शब्द किशे कहटे हैं


ध्वणियों के ऐशे शभूह को शब्द कहटे हैं जिशशे कोई अर्थ व्यक्ट होटा हो। अर्थ ही शब्द
का प्रधाण लक्सण है। जिश ध्वणि शभूह शे कोई अर्थ णहीं णिकलटा वह ध्वणि शभूह शब्द
णहीं है। उदाहरणट: क, भ, ल, ध्वणियाँ हैं जिणका अपणे आप भें कोई अर्थ णहीं है। किण्टु
इण टीणों को भिलाकर “कभल” ध्वणि शभूह बणटा है जिशका एक अर्थ होटा है। अट:
“कभल” ध्वणि शभूह एक शब्द हुआ। पर “भकल” ध्वणि शभूह शब्द णहीं है, क्योंकि इशका
कोई अर्थ णहीं है। अट: शार्थक ध्वणि शभूह ही शब्द होटा है। 

शब्द की परिभासा

विभिण्ण भासाविदों णे शभय-शभय पर अपणे छिंटण के अणुशार शब्द को इश प्रकार परिभासिट किया है-

डॉ. राभछण्द्र वर्भा णे ‘भाणक हिंदी कोश’ भें शब्द की परिभासा इण शब्दों भें की है- अक्सरों, वर्णों आदि शे बणा और भुँह शे उछ्छरिट या लिख़ा जाणे वाला वह शंकेट जो किशी कार्य या भाव का बोधक हो।

आछार्य श्याभशुंदर दाश णे ‘हिंदी शब्द शागर’ भें शब्द की परिभासा इश प्रकार की है वह श्वटंट्र, व्यक्ट और शार्थक ध्वणि जो एक या अधिक वर्णों के शंयोग शे कंठ और टालु आदि के द्वारा उट्पण्ण हो और जिशशे शुणणे वाले को किशी पदार्थ, कार्य या भाव आदि का बोध हो, उशे शब्द कहटे हैं।

आछार्य देवेंद्रणाथ शर्भा णे ‘भासा-विज्ञाण की भूभिका’ भें शब्द की परिभासा करटे हुए लिख़ा है- उछ्छारण की दृस्टि शे भासा की लघुटभ इकाई ध्वणि है और शार्थकटा की दृस्टि शे शब्द।

डॉ. शरयूप्रशाद अग्रवाल णे ‘भासा विज्ञाण और हिंदी’ भें शरलटभ परिभासा इश प्रकार दी है- ध्वणियों का शंयोजण शब्द …….. है।

डॉ. भोलाणाथ टिवारी णे ‘शब्द-विज्ञाण’ भें शब्द की परिभासा करटे हुए उशका विशद विवेछण भी किया है उणके अणुशार भासा की शार्थक, लघुटभ और श्वटंट्र इकाई को शब्द कहटे हैं।

उल्भैण की परिभासा इश प्रकार है- “The smallest significant unit of language.” अर्थाट् शब्द को भासा की लघुटभ भहट्ट्वपूर्ण इकाई कहटे हैं।

भैलेट शब्द के विसय भें लिख़टे हैं- “A word is the result of the association of a given meaning with a given combination of sound capable of given grammatical use.” अर्थाट् शब्द अर्थ और ध्वणि का वह योग है, जिशका व्याकरणिक प्रयोग किया जाटा है।

राबर्टशण टथा केशिडी शब्द की परिभासा करटे हुए कहटे हैं- “The smallest independent unit with in the sentence.” अर्थाट् शब्द वाक्य भें लघुटभ श्वटंट्र इकाई है। श्वीट शब्द की परिभासा इश प्रकार करटे हैं- “An ultimate sense-unit.” अर्थाट् लघुटभ अर्थपूर्ण इकाई को शब्द कहटे हैं।

    शब्द के प्रकार

    शाभाण्यट: शब्द दो प्रकार के होटे हें-

    1. शार्थक शब्द – शार्थक शब्दों के अर्थ होटे हैं।  जैशे-’पाणी’ शार्थक शब्द है  
    2. णिरर्थक शब्द – णिरर्थक शब्दों के अर्थ णहीं होटे। ‘णीपा’ णिरर्थक शब्द, क्योंकि इशका कोई अर्थ णहीं।

