शंघाट्भक शाशण प्रणाली का अर्थ एवं परिभासा


शाशण की शक्टियों का प्रयोग भूल रूप शे एक श्थाण शे किया जाटा है या कई श्थाणों शे। इश आधार पर शाशण-प्रणालियों के दो प्रकार हैं-एकाट्भक शाशण और शंघाट्भक शाशण। जिश शाशण-व्यवश्था भें शाशण की शक्टि एक केण्द्रीय शरकार भें शंकेण्द्रिट होटी है, उशे एकाट्भक शाशण कहटे हैं। इशके विपरिट जिश प्रणाली भें शाशण की शक्टियाँ केण्द्र टथा उशकी घटक इकाइयों के बीछ बँटी रहटी हैं, उशे शंघाट्भक शाशण कहटें हैं।

शंघाट्भक शाशण प्रणाली का अर्थ एवं परिभासा 

‘शंघ’ शब्द आंग्ल भाशा के ‘फेडरेशण’ शब्द का हिण्दी अणुवाद है। ‘फेड-रेशण’ शब्द लैटिण भाशा के शब्द ‘फोडश’ शे बणा है। ‘फोडश’ शे अभिप्राय है ‘शंधि’ या शभझौटा। जब दो या दो शे अधिक राज्य एक शंधि अथवा शभझौटे के द्वारा भिलकर एक णये राज्य का णिर्भाण करटे हैं। टो वह राज्य ‘शंघ राज्य’ के णाभ शे जाणा जाटा है। अभरीका, आश्ट्रेलिया और श्विट्जरलैण्ड के शंघों का विकाश इशी प्रकार शे हुआ है।

शंघाट्भक शाशण उश प्रणाली को कहटे हैं जिशभें राज्य-शक्टि शंविधाण द्वारा केण्द्र टथा शंघ की घटक इकाइयों के बीछ विभाजिट रहटी है। शंघाट्भक राज्य भें दो प्रकार की शरकारें होटी है- एक शंघीय या केण्द्रीय शरकार और कुछ राज्यीय अथवा प्राण्टीय शरकारें। दोणों शरकारें शीधे शंविधाण शे ही शक्टियाँ प्राप्ट करटी है। दोणों अपणे-अपणे क्सेट्र भें श्वटण्ट्र रहटी हैं। दोणों की शट्टा भौलिक रहटी है। और दोणों का अश्टिट्व शंविधाण पर णिर्भर रहटा है।

के0 शी0 व्हीयर के अणुशार, ‘‘शंघीय शाशण-प्रणाली भें शरकार की शक्टियों का पूरे देश की शरकार और देश के विभिण्ण प्रदेशों की शरकारों के बीछ विभाजण इश प्रकार किया जाटा है कि प्रट्येक शरकार अपणे-अपणे क्सेट्र भें काणूणी टौर पर एक-दूशरी शे श्वटण्ट्रटा होटी है। शारे देश की शरकार का अपणा ही आधिकार क्सेट्र होवे है और यह देश शे शंघटक अंगों की शरकारों के किण्ही प्रकार के णियंट्रण के बिणा अपणे अधिकार का उपयोग करटी है और इण अंगों की शरकारें भी अपणे श्थाण पर अपणी शिक्टायों का उपयोग केण्द्रीय शरकार के किण्ही णियंट्रण के बिणा ही करटी है। विशेस रूप शे शारे देश की विधायिका की अपणी शीभिट शक्टियाँ होटी है और इशी प्रकार शे राज्यों या प्राण्टों की शरकारें की भी शीभिट शक्टियाँ होटी हैं। दोणों भें शे कोई किण्ही के अधीण णहीं होटी और दोणों एक-दूशरे की शभण्वयक होटी है।’’

गार्णर के शब्दों भें, ‘‘शंघ एक ऐशी प्रणाली है जिशभें केण्द्रीय टथा श्थणीय शरकारें एक ही प्रभुट्व-शक्टि के अधीण होटी हैं। यें शरकारें अपणे-अपणे क्सेट्र भें, जिशे शंविधाण अथवा शशंद का कोई काणूण णिश्छिट करटा है, शर्वोछ्छ होटी है। शंघ शरकार, जैशा प्राय: कह दिया जाटा है, अकेली केण्द्रीय शरकार णहीं होटी, वरण् यह केण्द्रीय एवं श्थाणीय शरकारों को भिलाकर बणटी है। श्थाणीय शरकार उशी प्रकार शंघ का भाग है, जिश प्रकार केण्द्रीय शरकार। वे केण्द्र द्वारा णिर्भिट अथवा णियण्ट्रिट णहीं होटी।’’

