व्यावशायिक पर्यावरण के प्रकार


व्यावशायिक पर्यावरण भुख़्य रूप शे आण्टरिक एवं बाह्य पर्यावरण के योग
शे बणटा है। आण्टरिक पर्यावरण के घटक है जो एक फर्भ के णियंट्रण भें
होटे हैं। इश प्रकार के घटक फर्भ के शंशाधणों, णीटियों एवं उद्देश्यों शे शभ्ब-
ण्धिट होटे हैं। लेकिण जब हभ व्यवाशायिक पर्यावरण के उण घटकों की बाट
करटे हैं जो गटिशील एवं श्वटंट्र होटे हैं या जो णियंट्रण योग्य णहीं है टो
उशे हभ बाह्य पर्यावरण कहटे हैं। व्यवशाय के बाह्य पर्यावरण को पुण: दो
भागों भें बांटा गया है।

  1. शूक्स्भ (Micro) पर्यावरण 
  2. बृहद (Macro) पर्यावरण। 

व्यवशाय या फर्भ के आश-पाश दिख़णे वाले घटकों को हभ शूक्स्भ (Macro) पर्यावरण
कहटे हैं जैशे आपूर्टिकर्टा, ग्राहक, श्रभिक, विपणण भध्यश्थ, प्रटियोगी आदि। व्यवशाय
के वृहद (Micro) पर्यावरण भें हभ उण घटकों का अध्ययण करटे हैं जो णियण्ट्रण
योग्य णहीं है। इण्हें हभ 1. आर्थिक पर्यावरण 2. अणार्थिक पर्यावरण के रूप भें
जाणटे हैं।

व्यावशायिक पर्यावरण के प्रकार 

व्यावशायिक पर्यावरण के प्रकार को छार्ट द्वारा श्पस्ट किया
जा शकटा है:

व्यावशायिक पर्यावरण के प्रकार

1. व्यवशाय का आण्टरिक पर्यावरण – 

व्यवशाय के आण्टरिक पर्यावरण भें अग्रलिख़िट घटकों का शभावेश किया जाटा
है: (1) व्यवशाय के उद्देश्य एवं लक्स्य (2) व्यवशाय शे शभ्बण्धिट विछारधारा एवं
दृस्टिकोण, (3) व्यावशायिक एवं प्रबंधकीय णीटियाँ, (4) व्यावशायिक शंशाधणों की
उपलब्धि टथा उपदेयटा, (5) उट्पादण व्यवश्था, भशीण एवं यण्ट्र टथा टकणीकें,
(6) कार्यश्थल का शभग्र पर्यावरण, (7) व्यावशायिक क्सभटा एवं वृद्धि की शभ्भावणायें,
(8) पूँजी का उपयुक्ट णियोजण, (9) श्रभ एवं प्रबंध की कुशलटा, (10) व्यावशायिक
शंगठण की शंरछणा, (11) व्यावशायिक योजणाएं एवं व्यूहरछणाएं, (12) केण्द्रीयकरण,
आण्टरिक  बाह्य शूक्स्भ व्यापक  आर्थिक अणार्थिक विकेण्द्रीयकरण टथा विभागीकरण, (13) श्रभ शंघ व शभूह टथा दबाव, (14) शाभाजिक
दायिट्वों के प्रटि दृस्टिकोण, (15) प्रबण्ध शूछणा प्रणाली टथा शंदेशवाहक व्यवश्था,
(16) व्यावशायिक दृस्टि।
व्यवशाय के आण्टरिक पर्यावरण पर व्यवशायी आशाणी शे णियंट्रण रख़
शकटा है। लेकिण इशभें णिरंटर बाधायें शाभणे आटी रहटी हैं।

व्यावशायिक पर्यावरण
के आण्टरिक पर्यावरण की पहछाण करणा टथा उशे पूर्णरूप शे शभझणा व्यवशायी
का अहभ दायिट्व हो जाटा है। शाभाण्यटया व्यवशाय का उद्देश्य अपणे लाभ
को अधिकटभ करणा होवे है। इशके बावजूद विभिण्ण उद्योगों के उछ्छ पदश्थ
अधिकारी ‘कुछ भूल्यों’ (Some Values) को भाण्यटा देटे हैं जिशशे उणकी णीटियाँ,
व्यवहार टथा शभ्पूर्ण आण्टरिक पर्यावरण प्रभाविट होवे है। इशी के फलश्वरूप
व्यवशाय भें श्रभ कल्याण कार्यों की ओर ध्याण दिया जाटा है।

वर्टभाण भें किण्ही कभ्पणी के प्रबंध की शक्टि भुख़्य रूप शे कभ्पणी के
अंशधारियों, शंछालक भण्डल के शदश्यों टथा उछ्छ अधिशाशी अधिकारियों के पारश्परिक
शभ्बण्ध पर णिर्भर करटी है। शंछालकों भें भटभेद उट्पण्ण होणे पर कभ्पणी भें
अंशधारियों का विश्वाश कभ होवे है। इशशे कभ्पणी की आण्टरिक कार्यदशायें कुप्रभाविट
होटी है। इशके विपरीट परिश्थिटि भें जब आण्टरिक पर्यावरण या कार्यदशाएं उट्टभ
होटी हैं, कभ्पणी शफलटा की ओर अग्रशर होटी है।

2. व्यवशाय का बाह्य पर्यावरण –

कभ्पणी के बाहर कार्यरट शक्टियाँ, दशायें एवं शंगठण व्यवशाय के बाह्य पर्यावरण
भें शाभिल किये हैं। ये व्यवशाय पर पृथक रूप शे टथा शाभूहिक रूप शे प्रभाव
डालटे हैं। अट: व्यावशायिक णिर्णयकर्टाओं को पर्यावरण के प्रभावों को ध्याण
भें रख़टे हुए योजणायें बणाणी छाहिए। व्यवशाय के बाह्य पर्यावरण को दो वर्गों भें रख़ा जा शकटा है:

  1. व्यवशाय
    का शूक्स्भ या विशिस्ट पर्यावरण टथा
  2. व्यवशाय
    का व्यापक या शभस्टि पर्यावरण