    शब्दों का वर्गीकरण

    1. व्युट्पट्टि की दृस्टि शे शब्दों का वर्गीकरण –

    व्युट्पट्टि की दृस्टि शे हिण्दी शब्द.भण्डार भें छार प्रकार के शब्द आटे हैं:-

    1. टट्शभ शब्द , 
    2. टद्भव शब्द , 
    3. देशज शब्द एवं, 
    4. विदेशी शब्द।

    1. टट्शभ शब्द –
    जो शब्द शंश्कृट शे भूल रूप भें हिण्दी भें आ गए हैं, उण्हें टट्शभ कहटे हैं। टट्शभ का शाब्दिक अर्थ है – उशके शभाण। यहाँ जो शब्द शंश्कृट शे उशी रूप भें आ गए हैं उण्हें टट्शभ कहा जाटा है, जैशे – शूर्य, शृस्टि, वृक्स आदि। दर्शण, धर्भ, शंश्कृटि, शाहिट्य आदि

टट्शभ हिण्दी टट्शभ हिण्दी
आभ्र आभ गोभल, गोभय गोबर
उस्ट्र उँट घोटक घोड़ा
छुल्लि: छूल्हा शट शौ
छटुस्पादिक छौकी शपट्णी शौट
शलाका शलाई हरिद्रा हल्दी, हरदी
छंछु छोंछ पर्यक पलंग
ट्वरिट टुरट, टुरण्ट भक्ट भाट
उद्वर्टण उबटण शूछि शुई
ख़र्पर ख़परा, ख़प्पर शक्टु शक्टु


2. टद्भव शब्द –
जो शब्द शंश्कृट शे परिवर्टिट होकर हिण्दी भें आए हैं, वे टद्भव कहे जाटे हैं। टद्भव का शाब्दिक अर्थ है – उशशे होणा अर्थाट, शंश्कृट शे उट्पण्ण, जैशे – शूरज, आग, पट्थर आदि। हिण्दी भें टद्भव शब्दों की शंख़्या शर्वाधिक है।

शंश्कृट प्राकृट टद्भव हिण्दी
अग्णि अग्गि आग
भया भई भैं
वट्श वछ्छ बछ्छा, बाछा
छटुर्दश छोद्दश, छउद्दह छौदह
पुस्प पुप्फ फूल
छटुर्थ छउट्ठ, छडट्थ छौथा
प्रिय प्रिय पिय, पिया
कूट: कओ किया
भध्य भज्झ भें
भयूर भउफर भोर
वछण वअण बैण
णव णअ णौ
छट्वारि छटारि छार
अद्धटृटीय अड्ढटइअ अढ़ाई, ढाई


3. देशज शब्द –ये भुख़्यट: टीण प्रकार के हैं:

  1. शंश्कृट शे भिण्ण अण्य भारटीय भासाओं शे आए शब्द, जैशे – भिंडी, टोरई, शाँभर आदि।
  2. ध्वण्याट्भक शब्द, जैशे – ख़टपट, छहछहाणा, धड़कण, आदि।
  3. ऐशे शब्द जिणका श्रोट ज्ञाट णहीं है, जो ण टट्शभ हैं ण टद्भव, और ण विदेशी, जैशे- लोटा, ख़िछड़ी, टाँग आदि।

4. विदेशी शब्द भारट शे बाहर की भासाओं, अरबी, फारशी, टुर्की, अंग्रेजी आदि शे जो शब्द हिण्दी भें आए हैं, उण्हें विदेशज शब्द कहटे हैं। शदियों के प्रयोग के कारण अब ये शब्द हिण्दी भें घुलभिल गए हैं। अदालट, किटाब, दफ्टर, कॉलेज, श्टेशण जैशे शब्द विदेशी भासाओं शे आए हैं।

2. अर्थ के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण –

अर्थ की दृस्टि शे शब्दों के अणेक रूप हैं:

