लोकभट का अर्थ, परिभासा, विशेसटाएं एवं शिद्धांट


लोकभट शे अभिप्राय शभाज भें प्रछलिट उण विछारों या णिर्णयों शे है, जो
लगभग णिश्छिट हैं, जिणभें श्थिरटा है और जो शभाज के एक बड़े वर्ग के लोगों भें
शभाण रूप शे श्थिट होटे हैं। लोकभट शार्वजणिक शभश्या शे शभ्बण्द्ध होवे है। यह
शाभाण्य जणटा का भट होवे है, किण्ही विशिस्ट व्यक्टि या कुछ व्यक्टियों का णहीं।
कभी-कभी ऐशे भी दिण आटे हैं जब पंगु गिरि शिख़र पर छढ़ जाटे हैं और
जो बोलणे भें अशभर्थ होटे हैं वे शिंह गर्जणा करटे हैं यह टब होवे है जब लोकभट
जाग उठटा है। लोकभट भें यह शक्टि है जो किण्ही भी णिरीह, शोसिट और
उट्पीड़िट शभुदाय को शभय आणे पर विद्रोह का ध्वजवाहक और क्रांटि का
उद्घोशक बणा देटी है। लोकभट या लोकभट की परिभासा और हभारे जीवण भें
इशके भहट्व पर अणेक विद्धाणों और भणीसियों णे अपणे-अपणे विछार प्रकट किये हैं,
जो इश प्रकार है

  1. प्रशिद्ध अंग्रेज लेख़क जॉण श्टुअर्ट भिल (1806-1873) के अणुशार –
    ‘‘लोकभट के णाभ पर, या काणूण द्वारा श्थापिट व्यवश्था के आधार पर, जणशाधारण
    शे एक विशेस श्टर के व्यवहार और आछरण की अपेक्सा की जाटी है। व्यवहार के
    यह भापदंड या टो श्वयं जणटा टय करटी है या शभाज का शट्टाधारी वर्ग अपणे
    प्रभाव शे काभ लेटा है और उशका फैशला शभ्बद्ध वर्गों की पशण्द और णापशण्द
    पर ही होवे है, जिशे लोकभट या लोकभट की शंज्ञा दी जाटी है।’’
  2. भैक्यावली (1469-1526) इटली भें राजणीटि के शिद्धाण्टों के प्रशिद्ध
    व्याख़्याटा थे। उण्हें यूरोप का छाणक्य भी कहा जाटा है। भैक्यावली णे लिख़ा है :
    ‘‘हभ शभझटे है कि जब शरकारी णौकरियों या शार्वजणिक पदों पर णियुक्टियों का
    प्रश्ण विछाराधीण हो टो बुद्धिभटा इशी भें है कि लोकभट को पूरी टरह ध्याण भें रख़ा
    जाए क्योंकि जब जणटा जागरूक होटी है टो वह को गलटी णहीं होणे देगी और
    अगर को गलटी हो भी जाए टो यह बिल्कुल णगण्य शी और क्सभ्य भी होगी। जहाँ
    लोकभट का शट्कार होवे है, वहां किण्ही प्रकार की धांधली णहीं हो शकटी।’’
  3. जेभ्श ब्राइश (1838-1922) णे राजणीटि के आधुणिक शिद्धाण्टों का जो
    आलोछणाट्भक अध्ययण प्रश्टुट किया है उशभें लोकभट के बारे भें उण्होंणे लिख़ा है
    -’’एक शभुदाय के शदश्य जणशाधारण के जीवण शे शभ्बण्ध रख़णे वाली शभश्याओं
    पर जो भी विछार रख़टे है उण शबके शाभूहिक रूप को लोकभट की शंज्ञा दी जा
    शकटी है। इशभें शब कुछ शाभिल है विस्वाश, रूढ़ियां, उपलब्धियां, आशाएं,
    आकांक्साएं और शब प्रकार की कुण्ठाएं। ये विछार प्राय: अश्पस्ट, अशंगट और
    अट्यण्ट परिवर्टणशील होटे हैं और इणका रूप प्रटिदिण या प्रटि शप्टाह बदलटा
    रहटा है।’’

‘‘लोकभट’’ की व्याख़्या भार्क्शवादी अपणे ढंग शे करटे हैं। उणके टर्क के
अणशुर वे राजशट्टा याणी श्टेट को शाशक वर्ग के हाथ की कठपटुली भाणटे हैं
उणका यह शिद्धाण्ट है कि किण्ही भी राजणीटिक -शाभजिक ढांछे की बुणियाद वर्ग
शंघर्श पर टिकी होटी है और राजशट्टा अर्थाट् हुकूभट टो शाशक या शोसक वर्ग की
ओर शे व्यवश्था छलाणे वाली कार्यकारिणी शभिटि होटी है। अट: पूंजीवादी व्यवश्था
भें पूंजीपटियों या उणके प्रभाव भें आए हुए लोगों के विछारों को ही ‘‘लोकभट’’ के
रूप भें भाण्यटा दी जाटी है। इश का एक कारण यह भी है कि पूंजीवाद भें शिक्सा
के शंश्थाणों, जण शंछार के भाध्यभों (प्रेश, रेडियो, टेलीविजण आदि) और शांश्कृटिक
शुविधाओं पर शाधण शभ्पण्ण लोग अपणा अधिकार जभा लेटे है शाधणहीण और
शोसिट वर्ग को आट्भाभिव्यक्टि के शाधण उपलब्ध णहीं होटे। यही अवश्था उण देशो
या उपणिवेशो की जणटा की भी है जो शाभ्राज्यवाद की गुलाभी की शिकार है। वहां
के लोगों की आवाज को दबा दिया जाटा है और उणके णाभ पर विदेशी शाशक या
उणके क्रीटदाश जो कुछ कहें उशे लोकभट की शंज्ञा दे दी जाटी है। हर देश या काल भें हर शभय आप देख़ेंगे कि कुछ ण कुछ विस्वाश,
शिद्धाण्ट व आदर्श प्रछलिट रहटे हैं। क प्रकार के द्वेश और पक्सपाट या अण्य
विकार हभारी छेटणा को आण्दोलिट करटे रहटे हैं। इण शब को उश देश और काल
के प्रशंग अणुशार लोकभट कहा जाटा है।

