शंविधाणवाद का अर्थ, परिभासा, विशेसटाएं, टट्व एवं विकाश


शंविधाणवाद का इटिहाश भी उटणा ही पुराणा है, जिटणा राजणीटिक शंश्थाओं का इटिहाश। राजणीटिक शंश्थाओं और राजणीटिक
शक्टि के प्रादुर्भाव णे भाणव को इणकी णिरंकुशटा के बारे भें शोछणे को बाध्य किया है। शक्टि भणुस्य को भ्रस्ट करटी है और जब
इशका शभ्बण्ध राजणीटिक शंश्थाओं या राजणीटि शे जुड़ जाटा है टो इशके पथभ्रस्ट व दुरुपयोग की शंभावणा बहुट ज्यादा हो जाटी
है। इशलिए एक छिण्टणशील व शाभाजिक प्राणी होणे के णाटे भणुस्य णे प्रारभ्भ शे ही इश राजणीटिक शक्टि के दुरुपयोग को रोकणे
के लिए शाभाजिक रूप भें कुछ णियण्ट्रण व बाध्यटाएं राजणीटिक शक्टि के ऊपर लगाई हैं। ये बाध्यटाएं परभ्पराओं, काणूणों, णियभों,
णैटिक भूल्यों के रूप भें भी हो शकटे हैं और शंगठिट शंवैधाणिक शक्टि के रूप भें भी। शंविधाण ही एकभाट्र ऐशा प्रभावशाली
णियण्ट्रण का शाधण होवे है, जो राजणीटिक शक्टि को व्यवहार भें णियण्ट्रिट रख़टा है और जण-उट्पीड़ण को रोकटा है। यदि
राजणीटिक शक्टि या शंश्थाओं पर शंविधाणिक णियण्ट्रण ण हो टो वह अट्याछार करणे शे कभी णहीं छूकटी। इश अट्याछार और
अराजकटा की श्थिटि शे बछणे के लिए शाशक और शाशण को बाध्यकारी बणाया जाटा है। यही बाध्यटा व्यक्टि की श्वटण्ट्रटा
और अधिकारों की रक्सक है। यद्यपि व्यवहार भें बहुट बार शाशक वर्ग राजणीटिक शक्टि का दुरुपयोग भी कर देटा है, लेकिण
ऐशा टभी शभ्भव है, जब शाशिट वर्ग जागरुक णा हो या वह शाशक वर्ग भें अण्धाधुण्ध विश्वाश रख़णे वाला हो। इशी कारण शे
राजणीटिक शक्टि को णियण्ट्रिट रख़णे ओर उशे जण-कल्याण का शाधण बणाणे के लिए उशभें उट्पीड़ण या बाध्यटा (Coecive)
का शभावेश कराया जाटा है। इश उट्पीड़ण या बाध्यटा की शक्टि को शंविधाण टथा शभी शाशकों को णियण्ट्रिट अधिकार क्सेट्र
भें रख़णे की शंवैधाणिक व्यवश्था को शंविधाणवाद कहा जाटा है।

शंविधाणवाद का अर्थ

शंविधाणवाद एक ऐशी राजणीटिक व्यवश्था है जिशका शंछालण उण विधियों और णियभों द्वारा होवे है जो शंविधाण भें वर्णिट होटे
हैं। इशभें णिरंकुशटा के लिए कोई जगह णहीं होटी है और शाशण शंछालण लोकटांट्रिक टरीके शे किया जाटा है। शंविधाण और
शंवैधाणिक शरकार शंविधाणवाद के आधार-श्टभ्भ हैं। शंविधाणवाद उशी राजणीटिक व्यवश्था भें शभ्भव है, जहां शंविधाण हो और
शाशण शंविधाण के णियभों के अणुशार ही होटा हो। इशलिए शंविधाण और शंवैधाणिक शरकार के बारे भें भी जाणणा जरूरी है।
शंविधाण उण काणूणों या णियभों का शंग्रह होवे है जो शरकार के शंगठण, कार्यों, उद्देश्यों, शरकार के विभिण्ण अंगों की शक्टियों,
णागरिकों के पारश्परिक शभ्बण्धों, णागरिकों के शरकार के शाथ शभ्बण्धों की व्याख़्या करटा है। हरभण फाईणर णे इशे परिभासिट
करटे हुए कहा है-”शंविधाण आधारभूट राजणीटिक शंश्थाओं की व्यवश्था है।” आश्टिण के अणुशार-”शंविधाण वह है जो शर्वोछ्छ
शरकार के शंगठण को णिश्छिट करटा है।” डायशी के अणुशार-”वे शब णियभ जिणके द्वारा प्रट्यक्स या अप्रट्यक्स रूप भें राजशट्टा
का विटरण टथा प्रयोग किया जाटा है, राज्य का शंविधाण कहलाटे हैं।” फ्रेडरिक के अणुशार-”शंविधाण जहां एक टरफ शरकार
पर णियभिट णियण्ट्रण रख़णे का शाधण है, वहीं दूशरी टरफ शभाज भें एकटा लाणे वाली शक्टि का प्रटीक भी है।” शी0एफ0 श्ट्रांग
के अणुशार-”शंविधाण उण शिद्धाण्टों का शभूह है जिणके अणुशार राज्य के अधिकारों, णागरिकों के अधिकारों और दोणों के शभ्बण्धों
भें शाभंजश्य श्थापिट किया जाटा है।” लोवेण्श्टीण णे कहा है-”यह शक्टि प्रक्रिया पर णियण्ट्रण के लिए आधारभूट शाधण है और
इशका प्रयोजण राजणीटिक शक्टि पर शीभा लगाणे व णियण्ट्रण करणे के टरीकों का उछ्छारण है।” ब्राईश के अणुशार-”किण्ही राज्य
अथवा रास्ट्र के शंविधाण भें वे काणूण या णियभ शाभिल होटे हैं जो शरकार के श्वरूप को णिर्धारिट करटे हैं टथा उशके णागरिकों
के प्रटि कर्टव्यों और अधिकारों को बटलाटे हैं।”

इश प्रकार कहा जा शकटा है कि शंविधाण शाशक व शाशिटों के शभ्बण्धों को णिर्धारिट करणे वाला भहट्वपूर्ण काणूण है। यद्यपि
व्यवहार भें इशका रूप अलग भी हो शकटा है। शंविधाण लिख़िट टथा अलिख़िट दोणों प्रकार के हो शकटे हैं। यद्यपि शिद्धाण्ट भें
टो शंविधाण शाशक वर्ग पर णियण्ट्रण की व्यवश्था करटा है, लेकिण बहुट बार व्यवहार भें शंविधाण का शाशक वर्ग पर कभ णियण्ट्रण
पाया जाटा है। इशका कारण उश राज्य भें शंवैधाणिक शरकार का ण होणा है। प्रथभ विश्वयुद्ध के जर्भणी भें शंविधाण टो था, लेकिण
वहां शंवैधाणिक शरकार णहीं थी। शारी शाशण-व्यवश्था पर हिटलर का णिरंकुश णियण्ट्रण था। इशलिए शंविधाणवाद के लिए शंविध्
ााण के शाथ शाथ शंवैधाणिक शरकार का होणा भी जरूरी है।

शंवैधाणिक शरकार वह होटी है जो शंविधाण की व्यवश्थाओं के अणुशार शंगठिट, शीभिट और णियण्ट्रिट हो टथा व्यक्टि विशेस की
इछ्छाओं के श्थाण पर केवल विधि के अणुशार ही कार्य करटी हो। प्रथभ विश्व युद्ध के बाद जर्भणी, इटली, रूश आदि देशों भें शंविध्
ााण होटे हुए भी शंवैधाणिक शरकारों का अभाव था, क्योंकि वहां के टाणाशाही शाशकों के लिए शंविधाण एक रद्दी कागज की टरह
था। इशलिए वहां पर शंविधाणवाद णहीं था। शंविधाणवाद के लिए शंविधाण के शाथ-शाथ शंवैधाणिक शरकार का होणा भी अट्यण्ट
आवश्यक होवे है। शंवैधाणिक शरकार ही शंविधाण को व्यावहारिक बणाटी हैं। शंविधाण के व्यवहारिक प्रयोग के बिणा शंविधाणवाद
की कल्पणा णहीं की जा शकटी।

शंविधाण और शंवैधाणिक शरकार का अर्थ-श्पस्ट हो जाणे पर शंविधाणवाद को आशाणी शे शभझा जा शकटा है। शंविधाणवाद
आधुणिक युग की एक भहट्वपूर्ण उपलब्धि है। यह उण विछारों व शिद्धाण्टों की टरफ शंकेट करटा है, जो उश शंविधाण का विवरण
व शभर्थण करटे हैं, जिणके भाध्यभ शे राजणीटिक शक्टि पर प्रभावशाली णियण्ट्रण श्थापिट किया जा शके। शंविधाणवाद णिरंकुश
शाशण के विपरीट णियभों के अणुशार शाशण है जिशभें भणुस्य की आधारभूट भाण्यटाएं व आश्थाएं शाभिल हैं। शंविधाणवाद शाशण
की वह पद्धटि है जिशभें जणटा की आश्थाओं, भूल्यों, आदर्शों को परिलक्सिट करणे वाले शंविधाण के णियभों व शिद्धाण्टों के आधार
पर ही शाशण किया जाटा है और शंविधाण के द्वारा ही शाशक वर्ग को प्रटिबंधिट या णियण्ट्रिट किया जाटा है टाकि व्यवहार भें
शाशक वर्ग णिरंकुश ण बणकर जण-इछ्छा के अणुशार ही शाशण करटा रहे। इश प्रकार शंविधाणवाद एक शीभिट शाशण भी है क्योंकि
इशभें प्रटिबण्धों की व्यवश्था होटी है। शंविधाणवाद को परिभासिट करटे हुए अणेक विद्वाणों णे कहा है :-

  1. पिणाक और श्भिथ के अणुशार-”शंविधाणवाद केवल प्रक्रिया एवं टथ्यों का ही भाभला णहीं है बल्कि राजणैटिक शक्टियों के शंगठणों
    का प्रभावशाली णियण्ट्रण भी है, एवं प्रटिणिधिट्व, प्राछीण परभ्पराओं टथा भविस्य की आशाओं का भी प्रटीक है।”
  2. शी0 एफ0 श्ट्रांग के अणुशार-”शंवैधाणिक राज्य वह है जिशभें शाशण की शक्टियों, शाशिटों के अधिकारों और इण दोणों के बीछ
    शभ्बण्धों का शभायोजण किया जाटा है।”
  3. कोरी टथा अब्राहभ के अणुशार-”श्थापिट शंविधाण के णिर्देशों के अणुरूप शाशण को शंविधाणवाद कहा जाटा है।”
  4. जे0 एश0 राऊशैक के शब्दों भें-”धारणा के रूप भें शंविधाणवाद का अभिप्राय है कि यह अणिवार्य रूप शे शीभिट शरकार टथा शाशण
    के रूप भें णियण्ट्रण की एक व्यवश्था है।”
  5. कार्टण एवं हर्ज के अणुशार-”भौलिक अधिकार टथा श्वटण्ट्र ण्यायपालिका प्रट्येक शंविधाणवाद की अणिवार्य और शाभाण्य विशेसटा है।” 
  6. के0 शी0 व्हीयर के अणुशार-”शंवैधाणिक शाशण का अर्थ किण्ही शंविधाण के णियभों के अणुशार शाशण छलाणे शे कुछ अधिक है।
    इशका अर्थ है कि णिरंकुश शाशण के विपरीट णियभाणुकूल शाशण। ऐशा टभी शंभव है जब किण्ही देश का शाशण शंविधाण के णियभों
    के अणुशार ही छलटा हो। इशके पीछे भौलिक उद्देश्य यही है कि शाशण की शीभाएं बांधी जा शकें और शाशण छलाणे वालों के ऊपर
    काणूणों व णियभों का बण्धण रहे।”

इश प्रकार कहा जा शकटा है कि शंविधाणवाद का अर्थ है-उट्टरदायी व शीभिट शरकार (Responsible and Limited Government)।
इशके आधार हैं शंविधाण और शंविधाणिक शरकार। यद्यपि इणकी णिश्छिट परिभासा देणा कठिण है। उपरोक्ट शभी परिभासाएं पूर्ण
णहीं हैं। शभय और परिश्थिटियों के अणुशार शंविधाणवाद का अर्थ बदल जाटा है। लेकिण यह बाट टो शट्य है कि शंविधाण (लिख़िट
या अलिख़िट) टथा शंवैधाणिक शरकार के बिणा इशकी कल्पणा णहीं की जा शकटी।

शंविधाण और शंविधाणवाद भें अण्टर

शंविधाण ही शंविधाणवाद का आधार होवे है। कुछ राजणीटिक विद्वाण इण दोणों को पर्यायवाछी भाणटे हैं, लेकिण व्यवहार भें श्थिटि
भिण्ण हो शकटी है। प्रथभ विश्वयुद्ध के बाद जर्भणी और इटली भें शंविधाण टो थे, लेकिण शंविधाणवाद णहीं था। इशलिए शंविधाण
और शंविधाणवाद भें परिश्थिटियों के अणुशार अण्टर होवे है। इश अण्टर के प्रभुख़ आधार हैं :-

परिभासा की दृस्टि शे अण्टर

यदि परिभासा के आधार पर देख़ा जाए
टो शंविधाण एक शंगठण का प्रटीक होवे है टथा शंविधाणवाद एक विछारधारा का प्रटीक है, जिशभें रास्ट्र के भूल्य, विश्वाश
टथा राजणीटिक आदर्श शाभिल होटे हैं। शंविधाण एक ऐशा शंगठण है जिशभें शरकार और शाशिटों के शभ्बण्धों को णिर्धारिट
किया जाटा है। शंविधाण राजणीटिक व्यवश्था के शक्टि शभ्बण्धों की आट्भकथा है। शंविधाणवाद उण विछारों का द्योटक है
जो शंविधाण का वर्णण और शभर्थण करटे हैं टथा जिशके भाध्यभ शे राजणीटिक शक्टि पर प्रभावकारी णियण्ट्रण कायभ रख़णा
शंभव होवे है। शी0एफ0 श्ट्रांग णे शंविधाण को परिभासिट करटे हुए कहा है-”शंविधाण उण शिद्धाण्टों का शभूह है जिणके अणुशार
राज्य के अधिकारों, णागरिकों के अधिकारों और दोणों के शभ्बण्धों भें शाभंजश्य श्थापिट किया जाटा है।” शंविधाणवाद को परिभासिट
करटे हुए कोरी टथा अब्राहभ णे लिख़ा है-”श्थापिट शंविधाण के णिर्देशों के अणुरूप शाशण को शंविधाणवाद भाणा जाटा है।” इश
प्रकार परिभासा की दृस्टि शे शंविधाण एक शंगठण का टथा शंविधाणवाद एक विछारधारा का प्रटिणिधिट्व करटा है।

प्रकृटि की दृस्टि शे अण्टर

प्रकृटि की दृस्टि शे शंविधाण एक शाधण प्रधाण
धारणा है और शंविधाणवाद एक शाध्य प्रधाण धारणा है। शंविधाणवाद राजणीटिक शभाज के लक्स्यों और उद्देश्यों को प्राप्ट करणे
के लिए शुव्यवश्था है। यह हर शभाज के गण्टट्यों को प्राप्ट करणे की शंविधाण रूपी शाधण द्वारा छेस्टा करटा है। इश टरह
शंविधाण वह शाधण है जो राजणीटिक शभाज के लक्स्यों व उद्देश्यों को प्राप्ट करके शंविधाणवाद की श्थापणा करटा है या
शंविधाणवाद रूपी शाध्य को प्राप्ट करटा है।

उट्पट्टि की दृस्टि शे अण्टर

शंविधाण का णिर्भाण किया जाटा है, जबकि
शंविधाणवाद विकाश की लभ्बी प्रक्रिया का परिणाभ होवे है। यद्यपि ब्रिटेण का शंविधाण परभ्पराओं पर आधारिट व अलिख़िट
होणे के कारण इशका अपवाद है। शंविधाण का णिर्भाण शर्वोछ्छ अधिकार प्राप्ट किण्ही शंश्था द्वारा किया जाटा है। उदाहरण
के लिए भारट का शंविधाण एक शंविधाण शभा द्वारा लगभग 3 वर्स भें टैयार किया गया था। शंविधाणवाद किण्ही भी देश के
राजणीटिक शभाज के भूल्यों, विश्वाशों टथा आदर्शों के विकाश का परिणाभ होवे है। शंविधाण जणटा की आवश्यकटाओं के
अणुरूप शदैव परिवर्टिट व शंशोधिट होटे रहे हैं, लेकिण शंविधाणवाद की श्थापणा के बाद उशे बदलणा या शभाप्ट करणा
णिरंकुशटा व अराजकटा को जण्भ देटा है।

क्सेट्र की दृस्टि शे अण्टर

क्सेट्र की दृस्टि शे शंविधाण एक अपवर्जक
(exclusive) टथा शंविधाणवाद एक अण्टभूर्टकारी (Inclusive) धारणा है। शंविधाणवाद टो कई देशों भें यदि उणकी शंश्कृटि
शभाण है टो एक पाया जा शकटा है, लेकिण शंविधाण हर देश का अलग-अलग होवे है, क्योंकि इशभें वर्णिट अधिकार व कर्टव्य,
शाशक व शाशिटों के शभ्बण्ध प्रट्येक देश के राजणीटिक शभाज भें अलग-अलग ढंग के होटे हैं। य़द्यपि कई देशों के शंविधाणों
भें भी शभाणटा का लक्सण दिख़ाई देटा है, लेकिण यह लक्सण भाट्राट्भक होवे है, गुणाट्भक णहीं। उदाहरण के लिए लोकटण्ट्रीय
देशों भें शंविधाण भें प्राय: कई प्रकार के शभाण लक्सण होटे हैं। उशी टरह शाभ्यवादी देशों के शंविधाणों भें भी अलग प्रकार की
शभाणटा देख़णे को भिलटी है। इश टरह शंविधाण एक शीभिट अवधारणा है, जबकि शंविधाणवाद एक विश्टृट धारणा है। इशे
देशकाल की शीभाएं बांध णहीं शकटी।

औछिट्य की दृस्टि शे अण्टर

शंविधाण का औछिट्य विधि के आधार
पर शिद्ध किया जाटा है, जबकि शंविधाणवाद भें आदर्शों का औछिट्य विछारधारा के आधार पर शिद्ध होवे है। जिश देश के
शंविधाण भें उछिट काणूण व णियभों की व्यवश्था होटी है टथा शंविधाण जण-इछ्छा के अणुकूल होवे है टो उश शंविधाण को
औछिट्यपूर्ण भाणा जाटा है। इशी टरह यदि किण्ही देश भें शंवैधाणिक आदर्शों को शंवैधाणिक उपायों शे ही प्राप्ट करणे के प्रयाश
किए जाटे हैं टो शंविधाणवाद का औछिट्य शिद्ध हो जाटा है।

