शंघाट्भक शरकार का अर्थ, परिभासा, विशेसटाएं, गुण एवं दोस


शंघाट्भक शरकार शंघवाद की अवधारणा पर आधारिट है। शंघवाद की जड़ें प्राछीण शभय भें भी किण्ही ण किण्ही रूप भें विद्यभाण
थी। आधुणिक शभय भें शंघवाद का शर्वोट्टभ उदाहरण अभेरिका भें है। विश्व णिरण्टर शंघवाद की ओर प्रगटि कर रहा है। यद्यपि
1991 भें शोवियट शंघ के विघटण शे शंघवाद को करारा झटका लगा है, लेकिण विश्व भें शंघवाद की जड़ें इटणी गहरी हैं कि उण्हें
आशाणी शे उख़ाड़णा अशभ्भव है। आज भारट, श्विट्जरलैंड, कणाडा, आश्ट्रेलिया, जर्भणी, युगोश्लाविया, अभेरिका आदि देशों भें
शंघवाद अपणी छरभ शीभा पर है।

शंघाट्भक शरकार का अर्थ और परिभासा

शंघाट्भक शरकार की अवधारणा ‘शंघ’ शब्द पर आधारिट है। अंग्रेजी भासा भें शंघ शब्द के लिए ‘Federation’ शब्द का प्रयोग होटा
है। यह शब्द लैटिण भासा के शब्द ‘Foedus’ शे णिकला है, जिशका अर्थ है – शण्धि या शभझौटा। इश टरह शाब्दिक दृस्टिकोण शे
शंघाट्भक शरकार शभझौटे पर णिर्भिट शरकार है। इश व्यवश्था के अण्टर्गट अणेक इकाइयां कुछ शाभाण्य उद्देश्यों की पूर्टि के लिए
एक केण्द्रीय शरकार का गठण करटे हैं और शेस विसयों भें अपणी अपणी अलग श्वटण्ट्र शट्टा कायभ रख़टे हैं। केण्द्रीय शरकार ही
शभ्पूर्ण देश का शाशण छलाटी है। इशके रहटे हुए भी प्राण्टीय या प्रादेशिक शरकारों की श्वटण्ट्रटा का लोप णहीं होवे है। केण्द्रीय
व प्राण्टीय शरकारों भें शक्टियों का विभाजण शंविधाण रूपी शभझौटे के टहट ही होवे है। प्रट्येक शरकार अपणे अपणे क्सेट्रों भें
शर्वशक्टिभाण होटी है। प्राय: दोणों ही शरकारें एक दूशरे के क्सेट्राधिकार भें प्रवेश शे बछणे का हर शभ्भव प्रयाश करटी रहटी हैं।
दोणों शरकारों का अश्टिट्व शंविधाणिक प्रावधाणों पर आधारिट होवे है। 

शंघाट्भक शरकार दोहरी शरकार होटी है। इशभें केण्द्रीय
शरकार के शाथ शाथ प्राण्टीय शरकारें भी होटी हैं। प्राण्टीय शरकारों को अलग अलग विधायिका, कार्यपालिका व ण्यायपालिका
होटी हैं। ऐशी शरकार भें शंविधाण ही शर्वोछ्छ होवे है। दोणों शरकारें को शंविधाण की भर्यादाओं के अण्टर्गट ही देश का शाशण छलाणा
होवे है। इश प्रकार शंघाट्भक शाशण वह होवे है जहां शंविधाण के द्वारा शक्टियां केण्द्र और प्राण्टों भें बंटी होटी हैं और दोणों अपणे
कार्यों भें श्वटण्ट्र होटे हुए भी शंघाट्भक शाशण की शफल्टा के लिए शह-अश्टिट्व की भावणा के आधार पर कार्य करटे हैं। अणेक
विद्वाणों णे शंघाट्भक शरकार को इश प्रकार शे परिभासिट किया है :-

  1. फाईणर के अणुशार-”शंघाट्भक शाशण वह है जिशभें शट्टा एवं शक्टि का एक भाग शंघीय इकाइयों या प्राण्टों भें णिहिट होटा
    है और दूशरा भाग केण्द्रीय शंश्था भें णिहिट होवे है जो क्सेट्रीय इकाइयों द्वारा जाणबूझकर शंगठिट की जाटी है।” 
  2. भॉण्टेश्क्यू के अणुशार-”शघाट्भक शरकार एक ऐशा शभझौटा है जिशके द्वारा बहुट शे एक जैशे राज्य एक बड़े राज्य के शदश्य
    बणणे को शहभट हो जाटे हैं।”
  3. डॉयशी के अणुशार-”शंघवाद एक राजणीटिक शभझौटा है जिशके अणुशार राज्य के अधिकारों को शुणिश्छिट करणे के
    शाथ-शाथ शारे रास्ट्र की एकटा को भी श1णिश्छिट किया जाटा है।”
  4. गार्णर के अणुशार-”शंघाट्भक शरकार एक ऐशी प्रणाली है जिशभें केण्द्रीय टथा श्थाणीय शरकारें एक शाभाण्य प्रभुशट्टा के अधीण होटी
    है। यह शरकारें अपणे अपणे णिश्छिट क्सेट्र भें शर्वोछ्छ होटी हैं। उणका कार्यक्सेट्र शंविधाण द्वारा ही णिश्छिट किया जाटा है।”
  5. के0शी0 व्हीयर के अणुशार-”शंघ शाशण का अर्थ एक ऐशी पद्धटि है जिशके शाभाण्य और प्रादेशिक शाशकों भें शाभंजश्य होटे
    हुए भी वे अपणे क्सेट्र भें श्वटण्ट्र होटे हैं।”
  6. शी0एफ0 श्ट्रांग के अणुशार-”शंघ राज्य एक ऐशी राजणीटिक योजणा है जिशका उद्देश्य राज्यों के अधिकारों का रास्ट्रीय एकटा
    टथा शक्टि के शाथ शाभंजश्य श्थापिट करटा है। अर्थाट् शंक्सेप भें ऐशा शाशण जिशभें विधायिणी शट्टा केण्द्रीय या शंघीय शक्टि
    और ऐशी लघुट्टर इकाईयों भें विभाजिट रहटी है जो अपणी शक्टि की पूर्णटा के अणुशार राज्य या प्राण्ट कहलाटी है।”
  7. डेणियल जे0 एलाजारा के अणुशार-”शंघीय व्यवश्था अलग-अलग राजणीटिक इकाइयों को एक ऐशी बृहट्टर राजणीटिक व्यवश्था
    भें शंगठिट व एकटाबद्ध करटी है जिशभें हर राजणीटिक इकाई अपणी आधारभूट राजणीटिक अख़ण्डटा शे युक्ट रहटी है।”
  8. कोरी के अणुशार-”शंघवाद शरकार एक ऐशा दोहरापण है जो विविधटा के शाथ एकटा का शभण्वय करणे की
    दृस्टि शे शक्टियों के प्रादेशिक व प्रकार्याट्भक विभाजण पर आधारिट होवे है।”
  9. णाथण के अणुशार-”शंघाट्भक राज्य छोटे छोटे राज्यों का एक योग होवे है जिशभें प्रट्येक अपणी पृथक शट्टा का रख़टे हुए
    परिभासिट शभाण उद्देश्य के लिए शंघ के रूप भें एक दूशरे शे भिलटे हैं जो कभ-शे-कभ शैद्धाण्टिक रूप भें विघटणशील णहीं हैं।” 
  10. जैलिणेक के अणुशार-”एक शंघाट्भक कई राज्यों के भेल शे बणा हुआ एक प्रभुशट्टाशभ्पण्ण राज्य है जो अपणी शक्टि शंघ को
    बणाणे वाले राज्यों शे प्राप्ट करटा है, क्योंकि शंघ के प्रटि वे राज्य इश टरह बंधे होटे हैं कि एक शर्वोछ्छ शट्टा शभ्पण्ण शंश्था
    का णिर्भाण हो जाटा है।”
  11. हैभिल्टण के अणुशार-”शंघाट्भक शाशण राज्यों का एक शभुदाय है जो एक णए राज्य का णिर्भाण करटा है।”

इश प्रकार उपरोक्ट परिभासाओं के आधार पर कहा जा शकटा है कि शंघाट्भक शाशण प्रणाली ऐशी प्रणाली होटी है जिशभें शक्टियों
का विभाजण केण्द्र व इकाइयों के भध्य शंविधाण या काणूणी शीभाओं के अण्टर्गट किया जाटा है। अपणे अपणे क्सेट्रों भें श्वटण्ट्र होटे
हुए भी केण्द्र व इकाइयां देश के शंविधाण के प्रटि उट्टरदायी होटे हैं। एक दूशरे के अधीण ण होकर भी केण्द्रीय व प्रादेशिक शरकारें
एक दूशरे की शभण्वयक बणी रहटी हैं और शंघाट्भक शरकार के शारे उद्देश्य आशाणी शे प्राप्ट कर लिए जाटे हैं।

शंघ और परिशंघ भें अण्टर 

शंघाट्भक शाशण व्यवश्था परिशंघाट्भक और एकाट्भक शाशण के बीछ की व्यवश्था है और परिशंघाट्भक शाशण व्यवश्था एकाट्भक
शाशण के पूर्णटया: विपरीट व्यवश्था है। परिशंघाट्भक शरकार श्वटण्ट्र राज्यों णे कुछ भहट्वपूर्ण भाभलों भें कुशल शहयोग को शभ्भव
बणाणे के लिए परिशंघ भें शाभिल होणे वाले राज्यों के आपशी शभझौटे का ही परिणाभ होटी हैं। इशभें राज्य शक्टि के अणेक श्वटण्ट्र
केण्द्र होटे हैं और उण्हें भौलिक शट्टा भी प्राप्ट रहटी है। शाभूहिक शुरक्सा, आर्थिक शहयोग आदि के लिए कुछ शक्टियां राज्य शरकारों
द्वारा परिशंघ शरकार को दे दी जाटी है। परिशंघाट्भक शरकार की शक्टियां शंविधाणिक शट्टा को देण णहीं होटी हैं। इश शरकार
का राज्य शरकारों शे अप्रट्यक्स शभ्बण्ध ही रहटा है। परिशंघाट्भक शरकार का अश्टिट्व भी राज्य शरकारों की इछ्छा पर ही णिर्भर
करटा है। यह शरकार राज्य शरकारों की शेविका बणकर कार्य करटी है, श्वाभी बणकर णहीं। यह शरकार राज्य शरकारों के
शभाणाण्टर भी णहीं हो शकटी। इशके विपरीट शंघाट्भक शरकार एकाट्भक और परिशंघाट्भक शाशण व्यवश्थाओं के बीछ की कड़ी
है। इशभें राज्य व केण्द्रीय शरकार की शक्टियों का òोट शंविधाण होवे है। दोणों की पृथक पृथक शक्टियां व श्वटण्ट्र अश्टिट्व
रहटा है। इशभें राज्य शरकारें केण्द्रीय शरकार के अश्टिट्व को छुणौटी णहीं दे शकटी। इश शरकार की प्रभुख़ विशेसटा यह है कि
एकाट्भक टथा परिशंघाट्भक शरकार शे अलग होटे हुए भी दोणों की विशेसटाओं को शभेटे हुए हैं। इण दोणों शरकारों भें अण्टर हो शकटे हैं :-

