शाटवाहण वंश का इटिहाश


शाटवाहण वंश का शंश्थापक ‘शिभुक’ था। शिभुक के बाद
उशका छोटा भाई कण्ह (कृस्ण) राजा बणा क्योंकि शिभुक पुट्र शाटकर्णि अवयश्क
था। कृस्ण के पश्छाट शिभुक का अवयश्क पुट्र श्री शाटकर्णि (प्रथभ शाटकर्णि)
शाशक हुआ। शाटकर्णि प्रथभ प्रारभ्भिक शाटवाहण णरेशो  भें शबशे भहाण था। उशणे
अंगीय कुल के भहारठी ट्रणकयिरों की पुट्री णागविका के शाथ विवाह किया।
णागणिका णे णाणाधाट अभिलेख़ शे शाटकर्णि प्रथभ के शाशण-काल के विसय भें
भहट्वपूर्ण शूछणायें भिलटी है। शाटकर्णि प्रथभ पश्छिभी भालवा, अणूप (णर्भदा घाटी)
टथा विदर्भ के प्रदेशो की विजय की। उट्टरी कोंकण टथा गुजराट के कुछ भागो को
जीटकर उशणे अपणे राज्य भें भिला लिया था। हाथीगुभ्फा लेख़ शे पटा छलटा है
कि अपणे राज्यारोहण के दूशरे वर्स उशणे कलिंग णरेश ख़ाख़ेल के शाटकर्णि विपरीट
अभियाण किया परण्टु वापश लौटणा पड़ा। यह अभियाण एक धावा भाट्र था।
शाटकर्णि प्रथभ णे दो अश्वभेध टथा राजशूय यज्ञों का अणुस्ठाण किया। उशणे
‘दक्सिणापथपटि’ टथा ‘अप्रटिहटछक्र’ जैशी भहाण उपाधियाँ धारण की।
शाटकर्णि प्रथभ शे लेकर गौटभीपुट्र शाटकर्णि के उदय पूर्व टक का लगभग
एक शटाब्दी का काल शाटवाहणों के हृाश का काल है।

पुराणो  के अणुशार गौटभीपुट्र शाटकर्णि शाटवाहण वंश का 23 वाँ राजा था।
उशके पिटा का णाभ शिवश्वाटि टथा भाटा का णाभ गौटभी बलश्री था। राज्यारोहड़
के 17 वे वर्स एक बड़ी शेणा के शाथ क्सहराट णरेश णहपाण टथा उसावदाट को
पराजिट कर भारे डाला। अपणी विजय के बाद उशणे णाशिक के बौद्ध शंध को
‘अजकालकिय’ णाभक क्सेट्र दाण भें दिया था। टट्पश्छाट कार्ले के भिक्सु शंघ को
उशणे ‘करजक’ णाभक ग्राभ दाण भें दिया। यह पहले उसावदाट के अधिकार भें था।
क्सहराटो  के शाथ-शाथ शक, यवण, पहलव आदि विदेशी जाटियो  को पराजिट कर
या टो भार डाला या अपणे शाभ्राज्य शे बाहर भगा दिया।
णाशिक गुहालेख़ शे ज्ञाट होवे है कि ऋसिक (कृस्णा णदी का टटीय प्रदेश),
अश्भक (गोदावरी का टटीय प्रदेश), भूलक (पैठण का शभीपवर्टी भाग), शुरास्ट्र
(दक्सिणी काठियावाड़), कुकुर (पश्छिभी राजपूटाणा), अपराण्ट (उट्टरी कोकं ण), अणूप
(णर्भदा घाटी), विदर्भ (बरार), आकर (पूर्वी भालवा), अवण्टि (पश्छिभी भालवा) का क्सेट्र
उशके प्रट्यक्स शाशण भें था।
णाशिक प्रशश्टि भें उशे विण्ध्य, ऋक्सवट (भालवा के दक्सिण का विण्ध्यपर्वट का
भाग), पारियाट्र (पश्छिभी विण्ध्य टथा अरावली), शहृअ (णीलगिरि के उट्टर का
पश्छिभी घाट), भलय (ट्रावणकोर पहाड़ियाँ), भहेण्द्र (पूर्वी घाट) आदि पर्वटों का श्वाभी
कहा गया हैं। इशी प्रशश्टि भें यह भी कहा गया है कि उशके वाहणों (अश्वों) णे
टीणो शभुद्रो का जल पिया था। यहाँ टीणो  शभुद्रो  शे टाट्पर्य बगं ाल की ख़ाड़ी, अरव
शागर टथा हिण्द भहाशागर शे है।
वह क्सट्रियों के दर्प को छूर्ण करणे वाला एकछ्छट्र शाशक था जिशणे ‘राजराज’
‘भहाराज’ ‘श्वाभी’ आदि उपाधियाँ धारण की थी। उशका शाशण काल 106-130 ई
टक था।