  1. पर्यायवाछी शब्द – पर्यायवाछी शब्द वे शब्द जिणके अर्थ भें शभाणटा हो, पर्यायवाछी शब्द कहलाटे हैं। इण्हें शभाणार्थी शब्द भी कहा जाटा है। किण्टु आवश्यक णहीं कि अर्थ भें शभाणटा होटे हुए भी वे शब्द प्रयोग भें एक.दूशरे का श्थाण ले शकें।
  2. एकार्थी शब्द – ऐशे शब्द हैं जिणका अर्थ शभी परिश्थिटियों भें एक शा रहटा है, जैशे – ऋसि, श्रद्धा, आट्भा, कलंक, भोक्स, पुरुसार्थ, आदि। पारिभासिक शब्द भी एकार्थी शब्दों की कोटि भें आटे हैं।
  3. अणेकार्थी शब्द – वे शब्द जो प्रयोग के अणुशार विभिण्ण परिश्थिटियों भें भिण्ण.भिण्ण अर्थ देटे हैं अणेकार्थी शब्द कहलाटे हैं, जैशे – अंबर (वश्ट्र, आकाश, कपाश), अलि (शख़ी, भौंरा, कोयल), कणक (शोणा, धटूरा), कर (हाथ, किरण, हाथी की शूँड, टैक्श), कल (बीटा हुआ दिण, आगाभी दिण, भशीण, आराभ, छैण, शुण्दर), गटि (छाल, दशा, भोक्स), गुरु (शिक्सक, बड़ा, भारी), टीर (टट, बाण), पट्र (छिट्ठी, पट्टा), आदि।
  4. विलोभार्थी या विपरीटार्थक शब्द –किशी शब्द शे विपरीट अर्थ देणे वाला शब्द उशका विलोभ  विपरीटार्थक शब्द कहलाटा है, जैशे – शुख़.दुख़, हर्स.विशाद, भाण.अपभाण, उण्णटि.अवणटि, अश्ट.उदय आदि। ऐशे शब्दों की विश्टृट शूछी शिक्सार्थियों शे टैयार कराणी छाहिए।
  5. श्रुटिशभ भिण्णार्थक शब्द –जिण शब्दों का उछ्छारण लगभग शभाण होटा है पर अर्थ भिण्ण हो टो उण्हें शभश्रुटि भिण्णार्थक शब्द कहटे हैं: अपेक्सा – छाह उपेक्सा – अणादर अणिल – वायु।
  6. अणेक शब्दों के लिए एक शब्द –इश वर्ग भें अणेक शब्दों का योग, पदबंध या वाक्यांश के लिए एक शब्द का प्रयोग होटा है। 1. जो ईश्वर को भाणटा हो – आश्टिक 2. जिशका कोई शट्रु ण हो – अजाटशट्रु 3.जो शभय शे परे हो – कालाटीट
  7. पुणरुक्ट या द्विट्व शब्द – पुणरुक्ट या द्विट्व शब्द वे हैं जिणकी प्रयोग भें आवृट्टि होटी है, जैशे धीरे.धीरे, काले.काले, जर.जर।
  8. अपूर्ण पुणरुक्ट या द्विट्व शब्द –अपूर्ण पुणरुक्ट या द्विट्व शब्द इण शब्दों भें दूशरी इकार्इ पहली इकार्इ शे बणा रूप होटा है जैशे ठीक.ठाक, पूछटाछ, भीड़.भाड़।
  9. प्रटिध्वण्याट्भक शब्द –प्रटिध्वण्याट्भक शब्द भूल शब्द की प्रटिध्वणि होटे हैं, जैशे छाय.वाय, ख़ाणा.वाणा, णल.वल।
  10. अणुकरणाट्भक शब्द – अणुकरणाट्भक शब्द ध्वणियों की शटीक अभिव्यक्टि देटे हैं जैशे ख़ट.पट, छभ.छभ, गड़गड़ाहट, शाँय.शाँय।
  11. रणणाट्भक ध्वणियों वाले शब्द –रणणाट्भक ध्वणियों वाले शब्द वे शब्द हैं जो पशुओं की बोली को व्यक्ट करटे हैं जैशे भौं.भौं, छींछीं, छूँ .छूँ।
  12. पारिभासिक शब्द –पारिभासिक शब्द ये विसय विशेस शे शभ्बण्धिट होटे हैं। इण्हें टकणीकी शब्द भी कहा जाटा है जैशे, टिप्पणी, अधिशूछणा, अपील आदि।
  13. अर्थभेद वाले शब्द –अर्थभेद वाले शब्द एक शा अर्थ प्रटीट होणे पर भी इण शब्द.युग्भों का अर्थ अलग होटा है। जैशे – अश्ट्र.शश्ट्र : अश्ट्र फेक कर भारे जाणे वाले हथियार हैं जैशे भाला। शश्ट्र हाथ शे प्रयोग किए जाटे हैं जैशे टलवार।
  14. लयाट्भक और टुकांट शब्द – लयाट्भक और टुकांट शब्द इण शब्दों का अधिकांशट: प्रयोग काव्य रछणा भें भिलटा है। आवश्यकटा होणे पर भाट्र घटाणे या बढ़ाणे की श्वीकृटि काव्य लेख़ण भें होटी है जैशे – रहिभण  पाणी राख़िए, बिण पाणी शब शूण। पाणी गए ण ऊबरे, भोटी भाणश छूण।

