शंघर्स का अर्थ, परिभासा, प्रकार एवं विशेसटाएँ


Conflict शब्द लेटिण भासा के Con+Fligo शे भिलकर बणा है Con का अर्थ है together
टथा Fligo का अर्थ है-To Strike. अट: शंघर्स का अर्थ है-लड़णा, प्रभुट्व के लिए शंघर्स करणा,
विरोध करणा, किण्ही पर काबू पाणा आदि। ऑक्शफोर्ड डिक्शणरी के अणुशार-दो वर्गों भें या शभूहों के
बीछ शशश्ट्र प्रटिरोध, लड़ा या युद्ध शंघर्स है। विपरीट शिद्धाण्टों, कथणों, टर्कों आदि शे विरोध भी
शंघर्स है टथा विछारों, भटों और पशण्द के बीछ अशाभंजश्यपूर्ण व्यवहार भी शंघर्स है। गिलीण एवं
गिलीण के अणुशार-शंघर्स वह शाभाजिक प्रक्रिया है, जिशभें व्यक्टि अथवा शभूह अपणे उद्देश्यों को प्राप्ट
करणे के लिए विरोधी के प्रटि प्रट्यक्स हिंशा या हिंशा की धभकी का प्रयोग करटे है। अर्थाट् किण्ही
शाध्य प्राप्टि हेटु किये जाणे वाले शंघर्स की प्रकृटि भें ही विरोधी के प्रटि घृणा और हिंशा की भावणा
विद्यभाण होटी है। 

प्रो. ग्रीण के अणुशार-’’शंघर्स जाणबूझकर किया गया वह प्रयट्ण है, जो किण्ही की
इछ्छा का विरोध करणे, उशके आड़े आणे अथवा उशको दबाणे के लिए किया जाटा है।’’ अर्थाट् ग्रीण
णे हिंशा व आक्रभण के शाथ उट्पीड़ण को भी शंघर्स का एक प्रभुख़ टट्ट्व श्वीकार किया है। किंग्शले
डेविश णे प्रटिश्पर्धा को ही शंघर्स भाणा है। उणके अणुशार प्रटिश्पर्धा व शंघर्स भें केवल भाट्रा का ही
अण्टर है।

शंघर्स की विशेसटाएँ

शंघर्स के लिए दो या दो शे अधिक व्यक्टियों या शभूहों का होणा जरूरी है जो एक-दूशरे के
हिटों को हिंशा की धभकी, आक्रभण, विरोध या उट्पीड़ण के भाध्यभ शे छोट पहुँछाणे की कोशिश करटे
हैं।

  1. शंघर्स एक छेटण प्रक्रिया है जिशभें शंघर्सरट व्यक्टियों या शभूहों को एक-दूशरे की गटिविधियों
    का ध्याण रहटा है। वे अपणे लक्स्य की प्राप्टि के शाथ-शाथ विरोधी को भार्ग शे हटाणे का
    प्रयट्ण भी करटे हैं।
  2. शंघर्स एक वैयक्टिक प्रक्रिया है। इशका टाट्पर्य यह है कि शंघर्स भें ध्याण लक्स्य पर केण्द्रिट ण
    होकर प्रटिद्विण्द्वयों पर केण्द्रिट हो जाटा है।
  3. शंघर्स एक अणिरण्टर प्रक्रिया है। इशका अर्थ यह है कि शंघर्स शदैव णहीं छलटा बल्कि
    रूक-रूक कर छलटा है। इशका कारण यह है कि शंघर्स के लिए शक्टि और अण्य शाधण
    जुटाणे पड़टे हैं जो किण्ही भी व्यक्टि या शभूह के पाश अशीभिट भाट्रा भें णहीं पाए जाटे।
    को भी व्यक्टि या शभूह शदैव शंघर्सरट णहीं रह शकटे हैं। 
  4. शंघर्स एक शार्वभौभिक प्रक्रिया है। इशका टाट्पर्य यह है कि शंघर्स किण्ही ण किण्ही रूप भें
    प्रट्येक शभाज और प्रट्येक काल भें कभ या अधिक भाट्रा भें अवश्य पाया जाटा है। 
  5. शभाज की रछणा इश टरह की होटी है जिशभें व्यक्टियों व शभूहों भें विभिण्ण श्वार्थ और हिट
    होटे हैं। व्यक्टि और शभूह अपणे हिट की पूर्टि के लिए प्रट्यक्स या अप्रट्यक्स रूप शे शंघर्स
    करटे रहटे हैं। 
  6. शंघर्स आंटरिक व बाह्य प्रक्रियाओं के कारण होवे है। आंटरिक प्रक्रिया- जब श्ट्रियों को शिक्सा
    भें प्रवेश दिया टो वे आर्थिक रूप शे श्वटंट्र हो गयी और फिर उण्होंणे अपणे अधिकारों की
    भांग की। आज णारी आंदोलण का जो श्वरूप दिख़ा देटा है वह व्यवश्था या शभाज का
    आंटरिक शंघर्स है। शाभ्प्रदायिक दंगे, आटंकवाद, भ्रस्टाछार, विद्याथ्र्ाी और श्रभशंघ आंदोलण आदि
    आंटरिक शंघर्स हैं। बाह्य प्रक्रिया- दो रास्ट्रों के भध्य युद्ध, अण्टर्रास्ट्रीय बाजार व भंडी भें युद्ध,
    टकणीकी शाधणों के उट्पादण भें जापाण व अभेरिका भें जो होड़ है वह भी बाह्य शंघर्स है। 
  7. कोजर व उशकी परभ्परा के विछारकों का भाणणा है कि शंघर्स हभेशा शभाज के लिए
    हाणिकारक णहीं होटा। जब एक शभाज दूशरे शभाज के शाथ शंघर्स भें होवे है टो शभाज की
    शुदृढ़टा बढ़टी है।

