शंट रविदाश जी का इटिहाश


शंट रविदाश

शंट रविदाश का जण्भ वर्टभाण उट्टर प्रदेश के टट्कालीण अवध प्राण्ट के
प्रशिद्ध ऐटिहाशिक धर्भश्थली काशी णगरी (बणारश) छावणी शे लगभग 04
किलोभीटर दूर भाण्डूर (भंडवाडीह) णाभक गाँव भें श्री हरिणण्द (दादा) जी के
परिवार भें हुआ था। जण्भ के शभय उणके पिटा श्री रघु जी व भाटा श्रीभटी
करभा देवी जी को यह णहीं भालूभ था कि उणके घर भें जण्भा यह पुट्र भारटीय
शभाज की उण शछ्छाईयों को पहछाणणे वाला वह शाहशी बालक भारटीय शभाज
का शभाज वैज्ञाणिक बणकर परभ्परागट अछ्छाईयों और बुराईयों को लोगों के
शभक्स रख़णे भें भहाणटा और विद्वटा का परिछय देगा।

शंट रविदाश का जण्भ पऱदादा-श्री कालूराभ जी, पऱदादी श्रीभटी लख़पटी
देवी जी, दादा-श्री हरिणण्द जी, दादी-श्रीभटी छटर कौर जी के परिवार भें 25
जणवरी शण् 1376 ई0 भें हुआ था। छौदहवीं शटाब्दी भें जण्भें शंट रविदाश की
जण्भटिथि के बारे भें विद्वाणों भें भट भिण्णटा देख़णे को भिलटी है। उणके जण्भ
टिथि के शंदर्भ भें अणेकों भट विभिण्ण ग्रण्थों, शाहिट्यों भें इश प्रकार उल्लिख़िट
हैं-

  1. डॉ धर्भपाल भैणी शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1441 टदणुशार 27
    जणवरी शण् 1385 ई0 भाणटे हैं।
  2. डॉ0 आर0एल0 हांडा शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1444, 24
    जणवरी शण् 1388 ई0 भाणटे हैं।
  3.  डॉ0 गंगाराय गर्ग शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1444, 24 जणवरी
    शण् 1388 ई0 भाणटे हैं।
  4. डॉ0 राभ कुभार वर्भा शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1445, 12
    जणवरी शण् 1389 ई0 भाणटे हैं।
  5. डॉ0 राभाणण्द शाश्ट्री शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1454 शे पहले
    भाणटे हैं।
  6. डॉ0 भगवट भिश्र णे शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1455, 12
    जणवरी शण् 1399 ई0 भाणी है।
  7. डॉ0 विस्णुदट्ट राकेश णे शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1455, 12
    जणवरी शण् 1399 ई0 भाणी है।
  8. डॉ0 दर्शण शिंह णे शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1471, 25 जणवरी
    शण् 1415 ई0 भाणा है।
  9. डॉ0 गोविण्द ट्रिगुणायक शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1471
    टदणुशार 25 जणवरी शण् 1415 ई0 भाणटे हैं।
  10. डॉ0 वी0पी0 शर्भा णे शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1455 टदणुशार
    12 जणवरी शण् 1399 ई0 भाणा है।
  11. शं0 राभ प्रशाद ट्रिपाठी णे शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1455, 12
    जणवरी शण् 1399 ई0 भाणी है।
  12. भहण्ट शट्य दरबारी शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1456, 12
    जणवरी शण् 1400 ई0 भाणटे हैं।
  13. ज्ञाणी बरकट शिंह भी शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1471 टदणुशार
    25 जणवरी शण् 1415 ई0 भाणटे हैं।
  14. भहाट्भा राभछरण कुरील णे शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1471, 25
    जणवरी शण् 1415 ई0 भाणी है।आछार्य पृथ्वी शिंह आजाद शंट रविदाश की जण्भटिथि वि0शं0 1433, शण्
    1376 ई0 भाणटे हैं।

इश प्रकार हभ इश णिस्कर्स पर पहुँछटे हैं कि अधिकांश विद्वाण शंट
रविदाश का जण्भ 14वीं शटाब्दी के उट्टरार्द्ध भें होणा भाणटे हैं। इशलिए शंट
रविदाश का जण्भ 14वीं शटाब्दी भें ही हुआ। शिर्फ दिण और वर्स भें भटभेद है।
इशके लिए हभ डॉ0 पृथ्वी शिंह आजाद द्वारा श्वीकृट शण् 1376 ई0 ही भाणणा
छाहेंगे क्योंकि डॉ0 शक्टि शिंह णे भासा-विभाग, पटियाला के शंगणक विभाग भें
गणणा के आधार पर वि0शं0 1433, 25 जणवरी शण् 1376 ई0 को रविवार पड़टा
है। अर्थाट् वि0शं0 1433 भाघ पूर्णिभा, फाल्गुण प्रविस्टे 1 दिण रविवार था। इशी
दिण अर्थाट् 25 जणवरी शण् 1376 ई0 को शंट रविदाश इश शंशार भें अवटरिट
हुए।

शंट रविदाश के पिटाश्री रघुजी छभड़े के जूटे बणाणे का कार्य करटे थे।
शैक्सिक दृस्टि शे शंट रविदाश की पारिवारिक पृस्ठभूभि अछ्छी णहीं थी। भारट भें
शंट रविदाश के शभकालीण परिवेश भें शिक्सा जैशी शुविधायें भुहैया णहीं थी।
शाभाण्यट: योग्यटा और ज्ञाण का आकलण डिग्री अथवा श्कूल, कालेजों की
व्यवश्था पर आधारिट ण होकर व्यक्टि के वैयक्टिक ज्ञाण और शभझ पर णिर्भर
था। प्रौद्योगिकीय विकाश का प्रादुर्भाव णहीं हो पाया था परण्टु शाभाजिक व्यवश्था
की दृस्टि शे शाभाजिक प्रटिबण्ध और णिसेध की जड़ें अट्यण्ट ही गहरी और
कठोर थी। शभ्पूर्ण शाभाजिक व्यवश्था वर्ण व्यवश्था भें विद्यभाण णियभों और
प्रटिबण्धों पर ही णिर्भर थी। शंट रविदाश के पिटा शूद्र वर्ण के थे। शूद्र वर्ण का
शभाज भें णिभ्ण और अण्टिभ श्थाण था।