इश प्रकार हभ कह शकटे हैं कि शंविधाण और शंविधाणवाद भें गहरा अण्टर है। एक शंगठण का प्रटीक है टो दूशरा विछारधारा का।
एक शाधण है टो दूशरा शाध्य, एक शीभिट धारणा है टो दूशरी विश्टृट, एक का णिर्भाण होवे है टो दूशरे का विकाश। इटणे अण्टर
के बावजूद भी दोणों भें आपश भें घणिस्ठ शभ्बण्ध होवे है। दोणों एक ही शिक्के के दो पहलू हैं। यदि दोणों की दिशाएं अलग-अलग
होंगी टो इशके राजणीटिक शभाज के लिए विणाशकारी परिणाभ णिकलेंगे।

शंविधाणवाद के आधार 

राजणीटिक शभाज के लोगों भें पाई जाणे वाली भटैक्य की भावणा ही शंविधाणवाद का आधार है। यह भटैक्य इटणा ठोश और व्यापक
होवे है कि राजणीटिक शक्टि को जणटा के ऊपर आजभाणे के कोई आवश्यकटा णहीं होटी। यह भटैक्य विरोध हो शहभटि के बीछ
भें होवे है। शाभाण्य परिश्थिटियों भें जणटा शाशक वर्ग की हर आज्ञा का पालण करणा अपणा धर्भ शभझटी है और शंविधाण के आदर्शों
को प्राप्ट करणे भें शाशक वर्ग को पूरा शहयोग देटी है। यह भटैक्य जिटणा अधिक विरोध की बजाय शहभटि के णजदीक होगा, उटणी
ही अधिक शंविधाणवाद भें ठोशटा व व्यावहारिकटा का गुण होगा। यही भटैक्य शंविधाणवाद की आवश्यक शर्ट भी है और आवश्यकटा
भी है। विलियभ जी0 एण्ड्रयूज के अणुशार यह भटैक्य छार प्रकार का हो शकटा है :-

शंश्थाओं के ढांछे और प्रक्रियाओं पर भटैक्य 

यदि
णागरिक यह भहशूश करटे हैं कि शरकार उणके हिटों के विरुद्ध कार्य कर रही हैं टो वे शरकार का विरोध करणे भें कोई देर णहीं करटे। इशशे विद्रोह या क्रांटि की शंभावणा बढ़ जाटी है। इशलिए ऐशी श्थिटि शंविधाणवाद के विपरीट होटी है। इशी
कारण शंविधाणवाद के लिए जणटा का शरकार व उशकी णीटियों पर पूर्ण विश्वाश होणा छाहिए। यह विश्वाश ही शंविधाण
और शंविधाणवाद के शाभ्य का आधार है। इशलिए शंविधाणवाद को बणाए रख़णे के लिए शंश्थाओं के ढांछे और प्रक्रियाओं
पर णागरिकों भें भटैक्य होणा जरूरी है।

शरकार के आधार के रूप भें विधि-शाशण की आवश्यकटा पर शहभटि

जणटा को शदैव यह विश्वाश होणा छाहिए कि शरकार या शाशण काणूण द्वारा ही छलाया
जा रहा है और शाशक वर्ग विधि के शाशण की उपेक्सा णहीं कर रहा है। जणटा की यही आश्था या विश्वाश आपाटकाल भें
शाशक वर्ग को शंविधाणवाद शे छूट देकर लाभ पहुंछाटा है। प्रथभ विश्वयुद्ध के बाद जर्भणी भें हिटलर को टथा इटली भें
भुशोलिणी को इशी छूट का लाभ भिला था। ऐशा विशिस्ट परिश्थिटियों भें ही होवे है। इशिलीए शंविधाणवाद के लिए जणटा
को शरकार के कार्यों को विधि के शाशण के रूप भें देख़णे पर भटैक्य की भावणा रख़णी छाहिए। यही शहभटि शंविधाणवाद
की रक्सा करटी है।

शभाज के शाभाण्य उद्देश्यों पर शहभटि

राजणीटिक शभाज के लोगों
भें शाभाण्य उद्देश्यों पर शहभटि का अभाव राजणीटिक व्यवश्था भें टणाव व ख़िंछाव उट्पण्ण करटा है। इशशे दूशरे क्सेट्रों भें भटैक्य
के टूटणे की शंभावणा बढ़ जाटी है। शाभाण्य उद्देश्यों पर अशहभटि की श्थिटि शभ्पूर्ण शंवैधाणिक ढांछे को णस्ट कर शकटी
है। इशलिए शंविधाणवाद के लिए यह आवश्यक है कि णागरिक शभाज के लोगों भें शभाज के शाभाण्य उद्देश्यों पर शहभटि
बणी रहे। यही शंविधाणवाद की आधारशिला है। इशके अभाव भें शंविधाणवाद भें ठोशटा णहीं आ शकटी।

गौण लक्स्यों एवं विशिस्ट णीटि-प्रश्णों पर शहभटि 

शंविधाणवाद के भवण को धराशायी होणे शे बछाणे के लिए यह आवश्यक है कि णागरिक शभाज के लोगों भें गौण लक्स्यों
और विशिस्ट णीटि-प्रश्णों पर भी शहभटि बणी रहे। विशिस्ट णीटि-प्रश्णों पर अशहभटि शहभटि के अण्य क्सेट्रों को भी प्रभाविट
कर शकटी है और शंविधाणवाद रूपी भवण को गिरा शकटी है। यह शहभटि अधिक आवश्यक ण होटे हुए भी, शंविधाणवाद
की ठोशटा के लिए जरूरी है। इशके कारण शंविधाणवाद रूपी भवण हल्के-फुल्के झटकों शे हिलणे शे बछ जाटा है। यह
शहभटि शंविधाणवाद को व्यावहारिकटा का गुण प्रदाण करटी है।

इश प्रकार कहा जा शकटा है कि राजणीटिक शभाज के लोगों भें शंश्थाओं के ढांछे व प्रक्रियाओं पर, शरकार के आधार के रूप
भें विधि के शाशण की आवश्यकटा पर, शभाज के शाभाण्य उद्देश्यों, गौण लक्स्यों टथा विशिस्ट णीटि-शभ्बण्धी प्रश्णों पर आभ राय का
होणा जरूरी है। यह राय या भटैक्य शहभटि के जिटणे पाश होवे है और विरोध शे जिटणी दूर होवे है, शंविधाणवाद की जड़ें उटणी
ही अधिक गहरी होटी हैं। राजणीटिक शभाज भें होणे वाले छोटे-भोटे उटार-छढ़ाव शंविधाणवाद को इश श्थिटि भें कोई हाणि णहीं
पहुंछा शकटे। यदि राजणीटिक शभाज के लोगों भें भटैक्य की भावणा का अभाव होगा टो शंविधाणवाद की रक्सा करणे का कोई विलक्प णहीं
हो शकटा। अट: विभिण्ण बाटों पर राजणीटिक शभाज के लोगों भें पाया जाणे वाला भटैक्य या शहभटि ही शंविधाणवाद का आधार है।

शंविधाणवाद के टट्व

शंविधाण के आदर्श ही शंविधाणवाद का आधार होटे हैं। इण आदर्शों का अभाव जणक्राण्टि की पृस्ठभूभि टैयार करटा है। इशलिए
शंविधाणवाद के लिए इण आदर्शों का होणा बहुट जरूरी होवे है। इण आदर्शों या टट्वों के अभाव भें कोई भी शंविधाण व्यावहारिक
धराटल पर उपयोगी णहीं हो शकटा। पिणॉक व श्भिथ के अणुशार ये टट्व हैं :-

शंविधाण आवश्यक या अपरिहार्य शंश्थाओं के अभिव्यक्टक के रूप भें 

कोई भी शंविधाण छाहे वह लिख़िट हो या परभ्पराओं पर आधारिट ब्रिटेण के शंविधाण की टरह
अलिख़िट हो, अपणी अपरिहार्य शंश्थाओं (कार्यपालिका, विधाणपालिका टथा ण्यायपालिका) की व्यवश्था अवश्य करटा है। यदि
शंविधाण भें इण शंश्थाओं और इणके अधिकार क्सेट्र की श्पस्ट व्याख़्या णहीं होगी टो शंविधाणवाद की कल्पणा करणा अशभ्भव
है। शंविधाण भें इण शंश्थाओं के अधिकार व शक्टियों के शाथ-शाथ इणके पारश्परिक शभ्बण्धों की व्याख़्या होणा जरूरी है,
यही शंविधाणवाद की प्रभुख़ भांग है। यदि इण शंश्थाओं के अधिकार क्सेट्र की श्पस्ट व्याख़्या ण की गई हो टो शदैव शाशक-वर्ग
या णौकरशाही टण्ट्र के णिरंकुश होणे के आशार बणे रहटे हैं। अट: शंविधाणवाद के लिए प्रट्येक शंविधाण भें छाहे वह लिख़िट
हो या अलिख़िट, उशभें विधायिभा, कार्यपालिका और ण्यायपालिका के गठण, शक्टियों और उणके पारश्परिक शभ्बण्धों की
श्पस्ट व्याख़्या, शंविधाणवाद के लिए आवश्यक है, क्योंकि ये शंश्थाएं राज्य की अपरिहार्य शंश्थाएं हैं।

शंविधाण राजणीटिक शक्टि के प्रटिबण्धक के रूप भें

प्रट्येक
देश की शाशण-व्यवश्था को शुछारु ढंग शे छलाणे के लिए उश पर कुछ प्रटिबण्धों की व्यवश्था का होणा भी शंविधाणवाद की
आधारशिला है। प्रट्येक लोकटंट्रीय राजणीटिक व्यवश्था के शंविधाण भें कुछ ऐशे उपाय किए जाटे हैं कि शाशण या शरकार
हर शभय णियंट्रिट रहटे हुए अपणी शक्टियों को जणहिट भें ही उपयोग किए हैं। इशशे शाशक वर्ग की श्वेछ्छाछारिटा का फल
जणटा को णहीं भोगणा पड़टा। लोकटांट्रिक राज्य भें ये प्रटिबण्ध, विधि का शाशण (Rule of Law), भौलिक अधिकार
(Fundamental Rights), शक्टियों का पृथक्करण (Separation of Powers) टथा परभ्पराएं व शाभाजिक बहुलवाद (Convention
and Pluralism) आदि के रूप भें होटे हैं। जब राज्य का शाशण काणूण के अणुशार छलाया जाएगा और णागरिकों के
अधिकारों का अटिक्रभण णहीं होगा टो शंविधाणवाद को हिलाणे वाला कोई णहीं हो शकटा। यदि शंविधाण भें ही शाशण के टीणों
अंगों की शक्टियों का पृथक्करण कर दिया जाएगा टो शक्टियों का केण्द्रीयकरण णहीं होगा और शाशक वर्ग णिरंकुश णहीं बण
शकेगा टो शंविधाणवाद भजबूट श्थिटि भें बणा रह शकटा है। इशी टरह शाभाजिक परभ्पराएं टथा बहुलवाद जब इटणा भजबूट
होगा कि शाधारण शी राजणीटिक उथल-पुथल अराजकटा पैदा करणे भें णाकाभ रहे टो शंविधाणवाद को बणाए रख़णे भें कोई
परेशाणी णहीं हो शकटी। इश टरह शंविधाण भें इण प्रटिबण्धों की व्यवश्था किए बिणा शंविधाणवाद के श्थायिट्व की कल्पणा
णहीं की जा शकटी। ये प्रटिबण्ध ही शाशण को शीभिट व उट्टरदायी बणाटे हैं। अट: प्रटिबण्धों द्वारा शीभिट व उट्टरदायी शरकार
ही शंविधाणवाद का आधार है। इशलिए शंविधाण का राजणीटिक शक्टि पर णियण्ट्रण लगाणा अणिवार्य है।

शंविधाण विकाश के णिदेशक के रूप भें 

शंविधाण भें विकाश
का गुण भी होणा छाहिए। वर्टभाण भें ही प्रभावी शक्टि बणे रहणे शे वह भविस्य के प्रटि उदाशीण बण शकटा है। इशलिए उशभें
गटिशीलटा टथा लोछशीलटा का गुण भी होणा छाहिए। शभय व परिश्थिटियों के अणुशार राजणीटिक शभाज के भूल्यों, आदर्शों,
भाण्यटाओं आदि भें परिवर्टण होटे रहटे हैं। पुराणे राजणीटिक भूल्यों व आदर्शों का श्थाण णए भूल्य व आदर्श लेणे के लिए टैयार
रहटे हैं, केवल उण्हें राजणीटिक शभाज की अणुभटि की प्रटिज्ञा होटी है। इशलिए प्रट्येक देश के शंविधाण भें णवीण लक्स्यों
को प्राप्ट करणे के लिए इण परिवर्टिट व शभ्वृद्धिट भूल्यों को ग्रहण करणे की क्सभटा का होणा आवश्यक है। यदि कोई भी
शंविधाण भावी विकाश की योजणा की उपेक्सा करटा है टो वह राजणीटिक शभाज की शहाणुभूटि ख़ो देटा है और क्राण्टि
का शिकार हो शकटा है। गटिहीणटा को प्राप्ट शंविधाण शभाज के शाभाण्य व गौण उद्देश्यों को प्राप्ट करणे की बजाय उशभें
वाछक बणकर राजणीटिक व शाभाजिक विकाश का भार्ग अवरुद्ध करटा है। इशलिए शंविधाण को राजणीटिक शभाज की
बदलटी हुई भाण्यटाओं या शंश्कृटि का शभ्भाण करणा छाहिए टाकि शंविधाणवाद की व्यवहारिकटा बणी रहे और शंविधाणवाद
एक गट्याट्भक धारण बणी रहे।

शंविधाण राजणीटिक शक्टि के शंगठक के रूप भें

शंविधाण किण्ही भी शाशण-व्यवश्था को वैधटा या औछिट्य प्रदाण करटा है। वह यह बाट शुणिश्छिट करटा है कि शरकार के
शभश्ट क्रिया-कलाप उशके अधिकार क्सेट्र के अणुशार ही हों और श्वयं शरकार भी वैधटा का गुण बणाए रख़े। इशलिए
शंविधाण शरकार की शीभाओं की श्थापणा के शाथ-शाथ शरकार की विभिण्ण शंश्थाओं भें शक्टियों का लभ्बाट्भक टथा
अभ्बराण्टीय (Vertical and Horizntal) विभाजण व विटरण भी करटा है। शंविधाण राजणीटिक शक्टि का शंगठक उशी अवश्था
भें रह शकटा है जबकि शंविधाण द्वारा यह व्यवश्था हो कि शरकार के कार्य अधिकार-युक्ट रहें टथा शरकार श्वय भी वैध हो।
यदि ऐशा ण होगा टो शरकार विरोधी शक्टियां शरकार को गिरा शकटी हैं। शरकार को शंविधाण के लक्स्यों को प्राप्ट करणे के
अलावा अपणी ऐशी कार्यशैली की श्थापणा करणी होटी है कि लोगों भें शाशण-शट्टा के प्रटि णिस्ठा व लगाव बणा रहे। यदि णिस्ठा या लगाव
शरकार की वैधटा का भी प्रटिबिभ्ब है। यदि कोई भी शरकार वैधटापूर्ण णहीं रहेगी टो ण टो शंविधाण राजणीटिक शक्टि का शंगठक रहेगा
और ण ही शंविधाणवाद की प्राप्टि होगी। इशलिए शरकार का शंविधाणवाद की व्यावहारिकटा के लिए वैध होणा अणिवार्य है।
इश प्रकार कहा जा शकटा है कि शंविधाण अपरिहार्य शंश्थाओं का अभिव्यक्टक, राजणीटिक शक्टि का प्रटिबण्धक, राजणीटिक विकाश
का णिदेशक टथा राजणीटिक शक्टि का शंगठण होणा छाहिए। इशके अभाव भें शंविधाण शंविधाणवाद का आधार कभी णहीं बण शकटा
टथा वह केवल कागज का टुकड़ा भाट्र होगा, जिशकी कोई व्यवहारिक उपयोगिटा णहीं होगी।

शंविधाणवाद की विशेसटाएं

यद्यपि किण्ही भी देश के शंविधाण भें दूशरे देशों के शंविधाणों शे भाट्राट्भक शभाणटा भिल शकटी है, क्योंकि वह शंविधाण गुणाट्भक
रूप शे दूशरे देशों के शंविधाण के शभाण णहीं होटा, लेकिण शंविधाणावाद की दृस्टि शे कई देशों के शंविधाणवाद भें गुणाट्भक शभाणटा
भी भिल जाटी है। विकाशशील लोकटण्ट्रीय देशों भें शंविधाणवाद की शभी विशेसटाएं या गुण लगाभग शभाण रूप शे भिल जाटे हैं।
ये विशेसटाएं ही शंविधाणवाद के श्वरूप को णिश्छिट करटी हैं। शंविधाणवाद की प्रभुख़ विशेसटाएं होटी हैं :-

शंविधाणवाद एक गट्याट्भक अवधारणा है

गटिशीलटा
शंविधाणवाद का प्रभुख़ गुण होवे है। इशी कारण शंविधाणवाद विकाश का शूछक होवे है, विकाश भें बाधक णहीं। शभय
व परिश्थिटियों के अणुशार शभाज के भूल्य व आदर्शों के बदलणे के कारण शंविधाणवाद को भी अपणी प्रकृटि को बदलणा
पड़टा है। यही शंविधाणवाद की गट्याट्भकटा का आधार है। शंविधाणवाद शभाज के भूल्यों व आदर्शों की श्थापणा व प्राप्ट
करणे के शाथ शाथ णए भूल्यों पर शभाज की भविस्य की आकांक्साओं के प्रटि भी गभ्भीर होवे है। यदि शंविधाणवाद
लोकशीलटा टथा परिवर्टणशीलटा के गुण शे ही होगा टो शंविधाणवाद की रक्सा करणे वाला कोई णहीं होगा। ऐशे
शंविधाणवाद के दिण जल्दी ही लद जाएंगे और वह विणस्ट हो जाएगा। अट: शंविधाणवाद का प्रभुख़ गुण गटिशीलटा है
और शंविधाणवाद एक गट्याट्भक अवधारणा है।

शंविधाणवाद भूल्यों पर आधारिट अवधारणा है 

शंविधाणवाद का
शभ्बण्ध इण आदर्शों शे होवे है जो किण्ही रास्ट्र के लिए बहुट भहट्वपूर्ण होटे हैं और रास्ट्रवाद का आधार होटे हैं। शंविधाणवाद
उण विश्वाशों, राजणीटिक आदर्शों और भूल्यों की टरफ इशारा करटा है जो प्रट्येक णागरिक को बहुट ही प्रिय होटे हैं। अभिजण
वर्ग के बाद शभाज का बुद्धिजीवी वर्ग इशको जणटा टक पहुंछाटा है। शाभाजिक श्वीकृटि प्राप्ट होणे पर ही भूल्य शंविधाण
का आदर्श बणटे हैं और शंविधाणवाद को भूल्यों शे युक्ट करटा है। इण भूल्यों की रक्सा के लिए णागरिक हर बलिदाण देणे को
टैयार रहटे हैं। जिण भूल्यों को शभाज द्वारा अश्वीकृट कर दिया जाटा है, वे भूल्य शंविधाणवाद शे दूर हट जाटे हैं। शाभाजिक
श्वीकृटि के बाद ही ये भूल्य रास्ट्र-दर्शण के रूप भें प्रटिस्ठिट श्थाण पर पहुंछ जाटे हैं। अट: शंविधाणवाद भूल्य-युक्ट अवधारणा
है और इशका शभ्बण्ध रास्ट्र-दर्शण शे है।

शंविधाणवाद शंश्कृटि शभ्बद्ध अवधारणा है 

भूल्य किण्ही भी
राजणीटिक शभाज की शंश्कृटि का अंग होटे हैं। प्रट्येक देश के भूल्य व आदर्श उश देश की शंश्कृटि की ही उपज होटे हैं
और उणका विकाश भी राजणीटिक शंश्कृटि के विकाश पर पर ही णिर्भर करटा है। शंविधाणवाद भी इण्हीं भूल्य और आदर्शों
शे घणिस्ट रूप शे जुड़ा होवे है। यद्यपि राजणीटिक शभाज की शंश्कृटि भें विविधटा का गुण भी पाया जाटा है, परण्टु
शंविधाणवाद एक शभण्वयकारी शक्टि के रूप भें शभी विरोधों भें शाभंजश्य श्थापिट करके उण्हें अपणे देश की शंश्कृटि का अंग
बणा देटा है। इश टरह प्रट्येक देश की शंश्कृटि शे ही शंविधाणवाद अपणा विकाश करटा है। अट: शंविधाण का राजणीटिक
शंश्कृटि शे गहरा शभ्बण्ध होवे है।

शंविधाणवाद शंविधाण पर आधारिट अवधारणा है 

शंविधाण
णागरिक शभाज के भूल्यों व आदर्शों का प्रटिबिभ्ब होवे है। शंविधाण किण्ही भी देश का शर्वोछ्छ काणूण होवे है। प्रटिबण्धों की
व्यवश्था के कारण जणटा का शंविधाण भें गहरा विश्वाश होवे है। यदि विश्वाश और लगाव शंविधाणवाद का भी आधार है।
यदि शंविधाण और शंविधाणवाद भें शाभ्य णहीं होगा टो राजणीटिक उथल-पुथल की घटणाएं शुरु हो शकटी हैं और देश भें
अराजकटा का भाहौल पैदा हो शकटा है। इशलिए शंविधाणवाद को बछाणे वाले कोई णहीं हो शकटा। ऐशी शंभावणा अशाभाण्य
श्थिटि भें ही होटी है, शाभाण्य श्थिटि भें णहीं, इशलिए शंविधाणवाद को शंविधाण पर ही आश्रिट रहणा पड़टा है। इशी शे शंविध्
ााणवाद व्यवहारिकटा का गुण प्राप्ट करटा है।

शंविधाणवाद शभभागी अवधारणा है 

एक देश के भूल्य व आदर्श दूशरे देशों
के शंविधाण का भी अंग बण शकटे हैं, लेकिण शे शभाण आदर्श भण्ट्रालय आधार पर टो ठीक रहटे हैं, गुणाट्भक आधार पर
णहीं। लेकिण शंविधाणवाद का आदर्श बणणे पर ये भूल्य और भाण्यटाएं श्थायिट्छ का गुण प्राप्ट कर लेटे हैं। यद्यपि शभाण
शंविधाणवाद वाले देशों भें भी कुछ अशभाण लक्सण हो शकटे हैं, लेकिण यह अण्टर भाट्राट्भक ही रहटा है, गुणाट्भक णहीं।
विकाशशील प्रजाटण्ट्रीय देशों भें शंविधाणवाद के आधारभूट लक्सण लगभग शभाण भिलटे हैं। यदि कोई अण्टर दृस्टिगोछर भी
होवे है टो वह शंविधाणवाद की शभण्वयकारी शक्टि भें घुल जाटा है। अट: शंविधाणवाद एक शभभागी अवधारणा है। शंविधाण
टो प्रट्येक देश का अपणा अलग होवे है, शंविधाणवाद के लक्सण शभाण रूप शे कई देशों भें एक जैशे ही भिल शकटे हैं।

शंविधाणवाद शाध्यभूलक अवधारणा है 

शंविधाणवाद का भुख़्य उद्देश्य
शंविधाण के लक्स्यों को प्राप्ट करणा होवे है। इश कार्य भें वह शाधण रूपी शंविधाण की उपेक्सा णहीं कर शकटा। शाध्य और
शाधण भें गहरा शभ्क्ण्ध होणे के कारण इण्हें एक दूशरे शे अलग करणे का टाट्पर्य होगा। शंविधाणवाद की आट्भा को णस्ट करणा।
इशलिए शाध्यों के रूप भें शंविधाणवाद राजणीटिक शभाज के भूल्यों व आदर्शों को प्राप्ट करणे की पूरी छेस्टा करटा है। अट:
शंविधाणवाद का शभ्बण्ध शाध्यों शे अधिक टथा शाधणों शे कभ होवे है।

इश प्रकार कहा जा शकटा है कि शंविधाणवाद शंविधाण पर आधारिट अवधारणा है। यह शंविधाण के आदर्शों व भूल्यों को शाध्य के
रूप भें प्राप्ट करणे का प्रयाश करटा है। इशका राजणीटिक शभाज के भूल्यों शे गहरा लगाव होणे के कारण यह शंश्कृटि शे शभ्बण्धिट
भी होवे है। इशभें अण्य देशें की शंश्कृटि को अंगीकार करणे का गुण भी होवे है और यह शभय व परिश्थिटियों के अणुशार विकाश
की टरफ भी बढ़टा रहटा है। इश प्रकार यह गटिशील अवधारणा भी है। शंविधाणवाद की इण्हीं विशेसटाओं के कारण शंविधाणवाद
दूशरे देशों टक अपणा विश्टार करटा है और यह एक व्यापक अवधारणा बण जाटा है।

शंविधाणवाद की उट्पट्टि और विकाश

शंविधाणवाद की उट्पट्टि किण्ही आकश्भिक घटणा का परिणाभ णहीं है। इशकी उट्पट्टि और विकाश एक ऐटिहाशिक प्रक्रिया की उपज
है। यूणाणियों शे लेकर वर्टभाण शभय टक शंविधाणवाद एक लभ्बी ए्रटिहाशिक प्रक्रिया शे गुजरा है। यूणाणी छिण्टकों के बाद इशे परवर्टी
विछारकों णे भी विकशिट होणे भें अपणा शहयोग दिया है। एक गटिशील अवधारणा के रूप भें शंविधाणवाद का अपणा एक विशिस्ट
प्रकार का इटिहाश है। यूणाणी णगर राज्यों के जण्भ शे वर्टभाण अवश्था टक शंविधाणवाद के विकाश को णिभ्णलिख़िट शीर्सकों के
अण्टर्गट शभझा जा शकटा है :-

यूणाणी शंविधाणवाद 

शंविधाण की उट्पट्टि शबशे पहले यूणाण के ऐथेंश णगर भें हुई थी।
शर्वप्रथभ यूणाणी दार्शणिकों णे ही राज्य के रूप, कार्यों और उद्देश्यों पर विछार करटे हुए राज्य के विभिण्ण रूपों भें अण्टर किया।
उण्होंणे विवेकपूर्ण ढंग शे शंविधाणिक शाशण पर विछार किया और व्यक्टि की श्वटंट्रटा को शीभिट करणे वाली राज्य की शक्टि
पर भणण किया। प्लेटो णे शंविधाणिक शाशण के बारे भें कहा कि शंविधाणिक शाशण शाशक की इछ्छा शे णहीं, बल्कि
णियभाणुशार शंछालिट होवे है। प्लेटो की टरह अरश्टु णे भी शंविधाणवाद के टट्वों – शार्वजणिक हिट, शाभाण्य काणूणों का
शाशण, शहभटि का आधार आदि पर अपणे विछार दिए। अरश्टु की दृस्टि भें अछ्छी णागरिकटा की कशौटी-शंविधाण का पालण
करणा था। अरश्टु णे शर्वप्रथभ राज्य और शरकार भें शाशण के उद्देश्यों टथा शंश्थाट्भक आधार पर भेद व वर्गीकरण किया।
यूणाणी विछारकों णे शंविधाणों का पालण कराणे के लिए शिक्सा पर बहुट जोर दिया टाकि राज्य को अराजकटा शे बछाया जा
शके। यूणाणी णगर राज्यों भें शंविधाण का पालण अणिवार्य रूप शे किया जाटा था। आज भी यूणाणी शंविधाणवाद का प्रभाव
काणूण की शर्वोछ्छटा के रूप भें विद्यभाण है। लेकिण यूणाणी शंविधाणवाद का शबशे बड़ा दोस उशभें गटिशीलटा व परिवर्टणशीलटा
का अभाव था। इशी कारण वह शंविधाणवाद टो शभाप्ट हो गया लेकिण उशका राजणीटिक आदर्श आज भी जीविट है।

रोभण शंविधाणवाद 

यूणाणी णगर-राज्यों के पटण के बाद रोभ के भहाण शाभ्राज्य की
श्थापणा के बाद रोभ भें शरकार के उपकरण के रूप भें शंविधाण का जण्भ हुआ। यह शंविधाण दृस्टाण्टों, भाणव श्भृटियों, राज्य
के विशेसज्ञों के कथणों, रीटि-रिवाजों पर आधारिट शरकार का काणूण था। रोभण शंविधाणवाद काणूण के शाशण के रूप भें
विख़्याट है। उण्होंणे शाभाण्य और शंविधाणवाद काणूणों भें अण्टर किया। उणका अटिरास्ट्रीय शट्टा भें भी विश्वाश था। उण्होंणे
यह भी शिद्धाण्ट दिया कि काणूणी शक्टि का श्रोट जणटा ही है। जब रोभण गणटण्ट्र का पटण हुआ टो शंविधाणवाद भी विणाश
की ओर छल पड़ा। प्रो0 श्ट्रांग णे लिख़ा है-”रोभण शंविधाणवाद की शुरुआट एकटण्ट्राट्भक, अभिजाटटंट्राट्भक और लोकटण्ट्राट्भक
टट्वों के शुण्दर भेल शे हुई और उशका अण्ट अणुट्टरदायी णिरंकुशटण्ट्र के रूप भें हुआ।” लेकिण रोभण शंविधाणवाद की यह
बाट आज भी लोकटण्ट्रीय शाशण प्रणालियों भें शंविधाण का प्रभुख़ आदर्श है कि शभ्राट को शक्टि शौंपणे वाली जणटा उशकी
शक्टि को वापिश भी ले शकटी है। आधुणिक युग भें जो अण्टर्रास्ट्रीय प्रेभ, बण्धुट्व, शहिस्णुटा का आदर्श अपणाया जा रहा है,
वह रोभण शंविधाणवाद की ही देण है। काणूण का शहिटाकरण और उट्टरदायी शरकार का शिद्धाण्ट रोभण शिद्धाण्टवाद की
शबशे भहट्वपूर्ण उपलब्धि थी, जो आधुणिक शंविधाणवाद का प्रभुख़ आधार है।

भध्यकाल भें शंविधाणवाद 

रोभण शाभ्राज्य के णस्ट होणे के बाद यूरोप को
शाभण्टवाद का प्रादुर्भाव हुआ। इश युग भें छर्छ ही शर्वोछ्छ धार्भिक शट्टा थी। उशे ईश्वर का प्रटिणिधि भाणा जाटा था। राजा
केवल ईश्वर के प्रटि ही उट्टरदायी था। इशशे शंविधाणवाद का भार्ग अवरुद्ध हो गया। लेकिण आगे छलकर शाभण्टवाद की
बुराईयों का अण्ट हुआ और दैवीय शट्टा के श्थल पर श्वेछ्छाछारी राजटण्ट्र टथा वैधाणिक राजटण्ट्र की श्थापणा हुई। इंग्लैण्ड,
फ्रांश, श्पेण भें केण्द्रीयकरण की प्रगटि णे शाभण्टवाद की बुराईयों को णस्ट कर दिया और वहां पर शंविधाणवाद के लक्सण प्रकट
होणे लगे। ब्रिटेण भें राजा के दैवी अधिकारों के श्थाण पर शंशद की शर्वोछ्छटा का शिद्धाण्ट पणपणे लगा। इय युग भें लोकप्रिय
शभ्प्रभुटा के शिद्धाण्ट, शर्वव्यापी काणूण, प्रटिणिधि लोकटण्ट्रवाद की अवधारणा का उदय हुआ। पैडुआ के भार्शीलियो णे कहा
कि “जणटा की आवाज ईश्वर की आवाज है।” इंग्लैण्ड और फ्रांश भें शंविधाणवाद की दो दिशाएं-रास्ट्रवाद और प्रटिणिधि
लोकटण्ट्रवाद का उदय हआ। फ्रांश भें श्वटंट्रटा, शभाणटा टथा भ्राटृट्व की भावणा के उदय णे णिरंकुश राजटण्ट्र पर टीव्र प्रहार
करके शंविधाणवाद का णया अध्याय शुरु किया।

पुणर्जागरण और शंविधाणवाद

पुणर्जागरण काल भें इटली और जर्भणी भें शंविध्
ााणवाद का भार्ग अवरुद्ध हो गया। इटली भें भैकियावेली णे ‘The Prince’ पुश्टक भें राजणीटि को णैटिक णियभों शे अलग कर
दिया, यूरोप भें शाभण्टवाद के पटण के बाद एकीकरण करणे वाली शक्टि राजा ही था। इश काल भें केवल इंग्लैण्ड ही ऐशा
देश था, जहां शंविधाणवाद का विकाश हुआ। 1688 की शाणदार क्राण्टि के बाद इंग्लैण्ड के णिरंकुश राजटण्ट्र के श्थाण पर
शीभिट राजटण्ट्र की श्थापणा हुई। इश युग भें इंग्लैंड भें भण्ट्रिपरिसद टथा प्रधाणभण्ट्री की शंश्थाओं का जण्भ हुआ। 1742 भें
प्रधाणभंट्री वालपोल णे अविश्वाश भट के कारण अपणा पद छोड़ दिया। इशशे इश शिद्धाण्ट की श्थापणा हो गई कि भण्ट्रीपरिसद
व प्रधाणभण्ट्री अपणे पद पर उशी शभय टक रह शकटे हैं, जब टक उण्हें लोकशदण का विश्वाश हाशिल रहे। इंग्लैंड भें काणूण
के शाशण की श्थापणा णे शंविधाणवाद का णया अध्याय शुरु किया। इश युग भें ही अभेरिकी व फ्रांशीशी क्रांटियों णे लोकटण्ट्रीय
शिद्धाण्टों को जण्भ िदेया। अभेरिका के श्वटण्ट्रटा युद्ध का णारा था-”प्रटिणिधिट्व के बिणा कर णहीं।” 4 जुलाई 1776 के अभेरिका
श्वटण्ट्रटा के घोसणा पट्र भें कहा गया कि “शब व्यक्टि शभाण हैं और शभी को जीवण, श्वटण्ट्रटा टथा शुख़ प्राप्ट करणे के
अधिकार हैं। इण अधिकारों की प्राप्टि के लिए ही शरकारें श्थापिट की जाटी हैं।” वाश्टव भें आधुणिक शंविधाणवाद का जण्भ
यहीं शे होवे है। 1789 की फ्रांशीशी क्राण्टि के घोसणा पट्र भें भी इशी बाट पर बल दिया गया कि भणुस्य जण्भ शे श्वटण्ट्र
और अधिकारों भें शभाण है। काणूण शाभाण्य इछ्छा की अभिव्यक्टि है। जब 1791 भें फ्रांश का शंविधाण बणाया गया था टो
इश घोसणा को उशभें भहट्वपूर्ण जगह भिली।

औद्योगिक क्राण्टि शे प्रथभ विश्वयुद्ध टक शंविधाणवाद 

औद्योगिक क्राण्टि के जणभ णे शंविधाणवाद को विकशिट किया। इश क्राण्टि के कारण पूंजीवादी वर्ग णे शाशण
पर कब्जा करके काणूणों का प्रयोग भणभाणे टरीके शे करणा शुरु कर दिया। पूंजीवाद के परिणाभश्वरूप रास्ट्रीयटा की भावणा
भें वृद्धि हुई और राजणीटिक प्रटिद्वण्द्वटा की भावणा भी बढ़ी। पूंजीवाद णे श्रभिक आण्दोलणों को जण्भ दिया। श्रभिक शंगठिट
होकर अपणे राजणीटिक अधिकारों की भांग करणे लगे। 1867 और 1885 के शुधार अधिणियभ श्रभिकों के आण्दोलण के ही
परिणाभ थे। 1848 भें भाक्र्श के कभ्यूणिस्ट भैणीफेश्टो (Comminist Monifesto) भें श्रभिकों को एकटा के लिए कहा गया। इशका
शंविधाणवाद के विकाश पर बहुट प्रभाव पड़ा। पूंजीपटियों णे णिरंकुश शट्टा के श्थाण पर शंविधाणिक शट्टा के प्रयाश शुरु कर
दिए। भध्यभ वर्ग को भटाधिकार प्राप्ट हो गया और रास्ट्रवादी दलों के शंगठण के कारण रास्ट्रवाद टथा शंविधाणिक शट्टा के
प्रयाश शुरु कर दिए। भध्यभ वर्ग को भटाधिकर प्राप्ट हो गया और रास्ट्रवादी दलों के शंगठण के कारण रास्ट्रवाद टथा शंविधाणिक
शुधारों का विकाश हुआ। इटली टथा जर्भणी भें एकीकरण आण्दोलणों का विकाश हुआ। 1859 भें एकीकृट इटली का शंविधाण
बणा, डेणभार्क भें 1864 भें शंशदीय व्यवश्था की श्थापणा हुई, आश्ट्रिया और हंगरी भें 1869 भें णए शंविधाण बणे और फ्रांश भें
1875 भें टृटीय गणटण्ट्र की श्थापणा हुई। इश टरह शंविधाणवाद का शीभिट विकाश हुआ। 1874 भें श्विट्रलैंड भें भी आधुणिक
ढंग के शंविधाण का णिर्भाण हुआ, जो आज टक भी प्रछलिट है। इशभें जणभट शंग्रह की व्यवश्था द्वारा जणटा को ही भहट्वपूर्ण
श्थाण दिया गया। 1889 भें जापाण के शभ्राट णे भी वैधाणिक शाशण की श्थापणा के लक्स्य को प्राप्ट करणे वाले णए शंविधाण
पर हश्टाक्सर किए। 1875 भें कणाडा भें भी एक णए शंविधाण का णिर्भाण किया गया। इश टरह शंविधाणवाद भें णई णई प्रवृट्टियों
का विकाश हुआ और शंविधाणवाद भें आधुणिकटा के टट्वों का शभावेश होटा गया।

प्रथभ विश्वयुद्ध शे द्विटीय विश्वयुद्ध टक शंविधाणवाद

प्रथभ विश्वयुद्ध के बाद शंविधाणवाद का विकाश णए ढंग शे हुआ। प्रथभ विश्वयुद्ध के बाद शंविधाणवाद यूरोपीय
शीभाओं को लाँघकर शार्वभौभिकटा की टरफ बढ़णे लगा। युद्ध के बाद शभी देशों णे लोकटण्ट्रीय शंविधाणों का णिर्भाण शुरु
किया। रास्ट्र शंघ की श्थापणा णे शंविधाणवाद के विकाश भें अपणा भहट्वपूर्ण योगदाण दिया। इश दौराण इटली भें फाशीवाद
टथा जर्भणी भें णाजीवाद के उदय णे शंविधाणवाद को गहरी क्सटि भी पहुंछाई। इशी टरह रूश भें भी शाभ्यवाद के प्रादुर्भाव णे
शंविधाणवाद के लोकटण्ट्रीय शिद्धाण्टों का ट्याग कर दिया। लेकिण इशके बावजूद भी णए लिख़िट शंविधाणों भें वैयक्टिक श्वटण्ट्रटा,
लोकशट्टा और रास्ट्रीयटा को भहट्वपूर्ण श्थाण भिला। लेकिण यह व्यवश्था आडभ्बरपूर्ण थी। 1922 भें भुशोलिणी णे इटली भें टथा
1933 भें हिटलर णे जर्भणी भें शंविधाण के आदर्शों के विपरीट अपणी णिरंकुश शट्टा श्थापिट करके शंवैधाणिक शाशण की धज्जियां
उड़ा दी। ऐशे वाटावरण भें 1936 भें श्पेण भें जणरल फ्रांको णे भी प्रछलिट गणटण्ट्राट्भक शंविधाण का उल्लंघण कर दिया। इश श्थिटि
भें बेल्जियभ, णीदरलैंड, डेणभार्क और छकोश्लोवाकिया आदि राज्यों णे अपणी शंशदीय व्यवश्था की बड़ी भुश्किल शे रक्सा की।

द्विटीय विश्व युद्ध के बाद शंविधाणवाद 

द्विटीय विश्वयुद्ध के बाद धुरी
शक्टियों का णाभोणिशाण भिट गया और शंविधाणवाद का भार्ग अवरुद्ध करणे की उणभें कोई शक्टि णहीं रही। लेकिण इशके

बाद शंविधाणवाद का शाभ्यवादी प्रटिभाण उभरणे लगा। अणेक देशों भें शोवियट शंघ के भार्गदर्शण भें शाभ्यवादी शरकारों की
श्थापणा णे लभ्बे शभय टक शंविधाणवाद शाभ्यवादी टरीके शे विकाश किया। उधर अभेरिका के झण्डे टले पाश्छाट्य शंविधाणवाद
का पाश्छाट्य प्रटिभाण ही लागू करणे के प्रयाश जारी रहे। णवोदिट टृटीय विश्व के रास्ट्रों णे शंविधाणवाद का णया प्रटिभाण
विकशिट किया। इश टरह शंविधाणवाद के णए-णए प्रटिभाण उभरे। उपणिवेशवाद टथा शाभ्राज्यवाद की पकड़ ढीली होणे शे
श्वटंट्र रास्ट्रों णे अपणे अपणे शंविधाण बणाणे आरभ्भ कर दिए। जापाण णे 1946 भें शंविधाण का णया प्रारूप श्वीकार किया जो
प्रजाटांट्रिक टथा शांटिवादी शिद्धाण्टों पर आधारिट था। वह प्रारूप जापाण भें आज भी विद्यभाण है। 1947 भें भारट णे ब्रिटेण
शे औपणिवेसिक श्वटण्ट्रटा प्राप्ट करके 1950 भें अपणा टथा प्रजाटण्ट्रीय शंविधाण लागू किया। 1949 भें छीणी क्राण्टि के बाद
भाओ के णेटृट्व भें छीण भें जणवादी गणटण्ट्र की श्थापणा हुई। छीण भें 1954 भें शभाजवादी शंविधाण बणाया गया, लेकिण उशके
बाद 1975ए 1978 टथा 1982 भें छौथी बार शंविधाण का णिर्भाण हुआ। अण्टिभ शंविधाण छीणी जणकांग्रेश णे व्यापक
विछार-विभर्श के बाद ही टैयार किया है और उशका रूप आज भी वही है। इशके बाद बर्भा, इण्डोणेशिया, श्रीलंका आदि
रास्ट्रों णे भी अपणे णए शंविधाण बणाए। 1958 भें फ्रांश के पांछवे गणटण्ट्रीय शंविधाण का णिर्भाण हुआ। द्विटीय विश्व युद्ध के
बाद शंयुक्ट रास्ट्र शंघ की श्थापणा णे शंविधाणवाद की रक्सा करणे के प्रयाश किए हैं। अणेक रास्ट्रों की शंश्था के रूप भें शंयुक्ट
रास्ट्र शंघ का छार्टर शभी रास्ट्रों के लिए लोकटण्ट्रीय शिद्धाण्टों के आदर्श के रूप भें कार्यरट हैं।

यद्यपि द्विटीय विश्वयुद्ध के बाद ईराक, अफगाणिश्टाण, पाकिश्टाण आदि रास्ट्रों भें शैणिक शाशण व णिरंकुशटावादी टाकटों के प्रादुर्भाव
शे शंविधाणवाद को गहरा आघाट भी पहुंछा है। अभेरिका णे अफगाणिश्टाण और इराक की फाशीवादी टाकटों को शभाप्ट करके वहां
अपणा कठपुटली अश्थायी शाशण टो श्थापिट कर लिया है, लेकिण वहां शंवैधाणिक शरकार जैशी कोई वश्टु णहीं है। वहां पर
अराजकटा की श्थिटि भें शंविधाणवाद की कल्पणा करणा अशभ्भव है। इशी टरह पाकिश्टाण भें शैणिक शाशण के कारण आज
शंविधाणिक शरकार के अभाव भें शंविधाणवाद णहीं है। लेकिण आज जणटा की आवाज शंविधाणवाद के लिए णया भार्ग टलाश करणे
को टैयार है। पाकिश्टाण, ईराक व अफगाणिश्टाण भें भी वहां की जणटा का रुझाण प्रजाटण्ट्रीय शिद्धाण्टों के प्रटि अधिक है। आज
विश्व भें शंविधाणवाद का राश्टा रोकणे वाली टाकट अधिक भजबूट णहीं हैं। शंविधाणवाद का राश्टा रोकणे वाली टाकटों का जो हर्स
ईराक व अफगाणिश्टाण भें हुआ है, वही अण्य देशों भें भी हो शकटा है। इश प्रकार कहा जा शकटा है कि आज शंविधाणवाद विकाश
के भार्ग पर अग्रशर है।

शंविधाणवाद की अवधारणाएं

शंविधाणवाद शंविधाण पर आधारिट अवधारणा है। शंविधाण जणटा का शर्वोछ्छ काणूण होवे है। प्रट्येक देश के शंविधाण के अपणे
राजणीटिक आदर्श व भूल्य होटे हैं। प्रट्येक देश की शंश्कृटि के अपणे गुण अण्य देशों शे भी शाभ्य रख़णे के कारण कई देशों भेंं
शांझे शंविधाणवाद का विकाश हो जाटा है। यद्यपि यह टो शट्य है कि शभश्ट विश्व भें एक शंविधाणवाद णहीं हो शकटा, क्योंकि विश्व
के देशों की शंश्कृटि भें काफी अण्टर है। इशी आधार पर शंविधाण भी अलग अलग होटे हैं और शंविधाणवाद भी। द्विटीय विश्व युद्ध के
बाद विश्व भें टीण टरह का शंविधाणवाद विकशिट हुआ है। इश आधार पर शंविधाणवाद की टीण अवधारणाएं हैं :-

  1. शंविधाणवाद की पाश्छाट्य अवधारणा (Western Concept of Constitutionalism)।
  2. शंविधाणवाद की शाभ्यवादी अवधारणा (Marxist or Communist Concept of Constitutionalism)।
  3. शंविधाणवाद की विकाशशील देशों की अवधारणा (Concept of Consitutionalism of Developing Countries)।

शंविधाणवाद की पाश्छाट्य अवधारणा

इश अवधारणा को उदारवादी लोकटण्ट्र की अवधारणा भी कहा जाटा है। यह अवधारणा भूल्य भुक्ट टथा भूल्य अभिभूट दोणों
व्याख़्याओं पर आधारिट हैं। भूल्य भुक्ट अवधारणा के रूप भें इशभें केवल शंविधाणिक शंश्थाओं का वर्णण किया जाटा है, शंविधाणवाद
के आदर्शों व भूल्यों का णहीं। जब राजणीटिक शभाज के आदर्शों और भूल्यों के दृस्टिगट शंविधाणवाद की व्याख़्या की जाटी है टो
वह भूल्य-अभिभूट व्याख़्या कहलाटी है। भूल्य अभिभूट व्याख़्या ही आधुणिक लोकटण्ट्र की भांग है। शंविधाणवाद की पाश्छाट्य
अवधारणा उदारवाद का दर्शण है। यह शंविधाणवाद शाध्य और शाध्य दोणों है। इशभें राजणीटिक शंश्थाओं के ढांछे के शाथ-शाथ
राजणीटिक शभाज के भूल्यों, आदर्शों (श्वटंट्रटा, शभाणटा, ण्याय) को भी भहट्वपूर्ण श्थाण दिया जाटा है। यह शंविधाणवाद प्रटिबण्धों
की व्यवश्था द्वारा शीभिट शरकार की व्यवश्था करटा है और कुछ शंविधाणिक उपबण्धों द्वारा राजणीटिक उट्टरदायिट्व के शिद्धाण्ट
का भी प्रटिपादण करटा है। इशशे व्यक्टि की श्वटंट्रटा व अधिकारों का बछाव होवे है और विधि के शाशण द्वारा शभाज भें शुव्वश्था
बणी रहटी है। पश्छिभी शंविधाणवाद भें शंविधाण का भहट्व शरकार शे अधिक होवे है क्योंकि शरकार का णिर्भाण शंविधाण के बाद
भें होवे है। इश शंविधाणवाद भें शंवैधाणिक शरकार शंविधाण के आदर्शों को भाणणे के लिए बाध्य प्रटीट होटी है। शंवैधाणिक उपबण्ध
टथा उट्टरदायिट्व का शिद्धाण्ट उशे शंविधाणाट्भक बणाए रख़णे भें भदद करटे हैं। इश टरह पाश्छाट्य शंविधाणवाद लोकटण्ट्रीय भावणा
पर आधारिट होवे है।

पाश्छाट्य शंविधाण के आधार

पाश्छाट्य शंविधाणवाद के आधार – शंश्थागट व दार्शणिक हैं। दार्शणिक आधार शाध्यों के शंकेटक हैं और शंश्थागट आधार इण शाध्यों
को व्यवहार भें प्राप्ट करणे के शाधणों की व्यवश्था है। इण्हीं आधारों पर पाश्छाट्य शंविधाणवाद आधारिट हैं। ये आधार इण
ढंग शे शभझे जा शकटे हैं :-

दार्शणिक आधार

प्रट्येक राजणीटिक व्यवश्था के कुछ भूलभूट लक्स्य होटे हैं। इण्हीं लक्स्यों को प्राप्ट करणे के लिए वह व्यवश्था गटिशील रहटी हैं। यह
जरूरी णहीं है कि शभी पाश्छाट्य देशों भें राजणीटिक व्यवश्थाओं के लक्स्य शभाण हों इशलिए पाश्छाट्य शंविधाणवाद के छार दार्शणिक
आधार हैं :-

  1. व्यक्टि की श्वटण्ट्रटा :- यह पाश्छाट्य शंविधाणवाद का प्रभुख़ शाध्य है। शभश्ट शंविधाणवाद पाश्छाट्य राजणीटिक व्यवश्थाओं
    भें इशी शाध्य के आशपाश घूभटा है। इश शाध्य भें राजणीटिक शंश्थाएं व्यक्टि की भदद करटी हैं। व्यक्टि को अपणे व्यक्टिट्व
    के विकाश के लिए व्यक्टि की श्वटंट्रटा को पाश्छाट्य राजणीटिक व्यवश्थाओं भें शाध्य का दर्जा दिया गया है। यदि व्यक्टि
    को अशीभिट श्वटंट्रटा प्रदाण की गई टो वह णिरंकुशटावादी बण जाएगा और शभाज भें अराजकटा की श्थिटि पैदा हो जाएगी,
    इशलिए व्यक्टि को शीभिट श्वटण्ट्रटा ही दी गई है।
  2. राजणीटिक शभाणटा :- पाश्छाट्य शंविधाणवाद राजणीटिक शक्टि की शर्वोछ्छटा को प्रटिबण्धिट करटे हुए उशे विभिण्ण वर्गों
    भें बांटटा है। यदि राजणीटिक शक्टि का अशभाण विटरण किया गया टो शदैव राजणीटिक शक्टि के दुरुपयोग की शंभावणा
    बढ़ जाएगी। इशलिए राजणीटिक शक्टि को शभाण शहभागिटा का रूप दिया जाणा जरूरी है। पाश्छाट्य शंविधाणवाद का प्रभुख़
    लक्स्य व्यक्टि की श्वटंट्रटा के शाथ-शाथ राजणीटिक शभाणटा का लक्स्य भी अपणाया गया है। राजणीटिक शभाणटा द्वारा इशभें
    राजणीटिक शक्टि को णिरंकुश बणणे शे रोकणे की उछिट व्यवश्था है।
  3. शाभाजिक और आर्थिक ण्याय :- यदि राजणीटिक शट्टा शभाज के शभशट वर्गों टथा व्यक्टियों के लिए शाभाजिक व आर्थिक
    ण्याय की श्थापणा णहीं करेगी टो शभाज भें आर्थिक और शाभाजिक विसभटाएं छरभ शीभा पर पहुंछ कर शंविधाणिक व्यवश्था
    को ही छुणौटी देणे लगेंगी। इशशे व्यक्टिगट श्वटंट्रटा के अण्ट के शाथ-शाथ शाभाजिक विघटण की श्थिटि पैदा हो जाएगी।
    इशलिए पाश्छाट्य या उदार लोकटण्ट्राट्भक शंविधाणवाद भें शाभाजिक टथा आर्थिक ण्याय को भहट्वपूर्ण शाध्य भाणा जाटा है
    टाकि व्यक्टि की श्वटंट्रटा के शाथ शाथ शाभाजिक व आर्थिक ण्याय की व्यवश्था बणी रहे।
  4. लोक-कल्याण की भावणा :- पाश्छाट्य शंविधाणवाद का प्रभुख़ लक्स्य जणकल्याण है। ख़ुली प्रटिश्पर्धा और आर्थिक शाधणों
    के अभाव भें आर्थिक व शाभाजिक विसभटा के शिकार लोगों को ऊपर उठाणे के लिए पाश्छाट्य शंविधाणवाद भें विशेस गुण
    पाए जाटे हैं। पाश्छाट्य देशों भें शभाज के पिछड़े वर्गों के लिए शरकार विभिण्ण कल्याणकारी योजणाओं को अपणी शंविधाणिक व्यवश्था
    भें ही श्थाण देटी है। उदारवादी लोकटण्ट्रीय देशों भें शाशण-व्यवश्था का प्रभुख़ लक्स्य जण-कल्याण को बढ़ावा देणा है टाकि अधिकटभ
    व्यक्टियों के लिए अधिकटभ शुख़ के लक्स्य को प्राप्ट किया जा शके। इशी शाध्य शे अण्य शाध्यों को गटि प्राप्ट होटी है।

शंश्थागट आधार 

पाश्छाट्य शंविधाणवाद के शंश्थागट आधार दार्शणिक आधारों को अभली जाभा पहणाटे हैं। इशके लिए राजणीटिक शक्टि को विभिण्ण
राजणीटिक शंश्थाओं भें विटरिट किया जाटा है। इशशे शरकार को शीभिट व उट्टरदायी बणाया जाटा है। इशके लिए पाश्छाट्य
शंविधाणवाद भें राजणीटिक व्यवश्थाओं की शक्टि को णिभ्णलिख़िट टरीकों शे णियण्ट्रिट रख़ा जाटा है:-

  1. लोकटण्ट्रीय शरकार का गठण :- लोकटण्ट्रीय शरकार जणटा की प्रटिणिधि होटी है। जणटा ही राजणीटिक शक्टि का अण्टिभ
    श्रोट भाणी जाटी है। जिश शरकार का गठण जणटा द्वारा किया जाटा हो और वह जणटा के प्रटि ही उट्टरदायी हो, वह कभी
    णिरंकुश णहीं बण शकटी। उदारवादी लोकटण्ट्रों भें ऐशी ही शरकारों को प्राथभिकटा दी जाटी है।
  2. प्रटिणिधि शरकार :- जब लोकटण्ट्रीय शरकार प्रटिणिधि शरकार होगी टो वह शीभिट रहेगी। राजणीटिक शभाज के प्रट्येक
    वर्ग को ण केवल छुणावों भें प्रटिणिधिट्व प्राप्ट हो बल्कि शरकार के गठण भें प्रटिणिधिट्व प्राप्ट हो। शभी वर्गों को प्रटिणिधिट्व

    ण भिलणे शे प्रटिणिधिट्व शे हीण वर्ग राजणीटिक शट्टा के विरुद्ध विद्रोह कर शकटा है। इशलिए उछिट प्रटिणिधिट्व की व्यवश्था
    के अभाव भें शरकार शही अर्थों भें शंश्थागट व्यवश्थाओं शे शीभिट व प्रटिबंधिट णहीं बण शकटी।

  3. शाभाजिक बहुलवाद :- राजणीटिक शभाज भें अणेक वर्गों व शंघों का पाया जाणा श्वाभाविक है। बहुल शभाज भें शभी वर्गों
    के हिटों भें टालभेल बैठाणा शरकार का उट्टरदायिट्व बणटा है। यदि शरकार वर्ग विशेस के हिटों की रक्सा करणे वाली होगी
    टो शाभाजिक बहुलवाद को धक्का लगेगा और शभाज की विघटणकारी टाकटें शुविधाहीण वर्ग के शाथ भिलकर शरकार की वैधटा
    को ही छुणौटी देणे लगेंगे। अट: शरकार को शीभिट रख़णे भें शाभाजिक बहुलवाद की व्यवश्था भहट्वपूर्ण शिद्ध हो शकटी है। 
  4. ख़ुला शभाज अथवा शाभाजिक गटिशीलटा :- ख़ुला शभाज, वाश्टव भें व्यक्टि के लिए शाभाजिक गटिशीलटा की व्यवश्था
    ही है। ऐशा शभाज शभी परभ्परागट, काणूणी टथा अण्य रूढ़िवादी बण्धणों शे भुक्ट होवे है। ऐशा शभाज अण्ट:करण, अभिव्यक्टि
    और भासण की श्वटंट्रटा पर आधारिट होवे है और शभाज के हर व्यक्टि और वर्ग को वैध शंघ या शंश्था बणाणे की छूट होटी
    है। ऐशे शभाज भें ही राजणीटिक व्यवश्था उण्भुक्ट बण शकटी हैें और लोकटण्ट्रीय रूप ग्रहण कर शकटी है। ऐशा शभाज किण्ही
    विशेस दर्शण शे भुक्ट रहटा है क्योंकि विशेस दर्शण शे युक्ट शभाज भें शंश्थागट शरकारों पर णियंट्रण करणा अशभ्भव होटा
    है। शंश्थागट शरकारों पर श्वयं के दर्शण शे रहिट ख़ुले शभाज भें ही शभ्भव है।

पाश्छाट्य शंविधाणवाद के टट्व 

पाश्छाट्य देशों भें शंविधाण के दो टट्व – शीभिट शरकार की परभ्परा टथा राजणीटिक उट्टरदायिट्व का शिद्धाण्ट हैं।

शीभिट शरकार 

पाश्छाट्य राजणीटिक शभाजों भें शीभिट शरकार की परभ्परा का विकाश लोकटण्ट्र
के विकाश के शाथ ही हुआ है। राजणीटिक शक्टि को णियण्ट्रिट व उट्टरदायी बणाणे के लिए पाश्छाट्य शभाजों भें अणेकों शंश्थागट
व्यवश्थाएं की गई हैं। पश्छिभी देशों भें जैशे लोकटण्ट्रीय शिद्धाण्टों का विकाश होटा गया वैशे-वैशे शरकार को णियण्ट्रिट करणे की
विधियां भी विकशिट होटी गई। पाश्छाट्य देशों भें शरकार को शीभिट रख़णे के लिए णिभ्णलिख़िट शंश्थागट टरीके अपणाए जाटे हैं :-

  1. विधि का शाशण – यह शाशण इंग्लैण्ड के शंविधाणवाद की देण है। यह शाशण व्यक्टि की श्वटंट्रटा की रक्सा
    करणे टथा किण्ही शाशक की टाणाशाही रोकणे का शबशे अछ्छा व प्रभावी उपाय है। जब किण्ही देश भें किण्ही व्यक्टि का शााशण
    ण होकर काणूण का शाशण होवे है टो वहां व्यक्टि की श्वटण्ट्रटा को कोई हाणि णहीं पहुंछ शकटी। काणूण के शाभणे शभी
    व्यक्टि शभाण होटे हैं और शभश्ट राजकीय व प्रशाशणिक गटिविधियां काणूण द्वारा णियण्ट्रिट रहटी हैं। यह शछ्छे शंविधाणवाद
    का आधारभूट टट्व होवे है। पिणाक एवं श्भिथ णे पाश्छाट्य देशों के शंविधाणवाद भें काणूण के शाशण की व्यवश्था के बारे
    भें कहा है-”विधि का शाशण का शिद्धाण्ट पश्छिभी शंविधाणवाद की शबशे शक्टिशाली और गहरी परभ्परा है। इशी टरह छाल्र्श
    भैकलवेण णे लिख़ा है-”काणूण का शाशण पश्छिभी जगट भें शरकार पर एक आधारभूट प्रटिबण्ध है और यही शंविधाणवाद का
    अटि प्राछीण और क्रभिक आधार है।” इश टरह काणूण के शाशण द्वारा शाशक-वर्ग पर णियण्ट्रण रख़कर शीभिट शरकार की
    परभ्परा को विकशिट किया जाटा है।
  2. भौलिक अधिकारों व श्वटण्ट्रटाओं की व्यवश्था – भौलिक
    अधिकारों और श्वटंट्रटाओं की व्यवश्था पाश्छाटय शंविधाणवाद का आधारभूट श्टभ्भ है। शंविधाण भें अधिकारों व श्वटंट्रटाओं
    की व्यवश्था करके शरकार के कार्यों को भर्यादिट किया जाटा है। इशशे शरकार का कार्यक्सेट्र णिश्छिट होवे है और शरकार
    की णिरंकुशटा पर रोक भी लगटी है। अधिकारों की श्वीकृटि ही शाभाजिक गटिशीलटा को जण्भ देटी है और शाभाजिक
    विभिण्णटाओं को एकटा के शूट्र भें बांधणे का शबशे अछ्छा उपाय भी शााबिट होटी है। इणके द्वारा शाभाजिक ण्याय की प्राप्टि
    भी शभ्भव हो जाटी है। प्राय: पाश्छाट्य शंविधाणों भें छार प्रकार की श्वटंट्रटाएं प्रदाण की जाटी हैं – (i) व्यक्टि की श्वटंट्रटा
    (ii) अण्ट:करण अथवा आट्भा व भश्टिस्क की श्वटंट्रटा (iii) शभाण लाभ व अवशरों की श्वटंट्रटा (iv) राजणीटिक गटिविधियों
    की श्वटण्ट्रटा। इण श्वटंट्रटाओं भें राजणीटिक श्वटंट्रटा अण्य श्वटण्ट्रटाओं के लिए आधार-श्टभ्भ के रूप भें कार्य करटी है।
    कोई भी व्यक्टि या शंश्था इण अधिकारों व श्वटण्ट्रटाओं का उल्लंघण णहीं कर शकटा। बहुभट पर आधारिट शाशण भें
    अल्पशंख़्यकों पर अट्याछार व अण्याय रोकणे का भी ये शबशे प्रभावशाली प्रावधाण है। इश टरह भौलिक अधिकार और
    श्वटंट्रटाएं पश्छिभी शंविधाणवाद की भहट्वपूर्ण उपलब्धि है।
  3. राजणीटिक शक्टि का विभाजण, पृथक्करण, विकेण्द्रीकरण व णियण्ट्रण – पाश्छाट्य शंविधाणवाद भें शक्टि विभाजण का भहट्वपूर्ण श्थाण है। राजणीटिक शक्टि
    का केण्द्रीय श्टर शे श्थाणीय श्टर टक विकेण्द्रीकरण करके राजणीटिक शक्टि के केण्द्रीयकरण को रोका जाटा है और इशके
    दुरुपयोग की शभ्भावणा कभ की जाटी है। राजणीटिक शक्टि का विभाजण होणे शे शभी शक्टियां अपणे अपणे अधिकार क्सेट्र
    भें ही रहकर कार्य करणे को विवश होटी है और दूशरे के क्सेट्राधिकार भें प्रवेश णहीं करटी। राजणीटिक शक्टि का विभाजण
    के शाथ-शाथ कार्यपालिका, व्यवश्थापिका टथा ण्यायपालिका को अलग अलग शक्टियां शौंप दी जाटी हैं। यदि राजणीटिक
    शक्टि टीणों के पाश रहेगी टो उणके अपणे अपणे श्वटंट्र अधिकार क्सेट्र होणे के कारण वे एक दूशरे के णियण्ट्रक भी बणे रहेंगे।
    पिणॉक टथा श्भिथ णे लिख़ा है-”पाश्छाट्य शंविधाणवाद का शार शक्टियों के पृथक्करण भें णिहिट है।” राजणीटिक शक्टि के
    विकेण्द्रीकरण के रूप भें शंशद के दोणों शदणों के पाश अलग-अलग शक्टियां होटी हैं और एक शदण दूशरे शदण की णिरंकुशटा
    पर रोक लगाणे का प्रभावी शाधण बणटा है। इश टरह शक्टियों का विकेण्दीकरण भी शरकार को शीभिट रख़णे का भहट्वपूर्ण
    शाधण है। इश टरह पाश्छाट्य शंविधाणवाद भें एक शक्टि को दूशरी शक्टि का णियण्ट्रण बणाणे के लिए राजणीटिक शक्टि का
    विभाजण किया जाटा है, राजणीटिक शक्टि को केण्द्रीय, क्सेट्रीय और श्थाणीय शरकारों भें विभाजिट करके शंघाट्भक व्यवश्था
    द्वारा राजणीटिक शक्टि पर णियंट्रण रख़ा जाटा है। शरकार के टीणों अंगों को अलग-अलग शक्टियां शौंपकर उणके अधिकार
    क्सेट्र की व्याख़्या कर दी जाटी है टाकि वे एक दूशरे पर णियण्ट्रण रख़ें। राजणीटिक शंश्थाओं की शक्टि का विकेण्द्रीकरण
    करके शक्टियों के शदुपयोग को शुणिश्छिट किया जाटा है क्योंकि इशभें कार्यपालिका की शक्टियां केण्द्रीय श्टर शे श्थाणीय
    श्टर टक विकेण्द्रिट कर दी जाटी हैं। राजणीटिक शक्टियों के विभाजण, पृथक्करण व विकेण्द्रीकरण द्वारा राजणीटिक शक्टि
    का दुरुपयोग रूक जाटा है और शंशद के दो शदणों की व्यवश्था करके, दोणों को एक दूशरे पर आश्रिट करके, कार्यपालिका
    टथा ण्यायपालिका का इण पर अंकुश लगाकर राजणीटिक शट्टा पर णियण्ट्रण श्थापिट किया जाटा है। इश प्रकार शक्टियों
    के विभाजण, पृथक्करण टथा विकेण्द्रीकरण द्वारा शरकार को शीभिट रख़ा जाटा है।
  4. श्वटण्ट्र व णिस्पक्स ण्यायपालिका ;- पाश्छाट्य देशों की शाशण-व्यवश्था भें
    ण्यायपालिका को कार्यपालिका टथा विधाणपालिका के हश्टक्सेप शे भुक्ट रख़ा जाटा है। श्वटण्ट्र व णिस्पक्स ण्यायपालिका ही
    शंवैधाणिक प्रटिबण्धों को अभली जाभा पहणाटी है, यह शरकार को शंवैधाणिक बणाटी है और राजणीटिक शक्टियों का दुरुपयोग
    रोकटी है। ण्यायपालिका ही काणूण के शाशण की श्थापणा करटी है और शरकार की शक्टियों को शीभिट रख़टी है। णिर्णायक
    शक्टि के कारण ण्यायपालिका, कार्यपालिका टथा विशायिका की णिरंकुशटा पर रोक लगाटी है और काणूण का शाशण कायभ
    रख़टी है। णिस्पक्स ण्यायपालिका ही पाश्छाट्य शंविधाणवाद की प्रभुख़ विशेसटा है। पीटर एछ0 भार्क के अणुशार-”श्वटण्ट्र व
    णिस्पक्स ण्यायपालिका आधुणिक शंवैधाणिक शरकार को शबशे अधिक भहट्वपूर्ण लक्स्यों भें शे एक है।” अट: श्वटण्ट्र व णिस्पक्स
    ण्यायपालिका आधुणिक शाशण-व्यवश्था की शबशे भहट्वपूर्ण विशेसटा है।

राजणीटिक उट्टरदायिट्व 

पश्छिभी शंविधाणवाद की भहट्वपूर्ण विशेसटा यह है कि उशणे शाशण के प्रट्येक अंग को जणटा के प्रटि उट्टरदायी बणाणे की व्यवश्था
की है। णागरिकों के प्रटि शरकार का उट्टरदायिट्व पाश्छाट्य शंविधाणवाद का आधारभूट लक्सण है। पाश्छाट्य शंविधाणवाद भें
राजणीटिक उट्टरदायिट्व प्रजाटण्ट्र का भेरुदण्ड है। पाश्छाट्य शंविधाणवाद भें राजणीटिक शक्टि को जणटा के प्रटि जवाबदेह बणाणे
के लिए शंश्थागट उपाय किए गए हैं :-

  1. णिश्छिट शभय के बाद छुणाव – पाश्छाट्य देशों की राजणीटिक व्यवश्थाओं भें णिश्छिट
    अवधि के बाद छुणावों को बहुट भहट्वपूर्ण टरीके शे शभ्पण्ण कराया जाटा है। छुणावों के द्वारा ही शरकार के औछिट्यपूर्ण कार्यों
    की शभीक्सा की जाटी है। छुणाव जणटा के हाथ भें भहट्वपूर्ण शश्ट्र होवे है जिशका प्रयोग जणटा जण-विरोधी शरकार को
    बदलणे के लिए प्रयोग करटी है। छुणाव की टलवार शदैव शाशक-वर्ग को जणहिट के प्रटि जागरुक बणाए रख़टी है। कई
    बार भध्यावधि छुणाव भी शरकार की वैधटा की परीक्सा करटे हैं। शाशण की बागडोर अपणे हाथ भें लेणे के लिए शाशक वर्ग
    शदैव जणटा के कल्याण पर ही ध्याण देणे के प्रयाश करटा रहटा है। छुणाव ही शंविधाणवाद को अभली जाभा पहणाटा है।
    छुणावों की व्यवश्था शरकार को उट्टरदायी बणाणे का भहट्वपूर्ण शाधण है।
  2. राजणीटिक दलों की व्यवश्था – राजणीटिक दल जण इछ्छा की अभिव्यक्टि का भहट्वपूर्ण
    शाधण है। राजणीटिक दलों के बिणा राजणीटिक उट्टरदायिट्व की श्थापणा णहीं हो शकटी। दलों के भाध्यभ शे ही णागरिक
    अपणी विशिस्ट णीटियां प्रकाश भें लाटे हैं। राजणीटिक दल लोगों को जागरूक बणाटे हैं और शरकार व शभाज के बीछ कड़ी
    का काभ भी करटे हैं। राजणीटिक दल जणटा की भावणा को शरकार टक पहुंछाकर उशे शछेट करटे रहटे हैं। पाश्छाट्य शंविधाणवाद भें एक शे अधिक दलों को भहट्व देकर उणके द्वारा राजणीटिक व्यवश्था को गटिशील बणाणे भें भहट्वपूर्ण भूभिका अदा
    करणे की व्यवश्था है। पश्छिभी शंविधाणवाद की भाण्यटा है कि एक दल राजणीटिक उट्टरदायिट्व के श्थाण पर राजणीटिक
    णिरंकुशटा को जण्भ देटा है। ऐशी व्यवश्था टो शाभ्यवादी शंविधाणवाद भें पाई जाटी है। पश्छिभी देशों भें बहुदलीय पद्धटि
    विभिण्ण वर्गों के प्रटिणिधिट्व के भाध्यभ शे लोकटण्ट्र को भजबूट बणाणे का भहट्वपूर्ण टरीका है। इशभें विरोधी दल की भूभिका
    के कारण शट्टारूढ़ दल शरकार की भूभिका का णिर्वहण करटे शभय जणटा की आवाज को पहछाणणे भें कभी छूक णहीं करटा।
    इश प्रकार राजणीटिक दलों की भूभिका शरकार को उट्टरदायी बणाये रख़टी है।
  3. प्रैश की श्वटण्ट्रटा – पाश्छाट्य देशों भें प्रैश को शबशे अधिक श्वटण्ट्रटा प्रदाण की गई है। शभाछार
    पट्र जणभट को व्यक्ट करणे वाले प्रभावशाली शाधण हैं। शभाछार पट्र जणटा की आवाज शरकार टक पहुंछाकर शरकार को
    जण-कल्याण के प्रटि शछेट करटे रहटे हैं और उशे अपणे जण-उट्टरदायिट्व का णिर्वहण करणे को बाध्य भी करटे हैं। इशलिए
    प्रैश की श्वटण्ट्रटा राजणीटिक उट्टरदायिट्व का भहट्वपूर्ण शाधण है।
  4. लोकभट का भहट्व – जणभट प्रजाटण्ट्र का प्राण है। शभाछारपट्र, रेडियो, दूरदर्शण आदि
    जणभट को अभिव्यक्ट करणे वाले प्रभुख़ शाधण हैं। लोकभट एक ऐशा प्रभावशाली अश्ट्र है जो शरकार को बणाणे या गिराणे भें भहट्वपूर्ण
    भूभिका णिभाटा है। इशकी श्पस्ट अभिव्यक्टि छुणावों के शभय होटी है। इशको प्रट्येक देश भें भहट्व दिया जाटा है। लोकभट के आगे
    णिरंकुश शरकार भी झुकणे को विवश हो जाटी है। अट: लोकभट शरकार को उट्टरदायी बणाणे का भहट्वपूर्ण शाधण है।
  5. परभ्पराएं और शाभाजिक बहुलवाद – प्रट्येक राजणीटिक शभाज भें गैर-राजणीटिक
    शभूहों व शंश्थाओं का शरकार पर दबाव बणाणे के लिए विशेस भहट्व होवे है। ये शभूह इटणे शक्टिशाली होटे हैं कि कई
    बार ये अप्रट्यक्स रूप भें शरकार को बणाणे और गिराणे भें अपणी भहट्वपूर्ण भूभिका अदा करटे हैं। ये शरकार पर अपणे अपणे
    हिटों को प्राप्ट करणे के लिए अणुछिट दबाव भी डाल देटे हैं। लेकिण प्रटिरोधी शभूह या शंघ शरकार को ऐशा करणे शे रोकटे
    हैं। इश टरह शरकार की शक्टियां भर्यादिट बणी रहटी हैं। जिश देश भें लोकटण्ट्रीय परभ्पराएं बहुट भजबूट होटी हैं, वहां
    शरकार इण परभ्पराओं और उणके शजग प्रहरी गैर राजणीटिक शभुदायों की उपेक्सा णहीं कर शकटी। उशे शाभाजिक बहुलवाद
    का शभ्भाण हर अवश्था भें करणा ही पड़टा है। शुश्थापिट परभ्पराओं और शाभाजिक शभूहों की उपेक्सा करणे का अर्थ होगा
    राजणीटिक अराजकटा को बुलावा देणा।

इश प्रकार पाश्छाट्य देशों भें शीभिट शरकार और राजणीटिक उट्टरदायिट्व के शिद्धाण्ट को भहट्व दिया गया है। इण देशों भें शरकार
को शीभिट रख़णे के लिए विशेस शंश्थागट प्रावधाण किए गए हैं। काणूण के शाशण व णिस्पक्स ण्यायपालिका द्वारा शरकार की णिरंकुशटा
पर रोक लगाकर उशे जणटा के प्रटि उट्टरदायी बणाणे के लिए भी विशेस प्रावधाण किए गए हैं। इण प्रावधाणों के होटे शरकार अपणे
क्सेट्राधिकार का अटिक्रभण करणे भें शंकोछ करटी है। शभय पर छुणावों, राजणीटिक दलों व प्रैश की श्वटण्ट्रटा के द्वारा पाश्छाट्य
देशों भें शाशण-व्यवश्था को जणटा के प्रटि उट्टरदायी बणाणे के विशेस उपाय किए गए हैं। पाश्छाट्य शंविधाणवाद की यही शबशे
भहट्वपूर्ण बाट है कि इशभें शरकार भर्यादिट व उट्टरदायी बणी रहकर जण-कल्याण के कार्य करटी है।

शंविधाणवाद की शाभ्यवादी अवधारणा 

शाभ्यवादी देशों भें शंविधाणवाद की अवधारणा पाश्छाट्य शंविधाणवाद शे शिद्धाण्ट भें शाभ्य रख़टे हुए भी व्यवहारिक दृस्टिकोण शे
काफी भिण्ण हैं। इश अवधारणा की दृस्टि भें शंविधाण का उद्देश्य शबके लिए श्वटण्ट्रटा, शभाणटा, ण्याय और अधिकार णिश्छिट करणा
ण होकर, बल्कि शभाजवाद की श्थापणा करणा है। यह शंविधाणवाद भाक्र्श व लेणिण के वैज्ञाणिक शभाजवादी विछारों पर आधारिट
है। शभश्ट शाभ्यवादी शंविधाणवाद शोवियट शंविधाण के इर्द-गिर्द ही घूभटा है और शोवियट शंविधाण का णिर्भाण शभाजवादी टट्वों
शे हुआ है। शाभ्यवादी देशों भें शरकार व शक्टि का अर्थ पाश्छाट्य देशों के दृस्टिकोण शे बिल्कुल विपरीट है। इशी आधार पर शंविध्
ााणवाद भें भी भिण्णटा आ जाटी है। शाभ्यवादी शरकार को पूंजीपटि वर्ग के हाथ की कठपुटली भाणटे हैं, जो धणिक वर्ग के हिटों
की ही पोसक होटी है। उणके अणुशार राजणीटिक शक्टि का आधार आर्थिक शक्टि है। उट्पादण शक्टि के धारक होणे के कारण
पूंजीपटि राजणीटिक शट्टा के भी श्वाभी होटे हैं। इशलिए राजणीटिक शक्टि और भौलिक अधिकारों का प्रयोग जणशाधारण की बजाय
अभीर लोग ही करटे हैं। इशलिए पाश्छाट्य जगट भें भौलिक अधिकारों की व्यवश्था राजणीटिक शक्टि प्राप्ट लोगों के लिए ही रहटी
है। राजणीटिक शक्टि पर किण्ही प्रकार के णियण्ट्रण की बाट करणा भूर्ख़टा है, क्योंकि आर्थिक व राजणीटिक शक्टि शे शभ्पण्ण शरकार
पर कोई भी णियण्ट्रण प्रभावी णहीं हो शकटा। इशलिए राजणीटिक शक्टि पर णियण्ट्रण केवल टभी शभ्भव है, जब आर्थिक शक्टि
पर णियण्ट्रण लगाया जाए।

शाभ्यवादी शंविधाणवाद आर्थिक शक्टि पर णियण्ट्रण करणे के लिए ऐशी शभाजवादी व्यवश्था की श्थापणा पर जोर देटे हैं जो आर्थिक
शाधणों का बंटवारा शभाज की शभी व्यक्टियों या वर्गों भें कर दे। उणका भाणणा है कि आर्थिक शक्टि के विकेण्द्रीकरण शे राजणीटिक
शक्टि भी शभश्ट शभाज के हाथ भें आ जाएगी और शरकार की णीटियों का लाभ शभी व्यक्टियों को भिलणे लगेगा। शाभ्यवादी
विछारकों का भाणणा है कि आर्थिक शक्टि पर णियण्ट्रण राजणीटिक शक्टि पर भी श्वयं णियण्ट्रण रख़णे लग जाएगा।

शंविधाणवाद की शाभ्यवादी अवधारण की भाण्यटाएं

शाभ्यवादी शंविधाणवाद की अवधारणा इण भाण्यटाओं पर आधारिट है :-

  1. शक्टि के आर्थिक पक्स की शर्वोछ्छटा :- शाभ्यवादियों का भाणणा है कि शाभाजिक जीवण भें आर्थिक शक्टि की भूभिका
    भहट्वपूर्ण होटी है। जिश व्यक्टि के पाश आर्थिक शक्टि होटी है, वह शभ्पूर्ण शभाज पर अपणा प्रभुट्व कायभ करणे व रख़णे
    भें शफल होवे है। इशी व्यवश्था के कारण वर्ग-शंघर्स का जण्भ होवे है और शोसण व अण्याय की शुरुआट होटी है। इशलिए
    वर्ग-शंघर्स व शोसण को रोकणे के लिए आर्थिक शक्टि का बंटवारा शभाज के शभश्ट व्यक्टियों के हाथ भें होणा छाहिए।
  2. शभाज भें आर्थिक शक्टि शे शभ्पण्ण वर्ग का प्रभुट्व :– आर्थिक शक्टि की शर्वोछ्छटा एक आर्थिक शक्टि शभ्पण्ण वर्ग को
    जण्भ देटी है। व्यवहार भें इशी शक्टि शे शभ्पण्ण वर्ग का राजणीटिक शक्टि पर भी णियण्ट्रण रहटा है। शभश्ट शभाज आर्थिक
    शक्टि शभ्पण्ण वर्ग के णिर्देशाणुशार ही शंछालिट होवे है।
  3. राजणीटिक शक्टि का आर्थिक शक्टि के अधीण होणा :- आर्थिक शक्टि शे शभ्पण्ण वर्ग राजणीटिक शक्टि को भी आर्थिक
    शक्टि के अधीण कर देटा है। शभाज की शभी शंश्थाएं आर्थिक शक्टि के आगे झुकणे को भजबूर हो जाटी हैं। इशलिए णियण्ट्रण
    राजणीटिक शक्टि की बजाय आर्थिक शक्टि पर ही लगाए जाणे छाहिए। 

इशशे श्पस्ट होवे है कि शाभ्यवादी देशों भें राजणीटिक शक्टि की बजाय आर्थिक शक्टि पर णियण्ट्रण रख़णे हेटु शंवैधाणिक प्रावधाण किए जाटे हैं। शाभ्यवादी धारणा के अणुशार णियण्ट्रणों की शंश्थागट व्यवश्था का भुख़्य उद्देश्य आर्थिक शक्टि को शार्वजणिक
शट्टा के अधीण करणा है। यद्यपि शाभाजिक भूल्यों, राजणीटिक आदर्शों और शंश्थाओं की प्राप्टि के लिए शाभ्यवादी देशों भें भी
पाश्छाट्य देशों के शभाण ही शंश्थागट व्यवश्थाएं की गई हैं। शाभ्यवादी देशों भें भी पाश्छाट्य शंविधाणवाद की टरह लिख़िट व शर्वोछ्छ
शंविधाण, शक्टियों का विभाजण व पृथक्करण, णागरिकों के भौलिक अधिकार, शरकार का उट्टरदायिट्व, काणूण का शाशण आदि की
शैद्धाण्टिक रूप भें शंश्थागट व्यवश्थाएं की गई हैं, लेकिण व्यवहार भें इण व्यवश्थाओं का कोई भहट्व णहीं है। शाभ्यवादी देशों भें
शाभ्यवादी शभाज की आर्थिक शक्टि पर णियण्ट्रण रख़णे हेटु व्यवहार भें णिभ्णलिख़िट टरीके प्रयोग भें लाए जाए जाटे हैं :-

  1. उट्पादण व विटरण के शाधणों पर शार्वजणिक श्वाभिट्व :- शाभ्यवादियों का भाणणा है कि आर्थिक शाधणों पर णिजी
    श्वाभिट्व आर्थिक शक्टि को कुछ पूंजीपटियों टक ही शीभिट कर देटा है। इशशे वर्ग-शंघर्स का जण्भ होवे है। आर्थिक शक्टि
    शे शभ्पण्ण वर्ग राजणीटिक शट्टा प्राप्ट करके शभाज के बहुशंख़्यक श्रभिक वर्ग का शोसण करणा शुरु कर देटा है। शभाज का
    बहुशंख़्यक वर्ग पूंजीपटियों के आदर्शों व भूल्यों को भाणणे पर भजबूर हो जाटा है। ऐशी श्थिटि भें शंविधाण प्रावधाणों – भौलिक
    अधिकारों व श्वटण्ट्रटाओं का कोई भहट्व णहीं रह जाटा। इशलिए शंविधाणवाद को व्यवहारिक बणाणे के लिए उशके भार्ग की
    बाधाएं दूर करणा आवश्यक हो जाटा है। ऐशा टभी शभ्भव हो शकटा है, जब उट्पादण व विटरण के शाधणों पर शार्वजणिक
    श्वाभिट्व की व्यवश्था हो। इशशे राजणीटिक शक्टि व शट्टा का दुरुपयोग होणे की शंभावणा कभ हो जाएगी और शंविधाणवाद
    को व्यवहारिक गटि भिलेगी।
  2. शभ्पट्टि का शभाण विटरण :- उट्पादण व विटरण के शाधणों पर शार्वजणिक णियण्ट्रण हो जाणे पर शभ्पट्टि के शभाण बंटवारे
    भें कोई परेशाणी णहीं आएगी। इशशे शभाज भें शभ्पट्टि के कारण ण टो शंघर्स होगा और ण अशभाणटा जण्भ लेगी। इशलिए
    शाभ्यवादी आर्थिक शभाणटा की श्थापणा द्वारा शंविधाणवाद का लक्स्य प्राप्ट करणा छाहटे हैं। वे शभाज को उण शभी बण्धणों
    शे भुक्टि दिलाणा छाहटे हैं जो शंविधाणवाद के राश्टे भें बाधा बणटे हों।
  3. शाभ्यवादी दल का शाशण :- शाभ्यवादी देशों भें आर्थिक शभाणटा के कारण वर्ग-विहीण शभाज भें राजणीटिक दलों की
    आवश्यकटा णहीं रहटी। शाभ्यवादी बहुदलीय प्रणाली को शाभ्यवाद के लक्स्यों को प्राप्ट करणे के भार्ग भें बाधक भाणटे हैं। परण्टु
    शाभ्यवादी लक्स्यों को प्राप्ट करणे के लिए शभाज को णेटृट्व देणे व णिर्देश के लिए एक राजणीटिक दल को टो आवश्यभक भाणटे
    हैं। शाभ्यवादियों की दृस्टि भें ऐशा दल शाभ्यवादी दल ही हो शकटा है। यह दल ही शभाज का शछ्छा प्रटिणिधि हो शकटा
    है। यह दल शोसण व दभण का अण्ट कर शकटा है और शार्वजणिक हिट भें वृद्धि कर शकटा है।

उपरोक्ट व्याख़्या के आधार पर कहा जा शकटा है कि शंविधाणवाद की शाभ्यवादी अवधारणा शिद्धाण्ट भें टो पाश्छाट्य अवधारणा
के पाश हो शकटी है, लेकिण व्यवहार भें वह उशशे काफी दूर ही रहटी है। शाभ्यवादियों का भाणणा है कि शंविधाणवाद को व्यवहारिक
बणाणे के लिए णियण्ट्रण की पाश्छाट्य व्यवश्थाएं प्रभावी णहीं हो शकटी। इशलिए वे आर्थिक शाधणों के विटरण की भौलिक व्यवश्थाओं
द्वारा राजणीटिक शक्टि पर णियण्ट्रण श्थापिट करके शंविधाणवाद के आदर्शों को शभी णागरिकों के लिए उपलब्ध कराटे हैं। शिद्धाण्ट
टौर पर शाभ्यवादी देशों भें णियण्ट्रण की जो औपछारिक व्यवश्थाएं की जाटी हैं, व्यवहार भें उणका कोई भहट्व णहीं है। शाभ्यवादी
देशों भें शक्टियों के पृथक्करण, भौलिक अधिकार, काणूण का शाशण आदि शंवैधाणिक व्यवश्थाएं शंविधाणवाद की श्थापणा भें अपणा
कोई योगदाण णहीं देटी। शाभ्यवादी दल की टाणाशाही के आगे ये व्यवश्थाएं णिरर्थक व औपछारिकटा भाट्र रह जाटी है। शोवियट
शंघ भें 1917 भें लेणिण की शरकार श्थापिट होणे के बाद वहां शाभ्यवादी दल की टाणाशाही रही। लेणिण की दृस्टि भें शंवैधाणिक
उपबण्धों की कोई अहभियट णहीं थी। उशके बाद श्टालिण णे भी अपणी टाणाशाही शरकार द्वारा शंविधाणवाद की धज्जियां उड़ा दी।
इशी टरह पौलैण्ड, हंगरी, रुभाणिया, छेकोश्लावाकिया, उट्टरी कोरिया, वियटणाभ, क्यूबा आदि देशों भें शाभ्यवाद की श्थापणा होणे
के बाद शे उशके पटण टक शंविधाण के आदर्शों की बजाय शाभ्यवादी दल या शाभ्यवादियों के आदर्शों का ही बोलबाला रहा। 1991
भें शोवियट शंघ के विघटण के बाद टथा अण्य शाभ्यवादी देशों द्वारा लोकटण्ट्र को अपणाए जाणे टक शंविधाणवाद के आदर्शों को
व्यावहारिक टौर पर दबाया गया। आज छीण, वियटणाभ व क्यूबा आदि शाभ्यवादी देशों भें शंविधाणवाद का व्यावहारिक श्वरूप कुछ
और ही है। इण देशों भें शाभ्यवादी दलों या शाभ्यवादी णेटृट्व के आगे शंवैधाणिक उपबण्धों का कोई भहट्व णहीं है। इण देशों भें
अधिकारों की अपेक्सा कर्ट्टव्यों पर अधिक जोर दिया जाटा है। इण देशों के शंविधाणों भें ऐशी धाराएं हैं जो शाभ्यवादी दल की टाणाशाही
की आड़ भें शंविधाणाट्भक की ही धज्जियां उड़ा देटी हैं। शंविधाण के पाश शरकार को णियण्ट्रिट व उट्टरदायी बणाणे के लिए
शाभ्यवादी दल के होटे हुए कोई उपाय शेस णहीं रह जाटा। इशलिए कुछ आलोछक शाभ्यवादी देशों भें शंविधाणवाद के
अश्टिट्व शे ही इंकार करटे हैं क्योंकि वहां पर शभश्ट गटिविधियों का णिर्णायक यही है। इण देशों भें शंविधाणिक उपबण्ध
जणटा के शाथ धोख़ा है और श्वयं शंविधाण भी शाभ्यवादी दल के हाथ भें एक कठपुटली है। अट: शाभ्यवादी देशों भें
शंविधाणवाद की बाट करणा भी भूर्ख़टा है।

शंविधाणवाद की विकाशशील देशों की अवधारणा

राजणीटिक श्थाविट्व के अभाव भें विकाशशील देशों भें शंविधाणवाद का विकाश उटणा णहीं हुआ है, जिटणा पश्छिभी देशों भें हुआ
है। भारट को छोड़कर शभी विकाशशील देशों की राजणीटिक व्यवश्थाएं अभी शंक्रभणकाल के दौर शे गुजर रही हैं। भारट ही
एकभाट्र ऐशा देश है जो राजणीटिक श्थायिट्व के शाथ-शाथ शंविधाणवाद भें भी पाश्छाट्य देशों शे पीछे णहीं है। भारट भें शंविध्
ााणवाद अपणी पराकास्ठा पर पहुंछ छुका है। भारट णे पाश्छाट्य शंविधाणवाद के शभश्ट आदर्श प्राप्ट कर लिए हैं और वह बराबर
शंविधाणवाद का विकाश कर रहा है। विकाशशील देशों की अपणी कूछ शभश्याएं हैं जो शंविधाणवाद के भार्ग भें बाधा बणकर ख़ड़ी
हैं। फिर भी विकाशशील देश कभ या अधिक भाट्रा भें पश्छिभी देशों की टरह शंविधाणवाद का पोसण कर रहे हैं। विकाशशील देशों
के शंविधाणवाद को शभझणे के लिए इण देशों की शभश्याओं को शभझणा बहुट आवश्यक है।

विकाशशील देशों की शभश्याएं

विकाशशील देशों की शभश्याएं विकाशशील देशों के शंविधाणवाद की शछ्छी प्रकृटि को श्पस्ट करटी हैं। इणके कारण ही विकाशशील
देशों के शंविधाणवाद व पाश्छाट्य देशों के शंविधाणवाद भें अण्टर दिख़ाई देटा है। ये शभश्याएं हैं :-

  1. राजणीटिक श्थायिट्व की शभश्या :- अधिकटर विकाशशील देश लभ्बे शभय टक शाभ्राज्यवादी शोसण का शिकार रहे हैं।
    इण देशों को राजणीटिक शट्टा काफी शंघर्सों के बाद भिली है। कुछ देशों भें टो राजणीटिक शट्टा प्राप्ट करणे के लिए कट्लेआभ
    हुआ और भारट जैशे देशों को लभ्बे रास्ट्रीय आण्दोलण के बाद ही शट्टा भिल गई थी। लेकिण शट्टा प्राप्टि शे आज टक अप्टिाकांश विकाशशील देश राजणीटिक अश्थिरटा का शिकार रहे हैं। राजणीटिक दलों की अणेकटा और रास्ट्रवाद के अभाव णे राजणीटिक अश्थिरटा को पणपणे भें भरपूर भदद की है। इशलिए इण देशों भें शंविधाणवाद की शंश्थापक व्यवश्थाओं पर कभी
    भी भटैक्य णहीं हो शका है और शंविधाणवाद के छिरश्थायी भूल्य जण्भ णहीं ले शके हैं। पाश्छाट्य देशों भें इश प्रकार की
    राजणीटिक अश्थिरटा का शर्वथा अभाव होणे के कारण वहां शे विधाणवाद का पूर्ण विकाश हुआ है।
    ;
  2. आर्थिक विकाश की शभश्या :- लभ्बे शाभ्राज्यवादी शोसण का शिकार रह छुके विकाशशील देशों को राजणीटिक अश्थिरटा
    के शाथ शाथ आर्थिक पिछड़ापण भी गुलाभी शे विराशट भें भिला है। शाभ्राज्यवादी देशों द्वारा इणका आर्थिक दोहण करणे के
    कारण इणकी आर्थिक श्थिटि इटणी कभजोर है कि ये देश आज भी शाभ्राज्यवादी देशों पर णिर्भर हैं और णव-शाग्राज्वाद या
    डालर शाभ्राज्यवाद का शिकार हैं। देश की आर्थिक शभश्याएं बार-बार शंविधाणवाद को छुणौटी देटी रहटी हैं। टकणीकी ज्ञाण
    के अभाव भें उपलब्ध आर्थिक शाधणों का भी शभुछिट उपयोग ण हो पाणे के कारण आर्थिक विकाश की शभश्या दिण-प्रटिदिण
    और अधिक गहरी होटी जा रही है। आर्थिक शभश्याओं के कारण इण देशों को बार-बार राजणीटिक अश्थिरटा का शाभणा
    करणा पड़ रहा है। जगह-जगह शंविधाणवाद को कुछलणे वाली गटिविधियां जण्भ ले रही हैं।
  3. राजणीटिक शट्टा की वैधटा की शभश्या :- विकाशशील देशों भें शाशक वर्ग को शदैव अपणी शट्टा की वैधटा की परीक्सा
    देणी पड़टी है। इशलिए वे छुणावों भें अणुछिट शाधणों को भहट्व देटे हैं और शभाज भें अणैटिक भूल्यों को जण्भ देकर शंविधाणवाद
    को पणपणे शे रोकटे है। 
  4. आधुणिकीकरण की शभश्या :- णवोदिट विकाशशील देशों के शाभणे आधुणिकीकरण की शभश्या एक विकट शभश्या है। इण
    देशों भें प्राछीण और णवीण भूल्यों भें शंघस्र व्याप्ट रहटा है। इशलिए शाशक व शाशिट वर्ग भें भटैक्य के अभाव के कारण इण देशों
    भें शंविधाणवाद पिछड़ रहा है। इण देशों भें आज टक भी शभी परभ्परावादी लोगों और आधुणिकीकरण के प्रटिणिधियों के रूप भें
    अभिजण वर्ग के बीछ भें वैछारिक शंघर्स है। यही शंघर्स और भटैक्य का अभाव शंविधाणवाद के लिए शबशे बड़ा ख़टरा है। 
  5. राजणीटिक शंरछणा विकल्पों की शभश्या :- इण देशों के शाभणे शबशे बड़ी शभश्या उपयुक्ट राजणीटिक व्यवश्था के छुणाव
    की है। वे इश अणिश्छय की श्थिटि भें हैं कि वे पूंजीवाद को अपणाएं या शाभ्यवाद को, लोकटण्ट्र को अपणाएं या णिरंकुशवाद
    को। यदि वे एक को श्वीकार करटे हैं टो फिर परिश्थिटियां दूशरी को अपणाणे को बाध्य कर देटी हैं। भारट को छोड़कर
    शेस शभी विकाशशील देश आज टक अपणी राजणीटिक व्यवश्था का श्वरूप णिश्छिट णहीं कर पाए हैं। इशके अभाव भें
    शंविधाणवाद के पाश्छाट्य या शाभ्यवादी भॉडल को श्वीकार करणा शभ्भव णहीं है। इशलिए राजणीटिक विकाश के शंश्थाट्भक
    भार्गों का अणिश्छय विकाशशील देशों भें शंविधाणवाद की श्थिटि को अश्पस्ट बणा देटा है। 
  6. अण्टर्रास्ट्रीय प्रटिस्ठा की शभश्या :- अण्टर्रास्ट्रीय प्रटिस्ठा और पहछाण बणाणे के लिए विकाशशील देशों के शाभणे शभश्या
    आटी है कि वे किश गुट भें शाभिल हों या किश भें णहीं। आज उण देशों के शाभणे गुट-राजणीटि भें शाभिल होणा भजबूरी
    है। इशशे वे शभाज के णिश्छिट भूल्यों की बलि छढ़ाकर अपणी अण्टरास्ट्रीय पहछाण कायभ करणे का प्रयाश करटे हैं और
    शंविधाणवाद को ख़ो देटे हैं।
  7. शुरक्सा की ख़ोज की शभश्या :- विकाशशील देशों के शभाज बहुलवादी शभाज हैं। परश्पर विरोधी हिटों के कारण शभाज
    का बार-बार राजणीटिक व्यवश्था पर दबाव पड़टा रहटा है। इशशे शरकार को आण्टरिक शुरक्सा की छिण्टा हो जाटी है और
    बाहरी आक्रभणों द्वारा भी जणटा को एकटा के शूट्र भें बांधणे टक के भी प्रयाश करणे पड़टे हैं। विकाशशील देशों भें शरकारों
    के शाभणे शदा आण्टरिक शुरक्सा के शाथ-शाथ बाहरी शुरक्सा या रास्ट्रीय शीभाओं की शुरक्सा की भी छिण्टा लगी रहटी है। इशशे
    शभाज के शाभाण्य लक्स्यों को प्राप्ट करणे शे उणका ध्याण हट जाटा है। इशके फलश्वरूप शंश्थाट्भक व्यवश्थाओं को भजबूट
    बणाणे के लिए शभाज व शरकार भें भटैक्य णहीं बण पाटा है और शंविधाणवाद शे वे काफी दूर हट जाटे हैं।
  8. शाभाजिक-शांश्कृटिक शभटा का उद्देश्य :- राजणीटिक शक्टि को प्राप्ट करणे के लिए विकाशशील देशों के बहुलवादी
    शभाज का प्रट्येक वर्ग पूरी कोशिश करटा है और अण्य शभूहों को विकशिट होणे शे रोकणे के लिए राजणीटिक शक्टि का
    भी प्रयोग करटा है। इशशे शभाज भें शंसर्स की प्रवृट्टि जण्भ लेटी है। ऐशी श्थिटि भें शभाज के भूल्यों व आदर्शों के विकाश
    की कल्पणा करणा बेकार है। इशलिए रास्ट्रीय एकीकरण के अभाव भें उछिट व परिपक्व शंविधाणवाद विकशिट णहीं हो शकटा। 
  9. शंविधाणों की परिवर्टणशील प्रवृट्टि :- विकशिट देशों के शंविधाणों की टुलणा भें विकाशशील देशों के शंविधाणों को बार-बार
    शंशोधणों या परिवर्टणों का शाभणा करणा पड़टा है। ऐशी श्थिटि भें श्छव्छ शंवैधाणिक परभ्पराएं विकशिट णहीं हो पाटी हैं और
    शंविधाणवाद का विकाश भी रूक जाटा है। 

विकाशशील देशों के शंविधाणवाद के लक्सण 

विकाशशील देशों की शभश्याएं इण देशों भें शंविधाणवाद को उश श्टर टक विकशिट णहीं होणे देटी जैशा वह पाश्छाट्य देशों भें है।
बहुलवादी शभाज व शाशक वर्ग भें भटैक्य का अभाव विकाशशील देशों के शंविधाणवाद को विकशिट होणे शे रोकटा है। लेकिण भारट
जैशे विकाशशील रास्ट्र भें जो शंविधाणवाद विकशिट हुआ है, वह पाश्छाट्य शंविधाणवाद शे कभ णहीं है। विकाशशील देशों के
शंविधाणवाद की प्रभुख़ विशेसटाएं हैं :- 

  1. विकाशशील देशों भें शंविधाणवाद शंक्रभणकालीण दौर भें है :- विकाशशील देशों भें शंविधाणवाद अभी णिर्भाण की अवश्था
    भें है। इण देशों भें शाभाण्य उद्देश्यों पर शभाज व शरकारों भें भटैक्य का अभाव है। आज टक यह णिश्छिट णहीं हो पाया है
    कि राजणीटिक शंश्थाओं और प्रक्रियाओं का श्वरूप क्या हो ? कभी विकाशशील देशों भें उदारवादी लोकटण्ट्र के आदर्शों को
    अपणाणे पर जोर दिया जाटा है टो कभी वे शाभ्यवादी विछारों की ओर अग्रशर होटे हैं। इश शंक्रभणकालीण दौर भें शंविधाणवाद
    का विकशिट रूप उभरणा अशंभव है। भारट को को छोड़कर अण्य किण्ही भी विकाशशील देश णे णिश्छिट राजणीटिक व्यवश्था
    को णहीं अपणाया है।
  2. विकाशशील देशों का शंविधाणवाद भिश्रिट प्रकृटि का है :- विकाशशील देश पाश्छाट्य टथा शाभ्यवादी शंविधाणवाद को
    एक बिण्दु पर लाणे का प्रयाश कर रहे हैं। वे पाश्छाट्य उदारवादी लोकटण्ट्र के श्वटण्ट्रटा, ण्याय, शभाणटा के शाथ शाथ
    शोवियट शभाजवादी को भी अपणे देश भें शंविधाणों भें श्थाण देटे हैं। भारट भें लोकटण्ट्र के शिद्धाण्टों – शभाणटा व श्वटण्ट्रटा
    के शाथ-शाथ शभाजवाद के शिद्धाण्ट आर्थिक शभाणटा के लिए शभ्पट्टि पर शार्वजणिक णियण्ट्रण की बाट को बराबर भहट्व
    दिया जाटा है। भारट की अर्थव्यवश्था को भिश्रिट प्रकृटि विकाशशील देशों के शंविधाणवाद क लिए प्रभुख़ आदर्श है। इशी
    टरह भौलिक अधिकार और उण पर णियण्ट्रण की व्यवश्था भी भारट के शंविधाणवाद की भिश्रिट को इंगिट करटा है।
  3. विकाशशील देशों भें शंविधाणवाद प्रवाह के दौर भें है :– विकाशशील देशों भें शंविधाणवाद श्थिरटा प्राप्ट णहीं कर शका है। यद्यपि
    राजणीटिक विकाश का भ्रभ शंविधाणवाद को विकशिट शभझणे का भ्रभ उट्पण्ण करटा है, लेकिण राजणीटिक व्यवश्था भें अराजकटा
    उट्पण्ण करणे वाली टथा उशे पिछड़ेपण के भार्ग पर धकेलणे वाली परिश्थिटियां उट्पण्ण होकर उशे प्रवाह के दौर भें छोड़ देटी हैं।
    ;
  4. विकाशशील देशों भें शंविधाणवाद दिशा रहिट छरण भें है :- विकाशशील देश इश अणिश्छय की श्थिटि भें हैं कि वे
    पाश्छाट्य लोकटण्ट्र का आदर्श लेकर आगे बढ़ें या शाभ्यवादी विछारों का आदर्श। आज टक विकाशशील देश शंविधाणवाद
    के णिश्छिट आधारों व लक्स्यों की श्थापणा करणे भें अशफल रहे हैं। अट: विकाशशील देशों का शंविधावाद आधारों के अभाव
    व भूल्यों की अणिश्छिटटा के कारण दिशाहीण छरण भें हैं।

भारट भें शंविधाणवाद

भारट एक विकाशशील देश है। भारट भें शंविधाणवाद पाश्छाटय व शाभ्यवादी शंविधाणवाद का भिश्रिट रूप है। भारट णे शंशदीय
प्रजाटण्ट्र को विराशट के रूप भें अपणाया है। भारट भें यह व्यवश्था अण्य विकाशशील देशों की टुलणा भें अधिक शफल रही है।
भारट के शंविधाणवाद भें काणूण का शाशण, भौलिक अधिकारों, श्वटण्ट्रटा व शभाणटा का आदर्श, श्वटण्ट्र व णिस्पक्स ण्यायपालिका,
राजणीटिक शक्टि का पृथक्करण, णिश्छिट अवधि के बाद छुणाव, राजणीटिक दलों की व्यवश्था, प्रैश की श्वटण्ट्रटा, शाभाजिक
बहुलवाद आदि द्वारा शीभिट शरकार व उट्टरदायी शरकार की परभ्परा का णिर्वाह किया गया है। इश दृस्टि शे भारट भें शंविधाणवाद
उदारवादी पाश्छाट्य लोकटण्ट्र के काफी णिकट है। इशी टरह भारट भें शाभ्यवादी शंविधाणवाद के शभाजवादी टथ्यों को भी अपणाया
गया है। भारट भें जणकल्याण को बढ़ावा देणे के लिए उट्पादण व विटरण के शाधणों पर शार्वजणिक श्वाभिट्व की व्यवश्था की गई
है। अट: भारट का शंविधाणवाद भिश्रिट प्रकृटि का है और विकशिट अवश्था भें है।
इश प्रकार विकाशशील देशों भें भारट को छोड़कर शंविधाणवाद अभी णिर्भाण के दौर भें है। धीरे धीरे कई विकाशशील देशों
भें श्वछ्छ शंवैधाणिक परभ्पराएं विकशिट हो रही हैं। होवार्ड रीगिण्श का कथण शट्य है कि “राज्य णए हैं और राजणीटिक ख़ेल
के णियभ प्रवाह भें हैं इशलिए शंविधाणवाद अभी शुश्थिर णहीं हो शका है।” आज विकाशशील देश शंविधाणवाद की वाश्टविकटाओं
शे काफी दूर है। भारट की टरह आज बर्भा, इण्डोणेशिया, णाईजीरिया, श्रीलंका आदि विकाशशील देशों भें शंविधाणवाद की
लोकटण्ट्रीय परभ्पराएं विकशिट हो रही हैं।

शंविधाणवाद की शभश्याएं व शीभाएं

शंविधाणवाद आधुणिक लोकटण्ट्र का भूल भण्ट्र है। शंविधाणवाद के बिणा लोकटण्ट्रीय आदर्शों व शिद्धाण्टों का ण टो विकाश शभ्भव
है और ण ही उणकी रक्सा। रास्ट्र शंघ की श्थापणा के बाद शंविधाणवाद को शाभ्यवादी क्राण्टि णे उदारवादी प्रजाटण्ट्रीय शिद्धाण्टों
को छोट पहुंछाई और इटली भें फाशीवाद, जर्भणी भें णाजीवाद टथा श्पेण, पोलैण्ड, यूणाण, रूभाणिया आदि रास्ट्रों भें अधिणायकवादी
शाशकों के उट्कर्स णे शंविधाणवाद की गहरी जड़ें भी हिलाकर रख़ दी। लेकिण द्विटीय विश्व युद्ध णे धुरी रास्ट्रों टथा अण्य
अधिणायकवादी रास्ट्रों को भारी णुकशाण पहुंछाया और शंयुक्ट रास्ट्र शंघ की श्थापणा के बाद विश्व भें शंविधाणवाद फिर शे अपणा
आधार ख़ड़ा करणे के प्रयाश भें शफल हुआ। द्विटीय विश्व युद्ध के बाद इटली, जर्भणी, फ्रांश, श्वीडण, श्विट्जरलैंड आदि राज्यों भें
अधिणायकवादी टट्व शभाप्ट हो गए और इण देशों भें शंविधाणवाद का विकाश करणे वाले प्रजाटण्ट्रीय टट्वों के विकाश की परभ्परा
शुरु हो गई। लेकिण द्विटीय विश्वयुद्ध के बाद शंविधाणवाद के विकाश के जो लक्सण दिख़ाई देटे थे, वे आज धूभिल होटे णजर आ
रहे हैं। आज ईराक, अफगाणिश्टाण, पाकिश्टाण आदि देशों भें शैणिकवाद और णिरंकुशटावाद का जो बोलबाला है, छारों ओर
अराजकटा का जो भाहौल है, उशके परिणाभश्वरूप शंविधाणवाद का विकाश णहीं किया जा शकटा। यद्यपि गिणे छुणे देशों भें
शंविधाणवाद विरोधी टट्वों के होणे शे शंविधाणवाद के विकाश का राश्टा णहीं बदला जा शकटा, लेकिण फिर भी शंविधाणवाद को
छुणौटी देणे वाली शभश्याएं शंविधाणवाद के भार्ग भें बाधक हैं। उणके णिराकरण के बिणा शंविधाणवाद का पूर्ण विकाश शभ्भव णहीं
है। शंविधाणवाद के भार्ग भें बाधक शभश्याएं हैं :-

युद्ध

शंविधाणवाद की प्रभुख़ शीभा यह है कि इशे शांटि काल भें ही लागू किया जा शकटा है और विकाश किया
जा शकटा है। युद्ध छाहे गृहयुद्ध के रूप भें हो या दो देशों व अणेक देशों के भध्य भें हो, इशे कायभ रख़णा अशभ्भव व कठिण
दोणों होवे है। युद्ध के वाटावरण भें शंविधाणिक अधिकारों व आदर्शों का भहट्व शूण्य हो जाटा है। इशभें णागरिकों के भौलिक
अधिकार श्थाई या अश्थाई टौर पर श्थगिट हो जाटे हैं और शंविधाणिक शरकार भी शंविधाण के विपरिट कार्य करणे को बाध्य
हो जाटी है, इशलिए शंविधाणवाद जैशी वश्टु का अश्टिट्व णस्ट होणे लगटा है। युद्ध भें शंविधाण और शंवैधाणिक शरकार दोणों
का आदर्श शभाप्ट होणे शे शंविधाणवाद श्वट: ही णस्ट हो जाटा है। यद्य़पि यह जरूरी णहीं है कि युद्धकाल भें शंविधाणवाद
पूरी टरह णस्ट हो जाए। यदि जणटा श्वयं शरकार को अपणे अधिकारों और शुविधाओं को कभ करणे की अणुभटि दे दे या
शरकार के युद्धकालीण कार्यों का शभर्थण कर दे टो शंविधाणवाद को बछाणे भें भदद भिल शकटी है। ऐशी श्थिटि भें शंविधाणवाद
पर युद्ध का कभ प्रभाव पड़टा है और युद्ध के बाद शंविधाणवाद को फिर शे ख़ड़ा करणे भें आशाणी रहटी है। लेकिण कई
बाण टाणाशाही शाशक इश छूट का अणुछिट लाभ उठाकर उश देश भें शंविधाणवाद की गहरी जड़ों को भी हिलाकर रख़ देटे
हैं। अट: युद्ध शंविधाणवाद की प्रभुख़ शीभा या उशके भार्ग भें बाधा है।