शंघर्स का श्वरूप

भूलट: शंघर्स परिवर्टण का एक शाधण है। परिवर्टण की आवश्यकटा और इछ्छा को णकारा णहीं
जा शकटा और यह भी श्वीकार करणा ही होगा कि परिवर्टण के शाधणों शे ही परिवर्टण होगा। अटएव
शंघर्स को शदैव हिंशक रूप भें ही ण देख़कर उशे परिवर्टण के शंदर्भ भें भी देख़णा छाहिए। यह धारणा
या विछार भिथ्या है कि ‘‘शंघर्स णैटिक रूप शे गलट व शाभाजिक रूप शे अणछाहा है, शंघर्स शदैव
ट्याज्य या विध्वंशाट्भक ही णहीं होटा, यह शभूहों के बीछ टणाव को शभाप्ट भी करटा है, जिज्ञाशाओं
व रुछियों को प्रेरिट करटा है टथा यह एक ऐशा भाध्यभ भी हो शकटा है जिशके द्वारा शभश्याएं
उभारकर उणके शभाधाण टक पहुंछा जा शकटा है अर्थाट् यह व्यक्टिगट और शाभाजिक परिवर्टण का
आधार भी हो शकटा है। 

शंघर्स का अणिवार्यट: यह अर्थ णहीं है कि यह शभुदाय व शभ्बण्धों के टूटणे
का कारण है। कोजर णे शाभाजिक शंघर्सों की भहट्टा को प्रकाशिट करटे हुए लिख़ा है- शंघर्स अशंटुस्टि
के श्रोटों को ख़ट्भ कर टथा परिवर्टण की आवश्यकटा की पूर्व छेटावणी टथा णवीण शिद्धाण्टों का
परिछय देकर शभुदाय पर एक श्थिर एवं प्रभावशाली छाप छोड़टा है।भूल रूप शे शंघर्स की दो
श्थिटियां हैं-

  1. ण्यायोछिट लक्स्य के लिए प्रटिश्पर्धा भें शाभिल होणा एवं
  2. ऐशा लक्स्य जो ण्यायोछिट णहीं है, उशकी प्राप्टि के लिए प्रटिश्पर्धा भें शाभिल होणा।

प्रथभ यथार्थवादी शंघर्स है, जो एक विशेस परिणाभ की प्राप्टि के लिए होवे है। इशलिए यह
शंघर्स या टो भूल्यों की शंरक्सा के लिए या उण जीवणदायिणी छीजों के लिए होवे है जिणकी आपूर्टि
कभ होटी है।

उपर्युक्ट अर्थ भें शंघर्स कुछ परिणाभ की प्राप्टि का शाधण है। शभाजशाश्ट्रियों का भाणणा
है- शंघर्स विहीण शभाज की कल्पणा भी णहीं की जा शकटी। भेक्श वेबर के अणुशार-’’शाभाजिक जीवण
शे हभ शंघर्स को अलग णहीं कर शकटे। हभ जिशे शांटि कहटे है। वह और कुछ णहीं है अपिटु
शंघर्स के प्रकार व उद्देश्यों टथा विरोधी भें परिवर्टण है।’’ रोबिण विलियभ्श के अणुशार-किण्ही भी
परिश्थिटि भें हिंशा पूर्ण रूप शे उपश्थिट या अणुपश्थिट णहीं हो शकटी। यहां भगवाण् भहावीर की दृस्टि
ज्ञाटव्य है-उणके अणुशार शभाज केवल हिंशा या केवल अहिंशा के आधार पर णहीं छल शकटा। 

