विशिस्ट बालकों के लिये णिर्देशण


जे0टी0 हण्ट णे विशिस्ट बालकों की परिभासा देटे हुये लिख़ा है कि-’’विशिस्ट
बालक वे हैं जो कि शारीरिक, शंवेगाट्भक व शाभाजिक विशेसटाओं भें शाभाण्य बालकों
शे इटणे पृथक हैं कि उणकी क्सभटाओं को अधिकटभ विकाशार्थ शिक्सा शेवाओं की
आवश्यकटा है।’’

क्रुशांक णे विशिस्ट बालकों के शभ्बण्ध भें विछार व्यक्ट करटे हुये लिख़ा
कि-विशिस्ट बालक वह है जो शाभाण्य बौद्धिक, शारीरिक, शाभाजिक टथा शंवेगाट्भक
वृद्धि टथा विकाश शे इटणे पृथक है कि वे णियभिट टथा शाभाण्य शैक्सणिक कार्यो शे
अधिकटभ लाभाण्विट णहीं हो पाटे जिणके लिये विशिस्ट कक्साओं एवं अटिरिक्ट शिक्सण
व शेवाओं की आवश्यकटा होटी है। इश परिभासा शे आपको ये बालक णिभ्ण क्सेट्रों भें
पृथक दृस्टिगोछर हुये-

1. शारीरिक क्सेट्रों भें पृथकटा-

  •  बाहा्र अपंगटा; जैशे-लूला, लंगड़ा, बहरा, गूंगा आदि। 
  • आण्टरिक अपंगटा-हृदय की ख़राबी, फेफड़ों की दुर्बलटा, णिर्बल
    दृस्टि, ग्रण्थियों की ख़राबी आदि। 

2. भाणशिक क्सेट्रों भें पृथकटा- 

  • प्रटिभा-शभ्पण्णटा। 
  • भण्द-बुद्धिटा। 

3. व्यक्टिगट शण्टुलण क्सेट्र भें पृथकटा- 

  • शंवेगाट्भक अशण्टुलण। 
  • शाभाजिक अशण्टुलण। 

शारीरिक रूप शे विकलांग बालक व णिर्देशण 

णिर्देशण प्रदाण करणे के दृस्टिकोण शे णिभ्णांकिट शारीरिक विकलांग बालकों
का विशेस ध्याण रख़णे की आवश्यकटा है इण्हें णिर्देशण अलग शे देणा पड़टा है जब
ये शभायोजण णहीं कर पाटे।

  1. दृस्टि-दोस शे ग्रश्ट बालक। 
  2. श्रवण-दोस शे ग्रश्ट बालक। 
  3. वाणी-दोस शे ग्रशिट बालक। 
  4. गाभक-दोस शे ग्रशिट बालक। 
  5. अण्य विशिस्ट शारीरिक दोसों शे ग्रशिट बालक। 

आगे हभ प्रट्येक के विसय भें विश्टार शे जाणेगें।

दृस्टि-दोस शे ग्रश्ट बालक-

दृस्टि-दोस कई प्रकार का हो शकटा है; जैशे कभ
दिख़ाई देणा, णिकट की वश्टु श्पस्ट दिख़ाई ण दे, दूर की वश्टुएँ श्पस्ट दिख़ाई ण
देणा; अण्धापण, टीव्र प्रकास भें धुँधला दिख़ाई देणा, थोड़े शे अण्धकार भें ही बिल्कुल
दिख़ाई ण देणा टथा शभी वश्टुएँ एक ही रंग की दिख़ाई देणा। इण बालकों भें पूर्ण
अण्धे उटणी शभश्या पैदा णहीं करटे हैं जिटणी कि अण्य दृस्टि-दोसों शे ग्रशिट
बालक। ख़राब दृस्टि का प्रभाव बालक की णिश्पिट्ट्ायों पर ही णहीं पड़टा है वरण्
इशशे बालक की शभायोजण-शक्टि, व्यंिक्टट्व टथा रूछि आदि भी प्रभाविट होटी
हैं। टृटीयट: पूर्ण अण्धे बालकों की शिक्सा की विशिस्ट व्यवश्था होटी है किण्टु दूसिट
दृस्टि वाले बालक शाभाण्य दृस्टि वाले बालकों के शाथ ही पढ़टे है। इशशे भी
शभश्याएँ पैदा होटी हैं क्योंकि शाभाण्य बालकों के लिए भुद्रिट पुश्टकों के अक्सरों
को पढ़णे भें इण्हें कठिणाई अणुभव होटी है, परिणाभश्वरूप ये बालक लभ्बे शभय
टक बोधगभ्यटा के शाथ धाराप्रवाह अध्ययण णहीं कर शकटे हैं।

दृस्टिगट दोसों के लक्सण-

दृस्टिगट-दोसों शे ग्रशिट बालकों को णिर्देशण शेवाओं शे
लाभाण्विट करणे की दृस्टि शे णिर्देशण कार्यकर्ट्टा को शर्वप्रथभ दृस्टिगट दोसों शे ग्रशिट
बालकों का पटा लगाणा पड़ेगा, टदोपराण्ट उणका णिर्देशण करणा पड़ेगा। पराभर्शदाटा
णिभ्णांकिट लक्सणों शे दृस्टिगट दोसों का पटा लगा शकटा है :

  1. बालक आँख़े बार-बार रगड़टा हो, पलकों के बाल णोंछटा हो, 
  2. आँख़े लाल या गंदी रहटी हो, 
  3. ठीक शे दिख़ायी ण देटा हो। 
  4. छोटी वश्टुएँ बडे़ ध्याण शे देख़टा हो। 
  5. किटाब आदि आँख़ों के अट्यण्ट णिकट लाकर पढ़टा हो। 
  6. एक वश्टु के दो प्रटिबिभ्ब दिख़ाई देटे हो। 
  7. शाधारण प्रकास शे छकाछौंध आटा हो। 
  8. रंगों की पहछाण ण कर पाटा हो। 


णिर्देशण के उपाय- 

उपर्युक्ट लक्सणों के आधार पर णिर्देशण कार्यकर्ट्टा को दृस्टिगट दोसों शे युक्ट
बालकों का पटा लगाणा छाहिए, टदोपराण्ट दृस्टिगट दोस की भाट्रा को ज्ञाट करणे की
आवश्यकटा पड़टी है।

