रोग की उत्पत्ति के कारण एवं निवारण

By | February 15, 2021


आयुर्वेद में रोगों के दो प्रकार कहे गये हैं –

  • (1) निज और
  • (2) आगुन्तक।

निज उन्हें कहते हैं, जिन रोगों में पहले बात, पित्त एवं कफ का प्रकोप होता है,
तब रोग की उत्पत्ति होती है। आगुन्तक रोग वे कहे गये हैं, जो वाह्य आघात के
कारण उत्पन्न होते हैं और उनकी उत्पत्ति के पश्चात दोशों का प्रकोप होता है। अर्थात्
प्रत्येक रोग में तीनों दोष कारण स्वरुप होते ही हैं, इसलिए यह निर्देश दिया गया है
कि यदि किसी रोग में दोष नहीं बतलाया गया है, तब भी चिकित्सक का यह कर्तव्य
है कि वह दोशों के लक्षणों का अनुसन्धान कर तदनुसार चिकित्सा करें।

पहला रोगों की उत्पत्ति का मूल कारण (Cause), निदानं त्वादिकारणम्।
द्वितीय कारण रोगों की उत्पत्ति के उपायों का निदान (Diagnosis) कहते हैं।
निष्चित्य दीयते प्रतिपाद्यते व्याधिरनेन इति निदानम्। निदान का मुख्य अर्थ, कारण है।
रोग क्यों और कैसे हुआ या कैसे होता है, इसका विवेचन रोग की उत्पत्ति के कारण
एवं निदानस्थान है। रोग विज्ञान में पाँच बातें स्पष्ट होती हैं –

  • (1)-निदान-रोग के कारण का ज्ञान।
  • (2)-पूर्वरुप-रोग की उत्पत्ति से पूर्व के लक्षण।
  • (3)-रुप, लिंग या लक्षण-उत्पन्न हुए रोग के चिºन।
  • (4)-उपषय-रोगनाषार्थ ओशधि, आहार-विहार का उपयोग।
  • (5)-संप्राप्ति-शरीर में कौन सा दोष या रोग कब और किस समय बढ़ता है या घटता
    है, इसका विचार करना।

रोग उत्पत्ति का सामान्य कारण

सभी रोगों का कारण कुंपित वात, पित्त और कफ
है। इनके कोप का कारण है-नाना प्रकार के अहित का सेवन। इससे ज्ञात होता है
कि आहार-विहार में अनियमितता या अव्यवस्था ही सभी रोगों का कारण है। प्रज्ञापराध
रोगों का मुख्य कारण माना गया है। प्ज्ञापराध का भाव है कि मनुष्य की बुद्धि में
दोष आने के कारण सभी रोगों का जन्म होता है। खाना-पीना, रहन-सहन,
आचार-विचार और आहार-व्यवहार में सर्वप्रथम बुद्धि में दोश आता है। उचित-अनुचित
का ठीक ज्ञान न होने से विकृत बुद्धि विभिन्न रोगों को जन्म देती है।

वेदों में रोग के कारण के विषय में तीन प्रकार की मान्यताएँ प्रचलित थीं। ये
हैं- 1-विश-सिद्धान्त, 2-जीवाणुवाद, 3-त्रिदोश सिद्धान्त।

वेदों में त्रिदोश सिद्धांत का भी उल्लेख किया गया है। वेदों में वात, पित्त और
कफ के लिए अभ्र वात और शुश्म शब्द मिलते हैं। अभ्र (जल, कफ), वात (वात) और
शुश्म (पित्त) है। अत: त्रिदोश के विकार से उत्पन्न होने वाले रोगों को अभ्रजा, वातजा
और शुश्म कहा गया है।

ऋग्वेद में ‘त्रिधातु’ शब्द का प्रयोग आया है और कहा गया है
कि अष्विनीकुमार त्रिधातु-विशयक सुख दें। सायण ने इसकी व्याख्या में त्रिधातु का
अर्थ वात, पित्त और “लेश्म अर्थात् कफ रूपी तीन धातुएँ किया है। सूर्य ने एक ओज
को तीन प्रकार से फैलाया। सायण ने इसकी व्याख्या में ‘त्रेधा’ का अर्थ वात, पित्त और
कफ रूपी दोशत्रय (तीन दोष) किया है।

ऋग्वेद के मन्त्रों से यह यह स्पष्ट है कि
ओषधियाँ तीन प्रकार की हैं और तीन प्रकार से लाभकारी भी हैं। ये ओषधियाँ
हैं-दिव्य, पार्थिव और जलीय इनका अभिप्राय हैं –

  1. वात, पित्त और कफ इन तीनों दोशों को नष्ट करने वाले।
  2. आध्यात्मिक, आधिदैविक और अधिभौतिक तीनों प्रकार के दु:खों को दूर करने वाले
    को ‘त्रिधातु’ कहा जाता है।
वेदों में पित्त शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। वात के लिए वात शब्द है।
वातीकार, वातीकृत-नाषिनी शब्दों से स्पष्ट होता है कि इन शब्दों में वात शब्द
वातरोग के लिए है ही। वेदों में कफ के लिए “लेश्म शब्द का प्रयोग नहीं है। कफ के
लिए अभ्र (जल या वर्षाजल) शब्द है और कफज रोगों के लिए अभ्रजा और बलास
शब्द है।