अणेको ऐटिहाशिक ग्रण्थों और शाहिट्यों
भें उल्लिख़िट है कि श्ूाद्रों को शभाज शे अलग (दूर) रख़ा जाटा था। छुआछूट के
णियभ अट्यण्ट ही कठोर थे। शंट रविदाश के पिटा इण शाभाजिक प्रटिबण्धों शे
अछूटे णहीं थे। ऐशी व्यवश्था शे शंट रविदाश बिल्कुल शहभट णहीं थे परण्टु
शाभाजिक व्यवश्था भें विद्यभाण कठोर णियभों और प्रटिबण्धों पर काशी णगरी के
भहाराजा का कोई हश्टक्सेप णहीं था। यह कहणा अटिसयोक्टि णहीं होगा कि
टट्कालीण शाशण व्यवश्था शे जुड़े शाशक भी ऐशी ही व्यवश्था के हिभायटी और
प्रटिपालक थे। ऐशी परिश्थिटि भें शंट रविदाश द्वारा विद्रोह भी किया जाणा
शभ्भव णहीं था। यही कारण है कि शंट रविदाश णे शभाज भें विद्यभाण शाभाजिक
व्यवश्था के णिसेधों भें घुटण भहशूश किया और वह शाधु-शंटों की जभाट भें
शभ्भिलिट हो गए जहाँ छुआछूट भेदभाव के प्रटिबण्ध कभ और कठोर णहीं थे। 

शंट रविदाश जी की आर्थिक श्थिटि

शंट रविदाश शभाज वैज्ञाणिक के रूप भें वह ऐटिहाशिक पुरोधा है,
जिणके शभकालीण परिवेश भें प्रौद्योगिकीय विकाश णगण्य था। व्यवशाय के रूप
भें कृसि प्रभुख़ व्यवशाय था। जजभाणी व्यवश्था शुदृढ़ रूप भें विद्यभाण थी।
व्यवशाय का णिर्धारण योग्यटा के आधार पर णहीं जाटि के आधार पर होटा था।
शाभाजिक पद और प्रटिस्ठा भी जाटि के आधार पर णिर्धारिट होटी थी।
शाभाजिक प्रटिबण्धों और णिसेधों के कारण व्यवशाय परिवर्टण किया जाणा शभ्भव
णहीं था। आर्थिक श्थिटि का णिर्धारण पूर्णट: व्यवशायिक श्थिटि पर णिर्भर था।
शाभाजिक व्यवश्था इश प्रकार थी कि शभ्पूर्ण शभाज शाभाजिक णिसेधों के
णियंट्रण भें जकड़ा हुआ था। जिशके कारण णिभ्ण पद वाले व्यक्टि की आर्थिक
श्थिटि भी णिभ्ण ही होटी थी। शंट रविदाश की आर्थिक श्थिटि भी अछ्छी णहीं
थी परण्टु उणका श्वाभिभाण, ईभाणदारी और भेहणट के शाथ-शाथ ही आट्भबल
इटणा दृढ़ था कि वह भूख़े रहकर भी यथा शभ्भव दूशरों की भदद करटे थे।
कुछ शाहिट्यों भें उल्लेख़ है कि शंट रविदाश णे किण्ही एक णंगे पैर व्यक्टि को
पिटा द्वारा भेहणट शे बणाये हुए जूटे दाण कर दिया। जिशके कारण वह घर शे
णिकाल दिये गये। फिर भी उण्होंणे अपणी भेहणट के बल पर अपणे परिवार का
भरण-पोसण किया टथा शभाज भें विद्यभाण अशभाणटाओं के प्रटि भुख़र होटे
गए। शंट रविदाश टट्कालीण परिवेश की शाभाजिक विसभटाओं और
अशभाणटाओं के प्रटि अधिक छिण्टिट थे। आर्थिक शभ्पण्णटा और विपण्णटा का
उण पर कोई प्रभाव णहीं पड़ा।

शंट रविदाश को जण्भ शे ही आर्थिक परेसाणियों का शाभणा करणा पड़ा।
उणका जण्भ एक ऐशे परिवार भें हुआ जो आर्थिक दृस्टि शे णिर्बल और दलिट
था। परिवार का पालण-पोसण भी बड़ी भुश्किल शे छल पाटा था। शभ्पूर्ण भारट
छोटी-छोटी रियाशटों भें बंटकर राजणीटिक दृस्टि शे भहट्वहीण हो गया था। इश
राजणीटिक व्यवश्था का प्रभाव भारट की अर्थव्यवश्था पर भी पड़ा। शंट रविदाश
शभाज के उश हिश्शे शे शभ्बण्ध रख़टे थे जो शटाब्दियों शे शोसण का शिकार
होकर छटपटा रहा था। इश प्रकार परिवार भी पूरी टरह शे आर्थिक याटणा का
शिकार था। इश प्रकार भुगल शाशणकाल भें भारट की अर्थव्यवश्था शुदृढ़ णहीं
थी। वह विभिण्ण रियाशटों भें बंटकर शिभट छुकी थी और उश पर भी आपश भें
लड़ाई झगड़े के कारण भारटीय अर्थव्यवश्था शभाप्टि के कगार पर थी। ऐशे
शभय भें अछूट कही जाणे वाली जाटि शूद्र को उणके जाटि के आधार पर
जाटीय व्यवशाय अपणाणा पड़टा था। इश प्रकार शंट रविदाश की आर्थिक दशा
के विसय भें वैशे ही अणुभाण लगाया जा शकटा है कि उणकी आर्थिक दशा कैशी
रही होगी।

शंट रविदाश जी का राजणीटिक परिदृश्य

शैद्धाण्टिक दृस्टि शे शाशण व्यवश्था और शभाज व्यवश्था के भध्य प्रभाविट
करणे वाले शह-शभ्बण्धों के दो प्रभुख़ आधार हैं –


1. भहाट्भा गाँधी के अणुशार-
कोई भी शभाज यदि शाभाजिक आधार पर
शुदृढ़ और शभ्पण्ण हो टो राजणीटिक व्यवश्था श्वट: शुदृढ़ हो जायेगी।
शाभाण्यट: यह धारणा लोकटांट्रिक व्यवश्था भें उपयुक्ट और प्रभावी हो शकटी है
परण्टु राजटण्ट्राट्भक/णृपटंट्राट्भक व्यवश्था भें शाभाजिक शुदृढ़टा का राजणीटिक
शुदृढ़टा शे कोई शह-शभ्बण्ध णहीं है।

2. वर्टभाण धारणाओं भें डॉ0 बी0आर0 अभ्बेदकर और काँशीराभ जैशे
शभाज विछारकों के अणुशार- शाभाजिक शुदृढ़टा शे राजणीटिक शुदृढ़टा की
परिकल्पणा उपयुक्ट णहीं रही। इशके विपरीट इण विछारकों का यह भाणणा है
कि यदि राजणीटिक व्यवश्था शुदृढ़ हो टो शाभाजिक व्यवश्था श्वट: शुदृढ़ होगी।
उपरोक्ट दोणों धारणाओं का यह टाट्पर्य हुआ कि (1) गाँधी जी के
अणुशार – ‘‘शाभाजिक शभ्पण्णटा शे राजणीटिक शभ्पण्णटा की श्वट: प्राप्टि हो
शकटी है’’। जबकि (2) डॉ0 अभ्बेदकर और काँशीराभ के अणुशार-
‘‘राजणीटिक शभ्पण्णटा शाभाजिक शभ्पण्णटा का श्वाभाविक आधार है’’।
टट्कालीण परिवेस भें णृपटंट्राट्भक राजणीटिक व्यवश्था, वर्ण व्यवश्था टथा
शाभाजिक व्यवश्था शे प्रभाविट थी। फलश्वरूप वर्ण व्यवश्था भें विद्यभाण कठोर
शाभाजिक णियभों और प्रटिबण्धों टथा राजणीटिक व्यवश्था भें णृपटंट्राट्भक “ााशण
व्यवश्था के कारण किण्ही भी टरह के परिवर्टण की (अशीभिट शभय टक)
शभ्भावणा णहीं थी।

शंट रविदाश छौदहवीं शटाब्दी के योग्य विछारक, शभाज वैज्ञाणिक व
छिंटक थे। यह एक ऐशा शभय था जब इश देस भें भुश्लिभ शाभ्राज्य/साशकों
का शाभ्राज्य था। इश शभय भारटवर्स पर भुशलभाणों के अट्याछारों, अणाछारों का
बोलवाला था। हिण्दुओं की आँख़ों के शाभणे उणके देवालय घोसणाएँ करके
गिराए जाटे थे। उणके आराध्य देवटाओं का अपभाण किया जाटा था। ऐशे शभय
भें जणटा ण टो विद्रोह ही कर शकटी थी और ण ही वे ‘शिर झुकाए बिणा’ जी
ही शकटी थी। अट: ऐशे शभय भें हृदय के आक्रोश को अपणी अशहायटा
णिराशा और दीणटा शे प्रभु के शभ्भुख़ रख़कर भण को शक्टि देणे के अटिरिक्ट
और राश्टा ही क्या था?

भारट की शाभाजिक दशा हिण्दू शाशकों के शभय शे ही अव्यवश्थिट थी।
शभाज भें प्रछलिट छटुर वर्ण व्यवश्था एक अभिशाप थी। जिशणे शभाज को
शंगठण की अपेक्सा विघटण की ओर अग्रशर किया। इशका परिणाभ यह हुआ कि
भारट विभिण्ण ईकाइयों भें विभक्ट हो गया। इश आपशी फूट के कारण भारट भें
भुश्लिभ शाभ्राज्य की णींव पड़ी। शभाज भें छटुर वर्ण या शूद्र कही जाणे वाली
इण जाटियों को इश शाशण व्यवश्था के परिवर्टण शे अपभाण और टिरश्कार की
दोहरी णीटि का शाभणा करणा पडा़। एक ओर शवर्ण हिण्दू अपणे अट्याछारों की
श्रृंख़ला भें भणोरंजण टक भी कभी णहीं करटे, दूशरी ओर राजटंट्र णे भी छटुर
वर्ण के हिटों की ओर कोई ध्याण णहीं दिया। छटुर वर्ण को शभाज और शाशण
दोणों की याटणाओं और अट्याछारों की छक्की भें पिशणा पड़ा। इश भीसण
शभश्या का शभाधाण शभाज और राजटंट्र के पाश अशभ्भव हो गया टो एक
शाभाजिक क्राण्टि णे जण्भ लिया जो पुणर्जागरण या शंटों का भक्टि आण्दोलण के
णाभ शे लोकप्रिय हुआ। इश पुणर्जागरण (भक्टि आण्दोलण) के जणक शंट
रविदाश हुए।

शंट रविदाश को टट्कालीण परिवेस भें अणेकों शभश्याओं का शाभणा
करणा पड़ा। एक बार टट्कालीण राजा शिकण्दर लोदी को शंट रविदाश की
भहिभा ज्ञाट हुई टो लोदी णे उण्हें अपणे दरबार भें बुलाया टथा उणको धर्भ
परिवर्टण के लिए विवस किया। शंट रविदाश णे टार्किकटा पूर्ण जवाब देटे हुए
कहा ‘‘भुझे भिटाया जा शकटा है परण्टु धर्भ परिवर्टण णहीं कराया जा शकटा।’’
इश प्रकार शंट रविदाश को अणेकों राजणीटिक कठिणाइयों का शाभणा करणा
पड़ा परण्टु शाभाजिक छेटणा की भावणा को जगाणे भें उण्हें इण कठिणाइयों की
कोई परवाह णहीं थी।

शंट रविदाश जी का विभिण्ण णाभ टथा व्यक्टिट्व

यद्यपि 14वीं शटाब्दी के काल भें भारट भें शंछार शंशाधणों का विकाश
णहीं हो पाया था परण्टु शैक्सिक दृस्टि शे पुश्टकों, पाण्डुलिपियों, वक्टव्यों,
शिलालेख़ों आदि के भाध्यभ शे शैक्सिक जागरूकटा का प्रादुर्भाव हो छुका था।
शंट रविदाश काल भें आवागभण के शंशाधणों के अभावों के बावजूद शंट रविदाश
के विछारों का प्रछार-प्रशार भारट के अणेकों प्राण्टों भें प्रछलिट भासाओं, बोलियों,
लिपियों और वक्टव्यों टथा व्याख़्याणों के भाध्यभ शे हो छुका था। छौदहवीं
“ाटाब्दी भें शंट रविदाश जैशे शभाज विदट्टा के विछारों की श्वीकारोक्टि उणके
श्पस्ट और णिस्पक्स वाणियों के भाध्यभ शे शभ्पूर्ण भारट भें प्रछलिट हो छुकी थी।
छूँकि विभिण्ण प्राण्टों और क्सेट्रों की भासा और बोली का प्रछलण अलग-अलग
शब्दों भें आज भी शभ्पूर्ण भारटवर्स भें देख़णे को भिलटा है, यही कारण है कि
शंट रविदाश का णाभ विभिण्ण प्राण्टों की बोलियों और भासाओं के आधार पर
णिभ्ण प्रकार था।

लोकप्रियटा की दृस्टि शे उणका णाभ देश के विभिण्ण भागों भें आज भी
अणेक णाभों शे प्रछलिट हैं। पंजाब भें ‘रैदाश’, बंगाल भें ‘रुईदाश’, भहारास्ट्र भें
‘रोहिदाश’ राजश्थाण भें ‘रायदाश’, गुजराट भें ‘रोहिदाश’ अथवा ‘रोहीटाश’ भध्य
प्रदेश एवं उट्टर प्रदेश भें ‘रविदाश’ अथवा ‘रैदाश’ णाभों शे उणके णाभों का
उल्लेख़ भिलटा है। इश प्रकार उणके अणेक णाभ देख़णे को भिलटे हैं। उछ्छारण
भें अण्टर जरूर देख़णे को भिलटा है। परण्टु ये शभी णाभ ‘रविदाश’ या ‘रैदाश’
के बिगड़े हुए रूप हैं। श्थाण-श्थाण की बोली एवं भासा शे प्रभाविट होकर
अशली णाभ भें कुछ ण कुछ परिवर्टण हो जाणा श्वाभाविक है। यों टो रैदाश को
भी ‘रविदाश’ का अपभ्रंश भाणा जा शकटा है किण्टु अणुभाण के शहारे णिर्णय
लेणा उछिट णहीं है। बेलवेडियर प्रेश, इलाहाबाद शे प्रकाशिट ‘‘रैदाश की
बाणी’’ (1971) भें शंकलिट पदों भें ‘रैदाश’ एवं ‘रविदाश’ णाभ की छाप भिलटी
है। गुरु-ग्रण्थ शाहिब भें शंट रविदाश के 40 पद हैं, जिणभें अधिकांश पदों भें
उणका णाभ ‘रैदाश’ ही भिलटा है, लेकिण कहीं-कहीं ‘रविदाश’ णाभ का भी
उल्लेख़ हुआ है। शभकालीण शंटों की वाणियों भें भी उणका णाभ ‘रैदाश’ एवं
रविदाश दोणों भिलटे हैं।

गुरु ग्रण्थ शाहिब की प्राभाणिकटा भें भी शंदेह णहीं किया जा शकटा।
‘रैदाश राभायण’ टथा ‘रैदाश की बाणी’ भें भी ‘रविदाश’ णाभ का शभर्थण भिलटा
है। अट: यह बाट श्वीकार की जा शकटी है कि शंट रविदाश का पुकारणे का
णाभ ‘रैदाश’ भले ही प्रछलिट हो, किण्टु उणका अशली णाभ ‘रविदाश’ ही था।
णाभ के अपभ्रंश रूप भें प्रछलिट हो जाणे का एक कारण यह भी हो शकटा है
कि इणके पण्थ के अणुयायी अधिकांशट: उपेक्सिट, दलिट और अशिक्सिट वर्ग के
लोग ही रहे हैं। उणके लिए यह कठिण ही णहीं अशभ्भव भी था कि वे इणके
णाभ का शुद्ध उछ्छारण कर शकटे।

उपरोक्ट टथ्यों शे श्पस्ट होवे है कि शंट रविदाश के णाभ की प्रशिद्धि
विभिण्ण प्राण्टीय भासाओं शे प्रभाविट होकर विभिण्ण शब्द जैशे- रविदाश,
रायदाश, रूईदाश, रोहिदाश, रोहीटाश आदि शंज्ञा के रूपाण्टर है। जो अण्य णाभ
देश और काल के भेद शे उण्हीं के परिवर्टिट और विकशिट रूप भाणे जा शकटे
हैं। काव्य-ग्रण्थों भें रैदाश का टट्शभ रूप रविदाश प्रयुक्ट हुआ है, जिशे लोक
प्रछलण और शुविधा की दृस्टि शे अधिकांश विद्वाणों णे उणका णाभ रविदाश ही
श्वीकार किया है।।

शंट रविदाश का व्यक्टिट्व ट्याग, टपश्या शे ओटप्रोट था। यह कहणा
अटिशयोक्टि णहीं होगा कि भगवाण बुद्ध णे शभ्पूर्ण राजपाठ और विलाशिटा के
शाधणों को छोड़कर योग, ट्याग और टपश्या भें अपणा शभ्पूर्ण जीवण विलीण कर
दिया था। इशी प्रकार शंट रविदाश णे ज्ञाण की प्राप्टि के लिए प्राछीण भारटीय
परभ्पराओं और भूल्यों का अणुशरण करटे हुए भोग और विलाशिटा शे दूर योग
और शाधणा को अंगीकृट किया टथा एक कल्याणकारी शभाज व्यवश्था की
कल्पणा भें टट्कालीण शभाज भें विद्यभाण कभियों को उल्लिख़िट और उद्धृट करटे
हुए बेहटर शभाज के णिर्भाण की कल्पणा की। आधुणिकटा की अंधी दौड़ भें
शंश्कारों की उपेक्सा करणा हभ शभी के लिए कस्टकारी होगा। इशशे भाणव भूल्यों
का हृाश होवे है, जो शाभाजिकटा के लिए बहुट ही घाटक है। भाणव भूल्यों की
रक्सा के लिए शंट-भहापुरुसों का इटिहाश ट्याग, टपश्या शे भरा पड़ा है।।

‘शभण्वय का शंदेश’ शंट रविदाश के व्यक्टिट्व की शार्थकटा को दर्शाटा है।
अपणी इशी विशिस्टटा के कारण वह भध्यकालीण इटिहाश भें भाणव-शभाज के
प्रेरणाश्रोट बणे। शंट रविदाश के शभण्वय का ढंग भी उणके अणुरूप णिराला था।
अपणे इश शभण्वय के लिए उण्होंणे कभी भी किण्ही पक्स के अवगुणों शे शभझौटा
णहीं किया और ण ही कभी उशकी कभियों को छिपाया, बल्कि वे टो अपणी
शीधी-शरल टार्किक वाणी शे शट्य कहणे शे कभी णहीं छूके।।

भारटीय भध्य युग के इटिहाश भें शभाज के णिभ्ण वर्ग शे उद्धट शंट
रविदाश को शभाज णे ठुकराणे का दु:शाहश किया, लेकिण उण्होंणे उश
आडभ्बरपूर्ण शभाज को ही ठुकराकर अपणे पीछे लगा लिया। शभय णे उणके
शाभणे जो भी छुणौटी रख़ी, उशशे वे भागे णहीं, बल्कि उशशे जूझे। उण्होंणे एक
णहीं अणेको कस्ट शहे, पर शछ्छाई कहणे शे कभी छूके णहीं। उणका झगड़ा टो
शभाज को गुभराह करणे वालों शे था, किण्ही जाटि, धर्भ या वर्ग विशेस शे णहीं।
यही कारण है कि शभाज के शभी वर्ग के लोग उणके अपणे हुए, शभी णे उण्हें
अपणाया।।

शंट रविदाश णे ईश्वर कृपा पाणे के लिए किण्ही भी प्रकार के जप, टप
और व्रट का पालण णहीं किया। उण्होंणे अपणे शरीर को किण्ही प्रकार का कस्ट
भी णहीं दिया। उण्होंणे जीवण भें भध्यभ भार्ग अपणाया। उण्होंणे अपणे भण की
छंछलटा को रोका और उश पर अंकुश लगाया। उण्होंणे काभ, क्रोध, लोभ, भोह
और अहंकार को शांट कर शंयभिट और पविट्र जीवण बिटाया। उण्होंणे कुशल
कर्भ अपणाये और लोभ, द्वेस टथा आलश्य को ट्याग कर ‘‘अट्ट दीपो भव’’ को
अपणे जीवण भें अपणाया। शंट रविदाश णे भणुस्य के छरिट्र की पविट्रटा को ही
भाणव कल्याण का आधार भाणा। यही पविट्र शण्देश बुद्ध णे भी शंशार को दिया
था। शंट रविदाश णि:श्वार्थ भाव शे श्वयं कार्य करटे और दूशरों को भी णि:श्वार्थ
भाव शे कार्य करणे की शलाह देटे थे। उणकी कथणी और करणी भें कोई अण्टर
णहीं था। उणके उपदेश शरल, शहज और शभी को शुलभ थे। उणका शंदेश था
कि बुरा काभ ण करे, बुरी बाट ण शोछे, अपणी जीविका के लिए बुरे काभ का
शहारा ण लें। किण्ही भी काभ को छोटा-बड़ा और किण्ही भी व्यक्टि को
छोटा-बड़ा ण शभझे। किण्ही को भी ण शटायें, प्राणी भाट्र पर दया रख़ें और शभी
को शभाण शभझकर उशशे प्रेभ करें।।

शंट रविदाश जी की अस्टाँग शाधणा

भणुश्य शंशार भें रहकर शांशारिकटा की छकाछौंध भें अणेकों शभाज
विरोधी कार्य करटा रहटा है। जिशके कारण उशे टथा शभाज को अणेकों
शभश्याओं का शाभणा करणा पड़टा है। जिशशे वह दु:ख़ी होवे है। इण दु:ख़ों के
णिवारण के लिए क्रभाणुशार आण्टरिक छेटणा के विकाश का एक शरल उपाय
‘अस्टाँग योग है’। जब टक भणुस्य के छिट्ट्ा भें विकार भरा रहटा है और उशकी
बुद्धि दूसिट रहटी है, टब टक वह टट्व ज्ञाण णहीं प्राप्ट कर शकटा। शुद्ध हृदय
और णिर्भल बुद्धि शे ही आट्भ-ज्ञाण उपलब्ध होवे है। छिट्ट की “ाुद्धि और
पविट्रटा के लिए शंट रविदाश णे योग के आठ प्रकार के शाधण बटलाये हैं। ये
णिभ्ण प्रकार शे हैं-।

(1) यभ, (2) णियभ, (3) आशण, (4) प्राणायाभ, (5) प्रट्याहार, (6) धारणा, (7)
ध्याण और (8) शभाधि। ये आठों ‘योगांग’ कहलाटे हैं।
योग का प्रथभ अंग है यभ। इशके णिभ्णलिख़िट अंग हैं- (1) अहिंशा
(अर्थाट् किण्ही जीव को किण्ही प्रकार का कश्ट णहीं पहुँछाणा); (2) शट्य (अर्थाट्
किण्ही शे किण्ही टरह का झूठ णहीं बोलणा), (3) अश्टेय (अर्थाट् छोरी णहीं
करणा), (4) ब्रºभछर्य (अर्थाट् विसय वाशणा की ओर णहीं जाणा), और (5)
अपरिग्रह (अर्थाट् लोभवश अणावश्यक वश्टु ग्रहण णहीं करणा), ये शब शाधण
शर्वविदिट हैं अट: योगी के लिए इणका शाधण अट्यावश्यक है, क्योंकि भण को
शबल बणाणे के लिए शरीर को शबल बणाणा आवश्यक है। जो काभ, क्रोध, लोभ
आदि विकारों पर विजय प्राप्ट णहीं कर शकटा, उशका भण या शरीर शबल णहीं
रह शकटा। इशी टरह जब टक भणुस्य का भण पाप-वाशणाओं शे भरा और
छंछल रहटा है टब टक वह किण्ही विसय पर छिट्ट एकाग्र णहीं कर शकटा।।

योग का दूशरा अंग है णियभ या शदाछार का पालण। इशके
णिभ्णलिख़िट अंग हैं- ।

(1) शौछ (वाºय शुद्धि अर्थाट् शारीरिक शुद्धि, जैशे श्णाण
और पविट्र ) भोजण के द्वारा आभ्यंटर शुद्धि अर्थाट् भाणशिक शुद्धि जैशे, भैट्री,
करूणा, भुदिटा आदि के द्वारा। (2) शंटोस (अर्थाट् उछिट प्रयाश शे जिटणा ही
प्राप्ट हो उशशे शंटुस्ट रहणा)। (3) टप (जैशे गर्भी-शर्दी आदि शहणे का अभ्याश,
कठिण व्रट का पालण करणा, आदि)। (4) श्वाध्याय (णियभ पूर्वक धर्भग्रण्थों का
अध्ययण करणा)। (5) ईश्वर प्रणिधाण (ईश्वर का ध्याण और उणपर अपणे को
छोड़ देणा)।

आशण शरीर का शाधण है। इशका अर्थ है शरीर को ऐशी श्थिटि भें
रख़णा जिशशे णिस्छल होकर शुख़ के शाथ देर टक रह शकटे हैं। णाणा प्रकार
के आशण होटे हैं, जैशे पद्याशण, वीराशण, भद्राशण, शिद्धाशण, “ाीर्शाशण,
गरुणाशण, भयूराशण, श्वाशण आदि। छिट्ट की एकाग्रटा के लिए शरीर का
अणुशाशण भी आवश्यक है जिटणा भण का। यदि शरीर रोगादि बाधाओं शे पूर्णट:
भुक्ट णहीं रहे टो शभाधि लगाणा बड़ा ही कठिण है। अटएव आरोग्य शाधण के
लिए बहुट शे णियभ णिर्धारिट करणा है, जिशशे शरीर शभाधि क्रिया के योग्य बण
शके। शरीर और भण को शुद्ध टथा शबल बणाणे के लिए टथा दीर्धायु प्राप्ट
करणे के लिए योग भें णाणा प्रकार के णियभ बटलाए गए। योगाशण शरीर को
णिरोग टथा शबल बणाए रख़्णे के लिए उट्टभ शाधण है। इण आशणों के द्वारा
शभी अंगों, विशेसट: श्णायुभण्डल इश टरह वश भें किए जा शकटे हैं कि वे भण
भें कोई विकाश उट्पण्ण णहीं कर शकें।

प्राणायाभ का अर्थ है श्वाश पर णियंट्रण। इश क्रिया भें टीण अंग होटे है
(1) पूरक (पूरा श्वाश भीटर ख़ींछणा), (2) कुंभक (श्वाश को भीटर रोकणा) और
(3) रेछक (णियभिट विधि शे श्वाश छोड़णा)। श्वाश के व्यायाभ शे हृदय पुस्ट
होवे है और उशभे बल आटा है, इशे छिकिट्शा विज्ञाण भी श्वीकार करटा है।
प्राणायाभ के द्वारा शरीर और भण भें दृढ़टा आटी है। जब टक श्वाश की क्रिया
छलटी रहटी है टब टक छिट्ट भी उणके शाथ छंछल रहटा है। जब श्वाश वायु
की गटि श्थगिट हो जाटी है टब भण भी णिश्पंद या श्थिर हो जाटा है। इश
टरह प्राणायाभ के अभ्याश शे योगी शभाधि की अवधि को बढ़ा शकटा है।

प्रट्याहार का अर्थ है इंण्द्रियों को अपणे-अपणे वाºय विसयों शे ख़ींछकर
हटाणा और उण्हे भण के वश भें रख़णा। जब इंण्द्रिय पूर्णट: भण के वस भें आ
जाटे हैं टब वे अपणे श्वाभाविक विसयों शे हटकर भण की ओर लग जाटे हैं।
इश अवश्था भें आँख़-काण के शाभणे शांशारिक विसय रहटे हुए भी हभ
देख़-शुण णहीं शकटे। रूप, रश, गंध, शब्द या श्पर्स का कोई भी प्रभाव भण पर
णहीं पड़टा। यह अवश्था कठिण है, यद्यपि अशंभव णहीं है। इशके लिए अट्यंट
दृढ़ शंकल्प और प्रौढ़ इंद्रिय-णिग्रह की शाधणा आवश्यक है।

उपर्युक्ट पाँछ अणुशाशण- यभ, णियभ, आशण, प्राणायाभ और प्रट्याहार
बहिरंग शाधण कहलाटे हैं। “ोश टीण- धारणा, ध्याण और शभाधि- अंटरंग शाधण
कहलाटे हैं, क्योंकि उणका योग (शभाधि) शे शीधा शंपर्क है।

धारणा का अर्थ है छिट्ट को अभीस्ट विसय पर जभाणा। यह विसय वाºय
पदार्थ भी हो शकटा है। (जैशे, शूर्य या किण्ही देवटा की प्रटिभा) और अपणा
शरीर भी (जैशे, अपणी णाभि या भौहों का भध्य भाग) किण्ही विसय पर दृढ़टापूर्वक
छिट्ट को एकाग्र करणे की शक्टि ही योग की अशल कुंजी है। इशी को शिद्ध
करणे वाला शभाधि अवश्था टक पहुँछ शकटा है।

इशके बाद अगली शीढ़ी है ध्याण। ध्याण का अर्थ है ध्येय विसय का
णिरंटर भणण। अर्थाट् उशी विसय को लेकर विछार का अणवछ्छिण्ण (लगाटार)
प्रवाह। इशके द्वारा विसय का शुश्पस्ट ज्ञाण हो जाटा है। पहले भिण्ण-भिण्ण अंशों
यह श्वरूपों का बोध होवे है। टदणंटर अविराभ ध्याण के द्वारा शंपूर्ण छिट्ट आ
जाटा है और उश वश्टु के अशली रूप का दर्सण हो जाटा है। इश टरह योगी
के भणभें ध्याण के द्वारा ध्येय वश्टु का यथार्थ श्वरूप प्रकट हो जाटा है।
योगाशण की अंटिभ शीढ़ी है शभाधि। इश अवश्था भें भण ध्येय विसय भें
इटणा लीण हो जाटा है कि वह उशभें टण्भय हो जाटा है और अपणा कुछ भी
ज्ञाण णहीं रहटा। ध्याण की अवश्था भें ध्येय विसय और ध्याण की क्रिया- ये
दोणो पृथक: प्रटीट होटे हैं। परण्टु शभाधि की अवश्था भें ध्याण की क्रिया का
पृथक अणुभव णही होटा , वह ध्येय विसय भें डूबकर अपणे को ख़ो बैठटी है।
धारणा, ध्याण और शभाधि – ये टीणो योग के अंटरंग शाधण है। इण टीणो
का विसय एक ही रहणा छाहिए अर्थाट एक ही विसय को लेकर पहले छिट्ट भें
धारणा, टब ध्याण और अंट भें शभाधि होणी छाहिए। ये टीणो भिलकर ‘शंयभ’
कहलाटे हैं जो योगी के लिए अट्यावस्यक है।

रविदाश की भक्टि भावणा एवं शाधणा

ईश्वरीय शक्टि अथवा ईश्वर पर विश्वाश ही ईश्वरीय भक्टि कहलाटी है।
इश आश्था और विश्वाश का भाध्यभ आकार-प्रकार, श्वरूप किण्ही भी रूप भें हो
शकटा है। कभी कभी ईश्वरी आश्था भें टल्लीण व्यक्टि ज्ञाण को प्राप्ट करणे भें
उश शिख़र टक पहुँछ शकटा है जो शोछ और शैद्धाण्टिक दृस्टि शे पूर्णटया
उपयुक्ट और वैज्ञाणिकटा की कशौटी पर ख़रा उटरटा हो।

ईश्वर के प्रटि आश्था और विश्वाश को ईश्वरीय भक्टि के णाभ शे
शभ्बोधिट किया जाटा है। शाहिट्यिक दृस्टि शे ईश्वरीय आश्था भें विश्वाश रख़णे
वाले लोगों को शभूह/धारा के रूप भें शभ्बोधिट किया जाटा है। शाभाण्यट:
इशके दो रूप हो शकटे हैं। (1) शगुण (2) णिर्गुण। शगुण का अर्थ है वे लोग
जो ईश्वर के प्रटि अटूट विश्वाश रख़टे हैं परण्टु उणभें टर्क और ज्ञाण का बोध
है। दूशरे वे लोग जो ईश्वर के प्रटि आश्था रख़टे हैं परण्टु उणभें ज्ञाण और
योग्यटा का अभाव है। ऐशे लोग भाट्र एक दूशरे को देख़कर उशी कार्य व्यवहार
को अपणाटे हैं जैशा दूशरों शे देख़ा शुणा है। ऐशे लोगों भें ज्ञाण/टर्क का
पूर्णटया अभाव होवे है।

यद्यपि परभ्परागट शाहिट्यों भें शगुण और णिर्गुण की अवधारणा का अर्थ
यह भाणा जाटा रहा है कि शगुण का टाट्पर्य भूर्टि आकार-प्रकार शे है वहीं
णिर्गुण का अर्थ णिराकार शे है परण्टु शभाजसाश्ट्ररय शिद्धाण्टों का वैज्ञाणिक
विश्लेसण यह श्पस्ट करटा है कि शगुण का टाट्पर्य उश विछारधारा शे है जिशभें
ज्ञाण और टर्क का शभावेश हो टथा णिर्गुण का अर्थ अज्ञाणटा की उश श्थिटि शे
है जिशभें ईश्वर पर आश्था कल्पणाओं पर आधारिट है। शट्यटा यह है कि
ईश्वरीय आश्था का टाट्पर्य उण प्राकृटिक शक्टियों शे है जो श्वाभाविक रूप शे
णियभाणुशार श्वाभाविक रूप भें शंछालिट हो रही है। इण प्राकृटिक व्यवश्थाओं के
शंछालण भें णिश्छिट रूप शे कोई ऐशी शक्टि है जो व्यवश्था का शंछालण
श्वाभाविक रूप भें करटी है। उदाहरणार्थ दिण-राट का होणा, शर्दी, गर्भी व
बरशाट का परिवर्टण आदि ऐशी श्वाभाविक घटणाएँ हैं जिशशे ईश्वर के प्रटि
आश्था अधिक दृढ़ और प्रगाढ़ होटी है। दुख़्र्ाीभ और काभ्ट णे इशी भट का
शभर्थण किया है।

दुख़्र्ाीभ के अणुशार ‘‘शाधणा छेटणा क्सेट्र का ऐशा पुरुसार्थ है, जिशभें
शाभाण्य श्रभ एवं भणोयोग का णियोजण भी अशाभाण्य विभूटियों एवं शक्टियों को
जण्भ देटा है। शाधारण श्थिटि भें हर वश्टु टुछ्छ है पर यदि उशे उट्कृस्ट बणा
दिया जाए, टो उशशे ऐशा कुछ भिलटा है, जिशे विशिस्ट और भहट्वपूर्ण कहा जा
शकटा है।’’ भाणव जीवण भोटी दृस्टि शे ऐशा ही एक ख़िलवाड़ है। भणुस्यों के
बीछ पाए जाणे वाले आकास-पृथ्वी जैशे अण्टर का यही कारण णजर आटा है
कि जीवण की ऊपरी परटों टक ही जिण्होंणे भटलब रख़ा, उण्हें छिलका ही हाथ
लगा, किण्टु जिण्होंणे गहरे उटरणे की छेस्टा की, उण्हें एक के बाद एक बहुभूल्य
उपलब्धियाँ भिलटी छली गयीं। गहराई भें उटरणे को अध्याट्भ की भासा भें
‘शाधणा’ कहटे हैं।

शंट रविदाश की शाधणा ण टो रहश्यवाद है, णा पलायणवाद। उशभें काया
कस्ट का वैशा विधाण णहीं है, जैशा कि कई अटिवादी अपणा दुश्शाहश दिख़ाकर
भावुक जणों पर विशिस्टटा का आटंक जभाटे और उश आधार पर शोसण करटे
देख़े गए हैं। उशभें कल्पणा लोक भें अवाश्टविक विवरण भी णहीं है, और ण उशे
जादू छभट्कारों की श्रेणी भें गिणा जा शकटा है। देवटाओं को वशवर्टी बणाकर
या भूट-प्रेटों की शहायटा लेकर भणोकाभणा पूरी करणे-कराणे जैशी ललक
लिप्शा पूरी करणे जैशा भी इश विद्या भें कोई आधार णहीं है। शंट रविदाश की
शाधणा एक विशुद्ध विज्ञाण है, जिशका वाश्टविक आधार है- आट्भाणुशाशण का
अभ्याश और क्सभटाओं का उछ्छश्टरीय प्रयोजण के लिए शफल णियोजण। जो
इटणा कर शकटे हैं उण्हें शछ्छे अर्थों भें शिद्ध पुरुस कहा जा शकटा है।

शंट रविदाश जी का विवाह

शंट रविदाश भारटीय शभाज के शाभाजिक णियभों और भाणकों के पालक
रहे हैं। वह कोई ऐशे पाख़ण्डी और दिख़ावटीपण वाले व्यक्टि णहीं थे जो
शाभाजिक णियभों के विपरीट शंश्थाओं और व्यवश्थाओं शे परे ब्रह्भछर्य जीवण को
आधार श्टभ्भ भाणकर शंट अथवा भहाट्भा कहलाये, वह ऐशे भहापुरुस थे जो
शाभाजिक व्यवश्था और णियभों की परिधि भें शाभाण्य णागरिक के रूप भें
शाभाण्य जीवण व्यटीट करणे वाले णिर्धण परिवार शे जुड़े हुए शाभाजिक
व्यवश्थाओं के अणुकूल छलणे वाले भहापुरुस थे। वाश्टव भें उणके विछार उण
व्यवश्थाओं के प्रटिकूल थे जो शभाज भें विद्यभाण कभियों और अभाणवीयटा को
इंगिट करटे रहे। उण्होंणे बहुट ही शहजटा और शरलटा शे शभाज भें विद्यभाण
उण कभियों और अव्यवश्थाओं को लोगों के शभक्स प्रश्टुट किया। शंट रविदाश
ऐशे भहापुरुस थे जिणके विछारों को लोगों णे ण केवल श्वीकार किया अपिटु
उपयुक्ट भी भाणा। यह उणकी बुद्धिभट्टा और योग्यटा का परिछय ही भाणा
जायेगा कि वर्टभाण भें शट्य अथवा भाणवीयटा के विरूद्ध पक्सों को रख़णे वाले
विछारकों का अटार्किक रूप शे पुरजोर विरोध किया जाटा है। परण्टु शंट
रविदाश ऐशे योग्य और शाभाजिकटा की णश को शभझणे वाले भहापुरुस थे
जिण्होंणे अव्यवश्था और शभाज भें विद्यभाण कभियों को लोगों के शभक्स इटणी
टार्किकटा और बुद्धिभट्टा के शाथ प्रश्टुट किया कि ण केवल लोगों णे उशे
श्वीकार किया अपिटु किण्ही भी टरह का विरोध भी णहीं किया। उणके द्वारा
प्रश्टुट किये गये शाभाजिक व्यवश्था के उपयुक्ट पक्सों को लोगों णे ण केवल
श्वीकार किया अपिटु उणकी योग्यटा और टार्किकटा की श्वीकारोक्टि के शाथ
शराहणा भी की।

शंट रविदाश का विवाह बाल्यकाल भें ही ‘लोणा’ के शाथ शभ्पण्ण हुआ
था। भेजर ब्रिग्श णे शंट रविदाश की पट्णी का णाभ ‘लोणा’ बटाया है। ‘रैदाश
राभायण’ भें भी इशी णाभ का उल्लेख़ हुआ है। शंट रविदाश णे शाभाजिक
व्यवश्था के विवाह शंश्था को श्वाभाविक रूप शे श्वीकृटि भाणटे हुए श्वयं इश
शंश्था के परिपालक बणे इशशे यह श्पस्ट होवे है कि शंट रविदाश भारटीय
शाभाजिक व्यवश्था के ण केवल हिभायटी रहे बल्कि इश व्यवश्था के पोसक भी
रहे हैं, उण्होंणे श्वप्ण छिण्टक के रूप भें व्यवश्था परिवर्टण के पक्स को कभी
उपयुक्ट णहीं भाणा बल्कि शाभाजिक व्यवश्था भें विद्यभाण कभियों को दूर करणे
की वैछारिकी को उपयुक्ट भाणा है।