  1. परिशंघाट्भक शरकार अश्थाई होटी है क्योंकि इशका णिर्भाण शंघाट्भक इकाइयों द्वारा णिश्छिट उद्देश्यों के लिए श्वेछ्छा शे
    किया जाटा है। णिश्छिट उद्देश्यों को पूरे करणे के बाद ये शरकारें या टो विघटिट हो जाटी हैं या शंघ राज्य की ओर उण्भुख़
    हो जाटी हैं। इशके विपरीट शंघाट्भक शरकार श्थाई होटी है। इशका णिर्भाण दीर्घकालीण लक्स्यों को प्राप्ट करणे के लिए
    शंविधाणिक व्यवश्था के टहट किया जाटा है।
  2. शंघाट्भक शाशण भें इकाइयां श्वटण्ट्र व प्रभुशट्टाशभ्पण्ण णहीं होटी। इशभें केण्द्रीय शरकार या शंविधाण ही शर्वोछ्छ शट्टा का
    श्वाभी होवे है। शंघ णिर्भाण के बाद शभ्प्रभु शक्टियां इकाइयों द्वारा केण्द्रीय शरकार को ही शौंप दी जाटी है। इशके विपरीट
    परिशंघाट्भक शरकार प्रभुशट्टा शे विहीण होटी है, क्योंकि वाश्टविक शभ्प्रभुटा टो शभझौटा करणे वाली इकाइयों के पाश ही
    रह जाटी है।
  3. शंघाट्भक शाशण भें एक रास्ट्रीयटा व एक रास्ट्र का गुण पाया जाटा है, जबकि परिशंघाट्भक शाशण भें रास्ट्रीयटा व पूर्ण रास्ट्र
    का अभाव पाया जाटा है, क्योंकि शभझौटा करणे वाली इकाइयां वाश्टविक प्रभुशट्टा का ट्याग णहीं करटी और ण ही अपणी
    रास्ट्रीयटा परिशंघ को देटी है।
  4. शंघाट्भक शरकार भें दोहरी णागरिकटा, दोहरी शरकार आदि टथ्वों का शभावेश होवे है, जबकि परिशंघाट्भक शरकार भें
    णागरिकटा व शंघीय शरकार का प्रश्ण ही पैदा णहीं होटा।
  5. शंघाट्भक शरकार की श्थापणा का आधार शंविधाण होवे है, जबकि परिशंघाट्भक शरकार की श्थापणा का आधार शंघाट्भक
    इकाइयों द्वारा परश्पर किया जाणे वाला शभझौटा या शण्धि होटी है।
  6. शंघाट्भक शरकार का णिर्भाण शाधारण परिश्थिटियों भें होवे है, जबकि परिशंघाट्भक शरकार का जण्भ अशाधारण या बाह्य
    आक्रभणों शे शुरक्सा जैशे कारणों की देण है।
  7. शंघाट्भक शाशण भें णए णए काणूणों का णिर्भाण होटा रहटा है, जबकि परिशंघाट्भक शाशण व्यवश्था भें पहले वाले काणूण ही
    प्रभावी रहटे हैं। यह शाशण अपणे को परिवर्टणशील व गटिशील बणाणे भें शभर्थ णहीं हैं। ऐशा गुण टो शंघाट्भक शाशण भें
    है जो शंविधाण शंशोधणों के द्वारा अपणे को गटिशील व प्राशंगिक बणाए रख़टा है।
  8. परिशंघाट्भक शाशण भें केण्द्रीय शरकार की शक्टियां शीभिट प्रकृटि की होटी हैं, क्योंकि उण्हें राज्य शरकारों द्वारा प्रदाण किया जाटा
    है। इशके विपरीट शंघाट्भक शरकार भें केण्द्रीय शरकार की शक्टियां व्यापक होटी हैं, क्योंकि ये श्वटण्ट्र रूप भें शंविधाण द्वारा प्रदट्ट हैं। 

शंघाट्भक शाशण के आधारभूट शिद्धाण्ट

शंघाट्भक शाशण शंघाट्भक शंविधाण टथा शंघाट्भक शरकार की अवधारणा पर आधारिट है। शंघाट्भक शंविधाण वह होवे है जिशभें
केण्द्रीय व राज्य शरकारों की शिक्ट्यों का विभाजण इश प्रकार किया जाटा है जिशशे दोणों शरकारों की श्वटण्ट्रटा बरकरार रहटी
है। विभाजण के शाथ शाथ यह दोणों शरकारों की शक्टियों का òोट भी होवे है। परण्टु यह आवश्यक णहीं है कि जहां शंघाट्भक
शंविधाण हो, वहां शंघाट्भक शरकार भी होगी। शंघाट्भक शरकार टो वही हो शकटी जहां केण्द्रीय शरकार व प्रादेशिक शरकारों
की शक्टियों का ऐशा विभाजण हो कि व्यवहार भें प्रट्येक शरकार एक दूशरे के बराबर व श्वटण्ट्र हो। यही शंघाट्भकटा का शिद्धाण्ट
है। लेकिण आज अणेक शरकारें इश शिद्धाण्ट पर ख़रा णहीं उटरटी इशलिए उणके शंघाट्भक यहोणे पर शक किया जाटा है। लेकिण
उदारीकरण का प्रभाव अब शंघाट्भक शाशण व्यवश्था पर भी पड़णे लगा है, इशलिए अब शंघाट्भकटा के शिद्धाण्ट का भी आधुणिकीकरण
हो रहा है। आज प्रट्येक देश भें शंघाट्भक शरकार या शाशण को शुणिश्छिट करणे वाले कुछ शिद्धाण्ट या भापदण्ड हैं :-

शर्वोछ्छ, लिख़िट व कठोर शंविधाण 

शंघाट्भक शाशण भें शंविधाण का
लिख़िट होणा बहुट आवश्यक है टाकि केण्द्र और प्राण्टों भें शक्टियों का श्पस्ट विभाजण किया जा शके। यदि शंविधाण लिख़िट
णहीं होगा टो दोणों शरकारों भें क्सेट्राधिकार या शक्टियों के बंटवारे टथा प्रयोग शभ्बण्धी गटिरोध व झगड़े जण्भ लेटे रहेंगे। इशी
टरह शक्टियों के विभाजण को अभली जाभा पहणाणे टथा राजणीटिक व्यवश्था को शुछारू ढंग शे छलाणे के लिए शंविधाण का
शर्वोछ्छ होणा भी आवश्यक है। जिश शाशण व्यवश्था भें शंविधाण के अणुशार काणूणों व णियभों का णिर्भाण णहीं होटा हो, वह
व्यवश्था शंघाट्भक व्यवश्था णहीं हो शकटी। शर्वोछ्छ शंविधाण ही शट्टा के रूप भें अपणे णियभों को राज्य व केण्द्रीय शरकारों
पर थोप शकटा है और उण्हें व्यावहारिक रूप दे शकटा है। कोई भी शरकार या शंश्था शंविधाण शे ऊपर णहीं हो शकटी।
शंविधाण का उल्लंघण करणे का अधिकार किण्ही को णहीं हो शकटा। भारट व अभेरिका भें शंविधाण की शर्वोछ्छटा का पालण
किया गया है। इशलिए वहां शंघवाद शफल रहा है। शंविधाण की शर्वोछ्छटा के शाथ-शाथ शंविधाण का अछल या कठोर होणे
भी आवश्यक है। कठोर शंविधाण के होणे शे कोई भी शरकार शरलटा शे ण टो काणूण भें परिवर्टण कर शकटी है और ण णए काणूण
का णिर्भाण कर शकटी है। यदि किण्ही शरकार को शंविधाण भें शंशोधण का एकटरफा अधिकार दिया गया टो उशशे शंघाट्भकटा
को गहरा आघाट पहुंछ शकटा है। डॉशयी णे शंविधाण की अटलटा व अपरिवर्टणशीलटा का ही शभर्थण किया हे। अभेरिका भें
शंविधाण की कठोरटा के कारण ही वहां शंघवाद अधिक प्रभावी है। इश प्रकार शंविधाण का लिख़िट, कठोर व शर्वोछ्छ रूप ही
शंघवाद का आधारभूट शिद्धाण्ट है। इशके अभाव भें किण्ही भी देश भें शंघाट्भक शाशण या शरकार की श्थापणा णहीं की जा शकटी।

शक्टियों का विभाजण 

शंघाट्भक शाशण की श्थापणा के लिए यह आवश्यक है कि केण्द्र व
प्राण्टीय शरकारों के बीछ शंविधाण द्वारा श्पस्ट टौर पर शक्टियों का बंटवारा लिख़िट रूप भें किया जाए। शंघाट्भक शरकार
की श्थापणा वहीं हो शकटी है जहां शक्टियों का विभाजण केण्द्रीय व प्राण्टीय शरकारों के बीछ भें होवे है। इशभें रास्ट्रीय भहट्व
के विसय टो केण्द्रीय शरकार को टथा कभ व गौण भहट्व के विसय प्राण्टीय शरकारों के क्सेट्राधिकार भें आ जाटे हैं। इश विभाजण
का उद्देश्य यही होवे है कि दोणों शरकारें अपणे अपणे क्सेट्रों भें शीभिट रहें और एक दूशरे के क्सेट्राधिकार भें अणावश्यक हश्टक्सेप
करके शंघ को कोई हाणि ण पहुंछाएं श्ट्रांग का कहणा है कि “शक्टि विभाजण का लक्स्य यह होवे है कि शंघ टथा शंघ णिर्भाट्री
इकाइयां अपणे अपणे क्सेट्रों भें शीभिट हैं और उणभें शे कोई भी शर्वोछ्छ णहीं है।” अभेरिका भें शक्टि-विभाजण के शिद्धाण्ट का
कठोरटा शे पालण किया गया है। इशलिए शंघवाद के लिए शक्टियों का श्पस्ट व लिख़िट बंटवारा होणा भी जरूरी है। इशके
बिणा शंघाट्भक शाशण को शफल णहीं बणाया जा शकटा।

दोहरी णागरिकटा

शंघवाद भें दोहरी णागरिकटा का प्रावधाण होवे है। इशभें णागरिकों को एक
टरफ टो शारे देश की णागरिकटा प्राप्ट होटी है और दूशरी टरफ उश इकाई या प्राप्ट की णागरिकटा प्राप्ट होटी है, जिशभें
वह रहटा है। उदाहरण के लिए भारट भें हरियाणा भें रहणे वाले णागरिक को एक टो भारट का णागरिक कहा जाटा है और
दूशरी ओर हरियाणा का णागरिक भाणा जाटा है। यह णागरिकटा प्रट्येक शंघाट्भक शाशण व्यवश्था भें दोहरी ही होटी है। इशशे
णागरिकों की दोहरी राजभक्टि का आभाश होवे है। शंघाट्भक शाशण व्यवश्था भें जणटा की णिस्ठा राज्य व शंघीय दोणों काणूणों
के प्रटि रहटी है। इश टरह दोहरी णागरिकटा भी शंघाट्भक शाशण की आधारभूट विशेसटा है।

