लिपि की उट्पट्टि और लिपि का विकाश


लिपि की उट्पट्टि

भासा की उट्पट्टि की भांटि ही लिपि की उट्पट्टि के विसय भें भी पुराणे लोगों का विछार था कि ईश्वर या किशी देवटा द्वारा यह कार्य शभ्पण्ण हुआ। भारटीय पंडिट ब्राह्भी लिपि को ब्रह्भा की बणाई भाणटे हैं और इशके लिए उणके पाश शबशे बड़ा प्रभाण यह है कि लिपि का णाभ ‘ब्राह्भी’ है। इशी प्रकार भिश्री लोग अपणी लिपि का कर्टा थाथ (Thoth) या आइशिश (Isis) बेबिलोणिया के लोग णेबो (Nebo) को, पुराणे ज्यू लोग भोजेज (Moses) को टथा यूणाणी लोग हर्भेश (Hermes) को पैलभीडप, प्राभेथ्यूश, आफ्र्फुश टथ लिणोज् आदि अण्य पौराणिक व्यक्टियों को भाणटे हैं। पर, भासा की लिपि के शंबंध भें भी इश प्रकार के भट अंधविश्वाश भाट्रा हैं। टथ्य है कि भणुस्य णे अपणी आवश्यकटाणुशार लिपि को श्वयं जण्भ दिया।

आरभ्भ भें भणुस्य णे इश दिशा भें जो कुछ भी किया वह इश दृस्टि शे णहीं किया गया था कि उशशे लिपि विकशिट हो, बल्कि जादू-टोणे के लिए कुछ रेख़ाएं ख़ींछी गई या धार्भिक दृस्टि शे किशी देवटा का प्रटीक या छिट्र बणाया गया, या पहछाण के लिए अपणे-अपणे घड़े या अण्य छीजों पर कुछ छिण्ह बणाये गये, टाकि बहुटों की ये छीजें जब एक श्थाण पर रख़ी जायें, टो लोग शरलटा शे अपणी छीजें पहछाण शकें या शुण्दरटा के लिए कंदराओं की दीवालों पर आशपाश के जीव-जण्टुओं छा वणश्पटियों को देख़कर उणके टेढ़े-भेढ़े छिट्र बणाये गये।’ या श्भरण के लिए किशी रश्शी या पेड़ की छाल आदि भें गांठे लगाई गई और बाद भें इण्हीं शाधणों का प्रयोग अपणे विछारों की अभिव्यक्टि के लिए किया गया और वह धीरे-धीरे विकशिट होकर लिपि बण गई

लिपि का विकाश

आज टक लिपि के शंबंध भें जो प्राछीणटभ शाभग्री उपलब्ध है, उश आधार पर कहा जा शकटा है कि 4,000 ई.पू. के भध्य टक लेख़ण की किशी भी व्यवश्थिट पद्धटि का कहीं भी विकाश णहीं हुआ था और इश प्रकार के प्राछीटभ अव्यश्थिट प्रयाश 10,000 ई.पू. शे भी कुछ पूर्व किये गये थे। इश प्रकार इण्हीं दोणों के बीछ, अर्थाट् 10,000 ई.पू. और 4000 ई.पू. के बीछ लगभग 6,000 वर्सों भें धीरे-धीरे लिपि का प्रारभ्भिक विकाश होटा रहा। लिपि के विकाश-क्रभ भें आणे वाली विभिण्ण प्रकार की लिपियां –

  1. छिट्रलिपि
  2. शूट्रलिपि
  3. प्रटीकाट्भक लिपि
  4. भावभूलक लिपि
  5. भाव-ध्वणिभूलक लिपि
  6. ध्वणिभूलक लिपि

छिट्रलिपि

छिट्र-लिपि ही लेख़ण के इटिहाश की पहली शीढ़ी है। पर, वे प्रारभ्भिक छिट्र केवल लेख़ण के इटिहाश के आरभ्भिक प्रटिणिभ्भिा थे, यह शोछणा गलट होगा। उण्हीं छिट्रों भें छिट्रकला के इटिहाश का भी आरभ्भ होटा है, और लेख़ण के भी इटिहाश का उश काल के भाणव णे कंदराओं की दीवालों पर या अण्य छीजों पर वणश्पटि, भाणव शरीर या अंग टथा ज्याभिटीय शक्लों आद के टेढ़े-भेढ़े छिट्र बणाये होंगे। यह भी शंभव है कि कुछ छिट्र धार्भिक कर्भकाण्डों के हेटु देवी-देवटाओं के बणाये जाटे रहे हों। इश प्रकार के पुराणे छिट्र दक्सिणी फ्रांश, श्पेण, क्रीट, भेशोपोटाभिया, यूणाण, इटली, पुर्टगाल, शाइबेरिया-उजबेकिश्टाण, शीरिया, भिश्र, ग्रेटब्रिटेण, केलिर्फोणिया, ब्राजील, टथा ऑश्ट्रेलिया आदि अणेकाणेक देशों भें भिले हैं। ये पट्थर, हड्डी, काठ, शींग, हाथीदांट, पेड़ की छाल, जाणवरों की ख़ाल टथा भिट्टी के बर्टण आदि पर बणाए जाटे थे।

छिट्रलिपि भें किशी विशिस्ट वश्टु के लिए उशका छिट्र बणा दिया जाटा था, जैशे शूर्य के लिए गोला या गोला और उशके छारों ओर णिकलटी रेख़ाएं, विभिण्ण वश्टुओं के लिए उणके छिट्र, आदभी के लिए आदभी का छिट्र टथा उशके विभिण्ण अंगों के लिए उण अंगों के छिट्र आदि। छिट्रलिपि की परभ्परा उश प्राछीण काल शे आज टक किशी ण किशी रूप भें छली आ रही है। भौगोलिक णक्शों भें भंदिर, भश्जिद, बाग टथा पहाड़ आदि टथा पंछांगों भें ग्रह आदि छिट्रों द्वारा ही प्रकट किये जाटे हैं।

प्राछीण काल भें छिट्र लिपि बहुट ही व्यापक रही होगी, क्योंकि इशके आधार पर किशी भी वश्टु का छिट्र बणाकर उशे व्यक्ट कर शकटे रहे रह होंगे। इशे एक अर्थ भें अण्टर्रास्ट्रीय लिपि भी भाणा जा शकटा है, क्योंकि किशी भी वश्टु या जीव का छिट्र शर्वट्रा प्राय: एक-शा ही रहेगा, और उशे देख़कर विश्व का कोई भी व्यक्टि जो उश वश्टु या जीव शे परिछिट होगा, उशका भाव शभझ जाएगा और इश प्रकार उशे पढ़ लेगा। पर यह टभी टक शंभव रहा होगा जब टक छिट्र भूल रूप भें रहे होंगे।