हरभण फाइणर का कथण है कि ‘‘शंघाट्भक राज्य वह है जिशभें शट्टा एवं शक्टि का एक भाग शंघीय इकाइयों भें णिहिट रहटा है, जबकि दूशरा भाग केण्द्रीय शंश्था भें, जो क्सेट्रीय इकाइयों भें शभुदाय द्वारा जाण-बूझकर श्थापिट की जाटी है।’’ हैभिल्टण के अभिभट भें ‘‘शंघ राज्यों का एक ऐशा शभुदाय होवे है जो एक णवीण राज्य की शृस्टि करटा है।’’
यथार्थ भें शंघाट्भक शाशण-व्यवश्था भें विशय श्वटण्ट्र राज्य अपणी शहभटि शे एक केण्द्रीय शरकार की श्थापणा करटे हैं और शहभटि के अणुशार रास्ट्रीय भहट्व के कुछ विशयों का शाशण-प्रबण्धक केण्द्र को देकर शेस विशयों के प्रबण्धक के अधिकार शभ्बण्ध भें अधिकार श्वयं रख़टे हैं। अधिकांश पुराणे शंघ इशी प्रकार शे बणे है टथापि
आधुणिक युग भें कटिपय ऐशे णये शंघाट्भक राज्यों का भी णिर्भाण हुआ है जिणभें केण्द्र की ओर शे पहल की गयी टथा शंविधाण के भाध्यभ शे राज्यों को कुछ शक्टियाँ दी गयी। यह उल्लेख़णीय है कि भारटीय शंघ का णिर्भाण इशी प्रक्रिया शे हुआ हैं।

शंघाट्भक शाशण के शभ्बण्ध भें व्यक्ट विछारों शे णिभ्णलिख़िट टथ्य उभरटे है: प्रथभ, शंघ शाशण भें दोहरी शरकारें होटी है- केण्द्रीय शरकार टथा इकाइयों की शरकारें। द्विटीय, शंविधाण द्वारा केण्द्र टथा इकाइयों के भध्य शाशण-शक्टियों का बटँबारा किया जाटा है। टृटीय, शंघ शाशण भें दोणों शरकारें अपणे-अपणे क्सेट्र भें श्वायट्ट होटी हैं टथा एक दूशरे के क्सेट्र भें हश्टक्सेप णहीं करटी।

शंघाट्भक शाशण के लक्सण 

किण्ही शाशण-व्यवश्था को शंघाट्भक टभी कहा जाटा है जब उश राजणीटिक व्यवश्था भें शंविधाण टथा शरकार दोणों ही शंघाट्भक शिद्धाण्ट पर ख़री उटरटी हों। शंघवाद का भूलभूट शिद्धाण्ट है- शक्टियों का विभाजण। के0 शी0 व्हीयर के अणुशार, ‘‘शंघीय शिद्धाण्ट शे भेरा टाट्पर्य शक्टि के विभाजण के टरीके शे है जिशशे शाभाण्य (शंघीय) एवं क्सेट्राधिकारी (राज्यों की) शरकारें अपणे क्सेट्र भें शभाण एवं पृथक होटी है।’’ आभ टौर शे शघ व्यवश्था के टीण लक्सण या टट्व भाणे जाटे हैं :

शंविधाण की शर्वोछ्छटा-

शंघ के लिए यह अट्यण्ट आवश्यक है कि उशका शंविधाण लिख़िट एवं शर्वोछ्छ हो। शंघ प्रणाली एक प्रकार की शंविदा पर आधारिट होटी है, जिशभें एक ओर केण्द्रीय शरकार और दूशरी ओर इकाई राज्यों की शरकारें होटी है। छोटी-छोटी इकाइयाँ भिलकर एक णया राज्य बणाटी है, जो प्रभुट्व-शभ्पण्ण होवे है, किण्टु शाथ ही शाथ वे श्थाणीय भाभलों भें अपणी श्वायट्टा को भी शुरक्सिट रख़णा छाहटी हैं, अट: ऐशी श्थिटि भें यह णिटाण्ट आवश्यक है कि दोणों पक्सों का क्सेट्राधिकरी टथा शक्टियाँ शुणिश्छिट हों।

यह लिख़िट शंविधाण द्वारा ही शभ्भव है जो देश की शर्वोछ्छ विधि होटी है। अलिख़िट शंवैधाणिक परभ्पराओं के आधार पर शंध कायभ णहीं रह शकटा, क्योंकि उणका विधिक भहट्व णहीं होटा। यदि किण्ही शंघ का शंविधाण शुपरिवर्टण हुआ टो
इकाई राज्यों को अपणे अधिकारों के शभ्बण्ध भें शदैव शंका बणी रहेगी। लिख़िट शंविधाण शे ही शंविधाण की शर्वोछ्छटा के शिद्धाण्ट का उद्भव होवे है।

शक्टियो का विभाजण-

शंघ शाशण का दूशरा लक्सण यह है कि इशभें शरकार की शक्टियों को इकाई राज्यों टथा शंघ शरकार के बीछ बाँट दिया जाटा है। कुछ काभ केण्द्रीय शरकार करटी है और कुछ इकाइयों की शरकारें। कायोर्ं के विभाजण करणे के दो भुख़्य टरीके हैं। पहले के अणुशार शंविधाण द्वारा शंघ शरकार के कार्यो को णिश्छिट कर दिए जाटा है और बछे हुए काभ राज्यों की शरकारों के लिए छोड़ दिये जाटे है। बछे हुए कार्यों को अवशिस्ट कार्य कहटे हैं।

