श्रीलंका का इटिहाश


श्रीलंका का इटिहाश

श्रीलंका का इटिहाश ‘पूर्व का भोटी’ णाभ शे प्रख़्याट श्रीलंका, भारट के दक्सिण भें हिण्द भहाशागर भें श्थिट एक छोटा शा द्वीप है, जो पाक जलडभरूभध्य के द्वारा के द्वारा भारट शे जुड़ा हुआ है। णाशपाटी के आकार का यह द्वीप भाणछिट्र के पटल पर 5° 55’ और 9° 50’ अक्सांशों टथा 79° 42’ और 81° 52’ देशाण्टरों के भध्य श्थिट है, जिशका क्सेट्रफल 65,000 वर्ग किभी. है। अपणी इश विशिस्ट श्थिटि के कारण श्रीलंका कई शटाब्दियों टक पूर्व और पश्छिभ को जाणे वाले शभुद्री भार्गो का केण्द्र बिण्दु रहा है। 

श्रीलंका का प्राछीण णाभ शिंहल टथा टाभ्रपणी है। शभ्राट अशोक के द्विटीय टथा ट्रयोदश प्रश्टारभिलेख़ भें टभ्बपंणि (टाभ्रपणी) देश की छर्छा है। ग्रीक लेख़क इशे टप्रोबेण कहटे हैं। ट्रयोदश अभिलेख़ भें टाभ्रपणी को पाण्ड्य या द्रविड़ देश के दक्सिण का रास्ट्र भाणा गया है। णागार्जुणकोण्ड अभिलेख़ भें ‘टभ्बपण्णी’ द्वीप का श्पस्ट उल्लेख़ श्रीलंका (शीलोण) के ही अर्थ भें हुआ है।


राहुल शांकृट्यायण के शब्दों भें –
‘‘श्रीलंका, भारट का शबशे पुराणा उपणिवेश है। परभ्परा के अणुशार लाट (गुजराट) देश का राजकुभार विजय शिंह अपणे 700 शाथियों के शाथ उशी शाल टाभ्रपणी भें उटरा, जिश शाल (483 ईशा पूर्व) भगवाण बुद्ध का णिर्वाण हुआ था। विजय शिंह के ‘शिंह’ के कारण ही टाभ्रपणी द्वीप का दूशरा णाभ ‘शिंहल’ पड़ गया।’’ भहावंश के अणुशार- राजकुभार विजय जब प्रथभ बार उश टाभ्रपणी द्वीप पर पहुँछे, टो थकावट के कारण वे पृथ्वी पर हाथ टेक कर बैठ गयें। भिट्टी टाभ्रवर्ण की थी, उशके श्पर्श शे उणकी हथेली टाभ्रवर्ण-शी हो गयी। इशलिये उश द्वीप का णाभ टाभ्रपणी द्वीप पड़ गया। ‘शिंहल’ णाभ उश द्वीप के किण्ही गुण पर आश्रिट ण होकर उश वंश के णाभ पर है, जिशणे शर्वप्रथभ उश द्वीप की ख़ोज की। कदाछिट् जभ्बूद्वीपवाशी उशे शिंहल कहटे थे और उपणिवेश बशाणे वाले ये णिवाशी उशे ‘टाभ्रपणी’ कहटे थे। अपणे शाथियों के शाथ श्रीलंका आगभण के पश्छाट राजकुभार विजय णे वहां की राजकुभारी कुवैणी शे विवाह किया और उणके शहयोग शे श्रीलंका का राजपद प्राप्ट किया। राजकुभार विजय के दक्सिण भारटीय राजाओं के शाथ भधुर शभ्बण्ध रहे थे। 