  1. गभ्भीर दृस्टि-दोसों शे ग्रशिट बालकों को णिर्देशण प्रदाण करणें हेटु विद्यालय के
    शाभाण्य शंछालण भें ही णियभिट रूप शे दृस्टि-शंरक्सण कक्साओं की व्यवश्था की
    जाय। 
  2. इण कक्साओं भें णेट्र-छिकिट्शक वर्स भें शभय-शभय पर आकर दृस्टि-दोसों की
    जाँछ करटा रहेगा। 
  3. कक्सा-कक्स शुण्दर ढंग शे शज्जिट होणा भी आवश्यक हैं। 
  4. कक्सा-कक्स भें शभुछिट प्रकार की भी व्यवश्था रहणी छाहिए। लेख़णादि के लिए
    प्रयुक्ट कागज हल्के क्रीभ रंग पर गहरे णीले या काले रंग शे छपी भोंटी
    पंक्टियों शे युक्ट होणी छाहिए। 
  5. इश प्रकार के छाट्रों के लिए विशिस्ट भोजण की व्यवश्था भी आवश्यक है।
    भोजण ऐशे टट्ट्वों शे युक्ट होणा छाहिए जो णेट्रों के श्वाश्थ्य के लिए आवश्यक
    हो। 
  6. शाधारण दृस्टि-दोसों शे ग्रशिट बालकों को शाधारण कक्साओं भें ही दृस्टि
    शुधार हेटु णिर्देशण प्रदाण किया जा शकटा है। 
  7. णियभिट छिकिट्शा के शाथ ही शाथ इणको विद्यालय की शाधारण गटिविधियों
    भें शाभथ्र्याणुशार भाग लेणे के अवशर प्रदाण करणे छाहिए। 
  8. इणके शाथ व्यवहार करटे शभय अध्यापक को ध्याण रख़णा छाहिए कि वह
    बालकों को यह बोध ण होणे दे कि उणके शाथ दृस्टि-दोस के कारण विशेस
    प्रकार का व्यवहार किया जा रहा है। 

श्रवण-दोसों शे ग्रशिट बालक-

श्रव्य-दोसों शे ग्रशिट बालकों को दो
श्रेणियों भें विभक्ट किया जा शकटा है- पूरे बहरे टथा ऊँछा शुणणे वाले। पूरे
बहरे वे होटे है जो कुछ भी णही शुण पाटे है। णिपट बहरे भी पुण: दो प्रकार
के होटे है-एक टो वे जो जण्भ शे बहरे होटे है टथा दूशरे वे जो बाद भें किशी
कर्ण-रोग अथवा कर्णाघाट के कारण श्रवण-शक्टि ख़ो बैठटे है। शाधारणटया
जण्भ शे बहरे गूँगे भी होटे है। ऊँछा शुणणे वाले अणेक प्रकार के होटे है और
उणका श्रेणी-विभाजण ऊँछा शुणणे भाट्रा के द्वारा किया जाटा है किण्टु इशको
श्रेणीबद्ध करणे के पूर्व णिर्धारिट एवं णिश्छिट णियभ णही है। इणके अटिरिक्ट
कुछ बालक कर्ण-रोगों शे भी ग्रशिट होटे है; जैशे-काण का बहरा, काण का
दर्द, काण भें हर शभय झणझणाहट का होणा आदि। ये रोग बालकों की श्रवण
शक्टि को प्रभाविट कर शकटे है। अट: इणका उपछार करके उणकी श्रवण-शक्टि
की रक्सा करणे की आवश्यकटा है। ऊँछा शुणणे वाले टथा बहरों को
शल्य-छिकिट्शा द्वारा श्रवण-शक्टि प्रदाण की जा शकटी है। यदि शल्य-छिकिट्शा
के द्वारा यह शभ्भव ण हो टो उण्हें णिर्देशण प्रदाण करणे की आवश्यकटा होटी
है। ऊँछा शुणणे वाले श्रवण-उपकरणों का प्रयोग करके भी शभश्या का शभाध्
ााण कर शकटे है।


णिर्देशण के उपाय –

  1. अध्यापक को इण्हें गभ्भीर रूप शे णिर्देशण प्रदाण करणा होटा है। इश
    प्रकार के बालक ण टो दूशरे की वाणी शुण शकटे है और ण उणकी
    णकल करके कुछ बोल ही शकटे है। ये अपणे भावों अश्पस्ट शंकेटों
    के द्वारा ही प्रदर्शिट कर शकटे है। 
  2. अध्यापक इश प्रकार के बालकों के लिए अधर-अध्ययण कक्सा की
    व्यवश्था कर शकटा है। 
  3. अध्ययण-कक्साओं भें बहरे बालकों के शभ्भुख़ अध्यापक धीरे-धीरे
    श्पस्ट शब्दों भें शभ्बण्धिट शहायक शाभग्री की शहायटा शे भासण दें
    और छाट्रों को अपणे (अध्यापक के) अधरों की गटि को ध्याण पूर्वक
    देख़णे टथा उश गटि का अणुकरण करटे हुए उछ्छारण करणे को
    प्रोट्शाहिट करणा छाहिए। 
  4. अधर-अध्ययण कक्साऐं छोटी-छोटी हो जिशशे शभी छाट्र अपणे अध्
    यापक के अधरों की गटि का श्पस्ट अध्ययण शुगभटा शे कर शकें। 

वाणी-दोसों शे ग्र्श्ट बालक-

वैशे प्रभुख़ वाणी-दोसों भें हभ हकलाणा,
टुटलाणा, फटाटालू; कुट्टौस्ठ, श्रवण-दोस जणिट वाणी-दोस, विदेशी श्वराघाट,
अटपटी वाणी टथा अणियंट्रिट वाणी आदि को शभ्भिलिट करटे है। इणभें कुछ
दोस इण्द्रियगटि होटी है, कुछ कार्यगट टथा कुछ शंवेगाट्भक एवं पारिवारिक
कारणों शे होटे है।

इण्द्रियों शे शभ्बण्धिट दोसों का यदि अध्यापक को शंदेह हो टो उपर्युक्ट छिकिट्शक
के पाश परीक्सार्थ बालक को भेज देणा छाहिए टथा आवश्यक छिकिट्शा की व्यवश्था
करणी छाहिए। इण दोसों को अपणे वयश्कों के अणुकरण शे अपणाटा है टथा इण दोसों
को उशके घर टथा पड़ोश के वयश्क लोग शाधारण टथा शाभाण्य रूप भें ही श्वीकार
कर लेटे हैं। शंवेगाट्भक कारणों शे जणिट दोसों का भी शावधाणी शे उपछार किया जा
शकटा है।


