शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा, विषय क्षेत्र, उद्देश्य

By | February 16, 2021


शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ

शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की एक अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा है। शिक्षा मनोविज्ञान दो शब्दों के
संयोग से बना है- शिक्षा तथा मनोविज्ञान। अत: शिक्षा मनोविज्ञान शब्द का शाब्दिक अर्थ है शिक्षा से
सम्बन्धित मनोविज्ञान। शिक्षा का सम्बन्ध मानव व्यवहार के परिमार्जन से होता है, जबकि मनोविज्ञान का
सम्बन्ध व्यवहार के अध्ययन से होता है। मानव व्यवहार के परिमार्जन के लिए मानव व्यवहार का अध्ययन
करने की आवश्यकता स्वत: ही स्पष्ट ही है। मनुष्य के व्यवहार को उन्नत बनाने की दृष्टि से जब व्यवहार
का अध्ययन किया जाता है तो अध्ययन की इस शाखा को शिक्षा मनोविज्ञान के नाम से सम्बोधित किया
जाता है। अत: कहा जा सकता है कि शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षणिक परिस्थितियों में मानव व्यवहार का
अध्ययन करता है। अत: शैक्षणिक समस्याओं का वैज्ञानिक व तर्कसंगत ढंग से समाधान करने के लिए
मनोविज्ञान के आधारभूत सिद्धान्तों का उपयोग करना ही शिक्षा मनोविज्ञान की विषयवस्तु है। आधुनिक
शिक्षा जगत में शिक्षा मनोविज्ञान का एक महत्वपूर्ण स्थान है। 

शिक्षा मनोविज्ञान का प्रारम्भ कब हुआ, इस
सम्बन्ध में विद्धानों में कुछ मतभेद हैं। कुछ मनोवैज्ञानिक शिक्षा मनोविज्ञान का प्रारम्भ 19वीं शताब्दी से
स्वीकार करते हैं, जबकि कुछ अन्य शिक्षा मनोविज्ञान का प्रारम्भ प्लेटो व अरस्तु जैसे प्राचीन यूनानी
दार्शनिकों के समय से ही स्वीकार करते हैं। कॉलसनिक ने शिक्षा मनोविज्ञान का प्रारम्भ ईसा के जन्म से
पाँच शताब्दी पूर्व (500 बी.सी) के यूनानी दार्शनिकों से माना है। उसके अनुसार मनोविज्ञान और शिक्षा के
सर्वप्रथम व्यवस्थित सिंद्धातो में से एक सिद्धान्त प्लेटो का भी था। परन्तु स्किनर ने शिक्षा मनोविज्ञान का
प्रारम्भ प्लेटो के शिष्य अरस्तु से माना है। नि:संदेह प्लेटो, अरस्तू आदि यूनानी दार्शनिकों ने शिक्षा सम्बन्धी
सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हुए इन सिद्धान्तों को तत्कालीन मनोविज्ञान से जोड़ने की कोशिश की थी,
परन्तु आधुनिक शिक्षा मनोविज्ञान की उत्पत्ति 19वीं शताब्दी में पेस्तालॉजी, हर्बार्ट तथा फ्रॉबेल आदि
यूरोपियन शिक्षा दार्शनिकों के कार्यों से हुई जिन्होंने शिक्षा को मनोवैज्ञानिक बनाने का प्रयास किया। वास्तव
में शिक्षा में मनोवैज्ञानिक आंदोलन का सूत्रपात रूसो की प्रकृतिवादी विचारधारा से हुआ। उसने
शिक्षाशास्त्रियों का ध्यान विद्यार्थियों की ओर आकर्षित करते हुए इन मुद्दो पर जोर दिया कि बालकों को
उनकी रूचियों, प्रवृत्तियों, योग्यताओं तथा अवस्थाओं के अनुरूप ही शिक्षा दी जानी चाहिए। रूसो की इस
विचारधारा से प्रेरणा पाकर ही पेस्तालाजी, हर्बार्ट, फ्रॉबेल आदि ने शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान का विधिवत्
उपयोग करके तत्कालीन शिक्षा प्रणाली में अनेक सुधार किए। तत्पश्चात् गाल्टन, इबिंगहॉस, जेम्स, बिने,
गोडार्ड आदि मनोवैज्ञानिकों ने अनेक ऐसे मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र
में क्रांति सी ला दी। 

