लोकतंत्र की परिभाषा, गुण एवं दोष

By | April 7, 2021


लोकतंत्र अंग्रेजी शब्द “डेमोक्रेसी” का हिन्दी पर्याय है। डेमोक्रेसी शब्द मूल रूप से ग्रीक भाषा के डेमोक्रेशिया (demokratisa) से लिया गया है, जो दो शब्दों डेमॉस (demos)”जनता” और क्रेटस (kratos)”शासन” से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है “जनता का शासन”। शुरू-शुरू में लोकतंत्र शब्द का प्रयोग प्राचीन यूनान में अनेक लोगों के शासन के रूप में किया गया था न कि आज जैसे सकारात्मक रूप में। इस प्रकार तब सत्ता की शक्ति किसी एक व्यक्ति के हाथों में न रहकर कई व्यक्तियों में समाहित होती थी। अरस्तु ने छ: प्रकार की शासन पद्धतियों का वर्णन किया था-राजतंत्र, निरंकुशतंत्र, कुलीनतंत्र, वर्गतंत्र, लोकतंत्र और भीड़तंत्र । 

लोकतंत्र की परिभाषा

डायसी ने लोकतंत्र की परिभाषा करते हुए लिखा है कि “लोकतंत्र शासन का वह प्रकार है, जिसमें प्रभुत्व शक्ति समष्टि रूप में जनता के हाथ में रहती है, जिसमें जनता शासन सम्बन्धी मामले पर अपना अन्तिम नियंत्रण रखती है तथा यह निर्धारित करती है कि राज्य में किस प्रकार का शासन-सूत्र स्थापित किया जाए। राज्य के प्रकार के रूप में लोकतंत्र शासन की ही एक विधि नहीं है, अपितु वह सरकार की नियुक्ति करने, उस पर नियंत्रण रखने तथा इसे अपदस्थ करने की विधि भी है।”


अब्राहम लिंकन की लोकतंत्र की परिभाषा को लें तो “लोकतंत्र शासन वह शासन है जिसमें शासन जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा हो।”
इन परिभाषाओं को अस्वीकार करते हुए कुछ विचारक लोकतंत्र को शासन तक ही सीमित न रखकर इसे व्यापक अर्थ में देखने की बात कहते हैं।

गिडिंग्स -“प्रजातंत्र केवल सरकार का ही रूप नहीं है वरन राज्य और समाज का रूप अथवा इन तीनों का मिश्रण भी है।” मैक्सी ने इसे और भी व्यापक अर्थ में लेते हुए लिखा है कि “बीसवीं सदी में प्रजातंत्र से तात्पर्य एक राजनीतिक नियम, शासन की विधि व समाज के ढांचे से ही नहीं है, वरन यह जीवन के उस मार्ग की खोज है जिसमें मनुष्यों की स्वतंत्र और ऐच्छिक बुद्धि के आधार पर उनमें अनुरूपता और एकीकरण लाया जा सके।” डा0 बेनीप्रसाद ने तो लोकतंत्र को जीवन का एक ढंग माना है।

ब्राइस ने लोकतंत्र की परिभाषा – सरकार का वह रूप कहा है जिसमें योग्यता प्राप्त नागरिकों को बहुमत की इच्छा के अनुसार शासन करना होता है। इनका मानना है कि योग्यता प्राप्त व्यक्तियों की संख्या कम-से-कम तीन चौथाई अवश्य होनी चाहिए, जिससे सामान्य नागरिकों का भौतिक बल उसकी मतदान शक्ति के बराबर बना रहे। लोकतान्त्रिक व्यवस्था जनता की वह इच्छाशक्ति है, जिसमें शासक की नियुक्ति, राज्य में निवास करने वाली जनता के बहुमत की सहमति के आधार पर होती है जो जनता के कल्याण को ध्यान में रखते हुए शासन का संचालन करता है।  

माइकल मूर के अनुसार लोकतंत्र की परिभाषा – एक देखा जाने वाला खेल नहीं हैं, यह एक सहभागिता वाली घटना है। यदि हम इसमें भाग नहीं लेते हैं, तो लोकतंत्र का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इसी प्रकार सारटोरी ने लोकतांत्रिक युग को प्रजातांत्रिक भ्रांति का युग कहा है क्योंकि लोकतंत्र राजनीतिक सिद्वान्तों की सबसे भ्रमपूर्ण धारणा है। लोकतंत्र केवल सरकार को चुनने अथवा शासन प्रणाली का एक तरीका, ही नहीं बल्कि इसे एक तरह का समाज तथा जीने का तरीका एक आदर्श अथवा एक उद्देश्य के रूप में परिभाषित किया गया है। आधुनिक युग में लोकतंत्र न केवल प्रशासनिक पक्ष, बल्कि सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक आदि सभी पक्षों का वर्णन करता है। यह व्यक्तियों की समानता, सुरक्षा व स्वतन्त्रता पर बल देता है।

लोकतंत्र के गुण

संक्षेप में, इस शासन व्यवस्था के गुण नीचे दिए माने जा सकते हैं-

  1. शासक जन-कल्याण के प्रति सजग, अनुक्रियाशील तथा जागरूक रहते हैं। 
  2. जन शिक्षण का श्रेष्ठतम माध्यम है। 
  3. सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक सुधार के लिए समुचित वातावरण की व्यवस्था होती है।
  4. उच्च कोटि का राष्ट्रीय चरित्र विकसित करने में सहायक है।
  5. स्वावलम्बन व व्यक्तिगत उत्तरदायित्व की भावना का विकास करता है। 
  6. देशभक्ति का स्रोत है।
  7. क्रान्ति से सुरक्षा प्रदान करता है। 
  8. शासन कार्यो में जन-सहभागिता की व्यवस्था करता है। 
  9. व्यक्ति की गरिमा का सम्मान तथा समानता का आदर्श प्रस्तुत करता है।

लोकतंत्र प्रणाली के उपरोक्त गुण यह स्पष्ट करते हैं कि इस व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति यह शिकायत नहीं कर सकता कि उसे अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिला है। क्योंकि लोकतान्त्रिक व्यवस्था का पहला काम यही है वह जनता को अपनी बात कहने के अधिकाधिक अवसर दे तथा जनता की जिज्ञासा का समाधान करें। 

लोकतंत्र के दोष

लॉर्ड ब्राइस ने इसके लोकतंत्र के दोष बतलाए हैं-

  1. शासन-व्यवस्था या विधान को विकृत करने में धन-बल का प्रयोग। 
  2. राजनीति को कमाई का पेशा बनाने की ओर झुकाव। 
  3. शासन-व्यवस्था में अनावश्यक व्यय। 
  4. समानता के सिद्धान्त का अपव्यय और प्रशासकीय पटुता या योग्यता के उचित मूल्य का न आंका जाना। 
  5. दलबन्दी या दल संगठन पर अत्यधिक बल।
  6. विधान सभाओं के सदस्यों तथा राजनीतिक अधिकारियों द्वारा कानून पास कराते समय वोटों को दृष्टि में रखना और समुचित व्यवस्था के भंग को सहन करना।

लोकतंत्र की सैद्धान्तिक व्यवस्था को व्यावहारिक रूप देने में आने वाली कठिनाईयों के कारण ही प्लेटो और अरस्तू ने इस प्रणाली को शासन का विकृत रूप बतलाया था। कोई भी विचार सैद्धान्तिक श्रेष्ठता के कारण ही व्यवहार में श्रेष्ठतर नहीं रह जाता है। लोकतंत्र की अव्यावहारिकता के कारण ही आलोचक यह कहते हैं कि लोकतंत्र के सिद्धान्त अत्यधिक आदर्शवादी और कल्पनावादी हैं। व्यवहार में लोकतंत्र शासन कार्य का भार सम्पूर्ण जनता पर आधारित करके ‘निर्धनतम, अनभिज्ञतम तथा अयोग्यतम लोगों का शासन’ हो जाता है, क्योंकि आम जनता शासन की पेचीदगियों से अनभिज्ञ ही नहीं होती है वरन शासन करने के योग्य भी नहीं होती है। लोकतंत्र व्यवस्था की यही सबसे बड़ी विडम्बना है कि इसमें योग्यतम व्यक्ति-अभिजन वर्ग, जो शासन शक्ति के क्रियान्वयन में सक्रिय होते हैं, अयोग्यतम व्यक्ति-जनसाधारण, द्वारा नियंत्रित किये जाते हैं। अगर वह नियंत्रण व्यवहार में प्रभावी हो जाता है तो लोकतंत्र सही अर्थो में भीड़तंत्र बन जाता है। 

अत: दोष लोकतंत्र व्यवस्था में नहीं, इस व्यवस्था को क्रियान्वित करने में सम्मिलित शासनकर्ताओं और शासितों में होते हैं। वस्तुत: व्यवहार में लोकतंत्र में यह दोष इसलिए आ जाते हैं कि उसे व्यवहार में लाने वाले लोग अपने को उस स्तर का नहीं रख पाते हैं, जिस स्तर की लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यकता होती है। परन्तु लोकतंत्र के आलोचकों को एक बात तो माननी ही होगी कि इस प्रणाली के इन दोषों के बावजूद यह प्रणाली अन्य सभी प्रणालियों से श्रेष्ठतर है। यही कारण है कि दुनिया के अनेक राज्यों में लोकतंत्र व्यवस्था को कुछ महत्त्वाकांक्षी राजनेताओं द्वारा उखाड़ फेंकने के बाद भी इसकी स्थापना के फिर प्रयत्न होते रहे हैं। अनेक समाजों में नागरिकता क्रान्ति तक का सहारा लेकर पुन: लोकतान्त्रिक शासन स्थापित करते रहे हैं। 

लोकतंत्र के आलोचक इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते कि सभी दोषों के होने पर भी शायद लोकतान्त्रिक व्यवस्था ही मानव की गरिमा, उसके व्यक्तित्व के सम्मान और शासन कार्य में उसकी सहभागिता सम्भव बनाने का श्रेष्ठतम साधन है। यह केवल शासन का ही रूप नहीं, यह जीवन का ढंग है। इसमें व्यक्ति की सम्पूर्णता का आशय निहित है। यह व्यक्ति जीवन के विभिन्न पहलुओं को अलग-अलग करके नहीं, सम्मिलित रूप से विकसित होने का अवसर प्रदान करने वाली व्यवस्था है। लोकतंत्र की श्रेष्ठता का संकेत मिल के इस निष्कर्ष से मिलता है जिसमें उसने कहा है कि ‘लोकतंत्र के विरोध में दी जाने वाली युक्तियों में जो कुछ सुधार प्रतीत हुआ, उसको पूरा महत्व देते हुए भी मैंने सहर्ष उसके पक्ष में ही निश्चय किया।’

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