रोग के भेद

शारीरिक या कायिक और आगन्तुक, शारीरिक रोगों के लिए रोग और अमीव
या अमीवा शब्द है तथा आगन्तुक रोगों के लिए रक्षस्, और यातुधान शब्द है। ऋग्वेद
में अमीवा और रक्षम् दोनों भेदों का उल्लेख मिलता है। अधिक विशयाषक्ति और
दुर्भावना या दुर्विचार। इस मंत्र में काम का विशयाषक्ति और अपकाम शब्द का
दुर्भावना अर्थ है। हृदय में दुर्विचार प्रज्ञापराध के कारण है। दुर्विचार से बुद्धि विकृत
होती है और शारीरिक शक्ति क्षीण होती है, अत: इसीलिए मनुष्य रोगी होता है। चिन्ता
या शोक को भी रोगों का कारण माना गया है। किसी भी बातों की चिन्ता न करो,
क्योंकि इससे शक्ति क्षीण होती है और अवनति होती है।

वेदों में प्राण को भी रोग का कारण कहा गया है। प्राण ही जीवन है, प्राण ही
मृत्यु है और प्राण ही रोग एवं ज्वर है। अतएव विद्वान प्राण की उपासना करते हैं।
इसका अभिप्राय यह है कि प्राणषक्ति ही जीवन है। प्राणायाम आदि के द्वारा प्राणषक्ति
को पुष्ट करने से नीरोगता और सबलता प्राप्त होती है। प्राणषक्ति का क्षय होना ही
रोग और मृत्यु है। कईमंत्रों में प्राण शक्ति पर महत्वपूर्ण बात कही गईहैं कि
सत्यवादी को रोग आदि नहीं होते और वह उत्तम स्थिति में रहता है। इसका अभिप्राय
यह है कि सत्यनिष्ठा दुर्विचार और दुर्भावनाओं को नष्ट कर देती है, अत: रोग के
जीवाणु दग्ध हो जाते हैं, यही नीरोगता और मृत्यु पर विजय है।

नीरोग रहने के उपाय

भोजन पर नियन्त्रण, दैनिक कार्यों को नियमित रुप से
करना, समस्त कार्यों में अनासक्ति की भावना, ठीक समय सोना, और ठीक समय पर
उठना। सूर्य की किरणों का सेवन प्रातःकाल उदय होते हुए, सूर्य की किरणों को 5 से
15 मिनट तक छाती पर लेना। जाड़े के दिनों में सूर्य की किरणों को नग्न शरीर पर
लेना और धूप स्नान करना चाहिए। जीवनीशक्ति देने वाली आक्सीजन की प्राति के
लिए प्रातः: आधा या एक घण्टा शुद्ध हवा में घूमना चाहिए। साथ ही साथ खुली हुइर्
हवा में 15-20 लम्बे की सांस लेना चाहिए।

  1. हरी घास पर या ओस पर नंगे पाँव आधा घण्टा तक घूमना चाहिए। स्वच्छ जल
    प्रतिदिन कम से कम 2 लीटर पीना।
  2. जल में कोईदोश हो तो उसे उबालकर और ठंडा करके बर्तन में रखें और तब पीने
    चाहिए।
  3. प्रतिदिन व्यायाम, भ्रमण और योगासन रोगों को दूर करते हैं।

भोजन पर नियन्त्रण रखें भूख से कुछ कम खायें, भोजन थोड़ा और खूब
चबाकर खायें, गरिष्ठ भोजन हानिकारक है। प्रतिदिन स्वच्छ जल से स्नान करना
चाहिए। मादक द्रव्यों का सेवन न करें। स्वास्थ्य के सबसे बड ़ े शत्रु हैं। ओषधियों का
सेवन भी बहुत कम करें। रहने और सोने के कमरों में शुद्ध वायु और प्रकाश की
व्यवस्था होनी चाहिए। दीर्घायु के लिए संयम का पालन करना अनिवार्य है। उत्तेजक
पदार्थों का सेवन, कामोत्तेजक अश्लील दृश्यों का देखना या अश्लील साहित्य का पठन
स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। र्इष्वर प्रार्थना मन: ]शुद्धि, चारित्रिक पवित्रता, मनोबल
और आत्मविश्वास देती है। सदा प्रसन्नचित्त रहें, चिन्ता को दूर भगायें। दान, दया
परोपकार आदि के कार्य मनुष्य का प्रसन्नचित्त रखते है और उनकी जीवनी शक्ति बढ़ाते
हैं।;

सन्दर्भ-

  1. चरक संघिता, निदान स्थान – 1/3।
  2. सर्वेशामेव रोगाणां निदानं कुपिता मला:। – अश्टांग0, निदान – 1/12।
  3. अश्टांग0, सूत्र0 – 12/35।
  4. त्रिधातु शर्म वहतं शुभस्पती। – ऋग्वेद – 1/34/6।
  5. त्रिर्नो अष्विना दिव्यानि भेशजा0। – ऋग्वेद – 1/34/6।
  6. अपामीवा भवतु रक्षसा सह। – ऋग्वेद – 9/85/1।
  7. यदि कामाद् अपकामाद् हृदयात् जायते परि। – अथर्ववेद – 9/8/8।
  8. मा गतानामा दीधीथा ये नयन्ति परावतम्। – अथर्ववेद – 8/1/8।
  9. प्राणों मृत्यु: प्राणस्तक्मा0। प्राणों ह सत्यवादिनम् उत्तमे
    लोक आ दधम्।-अथर्ववेद-9/8/8।
  10. अग्नि:, सोम:, पूतदक्षा:, वेदि:, बर्हि:। – अथर्ववेद – 5/22/1।
    51-ज्वरस्तु देहेन्द्रियमनस्तापकर:।
  11. ज्वरयति शरीराणीति ज्वर:। – चरक निदान0 – 1/16 और 35।

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