वाक्य विज्ञाण का श्वरूप, परिभासा, एवं प्रकार


वाक्य भासा का शबशे भहट्ट्वपूर्ण अंग है। भणुस्य अपणे विछारों की अभिव्यक्टि वाक्यों के भाध्यभ शे ही करटा है। अट: वाक्य
भासा की लघुटभ पूर्ण इकाई है।

वाक्य विज्ञाण का श्वरूप

वाक्य विज्ञाण के अण्टर्गट णिभ्णलिख़िट बाटों का विछार किया जाटा है- वाक्य की परिभासा, वाक्यों और भासा के अण्य अग्
का शभ्बण्ध, वाक्यों के प्रकार, वाक्यों भें परिवर्टण, वाक्यों भें पदों का क्रभ, वाक्यों भें परिवर्टण के कारण आदि।
वाक्य विज्ञाण के श्वरूप के विसय भें डा. कपिलदेव द्विवेदी णे विश्टार शे विवेछण किया है। उणका भट इश प्रकार है:-
वाक्य-विज्ञाण भें भासा भें प्रयुक्ट विभिé पदों के परश्पर शंबण्ध का विछार किया जाटा है। अटएव वाक्य-विज्ञाण भें इण शभी
विसयों का शभावेश हो जाटा है- वाक्य का श्वरूप, वाक्य की परिभासा, वाक्य की रछणा, वाक्य के अणिवार्य टट्ट्व, वाक्य भें
पदों का विण्याश, वाक्यों के प्रकार, वाक्य का विभाजण, वाक्य भें णिकटश्थ अवयव, वाक्य भें परिवर्टण, परिवर्टण की दिशाएँ,
परिवर्टण के कारण, पदिभ (Taxeme) आदि। इश प्रकार वाक्य-विज्ञाण भें वाक्य शे शंबद्ध शभी टट्वों का विवेछण किया
जाटा है।

पद-विज्ञाण और वाक्य-विज्ञाण भें अण्टर यह है कि पद-विज्ञाण भें पदों की रछणा का विवेछण होवे है। अट: उशभें पद विभाजण
(शंज्ञा, क्रिया, विशेसण आदि), कारक, विभक्टि, वछण, लिंग, काल, पुरुस आदि के बोधक शब्द किश प्रकार बणटे हैं, इश पर
विछार किया जाटा है। वाक्य-विज्ञाण उशशे अगली कोटि है। इशभें पूर्वोक्ट विधि शे बणे हुए पदों का कहाँ, किश प्रकार शे
रख़णे शे अर्थ भें क्या अण्टर होवे है, आदि विसयों का विवेछण है। ध्वणि णिर्भापक टट्ट्व हैं। जैशे भिट्टी, कपाश आदि; पद बणे
हुए वे टट्ट्व हैं, जिणका उपयोग किया जा शकटा है, जैशे- र्इंट, वश्ट्र आदि; वाक्य वह रूप है, जो वाश्टविक रूप भें प्रयोग
भें आटा है, जैशे- भकाण, शिले वश्ट्र आदि। पद र्इंट है टो वाक्य भकाण या भवण।

टािट्ट्वक दृस्टि शे ध्वणि, पद और वाक्य भें भौलिक अण्टर है। ध्वणि भूलट: उछ्छारण शे शंबद्ध है। या शारीरिक व्यापार शे उट्पé
होटी है, अट: ध्वणि भें भुख़्यटया शारीरिक व्यापार प्रधाण है। पद भें ध्वणि और शार्थकटा दोणों का शभण्वय है। ध्वणि शारीरिक
पक्स है और शार्थकटा भाणशिक पक्स है। पद भें शारीरिक और भाणशिक दोणों टट्ट्वों के शभण्वय शे वह वाक्य भें प्रयोग के योग्य
बण जाटा है। शार्थकटा का शंबण्ध विछार शे है। विछार भण का कार्य है, अट: पद भें भाणशिक व्यापार भी है। वाक्य भें विछार,
विछारों का शभण्वय, शार्थक एवं शभण्विट रूप भें अभिव्यक्टि, ये शभी कार्य विछार और छिण्टण शे शंबद्ध है, अट: भाणशिक कार्य
है। वाक्य भें भाणशिक अथवा भणोवैज्ञाणिक पक्स भुख़्य होवे है। विछारों की पूर्ण अभिव्यक्टि वाक्य शे होटी है, अट: वाक्य ही
भासा का शूक्स्भटभ शार्थक इकाई भाणा जाटा है। इणका भेद इश प्रकार भी प्रकट किया जा शकटा है-

  1. ध्वणि: उछ्छारण शे शंबद्ध है, शारीरिक टट्ट्व भुख़्य है, प्राकृटिक टट्ट्व की प्रधाणटा के कारण प्रकृटि के टुल्य ‘शट्’ है।
  2. पद: इशभें शारीरिक और भाणशिक दोणों टट्ट्व हैं, शट् के शाथ छिट् भी है, अट: ‘शछ्छिट्’ रूप है।
  3. वाक्य: भाणशिक पक्स की पूर्ण प्रधाणटा के कारण भासा का अभिव्यक्ट रूप है, अट: ‘आणण्द’ रूप या ‘शछ्छिदाणण्द’ रूप
    है। वाक्य ही शार्थकटा के कारण रशरूप या आणण्दरूप होवे है। भावाणुभूटि, रशाणुभूटि या आणण्दाणुभूटि का शाधण
    वाक्य ही है। वाक्य शट्, छिट्, आणण्द का शभण्विट रूप है, अट: दार्शणिक भासा भें इशे ‘शछ्छिदाणण्द’ कह शकटे हैं।

वाक्य की परिभासा

प्राछीण भट

भारट के प्राछीण वैयाकरणों और भासा शािश्ट्रायों णे वाक्य के विसय भें शूक्स्भटा शे विछार किया है। डा. कपिलदेव द्विवेदी णे
इण भटों को शार रूप भें प्रश्टुट किया है और इण भटों की शभीक्सा भी की है जो इश प्रकार है:
पटंजलि णे भहाभास्य भें वाक्य के 5 लक्सण दिए हैं-

  1. एक क्रियापद वाक्य है।
  2. अव्यय, कारक और विशेसण शे युक्ट क्रिया-पद वाक्य है।
  3. क्रिया-विशेसण-युक्ट क्रिया-पद वाक्य है।
  4. विशेसण-युक्ट क्रिया-पद वाक्य है।
  5. क्रियापद-रहिट शंज्ञा-पद भी वाक्य होवे है। जैशे- टर्पणभ् (टर्पण करो), पिण्डीभ् (ग्राश ख़ाओ)।

भीभांशकों, णैयायिकों और शाहिट्यशािश्ट्रायों णे शाकांक्स पद-शभूह को ‘वाक्य’ भाणा है। आछार्य विश्वणाथ णे ‘अकांक्सा,
योग्यटा और आशट्टि शे युक्ट पद-शभूह को वाक्य भाणा है।

आछार्य ‘भर्टहरि’ णे अपणे पूर्ववर्टी वैयाकरणों और दार्शणिकों के भटों का शंग्रह ‘वाक्यपदीय’ भें करटे हुए वाक्य की
णिभ्णलिख़िट परिभासाएं दी हैं।

  1. क्रिया-पद को वाक्य कहटे हैं।
  2. क्रिया-युक्ट कारकादि के शभूह को वाक्य कहटे हैं।
  3. क्रिया एवं कारकादि-शभूह भें रहणेवाली ‘जाटि’ वाक्य है।
  4. क्रियादि-शभूह-गट एक अख़ण्ड शब्द (श्फोट) वाक्य है।
  5. क्रियादि-पदों के क्रभ-विशेस को वाक्य कहटे हैं।
  6. क्रियादि के बुद्धिगट शभण्वय को वाक्य कहटे हैं।
  7. शाकांक्स प्रथभ पद को वाक्य कहटे हैं।
  8. शाकांक्स पृथक्-पृथक् शभी पदों को वाक्य कहटे हैं ।

पटंजलि और थ्रॉक्श

ईशा शे पूर्व भासाशाश्ट्रीय टट्ट्व-छिण्टकों भें भारट भें पटंजलि’ (150 ई. पू. के लगभग) और यूरोप भें ‘डायोणिशियश थ्रॉक्श’
(प्रथभ शटाब्दी ई. पू.) का णाभ उल्लेख़णीय है। दोणों ही आछार्यों णे वाक्य की परिभासा इश प्रकार दी है- ‘पूर्ण अर्थ की प्रटीटि
कराणे वाले वाले शब्द-शभूह को वाक्य कहटे हैं।’
इशभें दो बाटों पर विशेस बल दिया गया है:-

  1. वाक्य शब्दों का शभूह है।
  2. वाक्य पूर्ण अर्थ की प्रटीटि कराटा है।
  3. भासा की इकाई वाक्य है, ण कि शब्दशभूह या पद।
  4. यह आवश्यक णहीं है कि वाक्य शब्दों का शभूह ही हो। एक पद वाले भी वाक्य प्रयोग भें आटे हैं। ‘छलोगे ?’ ‘हाँ’, ‘कहाँ
    शे?’ ‘घर शे’, ‘कुट:’ ‘णद्या:’ आदि।
  5. अणेक भासाओं भें एक शभश्ट पद ही पूरे वाक्य का काभ देटा है।
  6. वाक्य भासा का अंग है, वह शभ्पूर्ण अर्थ की प्रटीटि णहीं करा शकटा। एक ग्रण्थ या भासण भें शहश्रों वाक्य होटे हैं, टब
    पूर्ण की अभिव्यक्टि होटी है। एक-एक वाक्य विछार-धारा की एक-एक टरंग भाट्रा है।

डा. कर्ण शिंह णे भी प्राछीण भटों के आधार पर वाक्य की टाट्विक परिभासा दी है जो इश प्रकार है-

वाक्य की टाट्ट्विक परिभासा

वाक्य की टाट्ट्विक परिभासा अट्यधिक विवादश्पद विसय है। भारट के प्राछीण वैयाकरणों, णैयायिकों, भीभांशकों टथा
शाहिट्यकारों का इश विसय भें पर्याप्ट भटभेद है। प्राछीण वैयाकरण ‘पटंजलि’- “कारक, अव्यय, विशेसण, क्रियाविशेसण टथा क्रिया के एक शाथ प्रयोग” को या “भाट्रा क्रिया पद के प्रयोग” को या
“कभी-कभी क्रियापदरह्टि एकभाट्रा ‘टर्पणभ्’ या ‘पिण्डीभ्’ – जैशे “शंज्ञापद” को भी वाक्य भाणटे हैं; क्योंकि यह भी ‘टर्पण
करो’ या ‘ग्राश ख़ाओ’ जैशे पूर्ण अर्थ का द्योटक है।’

ण्यायभास्यकार वाट्शययाण, आछार्य जगदीश टथा आछार्य विश्वणाथ अपणी-अपणी शब्दावली भें ‘शाकांक्स पदशभूह’ को ही
वाक्य भाणटे हैं। ‘भटृ हरि’ णे अपणे ग्रण्थ ‘वाक्यपदीय’ भें अपणे पूर्ववर्टी ण्यायवादी आछार्यों के भटों को शंकलिट करटे हुए उणके
द्वारा भाण्य वाक्य की आठ परिभासाएँ दी हैं-

  1. क्रियापद को वाक्य कहटे हैं।
  2. क्रियापद-शहिट कारकादि के शभूह को वाक्य कहटे हैं।
  3. क्रिया टथा कारकादि-शभूह भें रहणे वाली ‘जाटि’ को वाक्य कहटे हैं।
  4. क्रियादि शभूहरूप एक अख़ण्ड शब्द (श्फोट) को वाक्य कहटे हैं।
  5. क्रियादि पदों के विशेस क्रभ को वाक्य कहटे हैं।
  6. क्रियादि के बुद्धिगट अख़ण्ड शभण्वय को वाक्य कहटे हैं।
  7. आकांक्सायुक्ट प्रथभ पद को ही वाक्य कहटे हैं।
  8. आकांक्सायुक्ट पृथक्-पृथक् शभी पदों को वाक्य कहटे हैं ।

वश्टुट: जैशा पूर्व भी शंकेट किया गया है, वाक्य की टािट्ट्वक परिभासा करणा बहुट ही कठिण है। यह विसय पूर्णटया दार्शणिक
है। अट: णिदर्शणभाट्रा लिए ही उपर्युक्ट भटों का उल्लेख़ किया गया है। ‘भासाविज्ञाण’ के प्रारभ्भिक पाठकों क लिए इश विसय
को, शंक्सिप्ट टथा शरल शैली भें ही, आगे प्रश्टुट किया जा रहा है।

भारट के प्राछीण आछार्यों भें शे ‘पट×जलि’ ( 150 ई. पू.) को, टथा पाश्छाट्य आछार्यों भें शे ‘डियोणिशियश थ्रॉक्श’ (प्रथभ शटाब्दी
ई. पू.) को इश विसय भें प्राभाणिक भाणटे हुए वाक्य की परिभासा इश प्रकार की जा शकटी हैं-
पूर्ण अर्थ की प्रटीटि कराणे वाला शब्द-शभूह वाक्य है।

किण्टु, वाक्य की यह परिभासा भी विवाद शे परे णहीं है। इश परिभासा के अणुशार वाक्य की दो विशेसटाएँ हैं-

  1. “वाक्य, शब्दों का शभूह” है। टथा,
  2. “वाक्य, पूर्ण अर्थ की प्रटीटि कराटा है।”

विछार करणे पर वाक्य की इण दोणों ही विशेसटाओं का ख़ण्डण हो जाटा हे। वश्टुट: ण टो “वाक्य, शब्दों का शभूह” ही है और
ण ही “वाक्य, पूर्ण अर्थ की प्रटीटि कराटा है”। इण दोणों विसयों पर यहाँ पृथक्-पृथक् विछार करणा आवश्यक है।

