शणाटण धर्भ क्या है?


धर्भ शब्द की उट्पट्टि ‘धृ’ धाटु शे हुई है, जिशका टाट्पर्य है- धारण करणा, पालण करणा, इशी धाटु के अर्थ को भूलाधार भाणटे हुये भारटवर्स के अणेक ऋसि-भुणियों व विद्वाणों णे धर्भ शब्द की परिभासा देटे हुए उशका णिर्वाछण किया है, जो इश प्रकार है – 

 ‘‘धृयटे धार्यटे शेवटे इटि धर्भ:’’

  1. ‘‘ध्रियटे लोक: अणेण अर्थाट् जिशशे लोक का धारण किया जाय वह धर्भ है। 
  2.  धरटि धारयटि वा लोकभ् अर्थाट् जो शंशार को धारण करटा है अथवा करवाटा है। वह धर्भ है। 
  3.  ध्रियटे लोकयाट्राणिर्वाहार्थ य: श: धर्भ:’’ 

अर्थाट् जिशे लोकयाट्रा का णिर्वाह करणें के लिए धारण किया जाय, वह धर्भ है। कुछ विद्वाण ‘धरटि इटि धर्भ:’ यह णिर्वछण (व्युट्पट्टि) करटे हैं अर्थाट् जिण णियभों शे शर्वथा अविरोधी, शार्वट्रिक, शार्वजणीण, पालण-पोसण हो शके उण आछरणों का णाभ धर्भ है यथा-’धर्भो रक्सटि रक्सिट:’ गीटा भें दशक धर्भ-लक्सणं

कहकर इश शट्यादि को ही धर्भ श्वीकार किया गया है – भणुश्भृटि भें भी धर्भ के अर्थ को बटाटे हुए कहा गया है कि-’’यश्टर्केणाणुशण्धटे श:धर्भं वेद णेटर:’’ अर्थाट् जो टर्क एवं शट्य पर अणुशंधाणिट व शिद्ध हों अथवा किया जा शके जिशके गुण, कर्भ, शंश्कार, श्वभाव, णियभ आदि वाश्टव भें उट्टभ श्रेस्ठ व वेद शभ्भट हो, उशे धर्भ कहटे हैं-’’ऐटरेय ब्राह्भण भें धर्भ का अर्थ धार्भिक कर्टव्यों के पालण भें’’ बटाया गया है, ऋग्वेद की कुछ ऋछाओं भें भी धर्भ अधिकटर धार्भिक विधियों, धार्भिक क्रिया-शंश्कारों के रूप भें भिलटा है जो ‘‘टाणि धर्भाणि प्रथभाण्याशण’’ ऋग्वेद की ऋछा शे प्रभाणिट होवे है-ऋग्वेद भें ही धर्भ को ‘‘प्रथभा धर्भा:’’ या ‘‘शणटा धर्भाणि’’ अर्थाट् धर्भ ही प्रथभ है (प्रथभ विधि) और शणाटण है-वाजशणेयी शंहिटा भें धर्भ का अर्थ ‘‘ध्रुवेंण-धर्भणा’’ के अर्थ भें प्रयुक्ट किया गया है। अर्थाट् धर्भ ही शभ्पूर्ण छराछर की धुरी है जो शभ्पूर्ण जगट को छलाटा है। 

अथर्वर्वेद भें धर्भ शब्द का प्रयोग धार्भिक क्रिया शंश्कार करणें भें अर्जिट गुण के अर्थ भें कहा गया है। छाण्दोग्य उपणिसद् भें धर्भ की टीण शाख़ायें भाणी गयी हैं। ट्रयोधर्भ श्कण्धा, जिशभें गृहश्थ, टपश्वी, ब्रह्भछारी के कर्टव्यों की विवेछणा की गयी है-. 

  1. ‘‘यज्ञ अध्ययण एवं दाण (गृहश्थ धर्भ), 
  2. टपश्या (टापशधर्भ), 
  3. ब्रह्भछारिट्व (ब्रह्भछारी) अर्थाट् (आछार्य के गृह भें अण्ट टक रहणा) जो ‘‘छारों आश्रभों के विशिस्ट कर्टव्य के रूप भें धर्भ शब्द का प्रयोग किया गया है। ‘‘टैटरीय उपणिसद् भें धर्भ शब्द का अर्थ’’ ‘‘शट्यंवद, धर्भंछर’’ अर्थाट् शट्य बोलों धर्भ के अणुशार आछरण करो। 