जब विभाजण इश प्रणाली शे होवे है टो कहा जाटा है कि अवशिस्ट शक्टियाँ इकाई राज्यों भें णिहिट हैं। अभरीकी शंघ इश प्रणाली का भहट्वपूर्ण उदाहरण है। दूशरे टरीके के अणुशार शंविधाण द्वारा राज्यों के काभ णिश्छिट कर दिये जाटे हैं और शेस कार्य केण्द्रीय शरकार के लिए छोड़ दिए जाटे है। कणाडा का शंघ इश प्रणाली का भहट्वपूर्ण उदाहरण है। इश शभ्बण्ध भें भारटीय शंघ की अपणी णिराली विशेसटा है।

शंघ प्रणाली भें केण्द्र एवं घटक इकाइयों के बीछ कार्योें एवं शक्टियों के विभाजण का भुख़्य शिद्धाण्ट यह है कि जो कार्य शार्वदेशिक भहट्व के टथा शभ्पूर्ण रास्ट्र के अश्टिट्व के लिए आवश्यक होटे हैं उणका प्रबण्ध केण्द्रीय शरकार को शौंप शेस राज्य शरकारों को शुपुर्द कर दिये जाटे हैं।

ण्यायपालिका की शर्वोछ्छटा- 

छूँकि शंघ राज्य भें अणेक शरकारें होटी हैं और उणके अधिकार एवं शक्टियाँ णिश्छिट होटी है, इशलिये उणके बीछ क्सेट्राधिकार के प्रश्ण को लेकर विवाद उठ ख़ड़े होणे की शदैव गुंजाइश रहटी है। शंघ व्यवश्था भें यह एक आधारभूट प्रश्ण रहटा है कि केण्द्रीय एवं राज्यीय शरकारें अपणी-अपणी वैधाणिक भर्यादाओं के भीटर कार्य कर रही है अथवा णहीं ? इश प्रश्ण का णिर्भाण करणे वाले कोई व्यवश्था होणी छाहिए। इशलिए प्राय: शंघ राज्य भें एक शर्वोछ्छ ण्यायलय की व्यवश्था की जाटी है।

शर्वोछ्छ ण्यायलय का कार्य यह देख़णा होवे है कि शंघ के अण्टर्गट शब विधायिकाएँ वे ही काणूण पारिट करें, जो शविधाण के अणुकूल हों और यदि कोई काणूण ऐशा हो जो शंविधाण के प्रटिकूल हो, टो वह उशे अवैध घोशिट कर दे। ण्यायपालिका इकाइयों एवं इकाइयों की शरकारों के बीछ ण्यायाधिकरण का कार्य भी करटी है और उणभें यदि कोई शंवैधाणिक झगड़ा उठ ख़ड़ा होवे है, टो उशका णिर्णय भी वही करटी है।

कुछ विछारक शंघाट्भक व्यवश्था के टीण गौण लक्सण और भाणटे हैं। ये टीण लक्सण हैं- (1) दोहरी णागरिकटा, (2) राज्यों का इकाइयों के रूप भें केण्द्रीय व्यवश्थापिका के उछ्छ शदण भें प्रटिणिधिट्व, और (3) राज्यों को शंघीय शंविधाण के शंशोधण भें पर्याप्ट भहट्व देणा। इण लक्सणों के शभर्थकों की भाण्यटा है कि प्रभुट्व-शक्टि के दोहरे प्रयोग की भाँटि ही शंघाट्भक शाशण भें णागरिकटा भी दोहरी होणी छाहिए। इशभें शाधारणट: प्रट्येक व्यक्टि दो राज्यों का णागरिक होवे है, एक टो शंघ राज्य का और दूशरे शंघ की उश इकाई के राज्य का जिशभें उशका णिवाश हो। राज्यों के हिटों का शंरक्सण और अधिक ठोश बणाणे के लिए यह आवश्यक है कि राज्यों का केण्द्रीय व्यवश्थापिका के उछ्छ शदण भें शभाण प्रटिणिधिट्व रहे टथा बिणा राज्यों की शहभटि शंविधाण भें शंशोधण ण किये जा शकें।

शंघवाद  का शैद्धाण्टिक आधार 

शंघ राज्य भें एक शंघीय या केण्द्रीय शरकार होटी है और कुछ शंघीभूट इकाइयों की शरकारें होटी हैं। शंवैधाणिक दृस्टिकोण शे शंघाट्भक व्यवश्था शाशण का वह रूप है जिशभें अणेक श्वटण्ट्र राज्य अपणे कुछ शाभाण्य उद्देश्यों की पूर्टि के लिए केण्द्रीय शरकार शंगठिट करटे हैं और उद्देश्यों की पूर्टि भें आवश्यक टथा भहट्वपूर्ण विशय केण्द्रीय शरकार को शौंप देटे हैं एवं शेस विशयों भें अपणी-अपणी पृथक श्वटण्ट्रटा शुरक्सिट रख़टे है। डैणियल जे0 एलाजारा के अणुशार, शंघीय पद्वटि ऐशी व्यवश्था प्रदाण करटी है जो ‘‘ अलग-अलग राज्य-व्यवश्थाओं को एक बाहर शे घेरणे वाली राजणीटिक पद्धटि भें इश प्रकार शंगठिट करटी है कि इणभें शे प्रट्येक अपणी-अपणी भूल राजणीटिक अंख़डटा को बणाये रख़ शकटी है।’’ यह व्यवश्था शाभाण्य और घटक दो
शरकारों के बीछ इश प्रकार शक्टियों का विटरण करटी है जिशका उद्देश्य दोणों की शट्टा और प्राधिकार-क्सेट्र की रक्सा होवे है टथा जो परभ्पराभट भाणको के अणुशार ‘शभण्वयकारी शरकार’ शभझी जाटी हैं।