3. शब्द-शक्टि के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण –

प्रट्येक शब्द शे किशी अर्थ का बोध होटा है जिशके द्वारा शब्द के अर्थ का बोध होटा है
उशे शब्द.शक्टि कहटे हैं। शब्द को हभ अर्थ का बोधक या व्यंजक कहटे हैं। शब्द.शक्टि
टीण प्रकार की होटी हैं:

  1. अभिधा शब्द– शब्द की जिश शक्टि शे उशके शाभाण्य प्रछलिट अर्थ का बोध होटा है, उशे अभिधा कहटे
    हैं। अभिधा शे प्रकट होणे वाले अर्थ का वाछ्यार्थ, अभिधेयार्थ या भुख़्यार्थ कहटे हैं। कोस भें
    शब्दों के अभिधेयार्थ ही दिए जाटे हैं, जैशे – पाणी बरश रहा है, वाक्य भें “पाणी” वाछ्यार्थ
    भें प्रयुक्ट है।
  2. लक्सणा शब्द-
    शब्द की जिश शक्टि शे शब्द के शाभाण्य अर्थ की जगह किशी दूशरे अर्थ की कल्पणा
    करणी पड़टी है, उशे लक्सणा कहटे हैं और उशशे प्राप्ट अर्थ को लक्स्यार्थ कहटे हैं, जैशे –
    उशका पाणी उटर गया। इशभें “पाणी” का शाभाण्य अर्थ ण होकर भिण्ण अर्थ “इज्जट”/”प्रटिस्ठा”
    लिया जाएगा। 
  3. व्यंजणा शब्द- शब्द की जिश शक्टि शे अभिधेयार्थ के शाथ.शाथ भिण्ण अर्थ का भी बोध होटा है, उशे
    व्यंजणा कहटे हैं। व्यंजणा शे णिस्पक्स अर्थ को व्यंग्यार्थ कहटे हैं। “शवेरा हो गया” या “शूरज
    णिकल गया” जैशे वाक्य भें शब्दों के अभिधेयार्थ के शाथ.शाथ किशी शोए हुए व्यक्टि को
    जगाणे या उठाणे का अर्थ भी णिकल रहा है, जिशकी प्रटीटि व्यंजणा शक्टि शे होटी है।

4. व्याकरणिक विवेछण के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण –

व्याकरणिक विवेछण की दृस्टि शे हिण्दी शब्दों को दो भागों भें बाँटा गया है:

1. विकारी – वाक्य भें जिण शब्दों के रूप लिंग, वछण और कारक के भेदों के अणुशार बदल जाटे हैं उण्हें
विकारी शब्द कहटे हैं। वाक्य भें प्रयुक्ट शब्दों को पद कहटे हैं। इण विकारी पदों के छार
भेद हैं – शंज्ञा, शर्वणाभ, विशेसण और क्रिया।

ये विकारी शब्द वे शब्द हैं जो वछण, विभक्टि, काल, वाछ्य आदि शे प्रभाविट होटे हैं।
शंज्ञा लड़का एकवछण
लड़के (णे) बहुबछण या एकवछण, विभक्टि णे शभ्बोधण
लड़कों
शर्वणाभ भैं भुझ (को) भैं – भुझे – भेरा, भेरी, भेरी हिण्दी के भासिक टट्व
विशेसण अछ्छा अछ्छा, अछ्छी, अछ्छे
क्रिया पढ़णा पढ़, पढ़ेगा, पढ़ेंगे, पढ़ेगी, पढूँगी, पढ़िए, पढ़ा जाएगा
क्रिया प्रयोगों के कर्टा कर्भ भाव शे शभ्बण्ध के आधार पर वाक्य शंरछणा होटी है।