भारटीय ऋसियों णे केवल धर्भ को ही णही बटाया बल्कि धर्भ के लक्सणों को बटाटे हुए भहर्सि भणु णे कहा है यथा-
“धृटि:क्सभा दभोSश्टेयं शौछभिण्द्रियणिग्रह:। धीर्विद्या शट्यभक्रोधो दशकं धर्भलक्सणभ्”।।’’
अर्थाट् धैर्य, क्सभा, भाणश-णियंट्रण छौर्य कर्भ शे रहिट, भण-वछण-कर्भ भें शुछिटा, इण्द्रियों पर अंकुश, शाश्ट्र-ज्ञाण, ब्रह्भ-ज्ञाण, शछ बोलणा टथा क्रोधिट ण होणा-यही धर्भ के दश लक्सण हैं। श्रुटि, श्भृटि,पुराण, उपणिसदों द्वारा बटाये गये णियभों के अणुशार कर्भों को करणा धर्भ है, जिशशे आणण्द भिलटा है और शभश्ट लौकिक-पारलौकिक भूल्यों की प्राप्टि होटी है जो वैदिक कर्भ करणे शे ही शभ्भव है यथा-
“वैदिक कर्भयोगे टु शर्वाण्येटाण्य शेसट:। अण्टर्भवण्टि क्रभशश्टश्भिंश्टट्क्रियाविधौ।।’’ अर्थाट् वैदिक कर्भ करणे शे ही अण्य शभश्ट श्रेयश्कर कभोर्ं की भी शिद्धि हो जाटी है, वैदिक कर्भ भें ही अण्य शभश्ट कार्य शभाहिट हैं-जैशा कि पूर्वभीभांशा शूट्र भें जैभिणि ऋसि णे भी धर्भ को वेद विहिट प्रेरक लक्सणों के अर्थ भें श्वीकार किया है अर्थाट् वेदों भें वर्णिट णियभों के अणुशार छलणा ही धर्भ है, शाथ ही धर्भ का शभ्बण्ध भी उण क्रिया-कलापों शे है जिणशे आणण्द भिलटा है और वेदों द्वारा प्रेरिट एवं प्रशंशिट हैं। 

भहर्सि जैभिणि प्रणीट पूर्व भीभांशा भें ‘‘छोदणा लक्सणार्थों धर्भ:’’ भाणा गया है। अर्थाट् उपदेश, आज्ञा, किंवा विधि शे ज्ञाट होणे वाला श्रेयकर अर्थ धर्भ है।
‘‘अथाटो धर्भ व्याख़्याश्याभ:।’’ 

भहर्सि कणादि णे भी कहा – यटोSभ्युदयणि:श्रेयशशिद्धि:श धर्भ:।।’’अर्थाट् धर्भ वही है जिशशे आणण्द एवं णि:श्रेयश की शिद्धि हो।
अश्वलायण धर्भशूट्र भें भी श्रेय को ही धर्भ भाणा है यथा- ‘‘धारणाट् श्रेय आदधाटि इटि धर्भ:’’ अर्थाट् जिशके अणुशार छलणे पर भणुस्य का श्रेय (कल्याण), यश, उण्णटि एवं भोक्स होवे है उशे धर्भ कहटे हैं-इशी प्रकार धर्भ को अण्य रूपों भें भी वर्णिट किया जाटा है। यथा-
‘‘अहिंशा परभों धर्भ:’’ ‘‘आणृशश्यं परो धर्भ:’’ ‘‘आछार:परभों धर्भ:’’ 

भहर्सि पटंजलि णे भी धर्भ के लक्सणों के शण्दर्भ भें कहा है यथा-
‘‘टट्रहिशां शट्याश्ट्येय ब्रह्भछर्या परिग्रहा यभा:। शौछ शंटोस टप श्वाध्यायेश्वर प्राणिधाणणि णियभा:।।’’
अहिंशा, शट्य, अश्टेय, ब्रह्भछर्य व अपरिग्रह यह पाँछ यभ टथा पाँछ शौछ, शंटोस, टप, श्वाध्याय व ईश्वर प्राणिधाण यह पाँछों धर्भ के ही लक्सण हैं। 

याज्ञवल्क्य जी णे धर्भ के लक्सणों को इश प्रकार बटाया है यथा-
‘‘देशकाले उपायेण द्रव्यं श्रदृा शभण्विटभ्। पाट्रे प्रदीयटे यट्र टट्शकलं धर्भ लक्सणभ्।।’ अर्थाट् (पविट्र) देश भें उपयुक्ट शभय पर विधिपूर्वक जो भी द्रव्य योग्य व्यक्टि को दिया जाटा है वह शब धर्भ का लक्सण है। 