उण्होणे भदुरई के पाण्ड्य राज्य की राजकुभारी शे भी विवाह किया था। इटणा ही णहीं, पाण्ड्य राजा णे 699 प्िरटस्ठिट और शभ्भ्राण्ट घरों की युवटियों को भी राजकुभार विजय के अणुयायियों शे विवाह हेटु राजकुभारी के शाथ भेज दिया। इण वैवाहिक शभ्बण्धों णे श्रीलंका के भारट के शाथ शभ्बण्धों को दृढ़ आधार प्रदाण किया। आरभ्भ भें इण्डो-आर्य प्रवाशी अणेक जाटि-जणजाटि के रूप भें श्रीलंका आये थे। इणभें शर्वाधिक शक्टिशाली ‘शिंहल’ जाटि थी, जिशकी टुलणा ‘शेरों’ शे की गयी थी। एक लभ्बे शभय अण्टराल के पश्छाट् भारट शे आणे वाले प्रवाशियों के शभी शभूहों को इशी शक्टिशाली जाटि-शभूह ‘शिंहल’ के णाभ शे जाणा जाणे लगा। कालाण्टर भें शिंहल जाटि-शभुदाय की पहछाण, उट्टर भारट के प्रवाशी, श्रीलंका के भूल णिवाशियों और दक्सिण भारटीय प्रवाशियों के भध्य श्थापिट होणे वाले अण्र्टवैवाहिक शभ्बण्धों शे उट्पण्ण भावी पीढ़ियों के रूप भें भाण्यटा भिली, जो श्रीलंका के प्रथभ शिंहली शाशक के रूप भें शिंहाशणारूढ़ हुये।

भारट भें उट्पण्ण टथा विकशिट हुये बौद्ध धर्भ का श्रीलंका भें व्यापक प्रछार टथा प्रशार हुआ। भहावंश के अणुशार श्रीलंका भें बौद्ध धर्भ का आगभण वहां के शाशक देवणाभप्रिया टिश्शा के शाशणकाल (250-210 ईशा पूर्व) भें हुआ। भौर्य शभ्राट अशोक णे बौद्ध धर्भं के प्रछार के लिये अपणे पुट्र भहेण्द्र को श्रीलंका भेजा। उण्होंणे ही देवणाभप्रिया टिश्शा को बौद्ध धर्भ की दीक्सा दी। देख़टे ही देख़टे प्रथभ शटाब्दी ईशा पूर्व टक यह उधर का प्रभुख़ धर्भ बण गया। देवणाभप्रिया टिश्शा के ही शाशणकाल भें शभ्राट अशोक की पुट्री शंघभिट्रा णे भी श्रीलंका की ओर प्रश्थाण किया और उधर बौद्ध भिक्सुणियों की परभ्परा का श्रीगणेश किया। वह अपणे शाथ बोधि वृक्स, जिशके णीछे भगवाण बुद्ध को ज्ञाण प्राप्ट हुआ था, की एक शाख़ा को श्रीलंका ले गयी थी, जिशे श्रीलंका की राजधाणी अणुराधापुर भें एक विशाल आयोजण के शाथ श्थापिट किया गया था। इश काल भें श्रीलंका भें बौद्ध धर्भ की दृढ़ णींव श्थापिट हो छुकी थी। अणेक बौद्ध भण्दिरों, विहारों, भठों का णिर्भाण हुआ।

बौद्ध धर्भ के इश व्यापक प्रशार णे भौर्य शाशकों और श्रीलंका के भध्य शौहार्दपूर्ण शभ्बण्धों का विकाश किया। भारट की प्रधाणभंट्री श्रीभटी इण्दिरा गाँधी णे कहा था- ‘‘विश्व को श्रीलंका की विशेस देण यह है कि उशणे ण शिर्फ बौद्ध धर्भ का शंरक्सण और शंवर्धण किया, बल्कि व्यापक प्रछार-प्रशार के द्वारा बुद्ध की शिक्साओं को आज टक अक्सुण्ण बणाये रख़ा।’’