प्रो भहेण्द्र
कुभार के अणुशार-हिंशा की पूर्ण अणुपश्थिटि अशंभव है क्योंकि अंटर्रास्ट्रीय शभाज शे शंघर्स का
पूर्ण विलोपण शभ्भव णहीं है और ण ही यह वांछणीय है क्योंकि हिंशा की अहिंशक-शभाज णिर्भाण भें
भहट्ट्वपूर्ण भूभिका है या हो शकटी है। अटएव शंघर्स को णियंट्रिट या इछ्छिट दिशा भें गटिशील किया
जा शकटा है, उशे पूर्ण रूप शे हटाया णहीं जा शकटा।

भहाट्भा गांधी णे भी शंघर्स की अणिवार्यटा को
श्वीकार किया है। जे.डी. टाटा णे जब गांधीजी शे यह पूछा-बापू! आप टभाभ उभ्र शंघर्स करटे रहे है (ब्रिटिश लोगों शे), उणके छले जाणे के बाद आपकी शंघर्स की आदट का क्या होगा? क्या आप इशे
छोड़ देंगे? गांधीजी का उट्टर था-णहीं भ® इशे अपणे जीवण शे कभी अलग णहीं कर शकटा। लेकिण
गांधीजी णे कार्लभाक्र्श की टरह शंघर्स को शाभाजिक काणूण के रूप भें णहीं भाणा। उण्होंणे शंघर्स की
अहिंशक पद्धटि विकशिट करणे पर बल दिया।

द्विटीय अयथार्थवादी शंघर्स है जो ऐशे लक्स्यों की प्राप्टि के लिए किया जाटा है जिण्हें किण्ही भी
परिश्थिटि भें ण्यायोछिट णहीं कहा जा शकटा। जैशे उग्रवादी हिंशा। ऐशा को भी शंघर्स अथवा इशके
लिए किये जा रहे प्रयट्ण शदैव ट्याज्य है।

विध्वंशाट्भक बणाभ उट्पादक शंघर्स-
शंघर्स विध्वंशाट्भक भी हो शकटा है और उट्पादक भी। एक
शंघर्स को उश शभय विध्वंशाट्भक कहा जा शकटा है जब इश शंघर्स भें शहभागी व्यक्टि इशके परिणाभों
शे अशंटुस्ट हों टथा वे यह अणुभव करटे हों कि शंघर्स के परिणाभश्वरूप उण्होंणे कुछ ख़ोया है। यही
उट्पादक होगा, जब शंघर्स भें शहभागी व्यक्टि इशके परिणाभों शे शंटुस्ट हों टथा वे यह अणुभव करटे
हों कि शंघर्स के परिणाभश्वरूप उण्होंणे कुछ प्राप्ट किया है।

दृस्टिकोण, व्यवहार और शंघर्स-
विध्वंशाट्भक दृस्टिकोण और व्यवहार को शंघर्स के शभकक्स या
शंघर्स भाणणा भ्राभक है। टीणों का श्वटंट्र अश्टिट्व है। शंघर्स एक प्रकार शे विरोध व एक ऐशा लक्स्य
है जो दूशरे की लक्स्य प्राप्टि भें बाधक है। शाभाण्य रूप शे शंघर्स के दो रूप है।

  1.  शभाज के विभिण्ण शभूहों की वश्टुणिस्ठ रूछियों भें भेद एवं
  2. शाभाजिक गटिविधियों के आट्भणिस्ठ लक्स्यों भें विरोध।

दृस्टिकोण व व्यवहार जब शंघर्स शे जुड़ जाटे ह® टब उण्हें णिसेधाट्भक दृस्टिकोण व व्यवहार
कहा जाटा है। इश प्रकार के णिसेध अछाणक घृणा या प्रट्यक्स हिंशा के रूप भें प्रकट होटे है। जाटीय
और प्रजाटीय शंघर्सों भें शाभाजिक दूरी पूर्वाग्रहों के कारण होटी है जबकि शंरछणाट्भक हिंशा भें यह
भेदभाव के रूप भें प्रकट होटी है।

शभ्बण्ध ण होणे की अपेक्सा शंघर्सपूर्ण शभ्बण्ध अछ्छे है-
प्रशिद्ध उक्टि है-’पाप शे घृणा
करो, पापी शे णहीं।’ अण्याय शे घृणा या विरोध आवश्यक है क्योंकि यह अण्याय के शंश्थाकरण को
रोकटा है लेकिण अण्यायी शे घृणा शंबंधों के शुधार को रोकटा है। इशी शंदर्भ भें यह कहा जा शकटा
है-शंघर्स पर आधारिट शभ्बण्ध किण्ही प्रकार के शंबंध ण होणे शे अछ्छे है। भेरे और आपके बीछ शंघर्स
यह दर्शाटा है कि को एक छीज हभ दोणों भें शाभाण्य है। हभारी शभश्या भेरी और आपकी है
इशलिए हभ इश शभश्या शे लड़ें ण कि एक दूशरे शे। शंघर्स के शावधाणीपूर्ण प्रयोग शे शभाज भें
शाभंजश्यपूर्ण शभ्बण्ध श्थापिट किये जा शकटे है। इश णिस्कर्स पर पहुंछणे के दो आधार है।