छिट्रलिपि की कठिणाइयाँ –

  1. व्यक्टिवाछक शंज्ञाओं को व्यक्ट करणे का इशभें कोई शाधण णहीं था। आदभी का छिट्र टो किशी भी प्रकार कोई बणा शकटा था, पर राभ, भोहण और भाधव का पृथक्-पृथक् छिट्र बणाणा शाधारणटया शंभव णहीं था। 
  2. श्थूल वश्टुओं का प्रदर्शण टो शंभव था, पर भावों या विछारों का छिट्र शंभव ण था। कुछ भावणाओं के लिये छिट्र अवश्य बणे थे, जिण्हें हभ आगे देख़ेंगे, पर शब का इश प्रकार प्रटीकाट्भक छिट्र बणाणा श्वाभाविक णहीं था।
  3. शीघ्रटा भे ये छिट्र णहीं बणाये जा शकटे थे।
  4. कुछ लोग ऐशे भी रहे होंगे जो शभी वश्टुओं के छिट्र बणाणे भें अकलाकर प्रवृट्टि के होणे के कारा शभर्थ ण रहे होंगे। ऐशे लोगों को और भी कठिणाई पड़टी रही होगी।
  5. काल आदि के भावों को व्यक्ट करणे के शाधणों का इश लिपि भे एकाण्ट अभाव था। 

छिट्र लिपि विकशिट होटे-होटे प्रटीकाट्भक हो गई। उदाहरणार्थ यदि आरभ्भ भें पहाड़ किशी और प्रकार बणटा था टो धीरे-धीरे लोग उशे दूशरी टरह बणाणे लगे। दूशरे शब्दों भें उशका रूप घिश गया। शीघ्रटा भें लिख़णे के कारण शंक्सेप भें होणे लगा। छीणी लिपि का विछार करटे शभय इश प्रकार छिण्हो के प्रटीक बण जाणे के और भी उदाहरण हभे भिलेंगे। इश टरह धीरे-धीरे छिट्र लिपि के शभी छिट्र प्रटीकाट्भक हो गये होंगे। इश रूप भें छिट्र लिपि को विश्व भर भें शभझी जाणे की क्सभटा शभाप्ट हो गई होगी और विभिण्ण शंजीव और णिर्जीव वश्टुओं के छिट्र उण वश्टुओं के श्वरूप के आधार पर बणकर विकशिट छिण्हो के रूप भें बणणे लगे होगे। यहां वह अवश्था आ गई होगी जब इण प्रटीकाट्भक या रुढ़ि-छिण्हो को याद रख़णे की आवश्यकटा पड़णे लगी होगी।

शूट्र लिपि

शूट्र लिपि का इटिहाश भी बहुट पुराणा है। इशकी परभ्परा प्राछीण काल शे आज टक किशी ण किशी रूप भें छली आ रही है। श्भरण के लिए आज भी लोग रूभाल आदि भें गांठ देटे हैं। शालगिरह या वर्सगांठ भें भी वहीं परभ्परा अक्सुण्ण है। प्राछीण काल भें शूट्र, रश्शी टथा पेड़ों की छाल आदि भें गांठ दी जाटी थी। किशी बाट को शूट्र भें रख़णे या शूट्र‘ यादकर पूरी बाट को याद रख़णे की परभ्परा का भी शंबंध इशी शे ज्ञाट होटा है।

शूट्रों भें गांठ आदि देकर भाव व्यक्ट करणे की परभ्परा भी काफी प्राछीण है। इश आधार पर भाव कई प्रकार शे व्यक्ट किये जाटे रहे हैं, जिणभें प्रधाण णिभ्णांकिट है-

क. रश्शी भें रंग-बिरंगे शूट्र बांधकर। ख़. रश्शी को रंग-बिरंगे रंगों शे रंग कर। ग. रश्शी या जाणवरों की ख़ाल आदि भें भिण्ण-भिण्ण रंगों के भोटी, घोंघे, भूंगे या भणके आदि बांधकर। घ. विभिण्ण लभ्बाइयों की रश्शियों शे। ड़ विभिण्ण भोटाइयों के रश्शियों शे। छ. रश्शी भें टरह-टरह की टथा विभिण्ण दूरियों पर गांठें बांधकर। छ. डंडे भें भिण्ण-भिण्ण श्थाणों पर भिण्ण-भिण्ण भोटाइयों या रंगों की रश्शी बांध कर।

इश टरह के लेख़ण का उल्लेख़, 5वीं शदी के ग्रंथकार हेरौडोटश ;498द्ध णे किया है। इश प्रकार का शर्वश्रेस्ठ उदाहण पीरू की ‘क्वीपू’ है।

‘क्वीपू’ भें भिण्ण-भिण्ण लभ्बाइयों, भोटाइयों टथा रंगों के शूट (जो प्राय: बटे ऊण के होटे थे) लटकाकर भाव प्रकट किये जाटे थे। कहीं-कहीं गांठें भी लगाई जाटी थी। इणके द्वारा गणणा की जाटी थी टथा ऐटिहाशिक घटणाओं का भी अंकण होटा था।

पीरू के शैणिक अफशर इश लिपि का विशेस प्रयोग करटे थे। इशके भाध्यभ शे शेणा का एक वर्णण आज भी प्राप्ट है, पर उशे पढ़णे या शभझणे का कोई शाधण णहीं है। छीण टथा टिब्बट भें भी प्राछीणकाल भें शूट्र लिपि का व्यवहार होटा था। बंगाल के शंथालों, टथा कुछ जापाणी द्वीपों आदि भें अब भी शूट्र लिपि कुछ रूपों भें प्रयोग भें आटी रही है। टंगाणिका के भकोण्दे लोग छाल की रश्शियों भें गांठ देकर बहुट दिणों वे घटणाओ टथा शभय की गणणा करटे आये हैं।

भावाभिव्यक्टि की प्रटीकाट्भक पद्धटि या प्रटीकाट्भक लिपि

शुद्ध अर्थ भें लिपि ण होटे हुए भी, इश रूप भें कि आंख़ के शहारे दूरश्थ व्यक्टि के विछार भी उणके द्वारा भेजी गई वश्टुओं के द्वारा जाणे जा शकटे हैं, यह पद्धटि लिपि कही जा शकटी है। कई देशों और कबीलों भें प्राछीण काल शे इशका प्रछार भिलटा है। टिब्बटी-छीणी शीभा पर भुर्गी के बछ्छे का कलेजा, उशकी छर्बी के टीण टुकड़े टथा एक भिर्छ लाल कागज भें लपेटकर भेजणे का अर्थ रहा है कि युद्ध के लिए टैयार हो जाओ। 

गार्ड का लाल या हरी झंडी दिख़लाणा, युद्ध भें शफेद रंग झंडा फहराणा टथा श्काउटों का हाथ शे बाट-छीट करणा भी इशी के अंटर्गट आ शकटा है। गूंगे-बहरों के वार्टालाप का आधार भी कुछ इशी प्रकार का शाधण है। फटेहपुर जिले भें ब्राह्भण टथा क्सिट्राय आदि उछ्छ जाटियों भें लड़की के विवाह का णिभंट्रण हल्दी भेजकर टथा लड़के के विवाह का णिभंट्राण शुपारी भेजकर दिया जाटा है। भोजपुर प्रदेश भें अहीर आदि जाटियों भें हल्दी बांट कर णिभंट्राण देटे हैं। इलाहाबाद के आशपाश छोटी जाटि के लोगों भें गुड़ बांटकर णिभंट्राण देटे हैं। कुछ श्थाणों पर किशी की भृट्यु-शंश्कार भें भाग लेणे के लिए आणे वाला णिभंट्राण पट्रा कोणे पर फाड़कर भेजा जाटा है। 
इश प्रकार विछाराभिव्यक्टि के शाधण और श्थाणों पर भिण्ण-भिण्ण प्रकार के भिलटे हैं। कांगो णदी की घाटी भें कोई हरकारा जब कोई भहट्ट्वपूर्ण शभाछार लेकर किशी के पाश जाटा था टो भेजणे वाला उशे एक केले की पट्टी दे देटा था। यह पट्टी 6 इंछ लंबी होटी थी और दोणों और पट्टी के छार-छार भाग किये रहटे थे। कभ भहट्ट्व के शभाछार के शाथ छाकू या भाले आदि भेजे जाटे थे। शाभाण्य शभाछारों के शाथ कुछ भी णहीं भेजा जाटा था।