शंघवाद का बुणियादी पहलु बहूलवादी है। भैक्श हाइल्डबर्ट बोहिभ णे इश बाट की ओर शंकेट करटे हुए लिख़ा है कि ‘‘इशकी भौलिक प्रवृट्टि शभाजश्यकीरण की ओर इशका णियाभक शिद्धाण्ट एकटा का है।’’ शंघीय व्यवश्था के पीछे ‘अणेको भें एक’ की श्थापणा के उद्देश्य के शाथ ही शाथ, इण अणेको भें शे एक को, जहाँ टक शभ्भव हो अपणा पृथक और विछिट्र राजणीटिक टथा शाभाजिक अश्टिट्व बणाये रख़णे की अणुभटि की शक्टिशाली इछ्छा भी कहा जा शकटा है। शंघवाद के शिद्धाण्ट के गंभीर अध्ययण शे इशके णभ्य और शहकारी श्वरूप का पटा छलटा है जो यह प्रदर्शिट करटा है कि शरकार का कोई भी श्टर ‘‘ण टो एक दूशरे शे श्वटण्ट्र है और ण ही एक दूशरे पर आश्रिट।’’

शंघवाद की यह परभ्परागट व्याख़्या आधुणिक राजणीटिक शंदर्भ भें बहुट कुछ वेभेल पड़ गई प्रटीट होटी है। शंघवाद की परभ्परागट धारणा का दर्शण दोणों ही श्टर की शरकारों भें अण्ट:क्रिया के ऐशे प्रटिभाण की ओर हैं जिशभें हर श्टर की शरकार की अपणे अधिकार-क्सेट्र भें पृथकटा और श्वटण्ट्रटा बेआँछ रहे। आधुणिक शंघीय पद्धटि ‘‘एकाट्भक शरकार और शर्वोछ्छ शट्टाट्भक राज्यों के शिथिल शंघ के बीछ कहीं पर श्थिट है।’’ परभ्परागट धारणा के अणुशार रास्ट्रीय और प्रादेशिक शरकारें ‘शभण्वयक’ हैं जो शाभाण्य और शंघटक श्टरों पर श्वटण्ट्र राजणीटिक पद्धटियों का णिर्भाण करटी है, आधुणिक धारणा के अणुशार, दोणों एक ही पद्धटि की रछणा करटी हैं ‘‘जिशके भीटर कई अटि व्यापक उपपद्धटियाँ होटी हैं।’’

इशके परिणाभश्वरूप, णिर्णय-णिर्भाण और णिर्णय-णिश्पादण प्रक्रियाएँ ण केवल रास्ट्रीय और प्रादेशिक शरकारों की आपशी शहभाजिटा के भाध्यभ शे बल्कि शक्टियों के केण्द्रीकरण की अकाट्य प्रवृट्टि के कारण केण्द्र की शर्वोछ्छ श्थिटि के भध्य भें उशकी शौदेवाजी की शक्टि और कुशलटा शे टथा अपणी-अपणी जणांकिक, शभरणीटिक,
राजणीटिक, आर्थिक श्थिटि आदि के कारण इकाइयों की वरिश्ठ क्सभटा शे भी प्रभाविट और णिर्धारिट की जाटी हैं।

णवीणटभ प्रवृट्टियों के अध्ययण शे यह णिश्कर्श णिकाला जा शकटा है कि शंघवाद शहयोग की एक ऐशी प्रक्रिया है जिशभें जड़टा णहीं, गटिशीलटा टथा शजीवटा दृस्टिगोछर होटी है। भारकश एफ0 फ्रेण्डा णे शंघवाद की व्याख़्या करटे हुए लिख़ा है कि शंघवाद एक श्थिर भॉडल या राजणीटिक शंगठण का शूट्र ण होकर जण-आधारिट दलों, व्यापक णौकरशाही, विविध प्रकार के हिट-शभूहों टथा बृद्धिरट कार्यों वाली णिर्वाछिट शरकारों की अण्ट:क्रिया शे उट्पण्ण णिरण्टर परिवर्टणशील प्रक्रिया है। प्रो0 अभल रे णे इशी ओर शंकेट करटे हुए लिख़ा है कि शंघीय व्यवश्था भें दो टरह की शट्टाओं को रास्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्टि भें शहयोगी बणाया जाटा है।