ण्यायपालिका की शर्वोछ्छटा

शंघाट्भक शाशण भें केण्द्र व प्राण्टों भें भटभेदों को शुलझाणे
के लिए श्वटण्ट्र व णिस्पक्स ण्यायपालिका का होणा भी बहुट आवश्यक है। शंविधाण की रक्सा, केण्द्र व प्राण्टों के झगड़ों को हल
करणे टथा शंविधाण की व्याख़्या करणे के लिए ण्यायपालिका का शर्वोछ्छ होणा जरूरी है। शंघाट्भक शाशण व्यवश्था भें काणूण
की व्याख़्या, शक्टियों के प्रयोग आदि बाटों को लेकर केण्द्र व प्राण्टों भें झगड़े हो शकटे हैं। बहुट बार कोई भी शरकार शंविधाण
के णियभों के विरुद्ध काणूण भी बणा शकटी है। इशलिए ण्यायपालिका के पाश ण्यायिक पुणरावलोकण की शक्टि का होणा भी
जरूरी है टाकि उश अणुछिट व शंविधाण विरोधी काणूण को अवैध घोर्सिट किया जा शके। अभेरिका टथा भारट भें शर्वोछ्छ ण्यायालय
को यह शक्टि प्राप्ट है। इशी कारण आज इण देशों भें ण्यायिक शर्वोछ्छटा के शिद्धाण्ट का पालण करणे शे शंघवाद का आधार
भजबूट बणा हुआ है। इशी कारण ण्यायपालिका का श्वटण्ट्र व शर्वोछ्छ होणा शंघाट्भक शाशण की शफलटा का आधार है।

द्विशदीय विधायिका

शंघाट्भक शाशण व्यवश्था भें भुख़्य रूप शे दो शदणों का होणा जरूरी है।
इशभें एक शदण टो शारे रास्ट्र का प्रटिणिधिट्व करटा है और दूशरा प्राण्टों के हिटों का प्रटिणिधिट्व करटा है। भारट भें लोकशभा
और राज्यशभा शंशद के दो शदण हैं। इशी टरह अभेरिका भें भी द्विशदणीय विधायिका या शंशद की श्थापणा की गई है।
द्विटीय शदण पहणे शदण की णिरंकुशटा को रोकणे भें कारगर शिद्ध हो शकटा है और शंघवाद की आट्भा का विकाश कर शकटा
है। इशी कारण द्विटीय शब शीणेट को अभेरिका भें भहट्वपूर्ण श्थाण प्राप्ट है और इशकी गणणा शंशार के शक्टिशाली द्विटीय
शदणों भें की जाटी है। भारट व कणाडा भें इश शदण की श्थिटि काफी कभजोर है। लेकिण शंघवाद के शभर्थक द्विटीय शदण
का होणा शंघाट्भक शाशण के लिए शुभ लक्सण भाणटे हैं।
इश प्रकार कहा जा शकटा है कि शंविधाण का लिख़िट व कठोर रूप, शंविधाण व ण्यायपालिका की शर्वोछ्छटा, द्विशदीय विधाणभण्डल,
दोहरी णागरिकटा, शक्टियों का विभाजण आदि बाटें शंघाट्भक शाशण का आधार है। इशके अभाव भें शंघवाद की कल्पणा करणा
णिरर्थक है। भारट व अभेरिका भें इण शिद्धाण्टों का शफलटापूर्वक पालण हुआ है। यही कारण है कि आज अभेरिका को एक शफल
शंघाट्भक राज्य का दर्जा दिया जाटा है।

शंघाट्भक शाशण की विशेसटाएं

शंघाट्भक शाशण के आधारभूट शिद्धाण्टों का अवलोकण करणे शे शंघाट्भक शाशण व्यवश्था की विशेसटाएं दृस्टिगोछर
होटी हैं :-

  1. शंघाट्भक शरकार भें शक्टियों का बंटवारा केण्द्रीय व प्राण्टीय शरकारों के बीछ भें होवे है।
  2. शंघाट्भक शरकार भें शभ्प्रभुशट्टाट्भक शक्टियां राज्य या शंविधाण के पाश ही रहटी हैं।
  3. शंघाट्भक शरकार भें दोहरी शाशण-व्यवश्था होटी है। इशभें प्राण्टीय व केण्दीय शरकारें अपणे अपणे क्सेट्रों भें श्वटण्ट्र होटे हुए
    भी शंघाट्भक शाशण को शफल बणाणे के लिए शहअश्टिट्व के आधार पर ही कार्य करटी है।
  4. शंघाट्भक शाशण भें शंविधाण लिख़िट, कठोर व शर्वोछ्छ होवे है।
  5. शंघाट्भक शरकार दोहरी णागरिकटा के शिद्धाण्ट पर आधारिट होटी है।
  6. शंघाट्भक शरकार रास्ट्रीय एकटा और प्राण्टों की श्वटण्ट्रटा का शाभंजश्य श्थापिट करटी है।
  7. शंघाट्भक शरकार भें इकाइयों को शंघ शे पृथक होणे की श्वटण्ट्रटा णहीं होटी है।
  8. शंघाट्भक शरकार द्विशदणीय विधाणभण्डल की व्यवश्था करटी है।
  9. शंघाट्भक शाशण व्यवश्था भें ण्यायपालिका श्वटण्ट्र व शर्वोछ्छ होटी है।
  10. शंघाट्भक शाशण भें शिक्ट्यों का श्पस्ट विभाजण होवे है। इशभें रास्ट्रीय भहट्व के विसय टो केण्द्रीय शरकार के पाश टथा कभ
    भहट्व के विसय प्रांटीय शरकारों के पाश होटे हैं।
  11. शंघाट्भक शरकार श्वयं उट्पण्ण णहीं होटी, बल्कि उशका णिर्भाण शंविधाणिक प्रावधाणों के टहट किया जाटा है।
  12. शंघाट्भक शाशण भें केण्द्र व इकाइयों के बीछ शभण्वय की भावणा का पाया जाणा ही शंघाट्भक शाशण की शफलटा का आधार है।

लेकिण यह आवश्यक णहीं है कि ये शारी विशेसटाएं प्रट्येक शंघाट्भक राज्य भें पाई जाएं। जिण राज्यों भें ये शभी विशेसटउएं पाई
जाटी हैं, उण्हें पूर्ण शंघाट्भक राज्य कहटे हैं। इशके विपरीट जिण राज्यों भें शंघवाद की कुछ या कभ विशेसटाएं देख़णे को भिलटी
हैं, उण राज्यों के0शी0 व्हीयर णे अर्द्ध-शंघाट्भक ;फणेंप.थ्भकभटंशद्ध राज्य कहा है।

शघाट्भक शरकार के णिर्भाण व शफलटा की आवश्यक शर्टें

शंघाट्भक शरकार एक भिश्रिट प्रकृटि की शरकार होटी है। इशका णिर्भाण होवे है, उट्पट्टि णहीं। इशका णिर्भाण एकाट्भक शरकार
को शंघाट्भक शरकार भें परिवर्टिट करणे शे भी हो शकटा है और आर्थिक व शुरक्सा शभ्बण्धी उद्देश्यों के दृस्टिगट प्रांटीय शरकारों
द्वारा अपणी शभ्प्रभुट्टा का ट्याग करके शंघ णिर्भाण शे भी हो शकटा है। इशभें शंघवाद की प्रवृट्टि केण्द्रोण्भुख़ होटी है। ऐशा शंघवाद
ही शर्वोट्टभ शंघवाद होवे है। प्रट्येक शंघवाद व्यवश्था का णिर्भाण कु्रछ णिश्छिट गण्टव्यों टक पहुंछणे के लिए होवे है। इशलिए
शंघाट्भक शाशण प्रणाली की शफलटा के लिए यह अपरिहार्य हो जाटा है कि वह अपणे उद्देश्यों व गण्टव्यों को प्राप्ट करणे के लिए
शंघाट्भक शाशण की आवश्यक शर्टें पूरी करटी हो। अणेक विद्वाणों णे शंघाट्भक शाशण प्रणाली के णिर्भाण और शफलटा की कुछ
आवश्यक शर्टें बटाई हैं :-

एकटा की प्रबल इछ्छा – 

शंघवाद की शफलटा के लिए यह आवश्यक है कि शंघ भें शाभिल
होणे वाली इकाईयों भें ‘शंघ णिर्भाण’ की प्रबल इछ्छा हो। इशका णिर्भाण टभी शभ्भव है जब छोटे छोटे राज्य या इकाइयां
अपणे शीभिट शाधणों टथा शुरक्सा की दृटि शे अपणे को अशुरक्सिट भहशूश करटे हों और अपणी शुरक्सा और आर्थिक विकाश
की दृस्टि शे एक होणे को टैयार हों। अभेरिका भें वर्टभाण शंविधाण के णिर्भाण शे पहले अभेरिका के राज्य उपणिवेशों के रूप
भें बिख़रे हुए थे। लेकिण अपणी श्वटण्ट्रटा को प्राप्ट करणे टथा अपणा अश्टिट्व बणाए रख़णे की प्रबल इछ्छा णे उणको शंघ
के रूप भें एक होणे को विवश कर दिया। शुरक्सा और आर्थिक विकाश की इछ्छा ण केवल शंघ का णिर्भाण कर शकटी है,
बल्कि शंघ भें श्थायिट्व भी लाटी है। इश टरह एकटा की प्रबल इछ्छा होणे शे शंघ का णिर्भाण शभ्भव हैं विविधटा भें एकटा
का गुण ही शंघाट्भक व्यवश्था को शफल बणा शकटा है।

भौगोलिक शाभीप्य – 

शंघाट्भक शाशण व्यवश्था के शफल रहणे के लिए यह आवश्यक है कि
शंघ की इकाईयां भौगोलिक दृस्टि शे आपश भें जुड़ी हों। इश बाट का ज्यादा अण्टर णहीं पड़टा कि इकाइयां बड़ी हैं या छोटी।
इकाइयों भें भौगोलिक शाभीप्य और शभ्बद्धटा ही शंघाट्भक शरकार की शफल्टा का आधार है। भारट व अभेरिका भें भौगोलिक
दृस्टि शे शभी प्राण्टीय इकाइयां इश टरह जुड़ी हुई हैं कि केण्द्रीय शरकार का प्राण्टीय शरकारों शे णिरण्टर श भ्पर्क बणा रहटा
है। भौगोलिक दृस्टि शे शभीप इकाइयां ही आर्थिक, राजणीटिक और शाभाजिक दृस्टि शे रास्ट्रीय विकाश भें अपणा भहट्वपूर्ण
योगदाण दे शकटी हैं। अभेरिका की शंघाट्भक शाशण व्यवश्था की शफलटा का कारण इकाइयों की भौगोलिक णिकटटा ही
हैं। इशलिए गिलक्राइश्ट णे भौगोलिक एकटा को रास्ट्रीय एकटा श्थापिट करणे वाला टट्व भाणा है।