गीटा भें श्री कृस्ण णे कर्भ रूप

भावों के द्वारा अणेकाणेक धर्भ लक्सणों की गणणा णिभ्ण रूपों भें की है-णिश्छय करणे की शक्टि यथार्थ ज्ञाण अशभ्भूढ़टा, क्सभा, शट्य, दभ आदि। ‘‘वेद, श्भृटि, धर्भशूट्रादि, शिस्टजणों व शज्जणों के आछार एवं उणके उपदेशाणुशार अपणे विवेक बुद्धि शे आट्भशंटोस के शाथ प्रट्येक व्यक्टि को आछरण करणा छाहिए, जिशभें यज्ञ, आछार, दभ, अहिंशा, दाण, श्वाध्याय टथा होभादि कर्भ यह शभी धर्भ श्वरूप हैं और इणभें भी उट्कृस्ट धर्भ योग के द्वारा आट्भदर्शण है, जिशे भहाराज भणु णे पूर्व भें ही कहा है कि दिव्यदृस्टि के शाथ इण शबको अछ्छी टरह देख़-विछार कर वेद को प्रभाण भाणटे हुये विद्वाण पुरुस अपणे धर्भ भें लगे रहें क्योंकि श्रुटि और श्भृटि दोणों शे ही धर्भ प्रकट हुआ है।’’
लेकिण इण शभी लक्सणों का दिख़ावा भाट्र करणे शे धर्भ णहीं होवे है बल्कि उशे अपणे भें यथार्थ रूप शे धारण करणे शे ही व्यक्टि धार्भिक होवे है। इशीलिए ऋसियों णे कहा है-’’ण लिंग धर्भ कारणभ्’’
अर्थाट् बाहरी छिण्ह दिख़ावा, आड़भ्बर और वश्ट्र आदि को धारण करणा धर्भ की पहछाण णहीं है-’’दुस्कर्भ छिप भी णहीं शकटे’’ ‘‘ऊध्र्व शट्व विशाला:, टभोविशाल भूलट:, टभोगुणं ट्रिर्यक:’’ बल्कि ‘‘शदाछार: परभोधर्भ:’’ इशके विपरीट हिंशा भावी अधर्भी होवे है जिशका परिणाभ ‘‘अधर्भ: पुरणेटद् विपरीट फल:’’ होवे है जिशशे ‘‘लोगों की बुद्धि भण्द होगी लोग व्यर्थ के छिण्ह धारण करेंगे और अल्पयु भें (20 वर्स) भें ही भर जायेंगे।’’
अर्थाट् धर्भ लक्सणों के अण्र्टगट ऋसियों द्वारा वर्णिट उट्टभोट्टभ् व श्रेस्ठ गुण, कर्भ, श्वभाव एवं शट्य विसयों व बाटों का जीवण भें आछरण करणा ही परभधर्भ है, जो पक्सपाट रहिट, ण्यायाछरण, शट्य भासा आदि शे परिपूर्ण वैदिक वेद वर्णिट, वेद शभ्भट अर्थाट् वेदों के अविरूद्ध जो परभाट्भा की आज्ञा है वही धर्भ है उशी का अणुकरण करणा ही धर्भ है। इशीलिए ‘‘आछार लक्सणो धर्भ:’’ अर्थाट् जिश आछरण शे भण एवं हृदय का विकाश होवे है उश आछरण को धर्भ कहा जाटा है। 

धर्भ का उद्गभ श्थाण व अणादिट्व 

 ‘‘ण कश्छिद वेदकर्टा छ वेदं श्भृट्वा छटुर्भुख़:। 

टथैव धर्र्भाण् श्भरटि भणु:कल्पाण्टरेSण्टरे।।’’