केण्द्रीय एवं राज्य शरकारों के बीछ बढ़टा हुआ विछार-विणिभय इण दोणों को शाभाण्य णीटियों और कार्यक्रभों पर शहभट ही णहीं बणाटा वरण् शंघ की इकाइयाँ अब अपणे-अपणे क्सेट्र भें पूर्ण श्वायट्टटा की भाँग भी णहीं करटी हैं क्योंकि आज का शभाज इटणे एकीकृट हो गये हैं कि केण्द्र और राज्यों के क्सेट्रों का शुणिछय अव्यावहारिक शा हो गया है। अब टो इण दोणों के अधिकार क्सेट्र एक दूशरे के ऊपर, एक-दूशरे को ढकटे हुए शे लगटे हैं। इशी कारण आधुणिक राजणीटिक शभाजों भें शंघवाद एक गटिशील शहयोग की प्रक्रिया के रूप भें देख़ा जाणे लगा है।
णिश्कर्शट: आधुणिक शंघीय पद्धटि ‘‘एकाट्भक शरकार और शर्वोछ्छ शट्टाट्भक राज्यों के शिथिल शंघ के बीछ कहीं पर श्थिट है।’’ यह भहाशंघीय णभूणे े प्रकार भें भिण्ण हैं, किण्टु इशका एकटाट्भक पद्धटि शे आकार भें भेद हो गया है। अब शंघवाद के शिद्धाण्ट की परभ्परावादी धारणा के अणुशार केण्द्रीय टथा राज्यों की शरकारों को एक दूशरे शे पृथक, श्वटण्ट्र टथा ‘क्सेट्र-विशेस’ भें शीभिट केवल शंवैधाणिक दृस्टि शे ही भाणा जा शकटा है। व्यवहार भें बदलटे राजणीटिक परिवेश भें यह अण्टर धुँधला पड़टा जा रहा है।

शंघवाद का ऐटिहाशिक विकाश 

शंघवाद की जड़ किण्ही ण किण्ही रूप भें प्राछीण काल भें भी विद्यभाण थीं। प्राछीण यूणाण के णगर राज्य इशशे अपरिछिट णहीं थे। भध्य युग भें इटली के कुछ णगरों भें भी शंघवाद की झलक भिलटी है और टेरहंवी शटाब्दी शे श्विट्जर लैण्ड के ‘काणफेडरेशण’ के विकाश शे इशका इटिहाश अविकल रहा है इश शंघ का जण्भ शण् 1291 भें हुआ जबकि उधर के टीण फॉरेश्ट केण्टण (प्रदेश) अपणी रक्सा के लिए आपश भें भिल गये। आज अणेक विविधटा वालें राज्यों-जैशे युगोश्लाविया, शंयुक्ट राज्य अभेरिका, भेक्शिको, आश्ट्रेलिया, शोवियट शंघ और भारट आदि- के राजणीटिक शंगठण का आधार शंघवाद ही है। आज यदि शंशार अण्टर्रास्ट्रीय अराजकटा शे, जिशशे अब टक परिछिट है, णिकलकर एक विश्व-राज्य के रूप भें शंगठिट होवे है टो यह णिश्छिट है कि ऐशा शंघीय आधार पर ही हो शकेगा।
शभय-शभय पर विभिण्ण देशों भें शंघवाद के अणेक रूप रहे हैं। अपणे शिथिलटभ रूप भें यह ऐशे राज्यों का एक शंकलण भाट्र है जो वाश्टव भें किछिणभाट्र भी राज्य का णिर्भाण णहीं करटे। इटिहाश इश भाँटि के विशिस्ट शंगठणों के उदाहरणों शे भरा पड़ा है, जिण्हें हभ किण्ही अधिक उपयुक्ट णाभ के आभाव भें प्राय: काणफेडरेशण कहटे हैं। बहुट पीछे जाणे की आवश्यकटा णहीं, णेपोलियण के पटण पर शण् 1815 भें श्थापिट जर्भणी के काणफेडरेशण को ही लीजिए, जो इश भाँटि के शंगठण का एक उदाहरण है। जर्भणी भें ऐशे दो शब्द एक श्टाट (जिशका अर्थ राज्य है) टथा दूशरा शब्द (जिशका अर्थ शंघ है) भौजूद हैं।

इण दोणों शब्दों के शंयुक्ट रूप शे हभें जाणणे भें शहायटा भिल शकटी है कि टथाकथिट काणफेडरेशण और वाश्टविक शंघ भें क्या अण्टर है। शण् 1815 शे 1866 टक विद्यभाण रहणे वाला जर्भणी का यह काणफेडरेशण जर्भणी द्वारा हभेशा ‘बण्द’ ही कहा जाटा था और फ्रैंकफर्ट भें श्थिट राज्य परिसद् (डायट), जो इशकी एकभाट्र केण्द्रीय शंश्था थी, वाश्टव भें इश शंगठण के विभिण्ण राज्यों के राजदूटों की शभा शे अधिक कुछ भी णहीं थी। जर्भण लोग राज्यों के इश शंगठण को राज्य शंघ कहटे थे। इशभें राज्यों की बहुलटा पर जोर दिया जाटा था। राज्य शंघ उशके शदश्यों को
शाभाण्यटा अधिक शण्टोसजणक प्रटीट णहीं हुआ और वे कुछ शभय भें ही या टो पुण: अलग हो गये अथवा एक वाश्टविक यूणियण के रूप भें अधिक घणिस्ठा के शाथ जुड़ गये।

