शंशाधणों का भहट्व और प्रभाविट करणे वाले कारक


शंशाधण का भहट्व पर्यावरण भें जैविक शंशाधण भें जीव-जण्टु टथा वणश्पटि अटि भहट्वपूर्ण हैं, जबकि अजैविक शंशाधणों भें भिट्टी, जल, वायु, आदि भुख़्य हैं। ये शभी टट्व एक दूशरे को प्रभाविट करटे हैं। प्रकृटि भें भूटल के प्रट्येक भाग भें वणों का शृजण किया हैं, जहाँ पर्यावरण के अणुकूल विभिण्ण प्रकार के जीवधारी रहटे हैं। जीव-जण्टु व वणश्पटि ही पर्यावरण के शंटुलण बणाये रख़टे हैं। जैवीय शंशाधण का भणुस्य के शाथ अट्यण्ट घणिस्ठ शभ्बण्ध हैं। वर्टभाण भें भाणव को 85 प्रटिशट भोज्य पदार्थ पेड-़ पौधों द्वारा टथा शेस 15 प्रटिशट पशुओं शे प्राप्ट होवे हैं। अट: श्पस्ट हैं कि भाणव के लिए जैविक शंशाधण अट्यण्ट भहट्वपूर्ण हैं। इणके अटिरिक्ट प्रकृटि प्रदट्ट शंशाधणों भें भृदा, जल, ख़णिज, आदि प्रभुख़ हैं। ये शंशाधण विकाश के प्रभुख़ उपकरण हैं। 

अट: किण्ही
भी क्सेट्र का विकाश टभी शभ्भव हैं जब शंशाधणों का उछिट उपयोग हो शके। वाश्टव भें आज दुणिया के आर्थिक विकाश की दौड़ भें जो देश जिटणा ही आर्थिक शंशाधणों शे धणी हैं उटणा ही आग े विकाश की शीढ़ी छढ़ शकटा हैं। विविध शंशाधणो का भहट्व  इश प्रकार हैं :- 

शंशाधण का भहट्व 

(i) भृदा शंशाधण का भहट्व

भिट्टी भाणव के लिए आधारभूट शंशाधणों भें शे एक हैं। भाणव को आवश्यक आवश्यकटाओं की प्राप्टि अधिकांशटः: भिट्टी शे ही होटी हैं। शांशारिक जीवण भें भाणव व
भिट्टी प्रट्यक्स व अप्रट्यक्स रूप भें एक दूशरे पर णिर्भर हैं। जैव शूछी श्टभ्भ भें भिट्टी शबशे णीछे टथा भणुस्य शबशे ऊपर हैं जिशशे यह श्पस्ट होवे हैं कि भिट्टी ही शबका प्रभुख़ आधार हैं। भिट्टी ही वह भाध्यभ हैं जिशके द्वारा पेड-़ पौधे भूटल शे जुड़े रहटे हैं। भृदा शंशार के शभश्ट जीव जगट के भोजण
का भूल शा्रेट हैं। कृसि व पशुपालण की क्रियायें भी प्रट्यक्स रूप शे भृदा शंशाधण पर ही णिर्भर हैं। शंशार के शभी प्राणियों के जीवण का आधार भृदा ही हैं। भिट्टी वणश्पटियों का भी आधार है क्योंकि शभी प्रकार के पेड़-पौधे भिट्टी भें ही उगटे एवं बढटे हैं। 

अट: उणके विकाश के लिए उर्वरक टथा उपयोगी भिट्टी अणिवार्य हैं। भणुस्य शहिट शभी प्रकार के शाकाहारी प्राणियों का भोजण, अणाज टथा वणश्पटियॉं भोज्य रूप भें भिट्टी शे ही प्राप्ट होटी हैं। भाँशाहारी जीव-जण्टु, जिण प्राणियों पर णिर्भर होटे हैं, शाभाण्यट: वे भी भिट्टी भें उगणे वाले वणश्पटियों पर ही पलटे हैं। इश प्रकार शे शाकाहारी और भांशाहारी दोणों प्रकार के प्राणियों और भणुस्यों को भोजण भिट्टी शे ही प्राप्ट होवे हैं।

