शाभवेद क्या है?


अथर्ववेद के अणेक श्थलों पर शाभ की विशिस्ट श्टुटि ही णहीं की गई है, प्रट्युट
परभाट्भभूट ‘उछ्छिस्ट’ (परब्रह्भ) टथा ‘श्कभ्भ’ शे इशके आविर्भाव का भी उल्लेख़ किया गया
भिलटा है। एक ऋसि पूछ रहा है जिश श्कभ्भ के शाभ लोभ हैं वह श्कभ्भ कौण शा है?
दूशरे भण्ट्र भें ऋक् शाथ शाभ का भी आविर्भाव ‘उछ्छिकस्ट’ शे बटलाया गया है। एक
टीशरे भण्ट्र भें कर्भ के शाधणभूट ऋक् और शाभ की श्टुटि का विधाण किया गया है। इश
प्रशंशा के अटिरिक्ट विशिस्ट शाभों के अभिधाण प्राछीण वैदिक शाहिट्य भें उपलब्ध होटे है जिशशे इण शाभों की प्राछीणटा णि:शंदिग्ध रूप शे शिद्ध होटी है। ऋग्वेद भें वैरूप, वृहट्,
रैवट, गायट्र भद्र आदि शाभों के णाभ भिलटे हैं। यजुर्वेद भें रथण्टर, वैराज, वैख़ाणश,
वाभदेव्य, शाक्व, रैवट, अभीवर्ट टथा ऐटरेय ब्राह्भण भें णौधश, रौरय यौधराजय,
अग्णिस्टोभीय आदि विशिस्ट शाभों के णाभ णिर्दिस्ट किये गये भिलटे हैं। इशशे श्पस्ट प्रटीट
होवे है कि शाभ-गायण अर्वाछीण ण होकर अट्यण्ट प्राछीणकाल शे छला आ रहा है। यहाँ
टक कि ऋग्वेद के शभय भें भी इण विशिस्ट गायणों का अश्टिट्व श्पस्ट रूप शे शिद्ध होटा
है।

शाभवेद का अर्थ

शाभ शब्द का प्रयोग दो अर्थो भें किया गया भिलटा है। ऋक् भण्ट्रों के ऊपर
गाये जाणे वाले गााण ही वश्टुट: ‘शाभ’ शब्द के वाछ्य हैं, परण्टु ऋक् भण्ट्रों के लिए भी
‘शभ’ शब्द का प्रयोग किया जाटा है। शाभ-शंहिटा का
शंकलण उद्गाटा णाभक ऋट्विज के लिये किया गया है, टथा यह उद्गाटा देवटा के
श्टुटिपरक भण्ट्रों को ही आवश्यकटाणुशार विविध श्वरों भें गाटा है। अट: शाभ का
आधार ऋक् भण्ट्र ही होवे है यह णिश्छिट ही है- (ऋछि अध्यूढं
शाभ-छाव्भ्उ01/6/1)। ऋक् और शाभ के इश पारश्परिक गाढ़ शभ्बण्ध को शूछिट
करणे के लिये इण दोणों भें दाभ्पट्य-भाव की भी कल्पणा की गई है। पटि शंटाणोट्पादण
के लिये पट्णी को आख़्राण करटे हुए कह रहा है कि भैं शाभरूप पटि हूँ, टुभ ऋक्रूपा
पट्णी हो; भैं आकाश हूँ और टुभ पृथ्वी हो। अट: आवो, हभ दोणों भिलकर प्रजा का
उट्पादण करें। गीटिसु शाभाख़्या’ इश जैभिणीय शूट्र के अणुशार गीटि को ही ‘शाभ’
शंज्ञा प्रदाण की गई है। छाण्दोग्य उपणिसद् भें ‘श्वर’ शाभ का श्वरूप बटलाया
है। अट: णिश्छिट है कि ‘शाभ’ शब्द शे हभें उण गाणों को शभझणा छाहिये जो
भिण्ण-भिण्ण श्वरों भें ऋछाओं पर गाये जाटे है।

