समिति का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएँ एवं अनिवार्य तत्व

By | February 15, 2021


समिति व्यक्तियों का
एक समूह है जो कि किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति हेतु बनाया जाता है। उस उद्देश्य की पूर्ति
हेतु समाज द्वारा मान्यता प्राप्त नियमों की व्यवस्था को संस्था कहते हैं। बहुत से लोग इन दोनों
को समान अर्थों में प्रयोग करते हैं जो कि उचित नहीं है। ऐसा भ्रम इन दोनों शब्दों के सामान्य
प्रयोग के कारण पैदा होता है। उदाहरण के लिए हम किसी भी महाविद्यालय को एक संस्था
मान लेते हैं। समाजशास्त्र में जिस अर्थ में संस्था का प्रयोग होता है उस अर्थ की दृष्टि
महाविद्यालय संस्था न होकर एक समिति है क्योंकि यह व्यक्तियों का एक मूर्त समूह है। यदि
इसे परीक्षा पद्धति (जो कि नियमों की एक व्यवस्था है) की दृष्टि से देखें, तो इसे संस्था भी
कहा जा सकता है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि कोई भी व्यक्ति अपनी सभी आवश्यकताओं की
पूर्ति स्वयं अकेला ही नहीं कर सकता है। यदि एक जैसे उद्देश्यों की पूर्ति वाले मिलकर
सामूहिक रूप से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करें, तो एक समिति का निर्माण होता
है। इसीलिए समिति को व्यक्तियों का एक समूह अथवा संगठन माना जाता है।

समिति का अर्थ एवं परिभाषा

समिति व्यक्तियों का समूह है। यह किसी विशेष हित या हितों की पूर्ति के लिए बनाया
जाता है। परिवार, विद्यालय, व्यापार संघ, चर्च (धार्मिक संघ), राजनीतिक दल, राज्य इत्यादि
समितियाँ हैं। इनका निर्माण विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है। उदाहरणार्थ,
विद्यालय का उद्देश्य शिक्षण तथा व्यावसायिक तैयारी हैं। इसी प्रकार, श्रमिक संघ का उद्देश्य
नौकरी की सुरक्षा, उचित पारिश्रमिक दरें, कार्य की स्थितियाँ इत्यादि को ठीक रखना है।
साहित्यकारों या पर्वतारोहियों के संगठन भी समिति के ही उदाहरण हैं।

जिन्सबर्ग (Ginsberg) के अनुसार, “समिति आपस में सम्बन्धित सामाजिक प्राणियों का
एक समूह है, जो एक निश्चित लक्ष्य या लक्ष्यों की पूर्ति के लिए एक सामान्य संगठन का
निर्माण करते हैं।” मैकाइवर एवं पेज (MacIver and Page) के अनुसार-”सामान्य हित या हितों
की पूर्ति के लिए दूसरों के सहयोग के साथ सोच-विचार कर संगठित किए गए समूह को
समिति कहते हैं।” गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार-”समिति व्यक्तियों का
ऐसा समूह है, जो किसी विशेष हित या हितों के लिए संगठित होता है तथा मान्यता प्राप्त या
स्वीकृत विधियों और व्यवहार द्वारा कार्य करता है।” बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार-”समिति
प्राय: किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए लोगों का मिल-जुलकर कार्य करना है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि समिति व्यक्तियों का एक ऐसा समूह
होता है जिसमें सहयोग व संगठन पाया जाता है। इसका प्रमुख उद्देश्य किसी लक्ष्य की पूर्ति
है। समिति के सदस्य अपने विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति कुछ निश्चित नियमों के अन्तर्गत सामूहिक
प्रयास द्वारा करते हैं।

समिति के अनिवार्य तत्त्व

समिति के चार अनिवार्य तत्त्व हैं-

  1. व्यक्तियों का समूह-समिति समुदाय की ही तरह मूर्त है। यह व्यक्तियों का एक
    संकलन है। दो अथवा दो से अधिक व्यक्तियों का होना समिति के निर्माण हेतु अनिवार्य है।
  2. सामान्य उद्देश्य-समिति का दूसरा आवश्यक तत्त्व सामान्य उद्देश्य अथवा उद्देश्यों का
    होना है। व्यक्ति इन्हीं सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जो संगठन बनाते हैं उसे ही समिति
    कहा जाता है।
  3. पारस्परिक सहयोग-सहयोग समिति का तीसरा अनिवार्य तत्त्व है। इसी के आधार
    पर समिति का निर्माण होता है। सहयोग के बिना समिति का कोई अस्तित्व नहीं है।
  4. संगठन-समिति के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संगठन का होना भी आवश्यक है।