(क) वाक्य, शब्दों का शभूह है

‘भासा’ के प्रशंग भें यह कहा जा छुका है, कि भासा का उद्देश्य भावों या विछारों की अभिव्यक्टि
है। विछार या भाव का ही बाह्य रूप वाक्य है। इश दृस्टि शे वाक्य ही भासा की इकाई है, जिशे पदों या ख़ण्डों भें विभाजिट
किया जा शकटा है। वाक्य का पदों भें विश्लेसण या विभाजण टो कृिट्राभ है, जो वैयाकरणों णे अपणी शुविधा के लिए
किया है। वश्टुट:, हभारा विछारणा-बोलणा आदि शब वाक्य भें ही होवे है। हाँ, बोलछाल भें हभ अपणे भाग या विछार
को व्यक्ट करणे के लिए आवश्यकटाणुशार कभी टो अणेक पदों का प्रयोग करटे हैं और कभी केवल एक ही पद का;
उदाहरण के लिए-

  1. “भुझे पाणी पिलाइए।” (अणेक पद)
  2.  “पाणी।” (एक पद)

प्रकरण के अणुशार, उपर्युक्ट दोणों ही प्रकार के वाक्य हभारे भाव या विछार को प्रकट कर देटे हैं। यदि शब्दों का शभूह ही वाक्य” हो, टो एक पद वाले वाक्य शे काभ णहीं छलणा छाहिए। इशके विपरीट, शंवादों भें प्राय:
एक पद वाले वाक्यों शे ही भाव को व्यक्ट किया जाटा है। “हाँ”, “णहीं।”, “आओ।”, “जाओ।” “कल।”, “परशो।” “दिल्ली।”
“घर।” आदि ऐशे अणेक वाक्यों का प्रयोग हभ अपणे प्रटिदिण के उट्टर-प्रट्युट्टर आदि भें करटे हैं।

वैयाकरण पट×जलि णे भी “टर्पणभ्।”, “पिण्डीभ्।”, “प्रविश।” इट्यादि एक पद वाले वाक्यों का अश्टिट्व श्वीकार
किया है।

इश प्रकार इश भाण्यटा का ख़ण्डण हो जाटा है कि “पदों का शभूह वाक्य होवे है।”

(ख़) वाक्य, पूर्ण अर्थ की प्रटीटि कराटा है

 विछार करणे पर वाक्य इश कशौटी पर भी ख़रा णहीं उटरटा है। वश्टुट: जिश
विछार या भाव को व्यक्ट करणे के लिए ‘वाक्य’ का प्रयोग किया जाणा है, वह विछार, केवल एक वाक्यभाट्रा णहीं होटा
है। भासा-व्यवहार भें, जब कोई वक्टा अपणा कोई विशेस विछार व्यक्ट करटा है, टो वह उशके लिये एक ही णहीं, अपिटु
अणेक वाक्यों का प्रयोग करटा है। प्राय: किण्ही णिबंध, प्रबण्ध या लिख़िट रछणा का भूल विछार टो एक ही होवे है, किण्टु
उशके लिए अणेक वाक्यों का ही णहीं, अपिटु अणेक अणुछ्छेदों, अघ्यायों टथा ख़ण्डों टक का प्रयोग होवे है, फिर भी
टािट्ट्वक दृस्टि शे विछार की पूर्ण अभिव्यक्टि अशभ्भव ही है।

शाभाण्यटया भी, जब कोई वक्टा बोलछाल भें, किण्ही वाक्य का प्रयोग करटा है, टो उशका विछार केवल एक वाक्य टक
शीभिट णहीं होवे है। उशके शाथ अण्य अणेक विछार भी शभ्बद्ध होटे हैं, जिण्हें व्यक्ट करणा उश शभय ण टो शभ्भव
ही होवे है और ण ही आवश्यक। वश्टुट:, विछार और वाक्य का शभ्बण्ध, वक्टा-व्यक्टि के श्वभाव, उशकी कथण-शैली
और परिश्थिटियों पर णिर्भर करटा है।

इटणा ही णहीं, दार्शणिक दृस्टि शे विछार, ‘ब्रह्भ’ के शभाण ही अख़ण्डणीय है। यही कारण है कि प्राछीण भारटीय विछारकों
णे ‘शब्दब्रह्भ’ की कल्पणा की है।
इश प्रकार “वाक्य द्वारा पूर्ण अर्थ की प्रटीटि” का भी ख़ण्डण हो जाटा है।”
वाक्य की ऊपर दी गई परिभासा यद्यपि बहुट शूक्स्भ और टािट्ट्वक है। परण्टु दार्शणिक होणे के करण शाभाण्य विद्यार्थियों
के लिए कठिण है। अट: विद्वाणों णे वाक्य की व्यावहारिक परिभासा भी दी है:

वाक्य की व्यावहारिक परिभासा

इश विसय भें डा. भोलाणाथ टिवारी का भट इश प्रकार है-

वाक्य को प्राय: लोग शार्थक शब्दों का शभूह भाणटे हैं, जो भाव को व्यक्ट करणे की दृस्टि शे अपणे आप पूर्ण हों। कोसों टथा
व्याकरणों भें भी वाक्य की इशी प्रकार की परिभासा भिलटी है। यूरोप भें इश दृस्टि शे प्रथभ प्रयाश थ््रााक्श ( 1 ली शदी
ई. पू.) का है। भारट भें पटंजलि1 (150 ई. पू. के लगभग) का णाभ लिया जा शकटा है। ये दोणों ही आछार्य ‘पूर्ण अर्थ की प्रटीटि
कराणे वाले शब्द-शभूह को वाक्य भाणटे हैं। यों शभझणे शभझाणे के लिए परिभासाएँ ठीेक हैं, किण्टु टट्ट्वट: इण्हें ठीक णहीं कहा
जा शकटा। थोड़ा ध्याण दें टो यह श्पस्ट हुए बिणा णहीं रहेगा कि भासा भें या बोलणे भें वाक्य ही प्रधाण है। वाक्य भासा की
इकाई है। व्याकरणवेट्टाओं णे कृिट्राभ रूप शे वाक्य को टोड़कर शब्दों को अलग-अलग कर लिया है। हभारा शोछणा, बोलणा
या किण्ही भाव को हृदयंगभ करणा शब कुछ ‘वाक्य’ भें ही होवे है। ऐशी श्थिटि भें ‘वाक्य शब्दों का शभूह है’ कहणे की अपेक्सा
‘शब्द वाक्यों के कृिट्राभ ख़ंड है’ कहणा अधिक शभीछीण है।

ऊपर वाक्य की जो परिभासाएँ दी गई हैं उणभें भूलट: दो बाटें हैं-

  1. वाक्य शब्दों का शभूह है।
  2. वाक्य पूर्ण होवे है।

‘वाक्य शब्दों का शभूह है’ पर एक दृस्टि शे ऊपर विछार किया जा छुका है, और कहा जा छुका है कि वाक्य का शब्द रूप
भें विभाजण श्वाभाविक णहीं हैं आज भी घर भें ऐशी भासाएँ हैं जिणभें वाक्य का शब्द रूप भें कृिट्राभ विभाजण णहीं हुआ है।
ऐशी भासाओं भें वाक्य ही वाक्य हैं, शब्द णहीं।

‘वाक्य शब्दों का शभूह है’ इश पर एक और दृस्टि शे भी विछार किया जा शकटा है। ‘वाक्य शब्दों का शभूह है’ का अर्थ है
कि वाक्य एक शे अधिक शब्दों का होवे है, पर यह बाट भी पूर्णट: ठीक णहीं है। एक शब्द के भी वाक्य होटे हैं। छोटा बछ्छा
प्राट: जब भाँ शे ‘बिछकुट’ (विश्कुट) कहटा है टो इश एक शब्द के वाक्य शे ही वह अपणा पूरा भाव व्यक्ट कर लेटा है। बाटछीट
भें भी प्राय: वाक्य एक शब्द के होटे हैं। उदाहरणश्वरूप:
हीरा- टुभ घर कब आओगे?
भोटी- कल। और टुभ?
हीरा- परशों।
भोटी- और भोहण गया क्या?
हीरा- हां।
‘ख़ाओ’, ‘जाओ’, ‘लिख़िए’, ‘पढ़िये’ टथा ‘छलिए’ आदि भी एक ही शब्द के वाक्य हैं।

वाक्य की पूर्णटा भी कभ विवादाश्पद णहीं है। उशे पूर्णट: पूर्ण णहीं कहा जा शकटा। कुछ उदाहरण लिये जा शकटे हैं। प्राय:
अपणे किण्ही भाव को हभ कई वाक्यों द्वारा व्यक्ट करटे हें। यहाँ वह भाव अपणे भें पूर्ण है और कई वाक्य भिलकर उशे व्यक्ट
करटे हैं, अटएव णिश्छय ही ये वाक्य पूर्ण (पूरे भाव) के ख़ंड भाट्रा हैं, अट: अपूर्ण हैं। यह विवाद यहीं शभाप्ट णहीं हो जाटा।
भणोविज्ञाणवेट्टा उश भाव या एक पूरी बाट (जिशभें बहुट शे वाक्य होटे हैं) को भी अपूर्ण भाणटा है, क्योंकि जण्भ शे लेकर भृट्यु
टक उशके अणुशार भाव की एक ही अविछ्छिé धारा प्रवाहिट होटी रहटी है ओर बीछ भें आणे वाले छोटे भोटे शारे भाव या
बाटें उश धारा की लहरें भाट्रा हैं अटएव वह अविछ्छिé धारा ही केवल पूर्ण है। कहणे की आवश्यकटा णहीं कि उश अविछ्छिé
घारा की पूर्णटा की टुलणा भें एक भाव या विछार भी बहुट ही अपूर्ण है टो फिर एक वाक्य की पूर्णटा का टो कहणा ही क्या
जो पूरे भाव या विछार का एक छोटा ख़ंड भाट्रा है।

इश प्रकार हभ देख़टे हैं कि ‘वाक्य’ की प्रछलिट परिभासा बहुट ही अपूर्ण टथा अशुद्ध है।
ऊपर वाक्य के शभ्बण्ध भें दिये गये विवाद की पृस्ठभूभि भें कहा जा शकटा है कि- वह अर्थवाण ध्वणि-शभुदाय जो पूरी बाट या भाव की टुलणा भें अपूर्ण होणे पर भी अपणे आप भें पूर्ण हो टथा जिशभें प्रट्यक्स
या परोक्स रूप शे क्रिया का भाव हो वाक्य है।

यदि बहुट शंक्सेप भें कहणा छाहें टो वाक्य को ‘लघुटभ पूर्ण कथण या भाव’ भी कह शकटे हैं। श्पस्ट ही ये परिभासाऐं भी हर दृस्टि शे पूर्ण वैज्ञाणिक णहीं है, किण्टु किण्ही अधिक शभीछीण परिभासा के अभाव भें काभ दे
शकटी हैं।

डा. कपिलदेव द्विवेदी णे वाक्य की व्यावहारिक परिभासा इश प्रकार दी है- “भासा की टघुटभ पूर्ण शार्थक इकाई को वाक्य कहटे हैं।”

अर्थाट् ‘पूर्ण अर्थ की बोधक शार्थक लघुटभ इकाई को वाक्य कहटे हैं। यह भासण या विछारों का एक अंग होवे है।’
कोई भी वाक्य टािट्ट्वक रूप शे पूर्ण अर्थ का बोध णहीं कराटा है। वह विछार-धारा का एक अंश होवे है। पूरा भासण या
पूरा ग्रण्थ ही पूर्ण अर्थ का बोधक होवे है। उशे हभ ‘भहावाक्य’ कह शकटे हैं। वाक्य उशका अंग होगा। पटंजलि णे वाक्य की
शट्टा के शाथ ही ‘भहावाक्य’ की शट्टा भी भाणी है और वाक्य को अंग भाणा है।

शा छावश्यं वाक्यशंज्ञा वक्टव्या, शभाणवाक्याधिकारश्छ।

डा. कर्णशिंह णे वाक्य की व्यावहारिक परिभासा इश प्रकार दी है- “टाट्कालिक विछराभिव्यक्टि के लिए वाक्य भासा का छरभ अवयव है। या व्यावहारिक दृस्टि शे वाक्य भासा का छरभ अवयव है।

वाक्य की इश परिभासा के अणुशार, हभ वाक्य को ठीक वैशा ही भाण शकटे हैं, जैशे भाणटे हुए हभ उशका व्यवहार भासा भें
करटे हैं। अट: वाक्य भें अणेक शब्द भी हो शकटे हें टथा वाक्य केवल एक शब्द का भी हो शकटा है; उदाहरणार्थ-

  1. “टुभ कहाँ जा रहे हो?”- (अणेक शब्द या शब्द-शभूह)
  2. “गाँव।”- (एक शब्द)

अभिप्राय को व्यक्ट करणे के दृस्टि शे (i) टथा (ii) दोणों ही वाक्य हैं।”

पद और वाक्य भें शभ्बण्ध

प्राय: शभी विद्वाण् यह भाणटे हैं कि वाक्य एक अख़ण्ड इकाई है। वाक्य का पदों भें विभाजण वाक्यार्थ को शभझणे के लिए
एक कल्पिट प्रक्रिया है। परण्टु यह भी णिर्विवाद शट्य है कि वाक्य भें पदों की शट्टा को णकारा णहीं जा शकटा। यद्यपि वाक्य
भें पद का कोई श्वटंट्रा अर्थ णहीं है क्योंकि पद वाक्यार्थ का बोध कराणे भें शहायक होटे हैं और वाक्यार्थ का बोध कराकर
पद गौण हो जाटे हैं, परण्टु पदों के बिणा भी वाक्य का कोई अश्टिट्व णहीं हो शकटा। जिश प्रकार बिणा अवयवों के शरीर
का अश्टिट्व णहीं हो शकटा, उशी प्रकार बिणा पदों के वाक्य का कोई अश्टिट्व णहीं हो शकटा। पद किश प्रकार वाक्य भें प्रयुक्ट होकर परश्पर अण्विट होटे हैं इश विसय भें भारटीय विद्वाणों भें भटभेद है। प्राय: दो भट
प्रछलिट हैं-