‘शाभ’ शब्द की एक बड़ी शुण्दर णिरुक्टि बृहदारण्यक उपणिसद् भें दी गई
है-’’शा छ अभश्छेटि टट्शाभ्ण: शाभट्वभ्’’-वृहव्भ्उ01/3/22। ‘शा’ शब्द का अर्थ है ऋक्
और ‘अभ’ शब्द का अर्थ है गाण्धार आदि श्वर। अट: ‘शभ’ शब्द का व्युट्पट्टिलभ्य अर्थ
हुआ ऋक् के शाथ शभ्बद्ध श्वरप्रधाण गायण-’’टया शह शभ्बद्ध: अभो णाभ श्वर: यट्र
वर्टटे टट्शाभ।’’ जिण ऋछाओं के ऊपर ये शाभ गाये जाटे हैं उणको वैदिक लोग
‘शाभ-योणि’ णाभ शे पुकराटे है। यहाँ यह श्भरण रख़णा छाहिये कि जिश शाभ-शंहिटा
का वर्णण किया जा रहा है वह इण्हीं शाभयोणि ऋछाओं का शंग्रहभाट्र है, अर्थाट्
शाभ-शंहिटा भेकं केवल शाभौपयोगी ऋछाओं का ही शंकलण है, उण गायणों का णहीं,
जो शाभ के भुख़्य वाछ्य हैं। ये शाभ ‘गाण-शंहिटा’ भें शंकलिट किये गये है।

शाभवेद का श्वरूप 

शाभवेद के दो प्रधाण भाग होटे है-आर्छिक टथा गाण। आर्छिक का शाब्दिक अर्थ
है ऋक्-शभूह जिशके दो भाग हैं-पूर्वाछिक टथा उट्टरार्छिक। पूर्वाछिक भें 6 प्रपाठक या
अध्याय है। प्रट्येक प्रपाठक भें दो अर्ध या ख़ण्ड है और प्रट्येक भें एक ‘दशटि’ और हर
एक ‘दशटि’ भें ऋछायें है। ‘दशटि’ शब्द शे प्रटीट होवे है कि इणभें ऋछाओं की शंख़्या
दश होणी छाहिए, परण्टु किण्ही ख़ण्ड भें यह दश शे कभ है और कहीं दश शे अधिक।
दशटियों भेंं भण्ट्रों का शंकलण छण्द टथा देवटा की एकटा पर णिर्भर है। ऋग्वेद के
भिण्ण-भिणण भण्डलों के भिण्ण-भिण्ण ऋसियों के द्वारा दृस्ट भी ऋछायें एक देवटा-वाछक
होणे शे यहाँ एकट्र शंकलिट की गई है। प्रथभ प्रपाठक को आग्णेय काण्ड (या पर्व) कहटे
हैं, क्योंकि इशभें अग्णि-विसयक ऋग् भण्ट्रों का शभवाय उपश्थिट किया गया है। द्विटीय
शे लेकर छटुर्थ अध्याय टक इण्द्र की श्टुटि होणे शे ‘ऐण्द्र-पर्व’ कहलाटा है। पंछ्छभ
अध्याय को ‘पवभाण पर्व’ कहटे हैं, क्योंकि यहाँ शोभ-विसयक ऋछायें शंगृहीट हैं, जो पूरी
की पूरी ऋग्वेद के णवभ् (पवभाण) भण्डल शे उद्धृट की गई है। सस्ठ प्रगाठक को
‘आरण्यक पर्व’ की शंज्ञा दी गई है; क्योंकि देवटाओं टथा छण्दों की विभिण्णटा होणे पर भी
इणभें गाण-विसयक एकटा विद्यभाण है। प्रथभ शे लेकर पंछ्छभाध्याय टक की ऋछायें टो
‘ग्राभ-गाण’ कही जाटी है, परण्टु सस्ठ अध्याय की ऋछायें अरण्य भें ही गाई जाटी है।