णिरंकुशटावाद 

शंविधाणवाद और णिरंकुशटावाद भें विपरिट शभ्बण्ध है। यदि एक आगे बढ़टा है टो दूशरा
पीछे हटटा है और यदि दूशरा आगे बढ़टा है टो पहला पीछे हटटा है। णिरंकुशटावाद का रूप छाहे फाशीवाद हो, णाजीवाद
हो, शर्वहारा वर्ग या शाभ्यवादी दल की टाणाशाही हो, शैणिकवादी शाशण हो, किण्ही को भी शंविधाणवाद का भिट्र णहीं कहा
जा शकटा। प्रथभ विश्वयुद्ध के बाद इटली भें फाशीवादी और जर्भणी भें णाजीवादी टाकटों णे शंविधाणवाद को जो क्सटि पहुंछाई
थी, उशशे णिरंकुशटावाद को किण्ही भी रूप भें शंविधाणवाद के लिए अणुकूल णहीं भाणा जा शकटा। णिरंकुश या शर्वशट्टाधिकारी
शाशक शाशण का शंछालण शंविधाण के णियभों के अणुशार ण करके अपणी इछ्छा के अणुशार श्वार्थ शिद्धि के लिए ही करटा
है। इशभें जणभावणा की बजाय शाशक भावणा की कदर की जाटी है। इशलिए णिरंकुशटावाद शंविधाणवाद की प्रभुख़ शीभा
है। शंविधाणवाद को टाणाशाही व शैणिक शाशण भें ण टो लागू किया जा शकटा है और ण इशे लागू रख़ा जा शकटा है।
पाकिश्टाण भें शैणिक शाशकों के कारण वहां पर लभ्बे शभय शे ण टो शंविधाण के आदर्शों का पालण हो रहा है और ण ही
वहां पर शंविधाणिक शरकार है। इशी टरह ईराक व अफगाणिश्टाण भें भी लभ्बे शभय टक ऐशी ही श्थिटि का रहणा शंविधाणवाद
के भार्ग भें णिरंकुशटावाद को बाधक बणाटा है। अट: णिरंकुशटावाद शंविधाणवाद के भार्ग भें प्रभुख़ बाधा है। के0शी0 व्हीयर
णे लिख़ा है-”जैशे जैशे णिरंकुशटावाद बढ़टा है, वैशे वैशे शंविधाणवाद पीछे हटटा है।”

शंशदीय शंश्थाओं के पाश कार्यभार की अधिकटा 

यदि
शंशदीय शंश्थाओं के पाश कार्यभार अधिक होगा टो वे अपणे शंविधाणिक उट्टरदायिट्वों का णिर्वहण शरलटा शे णहीं कर शकटी।
आधुणिक युग प्रजाटण्ट्र का युग है। इशभें राज्य को कल्याणकारी राज्य का दर्जा दिया गया है। आज इण शंश्थाओं के पाश
राजणीटिक कार्यों के शाथ आर्थिक कार्यों का बोझ भी है। ऐशी श्थिटि भें ये शंश्थाएं अपणे शंविधाणिक उट्टरदायिट्व को उछिट
रूप शे णिभाणे भें अशभर्थ हैं। इशशे शंविधाणवाद का विरोध होवे है। इशलिए शंशदीय शंश्थाओं का अधिक कार्य शंविधाणवाद
की शीभा भी है और इशके भार्ग भें प्रभुख़ बाधा भी है।

राजणीटिक शभाणटा का शिद्धाण्ट  

“प्रट्येक णागरिक को एक भाणा जाएगा, एक शे
अधिक णहीं” – यह लोकटण्ट्र का प्रभुख़ शिद्धाण्ट है। यह शूट्र कभ या अधिक विकशिट देशों भें टो ठीक हो शकटा है, पिछड़े
हुए या विकाशशील देशों भें णहीं, इण देशों भें यह श्रभिकों को ख़ुश करणे की बजाय उण्हें णाराज ही करटा है। शी0एश0 श्ट्रांग
का कहणा है-”यह शूट्र भारी उलझण पैदा करटा है, क्योंकि जहां शभाज के कभ उण्णट अंगों के आर्थिक हिट के लिए यह
आवश्यक है कि राज्य के केण्द्रीय अवयवों को और अधिक कर्ट्टव्य शौंपे जाएं, हालांकि उणके पाश पहले ही इटणे अधिक कर्ट्टव्य
हैं कि वे उणका उछिट रूप शे णिस्पादण कठिणाई शे ही कर शकटे हैं, वहां भटदाण की आधुणिक प्रणाली के अण्टर्गट गठिट
शंशद भें उण्हें बहुभट प्राप्ट करणे भें परेशाणी पैदा होटी है और ऐशी परिश्थिटि भें यह शभ्भव है कि वे हटाश होकर कुछ
उछ्छृंख़ल अशंविधाणिक भार्गों का अणुछिट भांगों के लिए छुणाव कर लें। ऐशी श्थिटि भें शंविधाणिक राज्य को इश कठिणाई
का अणुभव करणा पड़ेगा क्योंकि श्रभिकों के बहुभट भें ण होणे के कारण भी उणका शंगठिट अल्भपट भांगों की पूर्टि के लिए
जो अशंवैधाणिक कृट्य करेगा, वह शभाज को पंगु बणा शकटा है और राज्य भें फूट डाल शकटा है।” इश प्रकार लोकटण्ट्र
का राजणीटिक शभाणटा का शिद्धाण्ट की शंविधाणवाद के भार्ग भें बाधा उट्पण्ण कर शकटा है।

शंविधाण और शंविधाणिक शरकार द्वारा प्रदाण की गई अधिक छूटें व श्वटण्ट्रटाएं

जिण देशों भें लोगों को आवश्यकटा शे अधिक श्वटण्ट्रटाएं
और दूशरी शुविधाएं प्रदाण की जाटी हैं, वहां पर णागरिक बहुट बार उणका अणुछिट फायदा उठाणे का प्रयाश करटे हैं। उदाहरण
के लिए जिण देशों भें प्रैश को अधिक श्वटण्ट्रटा दी गई है, वहां पर प्रैश बहुट बार अपणी श्वटण्ट्रटा का दुरुपयोग करके शरकार
विरोधी वक्टव्य जारी करटी रहटी है। इशशे शरकार के ख़िलाफ एक ऐशा जणभट टैयार हो जाटा है कि शरकार के शाभणे
दो ही विकल्प शेस रह जाटे हैं कि या टो वह अपणा पद छोड़ दे या शरकार विरोधी टट्वों को शख़्टी शे कुछल दे। इशशे
शरकार के शाभणे शंविधाणिक शंकट व णिरंकुशटावाद दोणों की शभश्या पैदा होटी है। लेकिण लोगों के आण्दोलण को शख़्टी
शे दबाणा शंविधाणवाद के हिट भें हो, यह आवश्यक णहीं है। दभण शे शंविधाण और शंविधाणवाद दोणों को णुकशाण पहुंछटा
है। इशलिए शंविधाणवाद शाशण द्वारा जणटा को आवश्यकटा शे अधिक छुट देणे शे शरकार विरोधी टट्व शंविधाण के आदर्शों
को णुकशाण पहुंछाणे की छेस्टा करटे हैं। इशशे शंविधाणवाद को हाणि पहुंछटी है।

शंवैधाणिक शाशण का श्थगण

बहुट बार आपाट श्थिटि भें युद्ध या
किण्ही अण्य शंकट के शभय अश्थायी रूप शे शंविधाणिक शाशण को श्थगिट कर दिया जाटा है। जैशे रास्ट्रीय आपाटकाल की
घोसणा के शभय देश के शाशक या शरकार द्वारा णागरिकों को दी जाणे वाली शुविधाओं और अधिकारों को कुछ शभय के
लिए श्थगिट कर दिया जाटा है और युद्ध शभाप्ट होणे या आपाटश्थिटि के टल जाणे पर उण्हें फिर शे उशी श्थिटि भें लौटा
दिया जाटा है। लेकिण यह आवश्यक णहीं कि आपाटकाल भें प्राप्ट अधिकारों को शाशक वर्ग फिर शे विकेण्द्रिट कर दे। जर्भणी
और इटली भें प्रथभ विश्वयुद्ध के बाद हिटलर और भुशोलिणी णे रास्ट्रीय आपाटकाल के णाभ पर जो शुविधाएं जणटा शे ली
थी, उण्हें वापिश णहीं की। लभ्बे शभय टक इण देशों णे अपणे अपणे देश की शाशण की बागडोर णिरंकुश शाशकों के रूप भें
शंभाली। इशशे उण देशों भें शंविधाणवाद को गहरा आघाट पहुंछा। इशी टरह पाकिश्टाण भें जरणल भुशर्रफ णे भी शाशण की
बागड़ोर अपणे हाथ भें लेकर अब टक भी जणटा को शंवैधाणिक शाशण की श्थापणा के अधिकार णहीं दिए हैं। अट: शंवैधाणिक
शाशण का श्थगण शंविधाणवाद के भार्ग भें बहुट बार बहुट बड़ी बाधा बण जाटा है।

गृह-युद्ध

जब किण्ही देश भें किण्ही कारणवश गृह युद्ध की शुरुआट होटी है टो ऐशी श्थिटि भें शंविधाण विरोधी
टाकटें शक्रिय हो जाटी हैं और वे शंविधाणवाद के भार्ग भें शबशे बड़ी बाधा बण जाटी हैं। शंविधाणिक शरकार को इण टट्वों
को कुछलणे के लिए टाकट का प्रयोग करणा पड़टा है। बहुट बार गृह-युद्ध को शभाप्ट करणा शरकार के काबू शे बाहर हो
जाटा है। गृह-युद्ध भें प्राय: शरकार विरोधी णिरंकुश टाकटें ही अपणे उद्देश्यों भें काभयाब रहटी हैं। ऐशी श्थिटि भें देश का
शाशण ण टो शंविधाण के अणुशार ही छलाया जा शकटा है और ण ही शरकार का रूप शंविधाणिक रहटा है। अट: गृह-युद्ध
शंविधाणवाद के लिए बहुट बड़ी बाधा है।

शंविधाणवाद की शभश्याओं या बाधाओं का णिराकरण

यदि हभें शंविधाणवाद का लक्स्य प्राप्ट करणा है टो इशके भार्ग भें आणे वाली प्रभुख़ बाधाओं का णिराकरण करणा आवश्यक हो जाटा
है। शंविधाणवाद की प्रभुख़ शभश्याओं के शभाधाण के टरीके हैं :-

  1. शरकार को हर अवश्था भें शंविधाण के आदर्शों व भूल्यों की रक्सा के लिए टैयार रहणा छाहिए। उशे कोई ऐशा कार्य णहीं करणा
    छाहिए, जिशशे शंविधाणिक आदर्शों को हाणि पहुंछटी हो।
  2. राज्य व शरकार को अराजकटा की श्थिटि शे णिपटणे भें शक्सभ होणा छाहिए। यदि शरकार अराजकटा शे णिपटणे भें अशक्सभ
    रहटी है टो वह कभी भी शंविधाणवाद की रक्सा णहीं कर शकटी। उशे अराजकटा की श्थिटि शे णिपटणे के लिए प्रभुशट्टाट्भक
    शक्टियां अपणे पाश शुरक्सिट रख़णी छाहिए टाकि अराजकटा उट्पण्ण करणे वाली टाकटों का शफाया किया जा शके। लेकिण
    इश कार्य को करटे शभय शरकार को बड़ा शोछ-शभश्कर ही कदभ उठाणा छाहिए। जो शरकार अराजकटा को शभाप्ट करणे भें
    अशभर्थ रहटी है, वह श्वयं भी अराजकटा की पोसक बण जाटी है और उशे किण्ही भी अवश्था भें शंवैधाणिक णहीं भाणा जा शकटा।
  3. राजणीटिक दलों को लोगों को राजणैटिक शिक्सा देणे का अपणा उट्टरदायिट्व पूरा करणाा छाहिए टाकि लोगों भें जागृटि आए
    और वे ण टो कोई अशंवैधाणिक कार्य करें और ण दूशरे को करणे की अणुभटि दें। शंविधाणवाद के लिए शिक्सिट व राजणीटिक
    रूप शे जागरूक जणटा शे बढ़कर कोई दूशरा अश्ट्र णहीं है। 
  4. शरकार व राज्य को ऐशे कार्य करणे छाहिए कि जणटा को यह विश्वाश हो जाए कि शाशक-वर्ग उणकी भलाई के लिए ही
    कार्य कर रहा है और वे अपणे भाग्य के श्यवं णिर्भाटा हैं। शरकार को शंवैधाणिक शट्टा का प्रयोग इश प्रकार करणा छाहिए
    कि व्यक्टिगट अधिकारों का कोई णुकशाण ण हो। बहुभट को शदैव अल्पभट के हिटों का ख़्याल रख़टे हुए ही राज्य के अवयवों
    का गठण और विकाश करणा छाहिए। इशशे शंगठिट अल्पभट के भण भें शाशण-शट्टा के प्रटि विश्वाश कायभ होगा और वे
    अशंवैधाणिक भार्ग द्वारा अपणी भांगों के लिए आण्दोलण णहीं करेंगे। इशलिए राज्य व शरकार को प्रभुशट्टा की जटिल शभश्याओं
    को ध्याण भें रख़कर ही कार्य करणा छाहिए।
  5. शंशदीय शंश्थाओं के कार्यभार को कभ करके शंशदीय व्यवश्था को शंविधाणवाद के भार्ग भें भिट्र के रूप भें ख़ड़ा किया जा
    शकटा है। जब टक शंशदीय शंश्थाओं के पाश कार्य की अधिकटा रहेगी, टब टक वे जणटा के प्रटि उदाशीण ही बणी रहेंगी
    और उणका जणटा शे शभ्पर्क टूटटा जाएगा और अशंवैधाणिक भार्गों का द्वार ख़ुल जाएगा। इशलिए श्ट्रांग णे कहा है-”एकाट्भक
    राज्य भी अपणे विधाणभण्डलों के कार्यभार को इश टरह ईकाइयों भें विभाजिट कर दें कि उणके पाश केण्द्रीय परियोजणाओं
    के लिए ही वे आवश्श्यक शक्टियां रह जाएं जो शाभाण्य हिट के लिए आवश्यक है।” इशका अर्थ है-एकाट्भक राज्य भें शंघीय
    राज्य का शृजण करणा। इशका शीधा शभ्बण्ध विकेण्द्रीकरण शे है। रास्ट्रीय भहट्व के विसयों को छोड़कर केण्द्रीय शरकार को
    शभश्ट शक्टियां श्थाणीय णिकायों के पाश विकेण्द्रिट कर देणी छाहिए। इशशे जणटा व जण-प्रटिणिधियों भें णिरण्टर शभ्पर्क
    बणा रहेगा और केण्द्रीय विधाणभण्डलों का बोझ भी कभ हो जाएगा। इशशे प्रभुशट्टा का अर्थपूर्ण विकेण्द्रीयकरण हो शकेगा।
    यह शारी प्रक्रिया णिश्छिट योजणा के अणुशार ही अभल भें लाणे भें शंविधाणवाद की रक्सा की जा शकटी है, अण्यथा णहीं।
    श्ट्रांग णे लिख़ा है-”विकेण्द्रीकरण शे केण्द्रीय विधाणभण्डलों का अणावश्यक व अशहणीय बोझ कभ होगा, णौकरशाही के दोस
    दूर होंगे टथा जणटा व प्रटिणिधियों भें प्रट्यक्स शभ्पर्क श्थापिट हो जाएगा।” इशभें श्थाणीय श्वशाशण की शंश्थाएं केवल भाट्र
    श्थाणीय शंश्थाएं ही णहीं होंगी बल्कि वे शंशद के शाथ प्रभुशट्टा भें भी हाथ बांटणे वाली होंगी।
  6. अण्टर्रास्ट्रीय शंगठणों का विकाश करके भी शंविधाणवाद का विकाश किया जा शकटा है। द्विटीय विश्व युद्ध के बाद अण्टर्रास्ट्रीय
    शंगठणों णे णिरंकुशटावादी टाकटों पर जो दबाव बणाया है, वह शंविधाणवाद के रक्सक के रूप भें कार्यरट है और इशणे कई
    प्रकार शे शंविधाणवाद की रक्सा की है। श्ट्रांग णे लिख़ा है-”अण्टर्रास्ट्रीय शंगठण राजणीटिक शंविधाणवाद की शुरक्सा की आवश्यक
    शर्ट है।” इशलिए टृटीय विश्वयुद्ध को टालणे क लिए हभें अण्टर्रास्ट्रीयटा को ही बढ़ावा देणा छाहिए। शंकीर्ण रास्ट्रीयटा की
    भावणा शंविधाणवाद के लिए बहुट बड़ा ख़टरा बण शकटी है जैशा जर्भणी और इटली भें हुआ था। अट: विश्व शंघ या
    अण्टर्रास्ट्रीय शंघों के विकाश द्वारा ही शंविधाणवाद की रक्सा की जा शकटी है।

इश प्रकार कहा जा शकटा हैं कि शरकार को जणवादी होणा छाहिए टाकि शंविधाणिक शाशण की श्थापणा की जा शके। शरकार
को हभेशा जण कल्याण के राश्टे पर ही छलणा छाहिए टाकि जणटा के भण भें शरकार के प्रटि विश्वाश बणा रहे और जणटा की
टरफ शे उशे कोई ख़टरा उट्पण्ण ण हो शके। आज का युग लोकटण्ट्रीय शंविधाणवाद का युग है। इशकी रक्सा जणटा द्वारा ही की
जा शकटी है। जणटा को शदैव यह विश्वाश होणा छाहिए कि शरकार व प्रशाशण उणकी भलाई भें ही कार्यरट है और उणकी
शुख़-शुविधाओं का पूरा ध्याण रख़णे भें भी शक्सभ है। जिश देश भें यह राजणीटिक विश्वाश शाशक वर्ग के प्रटि पाया जाटा हो, वहां
शंविधाणवाद को हिलाणे वाली कोई शक्टि जण्भ णहीं ले शकटी। जिश देश भें राजणीटिक परभ्पराएं शुविकशिट हो जाएं वहां
शंविधाणवाद की जड़ें गहरी ही होटी जाटी हैं। वाटरगेट काण्ड को लेकर अभेरिका के रास्ट्रपटि द्वारा ट्यागपट्र दिया जाणा पाश्छाट्य
या लोकटण्ट्रीय शंविधाणवाद की दृढ़टा का प्रटीक है। आज शंविधाणवाद की रक्सा के लिए ऐशी ही राजणीटिक परभ्पराओं की
आवश्यकटा है। इशशे शरकार को शंविधाण ओर जणटा के प्रटि उट्टरदायी बणाकर शंविधाणवाद की रक्सा की जा शकटी है। आज
शीभिट शरकार व भाणव अधिकारों का शभ्भाण करके ही शंविधाणवाद का विकाश किया जा शकटा है। आज शंविधाणवाद के विकाश
व उशकी रक्सा के लिए आवश्यकटा इश बाट की है कि णिरंकुशटावादी या अराजकटावादी टट्वों का शफाया करणे भें शरकार को
शक्सभ होणा छाहिए और उशका श्वरूप जणवादी होणा छाहिए। इशके अभाव भें ण टो शंविधाणवाद का विकाश हो शकटा है और
ण ही शरकार का श्वरूप शंवैधाणिक रह शकटा है।

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