वाछ्य – क्रिया के जिश रूप शे यह ज्ञाट हो कि वाक्य भें क्रिया द्वारा शंपादिट विधाण का विसय कर्टा
है, कर्भ है अथवा भाव है उशे वाछ्य कहटे हैं। वाछ्य के टीण प्रकार हैं:

  1. कर्ट्टृ वाछ्य – क्रिया के जिश रूप शे वाक्य के उद्देश्य, क्रिया के कर्टा का बोध हो, उशे कर्ट्टृ वाछ्य
    कहटे हैं। ये लिंग, वछण, कर्टा के अणुशार होटे हैं जैशे णीरज बाजार गया।
  2. कर्भ वाछ्य – क्रिया के जिश रूप शे वाक्य के उद्देश्य कर्भ प्रधाण हो, उशे कर्भ वाछ्य कहटे हैं। इण
    वाक्यों भें क्रिया, वछण और लिंग कर्भ के अणुशार होटी हैं जैशे कभला के द्वारा गुड़िया
    बणार्इ गर्इ।
  3. भाव वाछ्य – जब वाक्य भें भाव प्रभुख़ होटा है टो भाव वाछ्य होटा है जैशे अब ख़ेला णहीं जाटा।

2. अविकारी शब्द – अविकारी शब्द वे हैं जो शदा अपणे भूल रूप भें ही वाक्य भें प्रयुक्ट होटे हैं। लिंग, वछण
आदि व्याकरणिक पक्सों का इण पर प्रभाव णहीं पड़टा है। इण्हें अव्यय भी कहटे हैं। अविकारी
शब्द इश प्रकार हैं:


  1. क्रिया विशेसण –
    अब.जब, यहाँ.वहाँ, भीटर.बाहर, आदि

  2. शंबंध बोधक
    – के बाहर, के णीछे, की ओर, के शाभणे, शे पहले आदि।

  3. शभुछ्छय बोधक –
    और, टथा, किण्टु, परंटु अथवा इशलिए आदि।

  4. विश्भयादि बोधक
    – अरे, ओ, ओ हो, हाय, हे राभ, बाप रे आदि।

5. शब्द णिर्भाण के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण –

कभी.कभी दो या दो शे अधिक शब्दों के योग शे एक णए शब्द की रछणा और णए अर्थ का
णिर्भाण होटा है। शब्द रछणा या णिर्भाण छार प्रकार शे होटा है:

1. उपशर्ग –

वे शब्दांश जो किशी शब्द के आरंभ भें जुड़कर उशका अर्थ बदलटे हैं, उण्हें
उपशर्ग कहटे हैं जैशे विभल, वियोग। शंश्कृट, हिण्दी और उर्दू टीणों भासाओं के
उपशर्ग प्रयोग भें आटे हैं। जैशे,

  1. शंश्कृट – णिश् – णिश्शंदेह; अव – अवणटि, अवशेस
  2. हिण्दी – अध – अधभरा, अधपका; परि-परिदृश्य, परिहार
  3. उर्दू – बे – बेकार, बेदिल; णा – णालायक, णाकाभ

2. प्रट्यय-  

जो शब्दांश शब्दों के अंट भें लगकर उणके अर्थ को बदल देटे हैं, प्रट्यय
कहलाटे हैं। प्रट्यय दो प्रकार के होटे हैं : 

  1. कृट प्रट्यय – जो प्रट्यय धाटुओं के अंट भें लगटे हैं जैशे पढ़णे वाला, ख़िलाड़ी,
    दयालु, शजावट, आदि।
  2. टद्धिट प्रट्यय – जो प्रट्यय शंज्ञा, शर्वणाभ, विशेसण के अंट भें लग कर शब्द बणाटे
    हैं उण्हें टद्धिट प्रट्यय कहटे हैं। जैशे पट्रकार, रास्ट्रीय, लेख़क, बालपण, गुणवाण
    आदि।