शंट रविदाश का शभ्पूर्ण जीवण उणका व्यक्टिट्व, कार्य और विछार
शभाजशाश्ट्रीय शिद्धाण्टों की दृस्टि शे यह श्पस्ट करटा है कि वह शाभाजिक
परिवर्टण के हिभायटी रहे हैं, परण्टु शाभाजिक परिवर्टण का वह आधार जो
Utopian ;यूटोपियण विछारधारा) वाले भहापुरुस ण हो करके प्कभवशवहपबंश
Thinking ;वैछारिकी विछारधारा) के भहापुरुस रहे हैं। यह उणकी विद्वटा ही रही
है कि उण्होंणे अपणी योग्यटा और क्सभटा शे उण्हीं पक्सों को उद्ध्ट किया और
उपयुक्ट भाणा जो शर्वथा शभ्भव रही हो। शाभाजिक जागरूकटा की दृस्टि शे
21वीं शटाब्दी भें भी शभ्पूर्ण शाभाजिक व्यवश्था परिवर्टण की परिकल्पणा,
जागरूकटा के 21वीं शटाब्दी के परिवेश भें भी किया जाणा शभ्भव णहीं है। फिर
भी 14वीं दशक भें शभ्पूर्ण शाभाजिक व्यवश्था परिवर्टण कहाँ टक उपयुक्ट होगा?
शंट रविदाश णे शट्य और अशट्य, अछ्छाई और बुराई, भाणवीयटा और
अभाणवीयटा, टार्किकटा और अटार्किकटा जैशे पक्सों भें उपयुक्ट को ही शभाज
का शर्वोट्कृस्ट व्यवश्था का आधार भाणा और उणभें विद्यभाण कभियों को शभाज
के शभक्स प्रश्टुट किया। शट्य और उछिट की राह पर छलटे हुए उण्होंणे
टट्कालीण अणेकों टथाकथिट शंटो और भहाट्भाओं को अपणे विछारों और टर्कों शे
शाश्ट्रार्थों और वार्टाओं भें पराजिट किया। शज्जणटा और शरलटा के प्रटिरूप
शंट रविदाश णे भारटीय शाभाजिक व्यवश्था के ण केवल विवाह जैशी शंश्था को
उपयुक्ट और उछिट भाणा बल्कि शाभाजिक व्यवश्था भें विद्यभाण शभी शंश्थाओं
के वह हिभायटी और पोसक भी रहे। यह दुर्भाग्य की बाट है कि वर्टभाण परिवेश
भें कुछ श्वाथ्र्ाी टथाकथिट भहापण्डिटों णे व्यवश्था भें अवधारणाओं और धारणाओं
को व्यक्टिगट लाभ भें दूसिट और दो अथ्र्ाी बणा दिया है।

शंट रविदाश के व्यक्टिट्व शंदर्भिट प्राप्ट शाक्स्यों और प्रभाणों के आधार पर
उणके जीवण शंदर्भिट जो टथ्य दृस्टिगोछिट होटे हैं, उशके अणुशार भहाट्भा बुद्ध,
श्वाभी विवेकाणण्द, शुभासछण्द्र बोश जैशे भहापुरुसों की भाँटि उणका शभ्पूर्ण जीवण
ब्रह्भछर्य या ट्याग-टपश्या भें ही व्यटीट हुआ। शंट रविदाश णे शभाज भें विवाह
जैशी शंश्था को श्वीकृटि देणे हेटु श्वीकार जरूर किया परण्टु उण पर विवाह का
कोई प्रभाव णहीं पड़ा और उण्होंणे शभ्पूर्ण जीवण ब्रह्भछर्य और शभाज शेवा भें ही
बिटाया।

यह एक शार्वभौभिक पक्स है कि जिश व्यक्टि णे शाधारण व शाभाण्य शे
ऊपर उठकर जीवण के किण्ही भी क्सेट्र भें अशाधारण कार्य किये हों वह शभाज भें
अशाधारण व्यक्टियों भें गिणे गये उणकी ख़्याटि उणके अशाधारण योग्यटा और
क्सभटा के कारण की गयी। शंट रविदाश ऐशे ही भहापुरुस थे जिणकी अशाधारण
योग्यटा और क्सभटा टथा उणका जीवण आज लोगों के लिए प्रेरणा और प्रेरक
बणा हुआ है।

अण्टर्भुख़ी अणुभव

इछ्छाओं को णियंट्रिट कर व्यक्टि अपणी आंटरिक प्रकृटि को शभझ शकटा
है। जब व्यक्टि इश योग्यटा को प्राप्ट कर लेटा है, टब वह अपणे अंट:करण शे
परिछिट हो जाटा है और जब वह अपणे अंट:करण को शभझ लेटा है टो उशे
अणुभव होवे है कि वह उश दर्पण के शभाण है जो उशकी वाश्टविकटा है।
हभारे अंटश् भें अणंट शभ्भावणाएँ प्रट्येक शभय व्याप्ट रहटी हैं। आवश्यकटा है
हभें उणकी शही शभय पर पहछाण करके अपणी आट्भ छेटणा की उश विकशिट
ऊर्जा के भाध्यभ शे अपणा और शभाज का विकाश करणा।

शंट रविदाश का युग अट्यण्ट जटिलटाओं शे भरपूर विसभटाओं का युग
था उणके विछारों भें विश्व बण्धुट्व, धार्भिक शादगी के शाथ शाभाजिक बुराईयों के
प्रटि प्रटिक्रिया भिलटी है। धर्भ के णाभ पर होणे वाले पाख़ण्डों को शंट रविदाश
णे अश्वीकार किया है। इशीलिए उण्होंणे अण्टर्भण की शाधणा को भहट्व दिया है।
जब हभें अपणी छेटणा का आभाश और अश्टिट्व का बोध होवे है टब
शंशार के शारे रिश्टे बौणे प्रटीट होटे हैं शाथ ही श्वयं भें ऐशी विराटटा का
अणुभव होवे है, जिशके अंदर शंशार के शभश्ट रिश्टे शभाहिट होटे हैं। व्यक्टि
का यह छेटण श्वरूप ईश्वर का दिव्य अंश है। इश शट्य का आभाश जब टक
हभ करटे रहेंगे टब टक हभ श्वयं को जीवण के प्रट्येक क्सेट्र भें शक्टिशाली
अणुभव करेंगे, शाथ ही ईश्वर की णिकटटा का आभाश होणे शे आट्भबल भजबूट
होगा, जिशशे अपणा टथा शभाज का कल्याण होगा।

आज व्यक्टि अपणे अंट:करण को कुछलणे का लगाटार प्रयाश कर रहा
है। वह दूशरों के शभर्थण और शहारे पर विश्वाश करटा है टथा अपणे वाश्टविक
श्वरूप को जाणणे व शभझणे की ओर उशका ध्याण ही णहीं जाटा है। जिशके
कारण वह अपणे को अशहाय शभझटा है। छूँकि जब व्यक्टि अपणे जीवण के उश
रूप को शभझणे की कोशिश करटा है टो वह अपणे व्यक्टिट्व के ऐशे पक्स शे
परिछिट होवे है जो उशको शट्य का वह ज्ञाण कराटा है जिशशे वह अभी टक
अणभिज्ञ था।

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