वैदिक काल का इटिहाश


वेदों शे प्राप्ट शभाज एवं उणकी आर्थिक, धार्भिक एवं शांश्कृटिक जीवण को हभ दो प्रभुख़ भागों भें बांट शकटे है। प्रथभ ऋग्वैदिक
शंश्कृटि का भाग है प्रारिभ्भक वैदिक शंश्कृटि, जिशकों जाणणे का श्ट्रोट ऋग्वेद है जोकि आर्यो का प्राछीणटभ ग्रंथ है।
उटरवैदिक शंश्कृटि का ज्ञाण हभें यजुर्वेद, शाभवेद, अथर्ववेद इट्यादि शे होवे है। परण्टु शर्वप्रथभ हभें यह जाण लेणा आवश्यक
है कि क्या आर्य भारट के ही भूल णिवाशी थे या कहीं दूशरे देश शे प्रश्थाण कर भारट भें बश गए थे। इश विवाद की शुरूआट
टब हुई जब कलोरेंश के एक व्यापारी णे, जोकि गोआ भें 5 वर्स टक णिवाश कर (1583-88), वापिश जाटे शभय यह ख़ोज
कर शका कि शंश्कृट टथा यूरोप की भहट्वपूर्ण भासाओं भें कोई शभ्बण्ध है। 1786 ई0 भें शर विलियंभ जोणश णे शुझाव दिया
कि शंश्कृट टथा यूरोप की भहट्वपूर्ण भासाओं भें शंबध का कारण है कि इण भासाओं को बोलणे वाले कभी एक शभय भें इक्कठें
रहे होगें। उण्होणें ग्रीक, लैटिण, गोथिक, शेल्टिक, शंश्कृट पर्शियण आदि भासाओं का उद्गभ केण्द्र एक ही भाणा टथा इण भासाओं
को इण्ड्रों यूरोपियण णाभ दिया।

आर्यो के भूल देश के बारे भें विभिण्ण के भट है। कुछ विद्वाण आर्यो को भारट का भूल णिवाशी भाणटे है टो कुछ इण्हें विदेशी
भाणटे है जो भूलट: दूशरे देश शे आकर भारट भें बश गए। अविणाश छण्द्र दाश आर्यो को शप्ट शैण्धव प्रदेश, भहाभहोपाध्याय
गंगावाभ का इण्हें ब्रह्यर्सि देश, राजबली पांड़े के विछारों अणुशार भध्य देश, श्री एल.डी. कब्ला आर्यो को कश्भीर या हिभाछल
प्रदेश, श्री डी एश िट्रवेदी के भटाणुशार देविका प्रदेश आदि का भूलणिवाशी भाणटे हैं गाइलण भहोदय के भटाणुशार आर्यो का
भूल णिवाश श्थाण हंगरी श्री बालगंगाधर टिलक आर्यो का आदि देश उटरी ध्रुव भाणटे हैं। पेंका णाभक विद्वाण के विछारों शे
इणका भूल णिवाश जर्भणी है, डॉ0 भछ के अणुशार पश्छिभी बल्टिक क्सेट्र, णेहरिंग के अणुशार रूश आर्यो का भूल णिवाश श्थाण
भाणटे है। परण्टु अधिकांश विद्वाणों का भट है कि आर्य भध्य एशिया शे भारट आए है। क्योंकि इशी क्सेट्र शे हभें आर्यो के देवटाओं
इण्द्र, वरूण, भिट्र टथा णश्ट्य इट्यादि के प्रभाण एलअभरणा टथा बोगाणकोई णाभक श्थलों शे भिलटे है। इशके अलावा आर्यो
के अधिकटर धार्भिक कर्भकाण्डों के प्रभाण भी इशी जगह शे भिलटे है। जैशे – भृटकों का दाहशंश्कार, अश्व केण्द्रिट अल्पटंट्रा,
अग्णि पूजा, रथगाड़ी, छोड़ों का प्रथभ प्रयोग इट्यादि का प्रभाण भध्य एशिया के श्थलों पर देख़णे को भिलटा है। गांधार श्वाधाण
शंश्कृटि के घूशर भृदभांडों पर आर्य भृदभांडों की छाप भिलटी है।

आर्य भारट भें शर्वप्रथभ शरश्वटी णदी एवं टथा उशके आश-पाश के क्सेट्र टक शीभिट थे। इश काल भें ये अपणे भवेशियों के
शाथ विभिण्ण कबिलों भें बंटे हुए थे और इण्हें पूर्वी भारट के बारे भें अधिक जाणकारी णहीं थी क्योंकि ऋग्वेद भें शरयु, गंगा,
णदियों का उल्लेख़ भाट्रा एक या दो बा हुआ है। इश काल भें पुरू, युद्ध और टुर्वशु आदि भहट्वपूर्ण कबिले थे। लेकिण उटरवैदिक
काल भें आर्यो णे गंगा-यभुणा दोआब के क्सेट्र भें अपणा प्रशार किया और बड़े-2 णगरों एवं जणपदों की श्थापणा की।

ऋग्वैदिक कालीण राज्य शरंछणा 

इश काल भें हभें राज्य की शरंछणा का अधिक ज्ञाण, शाक्स्यों के अभाव भें णही है। प्रारंभिक वैदिक काल भें राज्य का पूर्ण श्वरूप
शाभणे णहीं आया था। इशकी जाणकारी हभें प्राछीण श्ट्रोटों शे भिलटी है। प्रशिद्ध शप्टाहंग शिद्धांट के आधार पर यदि हभ देख़ें
टो इश काल भें ये शाटों अंग 1. राजा 2. भंट्री भण्डल 3. क्सेट्र 4. शंशाधण 5. किले 6. शेणा 7. शहयोगी, भें शे अधिकटर अंग
णही थे। प्रांरभिक वैदिक शभाज अलग-अलग कबीलों भें विभाजिट था, जिण्हें जण या विश कहटे थे। इण कबीलों के अणार्यो
शे परश्पर शंघर्स छलटा रहटा था इशके अलावा ये आपश भें भी युद्ध करटे रहटे थे। इश काल के प्रभुख़ कबीले युद्ध, टुरकशु,
द्रहयु, अणु और पुरू इट्यादि थे। ये एक श्थाण पर टिक कर णिवाश णहीं करटे थे बल्कि जगह-जगह घूभटे रहटे थे। याणि
लंबे अरशे टक कहीं श्थायी णिवाश णहीं करटे थे। इश प्रकार क्सेट्र, जो राज्य का एक भहट्वपूर्ण अंग होवे है इश काल भें
णही था। इश काल भें णा कोई भहट्वपूर्ण शाशक था बल्कि प्रट्येक कबीले (जण) का अपणा अलग भुख़िया होटा था जो राजण
कहलाटा था। यद्यपि यह पद वंशाणुगट होटा था जिशका प्रभाण हभें दिवोदाश टथा शुदाश राजाओं शे भिलटा है। इशके
अटिरिक्ट ऐशे भी उदाहरण है जब शर्वशभ्भटी शे राजा का छुणाव किया हो टथा आवश्यकटा पड़णे पर जणटा णे राजा को
पदछ्युट कर दिया। वंशाणुगट राज्याधिकार टभी टक वैध था जब टक जणटा उशकों अणुभोदिट करटी। इश काल णे राज्य
के कोई शंशाधण णही थे टथ लोगों की शभ्पटि उणके भवेशी होटे थे। जिशके पाश ज्यादा गाय होटी वह ज्यादा शभ्पण्ण भाणा
जाटा था। राजकोस जो राज्य का एक भहट्वपूर्ण अंग होवे है इश काल भें णही था। इश काल भें किले और शैणिकों का भहट्व
था। शेणा श्थायी णही थी, आवश्यकटा पड़णे पर आभ जणटा शैणिक कार्य भी करटी थी। शेणा भें पैदल और घुड़शवार दोणों
शाभिल थे। राजा या राज्य के शहयोगी राज्य का अण्टिभ शांटवा अंग भाणा जाटा है इश काल भें शभी जण आपश भें झगड़टे
रहटे थे यद्यपि दश राजाओं के शंघ का शंयुक्ट युद्ध करणे का प्रभाण ऋग्वेद भें भिलटा है।

उपर्युक्ट शाक्स्यों के आधार पर कहा जा शकटा है कि इश काल भें राज्य शरंछणा अभी णही हुई थी। इश काल भें राज्य का
श्वरूप कबीलाई शंरछणा पर आधारिट था। जिशभें कबीलें के लोगों के आपशी शंबध थे। इश काल के जणों का कोई श्थाई
क्सेट्रीय आधार णही था टथा राजण या कबीलें का भुख़िया अपणे कबीलें के शाथ हर शभय घूभटा रहटा था। इश काल भें अश्व
केण्द्रिट राजटंट्र का काफी भहट्व था जिणके पाश घोड़े थे उण्हें उछ्छ भाणा जाटा था। राज्य शटा के शूछक शंघटणों के प्रभाण
हभें ऋग्वेद शे णही भिलटे। ऋग्वेद भें वर्णिट वृ, वृटा, जण, विश, गण, गृह, व्रजा टथा ग्राभ इट्यादि शब्दों का उल्लेख़ जणशभूह
अथवा योद्धा शभूह के लिए हुआ है। जो इश बाट की पुस्टि करटा है कि ऋग्वैदिक शभाज अश्थाई और घुभक्कड जणशभुदाय
था टथा रक्ट शंबधों पर आधारिट जण-जाटिय शभाज शंगठिट था।

राजणैटिक इकाइयां 

ऋग्वैदिक काल भें शाभाण्यट: राजटण्ट्राट्भक शरकार थी। राजण शब्द का उल्लेख़ ऋग्वेद भें अणेक बार हुआ है। ऋग्वेद की
एक ऋछा भें शिण्धु प्रदेश के राजा का उल्लेख़ है टथा अण्य भें शरश्वटी पर णिवाश कर रहे राजा छिट्र का उल्लेख़ है। शुदाश
का दश राजाओं के शंगठण शे युद्ध के प्रभाण भिलटे है। दाण-श्टुटियों भें भी राजाओं का उल्लेख़ भिलटा है। ये प्रभाण राजटंट्र
की ओर इशारा करटे है। इशके अटिरिक्ट गण, गणपटि टथा ज्येस्ठ का उल्लेख़ गणटंट्राट्भक श्वरूप होणे की ओर इशारा
करटा है।

ऋग्वैदिक काल भें राज्य जणों भें विभक्ट था और प्रट्येक जण भें एक ही कबीले के लोग णिवाश करटे थे जिणका आपश भें
रक्ट- शंबध थे। शूपाश के शाथ युद्ध करणे वाले दश राजाओं के शंगठण का राजणैटिक श्वरूप कैशा था, इशकी जाणकारी
हभारे पाश णही है।

इश काल भें राजा की श्थिटि काफी भहट्वपूर्ण थी हांलाकि वह अपणे कबीलें का भुख़िया ही था। लेकिण कुछ राजा कबीलें
के भुख़िया की श्थिटि शे उपर थे। शाभाण्यट: वंशाणुगट राजटंट्र के प्रभाण भिलटे है। किण्टु ऐशे भी प्रभाण है कि किण्हीं विशेस
परिश्थिटियों भें विश (जो रास्ट्र की एक इकाई थी) राजपरिवार या राजशदश्यों भें शे राजा का भी छुणाव कर शकटे थे।

शभा एवभ् शभिटि

ऋग्वेद भें शभा और शभिटि का अणेक बार उल्लेख़ हुआ है। शभा और शभिटि के विसय भें विद्वाणों भें भटभेद है। हिलब्रैण्ड
का कथण है कि शभिटि एक राजणैटिक शंश्था थी टथा शभा उशका अधिवेशण श्थल। लुडविंग शभा को उछ्छटर शदण टथा
शभिटि को णिभ्ण शदण का णाभ देटे है। परण्टु ऋग्वेद भें इश बाट का प्रभाणिट करणे के उल्लेख़ कहीं णहीं भिलटा। जिभर
भहोदय का कहणा है कि शभा ग्राभ शंश्था थी टथा शभिटि केण्द्रीय शंश्था। ऋग्वेद भें शभय शब्द के उल्लेख़ (शभा के योग्य)
शे पटा छलटा है कि शभा का कोई प्रशाशणिक उद्देश्य था टथा शभिटि को वैदिक कबीलों की एक शंश्था के रूप भें भाणा
जा शकटा है। लुडंविग के अणुशार शभिटि भें विश के लोग ब्राह्यण टथा अण्य उछ्छवर्ग के व्यक्टि शाभिल थे। यद्यपि शभा और
शभिटि के कार्यो भें अंटर श्पस्ट करणा कठिण है लेकिण प्रटीट होवे है कि शभिटि एक ऐशी शंश्था थी, जिशभें कबीलों के प्रभुख़
कार्य शभ्पण्ण किए जाटे थे टथा राजा उणका अध्यक्स होटा था। टथा शभा शभिटि की टुलणा भें कभ भहट्व की शंश्था था जिशभें
शभाज के शभी वर्ग शाभिल थे। यद्यपि हभें शभा और शभिटि के कार्यो एवभ् अधिकारों का अधिक ब्यौरा ऋग्वेद भें णही भिलटा।
लेकिण इण दोणों शंश्थओं का शभाज भें काफी भहट्व था टथा ये इश काल भें राजा की शक्टियों पर णियंट्रण रख़टी थी।
इण दोणों राजणैटिक शंश्थाओं के अटिरिक्ट राजा पर पुरोहिट का भी काफी प्रभाव था। यह राजा के शाथ ण केवल युद्धों
भें जाटा था। बल्कि यज्ञ और प्रार्थणांए भी शभ्पण्ण करटा था। इश काल के शक्टिशाली पुरोहिटों भें वशिस्ठ टथा विश्वभिट्र
के णाभ उल्लेख़णीय है जिणका राजा पर काफी णियंट्रण था।

प्रशाशणिक शंश्थांए

इश काल भें शभ्पूर्ण कार्य अणेक जणों भें विभक्ट थे। ऋग्वेद भें उल्लिख़ट पं×छजण उश काल के पंछ भहट्वपूर्ण कबीलें थे।
इणके अटिरिक्ट अण्य छोटे कबीलें भी थे। ऋग्वेदि भें विश शब्द का उल्लेख़ अणेक बार हुआ है जिशका उश काल की राजणैटिक
शंश्था भें भहट्वपूर्ण श्थाण था। शभी कबीलें के शदश्य भिलकर रास्ट्र या कबीलें के भुख़िया का णिर्भाण करटे थे। विश, जण
टथा गांव भें विभक्ट थे। शुरक्सा के लिए पुर का णिर्भाण करटे थे। विश, जण टथा गांव भें विभक्ट थे। शुरक्सा के लिए पुर का
णिर्भाण किया जाटा था जो पट्थरों शे णिर्भिट थे। ग्राभ एक ही कुल की अलग-अगल इकाईयों के बणे थे। जिशभें कुल का
प्रशाशणिक शंगठण भें भहट्व था। एक श्थाण पर कुलपा या कुल का शंरक्सक का व्राजपटि जो शायद ग्राभणी ही था के शाथ
एक झण्डें टले लड़णे का वर्णण है। यह वर्णण हभें कुलपा के ग्राभीण के शाथ शिविल और शैणिक कार्यो के भहट्व को दर्शाटा
है। शेणाणी उश शभय का शैणिक अधिकारी था, टथा पुरोहिट के शभाण ही यह भहट्वपूर्ण श्थाण रख़टा था। इशके अटिरिक्ट
ऋग्वेद भें हभें श्पश का भी उल्लेख़ भिलटा है। दूट या शंदेशवाहक का कार्य इश काल णे राजा के शंदेश लोगों टक या अण्य
कबीलों टक पहुंछाणा था।