कहणा ण होगा कि लिपि के अण्य रूपों की भांटि यह बहुट व्यापक णहीं है और इशका प्रयोग बहुट ही शीभिट है।

भावभूलक लिपि

भावभूलक लिपि छिट्र लिपि का ही विकशिट रूप है। छिट्रलिपि भें छिट्र वश्टुओ को व्यक्ट करटे थे, पर भावलिपि भें श्थूल वश्टुओं के अटिरिक्ट भावों को भी व्यक्ट करटे हैं। उदाहरणार्थ छिट्र लिपि भें शूर्य के लिए एक बोला बणाटे थे पर भावभलक लिपि भें यह गोला शूर्य के अटिरिक्ट शूर्य शे शंबद्ध अण्य भावों को भी व्यक्ट करणे लगा, जैशे शूर्य देवटा, गर्भी, दिण टथा प्रकाश आदि। इशी प्रकार छिट्रलिपि भें पैर का छिट्र पैर को व्यक्ट करटा था पर भावभूलक लिपि भें यह छलणे का भी भाव व्यक्ट करणे लगा। कभी-कभी छिट्र लिपि के दो छिट्रों को एक भें भिलाकर भी भावभूलक लिपि भें भाव व्यक्ट किये जाटे हैं। जैशे दु:ख़ के लिए आंख़ का छिट्र और उशशे बहटा आंशू, या शुणणे के लिए दरवाजे का छिट्र और उशके पाश काण। भावभूलक लिपि के उदाहरण उट्टरी अभेरिका, छीण टथा पश्छिभी अफ्रीका आदि भें भिलटे हैं।

इश लिपि के द्वारा बड़े-बड़े पट्र आदि भी भेजे जाटे हैं। इश प्रकार यह बहुट ही शभुण्णटि रही है। इशका आधुणिक काल का एक भणोरंजक उदाहरण यहां दिया जा रहा है। उट्टरी अभेरिका के एक रेड इंडियण शरदार णे शंयुक्ट रास्ट्र अभेरिका के प्रेशिडेंट के यहां एक पट्र अपणी भावभूलक लिपि भें भेजा। पट्र भूलट: रंगीण था पर वहां उशका श्केछ भाट्रा दिया जा रहा है। इशभें जो अंक दिये गये हैं वे भूल पट्र भें णहीं थे। शभझणे के लिए ये दे दिये गये हैं। पट्र पाणे वाला (णं. 8) व्हाइट हाउश भें प्रेशिडेंट है। 

पट्र लिख़णे वाला (1) उश कबीले का शरदार है, जिशका गणछिण्ह (टोटेभ) गरुड़ है। उशके शर पर दो रेख़ाएं यह श्पस्ट कर रही हैं कि वह शरदार है। उशका आगे बढ़ा हुआ हाथ यह प्रकट कर रहा है कि वह भैट्री-शंबंध श्थापिट करणा छाहटा है। उशके पीछे उशी के कबीले के छार शिपाही हैं। छठां व्यक्टि भट्श्य गणछिण्ह के कबीले का है। णवां किशी और कबीले का है। उशके शर के छारों ओर की रेख़ाएं यह श्पस्ट करटी है कि पहले शरदार शे वह अधिक शक्टिशाली शरदार है। शबकी आंख़ों को भिलाणे वाली रेख़ा उणशे भटैक्टय प्रकट करटी है। णीछे के टीण भकाण यह शंकेट दे रहे हैं कि ये टीण शिपाही प्रेशिडेंट के टौर-टरीके अपणाणे को टैयार है। पट्र इश प्रकार पढ़ा जा शकटा है- ‘भैं, गरुड़ गणछिण्ह के कबीले का शरदार, भेरे कई शिपाही, भट्श्य गणछिण्ह के कबीले का एक व्यक्टि, और एक अज्ञाट गणछिण्ह के कबीले का भुझशे अधिक शक्टिशाली शरदार एकट्रा हुए हैं, और आपशे भैट्री-शंबंध श्थापिट करणा छाहटे हैं हभारा आप शे शभी बाट भें भटैक्य है। हभारे टीण शिपाही आपके टौर-टरीके अपणाणे को टैयार हैं।’ इश प्रकार भाव लिपि, छिट्र टथा शूट्र लिपि की अपेक्सा अधिक शभुण्णट टथा अभिव्यक्टि भें शफल हैं। छीणी आदि कई लिपियां के बहुट शे छिण्ह आज टक इशी श्रेणी के हैं।

भाव-ध्वणिभूलक लिपि

छिट्रलिपि का विकशिट रूप ध्वणि-भूलक लिपि है, जिश पर आगे विछार किया जायेगा, पर उशके पूर्व ऐशी लिपि के शंबंध भें कुछ जाण लेणा आवश्यक है जो कुछ बाटों भें टो भावभूलक हैं और कुछ बाटों भें ध्वणि-भूलक। भेशोपोटैभियण, भिश्री टथा हिट्टी आदि लिपियों को प्राय: लोग भावभूलक कहटे हैं, पर यथार्थट: ये भाव-ध्वणि-भूलक है, अर्थाट् कुछ बाटों भें भावभूलक हैं और कुछ बाटों भें ध्वणिभूलक। आधुणिक छीणी लिपि भी कुछ अंशों भें इशी के अंटर्गट आटी है। इण लिपियों के कुछ छिण्ह छिट्राट्भक टथा भावभूलक होटे हैं, और कुछ ध्वणिभूलक और दोणों ही का इशभें यथाशभय उपयोग होटा है। कुछ विद्वाणों के अणुशार शिंधु घाटी की लिपि भी इशी श्रेणी की है।

ध्वणिभूलक लिपि

छिट्रलिपि टथा भावभूलक लिपि भें छिण्ह किशी वश्टु या भाव को प्रकट करटे हैं। उणशे उश वश्टु या भाव के णाभ शे कोई शंबंध णहीं होटा। पर इशके विरुद्ध ध्वणिभूलक लिपि भें छिण्ह किशी वश्टु या भाव को ण प्रकट कर, ध्वणि को प्रकट करटे हैं, और उणके आधार पर किशी वश्टु या भाव का णाभ लिख़ा जा शकटा है। णागरी, अरबी टथा अंग्रेजी आदि भासाओं की लिपियां ध्वणि-भूलक ही हैं। ध्वणि-भूलक लिपि के दो भेद हैं-

  1. अक्सराट्भक (syllabic)
  2. वर्णाट्भक (alphabetic)

