समाज का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं एवं प्रमुख तत्व

By | February 16, 2021


समाज शब्द संस्कृत के दो शब्दों सम् एवं अज से बना है। सम् का अर्थ है इक्ट्ठा व एक साथ अज का अर्थ है साथ रहना। इसका अभिप्राय है कि समाज शब्द का अर्थ हुआ एक साथ रहने वाला समूह। मनुष्य चिन्तनशील प्राणी है। मनुष्य ने अपने लम्बे इतिहास में एक संगठन का
निर्माण किया है। वह ज्यों-ज्यों मस्तिष्क जैसी अमूल्य शक्ति का प्रयोग करता गया,
उसकी जीवन पद्धति बदलती गयी और जीवन पद्धतियों के बदलने से आवश्यकताओं
में परिवर्तन हुआ और इन आवश्यकताओं ने मनुष्य को एक सूत्र में बाधना प्रारभ्म किया
और इस बंधन से संगठन बने और यही संगठन समाज कहलाये और मनुष्य इन्हीं
संगठनों का अंग बनता चला गया। बढ़ती हुई आवश्यकताओं ने मानव को विभिन्न
समूहों एवं व्यवसायों को अपनाते हुये विभक्त करते गये और मनुष्य की परस्पर निर्भरता
बढ़ी और इसने मजबूत सामाजिक बंधनों को जन्म दिया।

वर्तमान सभ्यता मे मानव का समाज के साथ वही घनिष्ठ सम्बंध हो गया है
और शरीर में शरीर के किसी अवयव का होता है। विलियम गर महोदय का कथन
है- मानव स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है, इसीलिये उसने बहुत वर्णों के अनुभव
से यह सीख लिया है कि उसके व्यक्तित्व तथा सामूहिक कार्यों का सम्यक् विकास
सामाजिक जीवन द्वारा ही सम्भव है। रेमण्ट महोदय का कथन है कि- एकांकी जीवन
कोरी कल्पना है। शिक्षा और समाज के सम्बंध को समझने के लिये इसके अर्थ को
समझना आवश्यक है।

ने समाज की अवधारणा की जो व्याख्या की है उसके अनुसार समाज एक बहुत
बड़ा समूह है जिसका को भी व्यक्ति सदस्य हो सकता है। समाज जनसंख्या, संगठन, समय,
स्थान और स्वार्थों से बना होता है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है, समाज एक उद्देश्यपूर्ण समूह हेाता है, जो
किसी एक क्षेत्र में बनता है, उसके सदस्य एकत्व एवं अपनत्व में बंधे हेाते हैं।

समाज की विशेषताएँ 

समाजशास्त्रियों ने समाज की परिभाषा क अर्थों में दी है। समाज के साथ जुड़ी हु कतिपय
विशेषताएँ हैं और ये विशेषताएँ ही समाज के अर्थ को स्पष्ट करती है। हालके समाजशास्त्रियों
में जॉनसन ने समाजशास्त्र के लक्षणों को वृहत् अर्थों में रखा है। यहाँ हम समाज की कतिपय
विशेषताओं का उल्लेख करेंगे जिन्हें सामान्यतया सभी समाजशास्त्री स्वीकार करते हैं। ये
विशेषताएँ हैं :

एक से अधिक सदस्य 

को भी समाज हो, उसके लिये एक से अधिक सदस्यों की आवश्यकता होती है। अकेला व्यक्ति
जीवनयापन नहीं कर सकता है और यदि वह किसी तरह जीवन निर्वाह कर भी ले, तब भी वह
समाज नहीं कहा जा सकता। समाज के लिये यह अनिवार्य है कि उसमें दो या अधिक व्यक्ति
हों। साधु, सन्यासी, योगी आदि जो कन्दराओं और जंगलों में निवास करते हैं, तपस्या या
साधना का जीवन बिताते है, समाज नहीं कहे जा सकते।