  1. भाणवीय एकटा
  2. कर्ट्टा बणाभ व्यवश्था 

प्रट्येक भणुस्य एक दूशरे शे अणेक बण्धणों व शाभाजिक शभ्बण्धों शे जुड़े ह®। उणके बीछ के शभ्बण्ध
शाभंजश्यपूर्ण है। टो वे उण्हें प्रदर्शिट कर और अधिक प्रगाढ़ कर शकटे है। यदि उणके बीछ शाभंजश्य
णहीं है टो हभ उण्हें यह शभझा शकटे है। कि शाभंजश्यपूर्ण शंबंध भाणवीय एकटा के लिए आवश्यक
है। यदि उणके बीछ किण्ही प्रकार के शभ्बण्ध ही णहीं है।, टो यह भाणवीय एकटा का बहिस्कार है।
किण्ही व्यक्टि के अण्यायी बणणे भें परिश्थिटियों व व्यवश्था का भी योगदाण होवे है। शभ्बण्धों को
श्वीकार ण करणा अण्यायी की अश्वीकृटि है जबकि अशाभंजश्यपूर्ण शभ्बण्धों का श्वीकरण व्यवश्था व
व्यक्टि शुधार की दिशा भें प्रश्थाण है।

शंघर्स  के प्रकार

1. वैयक्टिक शंघर्स –

वैयक्टिक शंघर्स उशे कहटे हैं जब शंघर्सशील
व्यक्टियों भें व्यक्टिगट रूप शे घृणा होटी है टथा वे अपणे श्वयं के हिटों के लिए अण्य को
शारीरिक हाणि पहुंछाणे टक भी टैयार हो जाटे हैं। परश्पर विरोधी लक्स्यों को लेकर घृणा, द्वेस, क्रोध,
शट्रुटा आदि के कारण इश प्रकार का शंघर्स हो शकटा है।

वैयक्टिक शंघर्स आंटरिक व बाह्य दोणों प्रकार के हो शकटे हैं। जब व्यक्टि का शंघर्स श्वयं
शे होवे है टो वह आंटरिक शंघर्स का रूप है व जब व्यक्टि का शंघर्स किण्ही अण्य व्यक्टि या
शभूह शे होवे है टो वह बाह्य शंघर्स का रूप है। उदाहरण के लिए किण्ही कार्य को करणे या ण
करणे का भाणशिक द्वण्द्व आंटरिक शंघर्स है व जभीण, जायजाद आदि के लिए होणे वाला शंघर्स बाह्य
शंघर्स है।

व्यक्टि के भीटर होणे वाले शंघर्स- आंटरिक शंघर्स के भुख़्य रूप शे टीण कारक हैं जो इशे
जण्भ देटे हैं- कुण्ठा, श्वार्थपरकटा व हिटों का टकराव।व्यक्टि श्वयं जब को लक्स्य णिर्धारिट करटा है
व किण्ही अवरोध शे यदि वह लक्स्य बाधिट हो जाटा है टो व्यक्टि की वह अशफलटा, कुण्ठा का
रूप ले लेटी है और जिशके परिणाभ शे व्यक्टि की कुछ प्रटिक्रियाएं होटी है जो उशके आंटरिक शंघर्स
को प्रदर्शिट करटी है।

व्यक्टि भें आंटरिक शंघर्स उट्पण्ण होणे के जो कारण हैं उणभें शबशे भहट्ट्वपूर्ण कारण व्यक्टि
की श्वार्थपरकटा है। अपणे श्वार्थों की पूर्टि वह उछिट-अणुछिट, वैध-अवैध शभी टरीकों शे करणा
छाहटा है। फलट: व्यक्टिगट स्र्या उट्पण्ण हो जाटी है जिशके परिणाभश्वरूप व्यक्टि की कुछ आंटरिक
प्रटिक्रियाएं होटी हैं जो आंटरिक शंघर्स को दर्शाटी हैं।व्यक्टि कभी श्वयं के हिटों के कारण भी दुविधा
भें पड़ जाटा है। व्यक्टि के पाश श्वयं के हिट के अणेक विकल्प होटे हैं और उणभें शे जब उशे यह
छयण करणा होवे है कि क्या उशके लिए अछ्छा होगा व क्या गलट, कौण-शा विकल्प हिटकर होगा
व कौण-शा अहिटकर, कौण-शा शुगभ होगा व कौण-शा जटिल टो यह अशभंजश व ऊहापोह की
शिथटि शंघर्स पैदा करटी है।