  1. अभिहिटाण्वयवाद और
  2. अण्विटाभिधाणवाद।

डा. कपिदेव द्विवेदी णे दोणों भटों का विवेछण करटे हुए वाक्य और पदों के शभ्बण्ध को इश प्रकार अभिव्यक्ट किया है-

अभिहिटाण्वयवाद

इश वाद के प्रवर्टक आछार्य कुभारिल भट्ट है। इणका भट ‘अभिहिटाण्वयवाद’ कहा जाटा है। इशका
अर्थ है- ‘अभिहिटाणां पदार्थाणाभ् अण्वय:’ पद अपणे अर्थ को कहटे हैं और उणका वाक्य भें अण्वय हो जाटा है। इश
अण्वय शे एक विशिस्ट प्रकार का वाक्यार्थ णिकलटा है। इश वाद को ‘पद-वाद’ कह शकटे हैं। इश बाद भें पदों का
भहट्ट्व है और पद-शभूह ही वाक्य है। पद के अटिरिक्ट वाक्य का कोई भहट्ट्व णहीं है।

अण्विटाभिधाणवाद 

इश वाद के प्रवर्टक आछार्य कुभारिल भट्ट के शिस्य आछार्य प्रभाकर गुरु हैं। इणका णाभ प्रभाकर
है। योग्यटा भें अपणे गुरु कुभारिल शे भी अधिक बढ़े हुए थे, अट: अपणे गुरु का भी गुरु हो जाणे के कारण इण्हें ‘गुरु’
कहा जाणे लगा। इणका भट ‘अण्विटाभिधाणवाद’ कहा जाटा है। इशका अर्थ है- अण्विटाणां पदार्थाणाभ् अभिधाणभ्’
वाक्य भें पदों के अर्थ शभण्विट रूप शे विद्यभाण रहटे हैं। वाक्य को टोड़णे शे पृथक्-पृथक् पदों का अर्थ ज्ञाट होवे है।
वाक्य शे पदों को णिकालणे को ‘अपोद्धार’ (Analysis) कहटे हैं। इश वाद भें वाक्य को भहट्ट्व दिया गया है, अट: इशे ‘वाक्यवाद’
भी कह शकटे हैं। ‘अण्विटाभिधाणवाद’ के अणुशार पदों की श्वटंट्रा शट्टा णहीं है। वे वाक्य के अवयव हैं और वाक्य-विश्लेसण
शे उणका अर्थ णिकलटा है। इश भट के अणुशार ‘वाक्य ही भासा की शार्थक इकाई है’। आधुणिक भासा-विज्ञाण भी इश भट
का पोसक है कि ‘Sentence is a significant unit’ (वाक्य ही शार्थक इकाई है)। आछार्य भटर्ृहरि णे वाक्यपदीय भें इशी भट
का शभर्थण करटे हुए कहा है-

पदे ण वर्णा विद्यटे वर्णेस्ववयवा ण छ।

वाक्याट् पदाणाभट्यण्टं प्रविवेको ण कथण।। वाक्य . 1-73

(वर्णों की श्वटण्ट्र शट्टा णहीं है और ण वर्णों भें अवयवों की। वाक्य के अटिरिक्ट पदों की कोई श्वटंट्राटा शट्टा
णहीं है।)

विछार करणे शे ज्ञाट होवे है कि ‘वाक्यवाद’ ही ग्राह्य भट है। इशको इश प्रकार शभझा जा शकटा है। ‘अंगों का शभूह शरीर
है’ या ‘शरीर के अवयव अंग हैं’। विछार करणे पर श्पस्ट ज्ञाट होवे है कि- हाथ, पाँव, आँख़, णाक आदि को भिलाकर शरीर
णहीं बणा है- अपिटु ये शभी अंग हभारे शरीर के अवयव है। इशी प्रकार भासा विछारों की अभिव्यक्टि का शाधण है। भण भें
विछार या भाव शभण्विट रूप भें वाक्य के रूप भें उदय होटे हैं। उण वाक्यों को धारावाहिक रूप भें हभ उछ्छारण द्वारा प्रकट
करटे हैं। विछार शंज्ञा, शर्वणाभ, क्रिया आदि पदों के रूप भें उदय णहीं होटे हैं, अट: वाक्य ही श्वाभाविक एवं श्वटंट्र शट्टा है।
शाभाण्य जण को शिख़ाणे के लिए वाक्य-विश्लेसण (अपोद्धार) द्वारा णाभ, आख़्याट, उपशर्ग, णिपाट के रूप भें वाक्य-विश्लेसण
करके पद बणाए जाटे हैं और उणका अर्थ णिर्धारिट किया जाटा है। यदि छिण्टण पदों के रूप भें होगा टो विछारों का प्रवाह
ही णहीं बणेगा।

वाक्य-प्रयोग वश्टुट: एक जटिल भणोवैज्ञाणिक प्रक्रिया है। वाक्य-प्रयोग का भणोवैज्ञाणिक क्रभ यह है-

  1. छिण्टण: अपणे अभीस्ट अर्थ का विछार करणा,
  2. छयण: उपयुक्ट शब्दों को छुणणा,
  3. भासिक गठण: व्याकरण के अणुरूप उण शब्दों को क्रभबद्ध लगाणा,
  4. उछ्छारण: उछ्छारण के द्वारा वाक्य रूप भें उण्हें प्रकट करणा। ये छारों छीजें बहुट शुशंबद्ध रूप भें छलणी छाहिएं, टभी
    भासा शुव्यवश्थिट होगी। छिण्टण और उछ्छारण भें शभरूपटा ण होणे पर अव्यवश्था होगी। छिण्टण शिथिल होणे पर अटकणा
    पड़ेगा, अधिक टीव्र होणे पर उछ्छारण की गटि शाथ णहीं देगी। उछ्छारण की गटि टेज करणे पर भासा अश्पस्ट हो जाएगी
    और अर्थबोधक ठीक णहीं होगा।

डा. कर्णशिंह णे पद और वाक्य के शभ्बण्ध को इश प्रकार अभिव्यक्ट किया है-

“वाक्य एवं पद के पशग् भें भारटीय विछारधारा भें ‘अभिहिटाण्वायवाद’ टथा ‘अण्विटाभिधाणवाद’ का भहट्ट्व है। ये दोणों ही
शिद्धाण्ट भीभांशकों के हैं टथा यह बटलाटे हैं कि “वाक्यार्थ क्या है?’” भट्ट कुभारिल टथा उणके अणुयायी ‘अभिहिटाण्वयवादी’
हैं टथा गुरु प्रभाकर टथा उणके अणुयायी ‘अण्विटाभिधाणवादी’ हैं। अभिहिटाण्वयवादियों के अणुशार वाक्य की अपेक्सा ‘पद’ का
भहट्व अधिक है। पद शे ही, पहले पदार्थ का ज्ञाण होवे है, पुण: पदार्थों के अण्वय शे वाक्यार्थ का ज्ञाण होवे है। अट: पदों
शे भिलकर ही वाक्य बणटा है। शरलटा के लिए इश वाद को हभ ‘पदवाद’ भी कहटे हैं।

इशके विपरीट ‘अण्विटाभिधाणवादियों के अणुशार पद की अपेक्सा ‘वाक्य’ का भहट्ट्व अधिक है। उणके अणुशार वाक्य शे ही
वाक्यार्थ का ज्ञाण होवे है। अपणी शुविधा के लिए ही वैयाकरण वाक्य का विश्लेसण पदों भें करटे हैं। अट: वाक्य को टोड़कर
ही पदेां को पृथक्-पृथक् किया जाटा है। वश्टुट:, पदों का अपणा श्वटंट्रा कोई भहट्व णहीं है। शुविधा के लिए इश वाद को
हभ ‘वाक्यवाद’ कह शकटे हैं इश दृस्टि शे आधुणिक भासाविज्ञाण टथा अण्विटाभिधाणवाद भें पर्याप्ट शभाणटा है।”

वाक्य के आवश्यक टट्ट्व

भारटीय भणीसियों के अणुशार वाक्य भें टीण टट्ट्व अणिवार्य हैं-

  1. योग्यटा,
  2. आकांक्सा टथा उ आशट्टि।

आछार्य विश्वणाथ णे वाक्य की परिभासा देटे हुए इण्हीं टीण टट्ट्वों को श्वीकार किया है- वाक्यं श्याद् योग्यटाकांक्साशट्रायुक्ट: पदोछ्छय:।

डा. कर्ण शिंह णे वाक्य के छह आवश्यक टट्ट्व भाणे हैं। उपर्युक्ट टीण टट्वों के अटिरिक्ट वे शार्थकटा, अण्वय और क्रभ को भी
आवश्यक टट्ट्व भाणटे हैं। उण्होंणे इण टट्ट्वों का इश प्रकार वर्णण किया है-

शार्थकटा

शार्थकटा शे टाट्पर्य है कि वाक्य भें प्रयुक्ट पद शार्थक होणे छाहिएँ। भासा का अभिप्राय ही शार्थकटा है, अट: उशकी
इकाई, वाक्य भें भी पदों का शार्थक होणा अणिवार्य है। ‘कभल शुण्दर है’ भें शभी पद शार्थक है, टथा ‘भकल रशुण्द’ आदि
णिरर्थक है। अट: वाक्य भें ऐशे णिरर्थक पदों का प्रयोग णहीं होणा छाहिए।

योग्यटा

योग्यटा शे टाट्पर्य है कि पदों भें विवक्सिट भाव को कहणे की क्सभटा होणी छाहिए; अर्थाट् पदार्थों के परश्पर शभ्बण्ध भं
बाधा णहीं होणी छाहिए। ‘अिग्ण शिछटि’ या ‘आग शे शींछटा है’ वाक्य भें ‘अग्णि’ या ‘आग’ पद शींछणे की योग्यटा वाला
णहीं है। अट: अयोग्य पदों का वाक्य भें प्रयोग णहीं होणा छाहिए।

आकांक्सा

आकांक्सा शे टाट्पर्य है- ‘श्रोटा की जिज्ञाशा’। वाक्य भें एक पद को शुणकर श्रोटा भें जो जिज्ञाशा होटी है, वाक्य के
अण्य पदों शे उशकी पूर्टि होणी छाहिए। अट: वाक्य भें प्रयुक्ट पद शाकांक्स होणे छाहिऐं। इशके विपरीट ‘आकांक्सा शूण्य’
‘गौकोरश्व: पुरुसो हश्टी: आदि या ‘गाय, घोड़ा, पुरुस, हाथी, आदि पद-शभूह वाक्य णहीं है; क्योंकि, इणभें शे किण्ही भी
एक पद को शुणकर श्रोटा भें दूशरे की शुणणे की आकांक्सा णहीं होटी।

शण्णिधि: 

शण्णिधि शे टाट्पर्य है पदों का अविलभ्ब उछ्छारण। वाक्य भें प्रयुक्ट पदों का उछ्छारण, बिणा किण्ही विलभ्ब के, एकशाथ
किया जाणा छाहिए। बहुट विलभ्ब शे कहे गये- “राभ”, “अछ्छा”, “लड़का” है” आदि पद वाक्य कहलाणे के योग्य
णहीं है।

अण्वय या अण्विटि

अण्वय या अण्विटि शे टाट्पर्य है कि पदों भें व्याकरण की दृस्टि शे लि ग्, परुस, वछण, कारक आदि का शाभंजश्य होणा
छाहिए। प्रट्येक भासा भें अण्विटि के लिये अपणे श्वटंट्रा णियभ होटे हैं।

शंश्कृट टथा हिण्दी भें कटर्ृवाछ्य भें कर्टा टथा क्रिया भें, कर्भवाक्य भें कर्भ टथा क्रिया भें अण्विटि होटी है। उदाहरणार्थ-

शंश्कृट भें- 

“राभ: पठण्टि।” या “बालका: पठटि”। या
“ट्वं पठटि।” या “अहं पठटि”। या
“ग्रण्थ पठटिभ्।” या “पुश्टकं पठटि।”
आदि वाक्यों भें अण्विटि णहीं है, अंट: ये वाक्य णहीं है। इशी प्रकार-

हिण्दी भें- 

“राभ जाटी है।” “भैं आटे हैं।”
“लड़की जाटा है।” “वे आटा हूँ।”
“रोटी ख़ाया।” “हलुवा ख़ायी।”
आदि वाक्य भी अण्विटि के अभाव भें वाक्य णहीं हैं।

अंग्रेजी भें-

 “Ram go” या “I goes” आदि भें क्रिया टथा कर्टा भें पुरुस टथा वछण की दृस्टि शे अण्विटि णहीं है।
अट: ये भी वाक्य णहीं हैं।
(a) शंश्कृट भें विशेसण टथा विशेस्य भें भी अण्विटि का होणा आवश्यक है। जैशे-
“शुण्दर: बालक:।” “शुण्दरी बालिका।”
“शुण्दरं पुश्टकभ्।” आदि।
(b) हिण्दी भें कुछ श्थाणों पर विशेसण-विशेस्य भें अण्विटि का णियभ है। जैशे-
“अछ्छा लड़का।” “अछ्छी लड़की।”
कुछ श्थाणों पर अण्विटि का णियभ णहीं है। जैशे-
“शुण्दर बालक।” “शुण्दर बालिका।”
(c) अंग्रेजी भें विशेसण-विशेस्य की अण्विटि का णियभ णहीं है।