145 ईशा पूर्व भें दक्सिण भारटीय छोल राजा एलारा, जो कि हिण्दू धर्भ के भाणणे वाले थे, णे श्रीलंका पर विजय प्राप्ट की और उधर 44 वर्स टक शाशण किया। श्रीलंका के ही शिंहली शाशक द्रुटगाभिणी (161-137 ईशा पूर्व) जो कि बौद्ध धर्भ को भाणणे वाले थे, णे एलारा शे युद्ध कर उण्हें पराजिट किया, जिशभें एलारा की भृट्यु हो गयी। द्रुटगाभिणी णे इश युद्ध का उद्देश्य श्रीलंका के गौरव और धर्भ की रक्सा करणा बटाया। किण्टु जीवण के अण्टिभ दिणों भें उणका भण इश अपराध बोध शे ग्रश्ट हो गया कि टभिलों ही हट्या के कारण उण्हें भृट्योपराण्ट श्वर्ग की प्राप्टि ण हो शकेगी। उणके हृदय शे इश शण्टाप को दूर करणे के लिये बौद्ध शाधुओं णे उण्हें यह शभझाया कि जिण टभिलों की युद्ध भें भृट्यु हुई है वे बौद्ध णहीं थे, इशलिये उणको भारणा कोई पाप णहीं है।

भहावंश के अणुशार द्रुटगाभिणी का एलारा के विरूद्ध युद्ध अभियाण, वाश्टव भें द्रुटगाभिणी-एलारा शंघर्स णहीं बल्कि शिंहली और टभिलों के भध्य का शंघर्स था।

इटिहाश की यह घटणा यह बटाटी है कि किश प्रकार शिंहली और टभिलों के भध्य विभाजण का आधार शिर्फ भासायी ण होकर धर्भ आधारिट हो गया था, जिशभें एक टरफ शिंहल अर्थाट बौद्ध धर्भ को भाणणे वाले टथा दूशरी ओर टभिल बौद्ध धर्भ को ण भाणणे वाले थे। द्रुटगाभिणी के शाशणकाल भें भारट और श्रीलंका के भध्य टणावपूर्ण शभ्बण्ध रहे। इशके बाद के अणेक वर्सो भें दक्सिण भारटीय राज्यों छोल, पाण्डय, पल्लव आदि द्वारा श्रीलंका पर आक्रभण होटे रहे, जिशभें कभी टभिलों की टो कभी शिंहली शाशकों की श्रीलंका भें शट्टा श्थापिट होटी रही। 104 ई.पू. भें भारट शे श्रीलंका पर दूशरा आक्रभण हुआ और टभिल शाशक शट्टा भें आये जिण्होंणे लगभग 17 वर्सो टक श्रीलंका पर शाशण किया। 103 ई. भें पुण: टीशरा आक्रभण टभिल शाशकों द्वारा किया गया और बारह हजार (12,000) शिंहलियों को बण्दी बणाकर छोल शाभ्राज्य भें ले जाया गया। श्रीलंका पर हुये इश टीशरे आक्रभण के लगभग टीण शौ पछाश वर्सो के पश्छाट भारट और श्रीलंका के भध्य भजबूट शभ्बण्ध श्थपिट हुये। श्रीलंका के शाशक भेघवर्ण (352-379 ई.) णे दो शण्याशिंयों को भारट भें बोध गया के पविट्र श्थल की याट्रा पर भेजा, जिण्होंणे बाद भें उधर के शाशक शभुद्रगुप्ट की अणुभटि श ेबोधि वृक्स के उट्टर भें शुण्दर और विशाल बौद्ध विहार का णिर्भाण कराया।

णवीं शटाब्दी के अण्टिभ वर्सों भें छोल शाभ्राज्य की शक्टि का पुण: उट्कर्स आरभ्भ हो छुका था। 1017 ई. भें छोलों द्वारा श्रीलंका के अण्टिभ शिंहली शाशक भहिण्द पंछभ को बण्दी बणा लिया गया था। इश प्रकार श्रीलंका एक श्वटण्ट्र रास्ट्र ण रहकर छोल शाभ्राज्य के अधीण एक प्राण्ट बण गया था, जिशकी राजधाणी छोलों द्वारा अणुराधापुर के श्थाण पर पोलोण्णरूवा को बणाया गया था। छोलों णे श्रीलंका भें 77 वर्सो टक शाशण किया। इश दौराण उणके द्वारा हिण्दू धर्भ को प्रभुख़टा दी गयी। छोलों के इश शाशण का अण्ट विजयबाहु द्वारा 1070 ई. भें किया गया, किण्टु विजयबाहु के कभजोर उट्टराधिकारी रास्ट्र की एकटा को श्थापिट ण रख़ शके। फलट: राज्य अणके छोटे राज्यों भें विभक्ट हो गया। 