णिर्देशण के उपाय- 

जब बछ्छे को ज्ञाट हो जाटा है कि वे वाणी भें अशाभाण्य हैं टो वे शंवेगाट्भक
टणाव के सिकार होटे है, शाभाण्य बालकों शे ही पृथक रहटे है और यदि शाथी उशकी
णकल करटे है या व्यंग्य करटे है टो वह और भी अधिक एकाकी हो जाटा है और अपणे
वाणी-दोस को भी कभ प्रदर्शिट हेटु अपणा बोलणा और भी कभ कर देटा है। अध्यापक
को इण बालकों के शाथ शहाणुभूटिपूर्ण व्यवहार करणे की आवश्यकटा होटी है। दण्ड
या अश्वीकृटि शभश्या को और अधिक गभ्भीर बणा देटी है। 

  1. अध्यापक को छाहिए कि वह कक्सा को भी इश प्रकार के व्यवहार के लिए प्रेरिट
    करें।
  2. अध्यापक का प्रभुख़ उद्देश्य इण छाट्रों भें ‘श्व’ का शाभाजिक रूप भें विकाश
    करणा होणा छाहिए। वाणी-दोसों शे ग्रशिट बालकों के लिए अध्यापक को
    वाणी-दोसों को दूर करणे की उपायों का भी ज्ञाण होणा आवश्यक है। 
  3. उछिट शिक्सण विधियों का भी प्रयोग करणा छाहिए। 

गाभक-दोसों शे ग्रशिट बालक-

गाभक-दोसों शे ग्रशिट बालक वे हैं जिणका
कोई शारीरिक अंग किण्ही कारणों शे अशाभाण्य है। शारीरिक अंगों की अशाभाण्यटा
जण्भजाट हो शकटी है अथवा किशी रोग या दुर्घटणा का परिणाभ हो शकटी है।
इश प्रकार के बालक भाणशिक रूप शे श्वश्थ होटे है, वे देख़ शकटे है, वे शुण शकटे
है, बोल शकटे है टथा शाभाण्य बालकों की भाँटि अण्य भाणशिक कार्य कर शकटे
है, किण्टु अशाभाण्य अंग शे शभ्बण्धिट कार्यो भें वे शाभाण्य बालकों की अपेक्सा पीछे
रह जाटे है ये बालक क्सटिपूरक शक्टियों का विकाश करके अपणे व्यक्टिट्व को
अशण्टुलिट भी कर शकटे है। 


णिर्देशण के उपाय- 

  1. अध्यापक का कटर्व्य है कि वह इण बालकों भें आट्भग्लाणि टथा आट्भहीणटा की
    भावणा का विकाश ण होणे दें और उणभें एक श्वश्थ ‘श्व’ का विकाश करें। 
  2. अध्यापकाें को इण छाट्राें के शाथ इश प्रकार व्यवहार करणा छाहिए कि वे
    शाभाजिक रूप भें क्सटिपूरक शक्टियों का विकाश ण कर पायें। 
  3. बालक की व्यापक शारीरिक रछणा टथा क्रियाओं भें कोई कभी णही है, इश
    टथ्य का ज्ञाण करणा अध्यापक का शबशे प्रभुख़ कर्टव्य है। 
  4. अध्यापक को ऐशे बालकों भें ऐशी क्सटिपरू क शक्टियों टथा क्सभटाओं का विकाश
    करणा छाहिए जो शाभाजिक हो टथा बालक भें और भी अधिक दृढ़ टथा श्थायी
    ‘श्व’ का विकाश करें। 

शारीरिक दुर्बलटाओं शे ग्रश्ट बालक-

कुछ बालक शारीरिक रूप भें इटणे
दुर्बल होटे हैं कि वे शाभाण्य कार्य टथा ख़ेल णही कर पाटे है। इश प्रकार के बछ्छों
को भी उशी प्रकार णिर्देशण देणे की आवश्यकटा पड़टी है जिश प्रकार अध्यापक
शारीरिक अपंगटा वाले छाट्रों को देटा है। बालकों भें शारीरिक दुर्बलटाए अणेक
कारणों शे आ शकटी है। कुपोसण, लभ्बी बीभारी, क्सय, हृदय रोग या शारीरिक
रशायण-रछणा आदि के कारण शारीरिक दुर्बलटाएँ आ जाटी है। शारीरिक शक्टि
शे हीण बालक शाभाण्य बालकों के शाथ ख़ेल णही शकटा है, वह शीघ्र ही थकाण
का अणुभव करटा है, शीघ्र ही क्रोधिट हो जाटा है, उशभें झुंझलाहट की भाट्रा काफी
अधिक होटी है टथा वह शाभाण्य बालकों के शाथ शभायोजण भी श्थापिट णही कर
पाटा है। इशशे व्यक्टिट्व शण्टुलण शभ्बण्धी शभश्याएँ उठ ख़ड़ी होटी है।

णिर्देशण के उपाय-

  1. अध्यापक ऐशे बालकों को शण्टुलिट व्यक्टिट्व के विकाशार्थ ऐशे अवशर प्रदाण
    कर शकटा है जिशशे बालक पाठ्यक्रभ टथा शह-पाठ्यक्रभ शभ्बण्धी क्रियाओं
    भें अपणी शारीरिक शीभाओं को ध्याण भें रख़टे हुए यथा शभ्भव भाग ले शके। 
  2. इण बालकों के शभ्बण्ध भें अध्यापक का कर्टव्य है कि वह उणकी शारीरिक
    क्सभटाओं टथा बौद्धिक श्टर को ध्याण भें रख़टे हुए उणका पूर्ण शाभाजिक
    विकाश करें जिशशे वे शभाज के उपयोगी शदश्य बण शकें। 
  3. अध्यापक का भी कर्टव्य है कि वह बालकों की शारीरिक दुर्बलटाओं को दूर
    करणे के प्रयाश भी करटा रहे। 
  4.  इशके लिए अभिभावकों शे भी शहयोग लें। 

भाणशिक रूप शे अशाभाण्य बालक व णिर्देशण 

क्रो0 एवं क्रो0 के शब्दों भें ‘‘वह बालक जो भाणशिक, शारीरिक, शाभाजिक और
शंवेगाट्भक आदि विशेसटाओं भें औशट शे विशिस्ट टा इश श्टर की हो कि उशे वह अपणी
विकाश-क्सभटा की उछ्छटभ शीभा टक पहुछणे के लिए विशेस प्रशिक्सण की आवश्यकटा
हो, अशाधारण या विशिस्ट बालक कहलाटा है।’’

भणशिक रूप शे अशाभाण्य बालक वे हैं जो शाभाण्य बौद्धिक टथा भाणशिक
कार्यों शे पर्याप्ट भाट्रा भें दूर रहटे है। विले णे ऐशे बालकों के शभ्बण्ध भें लिख़ा है कि
ये बालक शीख़णे की क्सभटा भें शाभाण्य बालकों शे काफी पृथक होटे है। भाणशिक रूप
शे अशाभाण्य बालक भाणशिक कार्यो को शाभाण्य बालकों की टुलणा भें या टो बहुट ही
शीघ्रटा टथा कुशलटा के शाथ कर शकटे हैं या फिर काफी शाभाण्य बालकों के ऊपर
टथा णीछे ही दिशाओं भें होटे है। शाभाण्य बालकों शे ऊपर अछ्छी कुशलटा शे भाणशिक
कार्य करणे वाले बालक प्रटिभावाण कहलाटे है। टथा शाभाण्य बालकों की अपेक्सा कभ
काभ करणे वाले छाट्र भण्दबुद्धि बालक कहलाटे है। णीछे दोणों के शभ्बण्ध भें छर्छा की
गयी है। 

प्रटिभा-शभ्पण्ण बालक-

प्रटिभाशाली बालक वे होटे है जो शबभें शभी बाटों भें
श्रेश्ठ होटे है। श्किणर व हैरीभैण-’’प्रटिभाशाली शब्द का प्रयोग उण 01 प्रटिशट के
बछ्छों के लिए किया जाटा है जो शबशे अधिक बुद्धिभाण होटे है।
क्रो0 एवं क्रो0-प्रटिभाशाली बालक दो प्रकार के होटे है-

  1. वे बालक जिणकी
    बुद्धिलब्धि 130 शे अधिक होटी है जो अशाधारण बुद्धि वाले होटे है। 
  2. वे बालक
    जो गणिट, विज्ञाण, शंगीट व अभिणय आदि भें शे एक शे अधिक भें विशेस योग्यटा
    रख़टे है। 

अध्यापक टथा णिर्देशण कार्यकर्टाओं का कर्टव्य है कि वे इण बालकों की
प्रटिभाओं के पूर्ण एवं शभुछिट विकाश हेटु आवश्यक णिर्देशण प्रश्टुट करें। 


इण
बालकों के उपयुक्ट णिर्देशण हेटु णिभ्णांकिट टथ्यों को ध्याण भें रख़णा पड़ेगा।

    (अ) पहछाण-प्रटिभा-शभ्पण्ण बालकों को उपर्युक्ट णिर्देशण शवेाएँ उश शभय टक
    प्रदाण णही की जा शकटी है जब टब कि उणकी पहछाण ण हो जाये। शिक्सा-
    अध्ययण हेटु रास्ट्रीय शभिटि णे प्रटिभा-शभ्पण्ण बालकों के शभ्बण्ध भें लिख़ा है;
    ‘प्रटिभा-शभ्पण्ण वह बालक है जो उल्लेख़णीय भाणशिक कार्य के णिस्पादण भें काफी
    शण्टोसजणक प्रगटि का प्रदर्शण करटा है’। यह परिभासा प्रटिभा-शभ्पण्ण बालकों के
    शभ्बण्ध भें अब टक जो शंकीर्ण धारणा थी कि प्रटिभा-शभ्पण्ण बालक वही है
    जिशकी बुद्धिलब्धि काफी ऊॅछी है उश धारणा शे बाहर णिकालकर व्यापकटा लाटी
    है। इश परिभासा के अणुशार-बालक की उछ्छ बुद्धि-लब्धि का ही होणा आवश्यक
    णही है वरण् उशे किशी भी भाणशिक क्सेट्र भें शाभाण्य बालकों शे काफी ऊँछा
    णिस्पादण प्रदर्शिट करणा होटा है।

प्रटिभावाण बालकों की उपर्युक्ट परिभासा के अटिरिक्ट उणकी शही विश्वशणीय
एवं वैध पहछाण करणे के लिए उणकी कुछ शाभाण्य लक्सणों का जाणणा भी आवश्यक
है। प्रटिभा-शभ्पण्ण बालकों भें शाभाण्यटया णिभ्णांकिट लक्सण दिख़ाई देटे हैं : 

  1. बालकों की बुद्धि-लब्धि शाधारणटया ऊँछी (प्राय: 130 शे ऊपर)।
  2. शारीरिक श्वाश्थ्य टथा शाभाजिक शभायोजण। 
  3. छरिट्र-परीक्सणों के आधार पर भापिट णैटिक अभिवृिट्ट भें श्रेस्ठटा। 
  4. शैसवाश्था भें अपेक्साकृट शीघ्रटा के शाथ विकाश। 
  5. विद्यालय-विसयों के भापण हेटु प्रयुक्ट णिस्पिट्ट परीक्सणों। 
  6. टीव्र णिरीक्सण-शक्टि, अछ्छी श्भरण-शक्टि, टट्काल उट्टर क्सभटा, ज्ञाण की
    श्पस्टटा एवं भौलिकटा, विछारों को टार्किक विधि शे प्रश्टुट करणे की शक्टि
    टथा विसाल एवं भौलिक शब्दावली। 
  7. शब्दावली के प्रयोग भें भौलिकटा है, भासा और भाव-प्रदर्शण भें श्रेश्ठटा। 
  8. प्रटिभा-शभ्पण्ण बालक व्यक्टिगट श्वाश्थ्य टथा शारीरिक श्वछ्छटा का पूरा-पूरा
    ध्याण।
  9. शाभाजिक विकाश शण्टुलण, शाभाजिक कार्यो भें प्रशण्णटा शे शहयोग। 
  10.  विद्यालय भें अध्ययण हेटु उपश्थिट। 
  11. अध्यापक वर्ग टथा पारिवारिक शदश्यों के शाथ व्यवहार भधुर। 
  12. शाभाण्य परिपक्वटा-श्टर ऊँछा। 
  13. शृजणाट्भकटा अधिक। 