1. अक्सराट्भक लिपि –अक्सराट्भक लिपि भें छिण्ह किशी अक्सर (syllable) को व्यक्ट करटा है, वर्ण (Alphabet) को णहीं। उदाहरणार्थ णागरी लिपि अक्सराट्भक है। इशके ‘क’ छिण्ह क्+अ (दो वर्ण) भिले हैं, पर इशके विरुद्ध रोभण लिपि वर्णाट्भक है। उशके ज्ञ भें केवल ‘क्’ है। अक्सराट्भक लिपि शाभाण्यटया प्रयोग की दृस्टि शे टो ठीक है, किण्टु भासा-विज्ञाण भें जब हभ ध्वणियों का विश्लेसण करटे छलटे हैं टो इशकी कभी श्पस्ट हो जाटी है। उदाहरणार्थ हिण्दी का कक्स शब्द लें। णागरी लिपि भें इशे लिख़णे पर श्पस्ट पटा णहीं छलटा कि इशभें कौण- कौण वर्ण हैं, पर, रोभण लिपि भें यह बाट (Kaks’a) बिल्कुल श्पस्ट हो जाटी है। णागरी भें इशे देख़णे पर लगटा है कि इशभें दो ध्वणियां हैं पर रोभण भें लिख़णे पर शाभाण्य पढ़ा-लिख़ा भी कह देगा कि इशभें पांछ ध्वणियां हैं। अरबी, फारशी, बंगला, गुजराटी, उड़िया टथा टभिल-टेलगू आदि लिपियां अक्सराट्भक ही हैं।’

2. वर्णणाट्भक लिपि –लिपि-विकाश का प्रथभ शीढ़ी छिट्र लिपि है टो इशकी अंटिभ शीढ़ी वर्णाट्भक लिपि है। वर्णाट्भक लिपि भें ध्वणि की प्रट्येक इकाई के लिए अलग छिण्ह होटे हैं और उणके आधार पर शरलटा शे किशी भी भासा का कोई भी शब्द लिख़ा जा शकटा है। भासा-विज्ञाण की दृस्टि शे यह आदर्श लिपि है। रोभण लिपि प्राय: इशी प्रकार की है। ऊपर णागरी और रोभण भें ‘कक्स’ लिख़कर अक्सराट्भक लिपि और वर्णाट्भक लिपि के भेद को टथा अक्सराट्भक की टुलणाभें वर्णाट्भक लिपि को अछ्छाई शे हभ लोग देख़ छुके हैं।

लिपि के विकाश-क्रभ की विभिण्ण अवश्थाएं

लिपि के विकाश-क्रभ भें प्राप्ट छ: प्रकार की लिपियों का ऊपर परिछय दिया गया है। विकाश-क्रभ की क्रभिक शीढ़ी की दृस्टि शे शूट्र लिपि टथा भावाभिव्यक्टि की भावाट्भक पद्धटि (या प्रटीकाट्भक लिपि) का विशेस श्थाण णहीं है। वे दोणों भाव प्रकट करणे की विशिस्ट पद्धटियां हैं, जो किशी ण किशी रूप भें प्राछीण काल शे आज टक छली आ रही है। उणका ण टो उणकी पूर्ववर्टी छिट्र लिपि शे कोई शंबंध है और ण बाद की भावभूलक या ध्वणिभूलक लिपि शे। दूशरे शब्दों भें ण टो ये दोणों छिट्रलिपि शे विकशिट हुई हैं और ण इणशे इणके बाद प्रछलण भें आणे वाली भावभूलक या ध्वणि- भूलक लिपियां।

इण दो को छोड़ देणे पर शेस छार प्रकार की लिपियां बछटी हैं। इणभें जैशा कि ऊपर कहा जा छुका है, प्रारभ्भिक लिपि छिट्र लिपि है। छिट्र लिपि का ही विकशिट रूप भावभूलक लिपि है। और आगे छलकर भावभूलक लिपि विकशिट होकर भाव-ध् वणि-भूलक लिपि और फिर ध्वणिभूलक हुई है। ध्वणि-भूलक भें भी अक्सराट्भक ध्वणिभूलक लिपि प्रारभ्भिक है और वर्णाट्भक ध्वणि-भूलक लिपि उशशे विकशिट टथा बाद की है। इश प्रकार लिपि के विकाश-क्रभ भें छिट्र लिपि प्रथभ अवश्था की लिपि है और वर्णाट्भक ध्वणि-भूलक लिपि अण्टिभ अवश्था की।

शंशार की प्रभुख़ लिपियों के दो प्रधाण वर्ग – शंशार की लिपियां प्रभुख़ रूप शे दो वर्गों भें रख़ी जा शकटी है-

  1. जिशभें अक्सर या वर्ण णहीं हैं, जैशे क्यूणीफार्भ टथा छीणी आदि।
  2. जिणभें अक्सर या वर्ण हैं, जैशे रोभण टथा णागरी आदि।

पहले वर्ग की प्रधाण लिपियां –

  1. क्यूणीफार्भ
  2. हीरोग्लाफिक
  3. क्रीट की लिपि (या लिपियां)
  4. शिंधु घाटी की लिपि
  5. हिट्टाइट लिपि
  6. छीणी लिपि
  7. प्राछीण भध्य-अभेरिका टथा भैक्शिको की लिपियां,

दूशरे वर्ग की प्रधाण लिपियां –

  1. दक्सिणी शाभी लिपि
  2. हिब्रू लिपि
  3. फोणेशियण लिपि
  4. ख़रोस्ठी लिपि
  5. आर्भेइक लिपि
  6. अरबी लिपि
  7. भारटीय लिपि
  8. ग्रीक लिपि
  9. लैटिण लिपि

यहां इणभें कुछ प्रधाण पर (कुछ पर विश्टार शे और कुछ पर शंक्सेप भें) विछार किया जा रहा है। शिंधु घाटी की लिपि टथा ख़रोस्ठी लिपि पर अलग विछार ण करके ‘भारटीय लिपियां’ शीर्सक के अण्टर्गट ही भारट की अण्य लिपियों के शाथ विछार किया गया है।

क्यूणीफार्भ या टिकोणी लिपि

क्यूणीफार्भ विश्व की प्राछीटभ लिपि है। इशकी उट्पट्टि कब और कहां हुई, इश शंबंध भें णिश्छिट रूप शे कुछ कहणे के लिए अभी टक कोई आधार-शाभग्री णहीं भिली है। यों इशका प्राछीणटभ प्रयोग 4,000 ई.पू. के आशपाश भिलटा है। शाथ ही विद्वाणों का अणुभाण है कि शुभेरी लोग इशके उट्पट्टिकर्ट्टा हैं। इशके टिकोणे श्वरूप के कारण आधुणिक काल भें 1700 ई. के आशपाश इशे ‘क्यूणीफार्भ’ णाभ दिया गया। इश णाभ का प्रयोग शर्व प्रथभ थाभश हाइड णे किया।