बीसवीं शताब्दी में शिक्षा मनोविज्ञान की एक अलग शाखा के रूप में अस्तित्व में
आया। थार्नडाइक को प्रथम शैक्षिक मनोवैज्ञानिक कहा जा सकता है। जॉन डीवी नामक अमेरिकी
शिक्षाशास्त्री ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक चिन्तन किया तथा शिक्षा प्रक्रिया पर अविस्मरणीय
प्रभाव डाला। अमेरिका की नेशनल सोसाइटी ऑफ कॉलेज टीचर्स ऑफ ऐजूकेशन (National Society
of College Teachers of Education) ने शिक्षा मनोविज्ञान के कार्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण
योगदान दिया। परिणामत: वर्तमान समय में शिक्षा मनोविज्ञान को एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्वीकार
किया जाता है।

शिक्षा मनोविज्ञान के उद्देश्य

शिक्षा मनोविज्ञान का मुख्य उद्देश्य शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता करना है। शिक्षा का
उद्देश्य व्यक्ति की अन्तर्निहित शक्तियों का अधिकतम सम्भव, सहज, स्वाभाविक तथा सर्वांगीण विकास
करके उसे समाज का एक उपयोगी नागरिक बनाना है। अत: शिक्षा मनोविज्ञान का मुख्य उद्देश्य भी यही
है। शिक्षा मनोविज्ञान के इस उद्देश्य को दो भागों मे विभक्त किया जा सकता है-प्रथम, छात्रों के व्यवहार
को अधिक समृद्ध करना तथा द्वितीय, अध्यापकों को अपने शिक्षण में सुधार करने में सहायता प्रदान करना।
इन दोनों उद्देश्यों को ध्यान में रखकर कहा जा सकता है कि शिक्षा मनोविज्ञान के उद्देश्य है-

  • (1) छात्रों की योग्यताओं, क्षमताओं तथा सामथ्र्य का ज्ञान प्राप्त करना।
  • (2) छात्रों की रूचियों का ज्ञान प्राप्त करना।
  • (3) छात्रों की विकासात्मक विशेषताओं को ज्ञात करना।
  • (4) छात्रों की अवस्थाओं के अनुरूप उन्हें विकास की ओर अग्रसर करना।
  • (5) छात्रों के वंशानुक्रम का ज्ञान प्राप्त करना।
  • (6) छात्रों के वातावरण का अध्ययन करना।
  • (7) मानव विकास के विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन करना।
  • (8) मानव विकास के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करना।
  • (9) व्यक्तिगत भिन्नताओं का अध्ययन करना।
  • (10) सीखने की प्रक्रिया का अध्ययन करना।
  • (11) शिक्षण सिद्धान्तों व शिक्षण विधियों का अध्ययन करना।
  • (12) शिक्षण सामग्री तथा अधिगम सामग्री का निर्माण करना।
  • (13) छात्रों के विशिष्ट व्यवहारों का अध्ययन करना।
  • (14) शैक्षिक समस्याओं का अध्ययन करना।

शिक्षा मनोविज्ञान का विषय क्षेत्र

शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षाथ्र्ाी, अध्यापक तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करता
है। शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र को स्पष्ट करते हुए स्किनर ने लिखा है कि शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में वह
सभी ज्ञात तथा प्राविधियाँ सम्मिलित हैं जो सीखने की प्रक्रिया को अधिक अच्छी प्रकार से समझने तथा
अधिक निपुणता से निर्देशित करने से सम्बन्धित हैं। आधुनिक शिक्षा मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शिक्षा
मनोविज्ञान के प्रमुख क्षेत्र हैं-