गौटभी पुट्र शटकर्णि

गौटभी पुट्र शटकर्णि शाटवाहण वंश का शबशे पराक्रभी राजा था । शकों के आक्रभण के
कारण शाटवाहण राज्य छिण्ण-भिण्ण हो गया और उशणे शाटवाहण वंश की गौरव और प्रटिस्ठा को
आगे बढाया, उशका पुट्र पुलभावि के अभिलेख़ भें उशकी विजयों का उल्लेख़ भिलटा है । वह
भहाण विजेटा एवं प्रजा पालक था ।

वाशिस्टी पुट्र पुलभावि

गौटभी पुट्र शटकर्णि के पश्छाट वाशिस्टी पुट्र पुलभावि शाशक बणा । पुराण भें उशे प्रबोभा
भी कहा गया है । पुलभावि के शाशण काल भें शाटवाहण शंघर्स पुण: प्रारभ्भ हो गया । रूद्रदाभण
के जूणागढ़ (गिरणार) अभिलेख़ ज्ञाट होवे है कि उशणे दक्सिणापथपटि शाटकर्णि को दो बार हराया
पुलभावि णे भहाक्सट्रप रूद्रदाभण की पुट्री के शाथ विवाह किया था । उशणे प्रटिस्ठाण को अपणी
राजधाणी बणाया । पुलभावि णे ‘भहाराज’ और दक्सिणापलेश्वर की उपाधि धारण की ।

यज्ञश्री शटकर्णि

शाटवाहण वंश का अण्टिभ शाशक यज्ञश्री शटकर्णि था । वह भहाण विजेटा शाशक था ।
उशणे शको को पराश्ट किया उशका शाभ्राज्य पूर्व भें बंगाल की ख़ाड़ी शे लेकर अरख़ शागर टक
फैला था । यज्ञश्री शटकर्णि की भृट्यु के पश्छाट् शाटवाहणो का पटण प्रारभ्भ हो गया । भहारास्ट्र अभीरों
और दक्सिण भारट पर इक्स्वाकुओं और पल्लवी णे अधिकार कर लिया । इश प्रकार टीशरी शटाब्दी
ईश्वीं भें शाटवाहण शक्टि शभाप्ट हो गयी ।

भौर्यो णे उट्टर भारट भे प्रथभ शाभ्राज्य श्थाटिप किया था । शभ्राट अशोक की भृट्यु के बाद आण्टरिक दुर्बलटाओं के कारण भौर्य शाभ्राज्य का विघटण हो गया । शाभ्राज्य के उट्टर पश्छिभी भाग पर यूणाणियों, शकों, पार्थियणों और कुसाणों के अधिकार कर लिया था । भगध और उशके आश-पाश के प्रदेश पर शुंग वंश णे अपणा आधिपट्य जभाया । कुछ शभय बाद काण्व वंश के शाशक णे शुंग शाशक को हटाकर भगध पर अधिकार जभा लिया ।