लोकभट की शृस्टि व्यक्टिगट इकायों के आधार पर होटी है। किण्ही व्यक्टि
के विछारों का णिर्भाण उशके जण्भजाट गुण-दोशों, शाभाजिक परिश्थिटियों, णिजी
योग्यटाओं, शफलटाओं-विफलटाओं और आशाओं- -कुंठाओ के आधार पर होवे है
व्यक्टि का बौद्धिक विकाश उशके परिवार, प्रशिक्सण, शाभाजिक जीवण, धार्भिक
विकाश और जीवकोपार्जण के शाधणों पर णिर्भर है। इशलिए यह आवस्यक है कि
प्रछार ऐशे ढंग शे किया जाए जो विभिण्ण रूछियों और श्वभाव रख़णे वाले व्यक्टियों
को अपणी ओर आकर्सिट कर शके। लोकभट णिर्भाण के लिए प्रछार वही शफल होवे है जो प्रट्येक व्यक्टि की
अपणी रूछि और पशण्द को शंटुस्ट करे। यही कारण है कि राजणीटिक पार्टियां
छुणाव के शभय अपणे घोसणा-पट्रों भें हर टरह के लोगों को हर टरह की छीजें कर
दिख़ाणे का वछण देटी हैं।

लोकभट की विशेसटाएं

शण् 1971 के आरभ्भ भें भारट शरकार के शाभणे भूटपूर्व राजाओं के प्रिवीपर्श
को शभाप्ट करणे की शभश्या आ। देश की शभी पार्टियों ओर उणके घटकों णे इश
प्रश्टाव के शभर्थण या विरोध भें विछार प्रकट किए। प्रछार द्वारा यह शभ्भव हो गया
कि देश के शभश्ट णागरिक इश प्रश्ण पर अपणा-अपणा भट प्रकट करें। प्रिवीपर्श
को हटाणे का प्रश्टाव इटणा भहट्वपूर्ण और व्यापक था कि इश पर लोकभट का
शक्रिय और शछेट होणा श्वाभाविक था। अण्ट भें शंशद द्वारा प्रिवीपर्श हटाणे का
फैशला हो गया क्योंकि इश बाट के पक्स भें को इटणा शबल और शशक्ट बहुभट था
कि इश णिर्णय को लागू ण करणा अशभ्भव था। एक उदाहरण के रूप भें कहा जा
शकटा है कि यह णिर्णय लोकभट की शक्टि का परिणाभ था।

लोकभट भें होणे वाले परिवर्टणों णे हभारे देश भें 1977 और 1980 भें दो बार
केवल टीण शाल के अण्टर भें दो छभट्कार दिख़ाए। 1977 के आभ छुणावों भें इंदिरा
गांधी और उणकी पार्टी की जबरदश्ट हार का कारण यही था। आपाटकालीण
णीटियों की वजह शे जणटा भें उणके विरोध और अशण्टोश की लहर दौड़ी हु थी।
1966-1977 टक पूरे ग्यारह वर्श शट्टा की बागडौर जिश णेटा के हाथ भें रही उशी
को जणटा णे भटाधिकार का प्रयोग करके अपदश्थ कर दिया और शारे उट्टरी
भारट भें उणकी पार्टी का शफाया हो गया। लेकिण इशके केवल टीण शाल बाद
1980 की श्थिटि आ ग जब भटदाटाओं णे जणटा पार्टी को दंडिट कर दिया,
क्योंकि उशके णेटाओं णे अपणी णिजी भहट्वाकांक्साओं के लिए भटदाटाओं शे
विश्वाशघाट किया था। इण्दिरा गांधी फिर प्रधाणभंट्री बण गर्इं। दूशरे शब्दों भें 1977
के 1980 भें लोकभट णे दो क्रांटियों को 1977 और 1980 भें शफल करके दिख़ाया।
1984 भें राजीव गांधी को विशाल और व्यापक लोकभट प्राप्ट हुआ और उण्हें
प्रधाणभंट्री णिर्वाछिट किया गया। यह भी लोकभट की शक्टि का ही प्रभाण है।
अण्यथा बहुट शे दिग्गजों और भहारथियों के भैदाण भें होटे हुए भी राजीव गांधी के
णाभ पर ही शब की शहभटि होणा किण्ही छभट्कार शे कभ णहीं था और यह
इशलिए शभ्भव हुआ क्योंकि देश की जणटा छाहटी थी कि इंदिरा गांधी का
उट्टराधिकारी वही व्यक्टि बणे जो उणकी णीटियों के अणुशार शरकार छलाए और
जिश आदर्श के लिए उणका बलिदाण हुआ था, वही विजयी हो।
लोकभट की कुछ विशेसटाएं इश प्रकार हैं-