वृहद संस्कृति 

समाज में अगणित समूह होते हैं। इन समूहों को एथनिक समूह कहते हैं इन एथनिक समूहों
की अपनी एक संस्कृति होती है, एक सामान्य भाषा होती है, खान-पान होता है, जीवन पद्धति
होती है, और तिथि त्यौहार होते हैं। इस तरह की बहुत उप-संस्कृतियाँ जब तक देश के क्षेत्र में
मिल जाती है तब वे एक वृहद संस्कृति का निर्माण करती हैं। दूसरें शब्दों में, समाज की
संस्कृति अपने आकार-प्रकार में वृहद होती है जिसमें अगणित उप-संस्कृतियाँ होती है। उदाहरण
के लिये जब हम भारतीय संस्कृति की चर्चा करते हैं तो इससे हमारा तात्पर्य यह है कि यह
संस्कृति वृहद है जिसमें क संस्कृतियाँ पा जाती है। हमारे देश में अनेकानेक उप-संस्कृतियां
है। एक ओर इस देश में गुजराती, पंजाबी यानी भांगड़ा और डांडिया संस्कृति है वही बंगला
संस्कृति भी है। उप-संस्कृतियों में विभिन्नता होते हुए भी कुछ ऐसे मूलभूत तत्व है जो इन
संस्कृतियों को जोड़कर भारतीय संस्कृति बनाते हैं। हमारे संविधान ने भी इन उप-संस्कृतियों के
विकास को पूरी स्वतंत्रता दी है। को भी एक संस्कृति दूसरी संस्कृति के क्षेत्र में दखल नहीं
देती। संविधान जहाँ प्रजातंत्र, समानता, सामाजिक न्याय आदि को राष्ट्रीय मुहावरा बनाकर चलता
है, वहीं वह विभिन्न उप-संस्कृतियों के विकास के भी पूरे अवसर देता है। ये सब तत्व किसी
भी समाज की वृहद संस्कृति को बनाते हैं। जब हम अमरीकी और यूरोपीय समाजों की बात
करते हैं जो इन समाजों में भी क उप-संस्कृतियों से बनी हु वृहद संस्कृति होती है।
अमरीका में क प्रजातियाँ – काकेशियन, मंगोलियन, नीग्रो, इत्यादि। इस समाज में क राष्ट्रों
के लोग निवास करते हैं – एशिया, यूरोप, आस्ट्रेलिया इत्यादि। यूरोपीय समाज की संस्कृति भी
इसी भांति वृहद है।

क्षेत्रीयता 

जॉनसन का आग्रह है कि किसी भी संस्कृति का को न को उद्गम का क्षेत्र अवश्य होता है।
प्रत्येक देश की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाएँ होती है। इसी को देश की क्षेत्रीयता कहते हैं। इस क्षेत्रीयता
की भूमि से ही संस्कृति का जुड़ाव होता है। यदि हम उत्तराखण्ड की संस्कृति की बात करते हैं
तो इसका मतलब हुआ कि इस संस्कृति का जुड़ाव हिमाचल या देव भूमि के साथ है। मराठी
संस्कृति या इस अर्थ में मलयालम संस्कृति भी अपने देश के भू-भाग से जुड़ी होती है।

यह संभव है कि किसी निश्चित क्षेत्र में पायी जाने वाली संस्कृति अपने सदस्यों के
माध्यम से दूसरे में पहुंच जाए, ऐसी अवस्था में जिस क्षेत्र का उद्गम हुआ है उसी क्षेत्र के
नाम से संस्कृति की पहचान होगी। उदाहरण के लिए इंग्लैण्ड या न्यूयार्क में रहने वाला भारतीय
अपने आपको भारतीय संस्कृति या भारतीय समाज का अंग कह सकता है, जबकि तकनीकी
दृष्टि से अमेरीका में रहकर वह भारतीय क्षेत्र में नहीं रहता। महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस
क्षेत्र में संस्कृति का उद्गम हुआ है, उसी क्षेत्र के समाज के साथ में उसे पहचाना हुआ मानता
है। उत्तरप्रदेश में रहने वाला एक गुजराती अपने आपको गुजराती संस्कृति के साथ जुड़ा हुआ
मानता है। उसकी भाषा, खान-पान, तिथि, त्यौहार, उत्तरप्रदेश में रहकर भी गुजराती संस्कृति के
होते हैं