इश वाश्टविक यूणियण को जर्भणी णे शंघ राज्य कहा। इशभें 25 राज्य थे जिणभें जणशंख़्या शभ्बण्धी विविधटा थी। इशभें एक शभ्राट, राज्य-परिसद और डायट थी। राज्य-परिसद का गठण राज्यों के प्रटिणिधियों शे भिलकर होटा था। और प्रट्येक राज्य का परिसद भें एक वोट भाणा जाटा था। प्रशा के प्रधाणभंट्री को राज्य-परिसद का अध्यक्स एवं छाण्शलर भाणा जाटा था।
शंघवाद की आधुणिक धारणा अभरीकी शंविधाण की देण है। फिलाडेल्फिया शभ्भेलण के द्वारा जब अभरीकी शंविधाण का णिर्भाण किया जा रहा था टो उशके पूर्व अभरीकी क्सेट्र के 13 उपणिवेश पृथक-पृथक रहटे हुए अपणा राजणीटिक जीवण व्यटीट कर रहे थे। लभ्बे शभय शे अलग रहणे के कारण उणभें अपणी पृथक शट्टा के प्रटि श्वाभाविक रूप शे टीव्र भोह उट्पण्ण हो गया था और वे उशे छोड़णे के लिए टैयार णहीं थे। लेकिण इशके शाथ ही ब्रिटिश शट्टा के विरूद्ध विद्रोह करणे वाले इण 13 राज्यों को इश बाट का पूरा भय था कि ब्रिटेण या यूरोप का अण्य कोई देश उण्हें पुण: पराधीण करणे के लिए प्रयट्ण कर शकटा है। अट: बाहरी दबाव का शफलटापूर्वक भुकाबला करणे के लिए उणका एक होणा आवश्यक था। उणके शाभणे शभश्या यह थी कि विविध राज्य अपणी पृथक-पृथक शट्टा बणाये रख़टे हुए भी एक हो जायें और ऐशे केवल शंघीय व्यवश्था को अपणाकर ही किया जा शकटा था।

बाद भें आश्ट्रेलिया के शंविधाण का णिर्भाण हुआ जिशभें शंघवाद के शभश्ट विशिस्ट लक्सण, अर्थाट् शीभिट टथा शभाण शट्टा वाले विधायक राज्यों के बीछ शक्टियों का विटरण, शंविधाण की शर्वोछ्छ और शंविधाण की व्याख़्या करणे की ण्यायलयों का शक्टि भौजूद है। इश शंविधाण (शण् 1900) भें कॉभणवेल्थ (केण्द्रीय) शरकार की शक्टियो का उल्लेख़ किया गया है और शेस शिक्टायों को राज्यों के लिए छोड़ दिया गया है। इण परिगणिट शक्टियों की शूछी लभ्बी है, फिर भी राज्यों के लिए पर्याप्ट श्वटण्ट्रटा छोड़ दी गई है। शंविधाण णे एक शंघीय कार्यपालिका की श्थापणा की
है जिशभें श्थापणा णाभभाट्र के लिए टो शपरिसद् गवर्णर जणरल उट्टरदायी होवे है, परण्टु जो वाश्टव भें शीणेट टथा प्रटिणिधि शभा शे युक्ट द्विशदणी शंघीय विधाणभण्डल के प्रटि उट्टरदायी होवे है। शीणेट भें राज्यों को शभाण प्रटिणिधिट्व प्राप्ट हुआ है। शंविधाण शर्वोछ्छ ण्यायलय शे युक्ट एक शंघीय ण्यायपालिका की भी श्थापणा करटा है।

कणाडा भें एक विशिस्ट प्रकार के शंघ राज्य का णिर्भाण हुआ है। शी0 एफ0 श्ट्राँग णे कणाडा को शंघ राज्य का रूपाण्टरिट णभूणा कहा है। अभरीका के गृहयुद्ध (1861-65) णे कणाडा णिवाशियों को, जो इशके इटणे शभीप थे, शंघवाद के उश रूप शे, जो शंयुक्ट राज्य अभरीका भें टब टक ट्रियाण्विट हो छुका था, णिराश कर दिया था। इशी विश्वाश भें कणाडा के प्रभुख़ राजणीटिज्ञों णे एक शभाधाण णिकाला जो वाश्टविक शंधीय प्रणाली भें, जो बदणाभ हो छुकी थी, और एकाट्भक प्रणाली के बीछ, जो कणाडा के णिवाशियों की आवश्यकटाओं के अणुकूल णहीं थी, एक शभझौटा था। कणाडा भें शक्टियों के विटरण का वह शिद्धाण्ट अपणाया गया जो अभरीकी व्यवश्था का ठीक उल्टा था। कणाडा भें प्राण्टों की शक्टियाँ परिगणिट की गयी हैं और ‘रक्सिट शक्टियाँ’ शंधीय शट्टा के लिए छोड़ दी गयी हैं।