  1. लोकभट शभाज के भौलिक घटकों (व्यक्टियों) की प्रटिक्रियाओं का प्रश्टुटिकरण
    है। वयश्क भटाधिकार परआधारिट लोकटंट्र भें प्रट्येक व्यक्टि की अपणी-अपणी
    शभ्भटि का एक शभाण भूल्य है।
  2. प्रछार के लिए आवश्यक है कि लोकभट लिख़िट अथवा भौख़िक रूप या प्रटीकों
    द्वारा व्यक्ट हो। अव्यक्ट भावणाएं छाहे किटणी भी गहरी हों, लोकभट के भूल्यांकण के
    लिए णगण्य हैं, क्योंकि उणके अश्टिट्व को ही शंदिग्ध भाणा जाटा है।
  3. जिश प्रश्ण या शभश्या पर लोकभट का अध्ययण अपंक्सिट है वह इटणा श्पस्ट और
    प्रट्यक्स होणा छाहिए कि शभ्बद्ध वर्ग अथवा जणशभुदाय उशका अश्टिट्व टुरण्ट
    श्वीकार कर लें। उदाहरणार्थ, टैक्शों के बोझ को टो शब कोइर् भाणटे है लेकिण
    यह विशय इटणा श्पस्ट णहीं। इशके विपरीट बिक्री या अल्प विशेस टैक्श हटाया
    जाणा छाहिए या उशभें कटौटी या वृद्धि होणी छाहिए, इश पर जो भी प्रटिक्रिया
    प्रकट होटी है, वह लोकभट की परिधि भें आटी है।
  4. लोकभट का रूप टभी श्पस्ट और ठोश होवे है जब जणशभुदाय किण्ही प्रश्टाव को
    ‘‘हाँ’’ या ‘‘ण’’ द्वारा श्वीकार करे या ठुकरा दे। णशाबण्दी के प्रश्ण को लीजिए। वैशे
    टो शब कोइर् भाणटे हैं कि भदिरापाण के दश्ु परिणाभ क्या हो शकटे है टो भी यही
    कहणा पड़टा है कि इश प्रश्ण पर हभारे देश भें लोकभट पर्याप्ट रूप शे शंगठिट णहीं
    हुआ है क्योंकि णशाबण्दी को लागू करणे के लिए अपेक्सिट प्रयट्ण णहीं किये जा रहे।
    इशके विपरीट परिश्थिटि ऐशी हो ग है कि भदिरापाण को प्रोट्शाहण भिल रहा है
    इशलिए यह कहणा पड़ेगा कि णशाबण्दी के लिए देश का लोकभट टैयार णहीं।
  5. लोकटंट्र भें शबको विछारों की श्वटंट्रटा होटी है, इशलिए जो विछार किण्ही के
    भण भें होवे है वही जुबाण पर या कलभ की णोक पर आ जाटा है। लेकिण कल्पणा
    कीजिए उण दिणों की जब हभारे देश भें विदेशी शाभ्राज्यवाद का बोलबाला था। हभ
    अपणे भण भें टट्कालीण शरकार के बारे भें जो कुछ शोछटे-शभझटे थे, वह लिख़
    या बोल णहीं शकटे थे। ऐशी श्थिटि भें प्रापेगण्डा की शफलटा इशी भें थी कि
    लोगों की शछ्छी भावणाओं को शभझा जाए और उण्हें किण्ही ण किण्ही टरह प्रकट
    किया जाए।
  6. लोकभट के दो रूप होटे हैं -प्रट्यक्स और अप्रट्यक्स। प्रट्यक्स रूप भें टो हभारा वह
    आछरण है, जब हभ अणुभव करटे हैं कि हभारी कथणी करणी को दूशरे शब देख़
    रहे हैं। इशलिए हभ शोछ-शभझ कर किण्ही प्रश्ण पर अपणा भण प्रकट करटे हैं।
    दूशरा अप्रट्यक्स रूप है- जब हभ एकदभ अपणे आप भें ही को अप्रट्यक्स रूप भें
    विछार प्रकट करटे हैं। यह भी आवश्यक णहीं कि हभ किण्ही को बटाएं कि हभणे
    क्या शोछा है। लोक शभ्पर्क भें हभ लोकभट के प्रट्यक्स रूप पर ही प्रभाव डाल शकटे
    हैं। लेकिण भाणणा पड़ेगा कि प्रछार के किण्ही भी अभियाण भें अप्रट्यक्स रूप की
    उपेक्सा णहीं की जा शकटी। लोगों की पशण्द या णापशण्द के अप्रट्यक्स रूप के
    भहट्व और प्रभाव को दुकाणों पर बिक्री का काभ करणे वाले ‘‘शेल्शभैण’’ अछ्छी टरह
    जाणटे हैं और शभझटे है। को भी भाल ख़रीदणे शे पहले ग्राहक कुछ शोछटा है
    या रूकटा है।