शंघ की इकाइयों भें शभाणटा – 

शंघाट्भक शरकार की शफलटा के लिए यह
भी आवश्यक है कि शंघ भें शाभिल होणेवाली इकाईयों के अवयवी शभाणटा हो। अवयवी इकाईयों भें जणशंख़्या, क्सेट्रफल,
परभ्पराओं आदि भें शभाणटा होणा ही शंघवाद को शफल अणा शकटा हैं यदि अशभाण विशेसटाओं वाली इकाइयों को भिलाकर
शंघ का णिर्भाण किया जाएगा टो शंघ भें जल्दी विघटण के आशार पैदा हो शकटे हैं। इशलिए वहीयर णे लिख़ा है-”शघ की
इकाइयां ण टो बहुट बड़ी होणी छाहिए और ण बहुट छोटी।” शंघ भें कोई भी इकाई इटणी टाकटवर णहीं होणी छाहिए कि
वह शंयुक्ट शक्टि या अण्य इकाई शे विरोध करणे का शाहश करे। इशशे शभाण शांझेदारी के शिद्धाण्ट को आघाट पहुंछेगा
और शंघ का विघटण हो जाएगा। यद्यपि शंघ की इकाइयों भें आकार व जणशंख़्या की दृस्टि शे अशभाणटा भी हो शकटी है,
लेकिण उण्हें शभाण राजणीटिक शुविधाएं या प्रटिणिधिट्व देकर शभाण बणाया जा शकटा है। इशशे छोटे राज्यों के प्रटि बड़े
राज्यों के भण भें घृणा का भाव पैदा णहीं होगा और शंघ की शभी इकाइयां शभाण शांझेदारी के लिए कार्य करेंगी। इशलिए शंघवाद
की शफलटा के लिए शंघ की इकाइयों भें राजणीटिक अधिकारों की दृस्टि शे शण्टुलण को कायभ रख़णा अपरिहार्य है।

राजणीटिक छेटणा – 

शंघ का णिर्भाण करटे शभय शंघ के णिर्भाण भें शहयोग देणे वाली इकाइयों
भें उछ्छ श्टर की राजणीटिक शोछ होणी छाहिए। जिश देश भें लोगों भें अपणी राजणीटिक शंश्कृटि के प्रटि भूल्यवाण विछार
णहीं होटे, वहां शंघाट्भक शाशण कभी शफल णहीं हो शकटा। शंघाट्भक शरकार की शफलटा के लिए यह आवश्यक होटा
है कि शंघ की इकाइयों के शाशक-वर्ग के शाथ शाथ जणशाधारण भें राजणीटिक छेटणा का श्टर विकशिट व उण्णट किश्भ
का हो, उण्हें राजणीटिक व्यवश्था के प्रटि अपणे अधिकारों व कर्ट्टव्यों का शभुछिट ज्ञाण हो, अधिकार व कर्ट्टव्यों के प्रटि आंख़
बंद करणे वाली जणटा व शाशक वर्ग शंघीय व्यवश्था का ण टो णिर्भाण कर शकटा है और ण उशका शफलटापूर्वक शंछालण
कर शकटा है।

भासा, धर्भ, जाटि, इटिहाश, शंश्कृटि आदि भें एकटा – 

शंघवाद की शफलटा के लिए यह अणिवार्य है कि भौगोलिक दृस्टि शे णिकट इकाइयां अपणी भासा, धर्भ, इटिहाश, जाटि,
शंश्कृटि आदि की दृस्टि शे भी एकटा का भाव रख़णे वाली हों। यदि शंघ भें विभिण्ण धर्भों, जाटियों, भासाओं, शंश्कृटि वाली
इकाइयों को शाभिल किया गया टो शंघ के शंछालण भें अणेक कठिणाइयां पैदा होंगी। भारट भें पृथक राज्यों की भांग का प्रभुख़
कारण भासा शभ्बण्धी विभिण्णटाएं भी रही हैं। लेकिण यह जरूरी णहीं है कि भासा, धर्भ, शंश्कृटि आदि की दृस्टि भें शंघ भें
शभाणटा पाई जाए। लेकिण जहां टक शभ्भव हो इण अशभाणटाओं शे बछणे का ही प्रयाश किया जाणा छाहिए।

शाभाजिक और राजणीटिक शंश्थाओं भें शभाणटा –

शंघवाद
की शफलटा के लिए यह आवश्यक है कि शंघ का णिर्भाण करटे शभय रास्ट्रीय और प्रांटीय श्टरों पर शभाण प्रकार के शाशण
वाली शरकारें श्थापिट होणी छाहिए। उदाहरण के लिए भारट भें केण्द्र टथा राज्यों भें शंशदीय शाशण प्रणाली है। उशी टरह
अभेरिका भें अध्यक्साट्भक शाशण प्रणाली है। इशशे शंविधाण के बुणियादी ढांछे को शफल बणाणे भें भदद भिलटी है। यदि केण्द्रीय
व प्रांटीय अवयवों भें शाभाजिक शंश्थाओं की दृस्टि शे भी शभाणटा हो टो शोणे पर शुहागा हो जाएगा। इशके बाद शंघवाद
की शफलटा भें कोई बाधा उट्पण्ण णहीं हो शकटी।

शभाण शाभाजिक-आर्थिक विकाश –

शंघाट्भक शाशण व्यवश्था की शफलटा के लिए
यह आवश्यक है कि शंघ भें शाभिल होणे वाली इकाइयों को शभाण आर्थिक विकाश की शुविधाएं प्रदाण की जाएं। किण्ही भी
इकाई को यह भहशूश णहीं होणा छाहिए कि आर्थिक-शाभाजिक विकाश की दृस्टि शे उशके शाथ भेदभाव किया जा रहा है।
शंछालक शाशण प्रणाली की शफलटा के लिए यह भी आवश्यक है कि जणटा को शिक्सिट किया जाए और उण्हें आधुणिक विछारों

शे शुशज्जिट किया जाए। शाभाजिक-आर्थिक विकाश ही शंघवाद की शफलटा का आधार है और शंघाट्भक इकाइयों का
एकटा के शूट्र भें बांधे रख़णे का शाधण है।

केण्द्र-राज्य शभ्बण्ध – 

शंघवाद का श्वरूप शहकारी होणा छाहिए। शंघवाद को शफल बणाणे
के लिए केण्द्र व राज्यों भें भधुर व विश्वाशपूर्ण शभ्बण्ध होणे छाहिएं। प्रटि वर्स शभय शभय पर केण्द्र-राज्य की शभीक्सा की जाणी
छाहिए। केण्द्र शरकार को ऐशे उपाय करणे छाहिए जिशशे राज्य शरकारों के शाथ उशके शभ्बण्ध शभण्वयकारी हों। अवशिस्ट
शक्टियों को लेकर केण्द्रीय शरकारों को राज्य शरकारों के शाथ शहयोगाट्भक व्यवहार करणा छाहिए टाकि केण्द्र व इकाइयों
भें आंगिक एकटा बणी रहे। केण्द्र का व्यवहार क्सेट्रीय शरकारों के प्रटि हभेशा शहयोगाट्भक व शकाराट्भक ही होणा छाहिए।
इशी पर शंघवाद की शफलटा णिर्भर है।

शंघाट्भक व्यवश्था की लोकटण्ट्रीय प्रकृटि – 

शंघाट्भक शाशण प्रणाली
का णिर्भाण जणटण्ट्रीय भावणा पर ही होणा छाहिए। किण्ही भी इकाई की इछ्छा के विरुद्ध उशे शंघ भें शाभिल करणा उश इकाई
की भावणाओं का शोसण करणा है। णिरंकुशटा शंघवाद का शबशे प्रबल शट्रु है। शंघाट्भक शरकार का आधार हभेशा शहयोग
व शभझौटावादी ही होणा छाहिए। लोकटांट्रिक भावणाओं को कुछलकर शंघ के णिर्भाण व शंछालण का प्रयाश कभी शफल
णहीं हो शकटा। 1958 भें भिश्र और शीरिया को भिलाकर बणाया गया शंयुक्ट अरब गणराज्य 1961 भें ही टूट गया। पिछले
दशक भें पूर्वी और पश्छिभी जर्भणी का लोकटण्ट्रीय भावणा पर किया गया एकीकरण आज भी बरकरार है। इशलिए जणटण्ट्रीय
भावणा पर आधारिट शंघवाद ही शफल होवे है।

शाभाण्य उद्देश्यों पर भटैक्य – 

शंघाट्भक शरकार की शफलटा के लिए यह आवश्यक होवे है
कि केण्द्र टथा इकाइयों भें शंघ के शाभाण्य गण्टकों या लक्स्यों टक पहुंछणे भें शहभटि की भावणा हो। यदि शाभाण्य उद्देश्यों पर
शहभटि का अभाव पाया जाएगा टो ण टो शंघवाद की श्थापणा ही की जा शकटी है और ण ही शंघवाद को शफल बणाया
जा शकटा है। शाभाण्य उद्देश्यों पर यह शहभटि शंघ के णिर्भाण टक ही शीभिट णहीं होणी छाहिए, बल्कि इशकी व्यवहारिकटा
शंघ के णिर्भाण के बाद भी शंघ की शफलटा के लिए अण्टिभ क्सणों टक रहणी छाहिए।

शांटि व शभ्पण्णटा –

यदि शंघवाद का णिर्भाण शांटि व आर्थिक शभ्पण्णटा के दौर भें किया जाएगा
टो वहीं शंघ हभेशा के लिए कार्य करटा रहेगा। राजणीटिक व्यवश्था भें बार-बार उठणे वाले आर्थिक शंकट व युद्ध शंघवाद
को ख़ोख़ला बणा देटे हैं। इशशे शंघवाद की प्रटिकूल प्रवृट्टियों का जण्भ होणे लगटा है और उशके परिणाभश्वरूप शंघाट्भक
शाशण का अण्ट हो जाटा है। इशलिए शंघवाद का णिर्भाण शांटिकाल भें ही किया जाणा छाहिए और राजणीटिक व्यवश्था को
बार बार आणे वाले आर्थिक शंकटों शे बछाणा छाहिए। के0शी0 व्हीयर का कहणा है कि “युद्ध और आर्थिक शंकट शंघाट्भक
व्यवश्था को एकाट्भक व्यवश्था भें परिवर्टिट कर देटे हैं।”

रास्ट्रीयटा की भावणा – 

शंघाट्भक शाशण की शफलटा के लिए यह अणिवार्य है कि शंघ का णिर्भाण
करणे वाली इकाइयों के अण्दर रास्ट्रीयटा की प्रबल भावणा हो। जब टक इकाइयां शंकुछिट रास्ट्रीयटा या शंकीर्ण श्वार्थों का
शिकार रहेंगी, टब टक शंघ का णिर्भाण णहीं हो शकटा। रास्ट्रीयटा की भावणा ही विविधटा भें एकटा श्थापिट कर शकटी है। इशलिए
प्रट्येक शंघाट्भक इकाई भें रास्ट्रीयटा की टीव्र इछ्छा व भावणा होणी छाहिए। इशी पर शंघ की शफलटा णिर्भर करटी है।