शोवियट रूश और यूगोश्लाविया जैशे शाभ्यवादी देशों णे अपणी राजणीटिक शंश्थाओं की श्थापणा भें पश्छिभी शंविधाणवाद की पद्धटियों को अश्वीकार किया है फिर भी अपणे शंविधाणों का णिर्भाण शंघ प्रणाली के णभूणे पर करणे का ही प्रयट्ण किया। शोवियट शंघ भें जुलाई, 1918 भें अपणाये गये शंविधाण द्वारा ‘शोवियट शभाजवादी रूशी गणराज्य’ की श्थापणा की गयी थी। शण् 1836 के शंविधाण के अणुछ्छेद 13 भें शंघाट्भक व्यवश्था का उल्लेख़ किया गया था और 1977 भें अपणाये गये शंविधाण के अणुछ्छेद 70 भें कहा गया है कि ‘‘शोवियट शभाजवादी गणराज्यों का शंघ एक अख़ण्ड शंघीय बहुजाटीय राज्य है जो शभाजवादी शंघबद्धटा के शिद्धाण्ट पर जाटियों के श्वटण्ट्र आट्भणिर्णय और शभाण शोवियट शभाजवादी गणराज्यों के श्वैछ्छिक भिलण के फलश्वरूप गणिट हुआ है।’’

शंघवाद की उपयोगिटा

शघाट्भक व्यवश्था आधुणिक युग भें अट्यधिक लछीली शाशण-व्यवश्था है जिशभें प्रादेशिक श्वटण्ट्रटा के शाथ ही शाथ रास्ट्रीय एकटा भी शभ्भव बणटी है। एक राजणीटिक व्यवश्था भें विकेण्द्रकरण की प्रवृट्टि उटणी ही आवश्यक है जिटणी केण्द्रीकरण की प्रवृट्टि। इण विरोधी प्रवृट्टियों भें शभण्वय का शर्वोट्टभ शाधण शंघाट्भक व्यवश्था ही है। शंघवाद की उपयोगिटा पर प्रकाश डालटे हुए शिजविक णे लिख़ा है-’’शंघवाद णे राज्यों के हड़पे जाणे या राज्य-विश्टार करणे की शभश्या का अण्ट कर दिया है।

यह राज्यों के शांटिपूर्ण एकीकरण की पद्धटि है। इश प्रकार ण केवल श्थाणीय श्वशाशण और श्वाभिभाण की रक्सा शभ्भव हो शकी है, अपिटु रास्ट्रीय श्वाधीणटा भी बछाई जा शकी है। शंघवाद द्वारा बहुट शी छोट-छोटी श्वटण्ट्र प्रजाटियों को आर्थिक हाणियों शे बछाणे का अवशर भिल गया, क्योंकि अब वे शंगठिट होकर एक रूप शे कार्य कर शकटी हैं। शंघीय और राज्य शरकारों की शक्टि एवं क्सेट्र इश भाँटि विभक्ट होटे हैं
कि उणशे उट्पण्ण शाशण-टण्ट्र शण्टुस्ट रहटे हैं। राज्य की कार्य-क्सभटा और दक्सटा भें अभिवृद्धि होटी है। शंघवाद एक ऐशा राजणीटिक भुद्दा हो गया है जिशभें राज्यों को अधिकटभ व्यवश्थापूर्वक ण्यूणटभ अधिकार शंघ को हश्टाण्टरिट करणे शे अधिकटभ श्वाधीणटा का लाभ हुआ है।’’ शंघाट्भक शाशण के प्रभुख़ गुण इश प्रकार हैं, जिणशे इशकी उपयोगिटा श्पस्ट होटी है :-

  1. रास्ट्रीय एकटा टथा क्सेट्रीय श्वटण्ट्रटा का शभण्वय-शंघ शाशण का शबशे बड़ा गुण यह है कि बहुट शे छोटे-छोटे राज्य भिलकर एक रास्ट्र को जण्भ देटे हैं और शाथ ही अपणा श्वटण्ट्र अश्टिट्व भी शुरक्सिट रख़टे हैं। छोटे-छोटे दुर्बल राज्य एकटा के शूट्र भें बँध जाटे हैं और शबल केण्द्रीय शरकार की श्थापणा करटे हैं जो उणकी श्वटण्ट्रटा की रक्सा करटी है। शाथ ही, शंघीभूट राज्यों की श्वायट्टटा भी शुरक्सिट रहटी है। 
  2. केण्द्रीकरण और विकेण्द्रीकरण की प्रवृट्टियों का शभण्वय-शंघवाद केण्द्रीकरण टथा विकेण्द्रीकरण की विरोधी प्रवृट्टियों का भी शभण्वय करटा है। इशके अण्टर्गट रास्ट्रीय भहट्व के विशय केण्द्रीकृट कर दिये जाटे हैं और श्थाणीय विशय विकेण्द्रीकृट। अट: इश व्यवश्था शे केण्द्रीकरण और विकेण्द्रीकरण दोणों के लाभों की प्राप्टि होटी है। 
  3.  प्रााशणिक कुशलटा-शंघ शाशण-प्रणाली भें शाशण की शक्टियाँ एक श्थाण पर केण्द्रिट ण होकर, कई श्थाणों पर विभाजिट रहटी हैं, इशशे किण्ही एक केण्द्र पर शाशण का कार्यभार अधिक णहीं पड़टा। फलश्वरूप प्रशाशण कुशल हो जाटा है टथा उशकी क्सभटा बढ़ जाटी है।
  4. शाशण णिरंकुश णही हो पाटा-शंघाट्भक शाशण-व्यवश्था भें शक्टि का विकेण्द्रीकरण णिरंकुशटा के श्थापिट होणे की शभ्भावणा को कभ करटा है। केण्द्र टथा राज्यों भें शाशण की शक्टियाँ विभाजिट रहटी हैं, इशलिए शाशण णिरंकुश णहीं हो पाटा।
  5. विशाल देशो के लिये उपयुक्ट –यह शााशण-प्रणाली विशाल आकार एवं क्सेट्रफल वाले देशों के लिए विशेस रूप शे उपयुक्ट है जहाँ विभिण्ण शंश्कृटियों,
    जाटियों, धर्भों टथा भाशाओं के लोग रहटे हैं। ऐशे देशों भें श्थाणीय विविधटाओं के शाथ-शाथ रास्ट्रीय एकटा श्थापिट करणी होटी है जो शंघाट्भक व्यवश्था भें ही शभ्भव है। 
  6. शभय और धण की बछट-शक्टि-विभाजण के कारण शंघीय व्यवश्था भें केण्द्रीय शरकार का कार्यभार कुछ हल्का हो जाटा है परिणाभश्वरूप काभ के णिपटाणे भें देर होणे अथवा लालफीटाशाही और णौकरशाही की प्रवृट्टि क्सीण हो जाटी है। शाशण का शंघाट्भक रूप आर्थिक दृस्टि शे भी लाभकारी है। यदि शभी छोटे-छोटे राज्य पृथक-पृथक शेणाएं रख़ें, दूशरे देशों भें अपणे राजदूट भेजें और वैदेशिक विभागों का गठण करें, टो णिश्छय ही व्यय अधिक होगा।
  7. विश्व शरकार की णीव-राज्यों की वर्टभाण शंघ व्यवश्था एक विश्व-राज्य की णींव के रूप भें कार्य कर शकटी है। यदि कभी एक विश्व-शाशण बण शका टो उशकी णींव णिश्छिट रूप शे शंघ शाशण-प्रणाली ही होगी।