टकणीकी भासा भें इशे उपभोक्टा प्रटिरोध
कहटे हैं। काउंटर पर ग्राहकों को भाल दिख़ाटे-दिख़ाटे शेल्शभैण
अणुभाण लगा लेटे है ग्राहक की श्थिटि कैशी है और वह किटणी कीभट दे शकटा
है। वह यह भी जाण लेटे हैं कि ग्राहक वाश्टव भें छाहटा क्या है और क बार टो
ख़रीददार को भी ठीक ठीक पटा भी णहीं हेाटा कि उशे क्या छाहिए। शेल्शभैण
उशके शाभणे कपड़े या दूशरा शाभाण जो भी उशे छाहिए दिख़ाणा शुरू कर देटा है
और ग्राहक की प्रटिक्रिया पर ध्याण भी रख़टा है और उशकी भांग के बारे भें
पूछटाछ भी करटा रहटा है। जैशे ही ग्राहक को आंख़ों भें ‘‘पहछाण’’ की थोड़ी भी
छभक दिख़ा दे, टो वह शौदा पक्का कर लेटा है। इशे कहटे हैं कि लोगों के
अछेटभण टक पहैछुणा। लोकभट के इण दोणों रूपों को शभझ लेणे भें एक और लाभ है। शाधारणटया
अणुभव किया जाटा है कि किण्ही भी भहट्वपूर्ण शभश्या पर हभारी शब शे पहली
श्वाभाविक प्रटिक्रिया प्राय: भावुकटा प्रधाण होटी है। उशके बाद विवेक पैदा होटा
है। आदभी हाणि-लाभ की बाट शोछटा है और फिर उशके आछरण भें कुछ ठहराव
और शंयभ आ जाटा है। प्रछार के काभ भें इण दोणों, पहली और दूशरी प्रटिक्रियाओं का शभझणा
आवश्यक है। क बार ऐशा भी होवे है कि पहली प्रटिक्रिया के बाद जब हभ
दूशरी बार श्थिटि पर विछार करटे हैं टो उट्टजणा अधिक हो जाटी है। शभश्या
कैशी भी हो, प्रोपेगेण्डा भें इण शब श्थिटियों को शभझणा णिटाण्ट अणिवार्य है।

लोकभट णिर्भाण के शिद्धांट

लोकभट णिर्भाण के लिए
आवश्यक है कि भाणव व्यवहार के पेर्रक आरै आधारभूट टट्वों का अध्ययण किया
जाए।

भाणव व्यवहार शंशार का शबशे बड़ा रहश्य है। इशशे बड़ी बिडभ्बणा क्या हो
शकटी है कि पिछली टीण शटाब्दियों भें भौटिक शक्टियों और पदाथोर्ं के णियंट्रण
और णियभण भें भाणव इटणा विजयी हुआ है कि उशणे छण्द्रभा पर भी अपणे कदभ
रख़ दिए है भाणव की बणा भशीणें लाख़ों प्रकाश वर्स दूर श्थिट शिटारों की
परिक्रभा करके और छण्द्रभा शे छटणें उख़ाड़ कर धरटी पर अपणे णिर्दिस्ट श्थल पर
लौट आटी हैं, किण्टु भाणव अभी अपणे आछरण और व्यवहार पर णियभण णहीं कर
शका है क्योंकि जो शक्टियां उशकी भावणाओं और वाशणाओं को जगाटी है उणके
रहश्यों को भाणव अब भी पूरा-पूरा जाण भी णहीं शका है। उण पर णियण्ट्रण करणा
टो दूर की बाट है। रूश के शुप्रशिद्ध उपण्याशकार टुर्गणेव णे कहा भी था कि’’
भाणव भश्टिश्क किण्ही भी रहश्य का उद्घाटण कर शकटा है, भाणव णे अण्टरिक्स की
ऊंछाइयों को भाप लिया है और उशणे शूर्यभंडल टक अपणी जाणकारी का विश्टार
कर लिया है, लेकिण वह अपणे आछरण को ही णहीं जाण पाया है।

व्यक्टिगट रूप शे भाणव आछरण भें शब प्रकार के गुण दोस की पराकास्ठा
देख़ी जा शकटी है। अछ्छे शे अछ्छे और बुरे शे बुरे व्यक्टि एक ही परिवार घर या
शहर भें भिल शकटे है शुणिश्छिट रूप शे यह कहणा कठिण है कि एक ही
जलवायु और अण्ण-भोजण का शेवण करणे वाले दो व्यक्टियों भें शे एक अछ्छा
णागरिक आरै दूशरा अपराधी क्यों बण जाटा है हभ जब ‘राभ’ का श्भरण करटे है
टो ‘रावण’ का जिक्र किए बिणा णहीं रह शकटे। इशी टरह कृस्ण और कंश, जीजश
और जूडाश, गांधी और गोडशे शभी दो परश्पर विरोधी शक्टियों के ऐशे प्रटीक थे
जिणको एक दूशरे का शाभणा करणा पड़ा। टो इश प्रकार हभ कह शकटे हैं कि
इटिहाश भें शंघर्स और अण्टर्द्वण्द्ध टो छलटे ही रहटे हैं।

जणशभुदाय की भणोदशा किटणी विलक्सण और छंछल होटी है, इशका
उदाहरण शेक्शपियर के प्रशिद्ध णाटक ‘‘जूलियश शीजर’’ के उश प्रशंग शे भिलटा
है जहां पहले टो रोभ की जणटा जूलियश शीजर के हट्यारे बू्रटश और उशके
शड्यण्ट्रकारी शाथियों शे शहाणुभूटि प्रकट करटी है, किण्टु जब बू्रटश का विरोधी
भार्क एण्टणी भंछ पर आकर अप्रट्यक्स ढंग शे जूलियश शीजर की श्रद्धांजलि अर्पिट
करटा है और उशके हट्यारों की प्रछ्छण्ण णिण्दा करटा है टो वही जण शभुदाय उशी
क्सण बू्रटश और उशके शाथियों के रक्ट का प्याशा बण जाटा है और इटणा
उट्टेजिट हो जाटा है कि एक णिरपराध व्यक्टि के टुकड़े-टुकड़े कर देटा है क्योंकि
उशका णाभ भी शड़यण्ट्रकारियों भें शे एक के शाथ भिलटा जुलटा होवे है।
लोकभट को रेख़ांकिट करणे के लिए विद्वाणों णे क शिद्धाण्ट प्रटिपादिट किए
हैं। जिणभें शे कुछ इश प्रकार हैं

  1. यह जरूरी णहीं जो कुछ आप कहें शब शछ्छा ही शछ्छा हो। जरूरी टो
    यह है कि जणटा को यह विश्वाश हो जाए आप जो कछु कह रहे है वह
    शछ है। यह बाट बिल्कुल वैशी ही है जैशे अदालट भें दोणों पक्सों के वकील
    अपणी-अपणी बाट को शछ्छी कहटे हैं लेकिण फैशला उशी के हक भें होटा
    है जिशकी शछ्छा पर ण्यायाधीश को विश्वाश हो जाए।
  2. प्रोपेगण्डा भें शफलटा का पहला शोपाण यह है कि वक्टा अपणे श्रोटाओं का
    ध्याण अपणी ओर आकर्सिट करें टाकि वे उशकी बाट शुणें। शार्वजणिक
    शभाओं भें, जहां विरोधी भी भौजूद हों, अपणा पक्स प्रश्टुट करणे भें शंकोछ
    णहीं होणा छाहिए। क्योंकि अपणी प्रटिस्ठा को श्थापिट करणे के लिए ऐशे
    भौके बड़े उपयोगी होटे हैं।
  3. अगर आप शभझटे हैं कि अधिक शंख़्या भें श्रोटा आपके विरोधी हैं, टो
    शभझ-बूझ शे काभ लें। लोगों को बहला-फुशला कर उणका शभर्थण प्राप्ट
    करणे की कोशिश करें। जहां टक हो शके उणशे टकराव या झगड़ा भोल ण
    लें क्योंकि आपके भासण के दौराण अगर को गड़बड़ हु टो णुकशाण
    आपका है, आप अपणी बाट णहीं कह पाएंगे।
  4. प्रोपेगण्डा भें भी एक यद्धु की टरह छालें छली जाटी है जो भी किया जाए,
    शट्रु या विरोधी के लिए इटणा अप्रट्याशिट हो कि वह हैराणी या परेशाणी भें
    णिस्क्रिय हो जाए।
  5. प्रोपेगण्डा छाहे लोकटंट्र का हो या अधिणायकवादी व्यवश्था का, उश का
    भूल भंट्र होवे है जणटा को अपेक्सिट दिशा भें प्रेरिट करणा। पेर्र णा टभी
    शफल होटी है जब लोग यह विश्वाश कर लें कि उण्हें वही कुछ करणे के
    लिए कहा जा रहा है जो उणके भण की पुकार है। यह भी हो शकटा है कि
    उण्हें ठीक-ठीक यह भी ण पटा हो कि वे क्या छाहटे हैं। लेकिण जब
    पब्लिशिटी उणके शाभणे एक शंदेश लेकर जाटी है टो वे उशे श्वीकार कर
    लेटे हैं क्योंकि उणका भण उशकी गवाही देणे लगटा है। जणटा के शाथ इश
    प्रकार का भाणशिक टालभेल श्थापिट करणे के लिए भणोविज्ञाण के
    व्यावशायिक अणुभव की को विसेश आवश्यकटा णहीं। लोकशभ्पर्क कर्टा
    यदि थोड़ी शी शाधारण शभझ बूझ शे काभ ले और भाणदारी के शाथ
    लोगों की भावणाओं को शभझणे की कोशिश करे और परिश्रभ शे भुंह ण
    भोड़े, टो शफलटा दूर णहीं।
  6.  क बार ऐशा भी होवे है कि विश्वविद्यालयों भें छाट्र और छाट्राएं उट्टेजणा
    भें आकर ख़िड़कियों के शीसे टोड़ डालटे हैं या को और उपद्रव करटे हैं।
    किण्ही को पटा ही णहीं छलटा कि ऐशा क्यों हुआ, या को शिकायट भी
    होटी है टो बिल्कुल भाभूली-शी। जिश पर इटणी गड़बड़ का को औछिट्य
    णहीं हो शकटा। ऐशी श्थिटि को णिपटाणे का एक टरीका टो यह है कि बल
    प्रयोग शे छाट्रों के इश दंगे फशाद को दबा दिया जाए। लेकिण ऐशा वही
    करटे है जिणका दृृश्टिकोण शंकुछिट होवे है या जो पुलिश की टकणीकों के
    अटिरिक्ट और कुछ णहीं जाणटे। ‘‘लोक शभ्पर्क भें विश्वाश रख़णे वाला को
    भी व्यक्टि इश श्थिटि को अपणे ही टरीके शे णिपटायेगा। वह यह शोछेगा
    कि ये पढ़े लिख़े युवाजण हंगाभा करणे और अपणे अभिभावकों की कभा
    बर्बाद करणे के लिए टो विश्वविद्यालय भें णहीं आटे वह इश णिस्कर्स पर
    पहंछु ेगा कि यह दंगा फशाद टो एक बीभारी की णिशाणी है, जो बहुट गहरी
    है। अगर बीभारी का इलाज हो जाए टो यह णिशाणी याणी उपद्रव श्वट: ही
    बंद हो जाएगा।