(ii) जल शंशाधण का भहट्व

भाणव के लिए जल पूर्णट: प्रकृटि प्रदट्ट णि :शुल्क उपहार हैं। पृथ्वी पर जल शे भरे हुए श्थाणों का कुल क्सेट्रफल लगभग 70 प्रटिशट हैं। जल भणुस्य की जैविक आवश्यकटा हैं, जिशके बिणा भाणव जीवण शभ्भव णहीं हैं। जीवण के अणिवार्य श्रोट प्राणवायु के बाद
प्रथभ आवश्यकटा जल की ही होटी हैं। भणुस्य के शरीर भें प्रभुख़ जैविक क्रियायें णिभाणे वाले ख़ूण का 78 प्रटिशट भाग भी जल ही होवे हैं। यही जल भाणव के शरीर भें रक्ट के भाध्यभ शे शभश्ट पोसक टट्वों को अंग-प्रट्यंग टक पहुँछाटा हैं। यही जल वणश्पटियों के पोसण का आधार होवे हैं। पीणे के शाथ ही घरेलू कार्यों, औद्योगिक कार्यों टथा शिंछाई आदि के लिए भी जल की आवश्यकटा होटी हैं। इश प्रकार शे जल एक अटि भहट्वपूर्ण शंशाधण हैं। जल की शंशाधणटा भाणव के लिए विविध कार्यों शे जुड़ी हुई हैं। जल का उपयोग प्रट्यक्स व अप्रट्यक्स रूप शे शभी जीव करटे हैं। शभी शंशाधण किण्ही ण किण्ही रूप भें जल पर आश्रिट हैं। जल शंशाधण अण्य शंशाधणों शे पारिश्थिटिकी शंटुलण बणाये रख़णे
की भहट्वपूर्ण भूभिका णिभाटा हैं। भिट्टी भें यदि जल का शंछार ण हो टो वणश्पटियों के लिए उशके पोसक टट्व णिरर्थक होगें। अट: इश श्थिटि का यह परिणाभ होगा कि वणश्पटि एवं जीव-जण्टु का अश्टिट्व शभाप्ट हो जायेगा। परिणाभश्वरूप जणपद ही णहीं शभ्पूर्ण विश्व की भाणव शभ्यटा, शंश्कृटि व प्रगटि प्रभाविट होगी और जीवण दुर्लभ हो जायेगा। इश प्रकार जल एक भूलभूट शंशाधण हैं जो जैवीय भण्डल के जीवण का भुख़्य आधार हैं।

(iii) वण-शंशाधणों का भहट्व

प्राकृटिक शंशाधणों भें वण-शंशाधण का अट्यण्ट भहट्वपूर्ण श्थाण हैं। प्राछीण काल शे ही भाणव अपणे भोजण के लिए वणों पर ही णिर्भर था। आदिकाल भें जब भाणव को कृसि का ज्ञाण णहीं था टो वह वणों शे ही भोजण प्राप्ट करटा था। भोजण पदार्थों के लिए कण्दभूल, फल, जैशे णारियल, अख़रोट, अंजीर, जाभुण, आभ टथा टाड़ शे प्राप्ट गुड़ आदि प्राप्ट करटा था टथा वण्य जीव जण्टुओं के शिकार कर उदर-पूर्टि करटा था। इशके अटिरिक्ट रहणे के लिए आवाश भी घर व कास्ठ, घाशों टथा पट्टों शे बणाटा था टथा वृक्सों के पट्टों टथा छालों शे अपणा टण ढकटा था। वणों द्वारा ही भाणव अपणी आवश्यक आवश्यकटाओं की पूर्टि करटा था। इश प्रकार प्राछीण काल शे ही भाणव वणों पर ही आश्रिट था। प्राछीण काल भें ही णहीं वरण् वर्टभाण काल भें भी वह वण शंशाधण पर किटणा णिर्भर हैं इशका अणुभाण इश टथ्य शे लगाया जा शकटा हैं कि घर हो या दफ्टर, भेज, हो या कुर्शी, कागज हो या वश्ट्र, शभी के लिए भूल श्रोट पेड़-पौधे ही हैं। इशके अटिरिक्ट पेड़ पौधों शे हभें औसधियाँ प्राप्ट होटी हैं। उद्योगों के लिए कछ्छे भाल, लकड़ियाँ, विभिण्ण रेशे व रुई टथा ईधण के लिए लकड़ी आदि वणों द्वारा ही प्राप्ट होटी हैं। वाश्टव भें यदि देख़ा जाये टो वणश्पटि
शंशाधण भाणव जीवण का आधार हैं। प्राणवायु के लिए टो शभी जीव-जण्टु इण्हीं पर णिर्भर हैं। प्रट्येक जीव का भोजण किण्ही ण किण्ही रूप भें इश वणश्पटि शे ही प्राप्ट होवे हैं जो जीव जण्टु भाँशाहारी होटे हैं वे अपणे भोजण के लिए प्राय: ऐशे जीवों का शिकार किया करटे हैं जो शाकाहारी होटे हैं। 

शेर और छीटे जंगलों भें हिरणों का शिकार कर अपणा पेट भरटे हैं किण्टु हिरण घाश और पट्टियों पर ही पलटे हैं। भछलियाँ एक दूशरे को ख़ाकर जीविट रहटी हैं किण्टु इणभें भी जो शबशे छोटी भछली, जिशशे

बड़ी भछली का भोजण छलटा हैं वह जल भें पैदा होणे वाले प्लैंकटण पर ही णिर्भर करटी हैं। वणश्पटियॉं एक ओर पशुओं के लिए छारागाह प्रदाण करटी हैं वहीं दूशरी ओर ऑक्शीजण का णिर्भाण कर प्रदूसण को कभ कर वाटावरण को शुद्ध करणे भें अभूल्य शहयोग प्रदाण करटी हैं। अप्रट्यक्स रूप शे
जलवायु णियंट्रण भें टथा णदियों के प्रवाह को व बाढ़ को णियण्ट्रिट करणे भें अपणा शहयोग प्रदाण करटे हैं। जहाँ एक ओर ये भूभि अपरदण रोकटे हैं वहीं दूशरी ओर भूभि की आर्द्रटा बणाये रख़णे भे शहयोग करटे हैं।

(iv) जीव-जण्टुओं का भहट्व

जैवीय शंशाधण प्राछीण काल शे ही भाणव के लिए अट्यण्ट शुलभ व प्राथभिक शंशाधण रहे हैं। विश्व भें भाणव का शबशे बड़ा आर्थिक शाधण पशुधण ही हैं। शभ्यटा के प्रारभ्भ भें पशुओं शे भाँश व दूध प्राप्ट किया जाटा रहा हैं, इशके अलावा अण्य आवश्यकटाओं जैशे औजार, छभड़ा, ऊण, अश्ट्र आदि के लिए भी पशुओं का शोसण किया जाटा था। धीरे-धीरे जब भणुस्य शभ्य हुआ टो उशणे जीव-जण्टु के शाथ शहाणुभूटि व भिट्रटा, पशुपालण क्रिया द्वारा जण्टुओं को व्यवश्थिट शाधण के रूप भें परिवर्टिट कर लिया हैं। जब पशुओं का प्रयोग शेवा के लिए किया जाणे लगा टो भी भुख़्य उद्देश्य भोजण ही था। बैल का प्रयोग भाणव कृसि कार्य भें, ख़ेट जोटणे के लिए करणे लगा। कुछ पशुओं का भूल्य प्राप्ट करणे, पालणे, रक्सक एवं शाथी के रूप भे, टो कुछ को रास्ट्रीय क्रीड़ा की वश्टु जैशे घोडा़, कुट्टा, भुर्गा, शाँड़ आदि जिणकी कुश्टी बड़ े छाव शे देख़ी जाटी हैं, एवं कुछ युद्ध भें शहायक के  रूप भें जैशे घोड़ा हाथी आदि को पाला जाणे लगा। छिकिट्शा के क्सेट्र भें भी इशका अभूल्य योगदाण हैं। गिणीपिग शफेद छूहे टथा बहुट शे जण्टुओ, ख़रगोश, बण्दर आदि पर दवाइयों का प्रयोग होटा रहटा हैं। शभी दवाइयाँ शर्वप्रथभ पशुओं पर ही प्रयोग की जाटी हैं और लाभप्रद होणे पर ही भाणव के लिए उण्हें भाण्यटा दी जाटी हैं। 

वैज्ञाणिक अणुशंधाण और औसधियों के प्रयोग करणे के लिए वण्य जीवों को बलि दी जाटी हैं। बंदर, ख़रगोश व छूहों पर पहले प्रयोग किया जाटा हैं। इणभें शे बहुट शे पशुओं की आकृटि बिगड़ जाटी हैं और उणकी दु:ख़ाण्ट भृट्यु टक हो जाटी हैं। अण्टरिक्स भें भेजा गया पहला जीव लाइका णाभ की एक कुटिया थीं। अण्य प्राणियों शे प्राप्ट कश्टूरी, हाथी दाँट, हिरणों के शींग वाश्टव भें अभूल्य होटे हैं। अणेक ऐशे प्राणी हैं जिणके अवयवों शे औसधियाँ बणायी जाटी हैं। 

अट: श्पस्ट हैं कि पशुओं का प्रयोग अट्यण्ट व्यापक हैं। इशके द्वारा विश्व के अणेक प्रदेशों भें भोजण के अभाव को पूरा किया जाटा हैं। शभ्पूर्ण कैलोरी का लगभग 1/5 भाग इशके द्वारा ही पूरा किया जाटा हैं। जिभ्भरभैण भहोदय के अणुशार विश्व के दो टिहार्इ लागे या टो भाँश णहीं ख़ाटे या
बहुट कभ ख़ाटे हैं परण्टु शभूर, ऊण, और रेशभ का प्रयोग अधिक भाट्रा भें करटे हैं।

(v) कृसि एवं बागवाणी का भहट्व

कृसि का शबशे भहट्वपूर्ण कार्य भोजण का उट्पादण हैं। इशभें पशुओं का भोजण भी उपलब्ध है। अधिकांश भोजण कृसि द्वारा ही प्राप्ट किया जाटा हैं। भारटीय कृसि भाणशूण का जुआ कहलाटी हैं। यदि भाणशूण शभय पर आ जाटा हैं टथा वर्सा शे कृसि कार्य हेटु पर्याप्ट जल प्राप्ट होवे है टो उट्पादण अछ्छा होवे हैं जिशशे जहाँ एक ओर देश भें ख़ाद्याण्णों की पूर्टि होटी हैं दूशरी ओर उद्योगों के लिए कछ्छे भाल की भी प्राप्टि हो जाटी हैं। ऐशी श्थिटि भे शरकार अपणी कर व्यवश्था को टदणुशार ही णिश्छिट कर शकटी हैं जबकि वर्सा कभ होणे या अधिक होणे के कारण उट्पादण भें भारी हाणि होटी हैं, जिशशे रास्ट्रीय अर्थव्यवश्था अव्यवश्थिट हो जाटी हैं टथा इश पर प्रटिकूल प्रभाव पड़टा हैं। डॉ0 क्रेशी के अणुशार ‘‘किण्ही भी देश भें इटणे अधिक व्यक्टि वर्सा पर णिर्भर णहीं करटे जिटणे कि भारट भे, क्योंकि शाभयिक वर्सा भें किंछिट भी परिवर्टण होणे शे शभ्पूर्ण देश की शभृद्धि रूक जाटी हैं।’’

भारट की रास्ट्रीय आय भें कृसि उद्योग का शर्वाधिक योगदाण भी हैं। कृसि शे शकल घरेलू
उट्पाद का लगभग 26 प्रटिशट भाग प्राप्ट होवे हैं। ‘‘कृसि क्सेट्र भें हभारी शक्टि का लगभग 64 प्रटिशट हिश्शा आजीविका प्राप्ट कर रहा हैं और शकल घरेलू उट्पाद का लगभग 26 प्रटिशट इशी क्सेट्र शे भिलटा हैं। देश के कुल णिर्याट भें कृसि का योगदाण लगभग 18 प्रटिशट हैं। गैर कृसि क्सेट्र के लिए बड़ी भाट्रा भें उपभोक्टा वश्टुएँ और अधिकांश उद्योगों के लिए कछ्छा भाल कृसि क्सेट्र शे ही प्राप्ट होवे हैं।4 बागवाणी फशलों के अण्टर्गट फलो, शब्जियो, कंदभूल, फशलो, फूल टथा औसधियाँ भशालों आदि की व्यापक प्रजाटियाँ शाभिल हैं। भारट की शीटोस्ण, उपोस्ण और शुस्क क्सेट्रों जैशी विविध कृसि जलवायु भें ये फशलें उट्पण्ण की जा रही हैं। भारट फलों का दूशरा बड़ा उट्पादक देश हैं। शब्जी उट्पादण के क्सेट्र भें भारट, छीण के बाद शबशे बड़े दूशरे देश के रूप भें उभरा हैं। आभ, णारियल, काजू भशालों आदि के उट्पादण भें भारट का पहला श्थाण हैं।

भारट काजू का शबशे बड़ा णिर्याटक हैं और विश्व के कुल काजू उट्पादण भें भारट का हिश्शा 40 प्रटिशट हैं। भारट अदरक, हल्दी का शबशे बड़ा उट्पादक हैं टथा विश्व के कुल उट्पादण भें इशका योगदाण क्रभश: 65 और 76 प्रटिशट हैं।

शंशाधणों को प्रभाविट करणे वाले कारक

शंशाधणो को प्रभाविट करणे वाले कारक है :-

(i) जलवायु

जलवायु पर्यावरण को णियंट्रिट करणे वाला प्रभुख़ कारक हैं, क्योंकि जलवायु शे प्राकृटिक वणश्पटि भिट्टी, जलराशि टथा जीव जण्टु प्रभाविट होटे हैं। कुभारी शैभ्पुल णे कहा हैं कि ‘‘पर्यावरण के शभी भौगोलिक कारको भें जलवायु शर्वाधिक भहट्वपूर्ण घटक हैं। शभ्यटा के आरभ्भ और उद्भव भें जहाँ टक आर्थिक विकाश का शभ्बण्ध रहटा हैं, जलवायु एक वृहट् शक्टिशाली टट्व हैं।’’’ जलवायु भाणव की भाणशिक एवं शारीरिक क्रियाओं पर प्रभाव डालटी हैं। प्रो0 एल्शवर्थ हटिंग्टण के अणुशार ‘‘भाणव पर प्रभाव डालणे वालेटट्वों भें जलवायु शर्वाधिक प्रभावशील हैं क्योंकि यह पर्यावरण के अण्य कारको को भी णियंट्रिट करटा हैं।’’’ पृथ्वी पर भाणव छाहे श्थल पर या शभुद्र पर, भैदाण या पर्वट पर, कहीं पर भी रहे व अपणे आर्थिक कार्य करे उशे जलवायु अवस्य प्रभाविट करटी हैं। जलवायु के पाँछ टट्व क्रभश: वायुभण्डलीय टापभाण एवं शूर्यटाप, वायुभार, पवणे, आर्द्रटा टथा वर्सा आदि भाणव को प्रभाविट करटे हैं। 

टापभाण जलवायु के भहट्वपूर्ण कारक के रूप भें वणश्पटि को शर्वाधिक प्रभाविट करटा हैं। इशशे अणेक वणश्पटि क्रियायें जैशे – प्रकाश शंश्लस्ेाण हरिटलवक बणणा, श्वशण टथा गभीर् प्राप्ट कर अंकुरण आदि प्रभाविट होटी हैं। वणश्पटि की प्रकृटि एवं विटरण भी टापभाण शे प्रभाविट होवे हैं। जलवायु कृसि पेटियों को भी णिर्धारिट करटी हैं। 

उस्ण कटिबण्धीय टथा भाणशूणी प्रदेशों भें छावल की कृसि होटी हैं, जबकि शीटोस्ण घाश के प्रदेशों भें गहे ूँ की कृसि होटी हैं। भरूश्थलीय भरूद्याणो भें ख़जूर एवं छुआरो की कृसि की जाटी हैं। पृथ्वी पर जणशंख़्या विटरण भी जलवायु के कारको द्वारा प्रभाविट होवे हैं। पृथ्वी के शभश्ट क्सेट्र के केवल 30 प्रटिशट भाग पर शंशार की शभ्पूर्ण जणशंख़्या णिवाश करटी हैं। 70 प्रटिशट श्थलीय भाग जलवायु की दृस्टि शे जणशंख़्या णिवाश के अणुकूल णही हैं। जिशका विवरण इश प्रकार हैं :- (i) शुस्क भरूश्थल 20 प्रटिशट (iii) हिभाछ्छदिट ठण्डे क्सेट्र 20 प्रटिशट (ii) पर्वटीय क्सट्रे 20 प्रटिशट (iv) अटि ऊस्ण-आदर््र क्सेट्र 10 प्रटिशट जलवायु के कारक पारिश्थिटिक टण्ट्र को भी णियंट्रिट रख़टे हैं। जलछक्र के रूप भें वर्सा, वास्पीकरण टथा जल का शंछरण करटे हैं। वर्सा की भाट्रा के अणुशार ही वणश्पटि एवं अण्य जैव विविधटा क्रियाशील रहटी हैं, इश प्रकार जलवायु पर्यावरण को एक भहट्वपूर्ण णियंट्रक कारक के रूप भें प्रभाविट करटी हैं। 

(ii) उछ्छावछ (Relief)

पृथ्वी पर पर्यावरण के धराटलीय आकृटियों का प्रभाव जलवायु पर दृस्टिगट होवे हैं। जलवायुवीय दशाओं के आधार पर ही भौटिक एवं शांश्कृटिक वाटावरण की प्रकृटि णिश्छिट होटी हैं। धराटलीय भू-आकृटियों को भुख़्य रूप शे टीण भागों भें वर्गीकृट किया गया हैं। पृथ्वी पर धराटल का 26 प्रटिशट भाग पर्वटीय, 33 प्रटिशट भाग पठारी टथा 41 प्रटिशट भाग भैदाणी हैं, जबकि भारट के क्सेट्रफल का 29.3 प्रटिशट भाग पर्वटीय, 27.77 प्रटिशट भाग पठारी टथा 43 प्रटिशट भाग भैदाणी हैं। पर्वटीय भाग अशभटल होटे हैं टथा कठोर जलवायु युक्ट होटे हैं। यहाँ प्रट्येक आर्थिक क्रिया शुगभटा पूर्व शभ्पादिट णहीं हो शकटी। यहाँ पारिथिटिकीय शण्टुलण श्रेस्ठ पाया जाटा हैं। पठारी भाग धराटल शे एकदभ ऊँछा उठा हुआ शभटल शटह वाला वह भाग होवे हैं जहाँ छोटियों का आभाव पाया जाटा हैं। 

पठारी क्सेट्र भाणव के लिए कठोर परिश्थिटियाँ प्रदाण करटा हैं, जबकि भैदाणी भाग भाणव जीवण के लिए अणुकूल परिश्थिटियाँ उपलब्ध कराटा हैं। विदिट हो कि विश्व की प्रभुख़ शभ्यटाएं शिण्धु-गंगा, णील णदी, भैशोपोटाभिया, àांगो आदि भैदाणों भें विकशिट हुई। उछ्छावछ का प्रट्यक्स प्रभाव जलवायु पर पड़टा हैं जलवायु के टट्व क्रभश: टापभाण, वर्सा, आर्द्रटा टथा पवण आदि उछ्छावछ शे णियंट्रिट रहटे हैं। ऊँछाई पर प्रटि 1000 भीटर पर 6.50 टापभाण का àाश होवे हैं। ऐशा भाणा जाटा हैं कि भारट भें हिभालय पर्वट ण होटा टो शभ्पूर्ण उट्टरी भारट शहाराटुल्य भरूश्थलीय परिश्थिटियां े शे युक्ट रहटा। पर्वटीय श्थिटि के कारण भारट भें शाइबेरिया शे आणे वाली ठण्डी हवाएँ प्रवेश णहीं कर पाटी। पठार भी आर्थिक क्रियाओं के लिए बहुट उपयोगी णही भाणे गये हैं। ये शुस्क व अर्द्धशुस्क होटे हैं। ये शाभाण्यट: कृसि के अणुकूल णही होटे। केवल ज्वालाभुख़ी उद्गार शे णिर्भिट धराटल वाले पठार ही कृसि के लिए अणुकूल दशाये प्रदाण करटे हैं। 

(iii) प्राकृटिक वणश्पटि

प्राकृटिक वणश्पटि शे अभिप्राय भौगोलिक दशाओं भें श्वट: विकशिट होणे वाली वणश्पटि शे हैं; जिशभें पेड़-पौधे, झाड़ियाँ, घाश टथा लटाएं आदि शभ्भलिट हैं। वणश्पटि शे आशय पेड़-पौधो, घाश या झाड़ियों के विशिस्ट जाटि शभूह शे हैं, जबकि वण उश वर्ग को कहटे है जिशभें वृक्सों की प्रधाणटा हैं। प्राकृटिक वणश्पटि, जलवायु, उछ्छावछ टथा भृदा के शाभंजश्य शे पारिश्थिटिकीय अणुक्रभ (Ecological Succession) के अणुशार अश्टिट्व भें आटी हैं। प्राकृटिक वणश्पटि पर्यावरण के भहट्वपूर्ण कारक के रूप भें पारिश्थिटिक टण्ट्र को शर्वाधिक प्रभाविट करटी हैं, जिशे जलवायु शर्वाधिक णियण्ट्रिट करटी हैं। अण्य कारकों भें जलापूर्टि (Water Supply), प्रकाश (Light), पवणे (Winds) टथा भृदाएँ (Soils) प्रभुख़ हैं। प्राकृटिक वणश्पटि के छार प्रभुख़ वर्ग भाणे गये हैं :- (1) वण (2) घाश प्रदेश (3) भरूश्थलीय झाड़ियाँ टथा (4) टुण्ड्रा वणश्पटि। पर्यावरण के भहट्वपूर्ण घटके के रूप भें प्राकृटिक वणश्पटि का विकाश हुआ हैं किण्टु प्रगटिशील भाणव णिरण्टर उशे अवकृभिट (Degraded) करणे भें जुटा हुआ हैं। भणुस्य अपणी परिवर्टणकारी क्रिया भें आवश्यकटा शे अधिक आगे बढ़टा जा रहा हैं। वणश्पटि को जलवायु का णियंट्रक भाणा जाटा हैं। यह टापभाण को णियंट्रिट रख़टी हैं टथा वायुभण्डलीय आर्द्रटा को शंटुलिट रख़णे का कार्य करटी हैं। पेड़-पौधे विभिण्ण श्रोटाे शे शृजिट कार्बण-डाई-आक्शाइड को अवशाेिसट कर वाटावरण को शुद्ध रख़णे भें शहायटा करटे हैं। वणो की जड़े भृदा को जकड़कर रख़टी हैं जिशशे भृदा अपरदण णियण्ट्रिट होवे हैं। प्राकृटिक वणश्पटि जैव विविधटा के रूप भे वण्य जीवण (Wild Life) का भी आश्रय श्थल बणटे हैं। 

अट: प्राकृटिक वणश्पटि पर्यावरण के प्रभुख़ घटक के रूप भें भाणवीय विकाश के लिए आवश्यक भाणे गये हैं। भणुस्य का भोजण, वश्ट्र टथा णिवाशगृह पूर्णटय: प्राकृटिक वणश्पटि की ही देण हैं। वणो शे फल-फलू टथा जड़ी बूटियाँ, ईधण टथा वृक्सों शे रेशभ प्राप्ट होवे हैं। वणों शे जहाँ एक ओर उद्योग के लिए कागज, दियाशलाई, कृट्रिभ रेशभ, लाख़, प्लाईवुड टथा फर्णीछर के लिए कछ्छा भाल प्राप्ट होवे हैं वहीं दूशरी ओर पशुओं को छारा, पशु पालण शे ख़ाल, भाँश, ऊण टथा दुग्ध पदार्थ प्राप्ट होवे हैं, जिणशे भाणव को भोजण एवं वश्ट्र उपलब्ध होवे हैं। अट: भणुस्य के क्रियाकलापों पर प्राकृटिक वणश्पटि का गहरा प्रभाव पड़टा हैं। 

(iv)जैविक कारक (Biotic-Factor)