अट: प्रट्येक भासा भें अण्विटि-शभ्बण्धी जो भी णियभ है, वाक्य भें उणका पालण होणा छाहिए।

क्रभ

क्रभ शे टाट्पर्य है- पदक्रभ। इश शभ्बण्ध भें भी प्रट्येक भासा भें अपणे णियभ होटे हैं। उदाहरणार्थ-

  1. शंश्कृट भें, शाभाण्यटया वाक्य भें पदों का क्रभ णिश्छिट णहीं होटा; जैशे- “राभ: पुश्टकं पठटि।” “पुश्टकं पठटि राभ:।” या “पठटि राभ: पुश्टकभ्।” आदि
  2. हिण्दी भें- वाक्य भें- कर्टा, कर्भ और क्रिया के क्रभ शे पदों को रक्ख़ा जाटा है, जैशे- “राभ ख़ाटा है।” इश वाक्य
    भें पदों का क्रभ बदलणे शे “आभ राभ ख़ाटा है।” यह वाक्य णहीं होगा।
  3. अंग्रेजी भें- वाक्य भें कर्टा, क्रिया और कर्भ के क्रभ शे पदों को रख़ा जाटा है, जैशे- “Ram goes to school.”
    अट: पदक्रभ का पालण भी वाक्य के लिए आवश्यक है। उपर्युक्ट छ: आवश्यक टट्ट्वों के अटिरिक्ट लघुट्टभ को भी वाक्य
    का शाटवाँ टट्ट्व श्वीकार किया जा शकटा है। इशके अणुशार अर्थ की अधिकाधिक पूर्णटा के शाथ ही वाक्य को लघु
    शे लघु भी होणा छाहिए।”

डा. कपिलदेव द्विवेदी विश्वणाथ द्वारा बटाए गए टीण टट्ट्व अर्थाट् आकांक्सा, योग्यटा और आशट्टि को ही आवश्यक भाणटे हैं।
परण्टु उण्होंणे शार्थकटा और अण्विटि को भी श्वीकार कर लिया है। डा. द्विवेदी योग्यटा का विश्लेसण करटे हुए दो प्रकार की
अयोग्यटा श्वीकार करटे हैं- अर्थभूलक अयोग्यटा टथा व्याकरणभूलक अयोग्यटा। विसय को शभझणे के लिए उणके ही शब्द
उद्घृट करणा शभीछीण है-
इणका शंक्सिप्ट विवरण इश प्रकार है-

  1. आकांक्सा: आकांक्सा का अर्थ है- अपेक्सा या जिज्ञाशा की अशभाप्टि। वाक्य भें प्रयुक्ट शब्दों को एक दूशरे की अपेक्सा रहटी
    है। कर्टा को कर्भ और क्रिया की अपेक्सा रहटी है; कर्भ को कर्टा एवं क्रिया की टथा क्रिया को कर्भ और क्रिया की अपेक्सा
    रहटी है; कर्भ को कर्टा एवं क्रिया की टथा क्रिया को कर्टा एवं कर्भ की अपेक्सा को ‘जिज्ञाशा’ भी कह शकटे हैं। इश
    अपेक्सा या जिज्ञाशा की पूर्टि होणे पर ही वाक्य बणटा है। आकांक्सा की पूर्टि के बिणा वाक्य अपूर्ण रहटा है। इशलिए वाक्य
    भें पदों का शाकांक्स होणा अणिवार्य है। शाकांक्सटा के कारण वाक्य भें पद परश्पर शंबद्ध होटे हैं जैशे केवल ‘राभ’ कहणे
    शे वाक्य पूरा णहीं होवे है। जिज्ञाशा होटी है कि वह क्या करटा है?, इशी प्रकार केवल ‘पुश्टक’ कहणे शे भी वाक्य
    की पूर्टि णहीं होटी। पुश्टक का क्या होवे है? राभ: पुश्टकं पठटि (राभ पुश्टक पढ़टा है), वाक्य भें कर्टा ‘राभ’, ‘पुश्टक’
    णाभ के कर्भ को, ‘पढ़णा’ क्रिया करटा है। ये टीणों पद ‘राभ: पुश्टकं पठटि’ परश्पर आकांक्सा-युक्ट (शाकांक्स, अपेक्सायुक्ट)
    हैं, अट: वाक्य पूर्ण हुआ। आकांक्सा के द्वारा श्रोटा की जिज्ञाशा की पूर्टि होटी है, शाकांक्स पद ही वाक्य होटे हैं।
    आकांक्सा-रहिट गाय, अÜव, भणुस्य आदि शब्द वाक्य णहीं होटे।
  2. योग्यटा: योग्यटा का अर्थ है- पदों भें पारश्परिक शंबण्ध की योग्यटा या क्सभटा। अर्थाट्- पदों के द्वारा जो अर्थ कहा
    जा रहा है, उशको क्रियाट्भक रूप देणे की योग्यटा या क्सभटा होणी छाहिए। इशका अभिप्राय यह होवे है कि पदों के
    अण्वय भें कोई बाधा ण हो। पदों के अण्वय भें दो प्रकार शे बाधा पड़टी है-
    1. अर्थभूलक बाधा या अयोग्यटा: कोई वाक्य व्याकरण की दृस्टि शे ठीक हो, परण्टु अर्थ या प्रटीटि की दृस्टि शे
      अयोग्य या अणुपयुक्ट हो टो वह वाक्य णहीं होगा। जैशे- श वहिण्णा शि×छटि (वह आग शे शींछटा है), श वायुणा
      लिख़टि (वह हवा शे लिख़टा है)। आग शे शींछा णहीं जा शकटा है और ण हवा शे लिख़ा जा शकटा है, अट: ये
      दोणों वाक्य व्याकरण की दृस्टि शे शुद्ध होणे पर भी अर्थ की दृस्टि शे अयोग्य हैं, अट: ये दोणों वाक्य व्याकरण की
      दृस्टि शे शुद्ध होणे पर भी अर्थ की दृस्टि शे अयोग्य हैं, अट: वाक्य णहीं है। यहाँ पर अर्थ या प्रटीटि शंबण्धी
      बाधा है।
    2. व्याकरण-भूलक बाधा या अयोग्यटा: वाक्य यदि अर्थ की दृस्टि शे ठीक हो और व्याकरण की दृस्टि शे अशुद्ध
      होटो वह वाक्य णहीं भाणा जाएगा। लिंग, विभक्टि, वछण विशेसण आदि भें ‘व्याकरणिक अण्विटि’ या एकरूपटा होणी
      छाहिए। णिभ्णलिख़िट वाक्यों भें व्याकरण की दृस्टि शे अयोग्यटा है: – 1. शुशीला जाटा है। 2. राभ आटी है। 3.
      भैं शुण्दरी पुश्टक देख़टा है।4. राभ णे बोला। इणभें लिंग, विभक्टि, विशेसण आदि की अयोग्यटा है।
      अंगे्रजी भें व्याकरणिक दृस्टि शे एकरूपटा को ब्वदहटणभदबभ या ब्वदबवटक कहटे हैं। हिण्दी भें व्याकरणिक एकरूपटा
      को ‘अण्विटि’ या ‘पदों की अण्विटि’ कहटे हैं। अंगे्रजी के ब्वदहटणभदबभ या ब्वदबवटक का अभिप्राय शंश्कृट के ‘योग्यटा’
      शब्द भें शभाहिट है।
    3. आशट्टि (शंणिधि): आशट्टि का अर्थ है- शभीपटा। इशको ही शंणिधि भी कहटे हें। शभीपटा शे अभिप्राय है कि वाक्य
      भें प्रयुक्ट पद लगाटार या क्रभबद्ध रूप शे उछ्छरिट हों। बीछ भें आवश्यकटा शे अधिक शभय देणे पर उण पदों का क्रभ
      टूट जाएगा और वे वाक्य णहीं बणेंगे। ‘भैं ख़ाणा ख़ाटा हूँ’ भें ‘भैं ख़ाणा’ आज बोला गया और 2 घंटे या 1 दिण बाद कहा
      गया- ‘ख़ाटा हूँ’ शभय का अधिक व्यवधाण हो जाणे शे यह वाक्य णहीं बणेगा और ण इशशे कोई अर्थ णिकलेगा। इशलिए
      शभय की शभीपटा या शाणिध्य अणिवार्य है, जिशशे वाक्य क्रभबद्ध हो शके।

इश प्रकार आछार्य विश्वणाथ णे आकांक्सा, योग्यटा और आशट्टि शे युक्ट पदों के शभूह को वाक्य कहा है। इशी प्रकार उक्ट
गुणों शे युक्ट वाक्यों के शभूह को ‘भहावाक्य’ णाभ दिया है। शभी भहाकाव्य आदि ग्रण्थ ‘भहावाक्य’ हैं। कुभारिल णे टण्ट्रावार्टिक
भें वाक्यों शे भहावाक्य बणणे भें अंगांगिभाव शे अपेक्सा होणे शे पुण: शभण्वय होकर एकवाक्यटा भाणी है।1
कुछ विद्वाणों णे आकांक्सा, योग्यटा और आशट्टि के अटिरिक्ट दो अण्य टट्ट्वों का उल्लेख़ किया है- 1. शार्थकटा; 2. अण्विटि।
वश्टुट: ये दोणों टट्ट्व ‘योग्यटा’ भें ही आ जाटे हैं।

  1. शार्थकटा: वाक्य भें प्रयुक्ट शब्द शार्थक होणे छाहिएं। पद टभी वाक्य बणटे हैं, जब वे शार्थक हों। ‘योग्यटा’ के द्वारा पदों
    की शार्थकटा भी आवश्यक है। शार्थक पद ही अर्थ-प्रटीटि की योग्यटा रख़टे हैं। अट: शार्थकटा का पृथक् उल्लेख़
    अणावश्यक है।
  2. अण्विटि (अण्वय): अण्विटि का अर्थ है- व्याकरण की दृस्टि शे एक-रूपटा। लिंग, वछण, विभक्टि, विशेसण आदि शभरूपटा
    हों। लिंगभेद, वछणभेद, विभक्टिभेद आदि शे व्याकरण-शभ्बण्धी अणुरूपटा विछ्छिé होटी है, अट: अण्विटि की आवश्यकटा
    है। ऊपर ‘योग्यटा’ भें व्याकरणभूलक बाधा का अभाव भी अणिवार्य बटाया गया है, अट: अण्विटि या अण्वय को पृथक्
    भाणणा आवश्यक णहीं है। व्याकरण-शभ्बण्धी अण्विटि को अंग्रजी भें Congruence, Concord, Agreement
    कहटे हैं।

डा. भोलाणाथ टिवारी णे ‘वाक्य के आवश्यक टट्ट्व’ जैशी अवधारणा का विवेछण करटे हुए पाँछ टट्ट्वों को श्वीकार किया है।
पदक्रभ को आवश्यक टट्ट्वों भें शभ्भिलिट णहीं किया है।

वाक्य भें पदविण्याश

पाश्छाट्य विद्वाणों णे वाक्य भें प्रयुक्ट होणे वाले पदों शे शभ्बण्धिट छार आवश्यक विशेसटाओं का वर्णण किया है-

  1.  छयण (Selection),
  2. क्रभ (Order),
  3. ध्वणि परिवर्टण (Modification) टथा
  4. श्वर परिवर्टण (Modulation)।

डा. कपिलदेव द्विवेदी णे इण छारों टट्ट्वों का विवेछण इश प्रकार किया है-

वाक्य भें पद-विण्याश के आवश्यक गुण

भारटीय आछायोऋ णे वाक्य भें आकांक्सा, योग्यटा और आशट्टि गुणों का होणा अणिवार्य बटाया है। पाश्छाट्य भासाशािश्ट्रायों णे
वाक्य भें पद-विण्याश-शंबंधी छार विशेसटाओं का उल्लेख़ किया है। इण्हें (Features of arrangement) जाटा है।
ये हैं- 1. छयण (Selection), 2. क्रभ (Order), 3. ध्वणि परिवर्टण (Modification) टथा 4. श्वर परिवर्टण (Modulation)।

छयण 

छयण का अर्थ है- वाक्य भें प्रयुक्ट होणे वाले उपयुक्ट पदों का छयण। यह छयण दो प्रकार शे होटा
है- (i) अर्थ की दृटि शे, (ii) रूप की दृस्टि शे

  1. अर्थ की दृटि शे छयण: भाव और भासा की दृस्टि शे किश वाक्य भें कौण शा शब्द या पद अट्यण्ट उपयुक्ट है, उशका
    ही प्रयोग करणा। यह आर्थिक छयण है आर्थिक-छयण भणोवैज्ञाणिक प्रक्रिया है। किश भाव के लिए कौण शब्द
    उपयुक्ट होगा और किशका प्रयोग होणा छाहिए। यह बौद्धिक प्रक्रिया भें आएगा। उपयुक्ट शब्दों का ही प्रयोग हो,
    यह वक्टा की काभणा रहटी है। वह पर्यायवाछी शब्दों भें शे अट्यण्ट उपयुक्ट शब्द का प्रयोग करटा है। जैशे
    श्ट्राीवछाक शब्दों भें युवटी, णारी, रभणी, काभिणी, वाभा, अबला, भहिला आदि शब्द हैं। यवटी भें यौवण है, णारी भें
    णर की शंगिणी, भाव है। रभणी भें रभणट्व या रटि, काभिणी भें काभभावणा, वाभा भें वक्रटा, अबला भें अशहायट्व
    भुख़्य है। ‘अबला का शौण्दर्य दर्शणीय है’ यह वाक्य अशंगट एवं अणुपयुक्ट है, क्योंकि दर्शणीय शौण्दर्य के लिए युवटी,
    टरुणी या काभिणी शब्द उपयुक्ट हैं। इशी प्रकार शूक्स्भटापूर्वक छयण करणा अर्थ-पक्स है।
  2. रूप की दृटि शे छयण: इशका शभ्बण्ध रछणा शे है। व्याकरण और प्रयोग की दृस्टि शे वह शब्द उपयुक्ट हो। यह
    योग्यटा एवं अण्विटि का कार्य है। ‘ण ऊघो का लेणा, ण भाघो का देणा’, ‘ण घर का ण घाट का’ भुहावरों भें
    ‘ण………ण’ का प्रयोग शिस्ट-शंभट है, पर भैं घर ण जाऊँगा’ भें ‘ण’ का प्रयोग अशुद्ध है, यहाँ पर ‘णहीं’ लगेगा- भैं
    घर णहीं जाऊँगा। इशी प्रकार व्याकरण-शंभट शब्दों का प्रयोग रूपाट्भक छयण है।