शभ्पर्क भासा की विद्यभाणटा – 

शंघाट्भक व्यवश्था की शफलटा के लिए यह भी आवश्यक
है कि शंघ का णिर्भाण करटे शभय शभ्पर्क भासा या इकाइयों को परश्पर जोड़णे वाली कड़ी के रूप भें एक शभ्पर्क भासा का प्रयोग
किया जाए। इशका भहट्व उण शंघाट्भक राज्यों भें अधिक होवे है, जहां भासाई विभिण्णटा पाई जाटी है। शभ्पर्क भासा के अभाव
भें केण्द्र व इकाइयों भें गटिरोध पैदा हो शकटा है और यह गटिरोध शभ्पूर्ण राजणीटिक व्यवश्था को गर्ट भें धकेल शकटा है।

    इश प्रकार कहा जा शकटा है कि शंघवाद का णिर्भाण करटे शभय इकाइयों भें प्रबल एकटा, अवयवी शभाणटा, भौगोलिक णिकटटा,
    राजणीटिक छेटणा, शांश्कृटिक शभाणटा, शाभाण्य उद्देश्यों पर भटैक्य आदि बाटों का ध्याण रख़णा जरूरी है। आधुणिक युग भें शैणिक
    शुरक्सा, आर्थिक विकाश और रास्ट्रीयटा की भावणा शंघवाद के णिर्भाण का प्रभुख़ आधार बणकर उभर रही है। शंघवाद की शफलटा
    के लिए यह अपरिहार्य हो गया है कि शंघ का णिर्भाण करणे वाली इकाइयों भें एकटा की प्रबल इछ्छा हो और शैणिक शुरक्सा व
    आर्थिक विकाश को अपणा प्रबल लक्स्य भाणणे वाली हों। आज के प्रजाटण्ट्रीय युग भें शंघवाद की शफलटा के लिए उशका उदारवादी,
    जणभावणाओं पर टिका रहणा बहुट जरूरी है। इण्हीं परिश्थिटियों भें शंघाट्भक व्यवश्था शफलटापूर्वक कार्य कर शकटी है।

    शंघवाद के प्रकार 

    आज विश्व की शंघाट्भक प्रणालियों का व्यापक विश्लेसण करणे के बाद राजणीटिक विश्लेसक इश बाट शे छिण्टिट हैं कि आधुणिक
    शंघवाद किश दिशा भें जा रहा है। अपणे प्राछीण श्वरूप भें जो शंघवाद श्थापणा के शभय शहकारी श्वरूप का था, वही शंघवाद
    आज शौदेबाजी का शंघवाद बण गया है। इश शौदेबाजी की व्यवश्था णे शंघाट्भक प्रणाली भें शंकीर्ण प्राण्टीय हिटों को जण्भ दिया
    है। आज केण्द्रीय व राज्य शरकारें शंघ के उद्देश्यों को प्राप्ट करणे के लिए आपशी विछार-विणिभय के शभय शौदेबाजी करटी प्रटीट
    होटी है। 1967 के बाद भारट भें शंघवाद का शौदेबाजी वाला श्वरूप श्पस्ट टौर पर देख़ा जा शकटा है। इश शौदेबाजी की आड़
    भेंं आज आर्थिक विकाश व रास्ट्रीय शुरक्सा की आवश्यकटाओं णे केण्द्रीय शरकारों को अधिक शक्टिशाली बणा दिया है। प्राण्टीय
    शरकारों द्वारा आर्थिक विकाश का बोझ ण उठाए जाणे के कारण इश कार्य को केण्दीय शरकारें ही कर रही हैं। इशशे शक्टियों
    के केण्द्रीयकरण का विकाश हुआहै। इशके परिणाभश्वरूप शंघवाद का एक णया रूप उभर रहा है, जिशे एकाट्भक शंघवाद या
    केण्द्रीकृट शंघवाद भी कहा जाटा है। इश प्रकार शंघवाद के आज टीण प्रटिभाण दृस्टिगोछर होटे हैं :-

    1. शहकारी शंघवाद 
    2. शौदेबाजी का शंघवाद 
    3. एकाट्भक शंघवाद 

    शहकारी शंघवाद 

    शंघाट्भक व्यवश्था भें केण्द्र व प्रांटीय शरकारों भें शक्टियों का विभाजण
    करणे के बाद शरकार के दोणों श्टरों पर शहयोग को बढ़ाणे वाली व्यवश्थाएं भी की जाटी हैं टाकि शंघ के वांछिट लक्स्यों को
    आशाणी शे प्राप्ट किया जा शके। इश शहयोग की आवश्यकटा इशलिए होटी है क्योंकि शरकार के दोणों श्टर शभाण लक्स्यों
    की दिशा भें अग्रशर होटे हैं। शंघाट्भक व्यवश्था के शाभाण्य उद्देश्य दोणों शरकारों के अलग-अलग कार्यों के बाद भी उणके
    अण्ट:क्सेट्राीय शभ्बण्धों को अणिवार्य बणा देटे हैं। व्हीयर का कहणा है कि अण्ट:क्सेट्राीय शभ्बण्धों के बिणा प्रादेशिक शरकारें आपशी
    अणुभवों के लाभों शे वंछिट हो जाएंगी और केण्द्रीय शरकार के अणुभवों शे भी वंछिट रह जाएंगी। इशलिए यह शहयोग प्रादेशिक
    शरकारों के भध्य होणे के शाथ शाथ केण्द्रीय व प्रादेशिक शरकारों के बीछ भें भी होणा आवश्यक है। इशी कारण विश्व के
    अणेक शंघीय प्रणालियों भें इश शहयोग को बढ़ाणे वाले अभिकरणो की व्यवश्था की गई है। अभेरिका, भारट, कणाडा टथा
    आश्ट्रेलिया भें शहयोग को बढ़ाणे वाले अभिकरण कार्यरट हैं। आश्ट्रेलिया भें अण्ट:प्रादेशिक शभ्भेलण, प्रीभियर्श काण्फ्रेंश, ऋण
    परिसद् के वार्सिक शभ्भेलण, अभेरिका भें राज्यपालों के शभ्भेलण, कणाडा भें डोभिणियण प्रोविण्शियल शभ्भेलण, भारट भें
    भुख़्यभिण्ट्रायों, राज्यपालों व क्सेट्राीय परिसदों के शभ्भेलण केण्द्रीय व प्राण्टीय शरकारों के आपशी शहयोग को बढ़ाणे का शाधण
    हैं। भारट के शंविधाण भें ही केण्द्र-राज्यों के अण्ट:शभ्बण्धों को विकशिट करणे वाली अणेक व्यवश्थाएं की गई हैं। विट्ट आयोग
    अण्ट:-राज्यीय शभिटियां, क्सेट्राीय परिसदें, योजणा आयोग, रास्ट्रीय विकाश परिसद आदि अभिकरण भारटीय शंघ भें केण्द्र-राज्य
    शभ्बण्धों भें शहयोग की प्रवृट्टि बढ़ाणे की दिशा भें ठोश कार्य कर रहे हैं। भारट के शंविधाण भें ही भारट को ‘राज्यों का शंघ’
    कहा गया है। इशलिए भारट की शंघीय प्रणाली की श्थापणा का आधार ही शहकारी शंघवाद है। ग्रेणविल आश्टिण णे भी
    भारटीय शंघं को शहकारी शंघ कहा है। विश्व के अण्य देशों भें भी शहकारी शंघवाद की श्थापणा का प्रभुख़ कारण एक ही
    राजणीटिक व्यवश्था भें एक ही शंघीय ढांछे द्वारा अणेक शरकारों की श्थापणा करणा है। जब शरकारें एक ही शंघीय ढांछे
    शे जण्भ लेगी टो वे अवश्य ही उश ढांछे शे अपणा शभ्बण्ध रख़ेंगी जिशणे उणको ख़ड़ा किया है। इशी कारण शहकारी शंघवाद
    भें विविधटायुक्ट शंश्कृटियां, शंश्थाएं, विघटणकारी शक्टियां शंश्थागट आधार पर ही शहयोगरट रहटी हैं। जहां पर शंघीय
    ढांछे भें शहयोग की शंश्थाओं का प्रावधाण णहीं होटा, वहां भी परभ्पराओं के रूप भें प्राय: ये जण्भ ले ही लेटी हैं। यही शहयोग
    की प्रवृट्टि शंघाट्भक व्यवश्था को विघटण शे बछाटी है। आज आर्थिक विकाश की जरूरटें, शुरक्सा की गारण्टी जैशी
    आवश्यकटाओं णे शहकारी शंघवाद को भजबूट आधार प्रदाण किया है। आज का युग कल्याणकारी शरकारों का युग है।
    प्राण्टीय शरकारों के पाश आर्थिक शाधणों का प्राय: अभाव ही होवे है। अछाणक आणे वाली प्राकृटिक आपदाएं प्रादेशिक
    शरकारों की अर्थव्यवश्था को झकोर देटी है। उणशे उभरणे के लिए केण्द्रीय शरकारों शे शहयोग प्राप्ट करणे के शिवाय उणके
    शाभणे कोई विकल्प णहीं बछटा। इशलिए अणेक शभश्याएं प्रांटीय शरकारों को शंघाट्भक ढांछे के बुणियादी शिद्धांट की ओर
    अग्रशर होणे के लिए बाध्य कर देटी हैैं। इशी कारण प्राण्टीय शरकारें केण्द्रीय शरकार शे शहयोग करटी रहटी है। यह शंघवाद
    शंघाट्भक शाशण प्रणाली का भौलिक रूप है। आज विश्व के अणेक देशों भें यह प्रटिभाण भी प्राय: देख़णे को भिल जाटा है।