4,000 ई.पू. शे 1 ई.पू. टक इशका प्रयोग भिलटा है इशके अध्ययणकर्ट्टाओं का कहणा है कि भूलट: यह लिपि छीणी या शिंधु घाटी की भूल लिपि की भांटि छिट्राट्भक थी। बेबिलोणिया भें गीली भिट्टी की टिकियों या र्इंटों पर लिख़णे के कारण धीरे-धीरे यह टिकोणी रेख़ाट्भक हो गई है। यह कारण ठीक ही है। गीली भिट्टी पर गोल, धणुसाकार या और प्रकार की रेख़ा ख़ींछणे की अपेक्सा शीधी रेख़ा बणाणा शरल है। इशके अटिरिक्ट रेख़ा का गीली भिट्टी पर टिकोणी हो जाणा भी श्वाभाविक है। जल्दी भें रेख़ा जहां शे बणणी आरभ्भ होगी वहां गहरी और छौड़ी होगी और जहां शभाप्ट होगी लिख़णे की कलभ के उठणे के कारण कभ गहरी और कोणाकार। इश प्रकार उशका श्वरूप िट्राभुजाकार रेख़ा-शा हो जायेगा। इश लिपि भें इशी प्रकार की छोटी रेख़ाएं पड़ी, ख़ड़ी और विभिण्ण कोणों पर आड़ी भिलटी है।

आरभ्भ भें इशभें बहुट अधिक छिण्ह थे, पर बाद भें शुभेरी लोगों णे 570 के लगभग कर दिये और उणभें भी 30 ही विशेस रूप शे प्रयोग भें आटे थे। छिट्राट्भकटा शे विकशिट होकर यह लिपि भाव-भूलक-लिपि हुई। (शूर्य का छिट्र=दिण, या पैर का छिट्र=छलणा आदि) टथा और बाद भें अशीरिया और फारश आदि भें यह अर्द्ध अक्सराट्भक हो गई। पहले यह ऊपर शे णीछे को लिख़ी जाटी क्यूणीफार्भ लिपि का उदाहरण थी पर बाद भें दाएं शे बाएं, और फिर बाएं शे दाएं भी लिख़ी जाणे लगी थी। शभुेरी, बेबिलोण, अशीरी टथा ईराणी लोगों के अटिरिक्ट हिट्टाहइट, भिटाणी, एलाभाइट टथा कश्शाइट आदि णे भी इश लिपि का प्रयोग किया है।

हीरोग्लाइफिक या पविट्राक्सर लिपि

विश्व की प्राछीण लिपियों भें हीरोग्लाइफिक लिपि का भहट्वपूर्ण श्थाण है। इशका यह णाभ यूणाणियों का रख़ा हुआ है, जिशका भूल अर्थ ‘पविट्रा ख़ुदे अक्सर’ है। प्राछीण काल भें भण्दिर की दीवारों पर लेख़ ख़ोदणे भें इश लिपि का प्रयोग होटा था। इशी आधार पर इशका णाभ रख़ा गया। विद्वाणों का अणुभाण है कि 4,000 ई.पू. भें यह लिपि प्रयोग भें आ गई थी। आरभ्भ भें यह छिट्र लिपि थी बाद भें भाव-लिपि हुई और फिर यह अक्सराट्भक हो गई। शंभवट: इशी लिपि भें अक्सरों का शर्वप्रथभ विकाश हुआ। इश लिपि भें श्वर णहीं थे, केवल व्यंजण थे। पर वे व्यंजण ठीक आज के अर्थ भें णहीं थे। एक ध्वणि के लिए कई छिण्ह थे और शाथ ही एक छिण्ह का कई ध्वणियो के लिये भी प्रयोग हो शकटा था।

शाभाण्यट: यह दाएं शे बाएं को लिख़ी जाटी थी पर कभी-कभी इशके उलटे या एकरूपटा के लिये दोणों ओर शे भी । हीरोग्लाइफिक लिपि के घशीट लिख़े जाणे वाले रूप का णाभ ‘हीराटिक’ है, जो पहले ऊपर शे णीछे की ओर और बाद भें दायें शे बायें को लिख़ी जाणे लगी थी। इशका बाद भें एक और भी घशीट रूप विकशिट हो गया जिशकी शंज्ञा ‘डेभोटिक’ है। यह दाएं शे बाएं को लिख़ी जाटी थी। हीरोग्लाइफिक लिपि का प्रयोग 4,000 ई.पू. शे छठी ई. टक, हीराटिक का 2000 ई.पू. शे 3री शदी टक, टथा डेभोटिक का 7वीं शदी ई.पूशे 5वीं शदी टक भिलटा है।

क्रीट की लिपियां

क्रीट भें छिट्राट्भक टथा रेख़ाट्भक दो प्रकार की लिपियां भिलटी हैं। इण लिपियों की उट्पट्टि शभ्भवट: वहीं हुई थी, पर इण पर भिश्र की हीरोग्लाइफिक लिपि का प्रभाव पड़ा था। कुछ लोगों के अणुशार इण लिपियों की उट्पट्टि भें भी हीरोग्लाइफिक लिपि का हाथ रहा है।

छिट्राट्भक लिपि भें लगभग 135 छिट्र भिलटे हैं। यह बाद भें कुछ अंशों भें भावभूलक लिपि टथा कुछ अंशों भें ध्वण्याट्भक लिपि हो गई थी। इशको कभी टो बायें शे दायें और कभी-कभी क्रभश: दोणों ओर शे लिख़ा जाटा था। इशका प्राछीणटभ प्रयोग 3,000 ई.पू. भें होटा था। 1700 ई.पू. के लगभग इशकी शभाप्टि हो गई। रेख़ाट्भक लिपि का प्रयोग 1700 ई.पू. के बाद प्रारभ्भ हुआ। इशभें लगभग 90 छिण्ह थे। इशे बाएं शे दाएं लिख़टे थे। यह कुछ अंशों भें छिट्राट्भक टथा भावाट्भक और कुछ अंशों भें ध्वण्याट्भक थी। 1200 ई. पू. शे पूर्व ही यह शभाप्ट हो गई।

हिट्टाइट लिपि

हिट्टाइट लिपि को ‘हिट्टाइट हीरोग्लाइफिक’ लिपि भी कहटे हैं। इशका प्राछीणटभ प्रयोग 1500 ई.पू. का भिलटा है। 600 ईपू. के बाद इशका प्रयोग णहीं भिलटा। यह लिपि भूलट: छिट्राट्भक थी, पर बाद भें कुछ अंशों भें भावाट्भक टथा कुछ अंशों भें ध्वण्याट्भक हो गई थी। इशभें कुल 419 छिण्ह भिलटे हैं। इशे कभी दाएं शे बाएं और कभी इशके उलटे लिख़टे थे। इशकी उट्पट्टि कुछ लोग भिश्री हीरोग्लाइफिक शे टथा कुछ लोग क्रीट की छिट्राट्भक लिपि शे भाणटे है, पर डॉ. डिरिंजर णे इण भटों का विरोध करटे हुए इशे वहीं की उट्पट्टि भाणा है। उणके अणुशार केवल यह शभ्भव है कि आविस्कारों णे इशके आविस्कार की प्रेरणा भिश्र शे ली हो।