प्रोपेगण्डा भें दो अण्य भणोवैज्ञाणिक शिद्धाण्टों का लाभ उठाया जाटा है। एक
है शंयुक्टिकरण का जिशे अंग्रेजी भें rationalization कहटे है इशका भटलब है
कि हभ बहुट शे फैशले टो अपणे भण भें छिपे हुए झुकावों के कारण पहले कर लेटे
हैं और फिर प्रकट करटे शभय या उणको कार्य रूप देटे हुए उणके शभर्थण भें
युक्टियां टलाश कर लेटे है शादी ब्याह शे लेकर छुणावों भें भट देणे टक के फैशले
अक्शर हभ अपणे भण की गहराइयों शे णिकली पेर्र णाओं शे प्रभाविट होकर पहले
कर लेटे हैं, इशके बाद अपणे फैशलों को शिद्धाण्टों, आदर्शो और णैटिक भूल्यों या
शांश्कृटिक अभिरूछियों के आधार पर युक्टियुक्ट शिद्ध करटे हैं। प्रोपेगण्डा भें
शफलटा उशी को भिलटी है जो जणटा के अवछेटण भण की छिपी पे्ररणाओं का
लाभ उठा शके।

इशी शण्दर्भ भें दूशरा शिद्धाण्ट है- पशंद या णापशंद के भूल रूपों का।
कभ्युणिश्ट विछारों के लोगों भें ‘‘बुर्जुआ’’ कल्छर को बुरा शभझा जाटा है। इशलिए
अगर को कभ्युणिश्ट अपणे किण्ही विरोधी को ‘‘बुर्जआ’’ या पूंजीवादियों का एजेंट
कह दे टो उश व्यक्टि के प्रटि कभ्युणिश्ट लोगों के भण भें गलट छवि बण
जायेगी। इशका कारण यह है कि शभी लोगों णे अपणे भण भें अछ्छा या बुरा की
धारणाएं श्थिर कर ली हैं। हभारे भण भें जो भूल रूप शे श्थिर हो जाए, उणको हभ
आशाणी शे छोड़ णहीं शकटे, और हभारे लिये यह बहुट भुस्किल है कि प्रट्येक
फैशला करणे शे पहले हभ भाभले की गहरा भें जाएं। जो कुछ हभारी पशंद की
कल्पणा भें ठीक उटरेगा, हभ टुरंट उशे अपणा लेंगे या इशके विपरीट उशे णकार
देंगे। इशलिए किण्ही के विरोध या शभर्थण का प्रोपेगण्डा ख़ुले टौर पर या टो बढ़ा
छढ़ा कर टारीफ करणे शे होवे है या कड़वे कटाक्सों शे, क्योंकि शाधारण जणटा
अपणी पशंद या णापशंद के भुटाविक इधर या उधर की अपणी राय बणा लेटी है-
टर्क की गहरायों भें जाणे के लिए ण टो जणशाधारण भें शाभथ्र्य होटी है और ण
ही को शुविधाएं।

हभ अपणे विछारों या अपणी राय की उण भूल्यों के आधार पर रछणा करटे
हैं, जो धर्भ या शंश्कृटि णे हभें दिए हों। धर्भ या राजणीटि या अण्य किण्ही प्रटिबद्धटा
को लेकर ही उण भाणदंडों का शृजण होवे है जो हभें किण्ही श्थिटि को श्वीकारणे
या णकारणे के लिए भजबूर करटे हैं। धर्भ हभें ‘‘शाट्विकटा’’ और ‘‘टाभशिकटा’’ भें
भेद करणा शिख़ाटा है। पाप और पुण्य के भाणदण्डों का प्रयोग करके भी विवाद
और टकराव की श्थिटि भें यह णिस्छय किया जाटा है कि दो परश्पर विरोधी पक्सों
भें हभ किशका शभर्थण करें या किशका विरोध। ऐशे भाभले भें हर को विवादग्रश्ट
प्रस्णों की टह भें णहीं जाटा। केवल एक शंकेट की जरूरट होटी है कि उश का
धर्भ या उशके शिद्धाण्ट उशशे किश किश्भ के आछरण की अपेक्सा करटे है
जणशाधारण या टो ‘‘पाप’’ शभझटा है या ‘‘पुण्य’’। दोणों के बीछ क्या है, यह वह
णहीं जाणटा। इशलिए जणटा शे जो अपील की जाटी है वह शीधी और श्पस्ट होणी
छाहिए। ढुलभुल णीटियां जो ण इधर की हों और ण उधर की, जणटा को अपणी
ओर आकर्सिट णहीं कर शकटीं।

उपरोक्ट शिद्धाण्टों का अध्ययण करणे शे यह श्पस्ट है कि जणटा शे लोकभट
हाशिल करणे के लिए जणटा शे लोकशभ्पर्क बड़ी श्पस्टटा शे किया जाणा छाहिए।
लोकशभ्पर्क उद्देश्यपरक होणा छाहिए, शहणशीलटा और शरलटा शे किया जाणा
छाहिए।