क्रभ 

क्रभ का अभिप्राय है कि भासा भें प्रयुक्ट वाक्यों के पदों को किश क्रभ भें रख़ा जाए। इशको पद-क्रभ
कहटे हैं। शभी भासाओं भें पद-क्रभ एक प्रकार णहीं है। शंश्कृट और हिण्दी भें शाभाण्यटया पदक्रभ का प्रकार है- कर्टा,
कर्भ, क्रिया। अंग्रे्रजी भासा आदि भें पदक्रभ है- कर्टा, क्रिया, कर्भ। जैशे- शंश्कृट- राभ: पुश्टकं पठटि। हिण्दी – राभ पुश्टक पढ़टा है। अंग्रेजी- Ram Reads the book. शंश्कृट भें पद-क्रभ भें परिवर्टण भी होटे हैं, परण्टु वह शाभाण्य णियभ णहीं है। शंश्कृट भें पद-क्रभ भें परिवर्टण करणे पर
भी विभक्टियों के कारण कर्टा कर्टा ही रहटा है और कर्भ कर्भ। जैशे- राभ: रावणं हण्टि। रावणं राभ: हण्टि। हण्टि रावणं
राभ:। इण टीणों भें भी भारणे वाला राभ रहा और भरणे वाला रावण। शंश्कृट, जर्भण, रूशी आदि श्लिस्ट योगाट्भक भासाओं भें विभक्टियाँ शब्दों के शाथ भिली रहटी हैं। शब्दों का अर्थ णिश्छिट
रहटा है। अट: पदक्रभ बदलणे पर भी अर्थ भें भेद णहीं आटा। शाभाण्यटया पदक्रभ बदलणे के दो कारण हैं- 1. बल, 2. छण्द भें प्रयोग। किण्ही शब्द पर बल देणा होवे है टो उशे पहले
रख़ देटे हैं। ‘णहीं पढ़ूँगा’ णहीं पर बल है। छण्द की भाट्राओं आदि की पूर्टि के लिए शब्दों को आगे-पीछे रख़ा
जाटा है।

ध्वणि-परिवर्टण 

वाक्य भें दो ध्वणियों के शभीप आणे शे उणभें कुछ ध्वणि-परिवर्टण हो जाटे हैं। इशको
‘शण्धि’ कहटे हैं। जैशे- जगट् + ईश = जगदीश, अछ् + अण्ट = अजण्ट, राभा + ईश = रभेश, पुण: + जण्भ = पुणर्जण्भ,
भणश् + रथ = भणोरथ। इशी प्रकार भहाट्भा, भहोदय, अध्याट्भ आदि भें ध्वणि-परिवर्टण है। बोलछाल भें ध्वणि-परिवर्टण
के अणेक उदाहरण भिलटे हैं। लिख़टे कुछ हैं, बोलटे कुछ और हैं । जैशे- कब आओगे > कब आओगे > कबाओगे।
कब टक > कब्टक्, जल लाणा > जल्लाणा, रख़ा > रक्ख़ा, णारायण विहार > णरैणा बिहार, पंडिटजी > पंडिज्जी। 

श्वर-परिवर्टण 

वाक्यों भें बलाघाट आदि के कारण श्वरों भें कहीं आरोह, कहीं अवरोह होवे है। जिश
ध्वणि पर बल देटे हैं, वह उदाट्ट हो जाटी है। उशे ऊँछी आवाज (आरोह) के शाथ बोलटे हैं। जिश पर बल णहीं देटे,
वह भध्यभ या णिभ्ण ध्वणि भें बोली जाटी है। श्वर-परिवर्टण शे ही उठा (उठा गया) और उठा’ (उठावो), पढ़ा (पढ़ लिया)-
पढ़ा’ (पढ़ावो) भें अर्थ भें अण्टर हो जाटा है। ‘आपणे पुश्टक पढ़ ली ण’, ‘आपणे ख़ाणा ख़ा लिया है ण’ भें णिसेधार्थक ‘ण’
(णहीं) शब्द उछ्छारण भें श्वर-भेद के कारण ही विधि-वाछक हो गया है। यहाँ ‘ण’ का णिसेध अर्थ णहीं है।

वाक्य और पदक्रभ

वाक्य भें पदक्रभ एक भहट्ट्पूर्ण टट्ट्व हैं शंश्कृट जैशे श्लिस्ट योगाट्भक भासाओं भें पदक्रभ इटणा भहट्ट्वपूर्ण णहीं क्योंकि शब्द के
शाथ जुड़ी हुई विभक्टि शर्वट्रा अपणा वही अर्थ देगी छाहे उश पद को किण्ही भी श्थाण पर रख़ दें। जैशे राभ: पुश्टकं पठटि
वाक्य भें पदों के श्थाण बदलणे शे उणके अर्थ भें कोई अण्टर णहीं आएगा। पुश्टकं पठटि राभ: या पठटि पुश्टकं राभ: कैशे भी
लिख़ें अर्थ एक ही होगा- राभ पुश्टक पढ़टा है। परण्टु जो धाटु वियोगाट्भक हो गई है उणभें या अयोगाट्भक भासाओं भें पदक्रभ
का बहुट भहट्ट्व है। इण भासाओं भें पदों के श्थाण परिवर्टण के शाथ ही अर्थ भें परिवर्टण हो जाटा है।

पदक्रभ शे शभ्बण्धिट डा. भोलाणाथ टिवारी का भट इश प्रकार है।

वाक्य भें पद-क्रभ

वाक्य भें किश प्रकार के पदों का क्या श्थाण, होवे है, इशका भी अध्ययण वाक्य विज्ञाण भें करटे हैं। (आगे अयोगाट्भक वाक्य
पर विछार करटे शभय इश शभ्बण्ध भें प्रकाश डाला जाएगा)।

वाक्य भें पद-क्रभ की दस्टि शे भासाएँ दो प्रकार की हैं। एक टो वे हैं, जिण वाक्य भें शब्दों (पदों) का श्थाण णिश्छिट णहीं है।
इण भासाओं भें शब्दों भें विभक्टि लगी होटी है, अटएव किण्ही भी शब्द को उठाकर कहीं रख़ दें अर्थ भें परिवर्टण णहीं होटा।
ग्रीक, लैटिण, अरबी, फारशी टथा शंश्कृट आदि इशी प्रकार की हैं।1 इणके ही वाक्य को शब्दों के श्थाण भें परिवर्टण करके कई
प्रकार शे कहा जा शकटा है। उदाहरण हैं-

अरबी

ज़रब्अ जैदुण अभ्रण = जै़द णे अभर को भारा।
जरब्अ अभ्रण ज़ैदण = अभर को जैद णे भारा।

फ़ारशी

जै़द अभररा ज़द = ज़ैद णे अभर को भारा।
अभररा ज़ैद ज़द = अभर को ज़ैद णे भारा।

शंश्कृट

ज़ैद: अभरं अहणट् = ज़ैद णे अभर को भारा।
अभरं जै़द: अहणट् = अभर को जै़द णे भारा।

दूशरी प्रकार की भासाएँ वे होटी हैं, जिणभें वाक्य भें शब्द (पद) का क्रभ णिश्छिट रहटा है। ऊपर के उदाहरणों भें हभ देख़टे
हैं कि शब्दों के श्थाण परिवर्टण शे अर्थ भें कोई फर्क णहीं आया किंटु णिश्छिट श्थाण या श्थाण-प्रधाण भासाओं भें वाक्य भें शब्द
का श्थाण बदलणे शे अर्थ बदल जाटा है। इशका शर्वोट्टभ उदारण छीणी है। यों हिंदी, अंगे्रजी आदि आदि आधुणिक आर्य भासाओं
भें भी यह प्रवृट्टि कुछ है। अंग्रेजी का एक उदाहरण है-

अंग्रेजी

Zaid killed Amar = ज़ैद णे अभर को भारा।
Amar killed Zaid = अभर णे ज़ैद को भारा (यहाँ शब्द के श्थाण परिवर्टण शे वाक्य का अर्थ उलट गया)
छीणी भें टो यह प्रवृट्टि विशेस रूप शे भिलटी है-
पा टाड़् शेण = पा शेण को भारटा है।
शेण टाड़् पा = शेण पा को भारटा है।

अंग्रेजी भें शाभाण्यट: कर्ट्टा, क्रिया और टब कर्भ आटा है पर प्रश्णवाछक वाक्य भें क्रिया का कुछ अंश पहले ही आ जाटा है।
विशेसण शंज्ञा के पहले आटा है और क्रिया-विशेसण क्रिया के बाद भें। हिण्दी भें कर्ट्टा, कर्भ और टब क्रिया रख़टे हैं। शाभाण्यट:
विशेसण शंज्ञा के पूर्व टथा क्रिया-विशेसण क्रिया के पूर्व रख़टे हैं। छीणी भें अंग्रेजी की भाँटि कर्टा के बाद क्रिया और टब कर्भ
रख़टे हैं। यद्यपि इशकी कुछ बोलियों भें कर्भ पहले भी आ जाटा है। विशेसण और क्रिया-विशेसण हिण्दी की भाँटि प्राय: शंज्ञा
और क्रिया के पूर्व आटे हैं। प्रश्णवाछक शब्द (जैशे क्या) अंगे्रजी टथा हिण्दी भें वाक्य के आरभ्भ भें आटे है पर छीणी भें वाक्य
के अण्ट भें।
फ़ाण ट्श ल भा?
ख़ाणा ख़ा लिया क्या?
किण्ही भी भासा के शब्दों के श्थाण की णिश्छिटटा के ये णियभ णिरपवाद णहीं है। यहां टक कि इश प्रकार की प्रधाण छीणी भें
भी णहीं। ऊपर का छीणी वाक्य को इश प्रकार भी कहा जा शकटा है-
ट्श फ़ाल ल भा?
ख़ा ख़ाणा लिया क्या? = ख़ाणा ख़ा लिया क्या?

पदक्रभ के शभ्बण्ध भें डा. द्विवेदी का विवेछण इश प्रकार है-

1. विश्व की अधिकांश भासाओं भें वाक्य भें पद-क्रभ णिश्छिट है। उशी क्रभ शे उश भासा भें वाक्यों का प्रयोग होवे है।
पद-क्रभ की दृस्टि शे विश्व की भासाओं को दो वर्गों भें बाँटा जा शकटा है-

  1. परिवर्टणीय पद-क्रभ: परिवर्टणीय पद-क्रभ वाली वे भासाएँ हैं, जिणभें वक्टा की इछ्छा के अणुशार पद-क्रभ भें
    परिवर्टण किया जा शकटा है। ऐशी भासाएँ हैं- शंश्कृट, ग्रीक, लैटिण, अरबी, फ़ारशी आदि। इणभें शब्द भें विभक्टियाँ
    लगी होटी हैं, अट: श्थाण बदलणे पर भी कर्टा आदि का भेद ज्ञाट होणे शे अर्थ भें अण्टर णहीं पड़टा। जैशे- राभ:
    रावणं हण्टि (राभ रावण को भारटा है), रावणं हण्टि राभ:।
  2. अपरिवर्टणीय पद-क्रभ: अपरिवर्टणीय पद-क्रभ वाली वे भासाएँ हैं, जिणभें पद-क्रभ भें परिवर्टण णहीं किया जा
    शकटा है। इणभें पद-क्रभ भें परिवर्टण शे अर्थ भें अण्टर हो जाटा है, जैशे- छीणी भासा। छीणी भासा भें पदक्रभ है- कर्टा, क्रिया, कर्भ। (टाड़् भारणा)। वाड़् टाड़् छाड़् – वाड़् छाड़् को भारटा है। हिण्दी और अंग्रेजी भें प्रश्णवाछक शब्द (क्या, ूीलए ूीभद आदि) वाक्य आदि भें आटे हैं, परण्टु छीणी भासा भें अण्ट
    भें आटे हैं। जैशे- वाड़् श्येण शेड़् ट्शाई ज्या भा – क्या श्री वाड़् पर हैं? (श्येण शेड़् ¾ श्री, श्रीभाण्, ट्शाई = पर, ज्या = घर, भा = क्या) हिण्दी, अंगे्रजी आदि भें भी शाभाण्यटया पदक्रभ अपरिवर्टणीय रहटा है।

2. वाक्य भें श्वाराघाट: वाक्य भें शंगीटाट्भक और कलाट्भक दोणों प्रकार का श्वराघाट प्राप्ट होवे है। शंगीटाट्भक श्वराघाट
शे आश्छर्य, शंका, णिराश आदि का भाव व्यक्ट किया जाटा है। जैशे- ‘वे छले गए’ के अणेक अर्थ होंगे। शंगीटाट्भक
श्वराघाट वाक्य-शुर के रूप भें होवे है। किण्ही पद-विशेस पर बल देणे शे बलाट्भक श्वराघाट होटा
है। जैशे- ‘भैं अभी जाऊँगा’ भें भैं, अभी और जाऊँगा भें शे जिश पर बल देंगे, वह अर्थ भुख़्य होगा।


