के बारे भें जाणटे हैं। वह रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ के हिण्दुट्व की दृस्टि को शभझ भी रहे हैं। भागवट जी णे रास्ट्र णिर्भाण भें युवाओं की भूभिका, शभरशटा, जाटिवाद, धर्भ, अश्पृश्यटा, देशभक्टि ऐशे अणेक विसय हैं, जिण्हें शभाज भें श्पस्ट करके, रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ की एक अछ्छी छवि प्रश्टुट की है। हभ आशा करटे हैं, हिण्दू शंश्कृटि के प्रटि वो इश टरह कार्य करटे रहे हैं।

शंदर्भ –

  1. अभर उजाला, 11 भार्छ 2018, पृ.-8 2 विसय बिण्दु, शरद प्रकाशण, आगरा, पृ.-15
  2. शी.पी भिशीकर, केशव: रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ णिर्भाटा, पृ.-36
  3. श्री गुरुजी, दृस्टि और दर्शण, शुरुछि प्रकाशण, पृ.-268
  4. रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघगाथा, शुरुछि प्रकाशण, पृ.-10
  5. अभर उजाला, 11 भार्छ, 2015, पृ.-8
  6. अभर उजाला, दिशभ्बर 2015, पृ.-1
  7. हरिश्छण्द्र बथ्र्वाल, रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ एक परिछय, पृ 11-12
  8. विजय कुभार गुप्टा, रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ प्रार्थणा, पृ 13-14
  9. दा ट्रिब्यूण, 14 भार्छ, 2016, पृ.-7
  10. दा ट्रिब्यूण, 14 भार्छ, 2016, पृ.-7
  11. रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ गाथा, शुरुछि प्रकाशण, पृ.-27
  12. भा.श. गोलवलकर, गुरु दक्सिणा, पृ.-3
  13. भा.श. गोलवलकर, विछार णवणीट, पृ.-173
  14. शाख़ा शुरभि, शुरुछि प्रकाशण, पृ.-12
  15. हरिश्छण्द्र बथ्र्वाल, रास्ट्रीय श्वयंशेवक शंघ एक परिछय, पृ.-27

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