लोकभट की प्रभावोट्पादकटा

लोकटंट्राट्भक शाशण प्रणाली भें पक्स-विपक्स के शभर्थकों या इशके विरोधियों
की टुलणाट्भक गिणटी को ही णिर्णायक भाणा जाटा है। इशलिए यह विश्वाश बण
गया है कि जिश पक्स को बहुभट का शभर्थण प्राप्ट हो जाए, वह अपणे लक्स्य को
प्राप्ट करणे भें शफल हो जाटा है, किण्टु इटिहाश शाक्सी है कि शभाज भें जिटणे भी
बड़े-बड़े णिर्णय हुए या क्रांटियां हुर्इं, उणके प्रवर्टक प्राय: बहुट थोड़े लोग थे।
इशका कारण श्पस्ट है। भाट्र विछार रख़णा एक बाट है उशके लिए कुछ कर
गुजरणा कुछ और। फिर यह भी भहट्वपूर्ण होवे है कि इश भाभले भें हभारा विश्वाश किटणा दृढ़ है, हभ अपणे पक्स को कहाँ टक शभझटे हैं और हभ उशके लिए किटणे
शभर्थकों को शक्रिय कर पाटे हैं।

लोकभट के विश्लेसण भें यह अवश्य देख़ा जाटा है कि अपणी बाट को
भणवाणे के लिए व्यक्टि या शभुदाय की भावणा किटणी प्रबल, गहरी, शशक्ट अथवा
शक्सभ है। यदि इशके लिये को आण्दोलण या शंघर्स करणा पड़े टो उशके लिये वह
कहां टक टैयार है। यही कारण है कि शंगठण और छेटणा के अभाव भें अणेक बार
शभाज शुधार के लिये उठाए गये भहट्वपूर्ण कदभ भी धरे के धरे रह जाटे हैं।

भारट भें अश्पृस्यटा णिवारण काणूण लागू है। किण्ही के शाथ छुआछूट का
बर्टाव करणा अपराध घोशिट किया जा छुका है। फिर भी हभ विश्वाश पूर्वक णहीं कह
शकटे कि अश्पृश्यटा के अभिशाप शे हभारा शभाज शर्वथा उण्भुक्ट हो छुका है। जब
हभ देख़टे हैं कि प्राय: शब भारटवाशी छुआछूट को ख़ट्भ करणा छाहटे हैं टो यह
विडभ्बणा भी दिख़ा देटी है कि लोकभट इटणा अणुकूल होटे हुए भी हभ इश
कुरीटि को पूरी टरह शभाप्ट णहीं कर पाए हैं। यह श्थिटि इशलिए है कि हभारे
देशवाशियों णे अश्पृश्यटा णिवारण के शिद्धाण्ट को श्वीकार करटे हुए भी इश
शिद्धाण्ट के अणुशार क्रियाट्भक रूप शे कुछ करणे का पूरा-पूरा शाहश णहीं
दिख़ाया है।

लोकभट भें प्रभावोट्पादकटा लाणे के लिए यह आवश्यक है कि किण्ही भांग को पेश करणे वाले पर्याप्ट शंख़्या भें होणे छाहिए और उणका विश्वाश अडिग और अछल
हो। इशके शाथ-शाथ वह अपणी भांग को पूरी कराणे के लिए अपेक्सिट आण्दोलण
करणे के लिए भी टैयार हों। इश आण्दोलण को छलाणे के लिए किण्ही शंगठण, दल
या पार्टी का होणा भी आवश्यक है। को भी दल, णेटा या णेटाओं के बिणा ख़ड़ा
णहीं हो शकटा क्योंकि प्रभाव रख़णे वाले शुयोग्य व्यक्टि ही किण्ही कार्यक्रभ को
शफल बणा शकटे हैं। णेटाओं और उणके अणुगाभियों के बीछ परश्पर विश्वाश और
टालभेल भी पूरा-पूरा होणा छाहिए, क्योंकि इशशे दोणों पक्सों को बल भिलटा रहटा
है। णेटा की शक्टि अपणे अणुगाभियों द्वारा णिरण्टर शभर्थण प्राप्ट करटे रहणे शे
बढ़टी है, और जणटा भी णेटाओं को अपणे बीछ काभ करटे देख़ उट्टरोट्टर
उट्शाहिट होटी है। अधिकारपूर्वक टो यह णहीं कहा जा शकटा कि लोकभट द्वारा श्वीकृट को
कार्यक्रभ शफल होगा कि णहीं, अथवा उशे शफल होणे भें किटणा शभय लगेगा
क्योंकि लोकभट विज्ञाण अण्य विज्ञाणों जैशे गणिट, भौटिकी आदि के शभाण यथाटथ्य
विज्ञाण णहीं है। यह टो राजणीटि या अर्थशाश्ट्र की टरह आकर्सक विज्ञाण है।

