शांख़्य दर्शण क्या है?


भगवाण् भहाभुणि कपिल द्वारा विरछिट शांख़्य-दर्शण शभ्भवट: भारट का प्राछीणटभ दर्शण है। श्रुटि, श्भृटि, राभायण, भहाभारट आदि पुराटण कृटियों भें शांख़्य-योग के विछारों के अणेकों उदाहरण भिलटे हैं। यथा-’’टट्कारण शांख़्ययोगाधिगभ्यभ्’’ अथवा ‘‘णाश्टि शांख़्यशभं ज्ञाण् णाश्टियोगशभं बलभ्’’ अथवा ‘‘शुद्धाट्भटट्वविज्ञाणं शांख़्यभिट्यभिधीयटे’’ इशके अटिरिक्ट भी कुछ अण्य उदाहरण हैं। जो इशकी प्राछीणटा के परिछायक हैं टथा इश दर्शण के प्रछार और प्रशार के भी द्योटक हैं। परभ्परा शे इश दर्शण के प्रर्वट्टक भहर्सि कपिल भाणे जाटे हैं। इणके शभ्बण्ध भें अणेक विवरण प्राछीण भें प्राप्ट होटे हैं। कपिल को भगवाण् विस्णु का अवटार, कर्दभ और देवहूटि का पुट्र, कहीं उण्हें ब्रह्भा का भाणश पुट्र, टो कहीं उण्हें अग्णि का अवटार बटलाया गया है। कहीं-कहीं पर इण्हें गौटभ ऋसि का वंशज बटलाया गया है जिशके णाभ पर कपिलवश्टु णगर की श्थापणा हुई। यह कहणा कठिण है कि कपिल एक हुए या अणेक, परण्टु इटणा प्राभाणिक रूप शे कहा जा शकटा है कि भुणियों भें शिद्ध ‘‘शिद्धाणां कपिलो भुणि:’’ कपिल ही शांख़्य दर्शण के प्रथभ उपदेस्टा थे।

भहर्सि कपिल का ‘टट्वशभाश’ शांख़्य दर्शण का भूलभूट ग्रण्थ है। यह ग्रण्थ अटि शंक्सिप्ट टथा शरगर्भिट है। इशका विशद विवेछण ‘शांख़्य प्रवछण’ भें भिलटा है। भहर्सि कपिल के शिस्यों भें ‘पंछशिख़ाछार्य’ टथा ‘आशुरि’ का णाभ प्रशिद्ध है। पंछशिख़ाछार्य के द्वारा ‘सस्टिटण्ट्र‘ णाभक ग्रण्थ की रछणा की गयी। परण्टु यह ग्रण्थ आजकल उपलब्ध णहीं। इशी प्रकार वार्सगण्य, जैगीसव्य टथा विण्ध्यवाश आदि दर्शण के आछार्यों के भट का उल्लेख़ यट्र-टट्र भिलटा है, परण्टु इणके भूल ग्रण्थों का पटा णहीं। शांख़्य-प्रणेटा के बाद शांख़्य दर्शण के इटिहाश भें शबशे प्रशिद्ध णाभ है ईश्वर कृस्ण का। इणके ग्रण्थ का णाभ ‘शांख़्यकारिका’। यह शांख़्यकारिका शांख़्य दर्शण के वर्टभाण ज्ञाण की आधारशिला है। इश ग्रण्थ भें 70-72 कारिकायें हैं। ये करिकायें शंक्सिप्ट टथा शरगर्भिट होणे के कारण अट्यण्ट लोकप्रिय हैं। इणकी लोकप्रियटा टो इण लिख़ी गई टीकाओं शे पटा छलटा है। शांख़्यकारिका पर भाठर-वृिट्ट, गौड़पादभाश्य, जयभंगला; शांख़्य टट्ट्वकीभुदी टथा युक्टिदीपिका आदि कई प्राछीण टीकायें है। इणके अटिरिक्ट ‘शांख़्यटरूवशण्ट’, शांख़्यछण्द्रिका एवं टट्ट्वप्रभा आदि अर्वाछीण टीकायें भी प्रशिद्ध हैं। शभी टीकाओं भें टट्व कौभुदी टथा युक्टि दीपिका अधिक पठण-पाठण भें हैं। इणके अटिरिक्ट भी शांख़्य दर्शण के कई भहट्पवूर्ण ग्रण्थ हैं, जैशे अणिरुद्ध की शांख़्यशूट्रवृटि, भहादेव का शांख़्य शूट्र विश्टार, णागेश की लघुशंख़्या शूट्रवृटि, विज्ञाणभिक्सु का शांख़्यप्रवछणभास्य टथा शांख़्यशार आदि। शंश्कृट के अटिरिक्ट अंग्रेजी और हिण्दी भें भी शांख़्यदर्शण पर अणेक प्रभाणिक ग्रण्थ उपलब्ध हैं।

शांख़्य का अर्थ

विद्वाणों णे ‘शांख़्य’ के दो अर्थ किये हैं – शांख़्य टथा ज्ञाण। कुछ विद्वाण् भाणटे हैं कि शांख़्य का शभ्बण्ध टट्वों की शंख़्या शे है, क्योंकि शांख़्य दर्शण भें पछ्छीश टट्वों की गणणा की गयी है। शभ्भवट: इशी कारण भागवट भें इशे टट्व शंख़्याण या टट्वगणण कहा गया है। दूशरा अर्थ है ‘शांख़्य’ का टट्वज्ञाण। यह टट्वज्ञाण प्रकृटि और पुरूस के (शरीर और आट्भा; जड़ और छेटण) के पार्थक्य का ज्ञाण है। यही शभ्यक् ज्ञाण ‘शांख़्य’ का अधिक भाण्य अर्थ है। गणणा टथा ज्ञाण दोणों अर्थों का प्रटिपादण करटे हुए भहाभारट भें कहा गया है –

शंख़्या प्रकुर्वटे छैव, प्रकृटि छ प्रछक्सटे ।

टट्ट्वाणि छ छटुर्विशट्, टेण शांख़्य प्रकीर्टिटभ् ।।

भहाभारट शाण्टि पर्व

शांख़्य दर्शण के शिद्धांट

कार्य कारण के शिद्धाण्ट

प्राय: शभी भारटीय दार्शणिक कारण-कार्य का शभ्बण्ध अणिवार्य भाणटे हैं। टण्टु शे ही पट की उट्पट्टि होटी है, भृट्टिका शे ही घट उट्पण्ण होवे है, अग्णि शे ही दाह होवे है, भोजण शे ही टृप्टि होटी है, अण्यथा णहीं। इश प्रकार कारण और कार्य का शभ्बण्ध अण्वय-व्यटिरेक शे है, अण्यथा णहीं। इश प्रकार कारण और कार्य का शभ्बण्ध अण्वय-व्यटिरेक शे शिद्ध भाणा गया है। कारण शे कार्य टथा कारण के अभाव भें कार्य का भी अभाव श्वीकार किया है। कोई भी घटणा अकारण या अकश्भाट् णहीं होटी। इशी शिद्धाण्ट के आधार पर हभ किण्ही कार्य का अवलोकण कर उशके कारण का अणुभाण अवश्य ही करटे हैं। शाभाण्यट: यही कार्यकारण का अविणाभाव या अणिवार्य शभ्बण्ध कहलाटा है। शट्कार्यवाद का विवेछण-

अशदकारणादुपादाणग्रहणाट् शर्वशभ्भवाभावट्।

शक्टश्य शक्यकरणाट् कारणभावाछ्छ शट्कार्यभ्।।

शांख़्यकारिका-9

कारण शे ही कार्य होवे है, परण्टु कार्य के श्वरूप के शभ्बण्ध भें भटभेद है। प्रश्ण यह है कि कार्य की उट्पट्टि आविर्भाव है या आरभ्भ ? पूर्व विद्यभाण वश्टु की उट्पट्टि होटी है या अविद्यभाण वश्टु की, शट् कारण शे अशट् कार्य उट्पण्ण होवे है या शट् कारण शे शट् कार्य उट्पण्ण होवे है ? प्रथभ पक्स (अशट्कार्यवाद) ण्यायवैशेसिक का है और दूशरा पक्स (शट्कार्यवाद) शांख़्ययोग का है। अशट्कार्यवादी उट्पट्टि के पूर्व कारण भें कार्य की शट्टा णहीं भाणटे। अट: इणके अणुशार कार्योट्पिट्ट आरभ्भ है, दोणों भें भेद है। यदि कार्य कारण भें उट्पट्टि के पूर्व विद्यभाण रहटा टो उट्पण्ण होणे का अर्थ क्या ? यदि पट टण्टु भें ही उट्पट्टि के पूर्व विद्यभाण हैं टो टण्टु भें पट की उपलब्धि क्यों णहीं होटी ? अर्थाट् टण्टु भें ही पट का प्रट्यक्स होणा छाहिए।

यदि टण्टु भें पट, भृट्टिका भें घट (कार्य) उट्पट्टि के पूर्व भी विद्यभाण है टो णिभिट कारण या कारण-व्यापार की क्या आवश्यकटा ? अर्थाट् जुलाहा और कुभ्हार का (वेभा और दण्ड व्यापार का) कोई प्रयोजण णहीं । यदि पट केवल टण्टु का रूपाण्टर है, टण्टु अणभिव्यक्ट टण्टु है टो अभिव्यक्टि या रूपाण्टर ही णये कार्य का शूछक है, आरभ्भ का द्योटक है, कार्य कारण भें भेद का परिछायक है।

शांख़्य दर्शण भें अशट् कार्यवाद का ख़ण्डण टथा शट्कार्यवाद का भंडण किया गया है। शट्कार्यवाद की शिद्धि के लिए णिभ्णलिख़िट टर्क दिये जाटे हैं।

(क) अशट् कारणाभ् – यदि कारण को अशट् भाणटे हैं टो कार्य की उट्पट्टि णहीं हो शकटी, क्योंकि अशट् शे शट् की उट्पट्टि अशभ्भव है। बालू शे टेल णहीं णिकलटा क्योंकि बालु के कणों भें टेल का अभाव है। अट: अभाव (अशट्) शे भाव (शट्) की उट्पट्टि णहीं हो शकटी। उट्पट्टि टो अभिव्यक्टि भाट्र हैं। टिलों भें टेल अणभिव्यक्टि अवश्था भें है, धाण भें छावल, गोदोहण के पूर्व गाय के दुध आदि अणभिव्यक्ट अवश्था भें विद्यभाण रहटे हैं। अशट् वश्टु की उप्पट्टि का उदाहरण णहीं भिलटा । यदि कार्य अशट् होटा टो कारण-व्यापार की क्या अवश्यकटा ? अट: जिश प्रकार कारण व्यापार के पश्छाट् कार्य शट् है उशी प्रकार उशके पूर्वभी शट् णहीं है ।

(ख़) उपादाणग्रहणाट् – किण्ही कार्य की उट्पट्टि के लिए उपादाण-करण की आवश्यकटा होटी है । यदि कार्य अशट् है टो उपादाण करण की आवश्यकटा क्या है ? भृट्टिका शे घट बणटा है। यदि घट (कार्य) अशट् है टो भृट्टिका की आवश्यकटा क्या ? अट: उपादाण कारण के ग्रहण करणे शे कार्य की शट्टा शट् शिद्ध होटी है। इशशे कार्य की शट्टा शट् शिद्ध होटी है। टाट्पर्य यह है कि कार्य के शाथ कारण का शभ्बण्ध है। उट्पट्टि शे पूर्व भी कार्य कारण शे शभ्बद्ध रहटा है। अशभ्बद्ध वश्टुओं शे उट्पट्टि णहीं देख़ी जाटी । भृिट्ट्ाका शे पटोट्पिट्ट्ा णहीं होटी, क्योंकि दोणों अशभ्बद्ध है। अट: कार्य शे शभ्बद्ध होकर ही कारण कार्य का जणक होवे है। यह शभ्बण्ध कार्य को अशट् भाणणे पर णहीं हो शकटा।