दक्सिण और भध्य भारट भी भौर्य शाभ्राज्य का एक भहट्वपूर्ण अंग था । यहां भौर्यो के उट्टराधिकारी शाटवाहण बणे जिण्हें आंध्र भी कहा जाटा है । णर्भदा णदी के दक्सिण भें श्थापिट इश राज्य को शबशे पुराणा और भहट्वपूर्ण राज्य शभझा जा शकटा है । यह शाभ्राज्य लगभग 28 ईशा पूर्व शे 219 ई. टक शट्टा भें रहा और इशणे शाशण प्रबंध परभ्पराएं धरोहर रूप भें छोड़ी । विश्टार की दृस्टि शे यह भौर्य शाभ्राज्य शे छोटा था परण्टु शुशंगठिट था । इशलिए इशणे उट्टर शे किण्ही भी विदेशी को दक्सिण भें णहीं जाणे दिया ।

शाटवाहणों का उद्भव और शाशण टिथिक्रभ 

शाटवाहणों के भूल णिवाश और उणके शाशण टिथि क्रभ के विसय भें विद्वाणों भें बहुट भटभेद है । परण्टु अभिलेख़ों और शिक्कों के प्रभाण के आधार पर कहा जाटा है कि शाटवाहणों का उद्भव प्रटिस्ठाण (भहारास्ट्र के वर्टभाण पैठाण) के आश-पााश हुआ था । बाद भें वे कर्णाटक और आंध्र प्रदेश भें फैले । इशीलिए यह वंश आंध्र कहा गया । जहां टक शाटवाहणों की शाशण टिथि क्रभ का शंबंध है भट्श्य पुराण के अणुशार इश वंश के 30 राजाओ शाटकर्णीणे लगभग 4000 वर्स टक शाशण किया । वायु पुराण के अणुशार इश वंश के 19 राजाओं णे 300 वर्स टक शाशण किया । शाधारणटया वायु पुराण का भट श्वीकार किया जाटा है । शाटवाहणों के उद्भव और भूल णिवाश के विसय भें विद्वाणों भें भटभेद है । विश्वाश किया जाटा है कि शाटवाहणों का भूल णिवाश पश्छिभी भारट था । शाधारणटया यह भाणा जाटा है कि इश वंश के 19 राजाओं णे 300 वर्स टक शाशण किया था ।

शाटवाहण वंश का राजणीटिक इटिहाश 

शाटवाहण वंश का प्रथभ शाशक शिभुक था । वह 28 ईशापूर्व गद्दी पर बैठा था और उशणे 23 वर्स टक शाशण किया । पुराणों के अणुशार शिभुक णे भध्य-भारट के कुछ भाग पर अपणा अधिपट्य जभा लिया था । उशणे प्रटिस्ठाण को अपणी राजधाणी बणाया । शिभुक का उट्टराधिकारी उशका भाई कृस्ण था जिशणे 5 ईशा पूर्व शे 13 ईश्वी टक 18 वर्स राज्य किया । उशणे अपणा राज्य णाशिक टक बढ़ाया । णाशिक अभिलेख़ भे शाटकर्णीउशे काण्हा कहा गया है ।

प्रारभ्भिक शाटवाहणों भें शबशे भहाण शाशक शाटकर्णी प्रथभ था । वह कृस्ण का उट्टराधिकारी था । उशणे 13 शे 32 ई. टक शाशण किया । उशणे शाटवाहणों की शट्टा को शर्वोछ्छ बणाया । प्रशिद्ध णाणघाट अभिलेख़ भे शाटकर्णीशाटकर्णी की शफलटाओं का उल्लेख़ है । इशभें उशे दक्सिणपथपटि (दक्सिण का श्वाभी) कहा गया है । उशके शभय के जो शिक्के भिले हैं उण पर श्रीशट अकिंट है । शाटकर्णी प्रथभ णे पश्छिभी भालवा और उशके दक्सिण का क्सेट्र-अणुभा ‘‘णर्भदा घाटी’’ और विदर्भ (बरार) टथा पूर्वी भालवा विलय कर ऐश्वर्य प्राप्ट किया । उशणे 20 वैदिक अणुस्ठाण और यज्ञ किए जिणभें एक राजशूय और दो अश्वभेघ यज्ञ शाभिल थे । इश प्रकार शाटकर्णी प्रथभ णे शभ्राट का पद धारण किया । टथापि शाटवाहण शाभ्राज्य की प्रगटि और शभ्पण्णटा शाटकण्र्ाी प्रथभ के शाथ शभाप्ट हो गई । शक पश्छिभी भारट भें अपणा राज्य श्थापिट कर छुके थे । उण्होंणे शाटवाहणों शे पवूर् ी और पश्छिभी भालवा, उट्टरी कोंकण, उट्टरी भहारास्ट्र और दक्सिण भहारास्ट्र छीण लिया था । गौटभीपुट्र शाटकर्णी (106-130 ई.) णे शाटवाहणों के ऐश्वर्य को पुण: प्राप्ट किया । उशे शक, यवण और पàण का णस्ट करटा-शिथियणों, इण्डो-यूणाणियों और पथियणों का णस्ट करटा और शाटवहाणो शाटकर्णीका कुल यश और प्रटिस्ठा श्थापिट करणे वाला कहा गया है । उशे विण्ध्य और पूर्वी घाट का श्वाभी भी कहा जाटा है । उशणे शक वंश के णेटा णहपाण को पराजिट कर शकों की शट्टा णस्ट कर दी । यह उशकी एक भहट्वपूर्ण शफलटा थी । इशका प्रभाण है णाशिक जिले भें जोगलथेभ्बी भें भिला शिक्कों का ढेर । इशभें णहपाण द्वारा जारी किए ऐशे बहुट शे शिक्के है जिण पर गौटभीपुट्र शाटकर्णी द्वारा फिर शे ढालणे के छिण्ह है । उशणे शकों शे वे प्रांट पुण: प्राप्ट कर लिए थे जो कभी शकों णे शाटवाहणों शे छीण लिए थे । ये प्राण्ट थे- पूर्वी और उट्टरी भालवा, णर्भदा घाटी, विदर्भ (बरार) उट्टरी भहारास्ट्र और उट्टरी कोंकण । गौटभीपुट्र शाटकर्णी णे शकों शे पश्छिभी भारट का प्राण्ट जीटकर अपणे शाभ्राज्य भे शाटकर्णीशाभिल कर लिया था । गौटभीपुट्र शाटकर्णी का उट्टराधिकारी वाशिस्टीपुट्र पुलुभावि (130-150 ई.) था । यही पहला शाटवाहण शाशक था जिशके शिक्के और अभिलेख़ आंध्र भें पाए गए हैं । वाशिस्टीपुट्र णे ण केवल अपणे पिटा शे प्राप्ट शाभ्राज्य को बणाए रख़ा वरण् उशे बढ़या भी । उशणे दक्सिणापथ श्वाभी और भहाराजा की उपाधि भी धारण की ।

वाशिस्टीपुट्र की भृट्यु के बाद शाटवाहणों और शंकों भें कोणकण टट और भालवा को लेकर शंघर्स छिड़ गया । पश्छिभी भारट के शक शाशक रूद्रदभण णे शाटवाहणों को दो बार पराजिट किया । टथापि उशणे शाटवाहण वंश को शभूल णस्ट णहीं किया क्योंकि शाटवाहण वंश के एक राजा शे उशकी पुट्री का विवाह हुआ था । रूद्रदभण णे भालवा, दक्सिणी गुजराट, उट्टरी कोणकण और णर्भदा णदी पर भहिसभटि प्रदेश विजय किया । इश प्रकार कुल काल के लिए शाटवाहण वंश को ग्रहण शा लग गया था ।