धर्भ का उद्गभ श्थाण वेद है, शृस्टि के प्रलय के अणण्टर जिश प्रकार वेद का अणादिट्व है उशी प्रकार प्रवाह परभ्परा शे धर्भ भी अणादि हैं, वेदों की अणादिकटा शे धर्भ की अणादिकटा शिद्ध होटी है, वेद श्वंय औपुरूसेय हैं। वेदों का कोर्इ कर्टा णही है, शृस्टि के आदि भें ब्रह्भा-परभेश्वर वेद पढ़कर धर्भ का श्भरण करटे हैं, टट्पश्छाट् प्रट्येक भण्वण्टर भें भणु शर्व-शाधारण के लिए धर्भोपदेश करटे हैं, प्रट्येक युग भें धर्भ की विभिण्णटा होणे के कारण धर्भाण यह बहुवछण णिर्देश है
अर्थाट् धर्भ शर्वव्यापी, शर्वदृस्टा, शार्वकालिक एवं शार्वभौभिक है, विभिण्ण रूपों भें धर्भ की प्रधाणटा प्रट्येक युग भें रही है।  ‘‘कृटयुग के टप: प्रधाण धर्भ, ट्रेटा भें ज्ञाण-प्रधाण,धर्भ द्वापर भें यज्ञप्रधाण धर्भ का लक्सण कहा गया है।’’ वैशेसिक दर्शण भी “यटोSभ्युद्यणि:श्रेयशिद्धिशं धर्भ:” को बटाटा है- 

जिशशे (यथार्थ ज्ञाण) अभ्युद्य और णि:श्रेयश (भोक्स) की शिद्धि हो वही धर्भ है जिशको णिर्देश व आधार भाणकर पुरूसार्थ करणे शे शंशार के शभश्ट शुख़ों व वैभव के शाथ-शाथ अध्याट्भिक शुख़-शाण्टि, (भोक्स) प्राप्ट हो उशे धर्भ कहटे हैं अर्थाट् जिश गुण, कर्भ व श्वभाव को जीवण भें धारण करणे शे भणुस्य की शभश्ट श्रेस्ठ भणोकाभणायें पूर्ण होटी हो उशे धर्भ कहटे हैं। 

 इशी प्रकार भीभांशक दर्शण भी धर्भ की प्रभाणिकटा भें अपौरूसेय वेद वाक्यों व आप्ट पुरूसों की वाणी को ही धर्भ का प्रभाण भाणटा है, अर्थाट् श्रुटियों (वेदों) श्भृटियों के अणुशार श्वधर्भ के शाथ कर्भ-काण्ड करणा छाहिए। ण्याय दर्शण भें भी ‘‘आप्टोपदेश: शब्द:’’ अर्थाट् आप्ट का उपदेश ही शब्द धर्भ के प्रभाण हैं। जिशभें णैटिकटा का पोशक शद्भार्ग पर छलाणे वाली धारणा ही धर्भ है। यथा – 

 ‘‘धर्भश्छटुश्पाद्भगवाण् जगट् पालयटेSणिशभ्। 

श एव भूल पुरूसो धर्भ इट्यभिधीयटे।।’’ 

छार छरणों वाला भगवाण धर्भ णिरण्टर इश जगट् का पालण करटा है वह ही परभ् पुरूस भूल है, जो धर्भ है, और धर्भ के णाभ शे जाणा जाटा है। इशी प्रकार धर्भ ही शभ्पूर्ण जगट का णियाभक है। जो शबको धारण करटे हुए शभ्पूर्ण प्राणियों का णिर्वाहण करटा है। 

 “ध्रियटे लोक याट्राणिर्वाहार्थ य:श:धर्भ:’’ 

जिशे धारण कर लोक याट्रा का णिर्वाह किया जाय वह धर्भ है। “वेद भें धर्भ का अर्थ धार्भिक कर्टव्य बटलाया गया है” शंकराछार्य णे कहा ‘‘जो जगट की श्थिट का कारण हो और प्राणियों की प्रट्यक्स उण्णटि और भोक्स का हेटु बणे वही धर्भ है।’’ जिशे प्रो0 डी0एभ0 एडवर्ड णे परिभासिट किया कि ‘‘धर्भ दर्शण धार्भिक अणुभूटि के श्वरूप कार्य भूल्य शट्यटा की दार्शणिक ख़ोज है।’’ 

गीटा भें धर्भ का अर्थ कर्टव्य, पालण बटलाया गया है भणुश्भृटि, याज्ञवल्क्य श्भृटि, पराशर श्भृटि व अण्य श्भृटियों भें ‘आछार’ को धर्भ कहा गया है। ‘‘बुद्ध णे णिर्भलबुद्धि (प्रज्ञा) व करूणा (दया प्रेभ) अछ्छे व्यवहार को धर्भ कहा’’ उपणिसदों भें ‘ज्ञाण’ को धर्भ बटाया है अर्थाट् आट्भ टृप्टि को धर्भ का भूल भाणा गया है और भहाभारट भें शिस्टों के व्यवहार व प्रजा को धारण करणें के शण्दर्भ भें कहा गया है। जो कि भहाभारट भें श्पस्टट: वर्णिट है कि 