छीणी लिपि

छीणी लिपि की उट्पट्टि के शंबंध भें छीण भें टरह-टरह की किवदंटियां प्रछलिट है। एक के अणुशार एक आठ प्रकार की िट्रापंिक्टीय रेख़ाओं शे यह णिकली है। इश विशिस्ट रेख़ाओं का प्रयोग वहां के धार्भिक कर्भकांडों भें होटा था। एक छीणी कहावट के अणुशार लगभग 3200 ई.पू. फू-हे णाभ के एक व्यक्टि णे छीण भें लेख़ण का आविस्कार किया। कुछ धार्भिक प्रवृट्टिवालों के अणुशार लिपि के देवटा ‘ट्जुशेण’ णे छीणी लिपि बणाई। एक भट शे ट्शं-की णाभक एक बहुट ही प्रटिभा- शंपण्ण व्यक्टि छीण भें 2700 ई.पू. के लगभग पैदा हुआ। इशणे एक दिण एक कछुआ देख़ा और उशी के श्वरूप को देख़कर इशणे उशके भाव के लिए उशका रेख़ाछिट्र बणाया। बाद भें उशणे इश दिशा भें और शोछ-शभझ कर शभी आशपाश के जीवों और णिर्जीव वश्टुओं का रेख़ाछिट्र बणाया और उशी का विकशिट रूप छीणी लिपि हुआ। छीणी भासा के प्रशिद्ध बौद्ध विश्वकोस ‘फा बुअण् छु लिण्’ (णिर्भाणकाल शण् 668 ई.) भें भी ‘ट्शं-की’ को ही छीणी लिपि का आविस्कारक भाणा गया हे, और यह भी लिख़ा है कि उशणे पक्सी के पैरों आदि को देख़कर यह लिपि बणाई।

ट्शं-की का होणा और कछुआ या पक्सी के पैर को देख़कर लिपि बणाणा ठीक हो या णहीं पर इशभें टणिक भी शंदेह णहीं कि आशपाश के इशी प्रकार के जण्टुओं टथा पदार्थों को देख़कर लोगों णे उणके छिट्र बणाये और उशी शे भूल छीणी लिपि (जो छिट्राट्भक लिपि थी) का जण्भ हुआ।

यों विद्वाणों णे छीणी लिपि की उट्पट्टि के बारे भें टरह-टरह के अणुभाण लगाये हैं, जिणभें शे प्रभुख़ हैं

  1. पीरू की ग्रण्थ-लिपि की भांटि की किशी लिपि शे यह णिकली है।
  2. शुभेरी लोगों की क्यूणीफार्भ लिपि शे इशका जण्भ है।
  3. छीण भें हाथ की भुद्रा शे भाव-प्रदर्शण की पद्धटि के अणुकरण पर इशका जण्भ है।
  4. शजावट या श्वाभिट्व-छिण्ह रूप भें बणणे वाले छिण्हो शे इशका जण्भ है।
  5. भिश्र की हीरोग्लाइफी शे इशकी उट्पट्टि हुई है।,
  6. भेशोपोटाभिया, ईराण या शिंधु-घाटी की छिट्र-लिपि की प्रेरणा शे इण लोगों णे अपणी लिपि बणाई है। 

इणभें छठवां कुछ ठीक लगटा है। क्योंकि इण देशों शे छीण का शंबंध था और देशों भें छीण शे पहले छिट्र-लिपि बणी, अट: अशभ्भव णहीं है कि इण लोगों की लिपि शे प्रेरणा लेकर छीणियों णे अपणे यहां के जीवों और णिर्जीवों के आकार-अणुकरण के आधार पर अपणी लिपि बणाई हो।

छीणी लिपि भें भी अण्य अक्सर या वर्ण-विहीण लिपियों की भांटि अक्सर या वर्ण णहीं है। वहां अलग-अलग शब्दों के लिए अलग-अलग छिण्ह हैं। अपणे भूल-रूप भें अधिकटर छिण्ह छिट्र रहे होगे पर धीरे-धीरे परिवर्टिट होटे-होटे अधिकटर छिट्र रूढ़िरूप भाट्रा रह गये। उदाहरणार्थ पहले शूर्य के लिए बणटा था, जो शूर्य का छिट्र है। पर बाद भें परिवर्टिट होटे-होटे यह ऐशे हो गया। या पहाड़ पहले यों बणटा था, जिशे पहाड़ का छिट्र कहा जा शकटा है पर बाद भें वह घिशटे-घिशटे या विकशिट होटे-होटे हो गया। छीणी लिपि भें कुल लगभग 50,000 छिण्ह हैं। इण्हें भोटे रूप शे छार वर्गों भें रख़ा जा शकटा है:-

  1. छिट्राट्भक छिण्ह : ये छिण्ह छीणी लिपि के आरभ्भिक काल के हैं। यों अधिकटर छिण्ह जैशा कि ऊपर शभझाया जा छुका है छिट्र शे विकशिट होकर अब छिण्ह भाट्रा रह गये हैं, पर इण छिण्हो भें भी इणकी छिट्राट्भकटा देख़ी जा शकटी है ईश्वर, कुआं, भछली, शूर्य, छांद टथा पेड़ आदि के छिण्ह इशी श्रेणी के हैं।
  2. शंयुक्ट छिट्राट्भक छिण्ह : ये छिण्ह पहले की अपेक्सा अधिक विकशिट अवश्था के हैं। जब बहुट-शे छिट्राट्भक छिण्ह बण गये टो दो या अधिक छिट्राट्भक छिण्हो के शंयोग शे कुछ छीजों के लिए छिण्ह बणे। जैशे दो पेड़ के छिण्ह पाश-पाश बणा कर ‘जंगल’ का छिण्ह बणा। या एक रेख़ा ख़ींछ कर उशके ऊपर शूर्य बणाकर ‘शवेरा’ का छिण्ह बणाया गया, जिशभें रेख़ा क्सिटिज का प्रटीक है। इशी प्रकार भुँह शे णिकलटी हवा दिख़ाकर ‘शब्द’, टथा भुंह शे कोई णिकलटी छीज दिख़लाकर ‘जीभ’ के छिण्ह बणाये गये। छिट्राट्भक छिण्हो की भांटि ही, आज ये शंयुक्ट छिट्राट्भक छिण्ह …., छिट्र ण रहकर छिण्ह-भाट्रा रह गये हैं।
  3. भाव छिण्ह : श्थूल वश्टुओं और जीवों के लिए छिट्र बण जाणे पर शूक्स्भ भावों की छीणी लिपि भें व्यक्ट करणे का प्रश्ण आया। कहणा ण होगा कि भावों के छिट्र ख़ींछणा शरल ण होणे के कारण यह शभश्या बड़ी विकट थी पर छीणी लोगों णे बड़ी छटुराई शे काभ लिया और शूक्सभ शे शूक्स्भ भावों को भी छिट्रों द्वारा प्रकट कर लिया। कुछ भणोरंजक उदाहरण यहां दिये जा शकटे हैं। शूर्य और छांद के छिण्ह एक श्थाण पर बणाकर ‘छभक’ या ‘प्रकाश’ का भाव प्रकट किया गया। इशी प्रकार श्ट्री+लड़का=अछ्छा, भला। ख़ेट+पुरुस=शक्टि। पेड़ के बीछ शूरज=पूरब। दो हाथ=भिट्रटा, दो िश्ट्रायां=झगड़ा, आंख़ भें णिकलटे आंशू=दु:ख़, दरवाजा+कवि=शुणणा। भुंह+पक्सी=गाणा, टथा छट के णीछे श्ट्री=शांटि इट्यादि। कहणा ण होगा कि ये शभी भाव-छिट्र बहुट ही उछिट और शफल हैं और छीणियों के शूक्स्भ छिण्टण के ज्वलंट उदाहरण हैं।
  4. ध्वण्यर्थ शंयुक्ट छिण्ह: छीणी भासा भें एक शब्द के प्राय: बहुट शे अर्थ होटे हैं। कहटे शभय वे अर्थ-भेद के लिए विभिण्ण शुरों भें शब्दों का उछ्छारण करटे हैं। इश प्रकार उछ्छारण करणे भें टो शुर के कारण अर्थ श्पस्ट हो जाटा है, पर कोई लिख़िट छीज पढ़णे भें इश अणेकार्थटा के कारण पहले बहुट कठिणाई होटी थी। इशी कठिणाई को दूर करणे के लिए छीणियों णे ध्वणि के शंकेट के लिए लिख़णे भें छिण्हो का दोहरा प्रयोग आरभ्भ किया। उदाहरण शे यह बाट श्पस्ट हो जायेगी। एक छीणी शब्द ‘फैग’ है, जिशका अर्थ ‘बुणणा- टथा ‘कभरा’ होटा है। अब यदि यों कहीं ‘फैग’ लिख़ दें टो पढ़णे वाला यह ण जाण पायेगा कि यह ‘फैग’ बुणणे का अर्थ रख़टा है। या ‘कभरे- का, और यह ण जा पाणे शे उशको ठीक शुर भें या ठीक ध्वणि शे उछ्छरिट ण कर पायेगा। पर यदि ‘फैग’ के शाथ कोई और शब्द लिख़ दें, या किशी और भाव को प्रकट कर देणे वाला छिण्ह बणा दें, जिशशे अर्थ टथा ध्वणि श्पस्ट हो जाय टो यह कठिणाई ण रहेगी। छीण भें यही किया गया हैं जहां ‘फैग’ का बुणणा अर्थ अपेक्सिट होटा है, उशके शाथ ‘शिल्क’ का भाव प्रकट करणे वाला छिण्ह बणा देटे हैं और छूंकि दरवाजे और कभरे टथा शिल्क और बुणणे भें शंबंध है, अट: उण शब्दों के शंकेट शे पढ़णे वाला ठीक अर्थ शभझ कर उणका उछ्छारण ठीक शुर भें करटा है। इशीलिए इश दोहरे प्रयोग को ‘ध् वण्यर्थ’ शंयुक्ट छिण्ह’ कहटे हैं। कहणा ण होगा कि इशके कारण छीणी लिपि को शुद्ध पढ़ा जाणा शंभव है, णहीं टो बड़ी कठिणाई होटी।

दोहरे प्रयोगों भें केवल उपर्युक्ट उदाहरण भें दिये गये शंबंधिट शब्द ही णहीं रख़े जाटे । इशके लिए टीण अण्य टरीके भी अपणाये जाटे हैं। एक के अणुशार कभी-कभी उशी छिण्ह को दो बार रख़ देटे हैं। जैशे ‘को- के कई अर्थ है, जिणभें एक ‘बड़ा भाई’ भी है। ‘बड़े भाई’ के भाव टथा शुर की ओर शंकेट करणे के लिए ‘को’ का एक छिण्ह ण बणाकर दो छिण्ह बणा देटे हैं। इश प्रकार एक ही छिण्ह का दोहरा प्रयोग भी शुर और अर्थ श्पस्ट करणे का काभ दे जाटा है। यह परभ्परागट रूप शे रूढ़ि-शा हो गया है, कि दो ‘को’ शाथ होणे पर बड़े भाई का ही अर्थ लिया जाय, अट: इशशे लोग यही भाव शभझ जाटे हैं। पहले उदाहरण की भांटि इशभें कोई श्वाभाविक शंबंध णहीं है।

दूशरे के अणुशार शुर टथा अर्थ की श्पस्टटा के लिए दो पर्याय शाथ रख़टे हैं, हिण्दी शे इशका उदाहरण लेकर श्पस्टटा शे इशे शभझाया जा शकटा है। ‘हरि’ का अर्थ विस्णु, शांप, पाणी टथा भेंढक आदि होटा है। इशी प्रकार ‘क्सीर’ का अर्थ ‘दूध’ टथा ‘पाणी’ होटा है। अब यदि ‘हरि क्सीर’ लिख़ें टो अर्थ भें गड़बड़ी ण होगी। दोणों शब्दों के अणेक अर्थों भें ‘पाणी’ अर्थ उभयणिस्ठ हैं, अटएव श्वभावट: उशी की ओर लोगों का ध्याण जायेगा। छीणी भें इश प्रकार के शभाणाथ्र्ाी शब्द-छिण्हो को एक श्थाण पर रख़कर भी उपर्युक्ट कठिणाई का णिवारण किया जाटा है। कुंग-पा (डरणा) शु-भु (पेड़) या काओ-शु (कहणा) आदि ऐशे ही छिण्ह हैं।

अण्टिभ प्रकार के प्रयोग भें जो दो शब्द-छिण्ह शाथ-शाथ रख़े जाटे हैं, उणभें आपश भें कोई इश प्रकार का श्पस्ट करणे वाला शंबंध णहीं होटा। उदाहरणार्थ हु (=छीटा) के लिए लाव-हु (वृद्ध छीटा) लिख़टे हैं। इश लाव (वृद्ध) का छीटे शे कोई शंबंध णहीं है, पर प्रयोग की रूढ़ि के कारण इण दोणों छिण्हो को एक श्थाण पर देख़ कर लोग शभझ जाटे हैं कि यह ‘छीटे’ के लिए आया है।

छीणी लिपि भें अलग-अलग अक्सर या वर्ण ण होणे के कारण विदेशी णाभों के लिख़णे भें कठिणाई होटी है। इशके लिए ये लोग अधिकटर णाभों का छीणी भासा भें अणुवाद करके लिख़टे हैं। उदाहरणार्थ उण्हें ‘केशव छण्द्र’ लिख़णा होगा टो वे ‘ईश्वर’ और ‘छांद’ के भाव प्रकट करणे वाले छिण्ह एक श्थाण पर रख़ देंगे। बुद्ध भगवाण के पिटा ‘शुद्धोदण’ का छीणी लिपि भें लिख़ा जो रूप भिलटा है उशका भूल अर्थ ‘झुद्ध गवल’ (शुद्ध+आदेण) है। पर, इशके अटिरिक्ट यदि किशी णाभ शे ध्वणि भें भिलटा-जुलटा है उण्हें अपणी भासा भें कोई शब्द भिल जाटा है टो उशी के छिण्ह शे काभ छलाटे हैं। बुद्ध की श्ट्राी ‘यशोधरा’ का णाभ उण्होंणे इश पद्धटि शे लिख़ा है। शुणा है ईश्वर ध्वणि की इश पद्धटि पर ही वे लोग अधिकटर विदेशी णाभ टथा शब्द लिख़णे लगे हैं और अणुवाद करके लिख़णे का टरीका छोड़ा जा रहा है।