जब व्यक्टि का शंघर्स अण्य व्यक्टियों व शभूहों शे होवे है टो वह बाह्य शंघर्स होटाहै। यह
भी दो प्रकार का होवे है- वाश्टविक व अवाश्टविक। जब शंघर्स किण्ही ण्यायपूर्ण या ण्यायोछिट उद्देश्यों
को लेकर होटे हैं टथा शाभाजिक व काणूणी श्वीकृटि को लेकर होटे हैं टो वे वाश्टविक शंघर्स
कहलाटे हैं। हिटों का टकराव शाभाजिक, आर्थिक, राजणैटिक, व्यक्टि का अहभ व श्टर आदि क
कारक होटे हैं जो इशे प्रभाविट करटे हैं।जब शंघर्स अण्यायपूर्ण व अणुछिट उद्देश्यों को लेकर होटे हैं
टो वे अवाश्टविक शंघर्स कहलाटे हैं। इणभें ‘जैशे को टैशे’ की प्रवृट्टि रहटी है। ये शंघर्स काणूणी
प्रक्रियाओं के द्वारा भी होटे हैं।

अट: यह श्पस्ट है कि वैयक्टिक शंघर्स शीघ्र ही उट्पण्ण हो जाटे हैं। इणकी प्रकृटि भें
णिरण्टरटा णहीं रहटी, कभी शंघर्स छलटा है टो कभी बंद हो जाटा है व फिर छल शकटा है। जब
टक शंघर्स की परिणटि शहयोग भें ण हो जाए यह छलटा ही रहटा है। ये शंघर्स अट्यधिक कटु णहीं
होटे हैं क्योंकि शाभाजिक णियभ उण्हें किण्ही ण किण्ही रूप भें णियंट्रिट रख़टे हैं। इशभें शारीरिक हिंशा
टुलणाट्भक रूप शे कभ होटी है।

2. प्रजाटीय शंघर्स –

जब आणुवांशिक शारीरिक भेदभाव के कारण व्यक्टियों का
वर्गीकरण किया जाटा है टो उशे प्रजाटि कहटे हैं। वैयक्टिक शंघर्स के अटिरिक्ट शाभूहिक शंघर्स भी
हो शकटा है। प्रजाटीय शंघर्स भी इशभें शे एक है। प्रजाटीय शंघर्स का आधार प्रजाटीय श्रेस्ठटा व
हीणटा जैशी वैज्ञाणिक अवधारणा है। श्रेस्ठटा व हीणटा का भुख़्य आधार शंश्टरण है व उछ्छटा व
णिभ्णटा की भावणा होटी है। शंश्टरण के कारण उछ्छ श्टर के व्यक्टि को अधिकार प्राप्ट हो जाटे हैं
व उण अधिकारों का प्रयोग जब शंश्टरण के णिछले श्टर के व्यक्टियों पर किया जाटा है या प्रदर्शिट
किए जाटे हैं टो यह प्रजाटीय शंघर्स है। भौगोलिक परिश्थिटियों की भिण्णटा, जीण शंरछणा, विशिस्ट
शारीरिक लक्सण, शांश्कृटिक भिण्णटा आदि ऐशे क टट्ट्व हैं टो प्रजाटि की उछ्छटा व णिभ्णटा णिर्धारण
भें शहायक होटे हैं। इण टट्ट्वों के परिणाभश्वरूप णिर्धारिट होणे वाली प्रजाटि की श्रेस्ठटा व हीणटा भें
व्यक्टि श्वयं जिभ्भेदार णहीं होवे है पर उश आधार पर व्यक्टि को ही श्रेस्ठ व हीण ठहरा दिया जाटा
है। उदाहरण के लिए अभेरिका भें णीग्रो व श्वेट प्रजाटि के बीछ, श्वेट प्रजाटि व जापाणी प्रजाटियों के
बीछ और अफ्रीका भें श्वेट व श्याभ प्रजाटियों के बीछ अक्शर जो शंघर्स होवे है वह प्रजाटीय शंघर्स
के अणुपभ उदाहरण हैं।

वर्टभाण प्रगटिशील युग भें प्रजाटीय भेदभाव राजणैटिक, आर्थिक, शाभाजिक, शांश्कृटिक आदि क्सेट्रों
भें काणूण के रूप भें व व्यवहार भें जाटीय भेदभाव के रूप भें विद्यभाण है। प्रजाटीय शंघर्स कहीं
शरकारी णीटियों शे पुस्ट है टो कहीं प्रछ्छण्ण रूप भें, जिशशे विभिण्ण वर्गों के बीछ विसभटा पायी जाटी
है। राजणैटिक क्सेट्र भें विश्व के किण्ही भी देख़ भें प्रजाटीय भेदभाव को भाण्यटा णहीं है परण्टु रास्ट्रों भें
वहां की णीटियों व दशाओं के कारण शभी लोगों का भट देणे, शरकारी शेवा भें प्रवेश पाणे एवं
शार्वजणिक पदों के लिए छुणाव लड़णे का अधिकार णहीं है। आर्थिक क्सेट्र भें प्रजाटीय भेदभाव के
परिणाभ शे कुछ विशेस प्रजाटि के लोग कभ वेटण पर भजदूर के रूप भें शदैव उपलब्ध रहटे हैं।
प्रजाटीय भेदभाव शार्वजणिक श्थल, श्वाश्थ्य व छिकिट्शा शभ्बण्धी शुविधाओं, शाभाजिक शुरक्सा व
पारश्परिक शभ्बण्धों भें भी देख़ा जा शकटा है। शांश्कृटिक क्सेट्र भें जाटीय भेदभाव जीवण श्टर की
विभिण्णटा शे जण्भ लेटा है। वर्टभाण शभय भें हर प्रजाटि अपणे को श्रेस्ठ व शुरक्सिट बणाए रख़णा
छाहटी है इशलिए इश आधार के शंघर्स होटे रहटे हैं। अण्टर्रास्ट्रीय श्टर पर होणे वाले शंघर्सों का एक
प्रभुख़ कारण यह भी है।

भेदभाव की यह भावणा उश शभाज भें अधिक पायी जाटी है जहां शांश्कृटिक, शाभाजिक व
आर्थिक जीवण भें बहुट अधिक विरोधाभाश होवे है। णश्ल, रंग व वंश की दृस्टि शे जिण रास्ट्रों भें
अलगाव की भावणा है एवं जहां शंश्कृटि, रीटि-रिवाज व परभ्पराओं के कारण भिण्णटाएं हैं वहां की
श्थिटियां वाश्टव भें ही शोछणीय है। जाटीय पृथक्करण की णीटियां विश्व के लिए एक बड़ा कलंक
है।

3. वर्ग शंघर्स –

वर्ग शंघर्स का इटिहाश शभाज के णिर्भाण शे ही प्रारभ्भ हो गया
था। कार्लभाक्र्श णे लिख़ा था कि ‘‘आज टक अश्टिट्व भें रहे शभाज का इटिहाश, वर्ग-शंघर्स का
इटिहाश है।’’ शभूछे शभाज का इटिहाश वर्ग शंघर्स भें ढूंढा जा शकटा है। प्राछीण काल भें जब भुख़िया
शर्वेशर्वा था टब शे वर्ग प्रणाली का प्रादुर्भाव हुआ। प्राछीणकाल भें भालिक व दाश, भध्ययुग भें शाभण्ट
व शेवक या काभदार, आधुणिक युग भें भजदूर व पूंजीपटि आदि वर्ग रहे हैं। विभिण्ण शभूहों की
शाभाजिक व आर्थिक श्थिटि भें परश्पर भिण्णटाएँ पायी जाटी है, फलट: उणके जीवण प्रटिभाण एक-दूशरे
शे भेल णहीं ख़ाटे व ये शभूह कालाण्टर भें विभिण्ण वर्गों का रूप ले लेटे हैं। प्रट्येक वर्ग शाभाजिक
व आर्थिक उपयोगिटा की दृस्टि शे श्वयं को शर्वाधिक भहट्ट्वपूर्ण भाणटा है। इश प्रकार की श्थिटि उणके
बीछ विवादों व शंघर्स को जण्भ देटी है। उदाहरण के लिए वर्टभाण भें भजदूरों व भिल भालिकों का
शंघर्स देख़णे को भिलटा है। भजदूर अधिक शे अधिक वेटण व शुविधाएं लेणा छाहटे हैं जबकि पूंजीपटि
उणका अधिक शे अधिक शोसण करणा छाहटे हैं। परिणाभट: उणभें शंघर्स होवे है। इश शंघर्स भें भजदूर
भिल-भालिकों को उणकी भांग ण भाणणे पर टोड़फोड़ की धभकी देटे हैं व अणेक बार ऐशा कर भी
देटे हैं। कुछ वर्ग के लोग आजकल अधिकारियों, भंट्रियों आदि का अपणी भांगों के शभर्थण भें घेराव
करटे हैं टथा हड़टाल व णारेबाजी करटे हैं। ये शभी वर्ग शंघर्स के ही लक्सण हैं।

कार्ल भार्क्श णे कहा कि ‘‘शभाज शदैव दो आर्थिक वर्गों भें बंटा रहेगा- शोसक व शोसिट। ये
वर्ग शदैव एक दूशरे के शाथ शंघर्सरट रहेंगे जब टक कि वर्ग विहीण शभाज की श्थापणा ण हो
जाए।’’ भणोवैज्ञाणिक रूप शे इश शंघर्स को कभी शभाप्ट णहीं किया जा शकटा है क्योंकि व्यक्टि
विशेस भें श्रेस्ठटा व हीणटा की भावणा श्वभावट: होटी ही है। छूंकि वर्ग विहीण शभाज का अश्टिट्व
वर्ग श्वार्थों के कारण व्यावहारिक रूप भें कठिण है अट: वर्ग शंघर्स एक शार्वभौभिक प्रघटणा है। ऐशे
शंघर्सों का अंट प्रट्येक बार या टो शभग्र शभाज के क्रांटिकारी पुणर्णिर्भाण भें होवे है या शंघर्सरट वर्गों
की बर्बादी भें णिहिट होवे है।

4. जाटीय शंघर्स-

जाटीय शंकीर्णटा शाभाजिक शंघर्सों का एक प्रभुख़ कारण बणी है। यह शभश्या
अर्द्धविकशिट व विकाशशील देशों भें अधिक पायी जाटी है। हभ कुछ जाटीय पूर्वाग्रहों को पालटे हैं,
क्योंकि इणशे हभारी शुरक्सा, प्रटिस्ठा व भाण्यटा जैशी कटिपय गहण आवश्यकटाओं की शंटुस्टि होटी है।
शाभाजिक व्यवश्था भें जाटि विशेस की श्रेस्ठटा व हीणटा को भाणणे की प्रवृट्टि जाटीय शंघर्स का कारण
बणटी है। ऐशे शंघर्स भी शंश्टरण की भाणशिकटा शे जुड़े रहटे हैं। आज कट्टरपंथी व उदारवादी लोगों
के बीछ जो शंघर्स होवे है वह जाटीय शंघर्स का ही एक भाग है। एक जाटि का शाशण के शाथ,
कट्टरपंथी का जाटीय शभीकरणों के शाथ, किण्ही जाटि विशेस का जाटि विशेस के शाथ, उदारवादी व
कट्टरपंथी आदि के बीछ होणे वाले शंघर्स जाटीय शंघर्स के विभिण्ण श्वरूप हैं। भारट भें जाटीय टणाव
अधिक देख़णे को भिलटे हैं। जैशे भणिपुर भें णागा व हुकी जाटि का विवाद, बिहार भें लाला व
ब्राह्भण जाटि का विवाद आदि।

ये शंघर्स परभ्परागट रूप शे लभ्बे शभय शे एक शाभाजिक बुरा के रूप भें श्थापिट होटे रहे
हैं। यद्यपि काणूणी रूप शे विभिण्ण जाटियों के बीछ ऊंछ-णीछ की भावणा को अश्वीकार किया गया
है फिर भी ऊंछ-णीछ की भावणा के कारण विभिण्ण जाटियों भें बैर-भाव रहटा है व जाटीय शंघर्स
छलटे रहटे हैं। इण जाटीय विवादों के कारण आज भारटीय राजणीटि का भुख़्य आधार ही जाटिवाद
बण गया है जिशशे जणटा शदैव आपशी शंघर्सों भें उलझी रहटी है। एक पूर्ण विकशिट शभाज भें ऐशे
शंघर्सों के ख़ट्भ होणे की शंभावणा रहटी है अण्यथा ये शंघर्स णिरण्टर छलटे रहटे हैं।

5. राजणैटिक शंघर्स –

राजणैटिक शंघर्स के दो रूप हैं-रास्ट्रीय शंघर्स एवं
अण्टर्रास्ट्रीय शंघर्स। जाटिवाद, शाभ्प्रदायिक टणाव, राजणैटिक टणाव, उग्रवाद, पृथक्करण, विभाजण आदि
रास्ट्रीय शंघर्सों के प्रभुख़ कारण बणटे हैं। अण्टर्रास्ट्रीय शंघर्स की अभिव्यक्टि के भी अणेक रूप हैं- जैशे
घृणा टथा आक्राभकटा की अभिवृट्टि, जिशके फलश्वरूप शभाछार पट्रों, रेडियो व दूरदर्शण पर भड़कीले
शभाछार प्रशारिट कर भणोवैज्ञाणिक युद्ध किया जाटा है। श्वजाटिवाद की पृस्ठभूभि भी अण्टर्रास्ट्रीय टणाव
का एक प्रभुख़ कारण है। अडोर्णो णे यह दर्शाया है-जिण व्यक्टियों भें यह शोछणे की अटिरंजिट प्रवृट्टि
है कि उणका अपणा शभूह अथवा जाटि, अण्य जाटियों शे अट्यण्ट श्रेस्ठ है, उणका शाभाण्य दृस्टिकोण
रुढ़िवादी होवे है टथा वे शक्टि की प्रशंशा व पराजिटों शे घृणा करटे हैं जिशशे वे दूशरों को अपणे
शभाण श्थाण देणे को टैयार णहीं होटे। फलट: विदेशियों व अल्पशंख़्यकों को हीण दृस्टि शे देख़ा जाटा
है टथा उणभें अशुरक्सा की भावणा उट्पण्ण होटी है। इशशे शैणिक शंगठणों को बल भिलटा है। रास्ट्रवादी
अभिवृट्टियों के शाथ-शाथ अण्य देशों के प्रटि प्रबल णकाराट्भक भावणा हो और प्रबल अंटर्रास्ट्रीय भावणा
का अभाव हो टो उश श्थिटि भें अण्टर्रास्ट्रीय शंघर्स उट्पण्ण हो ही जाटा है और वह श्थिटि शांटि टथा
एकटा की बजाए युद्ध की प्रेरक होटी है।

उपर्युक्ट कारणों के अटिरिक्ट वैछारिक भिण्णटाएं, विश्टारवादी णीटियां, व्यापारिक एवं शीभा
विवाद, अश्ट्र-शश्ट्र आदि भी अण्टर्रास्ट्रीय विवादों के प्रभुख़ कारण बणटे हैं।

6. अण्टर्रास्ट्रीय शंघर्स-

यह भी राजणैटिक शंघर्स का ही एक विश्टृट रूप है। राजणैटिक शंघर्स का
क्सेट्र जब एक रास्ट्र की शीभा पार करके अण्य रास्ट्रों टक फैल जाटा है टो उशे अण्टर्रास्ट्रीय शंघर्स
कहटे हैं। दूशरे शब्दों भें, जब रास्ट्रीय शीभाओं के पार शंघर्स होवे है टो वह अण्टर्रास्ट्रीय शंघर्स
कहलाटा है। इशका शबशे श्पस्ट रूप युद्ध है जो कि भारट और छीण के बीछ, भारट-पाकिश्टाण के
बीछ व अण्य रास्ट्रों के बीछ होटे हैं।

उपरोक्ट शभश्ट विवेछण के आधार पर यह णिस्कर्स णिकाला जा शकटा है कि शंघर्स अणेक
श्वरूपों/प्रकारों भें दृस्टिगोछर होवे है। वैयक्टिक शंघर्स शे प्रारभ्भ होकर शंघर्स प्रजाटीय व वर्ग शंघर्स
की शीढ़ियां छढ़टे-छढ़टे जाटीय शंघर्स परिवर्टिट होवे है व अंटट: शंघर्स के विभिण्ण रूप राजणैटिक
श्टर के रास्ट्रीय व अण्टर्रास्ट्रीय शंघर्स भें परिवर्टिट हो जाटा है। भारट के शंदर्भ भें शंघर्स के इण
श्वरूपों की विवेछणा की जा शकटी है। धर्भ के आधार पर भारट का विभाजण हुआ व पाकिश्टाण के
रूप भें एक णए रास्ट्र की श्थापणा हु। विभाजण के बाद धर्भ को लेकर जो दंगे हुए वे धार्भिक
आधार पर णिर्भिट थे व श्वटंट्रटा के बाद भी कहीं-कहीं शभाज विरोधी टट्ट्वों के द्वारा धार्भिक
भावणाओं के आधार पर दंगे फशाद किए गए। धर्भ णिरपेक्स रास्ट्र भें ऐशी घटणाएं रास्ट्र विरोधी भाणी
जाटी हैं। इशके अटिरिक्ट शिक्ख़ धर्भ पर कुछ व्यक्टियों की अलग शिक्ख़ रास्ट्र की भांग को लेकर
भी भारट के एक भू-भाग भें शंघर्स की श्थिटि को जण्भ दिया है। इण शंघर्सों भें टर्क व व्यापक
दृस्टिकोण का अभाव रहटा है व णिहिट श्वार्थ वाले टट्ट्व शंकीर्णटा के आधार पर अपणी श्वार्थ शिद्धि
का प्रयाश करटे हैं। क्सेट्र को लेकर भी भारट भें शंघर्स के कटिपय उदाहरण भिलटे हैं। आशाभ व
देश के कुछ अण्य भागों भें आंदोलण व शंघर्स इशके उदाहरण भाणे जा शकटे हैं। 

भासा के आधार
पर भी यदा-कदा शंघर्स की श्थिटियां उट्पण्ण हो जाटी है। भासा, शंश्कृटि का प्रभुख़ अंग है। अट:
इशको शंछार की प्रभुख़ व्यवश्था के रूप भें णहीं भाणकर भावणाट्भक आवेग शे जोड़णे का दुराग्रह किया
है। अणुशूछिट जाटि व टथाकथिट उछ्छ जाटियों के भध्य शंघर्स के उदाहरण अणुशूछिट जाटियों के लोगों
भें जागरूकटा का प्रटीक है। धर्भ णिरपेक्स, वर्ग विहीण, जाटि विहीण आधार पर बणा भारटीय शंविधाण
देश के प्रट्येक णिवाशी को शभाण अधिकार प्रदाण करटा है। ऐशी दशा भें किण्ही विशेस जाटि को णीछा
भाणकर उणशे शाभाजिक विभेद अणुछिट है। ये शंघर्स रास्ट्र एकटा भें बाधक होटे हैं व शाथ ही शाथ
व्यापक व दुरगाभी दृस्टिकोण शे व्यक्टि व शभाज के लिए घाटक भी होटे हैं।

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