संगठन द्वारा समिति की कार्य-प्रणाली में कुशलता आती है। समिति के निर्माण हेतु उपर्युक्त चारों तत्त्वों का होना अनिवार्य है। वस्तुत: समितियों का
निर्माण अनेक आधारों पर किया जाता है। अवधि के आधार पर समिति स्थायी (जैसे राज्य) एवं
अस्थायी (जैसे बाढ़ सहायता समिति); सत्ता के आधार पर सम्प्रभु (जैसे राज्य); अर्द्ध-सम्प्रभु
(जैसे विश्वविद्यालय) एवं असम्प्रभु (जैसे क्लब); कार्य के आधार पर जैविक (जैसे परिवार);
व्यावसायिक (जैसे श्रमिक संघ); मनोरंजनात्मक (जैसे संगीत क्लब) एवं परोपकारी (जैसे सेवा
समिति) हो सकती हैं।

समिति की प्रमुख विशेषताएँ

समिति की विभिन्न परिभाषाओं से इसकी कुछ विशेषताएँ भी स्पष्ट होती हैं। इनमें से
प्रमुख विशेषताएँ हैं-

  1. मानव समूह-समिति का निर्माण दो या दो से अधिक व्यक्तियों के समूह से होता है
    जिसका एक संगठन होता है। संगठन होने का आधार उद्देश्य या उद्देश्यों की समानता है। 
  2. निश्चित उद्देश्य-समिति के जन्म के लिए निश्चित उद्देश्यों का होना आवश्यक है। यदि निश्चित उद्देश्य न हों तो व्यक्ति उनकी पूर्ति के लिए तत्पर न होंगे और न ही समिति का
    जन्म होगा।
  3. पारस्परिक सहयोग-समिति अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए एक व्यवस्था का
    निर्माण करती है। उद्देश्य की प्राप्ति तथा व्यवस्था के लिए सहयोग होना अति आवश्यक है।
    चूँकि सदस्यों के समान उद्देश्य होते हैं, इस कारण उनमें सहयोग पाया जाता है।
  4. ऐच्छिक सदस्यता-प्रत्येक मनुष्य की अपनी आवश्यकताएँ हैं। जब वह अनुभव करता
    है कि अमुक समिति उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर सकती है तो वह उसका सदस्य बन
    जाता है। समिति की सदस्यता के लिए कोई बाध्यता नहीं होती है। इसकी सदस्यता ऐच्छिक
    होती है। इसे कभी भी बदला जा सकता है।
  5. अस्थायी प्रकृति-समिति का निर्माण विशिष्ट उद्देश्यों को पूर्ति के लिए किया जाता
    है। जब उद्देश्यों की प्राप्ति हो जाती है तो वह समिति समाप्त हो जाती है। उदाहरणार्थ,
    गणेशोत्सव के लिए गठित समिति गणेशोत्सव समाप्त होने के बाद भंग हो जाती है। 
  6. विचारपूर्वक स्थापना-समिति की स्थापना मानवीय प्रयत्नों के कारण होती है।  व्यक्तियों का समूह पहले यह परामर्श करता है कि समिति उनके लिए कितनी लाभप्रद होगी।
    यह विचार-विमर्श करने के पश्चात् ही समिति की स्थापना की जाती है।
  7. नियमों पर आधारित-प्रत्येक समिति की प्रकृति अलग होती है। इसी कारण
    समितियों के नियम भी अलग-अलग होते हैं। उद्देश्यों को पाने के लिए व सदस्यों के व्यवहार
    में अनुरूपता (Conformity) लाने के लिए कतिपय निश्चित नियम आवश्यक हैं। नियमों के
    अभाव में समिति अपने लक्ष्यों की पूर्ति नहीं कर सकती।
  8. मूर्त संगठन-समिति व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जो कतिपय लक्ष्यों की प्राप्ति
    हेतु एकत्र होते हैं। इस दशा में समिति को मूर्त संगठन के रूप में वर्णित किया जा सकता है।
    इसको किसी के भी द्वारा देखा जा सकता है।
  9. समिति साधन है, साध्य नहीं-समितियों का निर्माण उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया
    जाता है। यदि हम पढ़ने के शौकीन हैं, तो वाचनालय की सदस्यता ग्रहण कर लेते हैं। इससे
    हमें इच्छानुसार पुस्तकें मिलती रहती हैं। इसमें वाचनालय पुस्तकें प्राप्त करने का साधन है,
    साध्य नहीं; और यही समिति है। अत: हम कह सकते हैं कि समिति साधन है साध्य नहीं।
  10. सुनिश्चित संरचना-प्रत्येक समिति की एक सुनिश्चित संरचना होती है। समस्त
    सदस्यों की प्रस्थिति समान नहीं होती, वरन् उनकी अलग-अलग प्रस्थिति या पद होते हैं। पदों
    के अनुसार ही उन्हें अधिकार प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिए, महाविद्यालय में प्राचार्य,
    अध्यापक, छात्र, लिपिक इत्यादि प्रत्येक की अलग-अलग प्रस्थिति होती है तथा तदनुसार उनके
    अलग-अलग कार्य होते हैं।

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