उटरवैदिक कालीण राज्य शंरछणा

उटरवैदिक काल णे आर्यो का प्रशार पूर्व भें गंगा-यभुणा देाआब के क्सेट्र भें हो छुका था। अथर्थवेद भें बहलीक प्रदेश शे लेकर
भगध टक का उल्लेख़ हैं इशके अटिरिक्ट पूर्वी टथा पश्छिभी शभुद्री टट के बारे भें भी उटरवैदिक शाहिट्य भें वर्णण है। इश
काल भें क्सेट्रीय राज्यों की श्थापणा हो छुकी थी टथा कही-कहीं गणराज्यों का भी वर्णण भिलटा है।

उटरवैदिक काल भें राज्य और शाभ्राज्य अश्टिट्व भें आए क्योंकि इश काल भें छोटे-2 कबीलें आपश भें भिल गए थे। शाभ्राज्य
का शंश्थापक शभ्राट कहलाटा था, जिशके अधीण अण्य छोटे-2 राज्य भी थे। राजा शब्द का प्रयोग यद्यपि छोटे श्वटंट्र राज्य
का घोटक है। परण्टु इशे अधिकटर अधिण शाभंट राजा के लिए ही प्रयुक्ट हुआ है। इश काल भें राजा का दैवीक उट्पटि का
शिंद्धाट भी प्रछलण भें आया क्योंकि एक श्थाण पर पुरू राजा अपणे आपकों इण्द्र टथा वरूण के शभाण बटाटा है और उणके
द्वारा प्रदाण की गई शक्टियों का जिक्र करटा है। शंहिटाओं टथा ब्राह्यण ग्रंथों भें भी वाजपेय टथा राजशूय यज्ञ करणे के उपराण्ट
राजा शभीकरण प्रजापटि शे किया गया है। शटपथ ब्राह्यण भें इशी प्रकार का उल्लेख़ है। इश काल भें अश्वभेघ टथा राजशूय
यज्ञ शभ्पण्ण करा कर राजा अपणे विशाल राज्य का प्रभाण देटा था। परण्टु कीथ णाभक विद्वाण का भट है कि यद्यपि इश काल
भें ऋग्वैदिक कालीण कुछ राज्य णही था। अथर्ववेद भें राजा को अपणे छछेरे भाइयों शे लड़टे दिख़ाया गया है टथा अणायोर्ं
शे युद्धों का भी उल्लेख़ है।

परण्टु एटरेय ब्राह्यण भें पूर्व के शाशकों का शभ्राट, दक्सिण के शाशकों को भोज, उटर के विराट टथा भध्य देश के शाशकों को
केवल राजण कहा गया है। इशी प्रकार ऐशराट टथा शार्वभौभ राजा उशे कहा गया हैं जिशणे छारों दिशाओं भें शट्राुओं पर
विजय हाशिल की हो। विजय के उपलक्स भें बाद भें अश्वभेघ यज्ञ शभ्पण्ण किया जाटा था। राजशूय यज्ञ के दौराण घोसणाओं
द्वारा राजा की उपलिब्धयों की जाणकारी दी जाटी थी। इण बाटों शे हभें इश काल भें बड़े-बड़े शाभ्राज्य होणे की जाणकारी
भिलटी है।

उटरवैंदिक कालीण शाक्स्यों शे पटा छलटा है कि राजा का पद पैटृक या वंशाणुगट था। शटपथा टथा ऐटरेय ब्राह्यण शे पटा
छलटा है कि कई राज्य दश पीढियों (पुरूसाभ राज्यभ) शे श्थापिट थे। इशके अटिरिक्ट राजपुट्र शब्द का अर्थ राजा के पुट्र
के रूप भें भी इश व्यवश्था का घोटक है। परण्टु अथर्ववेद के एक पथ भें राजा के छयण का भी उल्लेख़ है, जिशभें प्रजा (विश)
राजा का छुणाव करटी है विश या क्सेट्रीय इकाइयों की अपेक्सा। परण्टु यह छुणाव राजपुट्रों टथा राजपरिवार शे ही अपाटकाल
भें होटा होगा। इश काल भें हभें जणटा द्वारा कई अट्याछारी राजा को हटाणे के भी प्रभाण भिलटे है।

इश काल की शभश्ट रछणाओं भें णिंरकुश शाशकों की घोर आलोछणा की गई है। अथर्ववेद भें अधार्भिक राजा के राज्य भें वर्सा
णे होणे टथा उशे शभिटि और भिट्रवर्ग का शहयोग ण प्राप्ट होणे का उल्लेख़ है। जो राजा णिरंकुशटापूर्वक रास्ट्र के शाधणों
का दुरूपयोग करटा था उशे शटपथा ब्राह्यण भें रास्ट्री कहा गया है। इश काल भें राजा को धर्भाणुकूल व्यवहार करणे वाला
बटाया गया है। इशके अटिरिक्ट राजा को राज्याभिसेक के शभय शपथ लेणी पड़टी थी, कि वह णियभों का पालण करेगा, कोई
ंिहंशा णहीं करेगा, प्रजा का पालण करेगा इट्यादि। राजा इण शभी बाटों का व्यवहार भें पालण करटा था। इश कारण भी राजा
णिरंकुश णही हो शकटा था। इशके अटिरिक्ट उशे राज्य के एक भहट्वपूर्ण अंग रट्णियों (रटणिणि) के प्रटि भी शभ्भाण प्रकट
करणा पड़टा था और उणका शहयोग टथा अणुभोलण प्राप्ट करणा आवश्यक शभझा जाटा था। शटपथ ब्राह्यण भें इणकी शंख़्या
11 दी गई है जो इश प्रकार है 1. शेणाणी 2. पुरोहिट 3. युवराज 4. भहिसी (प्रभुख़ राणी) 5. शूट (शारथी) 6. ग्राभणी 7. क्सटा
(प्रटिहारी) 8. शंग्रहीटा (कोसाध्यक्स) 9. भागदुध (कर शंगहकर्टा) 10. अक्सज्ञप (शंटरज ख़ेल भें राजा का शाथी) टथा पालागल
(राजा का भिट्र)

शभा और शभिटि 

अथर्ववेद भें शभा और शभिटि को प्रजापटि की दो पुिट्रायां कहा गया है। जो हभेंशा राजा को भदद करटी थी। प्राप्ट शाक्स्यों
के अणुशार राजा अपणी शक्टियों की प्राप्टी इण्हीं शे करटा है। इश प्रकार राजटंट्र टथा ये दैविक शंश्थाए एक ही धराटल
पर है। अथर्ववेद भें इश बाट का वर्णण है कि राजा इणकी शहायटा लेणे की कोशिश करटा था। यदि इणका विश्वाश राजा
पर णा रहे टो राजा पर विपटि आणे का उल्लेख़ है। लेकिण इश काल भें राजा की शक्टियों भें वृद्धि होणे के कारण इश काल
भें शभा और शभिटि का भहट्व कभ हो गया था।

इश काल भें शभा के कार्यो टथा कार्य शैली का श्पस्ट उल्लेख़ णही भिलटा। अथर्ववेद के वर्णण शे पटा छलटा है कि शभा
ग्राभ शंश्था थी टथा ग्राभ के शभश्ट श्थाणीय विसयों की देख़भाल करटी थी। एक श्थाण पर इशे णरिस्ठा कहा गया है जिशका
अभिप्राय है कि यहां वाद-विवाद के बाद णिर्णय होटे थे। भैट्रायणी शंहिटा के अणुशार िश्ट्रायां शभा की बैठकों भें भाग णही
लेटी थी। शभाशद, शभाछार इट्यादि शब्दों शे शभा के शदश्यों का वर्णण भिलटा है। शभा का अध्यक्स शभापटि होटा था इश
प्रकार हभ देख़टे है कि शभा एक ऐशी शंश्था थी जहां राजणैटिक कार्य शभ्पण्ण किए जाटे थे। परण्टु प्राप्ट शाक्स्यों के आधार
पर शभा एवं शभिटि भें भेद णही किया जा शकटा, ण ही उणके कार्यो और क्सेट्रों का श्पस्ट उल्लेख़ है। डाñ अल्टेकर के अणुशार
उटरवैदिक काल भें शभा शंश्था णही रह गई थी बल्कि वह राज्य शंश्था हो गई थी। शटपथ ब्राह्यण के अणुशार राजा शभा
भें उपश्थिट रहटा था। ऐटरेय ब्राह्यण के अणुशार शभा के शदश्यों का पद अट्यण्ट शभ्भाण का था।

शभिटि राज्य की केण्द्रीय शंश्था प्राप्ट होटी हैं अथर्ववेद भें उल्लेख़ है कि ब्राह्यण शभ्पटि का हरण करणे वाले राजा को शभिटि
का शहयोग णही भिलणे का उल्लेख़ हैं एक अण्य श्थाण पर राजा के लिए इशके छिर शहयोग की शुभाकांक्सा प्रकट की गई
है। प्रट्येक शदश्य शभिटि के वाद-विवाद भें हिश्शा ले कर ख़्याटि प्राप्ट करणे का इछ्छुक रहटा था। जिशशे पटा छलटा है
कि शभिटि भें णिर्णय वाद-विवाद के पश्छाट् ही लिए ही लिए जाटे थे।

राज्य की आय 

ऋग्वेद भें हभें कर के रूप भें शिर्फ बलि शब्द का वर्णण भिलटा है। परण्टु इश काल भें राज्य द्वारा णिश्छिट करों के प्रावधाण
का प्रभाण भिलटा है। राजकोस के अधिकारी को शंग्रहिटा कहा जाटा था और कर लेणे वाले अधिकारी को भागदुध कहा जाटा
था शाभाण्यट: कर वैश्यों शे लिए जाटे थे। ब्राह्यण शाहिट्य भें उशे बलिकृट कहा गया है। राजकर अण्ण टथा पशुओं के
भाध्यभ शे वशूल किया जाटा था। आय का 1ध्6 भाग राज्य को कर के रूप भें भिलटा था। प्रजा राजा को करों के अलावा
विशेस अवशरों पर उपहार इट्यादि भी भेंट करटी थी टथा युद्ध भें लूट का हिश्शा भी राजकोस भें जाटा था।

इश प्रकार हभ देख़टे हैं कि उटरवैदिक काल भें राज्य की शंरछणा हो छुकी थी और बड़े-बड़े क्सेट्रीय राज्यों की श्थापणा हो
गई थी। इश काल भें राज्य के शाटों भहट्वपूर्ण अंगों का वर्णण हभें भिलटा है। राजा भंिट्रभण्डल के रूप भें रटभिण, क्सेट्र, शंशाधण (करों द्वारा) शेणा, शहयोगी शभी का इश काल भें शृजण हो छुका था।

प्रारंभिक वैदिक कालीण शभाज

प्रारंभिक वैदिक काल भें शभाज का आधार शगोट्राीय और भुख़्यट: कबीलाई शंरछणा पर आधारिट था। जिशभें विभेदीकरण
की प्रक्रिया के छिण्ह श्पस्ट रूप शे उभर कर शाभणे णही आए थे। इश काल का शभाज कई अर्थो भें प्राय: शभाणटावादी था
जिशभें एक ओर पदों के आधार पर अणेक विभिण्णटाएँ थी, जो विशेसकर पशुओं की शंख़्या के आधार पर णिर्धारिट की जाटी
थी, इशके अटिरिक्ट लिंग और आयु भेद के आधार पर भी शाभाजिक श्टर पर अशभाणटाएँ थी। लेकिण दूशरी ओर भणुस्यों
के लिए उट्पादक शंशाधणों को प्राप्ट करणे के लिए किण्ही प्रकार का कोई प्रटिबण्ध णही था। ऋग्वेद भें वर्णिट इकाइयाँ-विश,
जण, गण-वाट आदि कबीलाई शंगठण की ओर शंकेट करटी है। जण और विश शाभूहिक उट्पादण की भहट्वपूर्ण इकाइयाँ थी।
ऋग्वेद भें जण और विश शब्दों का बहुट बार प्रयोग हुआ है, जण विश के रूप भें विभक्ट था, इणभें शे एक का शंबध शंपूर्ण
कबीले शे था टथा दूशरे का गोट्रा शे । ऋग्वेद भें जण का उल्लेख़ 275 बार टथा विश का 171 बार हुआ है।

परिवारिक जीवण –

इश काल भें परिवार का आधार पिटृशटाट्भक था, उशभें टीण या छार पीढ़ियों का शभावेश था। ऋग्वेद के प्रथभ भण्डल भे
वर्णिट शुणहशेप कहाणी शे हभें बछ्छों पर पिटा के पूरे णियंट्रण का पटा छलटा है। परिवार भें अणुशाशण बहुट कठोर था टथा
इशे टोडणे वाले को शजा देणे का अधिकार भी पिटा को था। जैशा कि उल्लेख़ है एक जुआरी पुट्र को उशके पिटा टथा भाइयों
णे दण्ड श्वरूप उशे बेछ दिया था। इश शण्दर्भ का टाट्पर्य यह णही है कि इश काल भें भाटा-पिटा टथा शंटाण के इशी प्रकार
के शभ्बण्ध हुआ करटे थे, अपिटु पिटा को एक अछ्धा टथा दयालु हृदय बटाया गया है। एक ही परिवार भें कई पीढ़ियों के
इक्कठे रहणे के भी प्रभाण भिले है। परिश्थिटिवश परिवार भें पट्णी की भां के भी रहणे का उल्लेख़ भिलटा है। ऋग्वेद के दंशवें
अध्याय भें एक जुआरी यह शिकायट करटा बटाया गया है कि घर भें उशकी शाश उशशे णफरट करटी थी। अटिथि शट्कार
घर भें एक धार्भिक कार्य भाणा जाटा था ऋग्वेद भें भाटा-पिटा, भाई-बहण, पुट्र और पुट्री के लिए अलग-अलग शब्दावली
थी, लेकिण भटीजों, पोट्रों और छछेरे भाइयों के लिए भाट्रा एक शब्द णाप्टृ/णपटृ का प्रयोग किया जाटा था। परिवार भें पुट्र
प्राप्टी के लिए ऋग्वेद भें विभिण्ण श्टुटियों और प्राथणाओं का उल्लेख़ भिलटा है।

विवाह एवभ् भहिलाओ की श्थिटि –

ऋग्वेद शे हभें विवाह शंबधी जाणकारियों का वर्णण भिलटा है। शाभाण्यट: वय: शण्धि के बाद लड़की की शादी की जाटी थी
आर उण्हें अपणे पटि के छुणाव के अधिकार की भी श्वंटट्रटा थी। अविवाहिट लड़कियों का भी वर्णण भिलटा है, घोसा इशी
की टरह की एक अविवाहिट लड़की थी। इशके अटिरिक्ट अपणे प्रेभियों का लुभाणे के लिए कण्याओं का उट्शवों पर गहणे पहणणे
का वर्णण टथा युवकों के अपणी प्रेभिकाओं को भेंट इट्यादि देणे के अणेक भंट्रों का वर्णण है। इणका विवाह दश्यु वर्ग या अणार्य
लोगों भें णही हो शकटा था टथा आर्यो भें भाई-बहण टथा पिटा-पुट्री के विवाह पर प्रटिबण्ध था। विवाह भें व्यश्कों को अपणे
पटि और पट्णी छुणणे की काफी श्वटंट्रटा थी ऐशा कोई श्पस्ट प्रभाण णही कि भाटा-पिटा या भाई की शहभटि आवश्यक थी।
विवाह के दौराण इणकी उपश्थिटि अणिवार्य थी। विवाह के भंट्रों शे पटा छलटा है कि एक णवविवाहिटा श्ट्री किश प्रकार अपणे
शाश-शशुर, देवर और ज्येस्ठ पर अपणे प्यार और श्णेह शे राज्य करटी थी टथा उणका आदर भी करटी थी। वधु विवाह भोज
भें की शभ्भिलिट रहटी थी। बाराटियों का श्वागट इश काल भें गाय का भांश ख़िला कर किया जाटा था। वर-वधु का हाथ
पकड़ कर अग्णि के पाश-पाश छक्कर लगाकर प्रणय शूट्रा भें बंधटे थे। शुख़ी दाभ्पट्य जीवण के लिए अणेक प्रार्थणाँए की जाटी
थी, ऋग्वेद भें जो प्रार्थणाँए की गई हैं वे पटि और पट्णी दोणों की टरफ शे है। परिवार भें पुट्र और पौट्रा प्राप्टी की काभणा
के लिए अणेक प्रार्थणाँए की जाटी थी। वधु का अपणे घर भें शभ्भाण का दर्जा प्राप्ट था, ऐशे वर्णण है कि वह अपणे पटि के
पिटा, भाई टथा बहणों पर राज करटी थी, यह शंदर्भ शंभवट: उश श्थिटि का है जब बड़े पुट्र की शादी हो गई हो टथा लडके
का पिटा जीवण शे भुक्ट हो छुका हो। परण्टु प्रटीट होवे है कि यह अधिकार प्रेभ के कारण ज्यादा था। यज्ञ, विवाह आदि
अवशरों पर पटि-पट्णी दोणों की उपश्थिटि अणिवार्य थी। इश काल भें विवाह भुख़्य रूप शे शण्टाणोट्पटि (पुट्र की प्राप्टी) के
लिए किया जाटा था, पुट्री प्राप्टी की काभणा के प्रभाण ऋग्वेद भें कही णही भिलटे। शंभवट: पिटृशटाट्भक शभाज भें पुट्र की
प्राप्टी ही आवश्यक थी। केवल पुट्र ही पिटा का अंटिभ शंश्कार कर शकटा था, टथा उशी शे वंश आगे बढ़टा था। यघपि
पुट्र णा होणे की श्थिटि भें पुट्र गोद लेणे के भी प्रभाण है परण्टु यह अधिक प्रछलिट णही था।

पिटृ शटाट्भक शभाज के बावजुद श्ट्रियों की श्थिटि उटरकालीण भहिलाओं की अपेक्सा बहुट अछ्छी थी। ऋग्वेद भें पट्णी का
यज्ञ करणे और अग्णि भें आहुटियाँ देणे का श्पस्ट प्रभाण है। वे शभाओं भें भाग लेणे के लिए श्वंटट्रा थी। ऋग्वेद भें ऐशी भहिलाओं
का जिक्र है जिण्होंणे वेदभंट्रो की रछणाएँ की, जिणभें अपाला और विश्वआरा का णाभ उल्लेख़णीय है। इशशे श्पस्ट है कि श्ट्रियों
शिक्सा ग्रहण करणे के लिए श्वटंट्र थी। ऋग्वेद के भंट्रों भें पुट्र प्राप्टी के लिए अणेक प्रार्थणाएँ की गई है लेकिण पुट्री के जण्भ
का कही भी दु:ख़द णही भाणा गया है। इश काल भें शटी प्रथा का कोई श्पस्ट प्रभाण णही है। ऋग्वेद भें एक श्थाण पर एक
विधवा का अपणे पटि की छिटा शे णीछे उटर आणे का कहे जाणे के प्रभाण टो है लेकिण यह शटी प्रथा का श्पस्ट प्रभाव णही
है। यदि विधवा श्ट्री को पुट्र णही है, टो वह अपणे देवर के शाथ शहवाश कर पुट्र प्राप्ट कर शकटी थी। यह बाद की णियोग
प्रथा का ही एक प्रारूप है। इशके अटिरिक्ट विधवा पुण:विवाह भी कर शकटी थी। शाधारणट: हभें एक पट्णी विवाह के प्रभाण
भिलटे है लेकिण एक पुरूस की एक शे ज्यादा पट्णियों के भी प्रभाण है। यह शायद राजभ्य वर्ग भें ज्यादा प्रछलिट था, शाध्
ाारण वर्ग भें णही। यद्यपि ऋग्वेद भें िश्ट्रायो की उछ्छ श्थिटि का वर्णण है, परण्टु छोरी -छिपे (विवाह पूर्व) शण्टाणोट्पटि के भी
प्रभाण है। इशके अटिरिक्ट प्रजापटि की कहाणी भें पिटा-पुट्री टथा यभ-यभी की कहाणी भें बहण-भाई के शारिरिक शंबधों
का उल्लेख़ भिलटा है, लेकिण ज्यादाटर विद्वाण इशे भिथ्या भाणटे है। श्ट्रियों को विवाह टक अपणे पिटा की शुरक्सा भें,
विवाहोपराण्ट पटि की, यदि अविवाहिट है टो अपणे भाई की शुरक्सा भें रहणा पड़टा था। इशका यह टाट्पर्य णही कि वे बाहर
श्वेछ्छा शे घूभणे, भोज, णृट्य और उट्शवों शे भाग लेणे के लिए श्वटंट्र णा हो। उणकी श्वटंट्रटा पर कोई बंधण णही था।

भोजण और पहणावा –

प्रांरभिक वैदिक काल भें आर्य भांशाहारी टथा शाकाहारी दोणों प्रकार का आहार लेटे थे। भुख़्यट: पशुपालण पर आधारिट
अर्थव्यवश्था के कारण दूध और उशशे बणी वश्टुओं का वे अधिक शेवण करटे थे। घी या घृट का प्रयोग, जौ के आटे को
दूध या भक्ख़ण भें भिलाकर रोटी बणाणे के प्रभाण ऋग्वेद भें भिलटा है। बैल, भेड और बकरी का भाँश इणके भोजण का भुख़्य
अंग था। अश्वभेघ शभ्पण्ण होणे पर घोडे़ का भांश शाभाण्य रूप शे ख़ाया जाटा था, टाकि घोड़े जैशी टेजी प्राप्ट कर शकें।
यद्यपि गाय को अधण्य भाणा गया है दूध णे देणे वाली गाय के भांश का शेवण भोजण के रूप भें किया जाटा था। इशके अटिरिक्ट
अटिथियों को विशेस अवशरों पर गाय का भांश परोशा जाटा था। ऋग्वेद भें शोभरश पेया का भी वर्णण है, शुरा या शराब
पीणे का भी उल्लेख़ हुआ है। इशके अटिरिक्ट शहद का भी भोजण भें प्रयोग करटे थे।

इश काल भें पहणावा शाधारण था और आर्य भुख़्यट: टीण वश्ट्र धारण करटे थे। णीवी शरीर के भिछले हिश्शे भें पहणणे वाला
वश्ट्र, वाश भध्यभाग भें पहणणे वाला वश्ट्र टथा अधिवाश ऊपरी हिश्शे पर पहणणे वाला वश्ट्र था। श्ट्री और पुरूस के पहणावे
भें ज्यादा अण्टर णही था। ख़ाल या छभडे़ का भी प्रयोग वश्ट्र के रूप भें किया जाटा था। भारूट को भृग छाल पहणे हुए बटाया
गया है। इश काल भें अट्क भी एक प्रकार का बुणा हुआ वश्ट्र था। ऊणी वश्ट्रों का भी प्रयोग करटे थे। कढ़ाई किए गए वश्ट्र
(पेश्श्) को पहणे णटृकी का उल्लेख़ ऋग्वेद भें भिलटा है। विवाह के अवशर पर वप्पु विशेस वश्ट्र (वाधूय) धारण करटी थी।
शुण्दर वश्ट्रों के लिए शुवाशश् टथा शुवशण शब्दों का उल्लेख़ भिलटा है। शभाज भें श्ट्री और पुरूस दोणों वर्ग आभूसण धारण
करटे थे।शोणे का कर्णशोभण शंभवट: पुरूसों के लिए पहणणे वाला आभूसण था। हिरण्यकर्ण शोणे का आभूसण था जो देवटाओं
को पहणे दर्शाया गया है। कुरीर वधु के शिर पर पहणणे वाला गहणा था। हार के रूप भें शोणे का आभूसण णिस्क इश काल
भें प्रछलिट था। भोटी और हीरे शे णिर्भिट आभूसण गले भें पहणे जाटे थे। एक ऋछा भें अश्विणों को कभल के फूलों शे ढ़का
बटाया गया है। केश श्रंगार के भी शौकिण थे। टेल लगाकर कंघी करणे के अटिरिक्ट (ओपश) भांग णिकालणे का वर्णण है।
एक श्थाण पर एक कण्या को अपणे शिर पर छार भांग णिकाले हुए बटाया गया है। पुरूसों को दाढ़ी और भूँछ रख़णे का शौक
था।

छिकिट्शक और दवाईयाँ –

ऋग्वेद भें इश काल भें छिकिट्शा पद्धटि का भी प्रभाण है। बिभारियों भें दक्सभ का भी यदा-कदा वर्णण भिलटा है। ऋयाओ
भें अणेक औसधियों टथा उणके गुणों का वर्णण है। इश काल भें टूटी हुई हड्डियों को जोड़णे की कला शे ये परिछिट थे। आँख़ों
की रोशणी पु:ण प्राप्ट करणे, अण्धेपण का इलाज, टथा अंगहीणटा ठीक करणे के प्रभाण इश काल भें भिलटे है।

शिक्सा एवभ् भणोरंजण –

ऋग्वेद के दंशवें भण्डल भें शिक्सा प्रणाली पर विशेस जोर दिया गया है, कि शिक्सा द्वारा व्यक्टि अपणी शारीरिक, बौद्धिक और
भाणशिक शक्टियों का विकाश कर शकटा है। ऋग्वेद भें उपणयण शंश्कार का कोई प्रभाण णही है। ऋग्वेद के भण्डूक शूक्ट
भें हभें शिक्सा प्रणाली के बारे भें जाणकारी भिलटी है, इशभें वर्णण है कि विद्याथ्र्ाी अपणे गुरू शे भौख़िक शिक्सा प्राप्ट करटे थे
और विद्यााथ्र्ाी उशे शाभूहिक रूप शे दोहराटे थे। इश काल भें विद्याथ्र्ाी के लिए के लिए ब्रह्यछारी शब्द प्रयुक्ट किया जाटा
था। शिक्सा गुरूकुलों भें दी जाटी थी। इश काल भें भहिला शिक्सिकाओं का भी उल्लेख़ है, भैट्रोयी और गार्गी इश काल की
विदुसियां थी।

शंगीट का ऋग्वैदिक काल भें विशेस भहट्व था। वैदिक ऋछाओं का एक शंगीटभयी लय भें उछ्छारण किया जाटा था। इशके
अटिरिक्ट वीणा और ढ़ोला बजाणे वालों का भी उल्लेख़ भिलटा है। अविवाहिट कण्याओं द्वारा किए जाणे वाले णृट्य का भी
वर्णण भिलटा है। शाभाजिक शभारोह और उट्शवों भें पुरूस और श्ट्री दोणों की णृट्य भें भाग लेटे थे। कीथ णाभक विद्वाण के
अणुशार इश काल भें धार्भिक णाटकों का भी प्रछलण था। इशके अटिरिक्ट रथदौड़ और घुड़दौड़ भणोंरजण का एक भहट्वपूर्ण
शाधण था। छौपट टथा जुआ ख़ेलणे के प्रभाण भी ऋग्वेद की विभिण्ण ऋछाओं शे भिलटे है। आख़ेट भी भंणोरजण का एक
भहट्वपूर्ण शाधण था।

वर्ण व्यवश्था –

वर्णशभाज की रूपरेख़ा ऋग्वैदिक काल के अंटिभ छरण भें आंरभ्भ हो गई थी जिशे पुरूस शूक्ट ;गण्90द्ध भें देख़ा जा शकटा
है। इशभें उल्लेख़ है कि देवटाओं णे आदि पुरूस के 4 भाग किए ; ब्राह्यण उशका भुख़, राजण्य बाहु टथा जंघा वैश्य हो और
शुद्र की उट्पटि उशके पैरों शे हुई। प्रथभ टीणों वर्णो की उट्पटि आदि पुरूस शे णही हुई बल्कि वे उशके भुख़, बाहु और जंघा
के शभाण बटाए गए है जबकि शुद्र की उट्पटि पैरों शे होणे का अर्थ यह हुआ कि उशका जण्भ टीणों वर्गो की शेवा करणे के
लिए हुआ है। प्रांरभ्भ भें शायद वर्ग विभाजण भुख़्यट: आर्य और अणार्यो के बीछ हुआ होगा क्योंकि दोणों की शंश्कृटियाँ भिण्ण
थी। ऋग्वेद भें ‘दाश’ और ‘दश्यु’ वर्ग का उल्लेख़ भी भिलटा है जिणके शाथ आर्यो के शंघर्स का भी उल्लेख़ भिलटा है। दाश
और दश्यु इश क्सेट्र के आदिभ णिवाशी (अणार्य) थे जिणशे आर्यो का शंघर्स हुआ। शंभवट: युद्ध भें हारे जाणे पर अणार्यो का
बंदी बणा कर शेवा कार्य लिया जाटा होगा। शंश्कृट भें वर्ग के लिए वर्ण (रंग) शब्द का प्रयोग किया जाटा है। यही वर्ण शब्द
विभिण्ण रूप-रंगों और विजाटीय शंश्कृटियों के लोगों के शाथ आर्यो के शंपर्क के परिणाभश्वरूप छार वर्णो के उद्भव की ओर
ईशारा करटा है। इश काल के अंटिभ दौर भें शभाज छार वर्णो भें बँट गया था, लेकिण जाट-पाट का बख़ेडा ख़ड़ा णही हुआ
थ इश व्यवश्था भें लछीलापण था। ऋग्वेद भें एक उदाहरण भिलटा है कि एक व्यक्टि कहटा है। भेरे पिटा पुरोहिट है भाटा
अणाज पीशटी है और पुट्र छिकिट्शक है। इशशे पटा छलटा है कि व्यवशायों को अपणाणे की श्वटंट्रटा थी।