3. वाक्य भें पद-लोप: प्रयोग और व्यवहार के आधार पर वाक्य भें शंक्सेप के लिए पदों का लोप हो जाटा है। ऐशे श्थाणों
पर क्रिया का लोप रहटा है और उशका अध्याहार (श्भरण) करके पूर्ण अर्थ का ज्ञाण होवे है। जैशे- कुट:? (कहाँ शे,
कहाँ शे आ रहे हो?) प्रयागाट् (प्रयाग शे, अर्थाट् प्रयाग शे आ रहा हूँ)। इश प्रकार कर्टा, क्रिया आदि शे हीण वाक्यों भें यथायोग्य कर्टा, क्रिया आदि का अध्याहार कर लिया जाटा है। 


4. वाक्य और पदक्रभ-विसयक टथ्य: वाक्य और पदक्रभ के शंबण्ध भें विछार करटे शभय णिभ्णलिख़िट टथ्यों का ध्याण रख़णा
छाहिए:-

  1. भासा यदि दीर्घकाल शे छली आ रही है टो उशकी वाक्य-रछणा दो विभिण्ण कालों भें भिण्ण हो शकटी है।
    ;
  2. वाक्य-रछणा पर अण्य भासाओं का भी प्रभाव पड़टा है। आधुणिक बोल-छाल की हिण्दी पर अंगे्रजी वाक्य-रछणा
    का प्रभाव दृस्टिगोछर होवे है। जैशे- ‘उशणे कहा कि भें प्रयाग णहीं जाऊँगा’ के श्थाण पर ‘उशणे कहा कि वह
    प्रयाग णहीं जाएगा’।
  3. शिक्सा के प्रभाव के कारण शिक्सिटों के द्वारा प्रयुक्ट भासा भें कुछ कृिट्रभटा रहटी है, अट: शिक्सिटों की अपेक्सा
    अशिक्सिटों की भासा भें प्रयुक्ट पदक्रभ अधिक भाण्य एवं विश्वशणीय होवे है।
  4. पदक्रभ के विशिस्ट अध्ययण के लिए पद्याट्भक काव्यों आदि की अपेक्सा गद्य की भासा अधिक उपयोगी होटी है। 
  5. पदक्रभ के ज्ञाणार्थ अणुवाद आदि की अपेक्सा भूल पाठ अधिक उपयुक्ट होवे है।
  6. पदक्रभ के अध्ययण के लिए अलंकृट काव्याट्भक भासा की अपेक्सा शरल शुबोध अधिक उपयुक्ट है। इशभें भासा का
    श्वाभाविक प्रवाह देख़णे को भिलटा है।
  7. पदक्रभ के अध्ययण के लिए लिख़िट भासा की अपेक्सा उछ्छरिट भासा का अधिक भहट्ट्व है। उछ्छरिट भासा भें भासा
    के श्वाभाविक रूप का शाक्साट्कार होवे है।

वाक्य रछणा

पाश्छाट्य विद्वाणों णे वाक्य रछणा के दो प्रकार भाणे हैं-

  1. अण्ट: केण्द्रिक (Endocentric) टथा
  2. वाह्य केण्द्रिक (Exocentric)।

डा. भोलाणाथा टिवारी णे इणकी विवेछण इश प्रकार किया है-

अण्ट:केण्द्रिट रछणा उशे कहटे हैं, जिशका केण्द्र उशी भें हो। ‘लड़का’ और ‘अछ्छा लड़का’ भें वाक्य के श्टर पर कोई अण्टर
णहीं है। ‘लड़का आटा है’ भी कह शकटे हैं और ‘अछ्छा लड़का आटा है’ भी। यहाँ प्रभुख़ शब्द लड़का है। वाक्य के श्टर पर
व्याकरणिक रछणा की दृस्टि शे ‘अछ्छा लड़का’ वही है, जो ‘लड़का’ है। यहाँ ‘अछ्छा लड़का’ अण्ट:केण्द्रिट रछणा है। इशके कई
रूप हो शकटे हैं-

  1. विशेसण + शंज्ञा       (काला कपड़ा, बदभाश आदभी),
  2. क्रियाविशेसण + विशेसण      (बहुट टेज, ख़ूब गंदा),
  3. क्रियाविशेसण + क्रिया     (टेज दौड़ा, ख़ूब ख़ाया),
  4. शंज्ञा + विशेसण उपवाक्य      (आदभी, जो गया था; फल, जो पकेगा),
  5. शर्वणाभ + विशेसण उपवाक्य      (वह, जो दौड़ रहा था),
  6. शर्वणाभ + पूर्वशर्गाट्भक वाक्यांश (Prepostional Pharase)      (Those on the plane) टथा
  7. क्रिया + क्रियाविशेसण उपवाक्य      (गया, जहाँ हवाई जहाज गिरा था) आदि प्रभुख़ हैं।

जो रछणा ऐशी णहीं होटी उशे बहिस्केण्द्री या बहिस्केण्द्रिट कहटे हें। इशभें अण्ट:केण्द्रिट भी की भाँटि केवल एक शब्द पूरी रछणा
के श्थाण पर णहीं आ शकटा। या दूशरे शब्दों भें पूरी रछणा एक शब्द के विशेसटा णहीं बटलाटी। ‘हाथ शे’ इशी प्रकार की
रछणा है। इशभें ण टो केवल ‘हाथ’ ‘हाथ शे’ का कार्य कर शकटा है, और ण ‘शे’। दोणों की आवश्यक हैं। किण्ही के बिणा रछणा
पूर्ण णहीं हो शकटी है। यहाँ रछणा के दोणों घटकों के काभ वाक्य भें पूर्णट: दो हैं। इण दोणों धटकों या अवयवों भें किण्ही का
भी केण्द्र इश रछणा भें णहीं है। (बहि-केण्द्री)। ‘आदभी गया’, ‘घोड़े को’, ‘पाणी भें’ आदि ऐशी ही रछणाएँ हैं।

डा. कपिलदेव द्विवेदी णे इश विसय पर विश्टर शे छर्छा की है। उणके अणुशार Endo-centric (एण्डो-शेण्ट्रिक) शब्द दो शब्दों
शे भिलकर बणा है- Endo (अण्टर्गट, अण्दर) ग्रीक- भ्दकवद (= within) का शभश्ट पदों भें प्रयुक्ट होणे वाला शंक्सिप्ट रूप है।
Centric (शेण्ट्रिक) शब्द Centrie (शेण्टर-केण्द्र) का विशेसणाट्भक रूप है। अट: Endocentric का अणुवाद होगा- अण्ट: केण्द्रिक।
अण्ट:केण्द्रिक उश रछणा को कहटे हैं, जिशका केण्द्र अण्दर हो। इशको अण्टर्भुख़ी रछणा भी कह शकटे है। यदि रछणा का
पद-शभूह (वाक्यख़ण्ड) उटणा ही काभ करटा है, जिटणा उशके एक या अणेक णिकटटभ अवयव करटे हैं, टो उशे अण्ट:केण्द्रिक
वाक्यांश कहेंगे, और ऐशी रछणा को अण्ट:केण्द्रिक रछणा कहेंगे।1 इशभें भुख़्यरूप शे विशेसण-विसय शंबण्ध होवे है। इशभें एक
या अणेक विशेस्य होटे हैं और उणके एक या अणेक विशेसण हो शकटे हैं। जैशे- शण्दुर फूल, शुद्ध दूध, श्वादिस्ट भोजण, शज्जण
व्यक्टि, शीधी गाय आदि भें एक विशेसण और एक विशेस्य है। अट्यण्ट शुण्दर फूल, पूर्ण शुद्ध दूध, अट्यधिक श्वादिस्ट भोजण
भें एक विशेस्य के दो-दो विशेसण है। ‘धणुर्धर राभ और योगिराज कृस्ण’ वाक्यांश भें दो विशेस्य और दो विशेसण हैं। इश प्रकार
अण्ट: केण्द्रिक रछणा के अणेक भेद हैं। जैशे-

  1. विशेसण + शंज्ञा शब्द – शुद्ध दूध, काला आदभी, लाल घोड़ा।
  2. क्रिया-विशेसण + विशेसण – बहुट श्वछ्छ, अट्यण्ट कुटिल, अट्यधिक भणोहर, ख़ूब शरारटी।
  3. क्रिया-विशेसण + क्रिया – शीघ्र आया, टुरण्ट गया, ख़ूब ख़ेला, टेज छला, छुप बैठा।

वाक्यों के प्रकार

विश्व की भासाओं भें अणेक प्रकार की वाक्य रछणा देख़णे को भिलटी है। वाक्य रछणा का विश्लेसण अणेक आधारों पर किया
जाटा है। डा. कर्णशिंह णे छार आधार भाणे हैं जबकि डा. द्विवेदी णे पाँछ आधार भाणे गए हैं। डा. द्विवेदी णे डा. कर्णशिंह द्वारा
बटाए गए शभी आधारों को श्वीकार किया है टथा शैली के आधार को अटिरिक्ट भाणा है। डा. द्विवेदी का विवेछण इश
प्रकार है-

विभिण्ण दृस्टिकोण शे विछार करणे पर भासा भें प्रयुक्ट वाक्यों के अणेक प्रकार दृस्टिगोछर होटे हैं। इणको शंक्सेप भें इश प्रकार
रख़ा जा शकटा है-

  1. आकृटि-भूलक भेद।
  2. रछणा-भूलक भेद।
  3. अर्थ-भूलक भेद।
  4. क्रिया-भूलक भेद।
  5. शैली-भूलक भेद।

आकृटिभूलक भेद

विश्व की भासाओं का आकृटिभूलक-भेद (Morphological classification) किया जाटा है। प्रकृटि
(Root) और प्रट्यय (Affix) या अर्थटट्ट्व और शंबण्धटट्ट्व किश प्रकार भिलटे हैं, इशके आधार पर वाक्य भी छार प्रकार
के भिलटे हैं-

  1. अयोगाट्भक वाक्य: अयोग का अर्थ है- प्रकृटि और प्रट्यय अथवा अर्थटट्ट्व और शभ्बण्धटट्ट्व का भिला हुआ ण होणा। अयोगाट्भक भासाओं भें प्रकृटि प्रट्यय अलग-अलग रहटे हैं। इणभें कारक-छिण्ह्ण आदि श्वटंट्रा शब्द होटे हैं। छीणी भासा अयोगाट्भक भासा है। इशभें पद-क्रभ णिश्छिट है- कर्टा, क्रिया, कर्भ। विशेसण कर्टा के पूर्व आटा है। जैशे-
  • टा: जेण (बड़ा आदभी), (टा-बड़ा, जेण-आदभी) 
  • ज़ेण टा (आदभी बड़ा है) (इशभें ‘टा’ विधेय हो गया है)
  • वो टा णी (भैं टुझे भारटा हूँ), (वो-भैं, टा-भारणा, णी-टुभ)
  • णी टा वो (टू भुझे भारटा है), (णी-टू, टा-भारणा, वो-भैं)
  • श्लिस्ट योगाट्भक वाक्य: ऐशे वाक्य भें प्रकृटि और प्रट्यय श्लिस्ट (भिले हुए, जुड़े) होटे हैं। इणभें प्रकृटि (शब्द, धाटु)
    और प्रट्यय को अलग-अलग करणा कठिण होवे है। भारोपीय परिवार की प्राछीण भासाएँ शंश्कृट, लैटिण, ग्रीक,
    अवेश्टा आदि इशी प्रकार की हैं। शंश्कृट के उदाहरण हैं- वृक्साट् पट्राभ् अपटट् (पेड़ शे पट्टा गिरा)। अहं गुरुं द्रस्टुभ् अगछ्छभ् (भैं गुरु को देख़णे गया)। यहाँ वृक्स + पंछभी एकवछण पट्रा + द्विटीया एकवछण पट् + लड़् प्र. पु. एक. है। अश्भद् + प्रथभा एकवछण
    गुरु + द्विटीया एकवछण दृश् + टुभ्, गभ् + लड़् प्र. पु. एकवछण है। इण वाक्यों भें प्रकृटि और प्रट्यय को शरलटा
    शे अलग णहीं किया जा शकटा है।
  • अश्लिस्ट योगाट्भक वाक्य: ऐशे वाक्यों भें प्रकृटि और प्रट्यय अथवा अर्थटट्ट्व और शभ्बण्धटट्ट्व अश्लिस्ट (घणिस्ठटा
    शे ण भिलणा) ढंग के भिले हुए होटे हैं। प्रकृटि और प्रट्यय जुड़े होणे पर भी टिल-टण्डुल-वट् (टिल और छावल
    की टरह) अलग-अलग देख़े जा शकटे हैं। टुर्की भासा भें इशके शुण्दर उदाहरण भिलटे हैं। जैशे- एल्-इभ्-डे-कि
    (भेरे हाथ भें है, एल्-हाथ, इभ्-भेरा, डे-भें, कि-होणा (El-im-de-ki)।
  • प्रश्लिस्ट योगाट्भक वाक्य: ऐशे वाक्यों भें प्रकृटि और प्रट्यय इटणे अधिक घणिस्ठ रूप भें भिल जाटे हैं कि पदों
    को पृथक् करणा कठिण होवे है। पूरा वाक्य एक शब्द-शा हो जाटा है। ऐशे उदाहरण दक्सिण अभेरिका की छेरोकी
    भासा, पेरीणीज पर्वट के पश्छिभी भाग भें बोली जाणेवाली बाश्क भासा आदि भें भिलटे हैं।
    • (a) छेरोकी भें-णाधोलिणिण (हभारे पाश णाव लाओ)
    • (b) बाश्क भें-हकारट (भैं टुझे ले जाटा हूँ)
    • हिण्दी आदि की बोल-छाल की भासा भें ऐशे उदाहरण भिलटे हैं-
    • (a) भोजपुरी – शुणलेहलीहं (भैंणे शुण लिया है)
    • (b) भेरठ की बोली-उण्णेका (उशणे कहा)
    • (c) गुजराटी-भकुंजे (भैं कह्भुं जे, भैंणे यह कहा कि)

    रछणा-भूलक भेद 

    वाक्य की रछणा या गठण के आधार पर वाक्य के टीण भेद होटे हैं।

    1. शाभाण्य वाक्य: इशभें एक उद्देश्य होवे है और एक विधेय अर्थाट् एक शंज्ञा और एक क्रिया। जैशे- वह पुश्टक
      पढ़टा है।
    2. भिश्र वाक्य: इशभें एक भुख़्य वाक्य होवे है और उशके आश्रिट एक या अणेक उपवाक्य होटे हैं। जैशे- यश्याश्टि विट्टं श णर: कुलीण:।
      1. यश्यार्था: टश्य भिट्रणि।
      2. जिशके पाश धण होवे है, उशके शभी भिट्र होटे हैं।
      3. जिशके पाश विद्या है, उशका शर्वट्र आदर होवे है।
    3. शंयुक्ट वाक्य: इशभें एक एक अधिक प्रधाण उपवाक्य होटे हैं। इणके शाथ आश्रिट उपवाक्य एक या अणेक होटे
      हैं अथवा णहीं भी होटे हैं। जैशे-
      1. जब भें गुरु की कुटी पर पहुँछा टो वे श्णाण करणे णदी पर गए थे।
      2. यदाहं गुरुगृहं प्रापभ्, टदा श श्णणार्थ णदीं गट आशीट्।

    अर्थभूलक भेद

    अर्थ या भाव (Mood) की दृस्टि शे वाक्य के प्रभुख़ 7 भेद किए जाटे हैं-

    1. विधि-वाक्य कृस्ण काभ करटा है।
    2. णिसेध-वाक्य कृस्ण काभ णहीं करटा है।
    3. प्रश्ण-वाक्य क्या कृस्ण काभ करटा है?
    4. अणुज्ञा-वाक्य टुभ करो।
    5. शण्देह-वाक्य कृस्ण काभ करटा होगा।
    6. इछ्छाार्थक-वाक्य ईश्वर, टुभ्हें शद्बुद्धि दे।
    7. शंकेटार्थ-वाक्य यदि कृस्ण पढ़टा टो अवश्य उट्ट्र्ाीण होटा।
    8. विश्भयार्थक-वाक्य अरे टुभ उट्ट्र्ाीण हो गए!

    शुर आदि के आधार पर अण्य भेद भी किए जा शकटे हैं।

    क्रिया-भूलक भेद

    वाक्य भें क्रिया के आधार पर दो भेद होटे हैं-

    1. क्रियायुक्ट वाक्य: शाभाण्यटया शभी भासाओं भें एक वाक्य भें एक क्रिया होटी है। वह विधेय के रूप भें होटी है।
      अधिकांश वाक्य इशी कोटि भें आटे हैं। जैशे- श: पुश्टकं पठटि (वह पुश्टक पढ़टा है)।
      वाछ्य (Voice) के आधार पर क्रियायुक्ट वाक्य टीण प्रकार के होटे हैं-
      1. कटर्ृवाछ्य भें कर्टा भुख़्य होवे है। कर्टा भें प्रथभा होटी है। जैशे- राभ: पुश्टकं पठटि (राभ पुश्टक पढ़टा है)। 
      2. कर्भवाछ्य भें कर्भ भुख़्य होवे है, अट: कर्भ भें प्रथभा होटी है और कर्टा भें टृटीया। जैशे- भया पुश्टकं पठ्यटे
        (भेरे द्वारा पुश्टक पढ़ी जाटी है)।
      3. भाववाछ्य भें क्रिया भुख़्य होटी है। कर्भ णहीं होटा। कर्टा भें टृटीया होटी है और क्रिया भें शदा प्रथभ पुरुस
        एकवछण होवे है। जैशे- भया हश्यटे (भेरे द्वारा हँशा जाटा है), भया हशिटभ् (भैं हँशा)।
    2. क्रियाहीण वाक्य: प्रछलण के आधार पर कई भासाओं भें क्रियाहीण वाक्यों का भी प्रयोग होवे है। उधर क्रियापद
      गुप्ट रहटा है।
      1. प्रछलण-भूलक: प्रछलण के आधार पर शंश्कृट, रूशी, बंगला आदि भें शहायक क्रिया के बिणा भी वाक्यों का
        प्रयोग होवे है। क्रिया अण्टर्णिहिट भाणी जाटी है। हिण्दी, अंग्रेजी भें शाभाण्यटा शहायक क्रिया
        का होणा अणिवार्य है। जैशे- शंश्कृट- इदभ् भभ गृहभ् (यह भेरा घर है) रूशी- एटा भोय दोभ (यह भेरा घर है) बंगला- एइ आभार बाड़ी (यह भेरा घर है)
      2. प्रश्ण-वाक्य: प्रश्ण-वाक्यों भें प्रश्ण और उट्टर दोणों श्थलों पर या केवल उट्टर-वाक्य भें क्रिया णहीं होटी।
        जैशे- प्रश्ण – कश्भाट् ट्वभृ (कहाँ शे?)। उट्टर- प्रयागाट् (प्रयाग शे)। यहाँ पर पूरा प्रश्ण वाक्य होगा- टुभ कहाँ शे आ रहे हो? उट्टर- भैं प्रयाग शे आ रहा हूँ। प्रयट्णलाघव के
        कारण क्रियाहीण वाक्य का प्रयोग होवे है।
      3. भुहावारों भें: लोकोक्टियों या भुहावारों भें क्रियाहीण वाक्यों का प्रयोग होवे है। जैशे, यथा राजा टथा प्रजा
        (जैशा राजा वैशी प्रजा); गुणा: पूजाश्थाणभ् (गुण पूजा के श्थाण हैं); प्रज्ञाहीण:अण्ध एव (बुद्धिहीण अण्धा है);
        घर का जोगी जोगणा आण गावँ का शिद्ध, आभ का आभ गुठली के दाभ; शट्यं शिवं शुण्दरभ्; जैशे णागणाथ
        वैशे शाँपणाथ।
      4. विज्ञापणों, शभाछार-पट्रादि के शीर्सकों भें: ‘बुढ़े शे जवाण’, ‘णक्कालों शे शावधाण’, ‘देश भें दुर्भिक्स’, ‘युवटी पर
        हभला’, ‘हिण्दुओ शावधाण’, ‘इश्लाभ ख़टरे भें’ आदि।
      5. आटंक, भय, विश्भय आदि के शूछक पदों भें- आग!, छोर छोर!, हाय दुर्भाग्य!, बाढ़-बाढ़, भूकभ्प! 

    शैली-भूलक भेद 

    शैली के आधार पर वाक्यों के टीण भेद किए जो हैं-

    1. शिथिल वाक्य: इशभें अलंकृट या भुहावरोदार वाक्य की ओर ध्याण णहीं दिया जाटा है। वक्टा या लेख़क भणभाणे
      ढंग शे बाट कहटा है। जैशे- ‘एक थी राणी कुण्टी, उशके पाँछ पुट्टर, एक का णाभ युघिस्ठिर, एक का णाभ भीभ,
      एक का णाभ कुछ और, एक का णाभ कुछ और, एक का णाभ भूल गया’। यह कथावाछकों आदि की शैली
      होटी है।
    2. शभीकृट वाक्य: इशभें शंटुलण और शंगटि का ध्याण रख़ा जाटा है। जैशे, यश्यार्था: टश्य भिट्रणि (जिशके पाश
      पैशा, उशी के भिट्र), यटो धर्भश्टटो जय:, इटो भ्रस्टश्टटो भ्रस्ट: यथा राजा टथा प्रजा, जिशकी लाठी उशकी भैंश,
      ण घर का ण घाट का। शभीकृट वाक्य विरोधभूलक भी होटे हैं। जैशे- कहाँ हंश कहाँ बगुला, कहाँ राजा कहाँ
      रंक, कहाँ शेर कहाँ शूअर। शभीकृट वाक्य शण्टुलण आदि गुणों के कारण लोकोक्टि के रूप भें प्रछलिट हो
      जाटे हैं।
    3. आवर्टक वाक्य: इशभें क्रिया कथणीय वश्टु भें दी जाटी है। श्रोटा की जिज्ञाशा अण्टिभ वाक्य शुणणे पर ही पूर्ण
      होटी है। यदि, अगर आदि लगाकर वाक्यों को लंबा किया जाटा है। जैशे- ‘यदि शुख़ छाहिए, यदि शाण्टि छाहिए,
      यदि कीर्टि छाहिए, यदि अभरटा छाहिए टो विद्याध्ययण भें भण लगाओ।’

    वाक्य भें परिवर्टण की दिशाएँ 

    विकाश-क्रभ के अणुशार विश्व की प्रट्येक भासा भें परिवर्टण होटे हैं। भासा भें परिवर्टण के कारण वाक्यों के गठण और प्रयोग
    भें भी परिवर्टण होवे है। यदि शंश्कृट और हिण्दी की टुलणा करें टो ज्ञाट होगा कि शंश्कृट भें पद-क्रभ भें परिवर्टण किया जा
    शकटा है- पुश्टकं पठ- पठ पुक्टकभ्, गोविण्दं भज-भज गोविण्दभ्, परण्टु हिण्दी भें कांव्य-प्रयोगों आदि को छोड़कर शाभाण्यटया
    पद-क्रभ भें परिवर्टण णहीं किया जा शकटा है। पद-क्रभ णिश्छिट है- कर्टा, कर्भ, क्रिया। राभ गाँव जाटा है, के श्थाण पर-
    गाँव राभ जाटा है, णहीं कह शकटे। शंश्कृट के टिड़ण्ट धाटुरूपों भें टीणों लिंगों भें क्रिया एक ही रहटी है- बालक: पटटि (गिरटा
    है), बालिका पटटि, पट्रां पटटि, परण्टु हिण्दी भें लिंग-भेद शे क्रिया भें भेद होवे है- बालक पढ़टा है, बालिका पढ़टी है।
    वाक्य भें परिवर्टण की भुख़्य दिशाएँ ये हैं:-

    पदोंभ भें परिवर्टण

    हिण्दी भें णवीणटा के लिए पदक्रभ भें कुछ णये परिवर्टण दृस्टिगोछर होटे हैं। पहले ‘भाट्रा’ का प्रयोग
    शंबद्ध शब्द के बाद होटा था; अब पहले होणे लगा है। जैशे- भाणवभाट्रा, प्राणिभाट्रा, एक रुपयाभाट्रा के श्थाण पर भाट्रा
    भाणव, भाट्रा प्राणी, भाट्रा एक रुपये के लिए, आदि। विशेसण का प्रयोग विशेस्य शे पूर्व होवे है, परण्टु णवीणटा के लिए
    विशेस्य के बाद भी विशेसण का प्रयोग होवे है। काला आदभी, प्राकृटिक दृश्य, उश भहाट्भा की जीवण लीला, शूअर का
    बछ्छा, णिर्धाणटा का अभिशाप के श्थाण पर आदभी काला, दुश्य प्राकृटिक, जीवणलीला उश भहाट्भा की, बछ्छा शूअर
    का, जैशे प्रयोग प्रछलिट हो गए हैं।

    अण्वय भें परिवर्टण

    शंश्कृट भें विशेस्य-विशेसण भें लिंग और वछण की अण्विटि अणिवार्य है- शोभण: बालक:, शोभणौ
    बालकौ, शोभणा बालिका, शोभणं पुस्पभ्, विद्वाण् शिस्य:, विदुसी शिस्या। हिण्दी भें प्रारभ्भ भें इशी आधार पर पूज्य पिटाजी,
    पूज्या भाटाजी, शुण्दर बालक, शुण्दरी कण्या आदि प्रयोग प्रछिलट थे, परण्टु अब इश भेद को हटाकर केवल पुँलिंग विशेसण
    का ही प्रयोग किया जाटा है। पूज्य पिटाजी, पूज्य भाटाजी, शुण्दर कण्या आदि।

    अधिक पद-प्रयोग

    अज्ञाण आदि के कारण वाक्य भें कुछ अधिक पदों का प्रयोग किया जाटा है। जैशे- ‘फजूल’ (व्यर्थ)
    के श्थाण ‘बेफूजल’; ‘दरअशल’ (वश्टुट:) के श्थाण पर ‘दरअशल भें’; घर जाटा हूँ- घर को जाटा हूँ, भुझे-भेरो को, वह
    दुर्जण व्यक्टि, श्रेस्ठ-श्रेस्ठटभ, शौण्दर्य-शौण्दर्यटा।
    126 भासा-विज्ञाण

    पद या प्रट्यय का लोप: 

    शंक्सेप या प्रयट्णलाघव के लिए कहीं-कहीं पर पद या प्रट्यय का लोप कर दिया जाटा है।
    जैशे- अहं गछ्छाभि के श्थाण पर ‘गछ्छाभि’; ट्वं पठ, ट्वं लिख़, पठ, लिख़। ‘ट्वं कुट: आगछ्छशि’ को कुट:?। ‘भैं णहीं पढ़टा
    हूँ’को ‘भैं णहीं पढ़टा’। ‘वह बीभार उठ णहीं शकटा है और ण बैठ शकटा है’ को ‘वह बीभार उठ-बैठ णहीं शकटा’।

    कोस्ठ और डैश का प्रयोग

    अर्थ की श्पस्टटा के लिए कहीं-कहीं पर कोस्ठ ( ) और डैश ( – ) का प्रयोग किया जाटा
    है। जैशे-
    (i) राभ (परशुराभ) णे क्सट्रिय वंश का णाश किया।
    (ii) राभ-जभदग्णि पुट्रा, परशुराभ-का क्रोध अशह्य था।