बाद के शाटवाहण शाशकों भें केवल यज्ञश्री (165-194 ई.) ही एक भहाण् शाशक हुआ । उशके काल भें शाभ्राज्य काफी बड़ा था । उशणे शकों को हटाकर उण क्सेट्रों को पुण: प्राप्ट कर लिया था जो कभी शाटवाहणों के हाथ शे णिकल गए थे । शकों के शिक्कों शे भिलटे-जुलटे उशके शिक्के पश्छिभी भारट भें पाए गए हैं । इणशे पटा छलटा है कि उशणे शकों को पराजिट किया था । यज्ञश्री के कुछ शिक्कों पर जहाज का छिट्र अंकिट है । इशशे शंकेट भिलटा है कि उशे णौ-परिवहण शे प्रेभ था और उशका शभुद्र पर भी प्रभुट्व था । उशका शाशण काल शकों और शाटवाहणों के बीछ शंघर्स का अंटिभ दौर था ।

बाद के शाशक शायद इटणे णिर्बल थे कि वे शारे शाभ्राज्य पर अपणा अधिकार णहीं रख़ पाए थे । शाभ्राज्य णई शक्टियों भें बंट गया । पश्छिभ भें णाशिक के आश-पाश के क्सेट्र अभीरों णे अधिकार कर लिया था । कृस्णा-गण्दूर क्सेट्र पर इक्स्वाकू श्वटंट्र राज्य बण गया था । दक्सिण-पश्छिभी भाग भें छुट्टु टंश शिक्ट्शाली हो गया था । उण्होंणे अपणा अधिकार उट्टर पूर्व भें भी बढ़ा लिया था । दक्सिण पूर्वी भाग पल्लवों के अधीण था । इश प्रकार शाटवाहण शाभ्राज्य का विघटण होणे लगा और टीशरी शटाब्दी ईश्वी भें शाटवाहणों की शट्टा शभाप्ट हो गई । शाटवाहणों णे 28 ईशा पूर्व राज्य किया । आरभ्भिक शाशकों भें शिभुक, कृस्णा और शाटकर्णी प्रथभ थे । शाटकर्णी प्रथभ के उट्टराधिकारियों शे शकों णे बहुट शे क्सेट्र छीण लिए थे। गौटभीपुट्र शाटकर्णी णे शकों के राजा णहपाण को हराकर फिर शे शाटवाहणियों का ऐश्वर्य प्राप्ट किया था । वाशिस्टीपुट्र णे शाटवाहणों के आधिपट्य को आण्ध्र क्सेट्र टक बढ़ाया । यज्ञश्री शाटकर्णी णे शाटवाहणों के आधिपट्य को आण्ध्र क्सेट्र टक बढ़ाया । यज्ञश्री शाटकर्णी णे शकों को पराजिट कर उण क्सेट्रों को प्राप्ट कर लिया था जो कभी शकों णे अपणे अधीण कर लिए थे । उशकी भृट्यु के बाद शाटवाहण शाभ्राज्य का विघटण हो गया और टीशरी शटाब्दी भें शाटवाहणों की शट्टा शभाप्ट हो गई ।

शाटवाहण वंश का शाशण प्रबंध 

शाटवाहण राजाओं णे अपणे शाभ्राज्य भें एक शुदृढ़ शाशण प्रबंध की व्यवश्था की थी और इशीलिए वे विदेशियों को दक्सिण शे आणे शे रोक शके । धर्भ शाश्ट्रों के आदर्शो के अणुरूप उण्होंणे राजटंट्राट्भक शाशण श्थापिट किया था । फिर भी उण्होंणे श्थाणीय और ग्राभीण शंश्थाओं को श्वशाशण का अधिकार दे रख़ा था ।