(1) वंशानुक्रम –
वंशानुक्रम व्यक्ति की जन्मजात, योग्यताओं से सम्बन्धित होता है। किसी व्यक्ति के
वंशानुक्रम में वे समस्त शारीरिक, मानसिक तथा अन्य विशेषताएँ आ जाती हैं जिन्हें वह अपने माता-पिता
अथवा अन्य पूर्वजों से (जन्म के समय नहीं वरन्) जन्म से लगभग नौ माह पूर्व प्राप्त करता है।
मनोवैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि बालक के विकास के प्रत्येक पक्ष पर उसके वंशानुक्रम का प्रभाव
पड़ता है। शारीरिक संरचना, मूल प्रवृत्तियाँ, मानसिक योग्यता, व्यावसायिक क्षमता आदि पर व्यक्ति के
वंशानुक्रम का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। वंशानुक्रम के ज्ञान के आधार पर अध्यापक अपने
छात्रों का वांछित विकास कर सकता है।


(2) विकास –
शिक्षा मनोविज्ञान के अंतर्गत भ्रूणावस्था से लेकर मृत्युपर्यन्त होने वाले मानव के
विकास का अध्ययन किया जाता है। मानव जीवन का प्रारम्भ किस प्रकार से होता है तथा जन्म के उपरान्त
विभिन्न अवस्थाओं-शैशवास्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था तथा प्रौढ़ावस्था में शारीरिक, मानसिक, सामाजिक,
संवेगात्मक आदि पक्षों में क्या-क्या परिवर्तन होते हैं, इसका अध्ययन करना शिक्षा मनोविज्ञान का एक
महत्वपूर्ण विषय क्षेत्र है। बालकों की विभिन्न अवस्थाओं में होने वाले विकास के ज्ञान से उनकी सामथ्र्य
तथा क्षमता के अनुरूप शिक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान मिलता है।


(3) व्यक्तिगत भिन्नता –
संसार में कोई भी दो व्यक्ति एक दूसरे के पूर्णतया समान नहीं होते हैं।
व्यक्ति शारीरिक, सामाजिक व मानसिक आदि गुणों में एक दूसरे से भिन्न होते हैं। अध्यापक को अपनी
कक्षा में ऐसे छात्रों का सामना करना होता है जो परस्पर काफी भिन्न होते हैं। व्यक्तिगत भिन्नताओं के
ज्ञान की सहायता से अध्यापक अपने शिक्षण कार्य को सम्पूर्ण कक्षा की आवश्यकताओं तथा योग्यताओं के
अनुरूप व्यवस्थित कर सकता है।
(4) व्यक्तित्व-शिक्षा मनोविज्ञान मानव के व्यक्तित्व तथा उससे सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं का
अध्ययन भी करता है। मनोविज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि मानव के विकास तथा उसकी शिक्षा में
व्यक्तित्व की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शिक्षा का उद्देश्य बालक का सर्वांगीण विकास करना है। अत:
बालक के व्यक्तित्व का संतुलित विकास करना शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व हो जाता है।
मनोविज्ञान व्यक्तित्व की प्रकृति, प्रकारों, सिद्धान्तों का ज्ञान प्रदान करके संतुलित व्यक्तित्व के विकास की
विधियाँ बताता है। अत: शिक्षा मनोविज्ञान का एक कार्य क्षेत्र व्यक्तित्व का अध्ययन करके बालक के
व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करना भी है।


(5) विशिष्ट बालक –
शिक्षा मनोविज्ञान विशिष्ट बालकों के लिए विशेष प्रकार की शिक्षा व्यवस्था का
आग्रह करता है। वास्तव में तीव्र बुद्धि या मन्द बुद्धि बालकों तथा गूँगे, बहरे, अंधे बालकों के द्वारा सामान्य
शिक्षा का उचित लाभ उठाने की कल्पना करना त्रुटिपूर्ण ही होगा। ऐसे बालकों के लिए इनकी विशिष्ट
आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था का आयोजन करना होता है। शिक्षा मनोविज्ञान इस कार्य में
महत्वपूर्ण योगदान करता है।


(6) अधिगम प्रक्रिया-
अधिगम शिक्षा प्रक्रिया का आधार है। सीखने के अभाव में शिक्षा की कल्पना
की ही नहीं जा सकती। शिक्षा मनोविज्ञान सीखने के नियमों, सिद्धान्तों तथा विधियों का ज्ञान प्रदान करता
है। प्रभावशाली शिक्षण के लिए यह आवश्यक है कि अध्यापक सीखने की प्रकृति, सिद्धान्त, विधियों के ज्ञान
के साथ-साथ सीखने में आने वाली कठिनार्इयों को समझे तथा उनको दूर करने के विभिन्न उपायों से भी
भलीभाँति परिचित हो। सीखने का स्थानान्तरण कैसे होता है ? तथा शैक्षिक दृष्टि से इसका क्या महत्व है?
यह जानना भी अध्यापक के लिए उपयोगी होता है। इन सभी प्रकरणों की चर्चा शिक्षा मनोविज्ञान करता है। 