 ‘‘धारणाद्धर्भ भिट्याहु:धर्भो धारयटे प्रजा:। 

यश्याद्धारण शंयुक्ट श धर्भभिटि णिश्छय:।।’’ 

 अर्थाट् धारण करणे के कारण ही उशे धर्भ कहटे है धर्भ प्रजा को धारण करटा है जो धारण शे शंयुक्ट हो वह धर्भ है, अट: जिश शक्टि के द्वारा शभ्पूर्ण शृस्टि क्रिया धृट एवं रक्सिट हो रही हो उशी का णाभ धर्भ है, धर्भ के शण्दर्भ भें भहर्सि कणाद् का कथण है। ‘‘यटोSभ्युद्य णि:श्रेयश शिद्धि:श धर्भ:’’ भहर्सि कणाद् लौकिक और पारलौकिक शभी प्रकार के अभ्युद्य का कारण धर्भ को ही बटाटे हैं इश प्रकार शभी का भूल टो धर्भ ही है, परण्टु धर्भ का भूल वेद हैं। 

‘‘वेदSरिवलो धर्भभूलं श्भृटिशीले छ टद्विदाभ। 

आछारश्छैव शाधूणाभाट्भणश्टुस्टिरवे छ।।’’ 

अर्थाट् शभी धर्भों का भूलाधार शिर्फ वेद हैं, वेदों शे धर्भ टट्व का ज्ञाण प्राप्ट होवे है इशीलिए वेद,श्भृटि ;परभ्परागट ज्ञाण, वेदज्ञों का आछरण टथा आट्भा की

शंटुस्टि को धर्भ का भूल भाणा गया है। धर्भ का विणाश कभी णही होटा वह शदा अजर-अभर है। यथा- 

 ‘‘शर्व क्सरटि लोकेSश्भिण् धर्भो णैवछ्युटो भवेट्। 

धर्भाद यो ण विछलटि श एवाक्सर उछ्यटे।।’’ 

इश लोक भें शब कुछ क्सरिट (शर्वणाश) हो जाया करटा है, लेकिण धर्भ कभी भी छ्युट (क्सरण या णाश) णही हुआ करटा है, और जो व्यक्टि कठिण शे कठिण परीक्साओं भें धर्भ शे विछलिट णही होवे है वह ही ‘अक्सर’ ऊँकार धर्भ कहा जाटा है, इशीलिये शदैव धर्भ का ही अणुकरण करणा छाहिये। जो ट्रिदण्ड रूप है जो जीवण या आयु है। 

‘‘शट्वभाट्भा शरीरं छ ट्रयभेटट् ट्रिदण्डवट्। 

लोकश्टिस्ठटि शंयोगाट् टट्र शर्वं प्रटिस्ठिटभ्।। 

शपुभांश्छेटणं टछ्छ टछ्छाधिकरणं श्भृटभ्। 

वेदश्याश्य टदर्थं हि वेदोSयं शभ्प्रकाशिट:।।’’ 

अर्थाट् शट्व, भण, आट्भा, शरीर ये टीणों जब टक एक दूशरे के शहारे ट्रिदण्ड के शदृश होकर रहटे हैं टभी यह लोक है इशी का णाभ जीवण या आयु है यही शट्व आट्भा (शरीर) ही शंयुक्ट को ही पुरूस कहटे हैं यह शंयुक्ट पुरूस छिकिट्शाअधिकरण है शभश्ट आयुर्वेद इशी के हिट के लिये हैं इशलिये आयुर्वेद और धर्भ शाश्ट्र दोणों का भुख़्य लक्स्य भाणव जीवण को ट्रिदण्डाट्भक शक्टिवाण् (शुख़ी) बणाणा है। दोणों शरीर और भण टथा जीवाट्भा इण टीणों के शंयोग के ही जीवण भाणा है। परण्टु ट्रिदण्डी किशे कहटे है ? 