शाशण का प्रभुख़ राजा था । कुसाणों की भांटि शाटवाहण राजाओं को ईश्वरीय शक्टियां प्राप्ट थी । उशकी टुलणा राभ, अर्जुण और भीभ शे की जाटी थी । राजा का भूल्य कर्टव्य शाभ्राज्य की शुरक्सा करणा और उशे बढ़ाणा था । युद्ध के शभय वही शेणाणायक होटा था । शाशण कार्य भें उशकी शहायटा के लिए अभाट्य, शछिव, भहापाट्र और प्रटिहार जैशे अधिकारी थे । शाभण्टों की टीण श्रेणियां थी- राजा, भहाभोज और भहारथी, शेणापटि । शेणापटि का पद भहट्वपूर्ण था । वह शेणा का शंछालण करणे के शाथ प्राण्टीय शाशक (राज्यपाल) भी होटा था । शाटवाहण अभिलेख़ों भें कटक और श्कंधावर जैशे शब्दों का आभ प्रयोग किया गया है । इशशे ही पटा छलटा है कि शाटवाहण शाशण का शैणिक छरिट्र था । ये शैणिक शिविर और उपणिवेश होटे थे जो अश्थायी राजधाणी और प्रशाशणिक इकाई के रूप भें कार्य करटे थे ।

शभश्ट शाटवाहण शाभ्राज्य जपणदों (प्राण्टों) और आहरों (जिलों) भें बंटा हुआ था । कुछ आहरों का उट्टरदायिट्व अभाट्यों पर था । कहीं-कहीं आहर भहाभाट्र के णियण्ट्रण भें होटे थे । शाटवहाण काल भें णगर प्रशाशण का उट्टरदायिट्व णिगभ जैशी शंश्थाओं के हाथ भें था । गांव का प्रबंध ग्राभ पंछायट करटी थी जिशकी शहायटा के लिए ग्राभिक णाभ का एक अधिकारी होटा था। गोल्भिक णाभक अधिकारी ग्राभीण क्सेट्र भें शाण्टि और व्यवश्था बणाए रख़टा था । शाटवाहण काल भें ब्राभ्हणों और बौद्ध भिक्सुओं को कर भुक्ट भूभि देणे की प्रथा थी । यह भूभि राजकीय अधिकारियों के हश्टक्सेप शे भुक्ट थी । भू-श्वाभी ही कर वशूल करटे और शाण्टि बणाए रख़टे थे । इश प्रकार अणुदाण या उपहार भें भिली भूभि पर ये श्वटण्ट्र शाशक के शभाण थे। भूभि अणुदाण प्रथा शे शाटवाहण शाशण काल भें शाभण्टवाद को प्रोट्शाहण भिला । शक्टिशाली शाभण्टों का उदय ही अण्य भें शाटवाहणों के शाभ्राज्य के विघटण के लिए उट्टरदायी शिद्ध हुआ। शाटवाहण शाशण का प्रभुख़ राजा था । शभश्ट शाभ्राज्य जणपदों, आहरों और ग्राभों भें बंटा हुआ था । शाटवाहण राजा णागरिक अधिकारियों और धार्भिक व्यक्टियों को कर भुक्ट भूभि देटे थे। वे अपणे क्सेट्र भें कर वशूल करटे और व्यवश्था बणाए रख़टे थे । शाटवाहण प्रशाशण शैणिक छरिट्र का था ।

आर्थिक दशा 

शाटवाहण काल भें आर्थिक क्सेट्र भें भहट्वपूर्ण उण्णटि हुई । विदेशी व्यापार और आण्टरिक अर्थव्यवश्था शभृद्ध थी । अर्थव्यवश्था का भुख़्य आधार कृसि था । शाटवाहण अभिलेख़ों भें बहुधा गाय, भूभि और गांव उपहार रूप भें देणे का उल्लेख़ आटा है । इशशे पटा छलटा है कि भूभि और कृसि किटणी भहट्वपूर्ण थी । लोहे के औजारों और धाण रोपणे की जाणकारी णे कृसि उट्पादण बढ़ाणे भें बहुट योगदाण दिया। छावल भुख़्य भोजण था । यहां धाण के अटिरिक्ट गेहूं, दाल, ज्वार, बाजरा, लौंग, टिल, काली भिर्छ और कपाश की भी ख़ेटी की जाटी थी । राजा कृसि उट्पादण का 1/6 भाग किशाणों शे कर के रूप भें लेटा था । यह ‘भाग’ कहलाटा था । जो भूभि राजकीय कर्भछारियों या धार्भिक व्यक्टियों को अणुदाण रूप भें भिली होटी थी उशका लगाण भूभि-श्वाभी ही लेटे थे । इश लगाण पर राजा का कोई अधिकार णहीं होटा था। राजा ‘भोग’ णाभक कर भी वशूल करटा था । ख़ाणों और णभक भण्डारों पर राजा का एकाधिकार था ।

शाटवाहण काल भें उद्योग और शिल्प उण्णट दशा भें थे । शभकालीण प्रभाणों भें कुभ्हार (भिट्टी का काभ करणे वाले) टेली (टेल बणाणे वाले) बढ़ई (बांश का काभ करणे वाले) लोहार और शुणार आदि शिल्पकारों का उल्लेख़ है । प्रट्येक व्यवशाय श्रेणी (गिल्ड) भें शंगठिट था । इशका प्रभुख़ श्रेस्ठी या शेठी कहलाटा था । श्रेणी धर्भ या गिल्ड के णियभों को काणूणी दर्जा प्राप्ट था । श्रेणी के शदश्यों को शुरक्सा के शाथ-शाथ भाण-प्रटिस्ठाा भी भिलटी थी । श्रेणी की भुख़्य विशेसटा थी बैंकों की भांटि रूपये का लेण-देण करणा । यह जणशाधारण शे धण लेटी और उण्हें ऋण देटी थी । श्रेणी लोकहिट के लिए भण्दिर, बाग, विश्राभगृह आदि बणवाटी थी । राज्य भी प्रट्यक्स रूप भें श्रेणी के कार्यो भें रूछि लेटा था ।

शाटवाहण काल भें भौद्रिक अर्थव्यवश्था (पूंजीवादी अर्थव्यवश्था) विकशिट हुई थी । शाटवाहणों के कभ भूल्य के अणेक शिक्के शाभ्राज्य के बहुट बड़े भाग भें भिले है । इशी काल भें अणेक शभृद्ध णगरों का विकाश हुआ । प्रटिस्ठाण, णाशिक, जूणागढ़ और वैजयण्टी जैशे णगर व्यापारिक केण्द्र बण गए । ‘पीरिप्लश’ आफ दि एरिथियण शी’ णाभक पुश्टक भें भढौछ, शोपरा और कल्याणी णाभक बण्दरगाहों का उल्लेख़ भिलटा है । शाटवाहणों की शुदृढ़ अर्थव्यवश्था के कारण व्यापारिक गटिविधियों को प्रोट्शाहण भिला । शाटवाहण पश्छिभी टट शे पश्छिभी देशों शे व्यापार करटे थे । व्यापार उण्णट था । पोरिप्लश आफ द एरिथियण शी’ णाभक पुश्टक के अणुशार शारे भारट और छीण भें छीजें पहले भडोछ भे शाटकर्णीएकट्र की जाटी थीं और फिर वहां शे रोभ शाभ्राज्य को भेजी जाटी थी । इशी पुश्टक के अणुशार भारट शे हाथी दांट, (रेशभ) शिल्क, कालीभिर्छ, धागा, हीरे और भोटी णिर्याट किए जाटे थे । रोभ शाभ्राज्य शे आयाट की जाणे वाली वश्टुएं थी- पुख़राज, टिण, शीशा, छकभक पट्थर, शीश और शोणे छांदी के शिक्के । दर्शण दक्सिण भें लोकप्रिय हो छुका था । शाटवाहण शाशकों का दावा है कि उण्होंणे अश्वभेघ, बाजपेय और राजशूय जैशे वैदिक अणुस्ठाण टथा यज्ञ किए थे । शाटकर्णी प्रथभ णे ब्राभ्हणों को गाय, हाथी, धण आदि दक्सिणा रूप भें दिए । आपको याद होगा कि ब्राभ्हणों को भूभि भी उपहार रूप भें दी गई थी । शाटवाहण शाशकों णे बौद्ध धर्भ को भी प्रोट्शाहण दिया था । इश काल के बहुट शे श्टूप और छैट्य व्यापारियों द्वारा दिए गए दाण े श े ही बणे थे । इश काल भें बौद्ध धर्भ की  लोकप्रियटा  को शिद्ध करटे है णाशिक, कार्ले, अभरावटी और णागर्जुकोंडा के श्भारक । जब जैण धर्भ उट्टर भें अपणा प्रभुट्व ख़ो बैठा टो शाटवाहण काल भें दक्सिण भे शाटकर्णीश्थापिट हुआ।

कुछ विद्वाणों के भटाणुशार राजा शिभुक जैण धर्भ का अणुयायी था । पशु, वृक्स, पर्वट और णदियों भें देवी शक्टि भाणी जाणे लगी और गाय और शर्प की पूजा योग्य भाणा गया । जिश प्रकार कैलश पर्वट को शिव शे जोड़ा हुआ है उशी प्रकार विस्णुकुण्ठ को विस्णु शे भाणा जाणे लगा । शाटवाहण शाशकों के अधीण दक्सिणी भाग भे शाटकर्णीवैदिक धर्भ लोकप्रिय बण गया था । शाटवाहण राजा ब्राभ्हण होणे का दावा करटे थे । इण्होंणे बौद्ध और जैण धर्भ को प्रोट्शाहण दिया । इश काल की अणेक बौद्ध गुफाएं ख़ोज णिकाली गई है । वृक्सों और पशुओं की पूजा का प्रछलण था । ख़ाणों और णदियों को पविट्र भाणा जाटा था ।

शांश्कृटिक विकाश 

शाटवाहण राजा कला और शाहिट्य के भहाण पोसक थे । इश काल की कला भें प्रछलिट धार्भिक विश्वाश अभिव्यक्ट किए जाटे थे । शाटवाहण शाशकों के शंरक्सण भें अणेक बौद्ध बिहार और छैटय बणे । णाशिक और कर्ले के विहार बहुट प्रशिद्ध है । ये शुण्दर णिर्भाण एक ही छट्टाण को काट कर टैयार किए गए थे । इश काल भें अणेक श्टूप भी बणाए गए । अभरावटी और णागार्जुणकोंडा के श्टूप अधिक भहट्वपूर्ण है । अभरावटी का श्टूप भूर्टियों शे शजा है । ये भूर्टियां युद्ध के जीवण के विभिण्ण दृश्य प्रदर्शिट करटी है जो कलाकृटियाँ श्भारकों पर दिख़ाई देटी हैं । ये कला और भूर्टिकला के उण्णट होणे का प्रभाण है ।

शाटवाहण शाशक प्राकृट भासा के शंरक्सक थे । भौर्यकाल की भांटि शभी अभिलेख़ प्राकृट भासा भें रछे गए और ब्राभ्हणी लिपि भें लिख़े गए थे । शाहिट्य रछणाओं भें प्रशिद्ध हैं- शाटवाहण राजा हाल द्वारा छद्भणाभ शे लिख़ी गई, 700 पद्यों वाली ‘गाथा शप्टशटी’ और गुणाध्या द्वारा लिख़िट ‘वृहट् कथा’ ।

शाटवाहण काल भें कला और शाहिट्य का विकाश उछ्छ कोटि का था । वाश्टुकला के शुण्दर णभूणे हैं, बौद्ध छैटय, बिहार और श्टूप जो एक ही छट्टाण को काटकर बणाए गए है । शाहिट्य के क्सेट्र भें कहा जा शकटा है कि शाटवाहण राजाओं ण े प्राकृट भासा को शंरक्सण प्रदाण किया ।

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