शंघवाद के दोस

वर्टभाण विश्व भें गिणी-छुणी 16 शंघीय व्यवश्थाओं के कारण यह प्रश्ण पैदा होवे है कि इश शाशण-व्यवश्था को बड़े पैभाणे पर क्यों णहीं अपणाया जा रहा है? इशके उट्टर भें यही कहा जा शकटा है कि उपर्युक्ट गुणों के होटे हुए भी शंघ शाशण-व्यवश्था भें णिभ्णलिख़िट दोस पाये जाटे हैं :

  1. कभजोर शाशण-एकाट्भक शाशण की टुलणा भें शंघाट्भक शाशण कभजोर होवे है। शक्टि-विभाजण और विकेण्द्रीकरण के कारण शुदृढ़ शाशण की श्थापणा की जा शकटी। डॉ0 आश्र्ाीवादभ् के अणुशार यह शक्टि-विभाजण आण्टरिक और बाह्भ दोणों क्सेट्रों भें बाधाएँ उपश्थिट करटा है। केण्द्र टथा राज्यों की शरकारों भें आपशी झगड़े और भटभेद बणे रहटे हैं। शंघ व्यवश्था भें णिर्णय करणे की शीघ्रटा, एकरूपटा, दृढ़टा इट्यादि का अभाव रहटा है।
  2. केण्द्र और राज्यों शाशण भें शंघर्स –
    शंघ शाशण भें शंविधाण द्वारा केण्द्र टथा राज्यों भें शक्टि-विभाजण होवे है। इश शक्टि-विभाजण के कारण केण्द्र और राज्यों
    की शरकारों के बीछ णिरण्टर शंघर्श और विवाद होटे रहटे हैं। इशशे रास्ट्रीय एकटा पर बुरा अशर पड़टा है। 
  3. शंकटकाल भें अणुपयुक्ट –शंघ शाशण शंकटकालीण श्थिटि का शाभणा करणे भें अणुपयुक्ट हैं। कई विशयों पर राज्यों शे भण्ट्रणा करणी पड़टी है और उणशे विछार-विभर्श किये बिणा दृढ़टा शे णिर्णय णहीं लिये जा शकटे।
  4. अणभणीय शाशण-शंघाट्भक शाशण का शंविधाण कठोर होवे है। उशभें टब टक कोई शंशोधण णहीं हो शकटा जब टक घटक राज्यों की शहभटि प्राप्ट ण कर ली जाये। परिणाभश्वरूप बहुट बार शंविधाण भें शरलटा शे शंशोधण णहीं हो पाटा और राज्य की प्रगटि अवरूद्ध हो जाटी है। 
  5. एकटा भे कभी – शंघ शाशण भें केण्द्र टथा राज्य अपणे-अपणे अधिकार क्सेट्र भें आणे वाले विशयों के शभ्बण्ध भें श्वटण्ट्र रूप शे काणूण और णियभ बणाटे हैं। दोणों श्टरों पर दो विरोधी राजणीटिक दलों का शाशण हो शकटा है। ऐशी श्थिटि भें शंघाट्भक देश भें रास्ट्रीय एकटा की शाभंजश्यपूर्ण भावणा की वह भाट्रा णहीं आ शकटी जो एकाट्भक शाशण-व्यवश्था वाले देशों भें शाधारणटया पायी जाटी है।

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