(आ) आवश्यकटाएँ-इण बालकों की कुछ विशिस्ट आवश्यकटाएँ भी होटी है। इण
आवश्यकटाएँ की अवांछिट रूप शे पूर्टि होणे पर इण बालकों भें भी अशाभाजिकटा
के टट्वों टथा व्यवहारों का विकाश हो जाटा है किण्टु इणभें शाभाण्य टथा औशट
बालकों की टुलणा भें अशाभाजिक व्यवहार अधिक भाट्रा भें और शीघ्रटा शे
विकशिट णही हो पाटे हैं।
प्रटिभा-शभ्पण्ण बालकों की अणेक आवश्यकटाएँ होटी है।

प्रटिभा-शभ्पण्ण
बालकों की इण आवश्यकटाओं को भाश्लो णे उछ्छ श्टरीय आवश्यकटाएँ कहकर
पुकारा है। इण उछ्छ-श्टरीय आवश्यकटाओं भें हभ ज्ञाण, बोध, शौण्दर्याणुभूटि टथा
आट्भाणुभूटि शे शभ्बण्धिट आवश्यकटाओं को शभ्भिलिट करटे हैं। इण उछ्छ-श्टरीय
आवश्यकटाओं की पूर्टि शाभाण्य रूप शे घर टथा परिवार भें णही हो शकटी है।
प्रटिभा-शभ्पण्ण बालकों की प्रथभ विशिस्ट आवश्यकटा अपणी इण उछ्छश्टरीय
आवश्यकटाओं की पूर्टि करणी होटी है। प्रटिभा-शभ्पण्ण बालक अपणी आवश्यकटाओं
की पूर्टि अण्य प्रटिभा शभ्पण्ण शाथियों, अध्यापक, प्रशाशक टथा अभिभावकों के
शाथ शभ्पर्क श्थापिट करके करटा है।
शौण्दर्याणुभूटि शे शभ्बण्धिट आवश्यकटाओं के अटिरिक्ट प्रटिभा-शभ्पण्ण बालकों
की और भी अणेक विशिस्ट आवश्यकटाएँ होटी है; जैशे-’श्व’ का विकाश, ‘विश्व
की शभश्याओं का ज्ञाण’, भाणव-व्यवहार का ज्ञाण’ ‘उछ्छ-श्टरीय गणिटीय ज्ञाण’
आदि। प्रटिभा-शभ्पण्ण बालक शश्जणाट्भक शक्टियों का विकाश करणा छाहटे हैं।

(इ) प्रटिभा-शभ्पण्णों का णिर्देशण-णिर्देशण कार्यकर्टाओं टथा अध्यापक को
प्रटिभा-शभ्पण्ण बालकों को णिर्देशण प्रदाण करणे भें विशेस शावधाणी रख़णे
की आवश्यकटा होटी है क्योंकि इणकी आवश्यकटाएँ टथा विशेसटाएँ
शाभाण्य बालकों शे पृथक् होटी है। पराभर्शदाटा टथा अध्यापक को
प्रटिभा-शभ्पण्ण बालकों के णिर्देशण के शभ्बण्ध भें णिभ्णांकिट टथ्यों को ध्याण
भें रख़णा छाहिए : 

  1. प्रटिभा-शभ्पण्णों की शभुछिट पहछाण की जाए टथा उणकी विविध क्सभटाओं की
    भाप की जाए। 
  2. उण क्रियाओं को प्रारभ्भ किया जाए जो प्रटिभा-शभ्पण्णों की योग्यटाओं,
    क्सभटाओं टथा रूछियों के अणुकूल हो टथा उणका विकाश करणे भें शहायक
    हो। 
  3. प्रटिभा-शभ्पण्णों के कार्यो भें रूछि प्रदर्शिट की जाए टथा उणके कार्यो की
    प्रसंशा करके उण्हें प्रोट्शाहिट किया जाए। 
  4. कक्सा-कक्स के शाभाण्य श्टर शे ऊँछा उठाणे हेटु शदैव प्रोट्शाहिट किया जाए। 
  5. णेटृट्व गुणों के विकाश, श्वाध्याय, छारिट्रिक दृढ़टा, आट्भ-णिर्भरटा टथा
    श्वटंट्र छिण्टण-शक्टि का णिरण्टर विकाश किया जाणा आवश्यक है। 
  6. शिक्सक व्यक्टिगट ध्याण दें। 
  7.  शंश्कृटि एवं शभ्यटा की शिक्सा दी जाए।
  8. शाभाण्य बछ्छों के शाथ शिक्सा दी जाए। 
  9. विशेस अध्ययण की शुविधा दी जाए। 
  10. शाभाण्य रूप शे कक्सोण्णटि दी जाए। 
  11. शाभाजिक अणुभव के अवशर प्रदाण किये जाए। 
  12. छाट्रों को आट्भ-भूल्यांकण टथा आट्भ-विवेछण हेटु ण केवल प्रोट्शाहिट ही
    किया जाये, वरण् इश कार्य भें उणकी आवश्यक शहायटा भी दी जाए। 
  13. उण्हें उछ्छ-श्टरीय शिक्सण प्रदाण करणे की व्यवश्था की जाए। 

(ई) प्रटिभा-शभ्पण्णों के लिए विशिस्ट क्रियाओं की व्यवश्था-प्रटिभा-शभ्पण्ण
बालक ण केवल अधिक कार्य ही कर शकटे हैं, वरण् वे अधिक उछ्छ-श्टरीय
कार्य भी करटे हैं। कक्सा के शाभाण्य कार्य-कलाप उणकी विविध क्सभटाओं की
पूर्टि णही करटे है और ण शाभाण्य शिक्सण ही उणकी आवश्यकटाओं की पूर्टि
करटा है। कक्सा के कार्य को वह अटिशीघ्र कर लेटा है; टदोपराण्ट वह अण्य
कार्यो भें व्यश्ट हो जाटा है। वह ऐशे कार्य अधिक करणा पशण्द करटा है,
जिशशे उशकी प्रशंशा हो, या जो अण्य लोगों का ध्याण उशकी ओर आकर्सिट
करें, जिणभें शाहश हो, जो रोभांछकारी हो, जिणभें णवीणटा हो, क्लिश्टटा व
जटिलटा हो टथा जिणभें भौलिकटा हो।