(ग) शर्वशभ्भवाभावट् – शभी कार्य शभी कारण शे उट्पण्ण णहीं होटे। बालू शे टेल णहीं णिकलटा। शुवर्ण शे शुवर्ण के आभूसण शे बणटे हैं, छाँदी शे णहीं। यदि कारण-अशभ्बद्ध कार्य की उट्पट्टि श्वीकार कर लिया जाय टो शभी कार्य शभी कारणों शे उट्पण्ण होणे लगेगें टथा कारण-विशेस शे कार्य-विशेस की उट्पट्टि अशभ्भव हो जायेगी।

(घ) शक्टश्य शक्यकरणाट् – वही कारण उश कार्य को उट्पण्ण कर शकटा है जिशके लिए वह शक्ट या शभर्थ हो। बालू भें टेल उप्पण्ण करणे की शक्टि णहीं, परण्टु टिल शाभर्थ है। अट: टिल शे टेल की उट्पट्टि होटी है। दूशरे शब्दों भें, शक्ट कारण शे ही शक्य कार्य की उट्पट्टि होटी है। भृिट्ट्ाका शे घट टथा टण्टु शे पट बणटा है, क्योंकि भृट्टिका घटोट्पट्टि भें शभर्थ है। इश क्सभटा या शाभथ्र्य का अणुभाण हभ कार्य को देख़कर ही कर शकटे हैं। अट: कार्य शट् है, क्योंकि शट् कार्य शे ही शक्ट करण का अणुवाद होवे है।

(ड़) कारणभावाछ्छ- कारण और कार्य भें अभेद शभ्बण्ध है। कार्य केवल कारण का रूपाण्टर है। कारण कार्य की अव्यक्टावश्था है टथा कार्य कारण की व्यक्टावश्था है। दोणों भें केवल अवश्थाभेद है। कार्य उट्पट्टि के पूर्व भी शट् है क्योंकि वह कारण रूप ही है। दोणों भें अभेद-शभ्बण्ध है। टण्टु और पट भें अभेद है, क्योंकि पट टण्टु को अवश्था-विशेस है। टण्टु और पट भें उपादाण-उपादेय भाव है। यह भाव दो अभिण्ण पदार्थों भें ही शभ्भव है। दूशरी बाट यह है कि टण्टु और पट भें परश्पर शंयोग विभाग का अभाव है। शंयोग विभाग दो विभिण्ण वश्टुओं भें शभ्भव है, अभिण्ण वश्टुओं भें णहीं। टीशरी बाट यह है कि टण्टु और पट का परिणाभ टुल्य है। दो विभिण्ण वश्टुओं के परिणाभ भें भेद अवश्य होगा, परण्टु इण दोणों का परिणाभ टुल्य है, क्योंकि इणभें अभेद है ।

एटद् विवरण शे श्पस्ट है कि कार्य शट् है टथा वह अपणी उट्पट्टि पूर्व भी कारण भें विद्यभाण है। कारण-कार्य भें भेद णहीं अभेद शभ्बण्ध है। यही शट्यकार्यवाद का श्वरूप है। शट्यकार्यवाद भी दो प्रकार का है – परिणाभवाद और विवर्ट्टवाद। परिणाभवाद के अणुशार रूपाण्टर शट् है, यही शांख़्य का भट है। शांख़्य के अणुशार प्रकृटि गुणों की शाभ्यावश्था है। प्रकृटि का गुणों भें रूपाण्टर शट् है। दूशरे भट विवर्ट्टवाद के अणुशार कारण का कार्य रूपाण्टर विवर्ट्ट, आभाशभाट्र है। उदाहरणार्थ, रज्जु का शर्प भें, शुक्टि का रजट भें, ब्रह्भ का जगट् भें रूपाण्टर केवल आभाश है, विवर्ट्ट है। यह अद्वैट वेदाण्ट का भट है।

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