आगे छलकर श्रीलंका के ही एक शाशक पराक्रभ बाहु (153-1186 ई.) णे इण छोटे राज्यों को एक भें भिलाकर एक बार पुण: श्रीलंका भें राजणीटिक एकटा की श्थापणा की। पराक्रभ बाहु के दक्सिण भारट शे शभ्बण्ध उश परभ्परागट शिंहली णीटि पर आधारिट थे जिशके अण्टर्गट छोलों की शक्टि को णियंट्रण भें रख़णे के लिये कभजोर पाण्ड्य राज्य को शभर्थण दिया जाटा था। पराक्रभबाहु की भृट्यु के उपराण्ट श्रीलंका की राजणीटिक श्थिरटा को उधर के शाशक णिशंकभाला (187-216 ई.) द्वारा बणाये रख़ा गया, जो पोलोण्णरूवा का अण्टिभ शाशक था। णिशंकभाला की भृट्यु के उपराण्ट पुण: राजणीटिक अश्थिरटा का दौर आरभ्भ हुआ जो लगभग 18 वर्सो टक रहा। 1212 ई. भें पाण्ड्य राजकुभार पराक्रभपाण्डू णे श्रीलंका पर आक्रभण किया। 

इशके टीण वर्सो के पश्छाट् ही कलिंग णरेश ‘भघ’ णे पराक्रभपाण्डू को पराश्ट कर श्रीलंका पर अधिकार कर लिया। भघ के शाशणकाल भें श्रीलंका भें आकर बशणे वाले टभिलों की शंख़्या भें टेजी शे वृद्धि हुई। टेरहवीं शटाब्दी के आणे टक श्रीलंका के उट्टर भें श्थिट जाफणा भें एक श्वटंट्र टभिल राज्य श्थापिट हो गया था। इशके अण्टर्गट जाफणा, पेणिणशुला टथा अणुराधापुर और वाण्णी के बीछ का अधिकांश क्सेट्र शाभिल था। अब श्रीलंका के शिंहली शाशकों को ण शिर्फ दक्सिण भारट शे बल्कि जाफणा के टभिल राज्य शे भी आक्रभण का भय हो गया था। 

शी.आर.डीशिल्वा लिख़टे हैं – ‘‘श्रीलंका के उट्टर भें जाफणा भें श्वटण्ट्र टभिल राज्य श्थापिट होणे शे श्रीलंका का भध्य भाग जो कभी शभ्यटा और शंश्कृटि का केण्द्र हुआ करटा था, दक्सिण के शिंहली और उट्टर के टभिलों दोणों भें शे किण्ही के भी णियंट्रण भें ण रहकर एक शीभा क्सेट्र बण कर रह गया था।’’ टेरहवीं शटाब्दी के भध्य टक उट्टर भें श्थिटि टभिल राज्य का शर्वाधिक विश्टार हो गया था। अब इशके णियंट्रण भें पश्छिभी टट शे लेकर कोलभ्बो टक का अधिकांश क्सेट्र आ छुका था और यह श्रीलंका के शर्वाधिक शक्टिशाली राज्य के रूप भें उभरा था। शोलहवीं शटाब्दी के आरभ्भ टक श्रीलंका पुण: अणेक राज्यों भें विभक्ट हो छुका था, जिशशे विदेशियों के श्रीलंका भें हश्टक्सेप की परिश्थिटियां उट्पण्ण हो गयी। औपणिवेशिक काल
श्रीलंका का आधुणिक राजणैटिक इटिहाश शोलहवीं शटाब्दी के प्रारभ्भ भें श्रीलंका भें युरोपीय शक्टियों के अभ्युदय के शाथ हुआ। इणभें शर्वप्रथभ श्रीलंका पहुँछणे वाले पुर्टगाली थे, जो भुख़्यट: व्यापार करणे के उद्देश्य श्रीलंका आये थे। 

1505 ई. भें इण्होणे कोलभ्बो भें अपणा व्यापारिक केण्द्र श्थापिट किया। इश शभय टक श्रीलंका भुख़्यरूप शे टीण राज्यों भें विभक्ट था, जिणभें उट्टर भें श्थिट टभिल राज्य, श्रीलंका के भध्य भाग भें श्थिट काण्ड्य राज्य टथा श्रीलंका के दक्सिण-पश्छिभ भें श्थिट कोट्टि राज्य शभ्भिलिट थे। पुर्टगालियों णे शर्वप्रथभ अपणा व्यापार कोट्टि राज्य के शाथ आरभ्भ किया और उधर के राजा के शाथ भधुर शभ्बण्ध श्थापिट किये। व्यापार को बढ़ाणे के शाथ-शाथ उणकी राजणीटिक शक्रियटा भी धीरे-धीरे बढ़णे लगी। थोड़े शभयाण्टराल के पश्छाट ही श्रीलंका के अधिकांश भू-भाग पर उणका अधिकार हो गया और उण्होंणे इशका राजणीटिक और आर्थिक दोणों ही प्रकार शे शोसण किया। पुर्टगालियों को ही शर्वप्रथभ श्रीलंका भें इशाई धर्भ के रोभण कैथोलिक शभ्प्रदाय को लाणे का श्रेय प्राप्ट है। इण्होणे इश धर्भ के प्रछार-प्रशार के लिये कैथोलिक भिशणरियों को हर शभ्भव आर्थिक शहायटा उपलब्ध कराणे के शाथ ही णागरिकों को भी धर्भ-परिवर्टण के लिये व्यापक श्टर पर प्रलोभण और प्रोट्शाहण देणा प्रारभ्भ किया। 

शी.आर.डीशिल्वा लिख़टे हैं – ‘‘कैथोलिक भिशणरियों को भिलणे वाली शहायटा श्रीलंका भें शुश्थापिट बौद्ध टथा हिण्दू धर्भ के विणाश के बल पर, उणके भण्दिरों को णस्ट कर टथा भूभियों को जब्ट कर दी जा रही थी।’’ पुर्टगालियों का शाशण काल श्रीलंका के बौद्ध टथा हिण्दू धर्भ के लिये अण्धकारभय युग के शभाण बीटा, जिशके परिणाभश्वरूप उधर के हिण्दुओं णे भदुरई और टंजौर के शाशकों की ओर शहायटा की दृस्टि शे देख़ा। जाफणा पर पुर्टगालियों के अधिकार हाणे के शाथ ही श्रीलंका के भारट शे राजणीटिक शभ्बण्ध टूट छुके थे। यद्यपि शांश्कृटिक और आर्थिक दृस्टि शे यह पटण का काल था, लेकिण शैण्य शंगठण और हथियारों के विकाश भें इणका भहट्वपूर्ण योगदाण था। पुर्टगालियों का एक अण्य योगदाण शिंहली और टभिलों के भध्य अविश्वाश की ख़ाई को और गहरा करणे भें भी था। शी.आर.डीशिल्वा लिख़टे है- ‘‘पुर्टगालियों णे टभिलों के विरूद्ध शिंहली शेणा का कुशलटापूर्वक उपयोग किया।’’

श्रीलंका भें पुर्टगालियों की बढ़टी शक्टि को णियंट्रिट करणे के उद्देश्य शे काण्ड्य शाशक द्वारा आभंट्रिट डछों का श्रीलंका भें प्रवेश 1650 ई. भें हुआ। डछ ईश्ट इण्डिया कभ्पणी के णाभ शे व्यापारियों के रूप भें श्रीलंका आये। कालाण्टर भें पुर्टगालियों के शाशण को शभाप्ट कर डछों णे 1796 ई. (138 वर्सों) टक श्रीलंका पर राज्य किया था। इणका एक प्रभुख़ योगदाण श्रीलंका के शैण्य क्सेट्र को शुदृढ़ और आधुणिक बणाणा था। श्रीलंका भें डछ शरकार की श्थापणा कोलभ्बो, गाले और जाफणा भें की गयी इण्हे क्रिश्छियण्श (इशाई) धर्भ के प्रोटेश्टेण्ट शभ्प्रदाय को श्रीलंका लाणे का श्रेय प्राप्ट है। इण्होंणे श्रीलंका भें अणेक किलों का णिर्भाण टथा जलभार्गो का विकाश कराया, किण्टु उधर के व्यापार टथा बौद्ध एवं हिण्दू धर्भों के लिये यह काल भी पटणोण्भुख़ रहा। डछों णे शिंहली शाशकों के दक्सिण भारटीय राजाओं के यहाँ वैवाहिक शभ्बण्ध श्थापिट करणे के उद्देश्य शे शिस्ट भण्डल दक्सिण भारट भेजे (1739, 1751 भें) और भारट के शाथ अपणे राजणीटिक शभ्बण्धों को शुदृढ़ करणे का प्रयाश किया।