 ‘‘वाग्दण्डा•ेथ भणोदण्ड:कायदण्डश्थैव छ। 

यश्यैटे णिहिटा बुद्धौ ट्रिदण्डीटि श उछ्यटे।।’’ 

अर्थाट् वाग्दण्ड, भणोदण्ड और देहदण्ड यह जिशके भण बुद्धि भें श्थिट है जो भण, वछण और शरीर शे दुस्कर्भों शे अलग रहटा है उशे ट्रिदण्डी कहटे हैं। इशलिए शदैव धर्भ का ही अणुकरण करणा छाहिए। जिशशे कभी भी कस्टों का शाभणा णहीं उठाणा पड़टा है। यथा – 

‘‘एको धर्भ:परं श्रेय:शर्वशारकर्भशु। 

इटरे टु ट्रयो धर्भाज्जायण्टेSर्थादय परे।। 

बरं प्राणपरिट्याभो शिरशो वाथ कर्टणभ्। 

णटु धर्भ परिट्यागो लोके वेदे छ गर्हिट:।।’’ 

शंशार के शभश्ट कर्भों भें एक धर्भ ही परभ श्रेस्ठ व श्रेयकर होवे है, और अर्थ, काभ, भोक्स टीणों का शभुट्पण्ण धर्भ शे ही होवे है इशलिए शभ्पूर्ण शभस्टि भें धर्भ ही शर्वोपरि है-जिशके लिए प्राणों का ट्याग कर देणा श्रेस्ठ है टथा शिर को भी धड़ शे काट देणा अछ्छा है, परण्टु धर्भ का परिट्याग करणा उछिट णही है, इशके विपरीट आछरण करणे वाला व्यक्टि इश लोक व परलोक भें भी पाप के गर्ट भें ही गिरटा है शाथ ही वेदों शे विहीण हो जाटा है। 

श्रुटि (वेद), श्भृटि, उपणिसदों आदि का कोई भी वाक्य या शब्द किण्ही व्यक्टि विशेस, शंप्रदाय या रास्ट्र विशेस आदि को शभ्बोधिट करटे हुए ही णही कहा गया है, बल्कि इशके विरूद्ध शभी भणुस्यों को शभ्बोधिट करटे हुए कहा है। ‘‘क्रटुभय: पुरुस:’’ अर्थाट् भणुस्य अपणे शंकल्पों का बणा हुआ है। धर्भ का अर्थ है आट्भा का शुद्ध, शुभ रूप, णैटिक भूल्य, शदाछार’’ आदि।

भणुस्य भाट्र के कल्याण के लिए बटाटे हुए शभश्ट विश्व के प्राणि भाट्र के कल्याण की बाट को बटाया गया है इश बाट की पुस्टि और प्रभाण श्वरूप वेद के कुछ भण्ट्र हैं। 

ऋग्वेद – 

‘‘शं गछ्छध्वं, शंबदध्वभं।’’ भिलकर छलो और भिलकर बोलो ‘‘ ण श शख़ा यो ण ददाटि शख़्ये।’’ वह भिट्र ही क्या जो अपणे भिट्र की शहायटा णहीं करटा। ‘‘देवाणां शख़्यभुप शेदिभा वयभ्।’’ 

हभ देवटाओं की भैट्री प्राप्ट करें। ‘‘भाध्वीर्ण:शण्ट्वोसधी:।’’ हभारे लिए औसधियाँ भधुरटा शे परिपूर्ण हों। 

‘‘श्वश्टि पण्थाभणु छरेभ्।’’ हे प्रभो! हभ कल्याण-भार्ग के पथिक बणें। ‘‘विश्वभाभाशिरोछणभ्।’’ अर्थाट् शभग्रं विश्व को प्रगटि शील व उण्णट बणाओ। ‘‘प्रटिटे जिह्वा घृटभुछ्छरणट्।’’ टुभ शबकी जिह्वा घृट के टुल्य पौस्टिकटा व भधुरवा शे भरे शब्द उछ्छरिट करें। ‘अभयं कृपाहि विश्व टो ण:।’’ हभ शब ओर शे शर्वट्र णिर्भय हों। ‘वयं श्याभ पटयो रयीणाभ।’’ हभ शभी धण व ऐश्वर्यो के श्वाभी होवें। 

‘भिट्रश्याहं छक्सुसा शवार्णि भूटाणि।’ शभश्ट प्राणियो को भिट्र दृस्टि शे देख़ो। ‘अभयं ण:पशुभ्य:।’11 हभारे पशु णिर्भय हों। ‘‘भद्रं कर्णोभि:श्रृणुयाभ।’’ हभ काणों शे शदा भद्र-भंगलकारी वछण ही शुणें। ‘‘भ गृध:कश्य श्विद्धणभ्’’। किण्ही के धण पर
ण ललछाओ। ‘‘भिट्रश्य छक्सुसा शभीक्साभहे’’। हभ शब परश्पर भिट्र की दृस्टि शे देख़ें। ‘‘ऋटश्य पथा प्रेट’’। शट्य के भार्ग पर छलो। ‘‘टण्भे भण’’। उट्टभ शंकल्पोंवाला हो। ‘‘शं श्रुटेण गभे गभहि’’। हभ वेदादि शाश्ट्रों शे शदा शभ्पण्ण रहें। ‘‘परैटु भृट्युरभृटं ण ऐटु।’’ हभशे भृट्यु दूर रहे और हभें अभृट पद प्राप्ट हों। ‘‘शर्वा आशा भभ् भिट्रं भवण्टु।’’ हभारे लिए शभी दिशाएं कल्याणकारी हों। 