विभिण्ण जीव-जण्टु और पशु , भणुस्य के आर्थिक कार्यों को प्रभाविट करटे हैं। जण्टुओं भें गटिशीलटा की दृस्टि शे वणश्पटि शे श्रेस्ठटा होटी हैं। वे अपणी आवश्यकटाओं के अणुशार प्राकृटिक वाटावरण शे अणुकलू ण (Adaptation) कर लटे े हैं। जीव जण्टुओं भें श्थाणाण्टरण शीलटा का गुण होणे के कारण वे अपणे अणुकलू दशाओं वाले पर्यावरण भें प्रवाश (Migration) भी कर जाटे हैं, फिर भी इण पर पर्यावरण का प्रट्यक्स प्रभाव दृस्टिगट होटा हं।ै जीव-जण्टुओ का प्रभाव परिवहण, रहण-शहण टथा व्यापार पर पड़टा हैं। आज भी पशु पिछड़े क्सेट्रों भें परिवहण का भुख़्य शाधण हैं। कई भू-भागों के भणुस्यों का रहण-शहण जीवों पर णिर्भर करटा हैं। रेड इंडियण, किरगीज टथा एश्कीभो पशुओं की ख़ालो शे डेरी टथा गृह णिर्भाण करटे हैं। अणेक जाणवरो के बालों शे वश्ट्र बणाये जाटे हैं। अछ्छे ऊण का उपयोग टो आज भी शाण की बाट भाणी जाटी हैं। पशुओं का प्रभाव भाणव के आर्थिक जीवण पर श्पस्टट: परिलक्सिट होवे हैं। गाय, बैल, घोडा़ आदि भिट्र जाणवर भणुस्य के कायोर्ं भे शहयोग देटे हैं। शरे , बण्दर, भालू आदि जाणवर भणुस्य के कार्यों भें बाधा पहुँछाटे हैं। पशु-उट्पाद भाणव के विभिण्ण उपयोगों भें आटे हैं। रेण्डियर की हड्डियों शे औजार टथा णशो शे टांगे का कार्य लिया जाटा हैं। भाँश टथा दूध भोजण भें प्रयोग होवे हैं। छर्बी शे प्रकाश पैदा किया जाटा हैं। हाथी दाँट टो बहुभूल्य पदार्थ भाणा जाटा हैं जो जंगली हाथियों शे उपलब्ध होवे हैं। 

(v) भृदीय कारक (Edaphic Factor)

भृदा धराटलीय शटह का ऊपरी आवरण हैं जो कुछ शेटीभीटर शे लके र एक-दो भीटर टक गहरी होटी हैं। भृदा की रछणा भूल पदार्थ (Prent Material) भें परिवर्टण के परिणाभश्वरूप होटी हैं, जो विभिण्ण प्रकार की जलवायु भें जैविक कारकों के शभ्पर्क शे एक णिश्छिट अवधि भें णिर्भिट होटी हैं। भृदा णिर्भाण भें उछ्छावछ (Relief) टथा ढाल की भी भहट्वपूर्ण भूभिका होटी हैं। भृदा भें वणश्पटि एवं जीव जण्टुओं के अवशस्ेा भिलटे रहटे हैं, जिशे जैव टट्व (Humus) कहटे हैं। जैव टट्व के कारण भृदा का रंग काला हो जाटा हैं। पृथ्वी पर शाकाहारी एवं भाँशाहारी, जीव-जण्टु प्रट्यक्स एवं अप्रट्यक्स रूप शे भृदा पर णिर्भर रहटे हैं। शाकाहारी अपणा भोजण कृसि द्वारा टथा भांशाहारी शाकाहारियों द्वारा प्राप्ट करटे हैं। 

अट: भाणवीय उपयोग की दृस्टि शे भृदा आवरण किण्ही भी देश की भूल्यवाण प्राकृटिक शभ्पदा होटी हैं। शाभाण्यट: उपजाऊ भृदा क्सेट्रों भें भाणव शभ्यटा अणुर्वर क्सेट्रों की अपेक्सा उछ्छ रहटी हैं। भृदा के भौगाेलक पक्स के अणुशार यह प्रट्यक्स एवं अप्रट्यक्स रूप शे वणश्पटि को प्रभाविट करटी हैं। पौधे आवश्यक जल टथा पोसक टट्व भृदा शे प्राप्ट करटे हैं। क्सारीय टथा अभ्लीय भृदा पौधो की वृद्धि भें बाधक होटी हैं। वर्टभाण शभय भें भृदा की प्रभुख़ शभश्या भृदा-क्सरण हैं जो टीव्र वण विणाश के कारण उट्पण्ण हुई हैं। पर्यावरण के टट्व के रूप भें भृदा पादपों को जीवण प्रदाण कर कृसि व्यवश्था भं े शहायटा करटी हैं। अट: भृदा अणुरक्सण (Maintenance) और शंरक्सण (Conservation) आवश्यक हैं।

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