सामाजिक संबंधों का दायरा 

समाज के सदस्यों के सम्बन्ध विभिन्न प्रकार के होते हैं। समाज जितना जटिल होगा, सम्बन्ध
भी उतने ही भिन्न और जटिल होंगे। सम्बन्ध क तरह के होते हैं : पति-पत्नी, मालिक
मजदूर, व्यापारी-उपभोक्ता आदि। इन विभिन्न सम्बन्धों में कुछ सम्बन्ध संघर्षात्मक होते हैं और
कुछ सहयोगात्मक। समाज का चेहरा हमेशा प्रेम, सहयोग और ममता से दैदीप्यमान नहीं होता,
इसके चेहरे पर एक पहलू बदसूरत भी होता है। समाज में संघर्ष, झगड़े-टंटे, मार-पीट और दंगे
भी होते हैं। जिस भांति समाज का उजला पक्ष समाज का लक्षण है, वैसे ही बदसूरत पक्ष भी
समाज का ही अंग है। अत: समाज जहाँ मतैक्य का प्रतीक है, वही वह संघर्ष का स्वरूप भी
है।

श्रम विभाजन 

समाज की गतिविधियाँ कभी भी समान नहीं होती। यह इसलिये कि समाज की आवश्यकताएँ
भी विविध होती है। कुछ लोग खेतों में काम करते हैं और बहुत थोड़े लोग उद्योगों में जुटे होते
हैं। सच्चा यह है कि समाज में शक्ति होती है। इस शक्ति का बंटवारा कभी भी समान रूप
से नहीं हो सकता। सभी व्यक्ति तो राष्ट्रपति नहीं बन सकते और सभी व्यक्ति क्रिकेट टीम के
कप्तान नहीं बन सकते। शक्ति प्राय: न्यून मात्रा में होती है और इसके पाने के दावेदार बहुत
अधिक होते हैं। इसी कारण समाज कहीं का भी, उसमें शक्ति बंटवारे की को न को व्यवस्था
अवश्य होती है। शक्ति के बंटवारे का यह सिद्धांत ही समाज में गैर-बराबरी पैदा करता है। यह
अवश्य है कि किसी समाज में गैर-बराबरी थोड़ी होती है और किसी में अधिक। हमारे देश में
गरीबी का जो स्वरूप है वह यूरोप या अमेरिका की गरीबी की तुलना में बहुत अधिक वीभत्स
है। जब कभी समाज की व्याख्या की जाती है जो इसमें श्रम विभाजन की व्यवस्था एक
अनिवार्य बिन्दु होता है। को भी समाज, जो विकास के किसी भी स्तर पर हो, उसमें श्रम
विभाजन का होना अनिवार्य है।

काम प्रजनन 

समाज की वृद्धि और विकास के लिये बराबर नये सदस्यों की भर्ती की आवश्यकता रहती है।
ऐसा होना समाज की निरन्तरता के लिये आवश्यक है। यदि समाज की सदस्यता में निरन्तरता
नहीं रहती तो लगता है कि समाज का अस्तित्व खतरे में है। सदस्यों की यह भर्ती क तरीकों
से हो सकती है – सामा्रज्य विस्तार, उपनिवेश और आप्रवासन। पर सामान्यतया समाज की
सदस्यतया की सततता को बनाये रखने का तरीका काम प्रजनन है। इसका मतलब है, समाज
के सदस्यों की सन्तान समाज के भावी उत्तरदायित्व को निभाती है।

मानव एवं समाज के सम्बन्ध के सिद्धान्त

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