(7) पाठ्यक्रम निर्माण-वर्तमान समय में पाठ्यक्रम को शिक्षा प्रक्रिया का एक जीवन अंग स्वीकार
किया जाता है तथा पाठ्यक्रम निर्माण में मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है। विभिन्न स्तरों के
बालक व बालिकाओं की आवश्यकताएँ, विकासात्मक विशेषताएँ, अधिगम शैली आदि भिन्न-भिन्न होती हैं।
पाठ्यक्रम निर्माण के समय इन सभी का ध्यान रखना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।


(8) मानसिक स्वास्थ्य-
अध्यापकों तथा छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य का शैक्षिक दृष्टि से विशेष महत्व
है। जब तक अध्यापक तथा छात्रगण मानसिक दृष्टि से स्वस्थ तथा प्रफुल्लित नहीं होंगे, तब तक
प्रभावशाली अधिगम सम्भव नहीं है। मनोविज्ञान मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों का ज्ञान
प्रदान करना है तथा कुसमायोजन से बचने के उपायों को खोजता है।


(9) शिक्षण विधियाँ-
शिक्षण का अभिप्राय छात्रों के सम्मुख ज्ञान को प्रस्तुत करना मात्र नहीं है।
प्रभावशाली शिक्षण के लिए यह आवश्यक है कि छात्र प्रभावशाली ढंग से ज्ञान को ग्रहण करने में समर्थ हो
सके। शिक्षा मनोविज्ञान बताता है कि जब तक छात्रों को पढ़ने के प्रति अभिप्रेरित नहीं किया जायेगा, तब
तक अध्यापन में सफलता मिलना संदिग्ध होगा। यह भी स्मरणीय होगा कि सभी स्तर के बालकों के लिए
अथवा सभी विषयों के लिए कोर्इ एक सर्वोत्तम शिक्षण विधि सम्भव नहीं होती है। शिक्षा मनोविज्ञान
प्रभावशाली शिक्षण के लिए उपयुक्त शिक्षण विधियों का ज्ञान प्रदान करता है।


(10) निर्देशन व समुपदेशन-
शिक्षा एक अत्यंत व्यापक प्रक्रिया है। समय-समय पर छात्रों को तथा
अत्य व्यक्तियों को शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन व परामर्श प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है। छात्रों को
किस पाठ्यक्रम में प्रवेश लेना चािहए, किस व्यवसाय में वे अधिकतम सफलता अर्जित कर सकते हैं, उनकी
समस्याओं का समाधान कैसे हो सकता है- जैसे प्रश्नों का उत्तर शिक्षा मनोविज्ञान ही प्रदान कर पाता है।


(11) मापन तथा मूल्यांकन-
छात्रों की विभिन्न योग्यताओं, रूचियों तथा उपलब्धियों का मापन व
मूल्यांकन करना अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा आवश्यक होता है। मापन तथा मूल्याकंन की सहायता से एक ओर
जहाँ छात्रों की सामथ्र्य, रूचियों तथा परिस्थितियों का ज्ञान होता है, वहीं दूसरी ओर शिक्षण अधिगम की
सफलता-असफलता का ज्ञान भी प्राप्त होता है। शिक्षा मनोविज्ञान के विभिन्न उपकरण छात्रों की योग्यताओं
तथा उपलब्धियों का मापन व मूल्यांकन करने के कार्य में प्रयुक्त किए जाते हैं।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शिक्षा मनोविज्ञान का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है तथा इसमें मनोविज्ञान
से सम्बन्धित उन समस्त बातों का अध्ययन किया जाता है जो शिक्षा प्रक्रिया का नियोजन करने, संचालन
करने तथा परिमार्जन करने की दृष्टि से उपयोगी हो सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *