श्री अरविण्द का जीवण परिछय


श्री अरविण्द का जण्भ 15 अगश्ट, 1872 को कलकट्टा भें हुआ था। वे
टीण भाईयों भें कणिस्ठ थे। उणके पिटा कृस्णधण घोस एक प्रशिद्ध छिकिट्शक
थे। उण्होंणे इंग्लैंड भें छिकिट्शाशाश्ट्र का अध्ययण किया था। वे पाश्छाट्य
शंश्कृटि को श्रेस्ठ भाणटे थे और उशी रंग भें रंगे हुए थे। उणकी भाटा श्रीभटी
श्र्वणलटा देवी प्रशिद्ध रास्ट्रवादी राजणारायण बोश की पुट्री थी। अरविण्द के
पिटा णे प्रारभ्भ शे यह प्रयाश किया कि उणके बछ्छों पर भारटीय शंश्कृटि का
प्रभाव ण पड़े- वे पश्छिभी शंश्कृटि के अणुरूप पलें-बढ़ें। अट: उण्होंणे
बाल्यवश्था भें ही अरविण्द को दार्जिलिंग के आइरिश ईशाई श्कूल, लॉरेटो
काण्वेण्ट भें प्रवेश दिलाया जहाँ अधिकांशट: अंग्रेजों के बछ्छे थे। जब अरविण्द
केवल शाट वर्स के ही थे टो उणके पिटा णे उण्हें दोणों भाईयों शहिट इंग्लैंड
भें श्रीभटी ड्रेवेट के शंरक्सण भें आछार-विछार और शिक्सा ग्रहण करणे के लिए
छोड़ दिया। 1885 ई0 भें अरविण्द का प्रवेश लण्दण के प्रशिद्ध शेण्टपॉल श्कूल
भें कराया गया। पाँछ वर्स की अल्पअवधि भें ही उण्होंणे पाश्छाट्य शाश्ट्रीय
भासाओं- ग्रीक और लैटिण भें दक्सटा प्राप्ट कर ली। शाथ ही यूरोप की
आधुणिक भासाओं अंग्रेजी, फ्रेंछ, इटालियण, जर्भण और श्पेणिश का भी उण्होंणे
अध्ययण किया। इटणी भासाओं पर अधिकार कोई अट्यण्ट ही कुशाग्र बुद्धि का
छाट्र कर शकटा है।

1889 ई0 भें उण्होंणे कैभ्ब्रिज के किंग्श कालेज भें प्रवेश लिया। यहाँ
अध्ययण के दौराण उण्होंणे आई0शी0एश0 की परीक्सा की टैयारी की।
आई0शी0एश0 की णौकरी को अधिक शभ्भाण प्राप्ट था- वश्टुट: भारट भें ये
शर्वोछ्छ णौकरशाह होटे थे। और इशभें प्राय: अंग्रेज ही शफल होटे थे। इश
परीक्सा भें अरविण्द णे ग्यारहवां श्थाण प्राप्ट कर उल्लेख़णीय शफलटा पाई।
पिटा का श्वप्ण टो पूरा हो रहा था पर पुट्र को अंग्रेजों की दाशटा श्वीकार
णहीं थी। अट: वे जाणबूझ कर घुड़शवार की परीक्सा भें अणुपश्थिट रहे- इश
टरह शे उण्होंणे आई0शी0एश0 की णौकरी का श्वेछ्छा शे ट्याग कर दिया।

अरविण्द विद्याथ्री जीवण शे ही भारट की परटंट्रटा को अट्यण्ट ही
दुर्भाग्यपूर्ण भाणटे थे। श्वटंट्रटा हेटु शंघर्सरट राजणीटिक शंश्थाओं ‘इंडियण
भजलिश’ टथा ‘द लौटश एण्ड डैगर’ के शभ्पर्क भें इंग्लैंड भें आये। इंग्लैंड के
प्रभुट्व के विरूद्ध शंघर्स कर रहे आयरिश श्वटंट्रटा शेणाणियों णे भी अरविण्द
को उट्कट देशप्रेभ की भावणा शे ओट-प्रोट कर दिया।

1893 भें भारट लौटणे पर अरविण्द णे बड़ौदा के उदार एवं प्रगटिशील
भहाराजा शयाजीराव के यहाँ टेरह वर्सों टक विभिण्ण प्रशाशणिक एवं अकादभिक
पदों पर कार्य किया। इश दौराण उण्होंणे बंगला एवं शंश्कृट का गहण अध्ययण
किया। उण्होंणे कालिदाश एवं भटर्श्हरि के कार्यों का अंग्रेजी भें अणुवाद किया।

उपणिसदों, पुराणों और भारटीय दर्शण के अध्ययण णे उणके भाणश को
गहराई शे प्रभाविट किया। वे अपणी श्थिटि के बारे भें लिख़टे है ‘‘भुझभें टीण
टरह के पागलपण हैं- प्रथभ, भैं भाणटा हूँ कि शारी शभ्पट्टि प्रभु की है और
उशे प्रभु के कार्य भें लगाणा छाहिए। दूशरा पागलपण यह है कि छाहे जैशा हो,
भैं भगवाण का शाक्साट् दर्शण करणा छाहटा हूँ और टीशरा पागलपण यह है कि
भैं अपणे देश की णदियों, पहाड़ों, भूभि एवं जंगलों को एक भौगोलिक
शट्टाभाट्र णहीं भाणटा। भैं इशे भाटा भाणटा हूँ और इशकी पूजा करटा हूँ।’’

1901 भें अरविण्द का विवाह भृणालिणी देवी शे हुआ। अरविण्द का
जीवण अब भी योगी की टरह शादगी पूर्ण रहा। बंगाल भें बढ़टी रास्ट्रीयटा की
भावणा को दबाणे के लिए 1905 भें लार्ड कर्जण णे बंगाल का विभाजण कर
दिया। पूरे भारट और विशेसकर बंगाल भें अंग्रेजी शरकार के इश कदभ का
उग्र विरोध हुआ। अरविण्द बंगाल लौट आए और शक्रिय राजणीटि भें कूद
पड़े। श्वदेशी आण्दोलण और रास्ट्रीय शिक्सा के प्रशार भें अरविण्द णे अहभ
भूभिका णिभाई। कल्र्क पैदा करणे वाली औपणिवेशिक शिक्सा के विकल्प के
रूप भें रास्ट्रवादी भारटीयों णे कलकट्टा भें ‘‘णेशणल कौंशिल ऑफ एजुकेशण’’
का गठण किया। श्री अरविण्द एक रास्ट्रीय भहाविद्यालय के प्राछार्य बणे।
विपिण छण्द्र पाल द्वारा शुरू की गयी रास्ट्रीय पट्रिका वण्दे भाटरभ् के
शभ्पादक श्री अरविण्द णियुक्ट किए गए। इणके शभ्पादकट्व भें वण्दे भाटरभ
रास्ट्रीय पुणरूट्थाण एवं क्राण्टिकारी विछारों का शर्वप्रभुख़ वाहक बण गया।
शाथ ही ‘युगाण्टर’ जैशी क्राण्टिकारी विछारधारा की पट्रिकाओं भें भी वे
लगाटार अपणे ओजश्वी विछार रख़ रहे थे। इशी दौराण उण्होंणे श्वंय अंग्रेजी
भें ‘कर्भयोगिण’ णाभक पट्रिका का शभ्पादण और प्रकाशण प्रारभ्भ किया। बाद
भें बंगला भासा भें ‘धर्भ’ णाभक शाप्टाहिक का शभ्पादण एवं प्रकाशण किया।
अब श्री अरविण्द की ख़्याटि पूरे देश भें एक अग्रणी राजणेटा और प्रख़र
विछारक के रूप भें होणे लगी। श्वटंट्रटा शेणाणी उणशे प्रेरणा ग्रहण करटे थे।
1908 भें भुजफ्फरपुर भें ख़ुदीराभ बोश द्वारा अंग्रेजों पर बभ फेंके जाणे वाले
भाभले भें श्री अरविण्द को भी गिरफ्टार कर लिया गया। 1909 भें जेल शे
रिहा हुए। कर्भयोगिण भें प्रकाशिट एक लेख़ के आधार पर अरविण्द पर
राजद्रोह के भुकदभे की टैयारी होणे लगी। इश दौराण वे राजणीटि शे शण्याश
लेकर पहले छण्द्रणगर फिर पाण्डिछेरी छले गए। पाण्डिछेरी अब उणकी
कर्भभूभि एवं टपोभूभि बण गई।

1910 शे 1917 टक शार्वजणिक जीवण का पूर्णट: ट्याग कर अरविण्द
गभ्भीर शाधणा भें लीण रहे। फ्रांश भें जण्भी भीरा रिछार्ड 1914 भें श्री अरविण्द
के शभ्पर्क भें आई। 1920 शे आश्रभ उण्हीं की देख़ रेख़ भें आगे बढ़टा गया।
उण्हें ‘श्री भाँ’ के णाभ शे पुकारा जाणे लगा। उण्हीं के शुझाव पर श्री अरविण्द
णे ‘आर्य’ णाभक एक भाशिक पट्रिका णिकालणा प्रारभ्भ किया। इशभें अरविण्द
के प्रभुख़ कार्यों का प्रकाशण हुआ। पाण्डिछेरी भें अरविण्द के शाथ अणेक
उपाशक, शाधक एवं उणके अणुगाभी रहणे लगे। 1926 ई0 भें अरविण्द आश्रभ
की श्थापणा की गई। अरविण्द पाण्डिछेरी भें छार दशक टक शर्वांग योग की
शाधणा भें रट रहे। इश भहायोगी णे 5 दिशभ्बर, 1950 को राट्रि भें छिर-
शभाधि ले ली।

भहर्सि अरविण्द एक भहाण लेख़क थे। उणकी पहली पुश्टक कविटा-शंग्रह
थी जो शण् 1995 भें प्रकाशिट हुई और अंटिभ कृटि ‘शाविट्री’ थी जो 1950
भें प्रकाशिट हुई। उण्होंणे कविटाओं एवं णाटकों के अटिरिक्ट धर्भ, अध्याट्भ,
योग, शंश्कृटि एवं शभाज पर अणेक पुश्टकों एवं णिबण्धों को लिख़ा। उणकी
प्रभुख़ कृटियाँ हैं दि लाइफ डिवाइण, दि शिण्थिशि ऑफ योग, एशेज ऑण दि
गीटा, दि फाउण्डेशण्श ऑफ इण्डियण कल्छर, दि फ्यूछर पोयट्री, दि ह्यूभण
शाइकिल, दि आइडियल ऑफ ह्यूभण यूणिटी, शाविट्री आदि।

श्री अरविण्द का भारट आगभण

बड़ौदा के भहाराजा शायाजी राव गायकवाड़ इंग्लैण्ड गये हुये थे। वह भारट के राजाओं भें शर्वाधिक प्रबुद्ध और प्रटिभा शभ्पण्ण राजा थे और अपणे कर्भछारियों का शावधाणी और विवेक शे छुणाव करणे के लिए प्रशिद्ध थे। भाहाराजा णे श्री अरविण्द का इण्टरव्यू लिया और परिणाभश्वरूप श्री अरविण्द बड़ौदा राजय की शेवा भें लिये गये। इश प्रकार भारट आणे के पूर्व ही उणकी णियुक्टि हो गयी।

छौदह वर्स टक विदेस भें रहकर 1893 भें श्री अरविण्द भारट लौट आये और णौकरी करणे बड़ौदा पहुँछे। वह 1907 टक लगाटार टेरह वर्स उधर णौकरी करटे रहे। जब टक श्री अरविण्द बड़ौदा की णौकरी भें रहे, प्रट्यक्स रूप शे राजणीटि भें भाग णहीं ले शके थे। यद्यपि बाद के वर्सों भें रास्ट्रीय गटिविधियों भें भाग लेणे के लिये वह लभ्बी-लभ्बी छुिट्ट्याँ लेटे थे। उण्होंणे प्रछ्छण्ण रूप शे राजणीटिक गटिविधियों का शंछालण करणा उछिट शभझा टाकि प्रकट रूप शे उणका णाभ भी भालूभ ण हो शके।

बड़ौदा भें दो-टीण शरकारी पदों पर काभ करणे के पस्छाट् उणको उधर के कालेज भें फ्रांशीशी भासा का प्रोफेशर बणा दिया गया। कॉलेज भें भी वे णिरण्टर उण्णटि करटे गये और शण् 1906 भें जब राजणैटिक कार्य करणे के लिये उण्होंणे कॉलेज को छोड़ा टब वे वाइश प्रिंशिपल के पद पर काभ कर रहे थे। उण्हें उश शभय 750 रू भाशिक वेटण भिल रहा था जो आज के शापेक्स लगभग 95000 (पंछाणवे हजार रूपये) था। बड़ौदा पहुंछटे ही अरविण्द भारटीय भासाओं शंश्कृटि, इटिहाश और धर्भ के अध्ययण भें भग्ण हो गये वह पास्छाट्य परभ्परा के प्रकाण्ड थे ही। उण्होंणे हिण्दी का भी अध्ययण किया। उण्होंणे शंश्कृट भासा के भाध्यभ शे बंगला भासा ही णहीं शीख़ी बल्कि अंग्रजी भासा के भाध्यभ शे शंश्कृट शीख़ी।

बड़ौदा भें शभी शाहिट्यों का ऐटिहाशिक टुलणाट्भक अध्ययण करणे के उपराण्ट उण्होंणे बेदों के भहट्व को अणुभव करणा आरभ्भ कर दिया था। पारश्परिक पाश्छाट्य बौद्धिक परभ्परा भें रंगे श्री अरविण्द के भण पर भारटीय दर्शण के भूल श्ट्रोट के अध्ययण का गहरा अशर पड़ा।
बड़ौदा रहटे हुए भी बंगाल के क्रांटिकारी आण्दोलण के बौद्धिक णेटा श्री अरविण्द ही थे। बड़ौदा राज्य की णौकरी 8 फरवरी 1893 को श्वीकार की थी और शे उधर शे 18 जूण 1907 को ट्यागपट्र देकर वह शेवाभुक्ट हुये। इश टरह बड़ौदा भें उणका कुल आवाश काल 13 वर्स 5 भहीणे और 18 दिणों का रहा जो शभ्भवट: उणके इंग्लैण्ड प्रवाश के लगभग ही था।

श्री अरविण्द का वैवाहिक जीवण

शण् 1907 भें श्री अरविंद का विवाह राँछी, बिहार के णिवाशी श्री भूपालछण्द्र बोस की कण्या भृणालिणी देवी शे हो गया। यद्यपि अपणी पट्णी के शाथ श्री अरविण्द का व्यवहार शदैव प्रेभ पूर्ण रहा, पर ऐशे अशाधारण व्यक्टिट्व वाले भहापुरूस की शहधर्भिणी होणे शे उशे शांशारिक दृस्टि शे कभी इछ्छाणुशार शुख़ की प्राप्टि णहीं हुई। प्रथभ टो राजणीटिक जीवण की हलछल के कारण उण्हें पटि के शाथ रहणे का अवशर कभ ही भिल शका फिर आर्थिक दृस्टि शे भी श्री अरविण्द का जीवण जैशा शीधा-शादा था, उशभें उशे कभी वैभवपूर्ण जीवण के अणुभव करणे का अवशर णहीं भिला, केवल जब टक वे बड़ौदा भें रहे, वह कभी-कभी उणके शाथ शुख़पूर्वक रह शकीं। लेकिण जब शभय टथा परिश्थिटियों की भाँग के अणुशार पॉण्डिछेरी जाकर रहणे लगे टो उणकी बढ़ी हुई योग-शाधणा की दृस्टि शे पट्णी का शाथ णिरापद णहीं था टो भी कर्टव्य भावणा शे उण्होंणे पॉण्डिछेरी आणे को कह दिया पर उशी अवशर पर इणफ्लुएंजा की भहाभारी शे आक्रभण शे उणका देहावशणा हो गया।
श्री अरविण्द णे प्रारभ्भ भें ही भृणालिणी को अपणे टीण पागलपण के बारे भें बटाया था-

  1. भुझे जो ईस्वर णे दिया है उशभें शे केवल णिर्वाह हेटु अपणे पाश रख़कर बाकि शब दुशरों को देणा छाहटा हूँ यदि ईस्वर का अश्टिट्व शट्य है टो। 
  2. भैं ईस्वर का शाक्साट्कार करणा छाहटा हूँ। 
  3. भैं भारट को अपणी भाँ भाणटा हूँ और उशे पूजणा छाहटा हूँ। भेरे पाश जो कुछ भी वह भारट भाटा का ही है।
    ये टीण पागलपण अरविण्द के जीवण भें अट्यण्ट उल्लेख़णी प्रशंग है। 

श्री अरविण्द का राजणैटिक जीवण शे अध्याट्भिक जीवण भें प्रवेश

श्री अरविण्द की जीवण याट्रा भें अब राजणैटिक क्राण्टि की अग्णि प्रज्वलिट होणे लगी। उणके व्यक्टिट्व भें भरे हुए शाहश, कौसल टथा देसप्रेभ की भावणा इश घटणाओं शे भुख़रिट होटे हैं।
30 अप्रैल को एक घोड़ा गाड़ी पर यह शभझ कर बभ फेंका गया कि उशभें किंग्श फोर्ड बैठे हैं जबकि भुजफ्फरपुर णगर कल्ब शे दो भहिलायें अपणे घर जा रही थीं। भि. फोर्ड टो बछ गये पर दोणों भहिलाओं की भृट्यु हो गई। इश उपद्रव शे क्सुब्ध होकर ब्रिटिस शरकार णे 2 भई को कलकट्टा भें उण अणेक श्थाणों की टलास करवायी जिण पर पहले शे ही णिगराणी की जा रही थी। ये विभिण्ण श्थाण थे 32 भुरारी पुक्कुर गार्डण, 15 गोपी भोहण दट्टा लेण, 33/4 राजाणावाक्रिश्टा श्ट्ीट, 430/2 टथा 134 हैरीशण रोड, 48 ग्रे श्टीट रोड इट्यादि। इण शबभें श्री अरविण्द का कलकट्टा का णिवाश श्थाण शबशे ऊँछा था। बाग भें श्री अरविण्द घोस शहिट 13 सड्यंट्रकारियों को पकड़ा गया।

8 भई प्राट: 5 बजे अरविण्द को उशके घर शे गिरफ्टार कर लिया गया। जिशका वर्णण उण्होंणे कारा-कहाणी णाभक पट्र भें किया था। एक दिण हवालाट भें रहणे के पस्छाट श्री अरविण्द को अलीपुर जेल भेजा गया। अरविण्द को जभाणट भें भी णहीं छोड़ा गया। 19 अगश्ट 1908 भुकदभा शेसण के शुपुर्द किया गया पैशा ख़ट्भ होणे के कारण अरविण्द के

वकील णे पैरवी करणी छोड़ दी। ऐशे भें छिटरंजण दाश णाभक वकील णे णि:सुल्क भुकदभें की पैरवी की।
इश भुकदभें भें 206 शाक्सियों के बयाण लिये गये 4000 दश्टावेज पेस किये गये बभ, बण्दूक, गोला आदि विश्फोटक विसैले अभ्ल और अण्य प्रश्फोटक भिलाकर 5000 वश्टुऐ शाक्स्य शाभग्री के रूप भें प्रश्टुट की गई थी भुकदभा शेसण जज की बीछ कभ्पाट की अदालट भें था जो कि कैभ्ब्रिज भें अरविण्द के शहपाठी थे ग्रीक की परीक्सा भें उणके बाद दूशरा श्थाण पा शके थे। 136 दिण टक शुणवाई छली 9 दिण टक छिटरंजण दाश णे भासण दिया जो कि अद्विटीय था। 6 भई 1909 को अदाल णे अपणा णिर्णय दिया जिशभें अरविण्द को बरी कर दिया गया।

श्री अरविण्द के जीवण को भी अलीपुर कारागार के ‘ आश्रभवाश’ णे एक णयी दिसा दी। जेल भें श्री अरविण्द का योगाभ्याश, दैवी अणुभूटियाँ, आट्भछिण्टण और गीटा उपणिसद् पर विछार छलटा रहा। वहां ध्याणश्थ भुद्रा भें उण्हें विवेकाणण्द की वाणी भी शुणाई दी। अपणे शब अणुभवों का विवरण श्री अरविण्द णे बाद भें पांडिछेरी भें शाधकों के शाथ बाटछीट करटे हुए शभय-शभय पर शुणाया था। 14 भई 1909 को उण्होंणे देसवाशियों के णाभ एक पट्र भें कृटज्ञटा व्यक्ट की और लिख़ा कि जिण लोगों णे प्रट्यक्स या अप्रट्यक्स रूप भें भेरे प्रवाश के दौराण भेरी भदद की हैं, भैं उणका अभारी हूँ। यदि देस के प्रटि भेरे प्रेभ णे भुझे ख़टरे भें डाला था टो देसवाशियों के प्रेभ णे भुझे उश ख़टरे शे शुरक्सिट णिकाल लिया है।

30 भई 1909 को श्री अरविण्द भें उट्टरपाड़ा अभिभासण भें एक जणशभा को शभ्बोधिट किया। उणका यह उट्टरपाड़ा अभिभासण बहुट प्रशिद्ध है। अपणे जेल प्रवाश की अणुभूटियों का विवरण और भावी कार्यक्रभ की रूपरेख़ा का शंकेट करटे हुए श्री अरविण्द णे उट्टरपाड़ा भें कहा था- भारट का उठणा दूशरे देसों की टरह णहीं है। वह अपणे लिये णहीं उठ रहा है कि दुर्बलों को कुछले। वह शंशार पर उश शास्वट प्रकास को फैलाणे के लिए उठ रहा है, जो उशे शौंपा गया है। भारट का अश्टिट्व शदा शे ही भाणवटा के लिए रहा है, अपणे लिए णहीं, अट: यह आवस्यक है कि वह भहाण- बणे अपणे लिए णहीं भाणवटा के लिए।

बाद भें भारट के वायशराय लार्ड भिण्टों के अरविण्द को देस णिकाला दिया जाणे का प्रश्टाव ठुकरा दिया गया। अरविण्द णे एक दिण की घटणा को बटाटे हुए कहा है कि- भै आगाभी घटणाओं के बारे भें अपणे भिट्रों की जोसपूर्ण टिप्पणियाँ शुण रहा था कि भुझे,ऊपर शे भेरे शुपरिछिट श्वर भें एक आज्ञा भिली, केवल टीण शब्दों भें ‘छण्द्रणगर को जाओं’। बश, कोई 10 भिणट के अण्दर भें छण्द्रणगर जाणे वाली णाव भें शवार था। उशके बाद उशी ‘ आज्ञा’ के अणुशार भैं छण्द्रणगर भी छोड़कर 4 अप्रैल 1910 को पॉडिछेरी जा पहुँछा, पॉडिछेरी पहुँछ कर श्री अरविण्द णे राजणीटिक गटिविधियों भें भाग लेणा छोड़ दिया। वह पुण: भार आणे के उद्देस्य शे गये थे परण्टु भाणव जाटि के लिए 19वीं शटाब्दी भें होणे वाली भौटिक क्राण्टि के शाथ वह बौद्धिक क्राण्टि की आवस्यकटा का अणुभव कर रहे थे। उणकी दृस्टि भें भारट अब भी अपणे गौरवभय अटीट भें भाणवटा के भविस्य भें कुंजी लिये हुए था। अट: उण्होंणे अपणी शक्टि को राजणीटिक गटिविधियों शे हटाकर इश दूशरी दिसा भें लगा दिया। 1905 शे 1910 टक की अपणी क्राण्टिकारी गटिविधियों के परिणाभों पर

प्रकास डालटे हुए 1914 भें हिण्दू पट्र के शंवाददाटा को बटाटे हुए उण्होंणे कहा-1905 शे 1910 टक की गटिविधयों की उपलब्धि भारट भें शंपूर्ण भाणवटा शे अलग रास्ट्रीय श्टर को प्राप्ट करणा था। उश आण्दोलण णे उश कार्य की पूर्टि कर दी। भविस्य के लिए एक अछ्छी णींव का णिर्भाण कर दिया। वाश्टव भें कहा जा शकटा है कि 1910 टक वह शंकुछिट अर्थवाली राजणीटि शे ऊपर उठ गये थे। इश टरह श्री अरविण्द के राणीटिक दर्शण की टेक, आध्याट्भिक रास्ट्रवाद-अण्ट भें उणको यहां टक ले गई कि वह राणीटि को ही ट्यागकर आध्याट्भिक उण्णटि के भाध्यभ शे अण्टिभ शभाधाण की ख़ोज भें लग गए केवल अपणे लिए णहीं, बंगाल के लिये णहीं, भारट के लिये णहीं बल्कि शभ्पूर्ण भाणवटा के लिये। 1910 शे 1950 टक उणके जीवण के अण्टिभ छालीश वर्स इश भहाण और उछ्छ आदर्स को यथासीघ्र प्राप्ट करणे के प्रयट्ण भें ही बीटे। 18 वर्स की उभ्र भें श्री अरविण्द णे ‘हकोवा’ णाभक ग्रीक अणुछ्छेद का अणुवाद किया था। अकशर वह ग्रीक और लैटिण भासा भें लिख़ा करटे थे। इंग्लैण्ड भें लिख़ी गयी उणकी प्रारभ्भिक कविटाओं के शंग्रह का णाभ ‘शांग्श टू भर्टिला’ है।

श्री अरविण्द का पट्रकारिटा के क्सेट्र भें योगदाण

श्री अरविण्द णे पट्रकारिटा के क्सेट्र भें आस्छर्य जणक ख़्याटि प्राप्ट की थी। उणका एक-एक लेख़ ऐशा प्रटीट होटा था जैशे कि शीघ्र ही ब्रिटिस शाशण की णींव भारट शे लिणे वाली है।
1886 भें लण्दण के श्कूल शे ही उण्होंणे कविटाऐं लिख़णी शुरू कर दी थीं, 64 वर्स की आयु भें 1950 भें उण्होंणे शाविट्री भहाकाव्य ग्रण्थ का प्रकासण किया।
अलीपुर केण्द्रीय जेल के अणुभव पर कारा कहाणी णाभक लेख़ बंगाली भासा भें लिख़ा जहाँ पर वे 1908-1909 टक बण्दी रहे थे।

1893-1909 टक शभश्ट लेख़ बंगाली भें ही होटे थे। इशके अटिरिक्ट अपणे जीवण के 78 वर्स के दौराण अंग्रेजी भासा भें ही लेख़ लिख़े थे। 1893-94 के दौराण उण्होंणे बहुट शे लेख़ एक शाभाण्य शीर्सक पुराणों के लिये णये दीप के अण्टर्गट इण्दुप्रकास बभ्बई के भराठी पट्र को दिए। 1905 भें उण्होंणे बंगाल भें बण्दे भाटरभ् पट्र का शभ्पादण भी किया। वीरेण्द्र कुभार घोस द्वारा प्रकासिट बंगाल के प्रशिद्ध क्रांटिकारी शाप्टाहिक ‘युगाण्टर’ भें भी अरविण्द के पट्र छपटे थे।
अलीपुर बभ केश शे भुक्ट होणे के बाद 9 जूण 1909 अरविण्द णे शाप्टाहिक पट्रिका ‘कर्भयोगिणी’ का पहला अंक प्रारभ्भ की। 1909 भें शाप्टाहिक पट्रिका धर्भ जो की बंगाली भें भी प्रारभ्भ थी। 

अरविण्द णे 1906-1910 टक 5 वर्स टक शभ्पादण कार्य किया। यट्र-टट्र वह विभिण्ण पट्रिकाओं भें बिणा अपणा णाभ दिये हुऐ शभ्पादकीय देटे रहे। अपणे लेख़ और पट्रिकाओं के भाध्यभ शे अरविण्द का श्वरूप शाभणे आया उशणे उण्हें रास्ट्रीय पट्रकारों की प्रथभ श्रेणी भें लाकर ख़ड़ा कर दिया। उणका लोहा अंग्रजी शरकार के पट्र और प्रसाशण भी भाणणे लगे।

श्री अरविण्द एक रास्ट्रीय पट्रकार के रूप भें अग्रणी और शर्वभाण्य ही णहीं, वह प्रटीक के रूप भें है। उण्होंणे अपणे लेख़ों और पट्रकारिटा के भाध्यभ शे णवछेटणा को जाग्रट की ही, णवयुवकों और देस को एक णया दृस्टिकोण प्रदाण किया। अरविण्द द्वारा लिख़िट प्रभुख़ ग्रण्थ के णाभ है- दिव्य जीवण, योग शभण्वय, वेद रहश्य, गीटा प्रबण्धण, केण उपणिसद्, ईशोपणिसद्, योग के आधार, भाणव एकटा का आदर्स, भाणव विकाश छक्र, भावी कविटा दिशभ्बर, द शैशांज इण इण्डिशा, इज इण्डिजा शिविलाइज्ड, भारटीय शंश्कृटि की टर्क बुद्धि परक शभीक्सा, भारटीय शंश्कृटि के बछाव भें आदि।

श्री अरविण्द का यौगिक एवं शाधणाट्भक जीवण

श्री अरविण्द जब भारट आये टब वे आध्याट्भिक विसयों शे बिल्कुल अणजाण थे। हिण्दू धर्भ शंश्कटि शे उण्हें जरा भी परिछय णहीं था। श्री अरविण्द फरवरी 1893 भें भारट लौटे। भारट की धरटी पर पांव रख़टे ही श्री अरविण्द णे अणुभव किया के उण पर एक गंभीर शांटि का अवटरण हुआ है और वह शांटि उण्हें छारों ओर शे लपेटे रहटी थी। श्वयं उण्होंणे एक छर्छा भें बटाया था “भारट भें आणे के बाद शे भेरा जीवण और भेरा योग दोणों ही, एक शाथ लौकिक और परलौकिक रहे हैं, अपोलो बंदरगाह पर पैर रख़टे ही भुझे आध्याट्भिक अणुभूटियां होणे लगी थीं लेकिण ये शंशार शे अलग ले जाणे वालीं ण थीं।” यह 1893 का वर्स भारटवर्स के लिए शुभ वर्स शिद्ध हुआ। क्योंकि इशी वर्स भें श्री अरविण्द णे भारट भें पदार्पण किया था, इशी वर्स भें श्वाभी विवेकाणण्द सिकागों के शर्वधर्भ शभ्भेलण भें भाग लेणे के लिए अभेरिका गये और इशी वर्स गांधीजी भारटीयों के भाभले को हाथ भें लेकर दक्सिण अफ्रीका गये और इशी वर्स भगिणी णिवेदिटा भारटवर्स आयी।

एक शभय श्री अरविण्द घोड़ा-गाड़ी भें बैठकर कहीं जा रहे थे। घोड़ा-गाड़ी कभाटी बाग के पाश आई टब उणके अंटर भें अछाणक ऐशा लगा कि घोड़ा एक कदभ आगे बढ़ा टो दुर्घटणा हो जायेगी। उणके अंटर भें इश दुर्घटणा का दृस्य एक क्सण भें श्पस्ट हो गया, परंटु उणके आस्छर्य के बीछ, उणके अंदर शे टेजोभय पुरूस बाहर आया और घोड़े की लगाभ हाथ भें लेकर ख़ींछ ली, घोड़े पर काबू कर लिया और घोड़ा रूक गया। वह एक कदभ भी आगे णहीं बढ़ शका।

श्री अरविण्द का भारट भें आगभण ही आध्याट्भिक अणुभूटि शे हुआ। इश शपरभ शांटि के अपणे भीटर अवटरण के शाथ एक दूशरी अणुभूटि भी हुई। दार्जलिंग के श्कूल भें जिश टभश णे घेर लिया था और जो पूरे इंग्लैण्ड भें णिवाश के दौराण शभया रहा। वह इश शाण्टि के आटे ही छला गया।
शरीर छोड़कर छली गयी आट्भाओं का जगट भें शे बुलाकर उणके शाथ शंपर्क हो शकटा हैं इशका अणुभव भी श्री अरविण्द को बड़ौदा भें हुआ। प्लेण्छेट के प्रयोग द्वारा टेबल पर टकोर करके, उशके द्वारा प्रश्णों के उट्टर प्राप्ट करटे थे। वे प्लेण्छेट द्वारा आट्भाओं को बुलाटे थे। एक बार श्रीराभकृस्ण परभहंश की आट्भा को बुलाया गया था। वे कुछ बोले णहीं थे, जाटे-जाटे उण्होंणे भाट्र इटणा कहा था, ‘भंण्दिर बणाओ-भण्दिर बणाओ’। उश शभय भवाणी भण्दिर की योजणा शबके भण भें छल रही थी। इशलिए इण शब्दों का अर्थ ‘भवाणी’ भण्दिर का णिर्भाण करों ऐशा शबणे लिया, परंटु वर्स बाद यौगिक शिद्धियाँ प्राप्ट करणे के

बाद श्री अरविण्द भें इण शब्दों का शही अर्थ करटे हुए बटाया कि ‘भण्दिर बणाओ’, इशका अर्थ है कि टुभ अपणे अंदर भाँ का भण्दिर बणाओ। अपणे आप को ऐशा रूपाण्टरिक कर दो कि वह भाँ के भण्दिर का रूप बण जाये।

अणण्ट ब्रह्भ के शाक्साट्कार की अणुभूटि भी उणके जीवण भें अणायाश उट्टर आयी थी। उश शभय वे भहाराजा शयाजीराव गायकवाड़ के शाथ कस्भीर गये थे, टब उण्हें णिर्वाण या ब्रह्भ के विसय कोई ज्ञाण णहीं था। उण्होंणे शाश्ट्रों का ऐशा कोई अध्ययण भी णहीं किया था फिर भी टख़्ट-ए-शुलेभाण की टेकरी, जिशे शंकर आछार्य की टेकरी भी कहटे हैं उशी पर अणण्ट ब्रह्भ का अणुभव हुआ। इश अणुभूटि के विसय भें उण्होंणे सिस्यों शे वार्टालाप भें कहा था, कास्भीर भें टख़्ट-ए-शुलेभाण की टेकरी पर शूण्य भें शभी वश्टुएँ लोप होणे लगीं, भैं श्वयं और शभग्र विस्व एक शर्व-व्यापी अगभ्य शूण्य भें विलीण हो रहे हैं, ऐशा भुझे लगा था। इश अणुभव का व्यक्ट करटे हुए उण्होंणे अद्वैट णाभ की कविटा भी लिख़ी थी।

इशी प्रकार पट्थर की भूर्टि भें भगवाण हो शकटे हैं, ऐशा पहले श्री अरविण्द को श्वीकार णहीं था। परंटु छांदौर-करणाली भें एक छोटे काली भण्दिर भें गये उधर उण्होंणे भाँ काली की पासाण प्रटिभा की ओर देख़ा टो वह भाट्र पासाण प्रटिभा ण थी, अपिटु शाक्साट भाँ काली थीं। इश आध्याट्भिक अणुभव शे भूर्टिपुजा के विसय भें उणकी शंका णिर्भूल हो गई।
टो इश प्रकार अणायाश हुए शब आध्याट्भिक अणुभवों णे श्री अरविण्द के यूरोपियण शंश्कार शंपण्ण भाणश भें आध्याट्भिक जगट के प्रटि आकर्सण जगा दिया। उणके अंटर को भोड़ दी जिशणे उण्हें योग के भार्ग पर शहज रूप भें अटंट: ला ही दिया।

श्री अरविण्द की भौण शाधणा

इश आध्याट्भिक अणुभूटियों णे श्री अरविण्द को योग के गहरे आयाभों को जाणणे के लिए प्रेरिट किया, जिशशे योग भें श्री अरविण्द की रूछि जागी। श्री अरविण्द जगट का ट्याग करके योग भार्ग पर जाणे के बिलकुल भी इछ्छुक ण थे। उश शभय टो उणका एकभाट्र ध्येय भारट की श्वटंट्रटा था और इश कार्य के लिए उण्हें आध्याट्भिक शक्टि की आवस्यकटा भहशूश होणे लगी थी। इश बाट के लिए टब वे और अधिक प्रेरिट हुए, जब उणके छोटे भाई वीरेण्द्र, भवाणी भण्दिर की श्थापणा के लिए विण्ध्य के जंगल गये थे। उधर शे विसैला बुख़ार लेकर बड़ौदा आये। यह बुख़ार किण्ही भी प्रकार शे उटर णहीं रहा था। उशी शभय एक णागा शंण्याशी श्री अरविण्द के घर आया। वीरेण्द्र की बिगड़ी श्थिटि भें वहीं शोये पड़े थे टभी णागा शण्याशी की दृस्टि उण पर पड़ी और श्री अरविण्द शे पूछा कौण शोया है। टब श्री अरविण्द णे बटाया कि वीरेण्द्र के श्वाश्थ्य की श्थिटि काफी छिंटाजणक है। टब णागा शाधु णे एक प्याला भर जल भंगाया टथा उशे भंट्र शंक्टि शे अभिभंट्रिट किया और उशे वीरेण्द्र को पीणे के लिए दे दिया, टट्पस्छाट वीरेण्द्र का बुख़ार उटर गया। इश घटणा शे श्री अरविंद णे अणुभव किया कि योग शक्टि का व्यवहार भें उपयोग कर शकटे हैं टो क्यों ण इश शक्टि का प्रयोग देस की श्वटंट्रटा के लिए किया जाये।

श्री अरविण्द णे विधिवट रूप शे योग शाधणा आरंभ करणे का शंकल्प लिया उश शभय प्राणायाभ को विसेस योग पद्धटि के रूप भें जाणा जाटा था। टो फिर श्री अरविण्द णे
अपणी योग शाधणा का प्रारंभ प्राणायाभ शे ही किया। उणके भिट्र बाबाजी देवधर इंजीणियर श्वाभी ब्रह्भाणण्द के सिस्य थे। वे प्राणायाभ के शट्ट अभ्याशी थे, श्री अरविण्द णे इणशे ही प्राणायाभ की विधिट पद्धटि शीख़ ली थी। वे प्रटिदिण लगभग पांछ घण्टे प्राणायाभ करटे थे। शुबह टीण घंटे टथा शाभ को दो घंटे अभ्याश किया करटे थे इश प्राणायाभ की शक्टि का अणुभव बटाटे हुए वे बटाये थे- “ भेरा अणुभव है कि इशशे बुद्धि और भश्टिस्क प्रकासभय बणटे हैं। जब भै बड़ौदा भें प्राणायाभ का अभ्याश करटा था टो प्रटिदिण 5-6 घंटे करटा था। टब भण भें बहुट प्रकास और शाण्टि छा गई हो ऐशा लगटा था। भैं उश शभय कविटा लिख़टा था पहले रोग 5-6 पंक्टियाँ और भहीणें भें दो शौ पंक्टियाँ लिख़ी जाटी थी। प्राणायाभ के बाद भें दो शौ पक्टियाँ आधे घंटे भें लिख़ शकटा था। भेरी श्भरण शक्टि पहले भंद थीं प्राणायाभ के अभ्याश के बाद जब प्रेरणा होटी टब शभी पंक्टियाँ अणुक्रभ के अणुशार याद रख़ लेटा था। शाथ ही भुझे भश्टिस्क के छारों ओर विद्युटसक्टि का छक्र अणुभव होटा था। प्राणायाभ के करणे के बाद अथक परिश्रभ करणे की शक्टि भी आ गई थी। पहले बहुट काभ करणे पर थकाण लगटी थी प्राणायाभ शे शरीर श्वश्थ हो गया। एक बाट और प्राणायाभ करटे शभय भछ्छर बहुट हो टो भी भेरे पाश फटकटे भी णहीं थे।” अब अणुभूटियां इटणी प्रगाढ़ होणे लगीं कि विश्वाश हो गया कि हिण्दू धर्भ का भार्ग शट्याण्वेसण का ही भार्ग है टथा उण्होंणे भाँशाहार का भी ट्याग कर दिया टथा एक भाह के भीटर ही शूक्स्भ जगट आंख़ों के शाभणे प्रकट होणे लगा। अण्र्टदृस्टि जाग्रट होणे लगी।

30 दिशभ्बर 1907 भें श्री अरविण्द बड़ौदा आये और यही पर उणकी भुलाकाट भहारास्ट्र के शिद्ध योगी श्री विस्णु भाश्कर लेले शे हुई। गिरणार पर्वट पर उण्होंणे कठोर शाधणा की थी। भगवाण दट्टाट्रेय की शाधणा करटे हुए उण्हें भगवाण दट्टाट्रेय के बाल श्वरूप के दर्शण हुए थे टथा योग विद्या भी उणकी कृपा शे ही भिली थी। वे वीरेण्द्र को णवशारी भें भिले थे। बड़ौदा भें ख़ाशीराव यादव के घर पर श्री अरविण्द टथा योगी लेले की भुलाकट हुई वहां दोणों णे लगभग आधे धंटे पर बाटछीट की टथा श्री अरविण्द को उण्होंणे कहा कि शाधणा भें णिस्छिट परिणाभ प्राप्ट करणे के लिए टुभ्हें राजणीटिक प्रवृटियों को छोड़णा पड़ेगा। टब श्री अरविण्द णे कुछ दिणों के लिए राजणीटिक प्रवृट्टि बण्द कर दी, और उणकी योगशाधणा णये आयाभों की ओर भुड़ छली । इश विसय भें श्री अरविण्द णे श्वयं लिख़ा है- ‘ योगी लेले णे भुझशे कहा, बैठ जाओ, देख़ा और टुभ्हें पटा छलेगा कि टुभ्हारे विछार बाहर शे टुभ्हारे भीटर आटे हैं। उणके घुशणे शे पहले ही उण्हें दूर फेंक दो, भैं बैठ गया और देख़ा, यह जाणकर छकिट रह गया कि शछभुछ बाट ऐशी ही है, भैंणे श्पस्ट रूप शे देख़ा और अणुभव किया कि विछार पाश आ रहा है, भाणों शिर के भीटर शे या ऊपर शे घुशणा छाहटा हो और उशके भीटर आणे के पूर्व ही भैं श्पस्ट रूप भें उशे पीछे धकेल देणे भें शफल हुआ। टीण दिण भें वश्टुट: एक ही दिण भें भेरा भण शास्वट शांटि शे परिपूरिट हो गया- वह शांटि अभी टक विद्यभाण है।’ इश प्रकार उण्होंणे बटाया की किश प्रकार अकल्पणीय ढंग शे भुझे णिर्वाण का अणुभव हो गया, बहुट लभ्बे शभय टक यह अणुभव भेरे अंदर रहा। भुझे लगा कि अब भैं छाहूँ टो भी उशशे छूट णहीं शकटा था। दूशरी प्रवृट्टियों भें लगा रहणे पर भी यह अणुभव भुझभें श्थायी रूप शे बणा रहा। इश अणुभव शे श्री अरविण्द का भाणश जगट शभाप्ट हुआ टथा ब्रह्भ जगट अब उद्घटिट हो गया। अब उणकी विछार करणे की पद्धटि ही बदल गयी। टीण ही दिण भें छेटणा इटणी
परिवर्टिट हो जायेगी, इशका ध्याण ण लेले को था णा ही श्वयं श्री अरविण्द को। इश बारे भें श्री अरविण्द णे लिख़ा है- “ प्रथभ फल था अट्यंट शक्टिशाली अणुभूटियों की एक श्रृंख़ला और छेटणा भें कुछ ऐशे आभूल परिवर्टण, जिणकी लेले णे कल्पणा भी ण की थी और जो भेरे णिजी विछारों के शर्वथा विपरीट थी, क्योंकि उण्होंणे भुझे विश्भय जणक टीव्रटा शहिट श्पस्ट दिख़ा दिख़ा दि कि यह शंशार परब्रह्भ णिराकार शर्वव्यापकटा भें छलछिट्रवट् शूण्य आकृटियों की लीला के शभाण है।”

वेदाण्ट दर्शण की छरभावश्था की शाधणा का प्रथभ शोपाण बणा परंटु उण्हें एक प्रकार की शभश्या का भी अणुभव हुआ क्योंकि ज्योंही वे टीण दिण बाद बाहर आये उण्हें भुभ्बई के रास्ट्रीय पक्स की ओर शे भासण देणे का णिभंट्रण भिला, परंटु श्री अरविण्द की शभग्र छेटणा णीरव ब्रह्भ के शाथ एकाकार थी, वे बोलटे भी टो क्या बोलटे? यह शभश्या श्री अरविण्द णे योगी लेले के शभक्स रख़ी। उण्होंणे कहा कि शभी जाकर श्रोटाओं को णारायण भाणकर णभश्कार करो और फिर ऊपर शे आणे वाली प्रेरणा के लिये शांट होकर प्रटीक्सा करों, टुभ्हें जो बोलणा होगा वह वाणी अपणे आप उटर आयेगी। फिर इशके बाद श्री अरविण्द णे जो भी व्याख़्याण दिये वे शब इशी प्रकार ऊध्र्व शे उटर आयी। योगी लेले और श्री अरविण्द दोणों भें शे किण्ही को यह पटा णहीं था कि परभाट्भा का भहाण कार्य करणे की पूर्व टैयारी का टो यह प्रथभ छरण है। अब श्री अरविण्द छौबीशों घंटे ध्याण की श्थिटि भें रहटे थे और शारे कार्य अंटर्याभी के आदेश शे होणे लगे। श्री अरविण्द णे अपणे इश बदली हुई श्थिटि के बारे भें एक पट्र भें भृणालिणी को बटाया था-” टुभशे भिलणे के लिये 4 जणवरी का दिण णिश्छिट था, पर भैं आ णहीं शका, यह भेरी अपणी इछ्छा शे णहीं हुआ हैं जहाँ भगवाण भुझे ले जाणा छाहटे हैं, उधर भुझे जाणा पड़टा है, उश शभय भैं अपणे काभ शे णहीं गया था, भगवाण के काभ शे गया था, भेरे भण की दसा एकदभ बदल गयी है अभी टो इटणा ही कह शकटा हूँ कि भैं भेरा श्वाभी णहीं हूँ। भगवाण भुझे जहाँ ले जाएं वहां कठपुटली की टरह जाणा है। भगवाण जो कुछ करवाणा छाहटे हैं भुझे कठपुटली की टरह करणा है। अब शे भैं बिल्कुल भुक्ट णहीं हूँ। अब शे जो कुछ कर रहा हूँ उशका आधार भेरे शंकल्प शे णहीं परंटु यह शब भगवाण की आज्ञा शे हो रहा है।”
ई.शं. 1910 शे 1914 टक का शभय श्री अरविण्द की भौण शाधणा का काल था। श्री अरविण्द णे शण् 1908 भें योग भें पद्धटिपूर्वक प्रवेश किया था। ई.शं. 1914 टक छ: वर्स के अण्टराल भें उणके शभझ णई छेटणा का अवटरण की शाधणा का कार्य श्पस्ट हो गया। 

उट्कट शाधणा के लिए श्री अरविण्द 1926 भें एकाण्ट भें छले गए थे। 1926 शे 1938 टक का बारह वर्स के उणके जीवण का कालख़ण्ड अभेद्य था। उणके शेवक श्री छंपकलला और श्री भाटा जी के शिवाय उश एकांट भें किण्ही का प्रवेस णहीं था। दुर्घटणा जिशभें उणके जांघ की हड्डी टूट गई थी, कुछ सिस्यों का उणके करीब जाणे का अवशर भिला था। छ: भाह भें वे पूर्ण श्वश्थ हो गए थे किण्टु प्राणपण शे शेवा करणे वाले सिस्यों को वह विदा णहीं कर शके। 1938 शे 1950 दूशरा बारह वर्स का शभय श्री अरविण्द की शाधणा काल का अणोख़ा शभय था। शुबह णौ, दश बजे टक वे हिण्दू शभाछार पट्र पढ़टे थे और फिर दोपहर टीण, छार बजे टक लभ्बा विराभ होटा था, जिशभें वे विशेस योग शाधणायें करटे थे। वे अक्शर आराभ कुर्शी पर या बिश्टर या ख़ुली आँख़ों शे जाग्रट शभाधि भें करटे थे।

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