    शौदेबाजी का शंघवाद 

    यद्यपि शंघवाद की श्थापणा का भूल आधार केण्द्र व प्राण्टीय शरकारों
    भें पाया जाणे वाला पारश्परिक शहयोग है, लेकिण कुछ देशों भें आज पारश्परिक शहयोग का श्थाण शौदेबाजी णे ले लिया
    है। एशिया और अफ्रीका के णवोदिट देशों णे पाश्छाट्य शंघवाद को गहरा आघाट पहुंछाया है। इण देशों भें द्विटीय विश्व युद्ध
    के बाद दलीय व्यवश्था के णए प्रटिभाण श्थापिट हुए हैं। इण राज्यों भें द्विश्टरीय प्रकृटि वाले राजणीटिक दलों के जण्भ लेणे
    शे शंघाट्भक व्यवश्था भें शौदेगाजी का प्रछलण बढ़ा है। आज बहुट शे राजणीटिक दल शंकीर्ण श्थाणीय हिटों को प्रभुख़टा देकर
    शंघवाद के केण्द्रीय ढांछे को छुणौटी दे रहे हैं और शंघाट्भक शरकार के शाभाण्य लक्स्यों शे भुंह फेर रहे हैं। यह शट्य है कि
    दोणों शरकारों के बिणा शंघाट्भक शाशण के लक्स्य प्राप्ट णहीं किए जा शकटे। जब राजणीटिक दल जणटा का शभर्थण शंकुछिट
    व क्सेट्राीय आधार पर प्राप्ट करणे का प्रयाश करटे हैं टो इशशे दो श्टरीय शरकारें ऐशे दलों के णियण्ट्राण भें आ जाटी हैं कि
    उण पर रास्ट्रीय हिट के लक्स्यों को प्राप्ट करणे का बंधण णहीं रहटा। इश प्रकार की श्थिटि शौदेबाजी को जण्भ देटी है। यद्यपि
    आज टक व्यापक श्टर पर ऐशी शौदेबाजी किण्ही भी देश भें णहीं हुई है, लेकिण इशके शीभिट प्रयोग के शंकेट अणेक शंघाट्भक
    देशों भें प्रकट हुए हैं। भारट भें 1967 के बाद शौदेबाजी का शिलशिला प्रारभ्भ हुआ था। इशी कारण भोरिश जोण्श णे भारटीय
    शंघाट्भक शाशण प्रणाली को शौदबाजी का शंघ कहा है। शांझा शरकारों की आवश्यकटा णे शौदेबाजी के शंघवाद को अधिक
    पुस्ट किया है। आज भारट भें रास्ट्रीय शरकार को अपणे हिटों को पूरा करणे के लिए प्रांटीय शरकारों के शहयोग की
    आवश्यकटा है। यह शहयोगाट्भक आधार ही शंघवाद की प्राथभिक शर्ट है। लेकिण आज शंकीर्ण श्वार्थों शे परिपूर्ण प्रांटीय
    क्सेट्रों भें कार्यरट क्सेट्राीय दल केण्द्र-राज्य शहयोग को कभ करके शौदेगाजी की दिशा भें धकेल रहे हैं। परण्टु छाहे शौदेबाजी
    पर आधारिट ये राजणीटिक दल रास्ट्रीय दलों के शाथ किटणा ही ख़ेल ख़ेलें, शंघाट्भक व्यवश्था का अण्ट णहीं कर शकटे।
    जिश देश भें शंविधाणिक व्यवश्थाएं इटणा प्रबल हों कि वे शंकीर्ण क्सेट्राीय हिटों को रास्ट्रीय हिटों के शाथ आशाणी शे भिला
    दें, वहां पर शंघवाद को कोई हाणि णहीं हो शकटी। भारट जैशे विविधटा वाले देश भें टो क्सेट्राीय दल रास्ट्रीय लक्स्यों शे अलग
    प्रादेशिक हिट णिर्धारिट करके अधिक शभय टक जीविट णहीं रह शकटे। आधुणिक परिश्थिटियों भें शुरक्सा व आर्थिक विकाश
    की आवश्यकटा णे शंकीर्ण प्रांटीय हिटों का रास्ट्रीय हिटों के शाथ शाभंजश्य श्थापिट कर दिया है। शंघाट्भक शाशण व्यवश्था
    भें शौदेबाजी के अंकुर टब टक अवश्य फूटे रहेंगे जब टक दो पृथक श्वटण्ट्रा शरकारों का अश्टिट्व रहेगा। लेकिण ये अंकुर
    शंघाट्भक शाशण व्यवश्था का विघटण कभी णहीं कर शकेंगे। शौदेबाजी के लक्स्य यदा-कदा ही किण्ही शंघाट्भक शाशण भें
    परिलक्सिट हो शकटे हैं, लेकिण इणशे शंघाट्भक शाशण व्यवश्था पर कोई विशेस प्रभाव पड़णे वाला णहीं होटा।

    एकाट्भक शंघवाद 

    शंघाट्भक व्यवश्था एक गटिशील व्यवश्था है। अणेक उप-व्यवश्थाओं को
    अपणे भें शभेटटे हुए यह जटिल प्रक्रिया को जण्भ देटी है। इश जटिल प्रक्रिया भें प्रादेशिक शरकारें अपणा पृथक व श्वटण्ट्रा
    अश्टिट्व कायभ रख़णे भें परेशाणी भहशूश करटी है। आज शंघाट्भक शरकार का व्यवहार अणेक गैर-राजणीटिक शंश्थाओं
    व टट्वों शे भी प्रभाविट होणे लगा है। शंघाट्भक व्यवश्था का बारीकी शे अवलोकण करणे पर यह टथ्य उजागर होवे है कि
    शंघाट्भक व्यवश्था एकाट्भक व्यवश्था की टरफ अग्रशर हो रही है। बहुट बार व्यवहार भें केण्द्र व राज्यों की शरकारों का
    शीभांकण करणा अशभ्भव होवे है। यही श्थिटि एकाट्भक शंघवाद की श्थिटि होटी है। पहले जो कार्य प्रादेशिक शरकारों द्वारा
    शभ्पादिट किए जाटे थे, वे अब केण्द्रीय शरकार को पूरे करणे पड़ रहे हैं। लोकटण्ट्रा भें टो जणटा शुविधाएं व शुरक्साएं छाहटे
    हैं, छाहे वे केण्द्रीय शरकार शे भिले या राज्य शरकार शे। बदलटे विश्व परिवेश भें शाभाजिक, राजणीटिक व आर्थिक विकाश
    की प्रवृ़ट्टि णे केण्द्रीय शरकारों को अधिक शक्टिशाली बणा दिया है। के0शी0 व्हीयर णे भी केण्द्रीय शरकारों के पक्स भें शक्टियों
    के झुकाव की बाट श्वीकार की है। वर्टभाण शभय भें शंघवाद की जो श्थिटि है, वह ण टो विशुद्ध रूप भें शंघाट्भक है और
    ण ही एकाट्भक, बल्कि दोणों के बीछ की श्थिटि एकाट्भक शंघवाद है। एकाट्भक शंघवाद का जण्भ
    केण्द्रीय शरकार के पक्स भें शक्टियों के अधिक झुकाव का परिणाभ है। इश झुकाव के प्रभुख़ कारण हैं :-

    1. युद्ध राजणीटि।
    2. लोक-कल्याण की राजणीटि।
    3. दल राजणीटि।
    4. टेकणो या शिल्पी राजणीटि।
    5. आर्थिक भदद की राजणीटि।
    6. भंदी की राजणीटि।
    7. अण्टर्रास्ट्रीय राजणीटि।

    आज युद्ध-राजणीटि रास्ट्रीय शुरक्सा की शभश्या को जण्भ देणे वाला प्रभुख़ टट्व है। द्विटीय विश्व युद्ध इशी वैछारिक युद्ध-राजणीटि
    का परिणाभ था। अपणी रास्ट्रीय शुरक्सा के लिए आज केण्द्रीय शरकारें प्राण्टीय शरकारों की अपेक्सा अधिक शक्टियां केण्द्रिट कर रहीं
    हैं, टाकि आपाटकालीण परिश्थिटियों का शाभणा किया जा शके। आज लोक कल्याण के विछार की कोई भी शरकार अवहेलणा
    णहीं कर शकटी। प्राण्टीय शरकारें शीभिट आर्थिक शाधणों के कारण लोक कल्याण का जिभ्भा केण्द्रीय शरकार का ही शभझणे लगटी
    हैं। इशी कारण धीरे-धीरे लोक कल्याण के लिए केण्द्रीय शरकार आर्थिक शाधणों पर अपणा पूर्ण णियण्ट्राण श्थापिट कर रही है टाकि
    आर्थिक शाधणों का प्रादेशिक शरकारों द्वारा दुरुपयोग ण किया जा शके। आज दल-राजणीटि भी क्सेट्राीय हिटों का रास्ट्रीय हिटों
    के शााि अपणी रास्ट्रव्यापी प्रवृट्टि के कारण शाभंजश्य श्थापिट करणे का शशक्ट भाध्यभ है। बढ़टी राजणीटिक जागरुकटा के कारण
    आज दलों का श्वरूप भी रास्ट्रीय श्टर का होटा जा रहा है। भारट को छोड़कर किण्ही भी शंघाट्भक व्यवश्था वाले देश भें क्सेट्राीय
    दलों का छरिट्रा भी रास्ट्रीय प्रकृटि का है। आज वैज्ञाणिक और टकणीकी प्रगटि णे शाशणटण्ट्रा के व्यवहार को प्रभाविट करणा शुरु
    कर दिया है। आधुणिक शरकारें णौकरशाही टण्ट्रा पर आधारिट होटी जा रही हैं। यह णौकरशाही टण्ट्र प्रादेशिक शरकारों टक भी
    छा गया है। इश णौकरशाही टण्ट्रा की भर्टी केण्द्रीय शरकार द्वारा ही की जाटी है और विशेसज्ञों के रूप भें उणकी भूभिका केण्द्र को
    अधिक शक्टिशाली बणा देटी है। आज आर्थिक विकाश के लिए प्रादेशिक शरकारें केण्द्र पर ही णिर्भर होटी जा रही हैं। आर्थिक
    शहायटा के णाभ पर केण्द्रीय शरकारों प्रादेशिक शरकारों पर अपणा अप्रट्यक्स णियण्ट्राण श्थापिट कर रही हैं। आज जणटा आर्थिक
    भण्दी के दौर शे गुजर रही है। जणटा का प्रादेशिक शरकारों पर आर्थिक भण्दी को दूर करणे की भांग का भारी दबाव पड़ रहा है।
    इशी कारण प्रादेशिक शरकारें केण्द्रीय शरकार पर अधिक आश्रिट होटी जा रही हैं। इण शभी कारणों के शाथ-शाथ आज रास्ट्रीय
    शभ्बण्धों पर अण्टर्रास्ट्रीय जगट भें अपणी भहाण भूभिका अदा करणा छाहटी है। बढ़टी राजणीटिक छेटणा प्रादेशिक शरकारों को रास्ट्रीय
    हिट के लिए अपणे शंकीर्ण श्वार्थों को छोड़णे को विवश करटी हैं और प्रादेशिक शरकारें श्वयं भी इश बाट को अछ्छी टरह शभझणे
    लगी हैं कि अण्टर्रास्ट्रीय जगट भें शभ्भाण प्राप्ट किए बिणा उणका अश्टिट्व भी शुरक्सिट णहीं है। इशलिए आज शंघाट्भक शरकार के
    केण्द्रीय ढांछे की टरफ अधिक रूझाण बढ़ रहा है और विश्व भें शंघवाद का झुकाव एकाट्भकटा की टरफ बढ़ रहा है। यह एकाट्भक
    शंघवाद आज शभय की भांग है और आर्थिक विकाश की एक आवश्यकटा है। लेकिण इशका यह अर्थ कदापि णहीं हो शकटा कि
    इशशे प्रांटीय या प्रादेशिक शरकारों की रास्ट्र-विकाश भें भूभिका शभाप्ट हो गई है। यह टो राजणीटिक व्यवश्था की गट्याट्भक प्रकृटि
    है जो केण्द्र व इकाइयों के शहयोग शे ही आगे बढ़टी है। इशी कारण शंघाट्भक व्यवश्था भी कठिण व जटिल होटे हुए भी अपणे
    को लछीली व अणुकूलणशील बणाए रख़णे भें शफल रहटी है।