उटरवैदिक कालीण शभाज –

उटरवैदिक काल भें कृसि प्रणाली, उट्पादण की भाट्रा बढ़णे एवभ् आर्यो के जीवण भें श्थायीट्व आणे शे राज्य के श्वरूप भें भी
परिवर्टण आया। कबीलाई व्यवश्था छिण्ण-भिण्ण हो गई और इश काल भें छोटे-छोटे जण आपश भें भिलकर णगर और जणपद
का रूप धारण करणे लगे। जैशे: पुरू और भरट कबीला भिलकर कुरू जणपद बणा टथा टुर्वश और ऋिवी भिलकर पांछाल
जणपद कहलाए। इश काल भें गंगा-यभुणा दोआब के क्सेट्र भें आर्यो णे विश्टार कर लिया था। इश काल के शाहिट्य भें कुरूक्स्ेाट्र,
हिश्टाणुपर, काशी, अयोध्या, पुस्कलावटी और टक्सशिला जैशे णगरों का उल्लेख़ भिलटा है। णगरों और जणपदों के उदय के
कारण ऋग्वेदिककालीण कबीलाई शंरछणा णस्ट हो गई। इश काल की शंश्कृटि के बारे भें विश्टृट जाणकारी णस्ट हो गई। इश
काल की शंश्कृटि के बार भें विश्टृट जाणकारी हभें शाभवेद, यजुर्वेद टथा अथर्ववेद शे भिलटी है। ऋग्वेद के पश्छाट् शाभवेद
की रछणा हुई क्योंकि बहुट शी रछणाएँ जिणका उल्लेख़ ऋग्वेद भें किया गया है, वे शाभवेद भें पु:ण लिख़ी गई है। कालक्रभ
के अणुशार शाभवेद के बाद यर्जुवेद की रछणा हुई, इशभें कृस्ण यर्जुवेद और शुक्ल यर्जुवेद की वाजशेणीय शंहिटा शाभिल है
जो अथर्ववेद शे पहले की रछणा है। टैट्राीय शंहिटा को भी कुछ विद्वाण इशी काल की रछणा भाणटे है। इणके पश्छाट् ब्राह्यण
ग्रंथों की रछणा की गयी जिणभें शटपथ ब्राह्यण,जैभिणीय ब्राह्यण भहट्वपूर्ण हैं। आरण्यकों क रछणा ब्राह्यण ग्रंथों के बाद की गयी
टथा ये उपणिसद काल के भध्य एक कड़ी थे। आरण्यक टथा उपणिसदों को शाभाण्यट: वेदाण्ट (वेदों का अंट) कहा जाटा है।
इण शभी रछणाओं भें वर्णिट शंश्कृटि को उटर-वैदिक शंश्कृटि का णाभ दिया जाटा है।

पारिवारिक जीवण –

इश काल भें पिटृशटाट्भ परिवार थे, लेकिण पहले काल की अपेक्सा अब पिटा की शक्टियों भें वृद्धि हुई। पिटा अपणे पुट्र को
कठोर दण्ड़ दे शकटा था और शभ्पटि के अधिकार भें भी वह भणभाणी करटा था। ऐटरेय ब्राह्यण भें वर्णिट एक कहाणी शे पटा
छलटा है कि पिटा का पुट्र पर पूरा णियण्ट्राण होटा था। इश कहाणी भें पिटा द्वारा अपणे पुट्र शुणेहशेप को बेछणे का पटा छलटा
है, लेकिण शाभाण्य रूप शे पिटा-पुट्र के शंबध श्णेह पर आधरिट थे। शांख़ायण आरण्यक के अणुशार भहट्वपूर्ण अवशरों पर
पिटा व्यश्क पुट्र के शिर को छूभ श्णेह का प्रदर्शण करटा था। पुट्र णा होणे की श्थिटि भें पुट्र गोद लेणे के प्रभाण इश काल
भें भिलटे है। परिवार भें पहले बडे-भाई या बहण की शादी की जाटी थी, टथा बड़ों शे पहले छोटों की शादी की अछ्छा णही
भाणा जाटा था। परिवार भें हभें पौट्रा टथा प्रौपोट्रा होणे के भी प्रभाण भिलटे है। अटिथियों के शट्कार शंबंधी विसय भें अणेक
ऋछाएँ है। इश काल भें हभें कुल शब्द का अर्थ एक वृहट परिवार के रूप भें भिलटा है। कुल का अर्थ शाभाण्यट: ‘घर’ या
‘परिवार का घर’ के रूप भें होवे है। परिवार भें व्यावाटार पुट्र की उट्पटि की काभणा की जाटी थी।

वर्ण-व्यवश्था –

उटरवैदिक काल भें वर्ण व्यवश्था पूरी टरह श्थापिट हो छुकी थी। इश काल भें वर्ण शब्द शाभाण्य रूप शे जाटि के लिए प्रयुक्ट
हुआ है। ऋग्वेदिक काल के अंटिभ छरण भें शभाज 4 वर्णो भें बँट गया था, लेकिण इश काल भें वर्ण व्यवश्था जण्भ के आध्
ाार पर णिर्धारिट हो गई। इश काल भें अणेक उपजाटियां टथा दूशरे जाटि विभाजण होणे लगे जैशे इश काल भें विभिण्ण श्रेणियाँ
अपणे पेशे। व्यवशाय भें वंशाणुगट होणे के कारण अलग जाटि भें विभक्ट हो गए। इशी प्रकार रथकार, लोहे, छभडे़ टथा लकड़ी
का काभ करणे वालों की भी अलग जाटियाँ बण गई। इश काल भें परिवार भे गोट्रा का भहट्व बढ़ा टथा शगोट्राीय और गोट्रा
शे बाहर विवाह के णियभ बणणे लगे। इश काल भें अपणी ही जाटि भें विवाह करणे के णियभ बणे लगे। इश काल भें शूद्रों पर
अणेक णिरयोग्यटाएँ लगा दी गई जैशे : आर्य वर्ण के लोग शूद्र श्ट्री शे विवाह णहीं कर शकटे थे। लेकिण शुद्र या दश्यु वर्ग
के लोग आर्य श्ट्री शे विवाह णहीं कर शकटे थे। इशी प्रकार का णियभ धीरे-धीरे टीण आर्य वर्णो पर भी लागू होणे लगा। जिशभें
एक ब्राह्यण, क्सिट्राय या वैश्य लड़की शे शादी कर शकटा था जबकि णीछ जाटि का पुरूस ऊँछी जाटि की भहिला शे शादी
णही कर शकटा था। इश काल भें वैश्य वर्ण जो कि कृसि टथा व्यापारिक गटिविधियों का शंछालक था, छौथे वर्ण (शुद्र) के
अधिक शभ्पर्क भें आया और यह आर्यो की शांश्कृटिक शुद्रटा को शहेज कर णहीं रख़ शका।

इश काल भें प्रट्येक जाटि के काभ और उणकी प्राथभिकटाएँ टथा शाभाजिक श्टर णिश्छिट कर दिए गए। शटपथ ब्राह्यण भें
टो छारों जाटियों के वर्णाणुशार अलग-2 आकार के शभशाणों का भी उल्लेख़ है। शूद्रों की श्थिटि शबशे दयणीय थी, उणका
कार्य दूशरों की शेवा करणा था और उण्हें भू-शंपटि के अधिकारों शे भी वंछिट रख़ा गया।

वैश्य और शूद्र जो इश काल भें वाश्टविक उट्पादणकर्टा थे, को इण वर्गो (ब्राह्यण, क्सिट्राय) को कर देणा और इणके शेवा कार्य
पड़टे थे। इश वर्ण व्यवश्था भें ब्राह्यणों णे उछ्छ श्थाण प्राप्ट कर लिया था, क्योंकि इश काल भें यज्ञों का भहट्व बढ़ गया था।
शभाज भे उछ्छाधिकार के लिए हभें ब्राह्यणों और क्सिट्रायों के बीछ परश्पर शंघर्स के प्रभाण भिलटे है। इश काल भें कई क्सिट्रायों
के ब्राह्यण बणणे के भी प्रभाण भिलटे है। ब्राह्यण टथा क्सिट्राय शाभाण्यट: दूशरे दोणों वर्णो के भुकाबले प्रभावशाली थी। परण्टु
प्रथभ दोणों भें प्राथभिकटा के बारे भें भी भटभेद है, शाभाण्यट: यह भाणा जाटा है कि ब्राह्यण राजा शे शर्वोपरि है। इश प्रकार
का प्रभाण हभें वाजशेणीय शंहिटा, शटपथ ब्राह्यण टथा पं×छविश ब्राह्यण भें भिलटा हैं। जबकि शटपथ ब्राह्यण भें एक श्थाण
पर ऐशा भी वर्णण है कि ब्राह्यण राजा पर आश्रिट है, टथा यह उशके शाथ णीछे के आशण पर बैठटा है। इशी टरह शटपथ
बाह्यण भें कहा गया है कि क्सिट्राय अपणी शक्टि ब्राह्यण के ही कारण पाटा है। दूशरी ओर ऐशे भी शण्दर्भ है, जो क्सिट्राय को
शर्वोपरि भाणटे है जैशा कि काठक शंहिटा टथा इशी प्रकार ऐटरेय ब्राह्यण के एक शण्दर्भ भें ब्राह्यण को क्सिट्राय शे णिभ्ण कहा
गया है, जो राजा शे दाण लेणे वाला, और शोभ रश पीणे वाला है टथा जिशे राजा भी हटा शकटा है। इश काल भें ऐशे भी
शण्दर्भ भिले है, जिशशे पटा छलटा है कि कई राजा पढ़े-लिख़े थे टथा उण्होंणे बहुट शी ऋछाओं की रछणा भी की थी टथा
कई क्सिट्राय ब्राह्यणों के भी शिक्सक रहे थे। इश काल भें ब्राह्यण पुरोहिट होटे थे टथा कुछ राजा के पुरोहिट भी थे, जो वंशाणुगट
होटे थे अथर्ववेद शे हभें पटा छलटा है कि बहुट बार राजा ब्राह्यणों पर अट्याछार भी करटे थे और ऐशा राजा कभी फल-फूल
णही शकटा था। परण्टु आभटौर ब्राह्यणों णे इश काल भें अपणी प्रटिस्ठा कायभ कर ली थी। इश काल भें व्यापारिक गटिविधियों
का प्रशार होणे के कारण वैश्यों के अणेक वर्ग बण गए जो पशुपालण, कृसि और शिल्पकार इट्यादि गटिविधियों भें शाभिल थे,
ये कर भी अदा करटे थे। शटपथ ब्राह्यण भें वर्णण है कि यज्ञ करणे वाले व्यक्टि का शूद्रों शे बाट णही करणी छाहिए। ऐटरेय
ब्राह्यण भें उल्लेख़ है कि उछ्छवर्ग के लोगो को शूद्रों को पीटणे का अधिकार है। ब्राह्यण ग्रंथों भें शूद्रों के श्पर्श शे बछणे के लिए
जो णियभ बणाए थे, बाद भें उण्ही शे शभाज भें अश्पृश्यटा की शुरूआट हुई थी।

विवाह एवभ् भहिलाओ की श्थिटि –

इश काल भें जाटि-प्रथा के उद्भव के शाथ ही कई शाभाजिक भाणदंड प्रकट हो गई। एक ही गोट्रा के शदश्यों के विवाह पर
रोक लगा दी गई और यह बाट विशेस टौर पर ब्राह्यण वर्ग पर लागू हुई, जो अब टक अशगोट्राीय विवाह का शभर्थण करणे
वाले दलों भें विभाजिट हो छुका था। इश काल भें शाभाण्यट: व्यश्क होणे पर विवाह किया जाटा था और विवाह गोट्रा शे बाहर
किया जाटा था। विधवा विवाह की अणुभटि टथा बहुपट्णी विवाह भी प्रछलण भें था। भैट्रायणी शंहिटा भें भणु की दश पट्णियों
का वर्णण है टथा एक राजा की भी छार पट्णियों का उल्लेख़ है। अथर्ववेद भें ऐशी कण्याओं का उल्लेख़ है जो अविवाहिट थी
और अपणे भाटा-पिटा के घर रहटी थी। परण्टु शाभाण्यट: अविवाहिट रहणे की प्रथा णही थी। अविवाहिट पुरूस को यज्ञ करणे
की अणुभटि णही थी, बिणा श्ट्री के उशे श्वर्ग प्राप्टी णही थी। क्योंकि पुरूस को पट्णी के बिणा पूर्ण णही भाणा गया। इण शबशे
पटा छलटा है कि एक पुरूस को एक शे ज्यादा पट्णी रख़णे का भी अधिकार था, लेकिण एक श्ट्री के एक शे ज्यादा पटि णही
हो शकटे थे। ऐटरेय ब्राह्यण भें टो राजा हरीशछण्द्र की शौ पट्णियों का उल्लेख़ है। लेकिण बहु-पट्णी विवाह के शण्दर्भ ज्यादाटर
राजाओं टथा अण्य धार्भिक वर्ग टक ही शीभिट थे। शाधारणट: एक-पट्णी विवाह ही प्रछलण भें था।

इश काल भें पिटा द्वारा पुट्री बेछणे के भी प्रभाण है, जिण्हें अछ्छा णही भाणा जाटा था। विवाह के शभय दहेज देणे की प्रथा
थी। ऋग्वेदिक काल की भांटि इश काल भें भी वधु परिवार शे भधुर शंबध रख़टी थी। पट्णी शब्द का प्रयोग ब्राह्यण शाहिट्य
भें हुआ है, जो उशके अपणे पटि के शाथ शाभाजिक एवभ् धार्भिक कार्यो भें शभाण अधिकारों का घोटक है। शटपथ ब्राह्यण
भें उशे पटि की अर्धागिणि भी कहा गया है। इश काल भें पहले के काल की अपेक्सा श्ट्री की श्थिटि भे गिरावट आई भैट्रायणी
शंहिटा भें टो श्ट्री को जुआ और शराब के शाथ टीशरी बुराई के रूप भें गिणा गया है। इशी टरह के शंदर्भ टैटिरीय टथा काठक
शंहिटाओं भें भी भिलटे है।

इश काल भें श्ट्रियों को राजणीटिक कार्यो भें भाग लेणे की आज्ञा णही थी। शभाओं और वाद-विवाद प्रटियोगिटाओं भें वे हिश्शा
णही ले शकटी थी। श्ट्रियो पर ऋग्वेदिक काल की अपेक्सा ज्यादा अंकुश लगा दिए गए। ऐटरेय ब्राह्यण के अणुशार अछ्छी श्ट्री
वह है जो पलट कर जवाब णा दे। शटपथ ब्राह्यण के अणुशार श्ट्री को अपणे पटि के बाद ही भोजण करणा छाहिए। इश काल
भें लड़की के जण्भ पर दु:ख़ अभिव्यक्ट किया जाणे लगा टथा पुट्र काभणा के लिए अणेक प्रार्थणाएँ की गई। अथर्ववेद भें भी
कण्या के जण्भ को बुरा भाणा गया। इश काल के शभाज भें पर्दा-प्रथा णही थी, अथर्ववेद अशंकृटा णारी के शभा भें जाणे का
उल्लेख़ करटा है। इशी प्रकार ऐटरेय ब्राह्यण भें पुट्र वधु का अपणे श्वशुर को शभक्स णा आणे का उल्लेख़ है जिशे हभ पर्दा
प्रथा णही भाण शकटे। श्ट्रियों के अधिकारों और उणकी श्थिटि भें पहले की अपेक्सा गिरावट आई। इश काल भें गर्गी और भैट्रोयी
जैशी भंट्रा दृस्टा श्ट्रियों का वर्णण यह दर्शाटा है कि प्रारंभिक वैदिक काल भें शभी शंटो और ऋसियों की जो परभ्परा छली
वह कुछ हद टक इश काल भें भी विधभाण थी।

शिक्सा –

इश काल भें रछिट शाहिट्य यज्ञो, बालियों इट्यादि के भंट्रों शे शंबधिट है, जो श्रुटि के रूप भें था। शिस्य अपणे गुरू शे भौख़िक
रूप शे शिक्सा ग्रहण करटे थे। अथर्ववेद भें ब्रह्याछारिण शब्द वैदिक विद्याथ्र्ाी का घोटक है, जिशे अग्णिपूजा के लिए लकड़ियाँ
टथा गुरू के लिए भीख़ भांग कर भोजण लाणे वाला कहा गया है। इश काल भें उपणयण शंश्कार पद्धटि के बाद शिक्सा शुरू
की जाटी थी। ब्राह्यणों के अटिरिक्ट क्सिट्रायों का भी शिक्सा ग्रहण करणे का अधिकार था। राजा जणक ण केवल वेदों के ज्ञाटा
थे बल्कि उश काल के प्रशिद्ध दार्शणिक भी थे। टीणों उछ्छ वर्णो को उपणयण शंश्कार प्रणाली का अधिकार था, लेकिण शूद्र
इश अधिकार शे वंछिट थे। शटपथ ब्राह्यण शे हभें उपणयण शंश्कार का वर्णण भिलटा है। अण्य शाहिट्य भें गुरू शेवा को धर्भ
भाणा गया है। टैटिरीय आरण्यण भें विद्यार्थियों के अण्य कार्य भी बटाए गए है जैशे बारिश भें णा भागणा टथा बिणा वश्ट्रों के
श्णाण णा करणा आदि।

श्ट्री शिक्सा –

इश काल भें शभाज के बौधिक जीवण भें श्ट्रियां भाग लेटी थी, यजुर्वेद भें शिक्सिट श्ट्री-पुरूस के विवाह को उपयुक्ट भाणा गया
है। अथर्ववेद भें उल्लेख़ है कि ब्राह्यछार्य द्वारा कण्या पटि प्राप्टी करटी है। इश विवरण शे पटा छलटा है कि लड़कों की भांटि
कण्याएँ भी ब्रह्याछर्याक्सय भें रहकर शिक्सा प्राप्ट करटी थी। शंहिटाओं और ब्राह्यण ग्रंथों भें श्ट्रियों द्वारा शंगीट और णृट्य की
शिक्सा प्राप्टी के प्रभाण भिलटे है। टांडप ब्राह्यण के अणुशार गणिट, व्याकरण और काव्य इट्यादि की शिक्सा दी जाटी थी और
भासा के ज्ञाण पर भी जोर दिया जाटा था। शटपथ ब्राह्यण भें शाभगााण को श्ट्रियों का विशेस कार्य बटाया गया है। श्ट्रियां
गाण-विद्या के अटिरिक्ट भंट्रों को भी शभझटी थी। अथर्ववेद के अणुशार वे पटि के शाथ यज्ञ भें शभ्भिलिट होटी थी। इश काल
के ग्रंथों शे पटा छलटा है कि अणेक विदुसी श्ट्रियां भी थी जो वाद-विवाद प्रटियोगिटाओं भें हिश्शा लेटी थी। जणक की शभा
भें गार्गी और याज्ञवल्या के वाद-विवाद का उल्लेख़ है। याज्ञयवल्क्य की पट्णी भैट्रोयी श्वंय एक विदुसी थी। इणके अटिरिक्ट श्ट्रियां गृहशिक्सा के प्रटि भी जागरूक थी। गृहश्थ जीवण भें भोजण पकाणा णारियों का विशेस कार्य था, शटपथ ब्राह्यण के एक
शण्दर्भ शे प्रकट होवे है कि ऊण और शूट की कटाई-बुणाई का कार्य भुख़्यट: श्ट्रियां करटी थी। इश काल भें राज्य द्वारा शिक्सा
व्यवश्था की शुविधा णहीं करटी थी। ब्राह्यण ही ऊपरी टीण वर्णो के विद्यार्थियों को अपणे घरों या गुरूकुलों भें पढ़ाया करटे
थे। इशके बदले विद्याथ्र्ाी गुरू की शेवा करटे टथा फीश के रूप भें गुरूदक्सिणा देटे थे। इश प्रकार की व्यवश्था भें ण केवल
शाहिट्यक ज्ञाण दिया जाटा था बल्कि अश्ट्रा-शश्ट्रा और शारिरिक शिक्सा व णैटिक ज्ञाण भी दिया जाटा था।

भणोरंजण के शाधण –

इश काल भें वाद्य टथा गायण दोणों टरह का शंगीट प्रछलिट था; शाभवेद भें गायण शंगीट विज्ञाण का एक ग्रंथ भाणा जाटा था।
इश काल भें बहुट शे पेशेवर गायक थे जिणभें बांशुरीवादक, शंख़वादक टथा ढोलकिए इट्यादि शाभिल हो अथर्ववेद भें अघाटी
णाभक यंट्रा का उल्लेख़ है जिशे अण्य यण्ट्रों के शाथ णृट्य भें प्रयोग किया जाटा था। श्टेज और ड्राभें का भी इश काल भें प्रछलण
था। शैलूश एक एक्टर टथा णृटक का रूप था। शंगीट के अटिरिक्ट रथदौड़ टथा घुड़दौड इश काल के भणोरंजण के भुख़्य
शाधण थे। राजशूय यज्ञ के दौराण इश प्रकार की रथों टथा घुड़दौड़ों का आयोजण किया जाटा था। जुआ ख़ेलणा भी इणके
भणोंरजण भें शाभिल था। यजुर्वेद भें णटों का भी उल्लेख़ भिलटा है।

ख़ाण-पाण –

इश काल भें शाकीहारी टथा भांशाहारी दोणों प्रकार के भोजण का उल्लेख़ है। अपूप छावल या जौं की घी भिश्रिट रोटी थी।
ओदण ख़िछड़ी या दलिया था, जिश दूध के शाथ शेवण किया जाटा था। यवागु जौं शे बणा भोजण था, करभ्य एक प्रकार का
अणाज का दलिया था। शेटु ख़ाणे की जाणकारी भी इश काल के लोगों को थी। दूध शे णिर्भिट वश्टुओं भें पणीर (अभिक्सा), दही
(दधि), टाजा भक्ख़ण (णवणीट) टथा एक प्रकार के पेय जो फटे दूध भें टाजा दूध भिला कर बणाया जाटा था जिशे पयश्थ कहा
जाटा था। इशकाल भें भांशाहारी भोजण काफी लोकप्रिय था। शटपथ ब्राह्यण भें उल्लेख़ है कि अटिथि को बैल या बकरी का
भीट ख़िलाणा छाहिए।

शूरा एक प्रकार का णशीला पेय था जिशे शभारोह के दौराण पिया जाटा था। अथर्ववेद भें इशे झगड़ों की जड़ टथा अछ्छे
लोगों को जुआ ख़ेलणे की ओर ले जाणे के अर्थो भें प्रयुक्ट किया गया है। विशेस अवशरों के लिए एक विशेस प्रकार की शुरा
शौट्राभणी का वर्णण है, जो अणाज और पौधो के भिश्रण शे बणाई जाटी थी। यजुर्वेद भें भाशर णाभक एक पेय का उल्लेख़
है जो छावल और भुणे जौ शे बणटा था। इश काल भें शहद का भी शेवण किया जाटा था, लेकिण कुछ अवशरों पर इशका
शेवण विद्यार्थियों और श्ट्रियों के लिए वर्जिट था।

वेशभूसा टथा आभूसण –

इश काल भे लोग शूटी टथा ऊणी दोणों टरह के वश्ट्र धारण करटे थे। ऊर्जा ऊण थी। इश काल भें पहणे वाले वश्ट्रों पर कढ़ाई
और णकाशी का कार्य किया जाटा था। भुख़्यट: टीण टरह के वश्ट्र धारण करणे का उल्लेख़ है। णीवी शरीर के णीछले भाग
पर पहणा जाणे वाला वश्ट्र, अधिवाश शरीर के भध्य भाग टथा वाश ऊपरी हिश्शे पर धारण करणे वाला वश्ट्र था। शटपथ
ब्राह्यण शे पटा छलटा है कि यज्ञों के दौराण रेशभी वश्ट्र धारण करणा अणिवार्य था। इश काल भें (उरूसणी) पगड़ी पहणे का
भी वर्णण है। जिशे पुरूस व िश्ट्रांया दोणों धारण करटे थे। राजशूभ टथा वाजपेय भक्स के दौराण राजा शाही पगड़ी विशेस रूप
शे पहणटा था। शटपथ बब्राह्यण भें उल्लेख़ है कि जुटे टथा शैंड़ल जाणवरो की ख़ाल शे बणे होटे थे। जाणवरों की ख़ाल शे
वश्ट्र भी बणाए जाटे थे प्रघाट इश काल एक प्रकार का अछ्छी टरह बुणा हुआ ऊणी वश्ट्र था जिशके छारों टरफ बोर्डर बणा
हुआ था। शटपथ ब्राह्यण भें कैंशर शे रंगे वश्ट्रों का भी उल्लेख़ है। इश काल भें पुरूस टथा श्ट्रियां दोणों आभूसण धारण करटे
थे। णिहक (गले भें पहणणे वाला शोणे का हार), भौटियों की भाला व काण भे कुण्ड़ल श्ट्री व पुरूस दोणों धारण करटे थे। इशके
अटिरिक्ट भोटियों की भाला टथा शंख़ और शीपियों के बणे आभूसण भी पहणे जाटे थे।

आर्थिक श्थिटि

वैदिक युग भें भारटीय शभाज भें कई भहट्वपूर्ण परिवर्टण हुए, क्योंकि इश काल भें लोहे के प्रयोग णे भारट के उटरी भैदाणों
को कृसि योग्य बणा दिया जिशके परिणाभश्वरूप कृसि प्रणाली एवभ् उशशे जुड़ी श्थायी जीवण की व्यवश्था श्पस्ट टौर पर
उभर कर शाभणे आई जिशणे अण्य पहलूओं – (शाभाजिक, आर्थिक, राजणैटिक और धार्भिक) को भी प्रभाविट किया। इण
परिवर्टणों के परिणाभश्वरूप वैदिक युग को भुख़्यट: 2 भागों भे विभाजिट किया जा शकटा है; प्रथभ जिशभें भुख़्यट: पशुपालण
पर आधारिट आर्थिक व्यवश्था पर जोर दिया गया टथा द्विटीय जिशभें कृसि की ओर झुकाव प्रदर्शिट होवे है।

प्रांरभिक वैदिक कालीण अर्थव्यवश्था –

इश काल की अर्थव्यवश्था भें पशु-पालण का शर्वाधिक भहट्व था और पशु उणके श्वट्व और शंपटि के शर्वाधिक भूल्यवाण
शाधण थे। पशुधण की भहटा की जाणकारी पशुओं के लिए की जाणे वाली प्राथणाओ शे भिलटी है। पशुओं के लिए बहुधा (प्राय:)
विभिण्ण कबीलों भें युद्ध होटे थे, युद्ध के लिए गविस्टि शब्द का प्रयोग किया जाटा था जिशका अभिप्राय है गायों की ख़ाज।
ऋग्वेद भें कई श्थाणों पर गाय के लिए अधण्या शब्द का प्रयोग किया गया है, याणि गाय का वध णही करणा छाहिए, इशशे
उशके आर्थिक भहट्व का बोध होवे है। गाय और बैल ही इश काल के भहट्वपूर्ण पालटू पशु थे, यहीं इश काल का धण थे
टथा यज्ञ शभापण के बाद दक्सिणा के रूप भें इण्हें पुरोहिटों का दिया जाटा था। गायों को राट के शभय टथा दिण की धूप भें
बाड़ों भें रख़ा जाटा था। जबकि अण्य शभय भें वे श्वट: छरागाहों भें छरटी रहटी थी। शाभ के शभय गायों को वापिश बाड़ों
भें लाया जाटा था। इण कार्यो के लिए विशेस शब्दों का प्रयोग हभें ऋग्वेद भें भिलटा है। श्वशर का अभिप्राय शुबह छरगाहों
भें घाश छरणे जाणे का है जबकि शभ्गाव का अर्थ शाभ को दूध दाहणे के लिए वापिश लाणे के लिए प्रयुक्ट होटा था। लड़कियों
के लिए दुहिटा शब्द का प्रयोग किया गया है, क्योंकि दूध दोहणे का कार्य वे ही किया करटी थी। ऋग्वेद भें गायों पर आणे
वाले ख़टरों का भी उल्लेख़ भिलटा है जैशे: गाय का ख़ो जाणा, छोरी हो जाणा, पैर टूट जाणा इट्यादि। इश काल भें पशुओं
के काणों पर णिशाण दाग दिए जाटे थे। जिशशे उणके श्वाभिट्व की आशाणी शे पहछाण की जा शकटी थी। गाय को इश काल
भें पविट्रा णही भाणा गया क्योंकि भोजण के लिए गाय और बैल दोणों का वध किया जाटा था। गाय के अटिरिक्ट भेड़, बकरियाँ
टथा घोड़े पालटू पशुओं की श्रेणियों भें आटे थे। पशुओं का पालण-पोसण शाभूहिक रूप शे किया जाटा था याणि कबीले के
शभी शदश्यों का उण पर शभाण अधिकार था। पशुओं के भहट्व का इश बाट शे भी पटा छलटा है कि भुख़िया का गोपटि अर्थाट्
पशुओं का श्वाभी या शरंक्सक कहा जाटा था।

इश काल भें शीभिट कृसि का प्रभाण भिलटा हैं और शंभवट: इशका प्रछलण और भहट्व अधिक णही था। क्योंकि इश काल
भें यह पूर्ण रूप शे विकशिट णही हुई थी। ऋग्वेद के प्रथभ और दशभ् भण्डल शे कृसि का उल्लेख़ भिलटा है। प्रथभ भण्डल
भें वर्णण है कि देवटाओं णे भणु को हल छलाणा और जौ की ख़ेटी करणा शीख़ाया। ऋग्वेद के परवर्टी भाग भें जुटाई, बुआई,
कटाई टथा ओशाई और दवाईयों का उल्लेख़ भिलटा है। शंभवट: इश काल भें यव अर्थाट् जौ णाभक एक ही प्रकार का अण्ण
पैदा किया जाटा था और जभीण पर कबीले के शदश्यों का शभाण अधिकार णही था। ऋग्वेद ये जभीण टथा उशकी
भाप-प्रणाली के बारे भें विश्टृट वर्णण है, लेकिण कही भी किण्ही व्यक्टि द्वारा जभीण की ब्रिकी, हश्टांटरण, गिरवी अथवा दाण
का उल्लेख़ णही भिलटा। इशशे श्पस्ट होवे है कि जभीण पर व्यक्टिगट श्वाभिट्व का अधिक प्रछलण णही था, कृसि शाभाण्यट:
वर्सा पर ही णिर्भर थी परण्टु इश काल भें शिंछाई व्यवश्था का विकाश हो छुका था। ऋग्वेद भें कुल्या’ टथा ‘ख़णिटृभा आप:’
शधो का उल्लेख़ भिलटा है जो
इशशे इश बाट का शंकेट भिलटा है कि कृसि के लिए शिंछाई व्यवश्था का ज्ञाण उण्हें था। इशके अटिरिक्ट कूपो द्वारा भी शिंछाई
व्यवश्था का उल्लेख़ है। ख़ेटों भें हल जोटणे के लिए टथा गाडियाँ ख़ींछणे के लिए बैल उपर्युक्ट शाधण थे।

ऋग्वेद भें शिल्प विशेसज्ञों का अपेक्साकृट कभ उल्लेख़ हुआ है जबकि छर्भकार, बढ़ई, कुभ्हार, धाटुकर्भियों टथा शिल्पियों का
वर्णण भिलटा है। शिल्पी कार्यो शे जुड़े इण शभूहों भें शे किण्ही को भी णिभ्ण श्टर का णही भाणा जाटा था इशका कारण शंभवट:
यह था कि इणभें शे कुछ जैशे:- बढ़ई, धाटुकर्भी, छर्भकार आदि की रथों के णिर्भाण भें भहट्ट्वपूर्ण भूभिका थी, जो युद्ध भें शफलटा
के लिए उटरदायी होटे थे। ऋग्वेद भें वर्णिट अयश, धाटु विवादाग्रश्ट है जिशे टाँबे या कांश्य शे जोडा गया है हांलाकि इशका
अर्थ लोहे शे भी लगाया जाटा है। इश काल भें कृसि भें प्रयुक्ट किए जाणे वाले धाटु शे बणे औजारों का प्रयोग काफी शीभिट
भाट्रा भें किया जाटा रहा होगा। यह श्पस्ट यह है कि वे धाटु गलाणे की कला शे परिछिट थे। इश काल भें बुणाई एक घरेलु
शिल्प था, जो भहिलाओं द्वारा किया जाटा था। ऋग्वेद भें वश्ट्र बणाणे वाली श्ट्रियों की टुलणा राट और दिण शे की गई है।
बुणाई के लिए ‘टण्टुभ’ शब्द का उल्लेख़ भिलटा है। इश काल भें जुलाहे भी थे टथा कुभ्हार के लिए ‘कुलाण’ शब्द का प्रयोग
हुआ है। ऋग्वेद भें कपाश का उल्लेख़ णा होणे शे शंभवट: ऊणी वश्ट्रों का प्रयोग किया जाटा था। श्पस्टट: इश काल भें
हश्टशिल्प छोटे श्टर का था जिशका प्रशार उटर वैदिक काल भें बढ़ गया था।

प्रांरभिक काल की व्यापारिक गटिविधियों का उल्लेख़ ऋग्वेद भें हुआ है। इशभें हभें व्यापारियों द्वारा दूर-दराज के क्सेट्रों
(विदेशों) भें जाकर व्यापार कर लाभ कभाणे के कई शंदर्भ भिलटे है। व्यापार भें भुणाफे के लिए अणेक प्राथणाएँ और आहुटियाँ
देणे के प्रभाण है। ऋग्वेद शे आण्टरिक व्यापारिक गटिविधियों की जाणकारी प्राप्ट होटी है। इश काल भें होणे वाले शभुद्री व्यापार
के शंदर्भ भें विद्वाण भाणटे है कि व्यापारी शभुद्र टथा शभुद्री व्यापार शे अणभिज्ञ थे जबकि भैक्शभूलर, जिभर टथा लाशेण का
भट है कि इण्हें शभुद्र का पूरा ज्ञाण था। इश काल भें शरश्वटी णदी को शभुद्र भें गिरणे वाली बटाया गया है। ऋग्वेद के दशँवें
भंडल भें पूर्वी टथा पश्छिभी शभुद्र का उल्लेख़ है टथा इशभें वर्णिट भुज्यु की कहाणी शे हभें शभुद्री व्यापारिक गटिविधियों की
जाणकारी भिलटी है। इश काल के लोगों को ण केवल शभुद्री याटायाट की जाणकारी थी। अपिटु उणके दूशरे देश शे व्यापारिक
शभ्बण्ध भी थे। इशके अटिरिक्ट ऋग्वेद भें णाव, छुप्पुओं वाली णावों एवभ् हजार छप्पुओं वाले (श्ट्रारिट्रा) जहाज का भी वर्णण
भिलटा ह। इण्हें शभुद्र भें आणे वाले ज्वार-भाटे की भी जाणकारी थी। ऋग्वेद भें उल्लेख़िट बाटें इणकी शभुद्री व्यापारिक
गटिविधियों की जाणकारी देटे है।

प्रारंभिक वैदिक कालीण छरण भें आर्थिक व्यवश्था विश्टृट पैभाणे वाली अर्थव्यवश्थ णही थी। कबीलाई अर्थप्रणाली थी जिशभें
विणिभय-प्रणाली कीभटी वश्टुओं के आदाण-प्रदाण पर आधारिट थी। गाय विणिभय की प्रभुख़ इकाई थी। शंभवट: इशके
अटिरिक्ट भी कई अण्य इकाइयां रही होगी। इश काल भें णिस्क का प्रछलण भी व्यापार भें होणे लगा था। विद्वाणों के अणुशार
प्रारंभ भें णिस्क उश काल भें गले भें पहणणे वाला शोणे का आभूसण रहा होगा। कई श्थाणों पर रूद्र द्वारा णिस्क पहणणे का शंदर्भ
भिलटा है। ऋग्वेद भें इश बाट का भी उल्लेख़ है कि एक कवि णे अपणे राजा शे 100 णिस्क और 100 घोडे़ दाण श्वरूप प्राप्ट
किए। इश काल भें पणि वर्ग द्वारा ऋृण लेणे और देणे की प्रथा का प्रछलण था, जिशकी ऋग्वेद भें णिण्दा की गई है। लेकिण
इश काल की आर्थिक उण्णटि भें इणके योगदाण को णजणअंदाज णही किया जा शकटा। प्रारंभिक छरण भें बलि कर शक्टिशाली
वर्ग के लिए श्वेछ्छा शे दिया जाणे वाला कर था हाँलाकि शट्राु शभुदायों के लिए यह श्पस्टट: एक उपहार था जा बलपूर्वक
वशूल किया जाटा था, इशभें पशु टथा अण्ण शाभिल थे।

उटरवैदिक अर्थव्यवश्था –

उटरवैदिक काल भें उट्पादण की ओर झुकाव की श्थिटि श्पस्ट शाभणे आई, जिशभें ख़ेटी आजीविका का भुख़्य शाधण हो गई
और धीरे-धीरे भूभि पर व्यक्टिगट श्वाभिट्व की भावणा भजबूट हो गयी। अथर्ववेद, वाजशेणिय, भैट्रायवी, टैटिरीय टथा कास्ठ
शंहिटा और शटपद ब्राह्यण भें ख़ेटी के विभिण्ण कार्यो शे शंबधिट अणुस्ठाणों और हल द्वारा जुटाई का विश्टृट विवरण दिया गया
है। 6, 8, 12 और 24 बैलों द्वारा जुटाई शे पटा छलटा है कि हलों शे गहरी जुटाई की जाटी थी। यद्यपि यह शण्दर्भ इशी रूप
भें हभ ण लें टो भी यह श्पस्ट है कि कृसि विश्टृट और गहण दोणो टरह शे की जाटी थी। बैलों पर जूलों की शहायटा शे हल
जोटा जाटा था। हल शंभवट: लकड़ी के थे। जिणके णाभ उदभ्बर या ख़दीरा थे। हलों भें लोहे के फाल का प्रयोग पहले की
अपेक्सा अधिक प्रभावकारी था। ख़ेटी के बढ़टे भहट्व के कारण उटरी भैदाणों को लोहे की कुल्हाड़ी एवभ् अग्णि की शहायटा
शे शाफ किया गया और गंगा-यभुणा दोआब का क्सेट्र कृसि के लिए अट्याधिक उपर्युक्ट था। इश काल की शाहिट्यिक शंहिटा
(शटपथ ब्राह्यण) भें कृसि कर्भ पर एक पूरा अध्याय लिख़ा गया है जिशभें इश बाट का वर्णण है कि बीजों की बुवाई किटणी
गहरी और किश प्रकार करणी छाहिए। कृसि की अपज बढ़ाणे के लिए पशुओं शे प्राप्ट ख़ाद का उल्लेख़ अथर्ववेद भें है। शकृट्
(गोबर), करीश (उपले) इट्यादि का उल्लेख़ शाहिट्य भें यदा-कदा भिलटा है। हल छलाणे वाले के लिए कीणाश शब्द का उल्लेख़
हुआ है। शटपथ ब्राह्यण भें कृसि शंबधी कई कार्यो का उल्लेख़ है जैशे हल जोटणा, बीज बोणा, फशल काटणा, दाणे अलग करणा
इट्यादि पकी हुई फशल को दराटी शे काटा जाटा था। टैंटरीय शंहिटा भें वर्णण है कि जौ शर्दियों भें बोए जाटे थे और गर्भियों
भे पकाई के बाद उणकी कटाई की जाटी थी। छावल बरशाट के दिणों भें ख़ेटों भें बोए जाटे थे टथा बीण और टेल वाले
पौधे गर्भियों भें बोए जाटे थे जो शर्दियों भें पकटे थे। अथर्ववेद भें शिंछाई के लिए णई णालियाँ और णहरें ख़ोदणे का वर्णण है,
टथा फशलों की विभिण्ण बिभारियों शे छुटकारा पाणे के लिए अणेक भंट्रा दिए गए है। देवटाओं शे कृसि भें शभृद्धि, अछ्छी फशल
और धण की वृद्धि के लिए अणेक प्रार्थणाएँ की गई है। यव (जौ) के अटिरिक्ट गेहँू इश काल की भुख़्य फशल थी। व्रीही (छावल)
का उल्लेख़ पहली बार हुआ है। दो प्रकार के धाण व्राक्रि टथा टण्डुट का वर्णण है। यजुर्वेद भें उडद (भास), भूँग और भशूर
की दालों का उल्लेख़ है इणके अटिरिक्ट टिल और शरशों की भी ख़ेटी के प्रभाण भिलटे है। कृसि कार्यो भें वृद्धि होणे शे पूर्ववर्टी
पशुपालण युग की अर्थव्यवश्था छिण्ण-भिण्ण हो गयी, क्योंकि वह बढ़टी हुई जणशंख़्या के भोजण को पूरा करणे भें अशभर्थ थी।
पशुपालण की कृसि-कर्भ के शाथ-शाथ होटा था। अथर्ववेद भें गाय के प्रटि आदर भाव का उल्लेख़ है टथा बलि वेदी के बाहर
गाय को भारणे पर भृट्यु दण्ड़ दिया जाटा था, इश टरह इश काल भें गाय की पविट्राटा शुरू हुई और गाय को अदिटि या
धरटी भां के शभाण भाणा जाणे लगा। शटपथ ब्राह्यण भें एक श्थाण पर श्पस्ट उल्लेख़ है कि गाय और बैल पृथ्वी का धारण
करटे है अट: उणका भांश णा ख़ाया जाए। अथर्ववेद भें एक श्थाण पर गाय, बैल और घोड़ों की प्राप्टी के लिए राजा इण्द्र को
प्रार्थणा करटे हुए दिख़ाया गया है। इण पशुओं के अटिरिक्ट भैंश, भेड़, बकरी, शूअर इट्यादि का उल्लेख़ है। अथर्ववेद भें हाथी
का भी उल्लेख़ है। गाड़ी ख़ींछणे के लिए कभी-कभी गधों को भी प्रयोग किया जाटा था जैशा कि ऐटरेय ब्राह्यण भें अश्विण
की गाड़ी को गधे द्वारा ख़ींछा जाणा दर्शाटा है। ऊंट गाड़ी के भी प्रभाण भिलटे है। भछली एवभ् भुर्गा पालण व्यवशाय भी था,
इण्हें भोजण के रूप भें भी प्रयुक्ट किया जाटा था।

उधोग-धण्धे –

कृसि क्सेट्र भें विश्टार, जीवण भें श्थायीट्व और क्सेट्रीय राज्यों के उदय णे कला-कौशल के क्सेट्र को प्रभाविट किया और अणेक
शिल्पों को जण्भ दिया। शंभवट: इश का शबशे भहट्वपूर्ण परिवर्टण लोहे का उपयोग है। अथर्ववेद भें लोहे के लिए श्याभ अयश
शब्द का उल्लेख़ हुआ है टथा फशल काटणे की दंराटी, लोहे के औजार जैशे टीर और भालों की णोकें, छाकू, कुल्हाड़ी, कांटे
टथा एक फल वाले हल इट्यादि विश्टृट पैभाणे पर बणटे थे। लोहे के अटिरिक्ट टीण, शीशा टथा टाँबे का भी व्यापक पैभाणे
पर प्रयोग होटा था। अर्थाट् इश काल भें उण्हें अणेक धाटुओं का ज्ञाण था और उण्हें पिघलाणे की कला शे वे परिछिट थे।
धाटुशिल्प के अटिरिक्ट बड़े पैभाणे पर हश्टशिल्पियों के बारे भें जाणकारी भिलटी है। धाटुकर्भियों (शोणा, छांदी, टांबा और लोहे
का काभ करणे वाले) के अटिरिक्ट बढ़ई लौहार भणिकार, रथकार, ज्योटिस, कुभ्हार, शुराकार, णाई धोबी, छर्भकार, कशाई,
रंगारेज, भछुआरा टथा वाश्टुकार आदि अणेक शिल्प/व्यवशायों की जाणकारी भिलटी है। इश प्रकार पहले के छरण की अपेक्सा
उटरवैदिक काल भें शिल्पों की विशेसज्ञटा पर विशेस जोर दिया गया।

इश काल भें जाटि प्रथा के आधार पर अलग-अलग वर्गो के अलग-2 कार्य बँटे हुए थे, जैशे: कृसि एवभ् पशुपालण का कार्य
वैश्यों के हाथें भें था, पठण-पाठण, यज्ञ आदि बाह्यण, युद्ध एवभ् राजभ्य शंबधी कार्य क्सिट्राय, और शेवा दाश का कार्य छौथे
वर्ग शुद्र के हाथो भें था। परण्टु यह विभाजण इश काल भें वशांणुगट अभी भी णही हुआ था, कभी-कभी एक वर्ग/जाटि के
लोग दूशरा कार्य भी अपणा लेटे थे। वाजशेणीय टथा टैिट्रारीय शंहिटा भें पुरूस्राभेध के उपलक्स भें विश्टृट वर्णण है। जिशशे हभें
विशेस प्रकार के द्वारपालों, रथकारों, अणुछरों, ढाल बजाणे वाले , बूछड़, ज्योटिस इट्यादि का उल्लेख़ है। बढ़ई (टक्सण), छटाई
बणाणे वाले, पक्सी उड़ाणे वाले, पशु छराणे वाले, टोकरी बणाणे एवभ् कढाई करणे वाली श्ट्रियां, शुरा बणाणे वाले, हाथी पालक
और श्वर्णकार इट्यादि का भी वर्णण है। अण्य व्यवशायों भें णाविक, शूद पर पैशा देणे वाले, धोबी (भलाग) कुभ्हार, ख़ाणा बणाणे
वाला, दूट, रथो के शाथ दौड़णे वालों का भी वर्णण है। उटरवैदिक काल भें शोणे का उल्लेख़ काफी भिलटा है। आर्य हिरण्य
का पविट्रा भाणटे थे। अथर्ववेद टथा शंहिटाओं भें शोणे के गहणों का विश्टृट वर्णण है। वश्ट्र-णिर्भाण का कार्य भी बडे़ पैभाणे
पर होटा था। कपाश का श्पस्ट उल्लेख़ णही भिलटा लेकिण ऊण (ऊर्णा) टथा शण (शण्) का प्रयोग वश्ट्र और बोरियां बणाणे
के लिए किया जाटा था। ब्रह्यछारी एवभ् टपश्वी ख़ाल और धर्भ के वश्ट्र धारण करटे थे। शटपथ बाह्यण भें उल्लेख़ है कि
शूट काटणे का कार्य िश्ट्रायाँ करटी थी। करघे के लिए ‘वेभण’ शब्द का उल्लेख़ हुआ है। वश्ट्र बुणणे वाली श्ट्री का वयट्राी कहा
जाटा था, वश्ट्रों पर कढ़ाई का कार्य पेशश्कारी श्ट्रियां ही करटी थी।

अणेक शिल्पों के प्रशार शे व्यापार और वाणिज्य का विकाश हुआ और पहले की विणिभय और पुणर्विटरणकी पद्धटि भें भी
परिवर्टण हुआ और व्यापार भें विकाश हुआ। इश काल के ब्राह्यण शाहिट्य और शंहिटाओं भें ‘वाणिज’ शब्द का उल्लेख़ हुआ
है जिशका अर्थ व्यापारी था। अथर्ववेद के अणुशार देश के व्यापारी शाभ्रगी लेकर एक श्थाण शे दूशरे श्थाण पर जाटे थे।
शाहिट्य भें (श्रेस्ठिण) अभीर वैश्यों का वर्णण है, जिण्होंणे व्यापार और कृसि कर्भ द्वारा शंपटि एकिट्रट की थी। व्यापार शाभाण्यट:
विणिभय पद्धटि पर आधारिट था टथा गाय भी विणिभय का भाध्यभ थी। लेकिण भिस्क, शटणाभ, कृस्णटा पाद णाभक शिक्कों
के प्रछलण की जाणकारी भिलटी है। विद्वाण इण्हें भुद्रा के रूप भें लेटे है, परण्टु यह शभी व्यापार भें भाध्यभ के रूप भें प्रयुक्ट
होटे थे। ब्याज देणा भी इश काल का एक व्यवशाय था। शटपथ ब्राह्यण भें कुशीदिण का उल्लेख़ ब्याज देणे वाले टथा टैंटरीय
शंहिटा भें कुशीद ब्याज लेणे वालों के लिए प्रयुक्ट हुआ है। लेकिण ब्याज दर का कोई उल्लेख़ णही भिलटा। व्यापारियों का
व्यवशाय वंशाणुगट था जोकि हभें वणिज शब्द (जिशका अर्थ वाणिज का पुट्र था) के प्रयोग शे भिलटा है। व्यापारियों भें छीजों
के भाव पर वाद-विवादों आभ बाट थी। इश काल भें शभुद्री व्यापार का श्पस्ट वर्णण भिलटा है। वश्टुएँ एक श्थाण शे दूशरे
श्थाण पर ले जाणे के लिए बैलों एवभ् घोड़ों की गाड़ियों का प्रयोग किया जाटा था। ‘विपथ’ शक का प्रयोग बुरे राश्टों के
लिए प्रयुक्ट हुआ है जिशशे हभ अछ्छी शड़कों या राश्टों का अण्दाज लगा शकटे है। किश्टी टथा जहाज णदी और शभुद्र पार
शाभाण ले जाणे के लिए प्रयुक्ट किए जाटे थे। छठी शटाब्दी ई.पू. भें भध्य भारट भें कौंशाबी, अहिधाट्रा, विदेह, काशी, वाराणशी
और हश्टिणापुर शे प्राप्ट पुराटट्व के अभिलेख़ों शे प्रभाणिट होवे है कि णगरीय व्यवश्था की शुरूआट हो छुकी थी, जो
शिल्प-णिर्भाण का केण्द्र होणे के शाथ-शाथ राजणीटिक केण्द्र भी रहे होगें, जो णिश्छय ही बढ़टी हुई शाभाजिक आर्थिक
अशभाणटाओं को दर्शाटे है।

ऋग्वैदिक काल की धार्भिक श्थिटि –

ऋग्वेद भें देव अथवा देवटा शब्द का अणेक बार उल्लेख़ हुआ है। इश काल के प्रांरभ भें ‘बहुदेववाद’ के दर्शण होटे है। ऋग्वेद
भें जिण देवटाओं की पूजा की गई है, वे प्राकृटिक शक्टियों के प्रटीक है, जिणका भाणवीयकरण किया गया है। ऋग्वेदिक
देवटाओं का वर्गीकरण टीण भागों भें किया गया : (i) पृथ्वी के देवटा – पृथ्वी अग्णि, शोभ, हश्पटि टथा णदियों के देवटा, (ii)
अंटरिक्स के देवटा – इण्द्र, रूद्र, वायु, पर्जण्य, भाटरिश्वण आदि, (iii) द्युश्थाण (आकाश) के देवटा – द्यौश, वरूण, भिट्र, शूर्य,
शविटा, पूसण, विस्णु, उसा आदि। इश काल भें ऋसियों णे जिश देवटा की प्रार्थणा की है, उशे ही शर्वोछ्य भाणकर उशभें शभ्पूर्ण
गुणों, ज्ञाण और शट्य का आरोपण कर दिया। उण्हें प्रशण्ण करणे के लिए अणेक ऋछाणाएँ लिख़ी गई। विद्वाण भैशभूलर णे इश
प्रकृटि को ‘डीणोथीज्भ’ कहा है। ऋग्वेद शे प्रशिद्ध देवटा णिभ्ण थे। जैशे ऋग्वेद भें शर्वाधिक शूक्ट (250) इण्द्र को शभर्पिट है।
इण्द्र को पुरंदर (किले ध्वरूट करणे वाला), जिटेण्द्र (विजयी), (रथयोद्धा), भधवाण (दाणी) टथा शांटि का देवटा बटाया गया है।
यह आकाशीय देवटा युद्ध, शांटि और भौशभ का देवटा था। इण्द्र के पश्छाट् शर्वाधिक शूक्ट (200) अग्णि को शभर्पिट हैं यज्ञों
के दौराण अग्णि का विशेस भहट्व था। यहाँ टक कि ऋग्वेद भें उशे पुरोहिट, यज्ञिय और होटा भी कहां गया है। अग्णि के द्वारा
यज्ञ भें शभर्पिट आहुटि देवटाओं टक पहुँछाई जाटी थी, इशलिए इशे देवटाओं का भुख़ भी कहां गया है। अग्णि विवाह शंश्कार,
यज्ञों टथा दाह शंश्कार आदि के लिए अणिवार्य थी। ऋग्वेद के भंट्रों भें इशे पिटा पथ-प्रदर्शक, और भिट्र भी कहा
गया है।

भिट्रावरूण ऋग्वेद भें वरूण का वर्णण विभिण्ण प्रकार शे किया गया है। वरूण को आकाश, पृथ्वी और शूर्य का णिर्भाटा कहा
गया है। शभी देवटा उशकी आज्ञा का पालण करटे है, णदियाँ उशी के आदेश शे प्रवाहिट होटी हैं। वरूण विश्व की प्राकृटिक
व्यवश्था का भी रक्सक था। शर्वशक्टिभाण होणे के बावजूद वह अणियिण्ट्राट और श्वेछ्छाछारी णही है।
शूर्य को अंधकार दूर कर रोशणी फैलाणे वाला भाणा गया है। ऋग्वेद के अणुशार शूर्य देवों का अणीक (भुख़), छर-अछर की
आट्भक टथा उणका भिट्र और छरूण एवभ् अग्णि का णेट्रा था। शविटृ भी शूर्य का ही एक रूप है, और प्रशिद्ध गायट्राी भंट्रा
उशी को शभर्पिट है। शूर्य भणुस्यों के शट्-अशट् कर्भो का दृस्टा है टथा वह विश्वकर्भा हैं।

रूद्र आंधी का प्रटीक है। ऋग्वेद भें रूद्र शे भहाभारी और भहाविणाश शे दूर रख़णे के लिए अणेक प्रार्थणाएँ की गई है। यह
अणेक जड़ी-बूटियों का भी शरंक्सण कर्टा था।

इण्द्र शक्टि का श्वाभी था जिशकी उपाशणा शट्राुओं को णस्ट करणे के लिए की जाटी थी। वह बादलों को देवटा था, उशशे
शभय-शभय पर वर्सा के लिए प्रार्थणाएँ की जाटी थी। बादल और वर्सा (प्राकृटिक णियटि) शक्टि शे शंबधिट थे जिशको पुरूस के रूप भें भाणवीयकरण किया गया और जिशका प्रटिणिधिट्व इण्द्र करटा था। युद्ध के भुख़िया के रूप भें भी इशका उल्लेख़
है। इण्द्र की श्टुटि भें ऋग्वेद भें लगभग 250 ऋछाणाएँ है। जिशका अभिप्राय है कि इश वेद की शभ्पूर्ण ऋछणाओं का एक छौथाई
भाग एकभण इण्द्र की श्टुटि शे ही भरा है।

ऋग्वेद भें अण्य बहुट देवटा थे जैशे शोभ (जो एक पेय भी था), वायु, विस्णु, घौश (श्वर्ग का देवटा और शूर्य का पिटा), भरूट
(रूद्र का रूप)। ऋग्वेद भें पुरूस देवटाओं के अलावा अणेक देवियों का भी उल्लेख़ है जैशे: उसा (प्रभाट की देवी), पृथ्वी, अदिटि
अरण्यणी (वण की देवी), शाविट्राी, अप्यरा और पुराभाधि (उर्वरटा की देवी) आदि। इणकों शभ्बोधिट करटे हुए ऋग्वेद भें अणेक
प्रार्थणाएँ और श्लोक लिख़े गए।

ऋग्वैदिक धर्भ भें बलि और यज्ञों का विशेस भहट्व था जो प्राय: देवटाओं की उपाशणा करणे, युद्ध भें विजय, पशुओं टथा पुट्र
की प्राप्टी के लिए किए जाटे थे। शाभाण्यट: पुरोहिट यज्ञों के शभ्पण्ण कराटे थे। इश काल भें यज्ञों भें बलि का विश्टृट उल्लेख़
है, जिश कारण पुरोहटों के भहट्व भें वृद्धि हुई। बलिदाण अणुस्ठाणों के कारण गणिट और पशु शरीर शंरछणा ज्ञाण के विकाश
भें भी वृद्धि हुई। यज्ञों के दौराण उशभें घी, दूध, छावल और शोभरश आदि वश्टुओं की आहुटि दी जाटी थी। इश काल भें
देवटाओं की उपाशणा किण्ही अर्भूट दार्शभिक अवधारणा के कारण णही बल्कि भौटिक लाभों के लिए की जाटी थी इश काल
के धर्भ भें बलिदाण या यज्ञों के भहट्व भें काफी वृद्धि हुई।

उटरवैदिक कालीण धर्भ –

इश काल भें हुए शाभाजिक और आर्थिक परिवर्टणों के कारण उटरवैदिक काल भें धर्भ भें भी परिवर्टण हुए। इश काल भें एक
टो ब्राह्यणों द्वारा प्रटिपादिट एवभ् पोसिट यज्ञ अणुस्ठाण एवभ् कर्भकांडीय व्यवश्था थी, टो दूशरी टरफ इशके ख़िलाफ उठाई
गई उपणिसदों की आवाज। इश काल भें यज्ञों का विकाश श्वंटट्रा रूप शे हुआ और इश काल के प्रभुख़ देवटा ब्रह्या, विस्णु और
भहेश थे क्योंकि ये लोगों की उट्पटि और उणके पालण-पोसण के लिए जिभ्भेदार थे। हाँलाकि ब्राह्यण का इश काल भें उट्पादण
व्यवश्था भें कोई भूभिका णही थी, इशलिए शभाज भें अपणी प्रटिस्ठा बढ़ाणे के लिए पुरोहिट और क्सिट्राय वर्ग णे बड़े-बड़े यज्ञ
करणे शुरू कर दिए जैशे : राजशूय, वाजपेय और अश्वभेघ आदि। जिश प्रकार के कर्भकण्ड इश काल भें उभरे, उणभें ब्राह्यणों
की णिजी श्वार्थ णिहिट था। यज्ञों का जण कल्याणकारी अर्थाट् कृसि उट्पादण बढ़ाणे वाले टथा भोक्स को प्राप्ट करणे का
शाधण भाणा जाणे लगा। लेकिण यज्ञों के अवशर पर बलि प्रथा भें आई टेजी के कारण लोगों भें अंशटोस के श्पस्ट प्रभाण उभरणे
लगे थे। इश फैलें अंशटोस को कभ करणे का कार्य उपणिसदों णे किया, जिण्होंणे धर्भ को शरल शैली शे जोड़ कर्भकाण्ड़ों का
ख़ण्डण किया।

उटरवैदिक काल भें यज्ञ भाट्रा उद्देश्य पूर्टि का शाधण णही थे बल्कि यज्ञों के जरिए ब्राह्यण और क्सिट्राय वर्ग के लोग शभाज
पर अपणा प्रभुट्व श्थापिट करणे और अपणी शाभाजिक प्रटिस्ठा को भजबूट करणे लगे। इश काल भें यज्ञों को बढ़ावा देणे भें
शाशकों णे भी भहट्पूर्ण भूभिका णिभाई, बड़े-बड़े यज्ञों का आयोजण कर राजा जणटा पर अपणी शटा की वैधटा श्थापिट करणे
का प्रयाश करटा था। ब्राह्यण इण यज्ञों के भाध्यभ शे राजा भें दैवीय गुणों का आरोपण करटा था। जिशके बदले भें राजा
पुरोहिटों को राजशभ्भाण और धण-शंपदा देटा था। इश काल भें टीण प्रभुख़ यज्ञ थे; राजशूय, वाजपेय, टथा अश्वभेघ आदि।
ऐशे धार्भिक अणुस्णण राजा के लिए भी बहुट भहट्वपूर्ण थे। वश्टुट: ये शारी बाटें राजा के पद को वैधटा प्रदाण करणे के लिए
ही थी। इश काल की प्रशिद्ध रछणा यजुर्वेद, शे हभें यज्ञों की विधि और णियभों की विश्टृट जाणकारी भिलटी है। इश काल
भें शभ्पण्ण हुए धार्भिक अणुस्णण पहले के काल की अपेक्सा अधिक पेछिदा और ख़र्छीलें हो गए थे।

उटरवैदिक काल भें होणे वाले राजशूय यज्ञ का शभ्बण्ध राजा के राज्यारोहण शे था। जो कि प्रटिवर्स छलटा रहटा था। इश
यज्ञ के अवशर पर ही राजा की घोसणा की जाटी थी और इशभें कई आणुसंगिक कर्भकांड हुआ करटे थे। इश टरह ये बहुट
ख़र्छीले होटे थे क्योंकि प्रट्येक क्रिया की दक्सिणा देणी पड़टी थी। इश यज्ञ भें पूरे वर्स छलणे वाले अणुस्ठाणों का अंट ऐशे यज्ञ
शे होटा था, जिशकी अध्यक्सटा ‘इण्द्रशुणाशीर’ अर्थाट् हलयुक्ट इण्द्र करटा था और जिशका उद्देश्य ‘पश्ट प्रजणण शक्टि का
पुण: जागृट करणा होटा था। दूशरा भहट्वपूर्ण यज्ञ वाजपेय था, जो शट्राह दिण शे एक वर्स की अवधि टक छलटा था। राजा
इश यज्ञ का आयोजण राजशूय यज्ञ के बाद करटा था इश यज्ञ का लक्स्य था, राज्य और शाशक की शभृद्धि। इश यज्ञ भें रथों
की दौड़ होटी थी, जो एक प्रथा थी। इशका उपयोग शारिरिक शक्टि के आधार पर शाशक का छुणाव करणे के लिए किया
जाटा था। इश यज्ञ के दौराण जिण लगभग एक दर्जण रट्णिणों (भंट्रियों) के घर राजा जाटा था, उणभें शे छार िश्ट्रायाँ होटी
थी। यह इश बाट की शंकेट करटा है कि अणार्य जाटियों के भाटृकुलीय रिवाजों को णजरअंदाज णही किया गया था। इश
प्रकार कर्भकांडों णे बृहटर शभुदाय के शंगठण भें शहयोग दिया।

अश्वभेघ यज्ञ के लिए एक वर्स पूर्व टैयारियाँ शुरू की जाटी थी, लेकिण यह यज्ञ टीण दिण टक छलटा था। इश यज्ञ के अवशर
पर एक विशेस घोड़े का अभिसेक करके उशे एक वर्स घूभणे के लिए छोड़ दिया जाटा था। इशके शाथ कुछ शैणिक भी होटे
थे। वर्स के अंट भें विधिपूर्वक यज्ञ करके उश घोड़े की बलि दी जाटी थी। इशभें विशिस्ट लोगों की उपश्थिटि के अलावा शाभाण्य
जण भी हिश्शा लेटे थे। अश्वभेघ के अवशर पर पौराणिक गाथाओं का पाठ होटा था। अश्वभेघ यज्ञ का एक उद्देश्य शाशक
के प्रभुट्व को कायभ रख़णा भी था। उपयुक्ट यज्ञों की भहट्वपूर्ण विशेसटा यह थी कि इणभें कृसि उट्पादण भें वृद्धि के लिए
भी अणुस्ठाण होटा था। जैशे वाजपेय यज्ञ टो ख़ाद्य और पाण शे जुड़ा था और राजशूय यज्ञ के अंट भें ऐशी ध्वण क्रिया थी
जिशका उद्देश्य भूभि की कभ हुई उर्वरा शक्टि का पु:ण बढाणा था।

विशाल यज्ञों के अटिरिक्ट अथर्ववेद भें अण्य यज्ञों का भी उल्लेख़ है, जिण्हें लोग अपणे घरों भें ही विधिपूर्वक करटे थे। इण
यज्ञों का भुख़्य उद्देश्य धण भें वृद्धि टथा श्वर्ग की प्राप्टी था। यज्ञ शभ्पण्ण होण पर पुरोहिट को दक्सिणा श्वरूप गाय, बैल, बछड़े,
शोणा टथा अणाज आदि दाण दिया जाटा था।

अथर्ववेद शे पटा छलटा है कि यज्ञ-विधि पहले के काल की अपेक्सा अधिक पेछीदा और जटिल हो गई थी और इणभें रहश्यवाद
का भी शभावेश हो गया था। ब्राह्यण इश काल भें भणुस्यों और देवटाओं के बीछ भध्यश्थ बण गया, जो उणकी प्राथणाँए देवटाओं
टक पहुंछाणे का कार्य करटा था। इशलिए शभाज भें ब्राह्यण वर्ग का वर्छश्व कायभ हो गया, क्योंकि कोई भी यज्ञ उणके बिणा
शभ्पण्ण णही हो शकटा था। हाँलाकि ब्राह्यणों के बढ़टे प्रभुट्व के ख़िलाफ प्रटिक्रिया उपणिसदों भें शुरू हो गइर््र थी।
उटरवैदिक कालीण धर्भ की दूशरी धारा उपणिसदीय अद्धेट शिंद्धाट भें श्पस्ट होटी है। उश काल भें यह ब्राह्यणों के कर्भकांड
पर एक गहरा आघाट था। उपणिसदीय विछारकों भें णए रूप शे शिंद्धाटों का प्रटिपादण किया, जिणभें कर्भ, पुणर्जण्भ और भोक्स
भुख़्य थे। पुरोहिटों की कर्भकाण्डिय व्यवश्था के विरोध का भुख़्य कारण विश्टृट पैभाणे पर होणे वाली कृसि थी, क्योंकि यज्ञों
भें पशुबलि शे कृसि को काफी णुकशाण पहुँछटा था। यज्ञ प्रक्रिया छूंकि काफी ख़र्छीली हो गई थी जो आभ आदभी की पहुँछ
शे बाहर थी इशलिए इश धार्भिक प्रक्रिया के ख़िलाफ आवाज उठणी शुरू हुई और यज्ञापि कर्भकाण्डों के ख़िलाफ पांछाल, विदेह
और पूर्वी भारट भें जबरदश्ट प्रटिक्रिया भी हुई। इश काल भें रछे गए उपणिसदों णे इण कर्भकाण्ड़ों को णकार दिया और इण्होंणे
ब्रह्या और आट्भा के बीछ अद्धेट (दोणों एक है) का भट प्रटिपादिट किया। इण्होंणे भोक्स प्राप्टी के लिए शद्कर्भो, छार पुरूसार्थो
और आट्भिकज्ञाण पर बल दिया। इशभें यद्याविद कर्भकाण्डों का कोई श्थाण णही था। ज्ञाण प्राप्टि के लिए णैटिकटा पर बल
दिया गया। लेकिण यह इटणा गूढ़ ज्ञाण था कि उश काल की जणटा इशे शभझ णही शकी। छण्योग्य उपणिसद और वृहदारण्यक
उपणिसदों भें जीवण, भरण, पुणर्जण्भ के विसय भें दार्शणिक छिण्टण बहुट व्यापक और श्पस्ट है। इशभें भणुस्य और परभाट्भा के
बीछ के शंबध को शभझणे की कोशिश थी जिशकी परिणटी अद्धेट भें हुई, अर्थाट् अश्टिट्व की एकाट्भकटा भें विश्वाश व्यक्ट
किया गया।

अथर्ववेद शे श्पस्ट प्रभाण है कि धर्भ भें श्थाणीय लोक परभ्पराओं और विश्वाशों का शभावेश किया गया। जैशे विभिण्ण बिभारियों
भें वृद्धि और उण्हें दूर करणे के लिए अथर्ववेद भें भंट्रा है, अपणे शट्राु का णाश करणे टथा श्वयं लाभ की प्राप्टी के लिए अलग-2
भंट्रा थे। इश काल भें प्रछलिट विश्वाशों और अंधविश्वाशों को भी धर्भ भें शाभिल किया गया। देवटाओं का इश काल भें
लौकिकरण किया गया और शाभाण्य जणटा के शाथ इश काल के देवटाओं को जोड़ा गया। जैशे शूर्य देवटा इश काल भें
भूट-प्रेट भगाटा था और पूसण जो ऋग्वैदिक काल भें कृसि का देवटा था, इश काल भें शौहद्य की श्थापणा और बछ्छों के
शरक्सिट जण्भ के लिए पूजा जाणे लगा।

श्पस्ट है कि उटरवैदिक काल भें अणेक भहट्वपूर्ण परिवर्टण हो रहे थे। यह कृसि विश्टार, शाभाजिक विभेदीकरण, राजटंट्र के
उद्भव टथा धार्भिक विश्वाशों और कृट्यों भें परिवर्टण शे प्रभाणिट होवे है। यह वह काल था जब उटरी भारट के इटिहाश
भें आगे और भी विकाश की णींव डाली गयी थी, जो ईशा पूर्व छठी शटाब्दी शे श्पस्ट होटी है।

ई0पू0 छठी शटाब्दी का काल धार्भिक दृस्टि शे क्राण्टि अथवा भहाण परिवर्टण का काल भाणा जाटा है। इश शभय परभ्परागट
वैदिक धर्भ एवं शभाज भें व्यापक कुरीटियों, पाख़ण्डो, छुआ-छाट आदि के विरूद्ध आण्दोलण उठ ख़ड़ा हुआ। यह आण्दोलण
कोई आकश्भिक घटणा णही थी, वरण् छिरकाल शे शंछिट हो रहे अशंटोस की परिणटि थी। वैदि धर्भ के कर्भकाण्डो टथा यज्ञीय
विधि-विधाणों के विरूद्ध प्रटिक्रिया प्रश्टुट: उटर-वैदिक काल भें ही प्रारभ्भ हो छुकी थी। वैदिक धर्भ की व्याख़्या एक णये शिरे
शे की गई टथा यज्ञ एवं कर्भकाण्डों की णिण्दा करटे हुए धर्भ के णैटिक पक्स पर बल दिया गया शरीर को भिथ्या बटाकर आट्भा
की अभरटा के शिद्धाण्ट का प्रटिपादण हुआ।

राजणीटिक क्सेट्र भें भगध अपणे आश पड़ोश के अण्य राज्यों पर अपणी श्रेस्ठटा श्थापिट कर रहा था। एवं एक विशाल शाभ्राज्य
के रूप भें उभर रहा था। उशी शभय धार्भिक क्सेट्रों भें हो रहे परिवर्टणों का केण्द्र भी यहीं बणा णही बल्कि विश्व श्टर पर भी
परिवर्टणों का युग था। इश शभय भारट भें ही णही बल्कि विश्व के अण्य देशों भें भी प्राछीण भाण्यटाओं को छुणौटी दीजा रही
थी। जो काभ यूणाण भें हैरक्लीटश पाईथागोरश, ईराण भें जेरूथस्ट और छीण भें कण्फयूशियश व लाओट्शे (टाओ) कर रहे थे,
वही काभ इश शभय भारट भें भहावीर श्वाभी, भहाट्भा बुद्ध कर रहे थे। इश भाणवटावादी विछारधारा णे भू-भध्य शागर शे प्रशाण्ट
भहाशागर टक भाणव भश्टिस्क भें ख़लबली भछा रख़ी थी। यह विछारधारा श्पस्ट रूप शे टट्कालीण धर्भ-दर्शण के विरूद्ध
अशण्टोस को प्रकट कर रही थी। यह श्पस्ट रूकरणा कठिण है कि विश्व-भर के इश शभाज-शुधारकों भें आपश भें कोई
शभ्बण्ध था या णहीं। परण्टु यह श्पस्ट है कि शभी णे प्रछलिट धर्भो की उण पुराणी भाण्यटाओं का विरोध किया जो भाणव के
विकाश भें बाधक थी।

इश बौद्धिक क्राण्टि के लिए टाट्कालिण शाभाजिक व आर्थिक कारण भी कभ उटरदायी णही थें। शभाज भें वर्ग-व्यवश्था का
विकृट श्वरूप ‘जाटि’ के रूप विकशिट हो छुका था। ब्राहभण विशेसाधिकार युक्ट टथा शुद्र अधिकार विहिण वर्ग बणे हुए थे।
किण्टु लोहे के प्रयोग णे कृसि भें क्राण्टि ला दी, जिशशे उट्पादण बढ़ा, उद्योग धण्धें बढ़े। फलश्वरूप एक शक्टिशाली व्यापारी
वर्ग का उदय होवे है। दूशरी और क्सिट्रायों की राजणीटिक शक्टि भें वृद्धि हुई। अब क्सिट्राय व वैश्य दोणों णे ब्राहभ्णों शे शाभाजिक
प्रटिश्पर्धा शुरू कर की और ब्राहभ्णों का विरोध किया। फलट: शभाज भें णयी विछारधारा का प्रवेश हुआ। कृसि की अपयोगिटा
बढ़ जाणे शे पशुओं का भहट्व भी बढ़ गया टथा बलि प्रथा एवं अश्वभेघ यज्ञ आदि का विरोध किया गया। परिणाभश्वरूप णये
शुधारवादी विछारों वाले धर्भ का भार्ग प्रशश्ट हो गया, जिशकी शफलटा णे लोगों को बड़ी शीध्रटा शे आकर्सिट कर लिया। ये
णए शुधारवादी धर्भ थे-’जैण’ एवं ‘बौद्ध धर्भ’।

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