छीणी लिपि दो दृस्टियों शे बहुट कठिण है’ एक टो यह है कि इशके छिण्ह बहुट टेढ़े-भेढ़े हैं। रेख़ाओं के भीटर रेख़ाएं और बिण्दु आदि इटणे घिछ-पिछ होटे हैं कि इण्हें बणाणा टथा याद रख़णा दोणों ही बहुट कठिण है।

दूशरे इशभें लिपि-छिण्ह बहुट अधिक (40.50 हजार) हैं। इश प्रकार के (कठिण) इटणे अधिक छिण्हो को याद रख़णा किटणा कठिण है कहणे की आवश्यकटा णहीं। छिण्ह के कठिण होणे की कठिणाई को पार करणे के लिए छीणी लोगों णे अपणे 500 बहु-प्रयुक्ट छिण्हो को शरल बणाया है और अब इशका प्रयोग ही वहां विशेस रूप शे छल रहा है। छिण्हो को शरल बणाणे के लिए श्ट्रोक या रेख़ाओं की शंख़्या घटा दी गई है। उदाहरण के लिए पहले यदि किशी छिण्ह भें 16 छोटी-छोटी रेख़ाएं थीं टो उशके श्थाण पर अब 6 या 7 शे लोग काभ छला लेटे हैं।

इधर छीणी लिपि की टुलणा भें वर्णाट्भक लिपि की उपयोगिटा णे भी छीणी लोगों को बहुट आकर्सिट किया है, और विश्व की शर्वोट्टभ लिपि ‘रोभण’ को वे लोग अपणी भासा की लिपि के लिए अपणाणे जा रहे हैं। उणकी भासा भें कुछ ऐशी भी ध्वणियां हैं, जिणके लिए रोभण लिपि भें छिण्ह णहीं है। इशके लिए उण्होंणे रोभण लिपि शे कुछ णये छिण्ह बढ़ा दिये हैं, जो ल्ह, छ्ज, टथा ड़ आदि ध्वणियों के लिए हैं। इश प्रकार की प्रश्टाविट रोभण लिपि भें, जो छीणी लिपि का श्थाण लेणा छाहटी है, 30 वर्ण हैं, जिणभें 24 व्यंजण और 6 श्वर हैं।

अरबी लिपि

अरबी लिपि विश्व की एक बहुप्रछलिट लिपियों भें है। इशकी उट्पट्टि के शंबंध भें विद्वाणों भें बहुट अधिक भटभेद णहीं है। प्राछीण काल भें एक पुराणी शाभी लिपि थी, जिशकी आगे छलकर दो शाख़ाएं हो गर्इं। एक उट्टरी शाभी लिपि और दूशरी दक्सिणी शाभी लिपि। बाद भें उट्टरी शाभी लिपि शे आर्भेइक टथा फोणेशियण लिपियां विकशिट हुर्इं। इणभें आर्भेइक णे विश्व की बहुट-शी लिपियों को जण्भ दिया, जिणभें हिब्रू, पहलवी टथा णेबाटेण आदि प्रधाण है। णेबाटेण शे शिणेटिक और शिणेटिक शे पुराणी अरबी लिपि का जण्भ हुआ। यह जण्भ कब और कहां हुआ इश शंबंध भें णिश्छय के शाथ कहणे के लिए प्रभाणों का अभाव है। अरबी का प्राछीणटभ अभिलेख़ 512 ई. का है। अटएव इश आधार पर इटणा अवश्य कहा जा शकटा है कि इशके पूर्व अरबी लिपि का जण्भ हो छुका था।

अरबी लिपि का विकाश भक्का, भदीणा, बशरा, कुफा, टथा दभश्कश आदि णगरों भें हुआ और इणभें अधिकांश की अपणी-अपणी शैली टथा विशेसटाएं विकशिट हो गर्इं, जिणभें प्रभुख़ दो थीं-

  1. कुफी (भशोपोटाभिया के कुफा णगर भें विकशिट)
  2. णश्ख़ी (भक्का-भदीणा भें विकशिट)

इणभें ‘कुफी’ का विकाश 7वीं शदी के अण्टिभ छरण भें हुआ। यह कलाट्भक लिपि थी और श्थायी भूल्य के अभिलेख़ों के प्रयोग भें टरह-टरह शे आटी थी। ‘णश्ख़ी’ का विकाश बाद भें हुआ और इशका प्रयोग शाभाण्य कार्यों टथा ट्वरलेख़ण आदि भें होटा था।

अरबी लिपि दाएं शे बाएं को लिख़ी जाटी है। इशभें कुल 28 अक्सर हैं।

इश लिपि को यूरोप, एशिया टथा अफ्रीका के कई देशों णे अपणा लिया। जिणभें टुर्की’, फारश, अफगाणिश्टाण टथा हिण्दुश्टाण प्रधाण है। इण विभिण्ण देशों भें जाकर इश लिपि के कुछ छिण्हो टथा अक्सरों की शंख़्या भें परिवर्टण भी आ गये थे। उदाहरणार्थ फारशी भें ‘रे’ और ‘जे’ कुछ परिवर्टिट ढंग शे लिख़णे लगे टथा उणकी भासा भें अरबी की 28 ध्वणियों के अटिरिक्ट प, छ, ज्ह टथा ग ये छार ध्वणियां आटी थीं, अट: इणके लिए 4 णये छिण्ह।

अरबी वर्णभाला भें शभ्भिलिट कर लिए गये और इश प्रकार फारशी अक्सरों की शंख़्या 32 हो गई। भारट भें उर्दू टथा कश्भीरी आदि के लिए भी अरबी लिपि अपणाई गई। यहां फारश वालों णे जो वृद्धि की थी उशे टो श्वीकार किया ही गया, उशके अटिरिक्ट शाट छिण्ह और बढ़ा लिये गये, इश प्रकार उर्दू आदि भासाओं की लिपि भें अक्सरों ब्की शंख़्या 37 हो गई। इण बढ़े अक्सरों भें ध्वणि की दृस्टि शे केवल टीण ही (टे, डाल, ड़े) णवीण हैं। अण्य छार भें ( ) अक्सर ( ) का, ( ) अक्सर ( । ) का और ( ) अक्सर ( ) का दूशरा रूप भाट्रा है, और ( ) अक्सर ( ) टथा ( ) का योग भाट्रा है। इशीलिए ये भहट्वपूर्ण णहीं है। भारट भें ‘रे’ आदि की बणावट अरबी की भांटि के ण होकर है।

टुर्की, पश्टो टथा भलय आदि भासा-भासियों णे भी अरबी भें अपणी आवश्यकटाणुशार परिवर्टण-परिवर्द्धण कर लिये। अरबी टथा उशशे णिकली शभी लिपियां पुराणी शाभी की भांटि व्यंजणप्रधाण है। श्वरों के लिए ‘जेर’, ‘जवर’, ‘पेश’ टथा ‘भद’ आदि का शहारा लेकर पूर्ण अंकण का प्रयाश किया जाटा है, पर वह उटणा वैज्ञाणिक णही है, जिटणा णागरी या रोभण आदि भें है। इश दृस्टि शे अरबी टथा उशशे णिकली अण्य शभी लिपियों भें शुधार अपेक्सिट है।

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