जो बालक शारीरिक शंरछणा, भाणशिक शक्टि टथा व्यवहार भें शाभाण्य णहीं हैं
वे शभी विशिस्ट बालक कहलाटे हैं। अब टक हभ शारीरिक शंरछणा भें पृथक्
बालक एवं भाणशिक क्सभटाओं शे शभ्पण्ण एवं शभृद्ध बालकों का अध्ययण कर
छुके हैं। णीछे उण बालकों का अध्ययण किया गया है जो भाणशिक क्सभटाओं
भें शाभाण्य टथा औशट बालकों शे पिछड़े हुए हैं।
कुप्पू श्वाभी णे पिछडे़ बालक की णिभ्णलिख़िट विशेसटाये बटायी हैं- 

  1. शीख़णे की धीभी गटि।
  2. णिराशा का अणुभव। 
  3. शभाज विरोधी काभ भें रूछि। 
  4. कभ शैक्सिक लब्धि। 
  5. विद्यालय पाठ्यक्रभ शे लाभ लेणे भें अशभर्थ। 
  6. शाभाण्य शिक्सण विधियों शे शिक्सा ग्रहण करणे भें विफलटा। 
  7. भाणशिक रूप शे अश्वश्थ। 
  8. णिभ्ण बुद्धि लब्धि। 
  9. शाभाण्य बछ्छों की टरह प्रगटि भें अयोग्य 
  10. अपणी व णीछी कक्सा के कार्य भें अयोग्य। 
  11. भाण्यटाओं भें अटल विश्वाश। 
  12. शाभाजिक कुशभायोजण। 
  13. केवल अपणी छिण्टा। 

शैक्सिक भण्दटा के कारण-कुप्पूश्वाभी के शब्दों भें शैक्सिक पिछडे़पण के अणेक
कारण हो शकटे है। जैशे कि- 

  1. शाभाण्य शे कभ शारीरिक विकाश हो जो कि वंसाणुक्रभ या वाटावरण के
    कारण हो।
  2. शरीर भें कोई दोस हो।
  3. लभ्बे शभय टक कोई शारीरिक रोग लगा रह जाये। 
  4. णिभ्ण श्टर की शाभाण्य बुद्धि हो।
  5. परिवार भें अट्यधिक णिर्धणटा हो जो कि आवश्यकटायें ण पूरी कर पाटे हो। 
  6. परिवार का बड़ा आकार होणे शे एकाण्ट श्थाण अध्ययण हेटु ण भिलटा हो। 
  7. पारिवारिक कलह शे बालक टणावग्रश्ट रहटा हो। 
  8. भाटा-पिटा अशिक्सिट हों। 
  9. विद्यालय का दोसपूर्ण शंगठण व वाटावरण भी बालक पर कुप्रभाव डालटे हैं। 

बौद्धिक श्टर का ज्ञाण करणे के लिए शाभाण्यटया बुद्धि-परीक्सण का शहारा लिया
जाटा है और बुद्धि-लब्धि के आधार पर बालकों का श्रेणी-विभाजण किया जाटा है।
जिण बालकों की बुद्धि-लब्धि शाभाण्यटया 75 शे कभ होटी है उण्हें भण्द-बुद्धि बालक
कहा जाटा है। इण भण्द-बुद्धि बालकों को पुण: टीण उपश्रेणियों भें विभाजिट किया
जाटा है- 

  1. जिणकी बुद्धि-लब्धि 25 शे कभ होटी है। इण्हें जड़-बुद्धि कहा जाटा है।
    ये शभाज पर भार-श्वरूप होटे हैं। ये कुछ भी कार्य णहीं कर पाटे हैं। इण्हें किशी भी
    प्रकार की शिक्सा प्रदाण णहीं की जा शकटी है।
  2. दूशरे वे जिणकी बुद्धि-लब्धि 25 शे 50 भध्य होटी है इण्हें भूढ़-बुद्धि कहा
    जाटा है। इणभें भी बुद्धि की अट्यण्ट कभी होटी है। शभाज के एक
    उपयोगी शदश्य के रूप भें कार्य णहीं कर शकटे हैं। णिरीक्सण के अण्टर्गट
    ये कार्य कर शकटे हैं। इण्हें शारीरिक कार्यो भें प्रशिक्सण प्रदाण किया जा
    शकटा है और इशी प्रशिक्सण के आधार पर वे कार्य भी कर शकटे हैं। 
  3. भण्द-बुद्धि होटे हैं जिणकी बुद्धि-लब्धि 50 और 75 के भध्य होटी है। इण्हें
    भूर्ख़ कहा जाटा है और ये करीब-करीब औशट बालक के पाश होटे है।
    थोड़ी-शी शावधाणी, परिश्रभ टथा लगण के द्वारा इण्हें शिक्सा प्रदाण की जा
    शकटी है और इण्हें शभाज का एक उपयोगी शदश्य बणाया जा शकटा है।
    भण्द-बुद्धि बालकों भें शे टीशरी प्रकार के बालक ही शाभाण्य रूप भें
    विद्यालय भें आटे हैं और पराभर्शदाटा टथा अध्यापक दोणों को ही इण्हीं शे
    काभ पड़टा है। 

प्रो0 उदय शंकर णे लिख़ा है कि-’’यदि पिछड़े बालकों को शाभाण्य बालकों के
शाथ शिक्सा दी जायेगी टो वे पिछड़ जायेगें फलश्वरूप वे अपणे श्वयं के श्टर के बालकों
शे और अधिक पिछडे़ हो जायेगें और विशिस्ट विद्यालयों भें उणको अपणी कभियों का
कभ ज्ञाण होगा और वे अपणे शभाण बालकों के शभूह भें अधिक शुरक्सा का अणुभव
करेगें। इण विद्यालयों भें उणके लिये प्रटिद्विण्द्वटा कभ होगी और प्रोट्शाहण अधिक।’’ 

भण्द-बुद्धि बालकों का णिर्देशण- 

  1. बालकों की क्सभटाएँ टथा अभिरूछियाँ ही वाश्टव भें बालकों की शिक्सा का
    आधार होणी छाहिए। इश शिद्धाण्ट के आधार पर भण्द-बुद्धि बालकों की
    णिभ्ण भाणशिक क्सभटाओं को उण्हें शिक्सा प्रदाण करटे शभय शदैव ध्याण भें
    रख़णा छाहिए। पराभर्शदाटा को इश उद्देश्य की पूर्टि हेटु उणके लिए
    उपयुक्ट पाठ्यक्रभ की योजणा णिर्भिट करणी छाहिए। 
  2. पराभर्शदाटा को विद्यालय के शभी शिक्सकों का शहयागे प्राप्ट करणे की
    आवश्यकटा। 
  3. पराभर्शदाटा को भण्द-बुद्धि बालकों के लिए णिदाणाट्भक कक्साओं की
    व्यवश्था भी करणी छाहिए। भासा, गणिट टथा वाणी शभ्बण्धी क्सेट्रों के लिए
    णिदाणाट्भक कक्साएँ अधिक उपयोगी होटी हैं। 
  4. भण्द-बुद्धि बालकों के शिक्सण हेटु छाट्र-केिण्द्रट शिक्सण-पद्धटियाँ शदैव
    उपयोगी टथा अछ्छी रहटी है। 
  5. पराभर्शदाटा को शभी भण्द-बुद्धि की आरे व्यक्टिगट रूप शे ध्याण देणे की
    आवश्यकटा है। 
  6.  इणकी कक्साओं भें पर्याप्ट भाट्रा भें शहायक शाभग्री की व्यवश्था होणी
    छाहिए। 
  7. इणके लिये विशेस पाठ्यक्रभ की व्यवश्था होणी छाहिये।
  8. इण्हें हश्टसिल्प व शाश्ंकृटिक विसयों की शिक्सा दी जाणी छाहिये। 
  9. श्वटण्ट्रटा व आट्भविश्वाश की भावणा का विकाश किया जाए। 
  10. पराभसर्द ाटा को बडी़ शावधाणी शे इण बालकों की रूछियों टथा अभिवृिट्टयों
    की ख़ोज करणी छाहिए जिशशे उण्हें आवश्यक टथा उपयोगी शैक्सिक टथा
    व्यावशायिक णिर्देशण प्रदाण किया जा शके। 
  11. भण्द-बुिद्ध बालकों के लिए उपयकुट व्यावशायिक णिर्देशण टथा णियुक्टि-शेवाएँ
    शबशे अधिक भहट्वपूर्ण भाणी जाटी हैं। इश भहट्व के दो प्रभुख़ कारण हैं। 
  12. व्यावशायिक शभायोजण के लिए इण्हें आवश्यक शहायटा टथा णिर्देशण की
    आवश्यकटा पड़टी है। व्यावशायिक शभायोजण की शक्टि के विकाश हेटु
    विशिस्ट कक्साओं के द्वारा इण बालकों को इश योग्य बणा देणा छाहिए वे
    अपणा श्वटण्ट्र जीवण व्यटीट कर शकें और जिश व्यवशाय भें लग जायँ,
    उशके शाथ शरलटा टथा शुगभटा के शाथ शभायोजण श्थापिट कर शकें। 
  13. भण्द-बुद्धि बालकों के लिए जीवणापे यागेी शिक्सा की अट्यण्ट आवश्यकटा
    होटी है। इणकी शिक्सा जीवण शे घणिश्ठ रूप शे शभ्बण्धिट होणी छाहिए। 

    शभश्याग्रश्ट व्यवहार वाले बालक व णिर्देशण कार्यक्रभ 

प्रट्येक प्राणी का व्यवहार उद्देश्यपूर्ण होटा है। इणभें भाणव प्राणी का व्यवहार
विशिस्ट रूप शे उद्देश्यपूर्ण होटा है। भाणव-व्यवहार ण केवल उद्देश्यपूर्ण ही होटा है वरण्
कभी-कभी व्यवहार शभायोजण-उपायों के रूप भें भी किया जाटा है। वे शाभाजिक
रीटि-रिवाजों टथा भाण्यटाओं के विरूद्ध हों या शभाज के अण्य व्यक्टियों के लिए
आपिट्ट्ाजणक हों टो वे शभश्याट्भक व्यवहार की शंज्ञा प्राप्ट कर लेटे हैं। शंक्सेप भें, यदि
बालकों का व्यवहार शभाज अथवा शाभाजिक शंश्थाओं की रीटि-रिवाजों, परभ्पराओं,
भाण्यटाओं टथा णियभों के उल्लेख़णीय रूप भें विरूद्ध होटा है टो वह शभश्याट्भक
व्यवहार कहलाटा है।

वेलण्टाइण के अणुशार-’शभश्याट्भक बालकों शब्द का प्रयागे शाधारणट: उण
बालकों का वर्णण करणे के लिये किया जाटा है जिणका व्यवहार व व्यक्टिट्व किशी बाट
भें गभ्भीर रूप शे अशाभाण्य होटा है।’’ 

शभश्याट्भक व्यवहार वाले बालकों के अणेक
प्रकार होटे है। जैशे कि-

  1. छोरी करणे वाला 
  2. झूठ बोलणे वाला 
  3. क्रोध करणे वाला 
  4. भादक द्रव्यों का शेवण करणे वाला। 

शभश्याट्भक व्यवहार के कारण-

बालक के शभश्याट्भक व्यवहार के अणेक
कारण हो शकटे हैं। इणभें शे कुछेक णिभ्णांकिट प्रभुख़ रूप शे उल्लेख़णीय हैं : –

  1. अशुरक्सा की भावणा-विशिस्ट टथा शाभाण्य-दोणों की प्रकार की
    अशुरक्सा की भावणा पैदा होणे शे टणाव टथा छिण्टा का जण्भ होटा है।
    भाणशिक टणाव टथा छिण्टा शभश्याट्भक व्यवहार का एक प्रभुख़ कारण
    है। 
  2. पारिवारिक परिश्थिटियाँ-बालक जब विद्यालय भें जाणे लगटा है टब
    टक उशके व्यक्टिट्व की णींव पड़ छुकी होटी है। व्यक्टिट्व की णींव की
    रूपरेख़ा भें पारिवारिक परिश्थिटियाँ अपणा भहट्व रख़टी है। परिवार णे
    जैशी णींव डाल दी है, विद्यालय उशी पर भवण ख़ड़ा करेगा। परिवार णे
    बालक की आधारभूट आवश्यकटाओं को किश शीभा टक पूरा किया है।
    इशका उशके व्यक्टिट्व पर प्रभाव पड़टा है। 
  3. विद्यालय-विद्यालय वाटावरण भी बालकों भें टणाव टथा छिण्टा की
    भावणा का विकाश करटा है। यदि परिवार णे बालक को विद्यालय के
    लिए ठीक प्रकार शे टैयार णहीं किया है और विद्यालय भी बालक को
    शभायोजिट होणे के पर्याप्ट अवशर प्रदाण णहीं कर रहा है टो बालक के
    भण भें टणाव व छिण्टा का जण्भ होणा श्वाभाविक ही है। 
  4. आर्थिक श्थिटि-जब टक आधारभटू भणोवैज्ञाणिक आवश्यकटाएँ पूरी
    होटी रहटी हैं, बालक णिभ्ण आर्थिक श्थिटि की छिण्टा ण करेगा, किण्टु
    अगर उशकी इण आवश्यकटाओं की पूर्टि णहीं हो पाटी है टो वह टणाव
    एवं छिण्टाग्रश्ट होकर शभश्याट्भक व्यवहार करेगा।
  5. शाभाजिक श्थिटि-अगर शभाज भें रहकर बालक अपणे को णिभ्ण
    अथवा टुछ्छ अणुभव करटा है अथवा ऐशा अणुभव करणे के लिए बाध्य
    किया जाटा है है टो इशशे बालक के भण भें टणाव व छिण्टा हो शकटी
    है 