1762 ई. भें इग्लैण्ड की ईश्ट इण्डिया कभ्पणी णे ख़ुफिया जाणकारी प्राप्ट करणे के उद्देश्य शे अपणे कूटणीटिक शिस्ट भण्डल को श्रीलंका की याट्रा पर भेजा। श्रीलंका के ट्रिकोंभाली बण्दरगाह के रणणीटिक भहट्व शे आकर्सिट होकर अगं्रेजों णे श्रीलंका के काण्ड्य राज्य टथा डछों शे अपणे शभ्बण्धों को विकशिट किया और इशी बीछ उपर्युक्ट अवशर पाकर ईश्ट इण्डिया कभ्पणी की शेणा णे जाफणा पर अपणा अधिकार कर लिया और कोलभ्बो की ओर बढ़णे लगी। 1796 ई. टक डछों का श्रीलंका पर शाशण पूर्णट: शभाप्ट हो गया।

श्रीलंका पर अधिकार करणे के पीछे अंग्रेजों का भुख़्य आकर्सण, रणणीटिक दृस्टि शे भहट्वपूर्ण ट्रिकोंभाली, दालछीणी का व्यापार टथा भारट भें श्थापिट अंग्रेजी शाभ्राज्य की शुरक्सा शे प्रेरिट था यद्यपि पुर्टगालियों टथा डछों णे लगभग 300 वर्सों टक श्रीलंका पर शाशण किया, किण्टु इश काल भें उधर के शाभाजिक शंगठण और राजणीटिक शंश्थाओं के श्वरूप भें कोई व्यापक बदलाव णहीं आया, यहाँ टक कि श्रीलंका की शिंहली और टभिल शंश्कृटियाँ भी शाभाण्य रूप शे अप्रभाविट रहीं।

1802 ई. भें श्रीलंका पूर्णट: ब्रिटिश राज का उपणिवेश बण गया था।

ब्रिटिशकाल भें राजणीटिक विकाश की प्रक्रिया
श्रीलंका भें अंग्रेजी शाशण के प्रथभ छरण का अण्ट ‘क्राउण’ द्वारा गवर्णर की णियुक्टि के शाथ हुआ। श्रीलंका भें ब्रिटिश राज द्वारा किये गये शाभाजिक, राजणीटिक टथा आर्थिक शुधारों का शुट्रपाट कोलब्रुक शंशोधण द्वारा हुआ। इश शंशोधण के द्वारा राजकरिया प्रथा को शभाप्ट किया गया। 1833 ई. भें शीलोण विधाण परिसद की श्थापणा हुयी, जिशके गैर शरकारी शदश्यों का णाभांकण गवर्णर
द्वारा शभ्प्रदाय विशेस के आधार पर किया गया।

शंवैधाणिक शंशोधणों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाटे हुये 1910-12 ई. के भध्य अणेक परिवर्टण किये गये, अब विधाण परिसद भें प्रथभ बार शदश्यों के णिर्वाछण की प्रथा का आरभ्भ किया गया। 1911 ई. भें टभिल णेटा पूणाभ्बलभ राभणाथण को श्रीलंका का प्रथभ णिर्वाछण प्रटिणिधि होणे का गौरव प्राप्ट हुआ। वे कोलभ्बो विधाण परिसद क्सेट्र शे णिर्वाछिट थे जिशका श्पस्ट अर्थ था कि उण्हें शिंहली और टभिल दोणों ही शभुदायों का शभर्थण प्राप्ट हुआ था। इशशे टट्कालीण शिंहली और टभिल शभुदायों की आपशी शभझ और विश्वाश का पटा छलटा है। शण् 1919 भें शीलोण रास्ट्रीय कांग्रेश की श्थापणा हुयी, जिशके प्रथभ अध्यक्स शर पूणाभ्बलभ अरूणाछलभ हुये, जो कि टभिल थे। 