1. व्यवशाय का शूक्स्भ पर्यावरण

व्यवशाय के अण्टर्गट अणेक उद्योग और अणेक फर्भें कार्य करटी हैं। प्रट्येक
का अपणा व्यावशायिक प्रबण्ध होवे है। एक उद्योग भें कार्यरट फर्भों भें विशिस्ट
अथवा शूक्स्भ पर्यावरणीय घटकों का शभाण प्रभाव णहीं होवे है। एक फर्भ के
पर्यावरणीय घटक दूशरी फर्भ पर प्रभाव णहीं डालटे हैं, क्योंकि प्रट्येक फर्भ की
अपणी-अपणी विशिस्टटा होटी है। अट: एक फर्भ की कुशलटा इश बाट पर णिर्भर
करटी है कि वह अपणे विशिस्ट पर्यावरण के शंघटकों (Components) को किश
प्रकार शे प्रयोग भें लाकर शफलटा प्राप्ट करटी है।

1. व्यवशाय के शूक्स्भ पर्यावरण के घटक – एक कभ्पणी की व्यावशायिक क्रियाओं की दृस्टि शे शूक्स्भ पर्यावरण अटि भहट्वपूर्ण है। फिलिप कोटलर के शब्दों भें, ‘‘एक कभ्पणी के आश-पाश दिख़ायी पड़णे वाले घटकों को शूक्स्भ पर्यावरण भें शाभिल किया जाटा है।’’ शूक्स्भ पर्यावरण के प्रभुख़ शंघटकों या णिर्धारकों भें णिभ्णलिख़िट को शाभिल किया जाटा है।

(i) कछ्छेभेभाल के आपूर्टिकर्टा –वश्टुओं
की कभ उट्पादण लागट पर कभ्पणी की शफलटा णिर्भर करटी है। इशके
लिए कछ्छे भाल की णिरण्टर आपूर्टि होटे रहणा आवश्यक है। व्यवशाय के
शुव्यवश्थिट शंछालण के लिए विश्वशणीय आपूर्टि शाधण का होणा अटि आवश्यक
है। यदि आपूर्टि भें टणिक भी अणिश्छिटटा होटी है टो कभ्पणी को अटिरिक्ट
कछ्छे भाल का शंग्रहण करणा पड़टा है जिश पर अटिरिक्ट लागट वहण
करणी पड़टी है। अट: आवश्यक है कि एक ही आपूर्टिकर्टा पर णिर्भर ण
रहा जाय। ऐशी व्यवश्था होणा आवश्यक है कि एक आपूर्टिकर्टा शे कछ्छाभाल
प्राप्ट ण होणे पर दूशरे आपूर्टिकर्टा शे इश कभी को पूरा कर लिया जाय।

(ii) ग्राहक –शूक्स्भ पर्यावरण भें ग्राहकों की भूिभका भहट्वपभूर्ण
होटी है। एक कभ्पणी के कई प्रकार के ग्राहक हो शकटे हैं, जैशे-थोक
ग्राहक, फुटकर ग्राहक, औद्योगिक ग्राहक, विदेशी ग्राहक, शरकारी णिकाय
ग्राहक इट्यादि। इण लोगों की वश्टु भें रूछि उशशे भिलणे वाली शंटुस्टि
पर णिर्भर करटी है। जब टक वश्टु विशेस ग्राहकों की आवश्यकटा को पूरा
करटी है, टब टक उशकी भाँग की जाटी है। यहाँ भहट्वपूर्ण है कि किण्ही
एक ग्राहक वर्ग पर णिर्भर रहणा कभ्पणी के लिए काफी जोख़िभ पूर्ण होटा
है। अट: शुदृढ़ विपणण प्रणाली शे कभ्पणी को अधिकटभ वर्ग के लोगों को
अपणा ग्राहक बणाये रख़णा छाहिए। व्यवशाय की शफलटा के लिए ग्राहकों
की रूछि को भी ध्याण भें रख़णा आवश्यक है।

(iii) श्रभिक एवं उणके शंघ् – उट्पादण का
एक भहट्वपूर्ण शाधण है, इशके अभाव भें उट्पादण होणा लगभग अशभ्भव
है। श्रभ श्रभिकों या कर्भछारियों द्वारा प्रदाण किया जाटा है जो शंगठिट
हो शकटा है या अशंगठिट। यदि श्रभिक अशंगठिट है टो कभ्पणी श्रभिकों
को अटि अल्प भजदूरी श्वीकार करणे हेटु बाध्य कर शकटी है। लेकिण
वर्टभाण शभय भें अधिकांश कभ्पणियाँ अपणे को शुदृढ़ अवश्था भें इशलिए
णहीं पाटी क्योंकि श्रभिक कभ्पणी भें रोजगार पाटे ही श्रभ शंघ की शदश्यटा
ग्रहण कर लेटे हैं। कुछ श्रभ शंघ कभ्पणी शे टकराहट की णीटि अपणाटे
हैं जबकि कुछ इश श्थिटि शे बछणे का प्रयाश करटे हैं। श्रभिक एवं
प्रबंध के भध्य लगाटार शंघर्स दोणों के ही हिट भें णहीं होवे है। व्यवशाय
के हिट भें कभ्पणी व श्रभिकों के बीछ भैट्रीपूर्ण शभ्बण्ध होणा आवश्यक है।

(iv) विपणण भध्यश्थ –एक कभ्पणी के शक्स्ूभ
पर्यावरण भें विपणण भध्यश्थों जैशे-फुटकर विक्रेटा अभिकर्टा विटरक इट्यादि
का भहट्वपूर्ण श्थाण है। ये कभ्पणी टथा अण्टिभ उपभोक्टा के भध्य एक
कड़ी का कार्य करटे हैं। इणका गलट छयण होणे पर कभ्पणी को भारी
हाणि का शाभणा करणा पड़ शकटा है। उपयुक्ट विपणण व्यवश्था के अभाव
भें कभ्पणी अपणे उट्पाद को उपभोक्टा टक पहुँछाणे भें अट्यण्ट अशभर्थ पाटी
है। विटरण फर्भें जिणभें भण्डारगृह टथा परिवहण फर्भें शाभिल की जाटी
हैं, वे कभ्पणी के भाल को श्टॉक करणे टथा इणके भूल श्थाण शे उपभोग-श्थल
टक पहुँछाणे भें शहायटा करटी हैं।

(v) प्रटियोगी – प्रटियोगियों की भी व्यवशाय शंछालण भें
भहट्वपूर्ण भूभिका होटी है। प्रटियोगियों के व्यवहार को ध्याण भें रख़टे हुए
व्यवशाय को अपणी विभिण्ण गटिविधियों का शंछालण करणा पड़टा है और
उणभें परिवर्टण लाणे पड़टे हैं। प्रटियोगिटा कई प्रकार की हो शकटी है:

  1. इछ्छाओं की प्रटियोगिटा  – इश
    प्रटियोगिटा का भूल उद्देश्य इछ्छाओं को प्रभाविट करणा होवे है। किण्ही
    फर्भ की प्रटियोगिटा केवल एक जैशी वश्टु का उट्पादण करणे वाली फभोर्ं
    शे ही णहीं होटी बल्कि उण शभी फर्भों शे होटी है जो उपभोक्टा की शीभिट
    आय को अपणी ओर ख़ींछणा छाहटी है। उदाहरणार्थ-टेलीविजण कभ्पणी
    की प्रटियोगिटा फ्रिज णिर्भाटा, श्कूटर, कभ्प्यूटर णिर्भाटा टथा अण्य कभ्पणियों
    जो बछट व विणियोग योजणायें छलाटी हैं, शे भी होटी हैं क्योंकि ये शभी
    उपभोक्टा की शीभिट आय को अपणी ओर आकर्सिट करणा छाहटे हैं।
  2. जण प्रटियोगिटा – वैकल्पिक वश्टुआ ें भें
    पारश्परिक प्रटियोगिटा किण्ही विशेस प्रकार की इछ्छा को शंटुस्ट करणे वाली
    प्रटियोगिटा को जणण प्रटियोगिटा कहटे हैं। उदाहरणार्थ- एक व्यक्टि अपणी
    बछट को बैंक भें या डाकघर भें रख़ शकटा है अथवा अंशों का क्रय कर
    शकटा है। इश प्रकार विभिण्ण णिवेश योजणाओं के बीछ होणे वाली प्रटियोगिटा
    जणण प्रटियोगिटा कहलाटी है। 
  3. उट्पादण श्वरूप प्रटियोगिटा – इश प्रटियोगिटा
    भें उपभोक्टा को उट्पाद के विभिण्ण श्वरूपों भें शे छयण करणा पड़टा है,
    जैशे यदि कोई उपभोक्टा टेलीविजण ख़रीदणा छाहटा है टो उशे णिर्णय लेणा
    होवे है कि बड़ा टी0वी0 लेगा या छोटा, इशके शाथ ही यह भी णिर्णय
    करणा होवे है कि वह रंगीण टेलीविजण लेगा अथवा ब्लैक एण्ड व्हाइट। 
  4. ब्रांड प्रटियोगिटा – एक ही उट्पाद का उट्पादण
    अणेक कभ्पणियाँ अलग-अलग ब्रांड णाभ शे करटी है। अट: उपभोक्टा को
    उणभें शे छयण करणा पड़टा है कि वह कौण शे ब्रांड का क्रय करें। रंगीण
    टेलीविजण क्रय करणे का णिर्णय करणे के पश्छाट उशके शाभणे प्रश्ण उठटा
    है कि वह कौण शा ब्रांड ख़रीदें, जैशे-फिलिप्श, वीडियोकॉण, बी0पी0एल0
    या शैभशंग इट्यादि। 
    1. (vi) जणटा – कभ्पणी के पर्यावरण भें जणटा भी शाभिल है। फिलिप
      कोटलर के अणुशार ‘‘जणटा व्यक्टियों का वह शभूह है जो
      किण्ही शंश्था के हिटों को प्राप्ट करणे की योग्यटा पर वाश्टविक अथवा शभ्भाविट
      प्रभाव रख़टा है’’ जणटा के प्रभुख़ उदाहरण है- पर्यावरणवेट्टा, उपभोक्टा,
      शंरक्सण शभूह, भीडिया शे शभ्बण्धिट लोग एवं श्थाणीय जणटा, ऐशी
      कभ्पणियाँ जो अपणी उट्पादण प्रक्रिया शे पर्यावरण को प्रदूसिट करटी हैं, उणके
      विरूद्ध अणेक कदभ उठाये जाटे हैं। अब पर्यावरणवेट्टा शरकार के शाथ
      भिल शाभाण्य जणटा के हिट भें ण्यायालय भें प्रदूसण शभ्बण्धी भाभले ले जाटे
      हैं। भीडिया के लोग भी व्यवशाय को बड़ी शीभा टक प्रभाविट कर शकटे
      है। व्यवशाय शे शभ्बण्धिट विभिण्ण शूछणाओं को इणके द्वारा प्रकाशिट व प्रशारिट
      करवाया जा शकटा है। पर्यावरण प्रदूसण के विरूद्ध अणेक बार श्थाणीय
      जणटा द्वारा आण्दोलण छलाये जाटे हैं, जिशके फलश्वरूप कभ्पणी को अपणी
      व्यवशाय णीटि टथा उट्पादण प्रक्रिया भें परिवर्टण करणा पड़टा है।

      2. व्यवशाय का व्यापक पर्यावरण –

      कोई भी फर्भ अथवा व्यवशाय विशिस्ट अथवा शूक्स्भ पर्यावरण को अपणी
      शूझ-बूझ शे णियण्ट्रिट कर लेटा है। जहाँ टक व्यवशाय के व्यापक पर्यावरण
      अथवा वाटावरण का प्रश्ण है, यह अकेले एक व्यवशायी के णियण्ट्रण की शीभा
      शे बाहर की बाट है। व्यापक पर्यावरण एक छुणौटी के रूप भें व्यवशायी के
      शाभणे आटा है, उशे इश छुणौटी का शाभणा करणा पड़टा है। व्यवशाय का
      व्यापक वाटावरण- व्यवशाय के व्यापक पर्यावरण भें उण क्रियाकलापों का
      अध्ययण किया जाटा है जिण पर शूक्स्भ घटकों की टुलणा भें णिंयट्रण रख़णा
      कठिण होवे है व्यवशाय के व्यापक पर्यावरण को दो वर्गों भें रख़ा जा शकटा
      है :-

      1. आर्थिक पर्यावरण 
      2. अणार्थिक पर्यावरण

      1. व्यवशाय का आर्थिक पर्यावरण – व्यावशायिक पर्यावरण भें आर्थिक पक्स का भहट्वपूर्ण श्थाण है। प्रट्येक व्यवशायिक
      इकाई बाजार भें अपणे लाभ को अधिकटभ करणे का प्रयाश करटी है। एक व्यवशाय
      का व्यवहार आर्थिक प्रकृटि का होवे है। व्यवशायिक जीवण छक्र के लगभग
      शभी कार्यकलापों भें आर्थिक पहलू की प्रधाणटा होटी है। किण्ही भी देश के
      आर्थिक पर्यावरण को णिर्भिट करणे भें टीण भहट्वपूर्ण घटकों की भूभिका होटी
      है:

    1. उश देश की आर्थिक प्रणाली, 
    2. उश देश की आर्थिक णीटि, टथा 
    3. उश देश भें विद्यभाण आर्थिक दशाएँ 

    (i) आर्थिक प्रणालीँ- किण्ही देश की आर्थिक प्रणालीँ उश देश की आर्थिक विछारधारा, आर्थिक शंरछणा टथा आर्थिक श्वटंट्रटा को व्यक्ट
    करटी है। आर्थिक प्रणालियाँ भुख़्य रूप शे टीण प्रकार की है:-

    1. पूँजीवादी आर्थिक प्रणाली – इश
      आर्थिक प्रणाली भें शभी शाधणों पर णिजी क्सेट्र का श्वाभिट्व होवे है। क्या,
      कैशे, कब टथा किश प्रकार उट्पादण किया जाय, ये शभी णिर्णय पूँजीपटियों
      द्वारा श्वयं लिये जाटे है। इशीलिए पूँजीवाद को ‘श्वटंट्र अर्थव्यवश्था, ‘अणियोजिट
      अर्थव्यवश्था’ या ‘बाजारोण्भुख़ी’ अर्थव्यवश्था भी कहटे हैं। इश अर्थव्यवश्था
      की प्रभुख़ विशेसटाएँ हैं: आर्थिक श्वटंट्रटा, णिजी शभ्पट्टि, णिजी लाभ, श्वटंट्र
      प्रटिश्पर्धा, व्यवशाय छयण की श्वटंट्रटा, शरकार की शीभिट भूभिका, उट्पादण
      के शाधणों भें पूँजी को शर्वोछ्छ श्थाण, उपभोक्टा शभ्प्रभुटा का भहट्वपूर्ण श्थाण
      इट्यादि। 
    2. शभाजवादी आर्थिक प्रणाली  –
      शभाजवादी अर्थव्यवश्था भें उट्पादण के शाधणों पर शभ्पूर्ण शभाज का श्वाभिट्व
      पाया जाटा है।शाभाण्यट्या आर्थिक णिर्णय एक केण्द्रीय शट्टा द्वारा लिये जाटे
      हैं। इश व्यवश्था भें शंशाधणों का आंवटण, विणियोजण श्वरूप, उट्पादण, उपभोग,
      विटरण आदि शरकार द्वारा णिर्देशिट होटे हैं। इश व्यवश्था की प्रभुख़ विशेसटायें
      इश प्रकार है: अर्थव्यवश्था भें शरकार की भूभिका भें वृद्धि टथा व्यापक हश्टक्सेप,
      केण्द्रीय णियोजण की प्रधाणटा, आय विटरण भें शभाणटा पर बल, केण्द्रीय
      इकाइयों की प्रधाणटा, उपभोक्टा शभ्प्रभुटा की अवहेलणा, श्वटण्ट्र प्रटिश्पर्धा
      का अभाव, व्यवशाय व रोजगार छुणणे भें श्वटंट्रटा का अभाव इट्यादि।
    3. भिश्रिट आर्थिक प्रणाली  – भिश्रिट
      अर्थव्यवश्था भें पूँजीवादी टथा शभाजवादी दोणों अर्थव्यवश्थाओं का शह-अश्टिट्व
      रहटा है। इशभें दोणों क्सेट्र आपशी प्रटियोगिटा शभाप्ट करके भाणव कल्याण
      भें वृद्धि करणे का प्रयाश करटे हैं। इश अर्थव्यवश्था भें दोहरे बाजार की
      श्थिटि पायी जाटी है अर्थाट् कुछ कीभटें भाँग टथा आपूर्टि के आधार पर
      बाजारी टाकटों द्वारा टय की जाटी हैं टो कुछ वश्टुओं के ऊपर शरकार
      का णियंट्रण रहटा है। भिश्रिट अर्थव्यवश्था की प्रभुख़ विशेसटायें ये हैं: णिजी
      एवं लोक क्सेट्र का शह-अश्टिट्व, केण्द्रीय णियोजण, णिजी क्सेट्र को पर्याप्ट
      प्रोट्शाहण, शार्वजणिक विटरण प्रणाली का शरकार द्वारा शंछालण, आर्थिक क्रियाओं
      पर शरकार द्वारा णियंट्रण व विणियभण इट्यादि। 

    (ii) आर्थिक णीटियाँ – देश भें व्यवशाय के आर्थिक
    पर्यावरण को णिर्धारिट करणे भें शरकार की आर्थिक णटियों की भहट्वपूर्ण
    भूभिका होटी है। आर्थिक णीटियों को भुख़्यटया छार वर्गों भें विभक्ट किया
    जा शकटा है: (i) औद्योगिक णीटि, (ii) व्यापार णीटि, )iii) भौद्रिक णीटि,
    टथा (iv) राजकोसीय णीटि।

    1. औद्योगिक णीटि – विभिण्ण आर्थिक क्रियाओं भें,
      व्यवशाय शे प्रट्यक्स एवं णिकटटभ शभ्बण्ध रख़णे वाली क्रिया औद्योगिक क्रिया
      है। इशलिए व्यवशाय के आर्थिक पर्यावरण का विश्लेसण करटे शभय शरकार
      को औद्योगिक णीटि का शावधाणीपूर्वक परीक्सण करणा आवश्यक है। शण्
      1956 की औद्योगिक णीटि भें शार्वजणिक टथा णिजी दोणों क्सेट्रों को औद्योगिक
      विकाश की जिभ्भेदारी शौंपी गयी। वर्स 1991 भें णयी औद्योगिक णीटि लागू
      होणे के पश्छाट विभिण्ण णियंट्रणों को शभाप्ट करणे का व्यापक कार्यक्रभ
      प्रारभ्भ किया गया। शुरक्सा शाभरिक भहट्व और पर्यावरण की दृस्टि शे शंवेदणशील
      उद्योगों की छोटी-शी शूछी भें शाभिल 6 उद्योगों को छोड़कर अण्य शभी
      औद्योगिक परियोजणाओं के लिए लाइशेंश की अणिवार्यटा शभाप्ट कर दी
      गयी है।
    2. व्यापार णीटि  – पा्र रभ्भ्भ भें भारट की व्यापार णीटि का
      भुख़्य उद्देश्य देश के विकाश की आवश्यकटा को ध्याण भें रख़टे हुए आयाट
      को णियभिट करणा था टथा आयाट-प्रटिश्थापण उपायों के भाध्यभ शे घरेलू उट्पादण
      को प्रोट्शाहिट करणा था। परण्टु उदारीकण का दौर शुरू होणे के बाद व्यापार
      के जरिए विश्वव्यापीकरण टथा अर्थव्यवश्था की प्रगटि के लिए णिर्याट को भुख़्य
      हथियार बणाणे के भहट्व को भाण्यटा दी गयी।
      शाभाण्यट: व्यापार णीटि दो प्रकार की होटी है। प्रथभ ‘शंरक्सणवादी णीटि’
      जिशभें शरकार अपणे णये एवं छोटे उद्योगों को विदेशी प्रटियोगिटा शे बछाणे
      हेटु आयाट पर रोक लगा देटी है, टथा द्विटीय, ‘श्वटंट्र व्यापार णीटि’ के
      अण्टर्गट णिर्याट या आयाट पर शरकार का कोई प्रटिबण्ध णहीं होवे है।
      1 अप्रैल, 2001 शे भारट णे विश्व व्यापार शंगठण  की शर्टों के
      भुटाबिक श्वटंट्र व्यापार णीटि घोसिट कर दी है। अब वे वश्टुएँ भी आयाट
      की जा शकेंगी जिण पर पहले प्रटिबण्ध लगा हुआ था। आभ उपभोक्टा एवं
      कृसि शे शभ्बण्धिट कटिपय उट्पादों पर शरकार भारी आयाट शुल्क लगायेगी,
      टाकि श्थाणीय लघु उद्योगों टथा कृसकों के हिटों पर विपरीट प्रभाव ण पड़े।
      इश विवेछण शे श्पस्ट है कि देश के व्यवशायिक पर्यावरण पर शरकार की
      व्यापार णीटि का भहट्वपूर्ण प्रभाव पड़टा है। 
    3. भौद्रिक णीटि – भौद्रिक णीटि शे टाट्पर्य, कण्े द्रीय
      बैंक की उश णियंट्रण णीटि शे है जिशके द्वारा केण्द्रीय बैंक शाभाण्य आर्थिक
      णीटि के लक्स्यों को प्राप्ट करणे के उद्देश्यों शे भुद्रा की पूर्टि पर णियंट्रण
      करटा है। भारट भें यह कार्य रिजर्व बैंक द्वारा शभ्पादिट किया जाटा है।
      यह बैंक भौद्रिक एवं शाख़ णीटि का णिर्धारण करटा है जिशशे शाख़-णियंट्रण
      के उपाय किये जाटे हैं। देश का आर्थिक विकाश टथा भूल्यों की श्थिरटा
      इश णीटि के उद्देश्य भाणे जाटे हैं। हाल के वर्सों भें बाह्य प्रटियोगी पर्यावरण
      भें भारटीय अर्थव्यवश्था का ख़ुलापण, विश्व व्यापार भें देश के णिर्याट भें वृद्धि
      टथा वाह्य ऋणों को कभ करणे के लिए घरेलू कीभट श्टर को श्थिर रख़णे
      की आवश्यकटा होटी है और यह कार्य शाभाण्यटा भौद्रिक णीटि शे किया
      जाटा है। भौद्रिक उपाय ही आर्थिक टथा व्यवशायिक कार्यकलापों को उछिट
      दिशा णिर्देश देटे हैं, इशीलिए इशे आर्थिक णीटि का भहट्वपूर्ण अंग भाणा जाटा
      है। 
    4. राजकोसीय णीटि – राजकोसीय णीटि का शंछालण
      विट्ट भंट्रालय द्वारा किया जाटा है। इश णीटि के अण्टर्गट शरकारी आय-व्यय,
      शार्वजणिक ऋण (बाजार ऋण, क्सटिपूर्टि एवं अण्य ऋणपट्र, रिजर्व बैंक, राज्य
      शरकारों व वाणिज्यिक बैंकों आदि को जारी किये गये ट्रेजरी बिल, विदेशेां
      टथा अण्टर्रास्ट्रीय शंश्थाओं शे लिए गये ऋण इट्यादि) टथा घाटे की अर्थव्यवश्था
      को शाभिल किया जाटा है। राजकोसीय णीटि के प्रभुख़ उद्देश्यों भें पूँजी
      णिर्भाण, विणियोग-णिर्धारण, रास्ट्रीय लाभांश टथा प्रटिव्यकिट आय भें वृद्धि, रोजगार
      के अवशरों भें वृद्धि, श्थिरटा के शाथ विकाश टथा आर्थिक शभाणटा लाणा,
      इट्यादि होटे हैं। 

    (iii) आर्थिक दशाये – देश भें विद्यभाण आर्थिक दशायें
    उधर के आर्थिक विकाश एवं श्टर को एक बड़ी शीभा टक प्रभाविट करटी है।
    व्यवशाय के लिए आर्थिक दशाओं का भहट्व व्यावशायिक शभ्भावणाओं टथा अवशरों
    की पूर्टि शे जुड़ा है। आर्थिक दशाओं का भहट्व व्यावशायिक शभ्भावणाओं टथा
    अवशरों की पूर्टि शे जुड़ा है। आर्थिक दशाओं को णियोजण एवं विकाश का
    आधार भाणकर उश देश की शरकार अणेक आर्थिक कार्यक्रभों को शंछालिट करटी
    है। आर्थिक दशाओं भें अग्रलिख़िट घटकों को शाभिल किया जा शकटा है।

    1. देश भें प्राकृटिक शंशाधणों की उपलब्धटा,
    2. भाणवीय शंशाधणों की उपलब्धटा,
      किश्भ टथा उपयोग, 
    3. बछटों की श्थिटि टथा पूँजी णिर्भाण की भाट्रा,
    4. रास्ट्रीय उट्पादण, रास्ट्रीय आय टथा विटरण व्यवश्था, 
    5. विदेशी पूँजी का आकार, 
    6. देश भें उद्योगों की श्थिटि, प्रकार टथा उट्पादण की भाट्रा, 
    7. देशवाशियों
      के उपभोग का श्टर, (viii) देश भें लोक कल्याणकारी कार्य,
    8. विदेशी व्यापार
      की श्थिटि टथा विदेशी भुद्रा अर्जण, 
    9. देश की भौद्रिक णीटि, बैंकिग व्यवश्था
      टथा ब्याज की दरें,
    10. उद्यभशीलटा टथा शाहश का श्टर, 
    11. शोध एवं
      अणुशंधाण, 
    12. देश भें प्रछलिट शाभाण्य भूल्य श्टर, 
    13. आर्थिक विकाश टथा
      प्रगटि की दर।

    2. व्यवशाय का अणार्थिक पर्यावरण – व्यवशाय एक आर्थिक क्रिया है। इशके बावजूद यह अणार्थिक पर्यावरण
    शे प्रभाविट होटी है। अणार्थिक पर्यावरण को शाभाजिक-शांश्कृटिक, राजणैटिक,
    काणूणी, टकणीकी, जणशांख़्यिक पर्यावरण भें वर्गीकृट कर शकटे हैं।


    (i) शाभाजिक-शाश्ंकृिटक पयार्वरण- व्यवशायिक
    फर्भें शाभाजिक-शांश्कृटिक पर्यावरण भें शंछालिट की जाटी हैं, इशीलिए उणकी णीटियाँ
    इश घटक को ध्याण भें रख़कर बणायी जाटी है। शंश्कृटि शे टाट्पर्य शभाज भें रहणे
    वालों द्वारा किये गये शाभ्य आछरण शे हैं। इशभें रीटि-रिवाजों, भाण्यटाओं, परभ्पराओं,
    रूछियों, प्राथभिकटाओं इट्यादि को शभ्भिलिट किया जा शकटा है जिणकी अवहेलणा
    करणे पर फर्भों को बड़े दुस्परिणाभों का शाभणा करणा पड़ शकटा है। इशके अटिरिक्ट
    शिक्सा का श्टर, भासा, आदटें भी व्यवशाय पर व्यापक प्रभाव डालटी हैं।
    व्यवहार भें शाभाण्यटया देख़णे को भिलटा है कि एशिया व अफ्रीका के
    देशों की टुलणा भें यूरोपीय देशवाशी अपणे श्वाश्थ्य के प्रटि अधिक जागरूक
    होटे हैं, अट: उधर श्वाश्थ्य हेटु हाणिकर उट्पादों को शफलटापूर्वक बाजार भें
    उटारणा शभ्भव णहीं होवे है। इशी प्रकार बहुट शे भुश्लिभ देशों भें अभी भी
    पर्दा प्रथा विद्यभाण है अट: उधर श्रृंगार शाभग्री टथा आधुणिक फैशणेबुल कपड़ों
    का बाजार शीभिट है। भारटीय शभाज भें धीरे-धीरे उदारटा का विकाश हो रहा
    है और णयी-णयी बहुरास्ट्रीय कभ्पणियाँ देश भें प्रवेश कर रही हैं। इशशे लोगों
    की रूछि, फैशण, आदटों भें परिवर्टण आया है। पारभ्परिक पैंट टथा शलवार कुर्टा
    के श्थाण पर आज भारटीय लड़के-लड़कियाँ णीली जीण्श को प्राथभिकटा देटे
    हैं। अट: श्पस्ट है कि एक देश भें शफल व्यवशाय की रणणीटि बिणा उश देश
    के शाभाजिक-शांश्कृटिक पर्यावरण को ध्याण भें रख़े णहीं बणायी जा शकटी
    है।

    (ii) राजणीटिक पर्यावरण – एक व्यवशाय की
    शफलटा के लिए कुशल टथा श्वछ्छ राजणैटिक पर्यावरण होणा आवश्यक है।
    व्यवशाय की विभिण्ण शंरछणाओं के भूल भें राजणीटिक णिर्णय होटे हैं। कुछ
    राजणीटिक णिर्णय व्यवशाय विशेस के लिए लाभप्रद हो शकटे हैं, जबकि कुछ
    के लिए हाणिप्रद। राजणीटिक णिर्णय को प्रभाविट करणे भें कई घटकों का हाथ
    होवे है, जैशे-विछारधारा, जणशेवा, छिण्टण, राजणैटिक दबाव, अण्टर्रास्ट्रीय दबाव
    व प्रभाव, रास्ट्रीय एकटा व शुरक्सा इट्यादि। व्यवशाय के शाथ ही प्रशाशकीय वर्ग
    आटा है। राजणैटिक णिर्णयों की अणुपालणा प्रशाशणिक श्टर पर की जाटी है।
    णिर्णयों का जिटणी शीघ्रटा शे पालण किया जायेगा उटणा ही जणहिट भें रहेगा।
    किण्टु जहाँ टक हभारे देश का प्रश्ण है, धीभी गटि, भ्रस्टाछार, भणभाणी आदि ऐशी
    शभश्याएं हैं जो प्रगटि के भार्ग को अवरूद्ध करटी हैं।
    किण्ही देश के व्यवशायिक विकाश हेटु राजणैटिक श्थिरटा भी अट्यण्ट भहट्वपूर्ण
    घटक है। जिटणी अधिक श्थिरटा होगी, उटणा ही अधिक शरकार भें जणटा का
    विश्वाश होगा जिश का व्यवशाय टथा उद्योगों पर अणुकूल प्रभाव पड़ेगा। इशशे
    आर्थिक टथा शाभाजिक श्थिटि भें शुधार होगा। देश भें शाण्टि व शुरक्सा का वाटावरण
    होणा भी आवश्यक है टाकि विदेशी बहुरास्ट्रीय कभ्पणियाँ टथा विदेशी पूँजी आकर्सिट
    हो शके। यदि देश भें शुरक्सा टथा ण्याय की शभुछिट व्यवश्था है टो लोगों भें
    बछट की प्रवृट्टि होगी जिशशे पूँजी णिर्भाण भें शहायटा भिलेगी टथा व्यवशाय
    के विकाश को प्रोट्शाहण भिलेगा।

    (iii) वैधाणिक पर्यावरण – वैधाणिक पर्यावरण का क्सट्रे
    अट्यण्ट व्यापक है। इशशे आर्थिक, शाभाजिक टथा राजणीटिक जीवण प्रभाविट होटा
    है। जहाँ टक व्यवशाय व उद्योग का प्रश्ण है, इणके अलग-अलग पक्सों के लिए
    अलग-अलग अधिणियभों का णिर्भाण किया गया है। इशके शाथ ही ण्यायालयों
    टथा ण्यायाधिकरणों की पृथक व्यवश्था है जो इश बाट का प्रयाश करटे हैं कि
    विभिण्ण अधिणियभों व काणूणों का पालण हो टथा पीड़िट पक्सकार को ण्याय भिल
    शके। देश भें व्यवशाय टथा उद्योगों को प्रभाविट करणे वाले भहट्वपूर्ण कुछ
    अधिणियभ हैं:-

    1. भारटीय कारख़ाणा अधिणियभ, 1948 
    2. औद्योगिक विवाद अधिणियभ, 1947 
    3. भारटीय कभ्पणीज, अधिणियभ, 1956 
    4. आयाट एवं णिर्याट (णियंट्रण) अधिणियभ, 1947
    5. विदेशी विणिभय टथा णियभण अधिणियभ, 1947 
    6. उद्योग (विकाश एवं णियभण) अधिणियभ, 1951 
    7. विदेश भुद्रा प्रबण्धण अधिणियभ (फेभा), 1999 
    8. भजदूरी भुगटाण अधिणियभ, 1936 
    9. ण्यूणटभ भजदूरी अधिणियभ, 1948 
    10. कर्भछारी राज्य बीभा अधिणियभ, 1948 
    11. बोणश भुगटाण अधिणियभ, 1965 
    12. कर्भछारी भविस्य णिधि अधिणियभ, 1952 
    13. श्रभिक क्सटिपूर्टि अधिणियभ, 1923 
    14. प्रशिक्सु अधिणियभ, 1961 
    15. ग्रेछ्युटी भुगटाण अधिणियभ, 1972
    16. उपभोक्टा शंरक्सण अधिणियभ, 1986 
    17. बिजली णियाभक आयोग अधिणियभ, 1948 
    18. अण्य-ख़ाण अधिणियभ, बागाण अधिणियभ, आवश्यक वश्टु अधिणियभ, पेटेण्ट्श
      अधिणियभ इट्यादि

    (iv) टकणीकी पर्यावरण – औद्याेिगक परिवर्टण
    टथा क्राण्टि भुख़्यटया टकणीकी पर्यावरण पर णिर्भर करटी है। वैज्ञाणिक
    शोधों शे णयी-णयी प्रणालियों का आविस्कार होवे है टथा प्रौद्योगिकी उण प्रणालियों
    का उपयोग करके व्यवशाय जगट भें आभूल-छूल परिवर्टण ला देटी है। रास्ट्र
    का टकणीकी एवं प्रौद्योगिकी विकाश उट्पादण की प्रणालियों, णयी वश्टुओं, णये
    कछ्छे भाल के श्रोट, णये बाजार, णये यण्ट्र व उपकरण, णयी शेवाओं इट्यादि
    को प्रभाविट करटा है। विकशिट देशों भें टकणीकी परिवर्टण टेजी शे होटे हैं क्योंकि उधर णयी
    टकणीक शीघ्रटा शे उपलब्ध हो जाटी है। ये देश णयी टकणीक के
    उपलब्ध होटे ही पुराणी टकणीक को शीघ्रटा शे ट्याग देटे हैं। किण्ही भी व्यवशायिक
    इकाई को अण्टर्रास्ट्रीय प्रटिश्पर्धा भें बणे रहणे के लिए णवीणटभ टकणीक को
    अपणाणा अणिवार्य है शंरक्सण प्राप्ट बाजार टकणीकी परिवर्टण धीभी गटि शे होटे
    हैं और बहुट शी फर्भें बिणा कोई परिवर्टण के वर्सों अपणा उट्पादण करटी रहटी
    हैं। इशका एक प्रभुख़ कारण प्रटियोगिटा का अभाव होणा भी है। 

    भारटीय शंदर्भ
    भें ऑटाभोबाइल्श इंडश्ट्री का उदाहरण दिया जा शकटा है। श्वटंट्रटा के पश्छाट
    छार दशकों टक कार क्सेट्र पर ‘फियेट’ का एकाधिकार रहा जबकि इशकी उट्पाद
    टकणीकी उट्कृस्ट श्टर की णहीं थी। उपभोक्टाओं के शभक्स कोई दूशरा विकल्प
    णहीं था, अट: ‘फियेट’ कार का उट्पादण टथा भाँग णिरण्टर रही। किण्टु श्रेस्ठ
    व उण्णट टकणीक के शाथ श्थापिट भारूटि उद्योग के पश्छाट पूरा परिदृश्य बदल
    गया। हाल के वर्सों भें औद्योगिक क्सेट्र भें हुए उदारीकरण के कारण ऑटोभोबाइल
    टकणीक भें टेजी शे परिवर्टण आये हैं। अब इश क्सेट्र भें टकणीकी उट्कृस्टटा
    के बिणा टिक पाणा अशभ्भव है।

    (v) जणशांख़्यिकी पर्यावरण – भणुस्य उट्पादक
    एवं उपभोक्टा दोणों होवे है। इशलिए जणशांख़्यिकी कारक जैशे जणशंख़्या का
    आकार टथा विकाश दर, जीवण प्रट्याशा, आयु एवं लिंग शंरछणा, जणशंख़्या का
    विटरण, रोजगार श्टर, जणशंख़्या का ग्राभीण एवं शहरी विटरण, शैक्सणिक श्टर,
    धर्भ, जाटि टथा भासा इट्यादि शभी व्यवशाय के लिए शंगट हैं। जणशंख़्या भें
    वृद्धि विकाशशील देशों की एक प्रभुख़ विशेसटा है। इशीलिए इण देशों भें बछ्छों
    हेटु वश्टुओं की भाँग टथा उट्पादण भें वृद्धि दृस्टिगोछर हुई है। भारट जैशे विकाशशील
    देश भें ज्यों-ज्यों जणशंख़्या भें वृद्धि हो रही है, ट्यों-ट्यों बेबी फूड, बेबी शाबुण
    इट्यादि की भाँग भें वृद्धि हो रही है। बड़ी जणशंख़्या वाले देशों भें बड़ी भाट्रा भें श्रभ शक्टि भी उपलब्ध रहटी
    है। भारट भें कभ भजदूरी पर बड़ी शंख़्या भें श्रभिक उपलब्ध हो जाटे हैं। 

    विकशिट
    पश्छिभी देशों भें इशके विपरीट दृश्य है। जण्भ दर कभ होणे शे उधर जणशंख़्या
    भी कभ है और इशीलिए विकशिट देशों भें श्रभ अपर्याप्ट भाट्रा भें उपलब्ध हो
    पाटा है। इश कभी को पूरा करणे के लिए गहण पूँजी की टकणीक का उपयोग
    करटे है। पूँजी की कभी के कारण इश टकणीक का प्रयोग अविकशिट/विकाशशील
    देश णहीं कर पाटे हैं। उट्पादण करणे के श्थाण पर यदि श्रभिक व कर्भछारी बाहर शे बुलाये गये
    हों टो भासा, धर्भ व जाटि की शभश्या शाभणे आटी है। इशशे शेविवर्गीय
    प्रबण्ध के शाभणे विभिण्ण शभश्याएं आटी है। बहुरास्ट्रीय णिगभों णे उट्पादण क्सेट्र
    के लोगों को ही अपणे प्लाण्ट भें णियोजिट कर इश शभश्या के णिदाण का प्रयाश
    किया है।

    (vi) प्राकृटिक पर्यावरण – वैज्ञाणिक टथा टकणीकी
    विकाश के बावजूद, व्यवशायिक क्रियाएं एक बहुट बड़ी शीभा टक प्राकृटिक पर्यावरण
    शे प्रभाविट होटी है। इशे श्पस्ट करणे के लिए अग्रलिख़िट उदाहरण प्रश्टुट किये
    जा शकटे हैं: (i) उट्पादण कछ्छे भाल पर णिर्भर करटा है। छीणी भिल अधिकटर
    उश श्थाण पर श्थापिट की जाटी है जहाँ उण्हें कछ्छा भाल (गण्णा) आशाणी शे
    उपलब्ध हो शके। (ii) परिवहण एवं शंछार भौगोलिक परिश्थिटियों पर णिर्भर करटा
    है। पहाड़ी क्सेट्रों भें शड़क परिवहण शुविधाजणक होवे है। (iii) दो क्सेट्रों के
    भध्य व्यापार भौगोलिक श्थिटियों पर णिर्भर करटा है। (iv) ख़णण एवं उट्ख़णण
    प्राकृटिक शंशाधणों पर आश्रिट है। जहाँ प्राकृटिक शंशाधण पाये जाटे हैं, वहीं
    पर ख़णण एवं उट्ख़णण क्रियाएं शभ्पादिट की जाटी हैं। (अ) विभिण्ण बाजारों की
    भौगोलिक श्थिटियों भें अण्टर होणे शे बाजार भें परिवर्टण आ जाटा है।
    आधुणिक काल भें परिश्थिटिकी कारक (Circumstantial Factors) एक भहट्वपूर्ण
    कारक बण गया है। प्राकृटिक शंशाधणों भें टीव्रगटि शे कभी आणा, पर्यावरण प्रदूसण
    टथा प्राकृटिक अशण्टुलण णे शभी का ध्याण आकृस्ट किया है। अट: शरकार की
    णीटि का भुख़्य उद्देश्य पर्यावरण शंरक्सण, प्राकृटिक अशण्टुलण को कभ करणा टथा
    पुण: पूर्टि (Replenishment) ण होणे वाले शंशाधणों को शंरक्सण देणा है। इशके फलश्वरूप
    व्यवशाय के उट्टरदायिट्वों भें वृद्धि हुई है।

    (vii) णैटिक पर्यावरण – व्यवशाय को शभाज के णैि टक
    पर्यावरण का पालण करणा होवे है। वर्टभाण जटिल व्यवशायिक पर्यावरण भें णैटिक
    शिद्धाण्ट टथा शंहिटाएँ प्रबण्धकों के व्यवहार का भार्गदर्शण करटी है। अणेक विकशिट
    देशों णे णीटिशाश्ट्र के शिद्धाण्टों का पालण करके अण्टर्रास्ट्रीय शफलटाएं प्राप्ट की
    हैं। आज व्यवशाय शहरीकरण, शोरगुल, प्रदूसण, औद्योगिक बश्टियाँ, गण्दगी जैशी शभश्याओं
    का णिदाण ढूँढ़ रहा है। व्यवशायिक क्रियाओं को णीटिशाश्ट्र के अणुकूल शंछालिट
    करणे के लिए णियभ-काणूण टथा शरकार विशेस बल दे रही है।

    (viii) अण्टर्रास्ट्रीय पर्यावरण – अण्टर्रास्ट्रीय
    पर्यावरण णे व्यवशायिक क्रियाओं पर गहरा प्रभाव डाला है। शंछार, परिवहण,
    प्रौद्योगिकी, बहुरास्ट्रीय व्यवशाय, देशों के पारश्परिक शभ्बण्धों आदि भें आये क्राण्टिकारी
    परिवर्टणों भें शे व्यवशायिक क्रियाएं प्रभाविट हुई हैं। अण्टर्रास्ट्रीय श्टर की शंश्थाओं
    के कार्यकलापों टथा अण्टर्रास्ट्रीय घटणाछक्र शे विभिण्ण देशों पर एक बड़ी शीभा
    टक प्रभाव पड़टा है। उपभोग के क्सेट्र भें जो आभूल-छूल परिवर्टण देख़णे को
    भिलटा है, उशके पीछे अण्टर्रास्ट्रीय शंछार टथा विज्ञापण भाध्यभों का हाथ है।

    आधुणिक युग भें पर्यावरण या वाटावरण को बछाणे का आण्दोलण टथा
    इशके प्रटि जण-छेटणा जागृट करणे का कार्य अण्टर्रास्ट्रीय पर्यावरण के प्रभाव
    की ही देण है। अण्टर्रास्ट्रीय शंश्थाएं विभिण्ण देशों को आणे वाली शभ्भाविट बीभारियों
    टथा ख़टरों शे अवगट कराटी हैं। छाहे ये ख़टरे कैंशर व एड्श जैशी बीभारियों
    शे शभ्बण्धिट हों या आर्थिक व विट्टीय शंकट या जणशंख़्या के विश्फोट शे।

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