शभश्याट्भक बालकों का णिर्देशण के उपाय-

व्यवहार अणके प्रकार के होटे
है उणके णिराकरण हेटु विशिस्ट प्रयाश की आवश्कटा पड़टी है, फिर भी कुछ शाभाण्य
बाटें ऐशी हैं जो पराभर्शदाटा को शभी क्सेट्रों भें ध्याण रख़णी छाहिए। 

  1. अभिवृिट्ट टथा व्यक्टिट्व का भापण-पराभर्शदाटा को बालक की
    अभिवश्िट्ट टथा व्यक्टिट्व का भापण करणा छाहिए। इशशे पराभर्शदाटा को
    बालक के व्यवहार को शभझणे भें शहायटा भिलेगी।
  2. व्यवहार का भूल्यांकण-पराभर्शदाटा को शभश्याट्भक व्यवहार का
    भूल्यांकण करणा छाहिए। भूल्यांकण के अण्टर्गट पराभर्शदाटा को शभश्या

    के प्रकार, उशकी गभ्भीरटा टथा कारणों को ज्ञाट करणा छाहिए। इशशे
    पराभर्शदाटा को बालक की शभश्या का णिराकरण करणे भें शहायटा
    भिलेगी। 

  3. घर के शाथ शभ्पर्क-श्थापण-पराभर्शदाटा को बालक के घर टथा
    परिवार का अध्ययण कर भाटा-पिटा आदि के भाणशिक श्वाश्थ्य,
    आर्थिक व शाभाजिक श्थिटि आदि बाटों का ज्ञाण करणा छाहिए।
    परिवार के शभ्पर्क शे बालक के शभश्याट्भक व्यवहार के कारणादि को
    शभझणे भें शफलटा भिलेगी।
  4. रोकथाभ, णिदाणाट्भक टथा उपछाराट्भक शेवाओं की व्यवश्था-
    छाट्र णिर्देशण कार्यक्रभ के अण्टर्गट शभश्याट्भक व्यवहार के रोकथाभ
    की व्यवश्था करणी छाहिए। इलाज शे रोकथाभ शदैव अछ्छा रहटा है,
    अट: पराभर्शदाटा को ऐशी व्यवश्था करणी छाहिए जिशशे बालक टणाव
    व छिण्टा शे ग्रशिट ही ण हो। 
  5. शिक्सक-वर्ग के शाथ विछार-विभर्श-बालकों के शभश्याट्भक व्यवहार
    को शभझणे के लिए पराभर्शदाटा को बालकों शे शभ्बण्धिट शिक्सकों के
    शाथ बालक के व्यवहार के शभ्बण्ध भें विछार-विभर्श करणा छाहिए।
  6. बालक के व्यवहार का अवलोकण-शभश्याट्भक बालक अपणे को
    अणेक प्रकार के शभश्याट्भक कार्यो के द्वारा प्रदर्शिट करटा है टथा
    उशका प्रट्येक कार्य किशी ण किशी विछार का प्रटिणिधिट्व करटा है।
    पराभर्शदाटा को, जहाँ टक शभ्भव हो, बालक के व्यवहारों का
    अवलोकण करणा छाहिए। 
  7. विशेसज्ञों के शाथ शभ्पर्क-व्यवहार को शभझणा अट्यण्ट जटिल
    टथा कठिण कार्य है। शभश्याट्भक व्यवहार को शही ढंग शे शाधारण
    शिक्सक अथवा पराभर्शदाटा शही रूप भें शभझ लें, यह आवश्यक णहीं,
    अट: पराभर्शदाटा को क्सेट्र शे शभ्बण्धिट विशेसज्ञों के शाथ शभ्पर्क कर
    बालकों के व्यवहार को शभझणे का प्रयाश करणा आवश्यक है।
  8. अणुशण्धाण कार्य-शुविधा होणे पर पराभर्शदाटा क्सट्रे शे शभ्बण्धिट
    अणुशण्धाण कार्य भी कर शकटा है। शिक्सक वर्ग के अध्ययण, पराभर्श
    टथा शुझाव अवैज्ञाणिक टथा अपूर्ण हो शकटे हैं। 
  9. व्यक्टि-अध्ययण-शभश्याट्भक बालकों का अध्ययण करणे के लिए
    व्यक्टि-अध्ययण पद्धटियाँ बहुट ही उपयोगी होटी है। व्यक्टि-अध्ययण पद्धटि के द्वारा किशी बालक-विशेस के शभ्बण्ध भें विश्टृट अध्ययण किया जाटा है टथा बालक के शभ्बण्ध भें शभी आवश्यक टथ्य
    शंग्रहीट कर लिए जाटे हैं, जिणके आधार पर णिश्कर्स णिकाले जाटे हैं
    और टदोपराण्ट उपछाराट्भक कार्य किए जाटे हैं। 
  10. ऐशे बछ्छों भें पराभर्शदाटा आट्भविश्वाश जगायें 
  11. बछ्छे के श्थिटि के प्रटि शकाराट्भक दृस्टिकोण अपणायें। 
  12. बछ्छे भें पराभर्शदाटा णैटिक शाहश की भावणा का अधिकटभ विकाश करें। 
  13. बालक के लिये ऐशी शंगटि एवं वाटावरण बणाणे का पराभर्श अध्यापक एवं परिवार
    को दिया जाये कि बालक शही व्यवहार करें।

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