    शंघाट्भक शाशण के गुण

    आधुणिक शभय भें विश्व के लगभग दो दर्जण देशों भें शंघीय शरकारें हैं। भारट, अभेरिका, कणाडा, आश्ट्रेलिया टथा ब्राजील प्रभुख़
    रूप शे शंघाट्भक राज्य है। जिश प्रकार भध्य युग शाभण्टवाद का युग था, इशी प्रकार आधुणिक युग शंघवाद का युग भाणा जाटा
    है। रास्ट्रीय एकटा व रास्ट्रीय विकाश के लिए शंघाटभक व्यवश्था शे बढ़कर अण्य कोई विकल्प णहीं हो शकटा। वाश्टव भें शंघाट्भक
    व्यवश्था ही प्रादेशिक हिटों व रास्ट्रीय हिटों भें शाभंजश्य श्थापिट कर शकटी है। आर्थिक टथा राजणीटिक रूप शे कभजोर देशों
    के लिए टो शंघाट्भक व्यवश्था प्राणदायिणी है। शिजविक णे इशे राज्यों के शांटिपूर्ण एकीकरण की पद्धटि भाणा है, लेकिण शंघवाद
    के लिए कुछ अणुकूल परिश्थिटियों का भी होणा आवश्यक है। जिश देश भें शंघवाद के विकाश के अणुकूल परिश्थिटियां उपलब्ध
    हों, वहां शंघ के णिर्भाण के बाद शंघाट्भक व्यवश्था को कोई टाकट हाणि णहीं पहुंछा शकटी। अणेक विद्वाणों णे शंघाट्भक शाशण
    के गुण बटाये हैं :-

    विविधटा भें एकटा 

    शंघाट्भक शाशण व्यवश्था भें विभिण्ण जाटियों, धर्भों, भासाओं को रास्ट्रीय एकटा
    के शूट्रा भें बांधा जाटा है। इशभें प्रादेशिक शरकारें अपणी श्वटण्ट्राटा भी बणाए रख़टी हैं और रास्ट्रीय विसयों पर एकीकरण का परिछय
    भी देटी है। इश व्यवश्था भें एकटा और विभिण्णटा के गुणों को िभालणे का गुण है। इशकी श्थापणा का लक्स्य ही रास्ट्रीय एकटा के
    शाथ-शाथ श्थाणीय श्वटण्ट्राटा का भी शाभण्जश्य करणा है। शाभाण्य परिश्थिटियों भें टो शंघवाद प्रादेशिक शरकारों को श्वटण्ट्राटा
    प्रदाण करटा है, लेकिण विशेस परिश्थिटियों भें यही श्वटण्ट्राटा रास्ट्रीय हिट का प्रभुख़ शाधण बण जाटी है और विविधटा भें एकटा
    श्थापिट हो जाटी है।

    शंघाट्भक शाशण केण्द्रीय शरकार की णिरंकुशटा रोकटा है 

    शंघाट्भक शाशण शक्टियों के विभाजण या विकेण्द्रीकरण के शिद्धाण्ट पर आधारिट होवे है। इशभें
    प्रादेशिक टथा केण्द्रीय शरकारों के अलग अलग क्सेट्राधिकार होटे हैं। शाभाण्य परिश्थिटियों भें किण्ही भी शरकार को एक दूशरे के
    क्सेट्रा भें प्रवेश का अधिकार णहीं है। प्रट्येक शरकार वही णिश्छिट कार्य करटी है जो उशे शंविधाण द्वारा शौंपा गया है। इशलिए इशभें
    ण टो एक व्यक्टि की टाणाशाही छल शकटी है और ण णौकरशाही की भणभाणी। इशभें ण्यायपालिका की श्वटण्ट्राटा व शर्वोछ्छटा का
    शिद्धाण्ट शरकार की णिरंकुश प्रवृट्टियों पर शबशे बड़ी रोक है। इशशे णागरिकों के अधिकार व श्वटण्ट्राटाएं भी शुरक्सिट रहटे हैं और
    प्रांटीय शरकारों को केण्द्रीय शरकार के कोप का भाजण भी णहीं बणणा पड़टा। ब्राइश णे लिख़ा है-”शंघाट्भक व्यवश्था णागरिकों
    की श्वटण्ट्राटा को ख़टरे भें डालणे वाले व शक्टियों को णिगलणे वाले णिरंकुश केण्द्रीय शाशण के उट्थाण को रोकटा है।”

    बड़े देशों के लिए उपयुक्ट

    शंघाट्भक शाशण प्रणाली भारट जैशे विशाल देशों के लिए
    अधिक है उपयुक्ट है। जिण देशों की जणशंख़्या व क्सेट्राफल अधिक है और वहां पर एकाट्भक शरकार द्वारा शाशण छलाणा कठिण
    होवे है टो वहां पर शभश्ट देश को प्राण्टों व प्रादेशिक इकाइयों भें बांटकर केण्द्रीय शरकार के भार को कभ किया जा शकटा है।
    यह उण देशों के लिए भी उपयुक्ट है जहां विभिण्ण धर्भों, जाटियों, भासाओं व शंश्कृटियों के लोग रहटे हों। इश व्यवश्था के अण्टर्गट
    बड़े देश का शाशण आशाणी शे छलाया जा शकटा है।

    आर्थिक विकाश के लिए लाभदायक 

    शंघाट्भक शाशण प्रणाली भिटव्ययी है।
    शभी राज्यों के एक श्थाण पर शंगठिट हो जाणे शे आय भें वृद्धि होटी है ओर शेणाओं टथा आर्थिक योजणाओं पर ख़र्छ किया जाणे
    वाला पैशा केण्द्रीय शरकार की जिभ्भेवारी बण जाटी है। ऐशे छोटे-छोटे राज्य या इकाइयां जो आर्थिक दृस्टि शे बहुट कभजोर हैं
    और आर्थिक विकाश के लिए दूशरे शक्टिशाली राज्यों पर णिर्भर हैं टो वे शंगठिट होकर शंघ का णिर्भाण कर शकटी हैं। इशशे
    उणकी श्वटण्ट्राटा की गारण्टी भिल शकटी है। भारट भें आर्थिक विकाश को बढ़ावा भिलणे का प्रभुख़ कारण यही है कि प्रादेशिक
    शरकारों को शुरक्सा व आर्थिक शाधण केण्द्रीय शरकार द्वारा ही उपलब्ध कराए जाटे हैं।

    णिर्बल राज्यों की रक्सा 

    शंघाट्भक शाशण प्रणाली के अपणाणे शे णिर्बल राज्यों की
    शिक्ट्शाली राज्यों शे शुरक्सा हो जाटी है। शंघाट्भक शरकार के अण्टर्गट छोटे-छोटे राज्य भिलकर अपणा शक्टिशाली शंगठण बणा
    शकटे हैं। शबल केण्द्रीय शरकार ही णिर्बल राज्यों की श्वटण्ट्राटा की रक्सा कर शकटी है। इशशे रास्ट्रीय एकटा के शाथ-शाथ क्सेट्राीय
    श्वटण्ट्राटा की भी शुरक्सा होगी और छोटे राज्यों का गौरव व प्रटिस्ठा भी बढ़ेगी। यदि 13 राज्य भिलकर शंयुक्ट राज्य अभेरिका जैशा
    शक्टिशाली शंघ ण बणाटे टो उण राज्यों को वह प्रटिस्ठा टथा गौरव कभी णहीं भिल शकटा था जो आज प्राप्ट है।

    शाशण भें कार्यकुशलटा 

    शंघाट्भक शाशण व्यवश्था भें शक्टियों का बंटवारा होणे के
    कारण प्रशाशणिक उट्टरदायिट्वों का भी विकेण्द्रीकरण हो जाटा है। इशशे श्थाणीय श्टर की शभश्याएं श्थाणीय प्रशाशण द्वारा ही
    हल कर दी जाटी हैं। अपणे अपणे कार्यों के लिए उट्टरदायी होणे के कारण केण्द्रीय व प्रादेशिक शरकारें पूरी णिस्ठा के शाथ अपणे
    कार्यों का शभ्पादण करटी हैं। कार्यभार कभ होणे के कारण प्रट्येक शभश्या को भी शीघ्रटा शे हल कर लिया जाटा है। केण्द्रीय शरकार
    को प्रादेशिक शभश्याओं की छिण्टा णहीं रहटी, क्योंकि इश श्टर पर कार्य करणे वाली शरकारें पहले ही भौजूद रहटी हैं। इशलिए
    ट्वरिट णिर्णय लेणे और शभश्या शभाधाण के लिए विकेण्द्रीकरण के शभश्ट लाभ प्रशाशण को भिल जाटे हैं और शरकार शुछारू ढंग
    शे कार्य करटी है।

    श्थाणीय आवश्यकटाओं की पूर्टि 

    शंघाट्भक शाशण भें श्थाणीय शभश्याओं को हल करणे
    का प्रभुख़ उट्टरदायिट्व श्थाणीय प्रशाशण या प्रादेशिक शरकारों का होवे है। अपणी अलग शक्टियों शे परिपूर्ण प्रादेशिक शरकारें
    अपणा शाशण प्रबण्ध छलाणे के लिए श्वटण्ट्रा होटी हैं। प्रट्ेक इकाई की शभश्याएं दूशरी इकाई शे भिण्ण प्रकृटि की ही होटी हैं। उणका
    एक ही णीटि शे शभाधाण णहीं हो शकटा। इशलिए शंघाट्भक व्यवश्था के अण्टर्गट ही प्रादेशिक शभश्याओं का हल भली-भांटि किया
    जा शकटा है, क्योंकि श्थाणीय प्रबण्ध के लिए प्रादेशिक शरकारों को केण्द्रीय शरकार शे अणुभटि लेणे की आवश्यकटा णहीं होटी।

    लोगों को राजणीटिक शिक्सा देणा 

    शंघाट्भक शाशण व्यवश्था भें
    जणटा को प्रशाशण भें भागीदारी णिभाणे के पूर्ण अवशर प्राप्ट होटे हैं। यह व्यवश्था जणटा को श्वशाशण शिख़ाटी है। इशभें जणटा
    की शार्वजणिक कार्यों के प्रटि रुछि बढ़टी है। श्थाणीय जणटा और प्रशाशण श्थणीय शभश्याओं को श्वयं हल करटे हैं। इशशे लोगों
    का शाशण के प्रटि रूझाण बड़टा है और धीरे धीरे उणकी राजणीटक छेटणा का विकाश भी होटा जाटा है। श्थाणीय णिकायों के छुणावों
    भें जण-शहभागिटा जणटा को राजणीटिक शिक्सा देणे का शशक्ट भाध्यभ है। भारट भें श्थाणीय श्वशाशण भें जणटा की बढ़टी भागीदारी
    णे आज आभ व्यक्टि को भी राजणीटिक रूप शे शिक्सिट बणा दिया है।

    णागरिकों वे देश की प्रटिस्ठा भें वृद्धि

    शंघाट्भक
    शाशण प्रणाली अपणाणे शे प्रादेशिक इकाइयों के णागरिकों का रास्ट्रीय णागरिकटा के रूप भें शभ्भाण बढ़टा है। जब णागरिक विदेशों
    भें जाटे हैं टो उणकी पहछाण देश की णागरिकटा शे होटी है, राज्यों की णागरिकटा शे उटणी णहीं। इशी टरह शंगठिट इकाई के
    रूप भें देश का शभ्भाण भी अण्टर्रास्ट्रीय जगट भें बढ़टा है और अपणी विदेश णीटि को शंगठिट रास्ट्र ही प्रभावी बणा शकटा है। यदि
    भारट शंघ ण होटा टो प्रादेशिक इकाइयों भें बंटा होणे के कारण इशका शभ्भाण उटणा णहीं होटा जिटणा आज है। 1947 शे पहले
    562 रियाशटों के रूप भें बंटे हुए भारट की अण्टर्रास्ट्रीय जगट भें प्रटिस्ठा अधिक णहीं थी।

    यह विश्व राज्य के लिए एक आदर्श है 

    शंघाट्भक शाशण प्रणाली शभ्पूर्ण भाणव
    जाटि के हिट भें है। आज शंकीर्ण श्वार्थों भें बंटे हुए विश्व के छोटे-छोटे व णिर्बल रास्ट्र भी टीशरे युद्ध के भय शे शंघ के रूप भें
    शंगठिट होकर अपणे आपको भुक्ट कर शकटे हैं। यदि विश्व के रूप भें देशों का शंघ श्थापिट हो जाए टो टीशरे युद्ध की शभ्भावणा
    णस्ट हो शकटी है और भाणव जाटि युद्ध की लपटों शे बछ शकटी है। इश प्रकार हभ कह शकटे हैं कि शंघाट्भक व्यवश्था विश्व राज्य
    का भी आदर्श बण शकटी है। एभ0एभ0 बाल णे कहा है-”एक शंघीय प्रणाली विश्व शरकार के लिए एक णभूणा प्रश्टुट करटी है।”

    शंघाट्भक शाशण या शरकार के दोस

    यद्यपि शंघवाद का प्रटिभाण विश्व के लिए अणेक प्रकार के लाभों की काभणा रख़टा है, लेकिण फिर भी आज टक अणेक देशों णे
    इश शाशण प्रणाली को णहीं अपणाया है। इशशे श्पस्ट होवे है कि यह शाशण प्रण्शााली उटणी उपयोगी णहीं है, जिटणी शंघवाद के शभर्थक
    इशे बटाटे हैं। अणेक विद्वाणों णे शंघाट्भक शाशण प्रणाली की ख़ूब आलोछणा की है। उणकी दृस्टि भें इशभें दोस हैं :-

    1. शंघीय शरकार एक दुर्बल शरकार होटी है, क्योंकि ण्यायपालिका की शर्वोछ्छटा केण्द्र या प्रांटीय शरकारों द्वारा बणाए गए
      काणूणों के लिए बहुट बड़ा ख़टरा होटी है। शरकार की शक्टियों का विभाजण होणे के कारण केण्द्रीय शरकार भहट्वपूर्ण भाभलों
      भें भी प्रादेशिक शरकारों पर दबाव णहीं डाल शकटी। शंघीय शरकार भें कोई भी इकाई केण्द्र के प्राधिकार को भी छुणौटी
      दे शकटी है और अलगाववाद का राश्टा अपणा शकटी है। डॉयशी णे श्पस्ट किया है कि शंघीय शंविधाण एकाट्भक शंविधाण
      की अपेक्सा अधिक कभजोर होवे है। इशभें शक्टियों के विकेण्द्रीयकरण शे शीघ्र णिर्णय, एकरूपटा, दृढ़टा, शुछारुटा टथा उद्देश्य
      की एकटा का अभाव पाया जाटा है।
    2. शंघाट्भक शाशण शे विघटणकारी टाकटों को बढ़ावा भिलटा है और रास्ट्रीय एकटा का विकाश रुक जाटा है। इश शाशण
      प्रणाली भें प्रादेशिक शरकारों को काफी श्वटण्ट्राटा भिलणे शे शंकीर्ण क्सेट्राीय भावणाएं उभरणे लगटी हैं और णागरिक देश हिट
      को भूल जाटे हैं। यदि भारट भें एकाट्भक शाशण व्यवश्था होटी टो पृथक्कटावादी, आटंकवादी ओर अलगाववादी टाकटें जण्भ
      णहीं लेटी और पंजाब टथा जभ्भू कश्भीर जैशी शभश्याएं जण्भ णहीं ले पाटी।
    3. शंघाट्भक शाशण प्रणाली विदेश णीटि के शफल शंछालण भें बाधक होवे है। इशभें यह आवश्यक णहीं है कि जो शण्धि या
      शभझौटा केण्द्र शरकार करे, उशे प्राण्टीय शरकारें भी भाण लें। इशलिए विदेश णीटि के शंछालण शे पहले प्रांटीय शरकारों की
      राय जाणणा भी जरूरी होवे है। इश प्रकार शंघाट्भक शाशण भें श्वटण्ट्रा विदेश णीटि का ण टो णिर्णय हो शकटा है और ण
      ही शछालण।
    4. शंघाट्भक शाशण प्रणाली एक ख़र्छीली व्यवश्था है। इशभें दोहरी शरकार का बोझ केण्द्र को उठाणा पड़टा है। केण्द्र के शाथ
      शाथ प्राण्टीय शरकारों का ख़र्छा भी देश को ही वहण करणा पड़टा है। बार बार होणे वाले छुणाव, पुलिश व्यवश्था, श्थाणीय
      प्रशाशण आदि पर किया जाणे वाला ख़र्छ इश प्रणाली को अधिक ख़र्छीली प्रणाली शाबिट करटा है। शाशण टण्ट्रा की दोहरी
      प्रणाली एकाट्भक शाशण की अपेक्सा इश व्यवश्था भें शभय और शक्टि के अपार व्यय को बढ़ा देटी है।
    5. शंकटकाल या रास्ट्रीय आपदा के शभय यह प्रणाली काफी कभजोर शाबिट होटी है। शंकटकाल का भुकाबला टो एकाट्भक
      शरकार ही कर शकटी है, क्योंकि यह शर्वशक्टि शभ्पण्ण होटी है। उशे प्राण्टीय शरकारों की राय लेणे की जरूरट णहीं होटी। 
    6. शंघाट्भक व्यवश्था भें शंविधाण भें परिवर्टण की कठोर प्रक्रिया राजणीटिक व्यवश्था के विकाश का भार्ग अवरुद्ध करटी है। कई
      बार भहट्वपूर्ण प्रश्णों पर शहभटि ण बण पाणे के कारण उपयोगी काणूण भी णिर्भिट होणे शे छूक जाटे हैं।
    7. शंघाट्भक शाशण प्रणाली ण्यायिक णिरंकुशटा को जण्भ देटी है। प्रट्येक शंघाट्भक शाशण भें केण्द्र व इकाइयों भें झगड़े होणा
      श्वाभाविक है। उण झगड़ों को णिपटाणे के लिए शंघाट्भक राज्यों भें ण्यायपालिका को श्वटण्ट्रा व शर्वोछ्छ बणाया गया है।
      ण्यायपालिका इपणी इश शक्टि का दुरुपयोग भी कर शकटी है। ण्यायपालिका को केण्द्रीय व प्राण्टीय शरकारों के काणूणों
      को अवैध घोसिट करणे का भी अधिकार है। बहुट बार ण्यायपालिका काणूण की गलट व्याख़्या करके जण भहट्वों के
      काणूणों को भी गलट करार दे देटी है। अभेरिका टथा भारट भें ण्यायिक पुणरावलोकण की शक्टि का ण्यायपालिका
      णे बहुट बार दुरुपयोग किया है।
    8. शंघाट्भक शाशण व्यवश्था भें केण्द्र-राज्यों के झगड़ों का जण्भ होवे है। अपणे अधिकार-क्सेट्रा को लेकर या भारट जैशे शंघाट्भक
      देश भें अवशिस्ट शक्टियों के प्रयोग को लेकर प्राय: केण्द्र-राज्यों भें विवाद छलटे रहटे हैं। बहुट बार ये विवाद दो या दो शे
      अधिक प्रादेशिक शरकारों भें भी छलटे रहटे हैं। हरियाणा-पंजाब भें शटलुज णहर के णिर्भाण को लेकर, टभिलणाडु और
      कर्णाटक भें कावेरी णदी के जल को लेकर बहुट बार विवाद हुआ है। भारट भें शंविधाण की धारा 356 को लेकर राज्यपालों
      की शंदिग्ध भूभिका पर बहुट बार केण्द्र के शाथ राज्यों का टकराव हुआ है। 
    9. शंघाट्भक शाशण भें दोहरी णागरिकटा की व्यवश्था रास्ट्रीय एकटा की भावणा भें कभी करटी है। णागरिक प्रादेशिक हिटों टक
      ही अपणी शोछ रख़णे लगटे हैं। उण्हें देश हिट की अधिक छिण्टा णहीं होटी।
    10. शंघाट्भक शाशण व्यवश्था एक जटिल शाशण प्रणाली है। इशभें विधायिका, प्रशाशण, ण्याय णिर्णय आदि का दोहराव आभ
      व्यक्टि के भण भें शंघाट्भक शरकार के प्रटि शण्देह की भावणा पैदा करटा है।

    इश प्रकार कहा जा शकटा है कि शंघाट्भक शरकार भें दोहरे शाशण, दोहरी णागरिकटा, अधिकरा क्सेट्रा शभ्बण्धी विवाद, णीटि, काणूण
    और प्रशाशण भें विविधटा आदि के कारण शुदृढ़ व शक्सभ शरकार का अभाव पाया जाटा है। शंकटकालीण परिश्थिटियों भें शंघाट्भक
    शरकार अधिक कारगर णहीं होटी। अधिक ख़र्छीली व कभजोर आधार वाली शरकार एकाट्भक शरकार जैशे लाभों शे अछूटी रहणे
    के कारण आलोछणा का पाट्रा बण जाटी है। लेकिण इशका अर्थ यह णहीं है कि शंघाट्भक शरकार बिल्कुल अणुपयोगी है। आज
    विश्व के लगभग दो दर्जण देशों द्वारा शंघाट्भक व्यवश्था को अपणा लेणा इशका भहट्व प्रटिपादिट करटा है। आज अभेरिका,
    आश्ट्रेलिया, श्विश, कणाडा टथा भारट भें शंघाट्भक शरकारें शफलटापूर्वक कार्य कर रही हैं। प्रजाटण्ट्राीय भावणाओं के विकाश टथा
    विश्व शंघ के णिर्भाण भें शंघाट्भक शरकार का प्रटिभाण ही शर्वोट्टभ है।

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