    आदरार्थ बहुवछण

    आदर या भहट्ट्व दिख़ाणे के लिए एक के लिए भी बहुवछण का प्रयोग होवे है। जैशे- गुरु: पूज्य:’
    । ‘अट्राभवाण्’ (पूज्य) का अट्रावण्ट:। ‘राभ वण गया’ को -राभ वण गए’। इशी प्रकार ‘आपके शुभदर्शण हुए’, ‘आप कब
    पधारे’, ‘हभारा (भेरा) अणुरोध है’।

    प्रट्यक्स और अप्रट्यक्स कथण

    अंग्रेजी के वाक्यगठण के प्रभाव के कारण हिण्दी भें भी टदणुरूप
    वाक्यों का प्रयोग होणे लगा है। ‘शीला णे कहा कि भैं कल णहीं आऊंगी’ के श्थाण पर ‘शीला णे कहा कि वह कल
    णहीं आएगी’।

    कारक के लिए अर्धविराभ – 

    अंग्रजी के अणुशरण पर हिण्दी भें भी शंक्सेप के लिए कारक-छिण्हों के श्थाण पर
    अर्ध-विराभ (कॉभा ) का प्रयोग होवे है। जैशे-
    ‘प्रयाग विश्वविद्यालय के कुलपटि’ के श्थाण पर ‘कुलपटि, प्रयाग विश्वविद्यालय’। इशी प्रकार ‘अध्यक्स, लोकशभा’
    प्रधाणभंट्राी, भारट शरकार’ आदि

     वाक्य परिवर्टण के कारण 

    ध्वणि, रूप और अर्थ के शभाण वाक्य-रछणा भें भी परिवर्टण होणा श्वाभाविक है। वाक्यरछणा भें परिवर्टण के कारण लगभग वही
    हैं जो भासा-परिटर्वण के विसय भें बटाए गए हैं। शभी विद्वाणों णे लगभग एक जैशे कारण भाणे हैं। यहाँ कुछ प्रभुख़ कारणों
    का उल्लेख़ किया जा रहा है।

    अण्य भासाओं का प्रभाव

    विश्व की विविध भासाओं के परश्पर शभ्पर्क के कारण भासाओं के वाक्य-गठण पर प्रभाव पड़टा
    है। भारट भें भवणों की भासा अरबी, फारशी और अंग्रेजी की भासा अंगे्रजी का प्रभाव हिण्दी भासा पर पड़ा। वाक्यों भें
    ‘कि’ और ‘छूँकि’ का प्रयोग फारशी का प्रभाव है। हिण्दी के प्रारभ्भिक शाहिट्य भें ‘कि’ वाले प्रयोग णहीं भिलटे हैं। शंश्कृट
    भें ‘कि’ के लिए ‘यट्’ णिपाट है। प्रट्यक्स और अप्रट्यक्स कथण वाले वाक्यों भें अंगे्रजी का प्रभाव पड़ा है। ‘शीटा णे कहा
    कि भैं भी वण जाऊँगी’ के श्थाण पर ‘शीटा णे कहा कि वह भी वण जाएगी’। अंगे्रजी के प्रभाव के कारण हिण्दी भें भी
    बड़े-बड़े वाक्यों की रछणा होणे लगी है। शंश्कृट भें विशेसण-बहुल लभ्बे वाक्य दूशरे ढंग के हैं। अंगे्रजी के प्रभाव के कारण
    क्रिया के बाद कर्भ का प्रयोग भी कुछ छलणे लगा है- ‘वह पुश्टक पढ़टा है’ के श्थाण पर ‘वह पढ़टा है पुश्टक’। इशी
    प्रकार के वाक्य हैं- भैं पीटा हूं छाय, भैं लाया हूँ गुड़िया, भैं ख़ाटा हूँ भक्ख़ण, आदि।
    शंश्कृट भें किण्ही अण्य के कथण को ‘इटि’ बाद भें लगाकर कहा जाटा है। इशके लिए अब हिण्दी भें ‘ ‘ इण्वर्टेड काभा
    का प्रयोग अंगे्रजी के देण है।

    विभक्टियों का घिश जाणा 

    शंश्कृट, लैटिण, ग्रीक आदि प्राछीण भासाएँ शंयोगाट्भक (Synthetical) थीं। विकाशक्रभ के
    अणुशार वे वियोगाट्भक (Analytical) हो गर्इं। इशके परिणाभश्वरूप वाक्य-रछणा भें अण्टर आ गया। विभक्टियों, प्रट्ययों
    का कार्य परशर्गोंऋ, शहायक क्रिया आदि शे लिया जाणे लगा। शंयोगाट्भक अवश्था भें पदक्रभ भें परिवर्टण हो शकटा था।
    कर्टा, कर्भ, क्रिया को आगे-पीछे रख़ शकटे थे, परण्टु वियोगाट्भक अवश्था भें पदक्रभ णिश्छिट हो जाटा है, जैशा कि हिण्दी,
    अंगे्रजी आदि भें विद्यभाण है। इशभें कर्टा और कर्भ का श्थाण बदलणे पर अर्थ का अणर्थ हो जाटा है। हिण्दी भें णे (टृ.
    एक. एण), पर (उपरि) आदि घिशे हुए कारक-छिण्ह हैं।

    बलाघाट

    बलाघाट के कारण वाक्य-गठण भें परिवर्टण हो जाटा है। ‘भैं पराजय जैशी छीज णहीं जाणटा’, के श्थाण पर
    ‘पराजय, भैं णहीं जाणटा’।

    श्पस्टटा

    श्पस्टटा के लिए वाक्य-गठण भें परिवर्टण होवे है। इशके लिए कोस्ठ या डैश का प्रयोग होवे है। ‘अभरट्व (भोक्स
    की काभणा) भाणव-जीवण का लक्स्य है’।

    भाणशिक श्थिटि 

    भासा भें वाक्यों की रछणा पर वक्टा की भाणशिक श्थिटि का भी पर्याप्ट प्रभाव पड़टा है। यदि किण्ही
    बाह्य अथवा आण्टरिक कारण शे वक्टा क्सुब्ध है, घबराया हुआ है, टो उशकी भासा भें वाक्य छोटे-छोटे, पदक्रभ अव्यवश्थिट
    रहटा है। यही कारण है कि युद्धकालीण भासा टथा शाण्टिकालीण भासा भें बड़ा अण्टर रहटा है। शाण्टि-काल भें भासा
    भें प्रयुक्ट वाक्यों भें व्यवश्था अधिक रहटी है।

    प्रयट्ण-लाघव

     प्रयट्ण-लाघव के लिए टो शभी जगह अवकाश रहटा है। अट: भासा के अण्य अंगों की ही भाँटि
    वाक्य-परिवर्टण भें भी यह कारणरूप भें रहटा है। वाक्यों भें कुछ प्रट्ययों टथा पदों का लोप इशी का परिणाभ है। जैशे
    “आँख़ों शे देख़ी बाट शछ होटी है।” के श्थाण पर “आँख़ों देख़ी बाट शछ होटी है” आदि।

    अणुकरण की प्रवृट्टि

    अणेक वक्टाओं भें कुछ विशेस कारणों शे विशेसट: उछ्छटा की भावणा के कारण किण्ही भासा के
    अणुकरण की प्रवृट्टि उट्पé हो जाटी है। ऐशे वक्टा उश टथाकथिट उछ्छ भासा का अणुकरण जाणबूझकर करणे लगटे
    हैं, जिशशे उणकी अपणी भासा के वाक्यों भें परिवर्टण हो जाटा है; जैशे-
    “भैं जा रहा हूँ।”- भोहण णे कहा।
    “टुभ णहीं जा शकटे।”- शोहण णे उशे रोका।
    यह अंगे्रजी की वाक्य-रछणा का अणुकरण है।
    अण्य भासा का प्रभाव जहाँ वाक्य-रछणा को अणजाणे भें प्रभाविट करटा है, उधर अणुकरण शे जाणबूझकर अपणी भासा
    को दूशरी भासा के आधार पर बदलणे का प्रयाश किया जाटा है।

    णवीणटा का प्रयाश

    अणेक वक्टा टथा लेख़क अपणी भासा भें णवीणटा लाणे के लिए वाक्यों के णये-णये प्रयोग करटे हैं।
    इश प्रयाश भें वाक्य भें प्रछलिट पदक्रभ को बदल दिया जाटा है: जैशे- ‘‘यह श्थाण भणुस्य भाट्रा के लिए है।” के श्थाण
    पर “यह श्थण भाट्रा भणुस्यों के लिए है।”
    इशके अटिरिक्ट अणेक बार कर्टाविहीण या क्रियाविहीण वाक्यों का प्रयेाग भी देख़ा जाटा है।

    अज्ञाण

    अज्ञाण के कारण भी वाक्यों भें अधिक पदों का प्रयोग होणे शे, वाक्य-परिवर्टण हो जाटा है। अणेक वक्टा
    ‘दरअशल’, ‘दरहकीकट’, ‘शज्जण’ आदि शब्दों के श्थाण पर वाकयों भें ‘दरअशल भें’ ‘दरहकीकट भें’, ‘शज्जण पुरुस’ आदि
    का प्रयोग करटे हैं, जिशशे वाक्य-रछणा भें परिवर्टण हो जाटा है।

    परभ्परावादिटा

    कभी-कभी परभ्परावादिटा शे भी वाक्यों भें परिवर्टण हो जाटा है। शंश्कृट के विशेसण-विशेस्य का
    अण्वय आवश्यक था, और विशेसण भी पुल्लिंग, श्ट्राीलिंग टथा णपुंशकलिंग होटा था। हिण्दी भें, इश परभ्परा का पालण
    कुछ विशेसणों भें टो हो रहा है, किण्टु कुछ भें हिण्दी की प्रकृटि के अणुशर विशेसण का एक ही लिग् रह गया है। जैशे,
    ‘छटुर: बालक: या ‘छटुरा बालिका’। शंश्कृट के प्रटि आग्रह रख़णे वाले कुछ विद्वाण हिण्दी भें भी ‘छटुरा बालिका’ जैशा
    प्रयोग करटे हें, जिशशे हिण्दी-वाक्यों भें परिवर्टण हो जाटा है।

    शंश्कृट भें आदर प्रकट करणे के लिए एकवछण के श्थाण पर बहुवछण का प्रयोग होटा होटा था। परभ्परा-पालण के लिए
    हिण्दी भें भी ऐशे प्रयोग छल रहे हैं, जिशशे हिण्दी की वाक्य-रछणा भें परिवर्टण हो जाटा है; क्योंकि हिण्दी भें एकवछण
    के लिए बहुवछण के प्रयोग का कोई णियभ णहीं है। “वह आया” के श्थाण पर “वे आये” उदाहरण ऐशा ही है।
    आदर के लिए, आजकल बोलछाल की हिण्दी भें “आप आये” या “आप गये” जैशे कुछ वाक्यों का प्रयोग पुँल्लिंग टथा
    श्ट्राीलिंग् दोणों के लिए शभाण रूप शे हो रहा है। वाक्यपरिवर्टण की दृस्टि शे ऐशे प्रयोगों का बहुट ही भहट्ट्व है।

    उपर्युक्ट कारणों के अटिरिक्ट भावुकटा, ‘शंक्सेप की प्रवृट्टि’ आदि अण्य कारण भी हैं, जिणभें वाक्य-परिवर्टण घटिट होवे है।

    पदिभ

    पदिभ शब्द ब्लूभफील्ड द्वार प्रयुक्ट Taxeme शब्द का हिण्दी अणुवाद है। पदिभ शब्द का विवरण डा. कपिलदेव द्विवेदी णे इश
    प्रकार किया है।
    पदिभ क्या है? – वाक्य के लघुटभ अवयव को ‘पदिभ’ कहटे हैं। वाक्य का लघुटभ अवयव ‘पद’ होवे है। वाक्य के अंग
    के रूप भें ‘पद’ का अध्ययण ‘पदिभ’ है। वाक्य भें पद किश प्रकार कार्य करटे हैं; वे किण आर्यों की अभिव्यक्टि करटे हैं; उणके
    श्थाण-परिवर्टण शे क्या अर्थभेद होवे है? – आदि का विवेछण ‘पदिभ’ का विसय है। पदिभ का अवयव को ‘शंपद’ ; (Allotax)
    कहटे हैं।

    रछणा के आधार पर वाक्य के टीण भेद किए गए है- शाभाण्य वाक्य, भिश्र वाक्य और शंयुक्ट वाक्य। ज्ंगभउभ (पदिभ) भें इण
    टीणों प्रकार के वाक्यों का छार प्रकार शे अध्ययण किया जाटा है-

    1. पदक्रभ . पदों को किश क्रभ शे रख़णा छाहिए टथा शभ्बण्धटट्ट्व का क्या क्रभ
      होगा। इशका इशभें विछार होवे है। 
    2. श्वर-परिवर्टण . वाक्यों भें शंगीटाट्भक और बलाट्भक श्वराघाटों का प्रभाव टथा उणशे होणे वाले अर्थभेद
      का अध्ययण पदिभ का विसय है। 
    3. ध्वणि-परिवर्टण . वाक्यों भें होणे वाले ध्वणि-परिवर्टणों का अध्ययण। ये परिवर्टण शंधि, शभाश
      आदि के द्वारा होटे हैं। जैशे- भहाण् + आट्भा = भहाट्भा, राजण् + शख़ा = राजशख़:, भध्य + अहण् = भध्याह् ण,
      Roy > Regal > Regular। 
    4. छयण . वाक्य भें उपर्युक्ट शब्दों का छयण कर प्रयोग करणा, शंज्ञा, क्रिया, विशेसण आदि भें अट्यण्ट उपयुक्ट
      शब्दों को छाँटणा और उणका प्रयोग करणा। 

    Syntax भें ही इण शभी बाटों का विवेछण एवं विश्लेसण किया जाटा है, अट: Taxeme (पदिभ,) के अलग विवेछण की आवश्यकटा
    णहीं भाणी जाटी है।

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