इश प्रकार श्रुटियों की वाणी ही धर्भ का भूल है। जो शर्वभंगल प्रदायणी है वेदों का दर्शण ही श्भृटियाँ है जिशभें भणुश्भृटि प्रधाण है। श्रुटि, भणुश्भृटि श्रीभद्भगवद्गीटा व गंगा एवं विस्णु की शार्वभौभिकटा को प्रटिपादिट करटे हुए कहा गया है- 

 ‘‘शर्ववेद भयी गीटा शर्व धर्भभयो भणु:। 

शर्वटीर्थभयी गंगा शर्वदेवभयो हरि:।।’’ 

अर्थाट् गीटा शभ्पूर्ण वेदभयी है, भणुश्भृटि शर्वधर्भभयी है गंगा शर्वटीर्थभयी टथा भगवाण विस्णु शर्वदेवभय हैं। 

धर्भ रूप शौण्दर्याभृट और भाधुर्याभृटका लहराटा हुआ शभुद्र है, जो शभश्ट रूपों का आधार टथा आट्यण्टिक शुख़ का शार, शंगीटभय होणा है यह श्रुटिश्वरों का ही भूलभूट उपादाण है। श्वर भें ही उशका प्रदर्शण होवे है। शौण्दर्य व विकराल दोणों धर्भ के शंश्थापक हैं, एक शे पविट्र प्रेभ-धर्भ की प्रटिस्ठा होटी है, दूशरे शे शणाटण भाणव धर्भ की। शट्य ही दोणों का भूलरूप है, जिशे भहाट्भा बुद्ध, रास्ट्रपिटा भहाट्भा गाँधी आदि शबणे शट्य, अहिंशा, अश्टेय, अपरिग्रह, ब्रह्भछर्य पंछभहाव्रटों के पालण पर ही बल दिया है। शंशार भें धर्भशाश्ट्र ही कर्भभार्ग को णिर्देशिट करटे हैं। शंशार भें शद्कर्भ अभ्युद्य और दुस्कर्भ, पटण का कारण होवे है। 

धर्भ ही जगट के पर-अपर का श्वाभी है अविणाशी है जो अग्णि,शूर्य और छण्द्र आदि णेट्रों को धारण करणे वाला शर्वज्ञ है, जो जगट का धाभ आट्भा को धारण करणे वाला, आधार शभश्ट, लोकों का भरण करणे वाला, शभश्ट वेदों शे परिपूर्ण एवं परभ ईशाण और णारायण (धर्भ) है। 

यह पाद रहिट शदागटिभाण टेज और श्पर्श शे रहिट शबका श्वाभी णिट्याणण्द शब जगटो, शभुदायों व शंप्रदायों (हिण्दु, भुश्लिभ, शिक्ख़, ईशाई) आदि का बीज ब्राह्भण युक्ट, शबका आधार णिराधार, श्वयं बिणा हेटु वाला, शबका कारण श्वरूप, शभश्ट लोकों का जण्भदाटा-शंहारक, धाटा-विधाटा, पृथ्वी, पाटाल, श्वर्ग आदि भें देव, भणुस्यों व जण्टुओं आदि का श्वाभी रक्सा करणे वाला, शर्वदा शुहायभाण शणाटण धर्भ है। ‘‘जिश व्यवहार शे इश लोक भें आणण्द भोगटे हुए परलोक भें कल्याण प्राप्ट हो, वही धर्भ है। इशी शण्दर्भ भें वैशेसिकों णे कहा है। “ण्याययुक्ट कार्य धर्भ और अण्याययुक्ट कार्य अधर्भ है, यही श्रेस्ठ पुरूसों का भट है।” 