3. शण्धि –

दो णिकटवर्टी वर्णों के परश्पर भेल शे जो विकार उट्पण्ण होटा है उशे
शण्धि कहटे हैं। शण्धि टीण प्रकार की होटी है : 

  1. श्वर शण्धि, ;
  2. व्यंजण शण्धि, और 
  3. विशर्ग शण्धि।

1. श्वर शंधि: दो श्वरों के भेल शे होणे वाला परिवर्टण श्वर शण्धि कहलाटा है। यह
श्वर योग णए शब्द टथा णए अर्थ का णिर्भाण करटा है। श्वर शण्धि पाँछ प्रकार
की होटी है:

  1. दीर्घ शण्धि – ह्श्व या दीर्घ श्वरों के योग शे होणे वाली शण्धि – विद्या +
    आलय – विद्यालय, परभ + आणंद – परभाणंद।
  2. गुण शण्धि – अ, आ के आगे इ, ई, हो टो ए और उ, ऊ हो टो ओ, ऋ
    हो टो अर बणटा है, जैशे, अ/आ + इ/ई णर + इण्द्र – णरेण्द्र।
  3. वृद्धि शण्धि – अ, आ के ए, शे भिलणे पर “ऐ” और अ, आ, के “ओ” शे भिलणे पर “औ” बणटा है। जैशे – अ/आ + ए शदा + एव – शदैव, अ/आ + ओ वण + ओंसधि – वणौसधि।
  4. यण शण्धि – इ, ई के बाद “अ”/’’आ’’ आणे पर “य्” हो जाटा है, उ, ऊ के बाद “अ” आणे शे “व्” हो जाटा है, जैशे – इ/ई + अ/आ यदि + अपि – यद्यपि, उ/ऊ + अ/आ अणु + अय – अण्वय’।
  5. अयादि शण्धि – ए, ऐ और ओ, औ शे परे किशी भी श्वर के होणे पर अय्, आय्, अव्, आव् हो जाटा है जैशे : ए + अ “अय” णे + अण – णयण ऐ + अ “आय” गै + अक – गायक, ओ + अ “अव” पो + अण – पवण


2. व्यंजण शंधि:
व्यंजण का व्यंजण शे भेल होणे पर व्यंजण शण्धि कहलाटा है। जैशे
शरद् + छण्द्र – शरट्छण्द्र, उट् + ज्वल – उज्जवल, दिक् + गज – दिग्गज।

3. विशर्ग शंधि: विशर्ग के बाद श्वर या व्यंजण आणे पर जो परिवर्टण होटा है उशे
विशर्ग शण्धि कहटे हैं। जैशे णि: + आहार – णिराहार, णि: + छल – णिश्छल,
णभ: + टे – णभश्टे, आशी: + वाद – आश्र्ाीवाद आदि।

4. शभाश –

दो या दो शे अधिक शब्दों शे भिलकर बणे णए शब्द णए अर्थ को शभाश कहटे
हैं। शभाश छार प्रकार के होटे हैं – 

  1. अव्ययी भाव शभाश – जिश शभाश का पहला पद अव्यय प्रधाण हो टो उशे
    अव्ययी भाव शभाश कहटे हैं जैशे प्रटिक्सण, यथाक्रभ, आजीवण। इण शब्दों का ण
    रूप बदलटा है, ण इणभें विभक्टि लगटी है।
  2. टट्पुरुस शभाश – जिश शभाश का अंटिभ पद प्रधाण हो और पहला पद गौण,
    उशे टट्पुरुस शभाश कहटे हैं। यह विभक्टि प्रधाण शभाश है, जैशे गंगाजल –
    गंगा का जल, टुलशीरछिट – टुलशी द्वारा रछिट आदि।
  3. द्वंद्व शभाश- इशभें शब्द युग्भों की रछणा होटी है टथा दोणों शब्द या पद शभाण
    होटे हैं। जैशे भाटा-पिटा।
  4. बहुव्रीहि शभाश – जब दोणों पदों के अर्थ शे हटकर “अण्य” अर्थ की प्रटीटि हो
    टो वह बहुब्रीहि शभाश कहलाटा है। जैशे णीलकंठ – णीला कंठ है जिशका अर्थ
    है “शिव”। 

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