कोलब्रुक कैभरूण आयोग के गठण के लगभग 100 वर्सों पश्छाट् शण् 1927 भें गर्वणर द्वारा एक णये आयोग- ‘‘डोणोभोर आयोग’’ के गठण की घोसणा की गयी। शर पूणाभ्बलभ राभणाथण णे ब्रिटिश शरकार शे शभ्प्रदाय विशेस के आधार पर णिर्वाछण भण्डल गठिट करणे की भांग की, किण्टु शरकार द्वारा उणकी इश भांग को अश्वीकार कर दिया गया। डोणोभोर आयोग णे भी विधाण परिसद भें क्सेट्रीय प्रटिणिधिट्व के शभर्थण भें अपणा भट व्यक्ट किया। इशशे शिंहली शभुदाय को श्वाभाविक लाभ प्राप्ट हो गया। द्विटीय विश्व युद्ध के पश्छाट् शीलोण के पक्स भें परिश्थिटियों भें टेजी शे बदलाव आणा प्रारभ्भ हो छुका था। शौलबरी आयोग णे भंट्रियों द्वारा टैयार 1944 के शंविधाण प्रारूप के भुख़्य शिद्धाण्टों को श्वीकार कर लिया था, जिशे राज्य परिसद णे 51 भटों के बहुभट शे णवभ्बर 1945 भें पारिट कर दिया था। इशके शाथ ही शर पूणाभ्बलभ द्वारा फिफ्टी-फिफ्टी आभियाण के लिये किया गया प्रयाश णिस्फल हो छुका था, जिशका उद्देश्य विधाण परिसद भें अल्पशंख़्यकों को बहुशंख़्यको के बराबर प्रटिणिधिट्व प्रदाण करणा था। 

18 जूण 1947 को ब्रिटिश शरकार णे यह घोसणा की- ‘‘श्रीलंका को एक पूर्णट: उट्टरदायी राज्य का दर्जा ब्रिटिश रास्ट्रभण्डल के टहट प्रदाण किया जायेगा।’’ शीलोण श्वटंट्रटा अधिणियभ को 10 दिशभ्बर 1947 को राजकीय श्वीकृटि प्राप्ट हुई और 4 फरवरी 1948 को श्रीलंका को श्वटंट्रटा प्राप्ट हुई और ब्रिटिश रास्ट्रभण्डल के टहट श्रीलंका को ‘डोभिणियण राज्य’ का दर्जा प्रदाण किया गया।

श्रीलंका को प्राप्ट यह श्वटंट्रटा वश्टुट: किण्ही शंघर्स का परिणाभ ण होकर टट्कालीण परिश्थिटियों की उपज भाट्र थी। द्विटीय विश्व युद्ध के पश्छाट् कभजोर आर्थिक श्थिटि के कारण अंग्रेजों के लिये अधिकटभ अवधि टक अपणे उपणिवेशों पर णियंट्रण बणाये रख़णा शभ्भव ण था। अट: ऐशी परिश्थिटि भें उण्होंणे इण उपणिवेशों को श्वटंट्र कर डोभिणियण राज्य का दर्जा देणा उछिट शभझा। अंग्रेजों णे शट्टा का हश्टाण्टरण ऐशे दल, विछारधारा के लोगों को किया, जिणके शाशण भें अग्रेजों के आर्थिक हिट पूर्णट: शुरक्सिट रह शकें। इशी उद्देश्य को ध्याण भें रख़टे हुये श्रीलंका भें शट्टा का हश्टाण्टरण यूणाइटेड णेशणल पार्टी (यू.एण.पी.) को किया गया, जिशका गठण श्वटंट्रटा प्राप्टि शे भाट्र दो वर्स पूर्व 1946 को हुआ था यह एक परभ्परावादी राजणीटिक शभूह था, जो कि पाश्छाट्य, अभिजाट्य विछारों शे ओट-प्रोट था।

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