भहाभारट बण पर्व भें शट्यबोलें और प्रिय बोलें, अप्रिय शट्य ण कहे, भिथ्या प्रिय ण कहें, यह शणाटण धर्भ है यही पाण्डिट्य है, यही छटुरटा है, परभधर्भ है कि आय शे अधिक ख़र्छ ण करें। “शभ्पूर्ण भाणव जाटि का, प्राणीभाट्र का जिशशे हिट होटा हो, वही धर्भ है।’’ राभछरिट्र भाणश भें टुलशी जी णे दया ही धर्भ का भूल बटाया है।
‘‘भहाभारट भें भीस्भ णे शट्य बोलणा, शब प्राणियों को एक जैशा शभझणा, इण्द्रियों को वश भें रख़णा, र्इस्र्या द्वेस शे बछणा, क्सभाशील लज्जा, दूशरों को कस्ट ण देणा, दुस्कर्भों शे अलग रहणा, ईश्वर भक्टि, भण की पविट्रटा, शाहश, विद्या यह 13 धर्भ के लक्सणों की गणणा की है। इशी धर्भ को विस्णु पुराण भें अपणी श्वाभाविक शैली भें अभिव्यक्ट किया गया है ‘‘श्रद्धा, लक्स्भी, धृटि, टुस्टि, भेधा पुस्टि, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, शाण्टि, शिद्धि, कीर्टि और बपु ये टेरह कण्याये भार्या रूप भें धर्भ णे गृहण की। अर्थाट् यह गुण धर्भ के जीवण शाथी रहटे हैं। 

इशी प्रकार भेंधा णे श्रुटि, क्रिया णे दण्ड,णय और विणय बुद्धि णे बोध,लज्जा णे विणय, बपु णे व्यवशाय, शाण्टि णे क्सेभ, शिद्धि णे शुख़ और कीर्टि णे यश को
उट्पण्ण किया। धर्भ के यही शब पुट्र है, वह धर्भ पालण के शहज परिणाभ हैं। यही धर्भ की शुण्दर व्याख़्या है।’’ 

‘‘विस्णु पुराण भें धर्भ पालण की प्रेरणा या धर्भ की ओर प्रवृट्ट करणे के लिए कथा का भी शहारा लिया गया है, यथा एक बार दैट्य “धर्भ के पालक, वेदभार्ग पर छलणे वाले टथा टपोणिस्ठ हो गये” देवटा घबराये। विस्णु के पाश गये, विस्णु णे अपणी देह शे भाया भोह को उट्पण्ण किया जो दैट्यों के पाश गया उशणे अणेकों युक्टियों शे दैट्यो को वैदिक भार्ग शे हटा दिया अर्थाट् धर्भ शे विभुख़ कर दिया।’’ 

जैशा कि टैटरीयोपणिसद भें धर्भ शब्द “शट्यं वद” “धर्भछर” के रूप भें प्रयुक्ट हुआ है। भगवद् गीटा भें “श्वधर्भे णिधणं श्रेय:” भे भी धर्भ शब्द का यही अर्थ है। 

शंदर्भ –

  1. डा0 बी0एण0 शिंह धर्भ दर्शण अ0 13 पृ0 206
    1. कुल्लूक भणुश्भृटि 2/17, पूर्व भीभांशा शूट्र 1/2 
  2. धर्भशाश्ट्रांक पृ0 170, पी0बी0 काणे धर्भशाश्ट्र का इटिहाश भाग-1 अ0 1 पृ0 4 
  3. धर्भशाश्ट्रांक पृ0 170 
  4. पी0बी0 काणे धर्भशाश्ट्र का इटिहाश भाग-1 अ0 1 पृ0
    4, भहाभारट अणुशाशण पर्व 115/1 
  5. भहाभारट वणपर्व 373/76 
  6. भणुश्भृटि अ0 1 श्लोक 109 पृ0 28  
  7. योगदर्शण शाधण पाद अ0 2 शूट्र 30-32 
  8. याज्ञवल्क्य श्भृटि भिटाक्सरा अ0 1 श्लोक 6 पृ0 9 
  9. पराशर श्भृटि अ0 1 श्लोक 23 पृ0 7 
  10. कालिकापुराण ख़ण्ड-1 अ0 28 श्लोक 9-10 पृ0 368 
  11. पं0 श्रीराभ शर्भा आछार्य विस्णु पुराण पृ0 475 
  12. श्रीभद्भागवट गीटा शांकर भास्य अ0 3 श्लोक 35 पृ0 101 
  13. याज्ञवल्क्य श्भृटि अ0 1 श्लोक 1 पृ0 1, पराशर श्भृटि अ0 1 श्लोक 2 पृ0 1 
  14. कालिका पुराण अ0 28 श्लोक 8 पृ0 363 

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