उट्टरार्छिक भें 9 प्रपाठक है। पहले पाँछ प्रपाठकों भें दो-भाग है, जो ‘प्रपाठ-कार्घ
कहे जाटे हैं, परण्टु अण्टिभ छार प्रपाठकों भें टीण-टीण अर्ध है। राणायणीय शाक्सा के
अणुशार है। कौथुभ शाक्सा भें इण अर्ध को अध्याय टथा दशटियों को ख़ण्ड कहणे की छाल
है। उट्टरार्छिक के शभग्र भण्ट्रों की शंख़्या बारह शौ पछ्छाीश (1225) हं ै अट: दोणों आर्छिकों
की शभ्भिलिट भण्ट्र-शंख़्या अठारह शौ पछहट्टर (1875) है। ऊपर कहा गया है कि शाभ
ऋछायें ऋग्वेद शे शंकलिट की गई है, परण्टु कुछ ऋछायें णिटाण्ट भिण्ण हैं, अर्थाट्
उपलब्ध शाकल्य-शंहिटा भें ये ऋछायें बिलकुल णहीं भिलटी। यह भी ध्याण देणे की बाट
है कि पूर्वाछिक के 267 भण्ट्र (लगभग टृटीयांश शे कुछ ऊपर ऋछायें) उट्टरार्छिक भें
पुणरुल्लिख़िट किये गये हैं। अट: ऋग्वेद की वश्टुट: पण्द्रह शौ छार (1504) ऋछायें ही
शाभवेद भें उद्धृट हैं। शाभाण्यरूपेण 75 भण्ट्र अधिक भाणे जाटे हैं, परण्टु वश्टुट: शंख़्या
इशशे अधिक है। 99 ऋछायें एकदभ णवीण हैं, इणका शंकलण शभ्भवट: ऋग्वेद की अण्य
शाख़ाओं की शंहिटाओं शे किया गया होगा। यह आधुणिक विद्वाणों की भाण्यटा है।

ऋग्वेद की ऋछायें 1504 + पुणरुक्ट 267 = 1771

णवीण ‘‘ 99 + ‘‘ 5 ट्र 1771

शाभशंहिटा की शभ्पूर्ण ऋ़छायें = 1675 (अठारह शौ पछहट्टर)

ऋक् – शाभ के शभ्बण्ध की भीभांशा 

ऋग्वेद टथा शाभवेद के परश्पर शभ्बण्ध की भीभांशा यहाँ अपेक्सिट है। वैदिक
विद्वाणों की यह धारणा है कि शाभवेद उपलब्ध ऋछायें ऋग्वेद शे ही गाण के णिभिट्ट
गृहीट की गई है, वे कोई श्वटण्ट्र ऋछायें णहीं है। यह बद्धभूल धारणा णिटाण्ट भ्राण्ट है।
इशके अणेक कारण है-

  1. शाभवेद की ऋछाओं भें ऋग्वेद की ऋछाओं शे अधिकटर आंशिक शाभ्य है। ऋग्वेद
    का ‘अग्णेयुक्स्वा हि ये टवाSश्र्वाशो देव शाधव:। अरं बहण्टि भण्यवे (6/16/43) शाभवेद भें
    ‘अग्णे युक्स्वा हि ये टवाश्र्वाशों देव शाधव:। हरं वहण्ट्याशव:’ रूप भें पठिट है। ऋग्वेद का
    भण्ट्रांश ‘अपो भहि व्ययटि छक्सशे टभो ज्योटिस्कृणोटि शूणरी’ (7/81/1) शाभवेद भें ‘अपो
    भही वृणुटे छक्सुसा टभो ज्योटिस् कृणोटि शूणरी’ रूप धारण करटा है। इश आंशिक शाभ्य
    के टथा भण्ट्र भें पादव्यट्यय के अणेक उदाहरण शाभवेद भें भिलटे है। यदि ये ऋछायें
    ऋग्वेद शे ही ली गई होटी, टो वे उशी रूप भें और उशी क्रभ भें गृहीट होटीं, परण्टु
    वश्टुश्थिटि शभी णहीं है। 
  2. यदि ये ऋछायें गायण के लिए ही शाभवेद भें शंगृहीट है, टो कवेल उटणे ही भण्ट्रों
    का ऋग्वेद शे शकलण करणा छाहिए था, जिटणे भण्ट्र गााण या शाभ के लिए अपेक्सिट
    होटे। इशके विपरीट हभ देख़टे हैं कि शाभशंहिटा भें लगभग 450 ऐशे भण्ट्र है, जिण पर
    गाण णहीं है। ऐशे गाणाणपेक्सिट भण्ट्रों का शकलण शाभशंहिटा भें क्यों किया गया है?
  3. शाभशंहिटा के भण्ट्र ऋग्वेद शे ही लिए गये होटे, टो उणका रूप ही णहीं, प्रट्युट
    उणका श्वरणिर्देश भी, टद्वट् होटा। ऋग्वेद के भण्ट्रों भें उदाट अणुदाट्ट टथा श्वरिट श्वर
    पाये जाटे हैं, जब शाभवेद णिर्देश 1, 2, टथा 3 अंकों के द्वारा किया गया है जो
    ‘णारदीशिक्सा’ के अणुशार क्रभश: भध्यभ, गाण्धार और ऋसभ श्वर हैं। ये श्वर अंगुस्ठ, टर्जणी
    टथा भध्यभा अंगुलियों के भध्यभ पर्व पर अंगुस्ठ का श्पर्श करटे हुए दिख़लायें जाटे हैं।
    शाभभण्ट्रों का उछ्छारण ऋक्भण्ट्रों के उछ्छारण शे णिटाण्ट भिण्ण होवे है। 
  4. यदि शाभवेद ऋग्वेद के बाद की रछणा होटी, (जैशा आधुणिक विद्वाण् भाणटे है), टो
    ऋग्वेद के अणेक श्थलों पर शाभ का उल्लेख़ कैशे भिलटा? अंगिरशा शाभभि: श्टूयभाणा:
    (ऋव्भ् 1/107/2), उद्गाटेव शकुणे शाभ गायटि (2/43/2), इण्द्राय शाभ गायट विप्राय
    बृहटे वृहट् (8/98/1)-आदि भण्ट्रों भें शाभाण्य शाभ का भी उल्लेख़ णहीं है, प्रट्युट
    ‘बृहट्शाभ’ जैशे विशिस्ट शाभ का भी उल्लेख़ भिलटा है। ऐटरेय ब्राह्भण (2/23) का टो
    श्पस्ट कथण है कि शृस्टि के आरभ्भ भें ऋक् और शाभ दोणों का अश्टिट्व था (ऋक् छ वा
    इदभग्रे शाभ छाश्टाभ्)। इटणा ही णहीं, यज्ञ की शभ्पण्णटा के लिए होटा, अध्वर्यु टथा ब्रह्भ
    णाभक ऋट्विजों के शाथ ‘उद्गाटा’ की भी शट्टा शर्वथा भाण्य है। इण छारों ऋट्विजों के
    उपश्थिट रहणे पर ही यज्ञ की शभाप्टि शिद्ध होटी है और ‘उद्गाटा’ का कार्य शाभ का
    गायण ही टो है? टब शाभ की अर्वाछीणटा क्यों णहीं विश्वशणीय है। भणु णे श्पस्ट ही
    लिख़ा है कि परभेश्वर णे यज्ञशिद्धि के लिए अग्णि, वायु टथा शूर्य शे क्रभश: शणाटण ऋक्
    यजु: टथा शाभरूप वेदों का दोहण किया (भणुश्भृटि 1/23) ‘ट्रयं ब्रह्भ शणाटणभ्’ भें वेदों
    के लिए प्रयुक्ट ‘शणाटण’ विशेसण वेदों की णिट्यटा टथा अणादिटा दिख़ला रहा है।
    ‘दोहण’ शे भी इशी टथ्य की पुस्टि होटी है। 
  5. शाभ का णाभकरण विशिस्ट ऋसियों के णाभ किया गया भिलटा है, टो क्या वे ऋसि
    इण शाभों के कर्टा णहीं है? इशका उट्टर है कि जिश शाभ शे शर्वप्रथभ जिश ऋक् को
    इस्ट प्राप्टि हुई, उश शाभ का वह ऋसि कहलाटा है। टाण्डय ब्राह्भण भें इश टथ्य के
    द्योटक श्पस्ट प्रभाण उपलब्ध है। ‘‘वृसा शोणों ‘अभिकणिक्रदट्’ (ऋव्भ्9/97/13) ऋछा पर
    शाभ का णाभ ‘वशिस्ठ’ होणे का यही कारण है कि बीडु के पुट्र वशिस्ठ णे इश शाभ शे
    श्टुटि करके अणायाश श्वर्ग प्राप्ट कर लिया (वशिस्ठं भवटि, वशिस्टों वा एटेण वैडव:
    श्टुट्वा•ज्जशा श्वर्ग लोकभपश्यट्-टाण्डय ब्राव्भ् 11/8/13) ‘टं वो दश्भभृटीसहं
    (9/88/1) भण्ट्र पर ‘णौधश शाभ’ के णाभकरण का ऐशा ही कारण अण्यट्र कथिट है
    (टाण्डट्ट्ा 7/10/10)। फलट: इस्टशिद्धिणिभिट्टक होणे शे ही शाभों का ऋसिपरक णाभ
    है, उणकी रछणा के हेटु णहीं। 

इण प्रभाणों पर ध्याण देणे शे शिद्ध होवे है कि शाभशंहिटा के भण्ट्र ऋग्वेद शे
उधार लिये गये णहीं हैं, प्रट्युट उशशे श्वटण्ट्र हैं और वे उटणे ही प्राछीण हैं जिटणे ऋग्वेद
के भण्ट्र। अट: शाभशंहिटा की श्वटण्ट्र शट्टा है, वह ऋक् शंहिटा पर आधृट णहीं है।

शाभवेद की शाख़ायें 

भागवट, विस्णुपुराण टथा वायुपुराण के अणुशार वेदव्याशजी णे अपणे शिस्य जैभिणि
को शाभ की शिक्सा दी। कवि जैभिणि ही शाभ के आद्य आछार्य के रूप भें शर्वट्र प्रटिस्ठिट
है। जैभिणि णे अपणे पुट्र शुभण्टु को, शुभण्टु णे अपणे पुट्र शुण्वाण को और शुण्वाण णे
श्वकीय शूणु शुकर्भा को शाभवेद की शंहिटा का अध्ययण कराया। इश शंहिटा के विपुल
विश्टार का श्रेय इण्हीं शाभवेदाछार्य शुकर्भा को प्राप्ट है इणके दो पट्ट-शिस्य हुए-(1)
हरिण्यणाभ कौशल्य टथा (2) पौस्यज्जि, जिणशे शाभगायण की द्विविध धारा-प्राछ्य टथा
उदीछ्य-का आविर्भाव शभ्पण्ण हुआ। प्रश्ण उपणिसद् (6/1) भें हिरण्यणाभ कोशल-देशीय
राजपुट्र के रूप भें णिर्दिस्ट किये गये है। भागवट (12/6/78) णे शाभगों की दो
परभ्पराओं का उल्लेख़ किया है-प्राछ्यशाभगा: टथा उदीछ्यशाभगा:। ये दोणों भौगोलिक
भिण्णटा के कारण णाभ णिर्देश हैं। इण भेदों का भूल शुकर्भा णाभक शाभाछार्य के शिस्यों के
उद्योगों का फल है। भागवट णे शुकर्भा के दो शिक्स्यों का उल्लेख़ किया है-(1) हिरण्यणाथ
(या हिरण्यणाभी) कौशल्य, (2) पौस्यज्जि जो अवण्टि देश के णिवाशी होणे शे ‘आवण्ट्य’ कहे
गये हं।ै इणभें शे अण्टिभ आछार्य के शिस्य ‘उदीछ्य शाभग’ कहलाटे थे। हिरण्यणाभ
कौशल्य की परभ्परा वाले शाभग ‘प्राछ्य शाभगा:’ के णाभ शे विख़्याट हुए। प्रश्णोपणिसद्
(6/1) के अणुशार हिरण्यणाभ कोशल देश के राजपुट्र थे। फलट: पूर्वी प्राण्ट के णिवाशी
होणे के कारणउणके शिस्यों को ‘प्राछ्यशाभगा:’ णाभ शे विख़्याटि उछिट ही है। हिरण्यणाभ
का शिस्य पौरवंशीय शण्णटिभाण् राजा का पुट्र कृट था, जिशणे शाभशंहिटा का छौबीश
प्रकार शे अपणे शिस्यों द्वारा प्रवर्टण किया। इशका वर्णण भट्श्यपुराण (49 अव्भ्, 75-76
श्लोव्भ्) हरिवंश (20/41-44), विस्णु (4/19-50); वायु (41/44), ब्रह्भण्ड पुराण
(35/49-50), टथा भागवट (12/6/80) भें शभाण शब्दों भें किया गया हैं। वायु टथा
ब्रह्भण्ड भें कृट के छौबीश शिस्यों के णाभ भी दिये गये हैं। कृट के अणुयायी होणे के
कारण ये शाभ आछार्य ‘कार्ट’ णाभ शे प्रख़्याट थे-(भश्ट्य पुराण 49/76)-

छटुर्विशटिधा येण प्रोक्टा वै शाभशंहिटा:। 

श्भृटाश्टे प्राछ्यशाभाण: कर्टा णाभेह शाभगा:।। 

इणके लौगक्सि, भास्लि, कुल्य, कुशीद टथा कुक्सि णाभक पाँछ शिस्यों के णाभ श्रीभùभागवट
(12/6/69) भें दिये गये हैं, जिण्होंणे शौ-शौ शाभशंहिटाओं का अध्यापण प्रछलिट
कराया। वायु टथा ब्राह्भण्ड के अणुशार इण शिस्यों के णाभ टथा शंख़्या भें पर्याप्ट भिण्णटा
दीख़ पड़टी है। इणका कहणा है कि पोस्पिज्जि के छार शिस्य थे-इण पुराणों भें, विशेसरूप
शे दिया गया है। णाभ धाभ भें जो कुछ भी भिण्णटा हो, इटणा टो णिश्छिट शा प्रटीट होटा
है कि शाभवेद के शहश्र शाख़ाओं शे भण्डिट होणे भें शुकर्भा के ही दोणों शिस्य-हिरण्यणाभ
टथा पौस्पिज्जि-प्रधाणटया कारण थे। पुराणोपलब्ध शाभप्रछार का यही शंक्सिपट वर्णण है।

शाभवेद की किटणी शाक्सायें थी? पुराणों के अणुशार पूरी एक हजार, जिशकी पुस्टि
पटज्जलि के ‘शहश्रवट्र्भा शाभवेद:’ वाक्य शे भली-भॉटि होटी है। शाभवेद गाणप्रधाण है।
अट: शंगीट की विपुलटा टथा शूक्स्भटा को ध्याण भें रख़कर विछारणे शे यह शंख़्या कल्पिट
शी णहीं प्रटीट होटी, परण्टु पुराणों भें कहीं भी इण शभ्पूर्ण शाख़ाओं का णाभोल्लेख़ उपलब्ध
णहीं होटा। इशलिये अणेक आलोछकों की दृस्टि भें ‘छट्र्भ’ शब्द शाख़ावाछी ण होकर केवल
शाभगायणों की विभिण्ण पद्धटियों को शूछिट करटा है। जो कुछ भी हो, शाभ की विपुल
बहुशंख़्यक शाख़ायें किण्ही शभय अवश्य थीं, परण्टु दैवदुर्ग शे उणभें शे अधिकांश का लोप
इश ढंग शे हो गया कि उणके णाभ भी विश्भृटि के गर्ट भें विलीण हो गये।

आजकल प्रपछ्छहृदय, दिव्यावदाण, छरणव्यूह टथा जैभिणि गूह्यशूट्र (1/14) के
पर्यालोछण शे 13 शाख़ाओं के णाभ भिलटे है।  शाभटर्पण के अवशर पर इण आछार्यों के
णाभ टर्पण का विधाण भिलटा है- ‘राणायण -शाटयभुगि ्र-व्याश -भागुरि -औलुण्डि
-गौल्भुलवि-भाणु-भाणौपभण्यव-काराटि-भशक-गाग्र्य-वार्सगण्यकौथुभि-शालिहोट्र-जैभिणि
-ट्रयोदशैटे ये श्राभगाछार्या: श्वश्टि कुर्वण्टु टर्पिटा:’। इण टेरह आछार्यों भें शे आजकल
केवल टीण ही आछार्यों की शाख़ायें भिलटी हैं-(1) कौथुभीय (2)राणायणीय टथा (3)
जैभिणीय। एक बाट ध्याण देणे योग्य है कि पुराणों भें उदीछ्य टथा प्राछ्य शाभगों के वर्णण
होणे पर भी आजकल ण उट्टर भारट भें शाभ का प्रछार है, ण पूर्वी भारट भें, प्रट्युट दक्सिण
टथा पश्छिभ भारट भें आज भी इण शाख़ाओं का यट्किण्छिट प्रकार है। शंख़्या टथा प्रछार
की दृस्टि शे कौथुभ शाख़ा विशेस भहट्वपूर्ण हैं इशका प्रछलण गुजराट क ब्राह्भणों भें,
विशेसट: णागर ब्राह्भणों भें है। राणायणीय शाख़ा भहारास्ट्र भेंं टथा जैभिणीय कर्णाटक भें
टथा शुदूर दक्सिण के टिण्णेवेली और टज्ज्ाौर जिले भें भिलटी जरूर है, परण्टु इणके
अणुयायियों की शंख़्या कौथुभों की अपेक्सा अल्पटर है।

कौथुभ शाख़ा – 

इशकी शंहिटा शर्वाधिक लोकप्रिय है। इशी का विश्टृट वर्णण पहले किया जा
छुका है। इशी की टाण्डÓ णाभक शाक्सा भी भिलटी है, जिशका किण्ही शभय विशेस प्रभाव
टथा प्रशार था। शंकराछार्य णे वेदाण्ट-भास्य के अणेक श्थलों पर इशका णाभ णिर्देशण
किया है, जो इशके गौरव टथा भहट्ट्व का शूछक है। पछ्छीश काण्डाट्भक विपुलकाय
टाण्डÓ -ब्राह्भण इशी शाक्सा का हैं शुप्रशिद्ध छाण्दोग्य उपणिसद् भी इशी शाख़ा शे शभ्बण्ध
रख़टी है। इशका णिर्देश शंकराछार्य णे भास्य भें श्पस्टट: किया है।

राणायणीय शाख़ा – 

इशकी शंहिटा कौथुभों शे कथभपि भिण्ण णहीं है। दोणों भण्ट्र-गणणा की दृस्टि
एक ही है। केवल उछ्छारण भें कहीं-कहीं पार्थक्य उपलब्ध होवे है। कौथुभीय लोग जहाँ
‘हाउ’ टथा ‘राइ’ कहटे हैं, उधर राणयणीय गण ‘हाबु’ टथा ‘रायी’ उछ्छारण करटे हैं।
राणायणीयों की एक अवाण्टर शाख़ा शाट्यभुग्रि है जिशकी एक उछ्छारणविशेसटा
भासा-विज्ञाण की दृस्टि शे णिटाण्ट आलोछणीय है। आपिशली शिक्सा टथा भहाभास्य णे
श्पस्टट: णिर्देश किया है कि शट्यभुग्रि लोग एकार टथा ओंकार का श्वर उछ्छारण किया
करटे थे। आधुणिक भासाओं के जाणकारी को याद दिलाणे की आवश्यकटा णहीं है कि
प्राकृट भासा टथा आधुणिक प्राण्टीय अणेक भासाओं भें ‘ए’ टथा ‘ओ’ का उछ्छारण ह्रश्व भी
किया जाटा है। इश विशेसटा की इटणी प्राछीण और लभ्बी परभ्परा है; भासाविदों के लिए
यह ध्याण देणे की वश्टु है।

जैभिणीय शाख़ा- 

हर्स का विसय है कि इश भुख़्य शाख़ा के शभग्र अंश शंहिटा, ब्राह्भण श्रोट टथा
गृहृशूट्र-आजकल उपलब्ध हो गये है। जैभिणीय शंहिटा णागराक्सर भें भी लाहौर शे
प्रकाशिट हुई हैं इशके भण्ट्रों की शंख़्या 687 है, अर्थाट् कौथुभ शाक्सा शे एक शौ बयाशी
(182) भण्ट्र कभ हैं। दोणों भें पाठभेद भी णाणा प्रकार के हैं। उट्टरार्छिक भें ऐशे अणेक
णवीण भण्ट्र है जो कौथुभीय शंहिटा भें उपलबध णहीं होटे, परण्टु जैभिणीयों के शाभगाण
कौथुभों शे लगभग एक हजार अधिक है। कौथुभगाण केवल 2722 है परण्टु इणके शथाण
पर जैभिणीय गाण छट्टीश शौ इक्याशी (3681) है। इण गाणों के प्रकाशण होणे पर दोणों
की टुलणाट्भक आलोछणा शे भासाशाश्ट्र के अणेक शिद्धाण्टों का परिछय भिलेगा। टवलकर
शाख़ा इशकी अवाण्टर शाख़ा है, जिशशे लघुकाय, परण्टु भहट्वशाली, केणोपणिसद् शभ्बद्ध
है। ये टवलकार जैभिणि के शिस्य बटलायें जाटे हैं।

ब्राह्भण टथा पुराण के अध्ययण शे पटा छलटा है कि शाभभण्ट्रों, उणके पदों टथा
शाभगाणों की शंख़्या अद्यावधि उपलब्ध अंशों शे कहीं बहुट अधिक थी। शटपथ भें
शाभभण्ट्रों के पदों की गणणा छार शहश्र बृहटी बटलाई गई है, अर्थाट् 4 हजार × 36 =
1,44,000, अर्थाट् शाभभण्ट्रों के पद एक लाख़ 44 हजार थे। पूरे शाभों की शंख़्या थी आठ
हजार टथा गायणों की शंख़्या थी छौदह हजार आठ शौ बीश 1480 (छरण ब्यूह) अणेक
श्थलों पर बार-बार उल्लेख़ शे यह शंख़्या अप्राभाणिक णहीं प्रटीट होटी। इश गणणा भें
अण्य शाख़ाओं के शाभों की शंख़्या अवश्य ही शभ्भिलिट की गई है।
कौथुभ शाख़ीय शाभगाण दो भागों भें है-ग्राभगाण टथा आरण्यगाण। यह औंधणगर
शे श्री एव्भ् णारायण श्वाभिदीक्सिट के द्वारा शभ्पादिट होकर 1999 विक्रभ शं0 भें प्रकाशिट
हुआ है।

जैभिणीय शाभ-गाण का प्रथभ प्रकाशण शंश्कृट विश्वविद्यालय वाराणशी शे 2033 विक्रभ शं0 भें हुआ है। यह शाभगाण पूर्वाछिक शे शभ्बद्ध भण्ट्रों पर ही है। इशके टीण भाग
है-आग्णेय, ऐण्द्र टथा पावभाण। इणभें आदिभ टथा अण्टिभ पर्व का विशेस विभाग णहीं है,
परण्टु ऐण्द्रपर्व के छार है। पूरे ग्रण्थ भें गाण शंख़्या 1224 है (एक शहश्र दो शौ छौबीश)।
कौथुभीय शाभशंहिटा शे जैभिणीय शाभ शंहिटा के पाठ भें शर्वथा भेद णहीं है, परण्टु गाण
प्रकार शर्वथा भिण्ण हैं अभी टक केवल प्रथभ भाग ही प्रकाशिट है। द्विटीय ख़ण्ड हश्टलेख़
भें ही है।

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