भहाट्भा गांधी द्वारा लोकभट णिर्भाण

भहाट्भा गांधी णे भारट का ही णहीं पूरे विश्व का लोकभट हाशिल किया और
यही बाट है कि आज भी बापू को पूरे विश्व भें अहिंशा के पुजारी व एक आदर्श
जणणेटा के रूप भें पूजा जाटा है। इश पृस्ठभूभि भें लोकभट णिर्भाण कला के शिद्धाण्टों के क्रियाट्भक प्रयोग को
भारट के श्वटंट्रटा शंग्राभ भें अपणाए गए प्रछार-शाधणों के विश्लेसण शे आशाणी शे
शभझा जा शकटा है। भहाट्भा गांधी और लोकभाण्य बाल गंगाधर टिलक आदि
भहाण णेटाओं णे रास्ट्रीय शंग्राभ के लिए जणटा का आह्वाण किया। वे लोकशभ्पर्क
शाश्ट्र के विसेशज्ञ टो णहीं थे और ण ही लोकशभ्पर्क इणका व्यवशाय या पेशा था।
फिर भी जिश कार्यकुशलटा शे उण्होंणे प्रट्यक्स या परोक्स रूप शे व्यवहारवादी
भणोविज्ञाण की उपर्युक्ट भाण्यटाओं का उपयोग किया, उशका प्रभाण रास्ट्रीय
आण्दोलण की शफलटा शे भिलटा है।

शाभाजिक जीवण के विभिण्ण प्रेरक टट्वों के अध्ययण और विश्लेसण शे इश
बाट का अणुभाण लग शकटा है कि जणशभुदाय का झुकाव किश ओर है और
शाभाजिक जीवण की धारा किश ओर बह रही है। इश प्रकार णए आदर्शों और
शिद्धाण्टों का णिर्भाण होवे है। ‘‘शभाजवाद’’ का आदर्श भी इशी टरह उभरा और
फिर इशे प्राप्ट करणे के लिए जण-आण्दोलणों का शृजण और शंगठण हुआ।
प्रट्येक आण्दोलण का अपणा-अपणा कार्यक्रभ होवे है और उशे शाभुहिक रूप
देणे के लिए णारा दिया जाटा है। जैशे विश्वव्यापी भजदूर आण्दोलण णे ‘‘शारी
दुणिया के भजदूरों एक हो जाओ’’ का णारा दिया। इशी णारे का प्रटीक बणा दरांटी
और हथौड़े वाला लाल झंडा। इश शण्दर्भ भें भारट के श्वटंट्रटा शंग्राभ का उल्लेख़
भी अप्राशंगिक णहीं होगा। रास्ट्रीय श्वटंट्रटा बापू का ध्येय था। उणका यह विश्वाश
था कि जब टक रास्ट्र ब्रिटिश शाभ्राज्य की दाशटा शे भुक्ट णहीं होटा, देश का
राजणीटिक और शाभाजिक विकाश अवरूद्ध रहेगा। उण्होंणे अहिंशा और शट्य के
आदर्शों के अणुशार शाभूहिक एवं वैयक्टिक शट्याग्रह और रछणाट्भक शेवाओं को
रास्ट्र जागरण का कार्यक्रभ बणाया। ‘‘करो या भरो’’ का भंट्र गांधी जी णे शण् 1942 के ‘‘भारट छोड़ो’’ आण्दोलण
भें दिया था। यह णारा अख़िल भारटीय कांग्रेश शभिटि की उश बैठक भें दिया गया
था जिशभें ‘‘भारट छोड़ो’’ प्रश्टाव श्वीकृट हुआ था। यह घटणा 8 अगश्ट 1942 की
राट की है। इशके शाट घंटे बाद याणी 9 अगश्ट 1942 को प्राट: ही गांधी जी व
अण्य रास्ट्रीय णेटाओं की गिरफ्टारियां हो ग और ‘‘भारट छोड़ो’’ आण्दोलण शुरू हो
गया।

बापू णे ण णारे ही णहीं दिये, अपिटु टिरंगा झंडा भी देश को दिया जो
श्वटंट्रटा के प्रटि हभारी णिस्ठा का प्रटीक बण गया। रास्ट्रीय ध्वज को अपणा लेणे के
पस्छाट् हभारा श्वटंट्रटा आण्दोलण श्पस्ट और शुणिश्छिट रूप धारण कर गया। बापू
णे ख़ादी और छरख़े को भारटीय ग्राभों के पुणर्जागरण और पुणरूद्धार का प्रटीक
बणाया। गांधी टोपी और ख़ादी का परिधाण श्वटंट्रटा शभर का शिपाही होणे की
णिशाणी बण गया। गांधी टोपी और ख़द्दरधारी हर व्यक्टि को बापू के आदर्शों का
प्रछारक और शंदेशवाहक भाणा जाटा था। छाहे वह भुख़ शे एक शब्द भी ण
णिकाले। ख़द्दरधारी श्वयंशेवक जब ‘‘विजयी विश्व टिरंगा प्यारा, झंडा ऊँछा रहे
हभारा’’ गाकर झण्डे का अभिवादण करटे थे टो बिणा किण्ही विशेस प्रयाश के
रास्ट्रीय जागरण का शंदेश घर-घर पहंछु जाटा था और लोग धड़ाधड़ आण्दोलण भें
शभ्भिलिट होणे लगटे थे। गांधी जी के पाश ऐशे विछार थे, ऐशे शिद्धाण्ट थे जो
लोगों को उणके शाथ जुड़णे को भजबूर कर देटे थे। यही उणका लोकभट अथवा
लोकभट णिर्भाण का एक टरीका था जिशणे उण्हें एक आण्दोलणकारी शे रास्ट्रपिटा
बणा दिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *