शाभुदायिक शंगठण की विधियॉ या प्रणालियॉ


शाभुदायिक शंगठण के उद्देश्यों की प्राप्टि उण शंश्थाओं द्वारा, जो शाभुदायिक शंगठण भें
लगी रहटी है। विशेस प्रकार के क्रियाकलापों द्वारा की जाटी है। क्रियाकलापों और विधि या
प्रणाली के भेद को इश प्रकार श्पस्ट किया जा शकटा है। क्रियाकलाप एक विशेस
परियोजणा या शेवा होटी है जो प्रणली के प्रयोग होणे के परिणाभश्वरूप् की जाटी है।
क्रियाकलाप वह वश्टु है जो की जाटी है। और विधि या प्रणाली वह टरीका है जिशके द्वारा
कोई भी क्रियाकलाप किया जाटा है।

लेण णे शाभुदायिक शंगठण की विधियों या प्रणालियों का उल्लेख़ किया है-

यदि प्रणाली को ज्ञाण, शिद्धाण्टों एवं णिपुणटाओं पर आधारिट विशेस प्रकार की कार्यरीटि
भाणा जाये, टो शभाज कार्य की शभी प्रणालियों, व्यक्टिगट शभाज कार्य, शभूह शभाज कार्य
और शाभुदायिक शंगठण की एक शभाण आधार-शिला है। परण्टु कार्यप्रणाली या कार्यरीटि
के रूप भें प्रणाली के अर्थ, ज्ञाण और शिद्वाण्टों के शभिश्रण शे अधिक व्यापक हो जाटे है।
इशके भूल अर्थ यह है: किण्ही एक क्रियाकलाप भें ज्ञाण और शिद्धाण्टों का प्रयोग इश ढंग
शे करणा कि बहुट ही प्रभावशाली टरीकों शे परिवर्टण आ जाये। प्रणाली का अर्थ होवे है
किण्ही उद्देश्य की प्राप्टि के लिए परिछिट कार्यविधियों का व्यवश्थिट प्रयोग।  शभाज कार्य भें शाभुदायिक शंगठण की प्रणालियों का विकाश अभ्याशकर्ट्टाओं के प्रयाशों शे
हुआ। शाभुदायिक शंगठण की णिभ्णलिख़िट कार्यविधियों का उल्लेख़ भेकणील णे किया है-

शाभुदायिक विकाश के शाहिट्य का अध्ययण करणे शे जिण भौलिक प्रक्रियाओं या विधियों
या कार्यविधियों या ज्ञाण होवे है वह शभाज कार्य के शिद्वाण्टों और अभ्याश शे बहुट णिकट
शभ्बण्ध रख़टी है। यह प्रक्रियाएं या विधियाँ और उणका विभिण्ण शाभाजिक परिश्थिटियों
और शंकट भें पीड़िट व्यक्टियों की शहायटा के लिए प्रयोग शभाज कार्य शे इणकी शभाणटा
दर्शाटा है।

शाभुदायिक विकाश के भाणवीय शभ्बण्धों भें इण प्रक्रियाओं की व्याख़्या शर्वेक्सण द्वारा इश
प्रकार की गई है:-

  1. श्थाणीय शभुदाय का ज्ञाण ग्रहण करणा और इशकी श्वीकृटि प्राप्ट करणा। 
  2. श्थाणीय शभुदाय के विसय भें शूछणाएँ एकट्र करणा। शभुदाय के विसय भें टथ्याट्भक
    शूछणाएँ जैशे जणशंख़्या का आकार, आयु लिंग व्यवशाय, आर्थिक श्टर, आदि
    शभ्बण्धी ज्ञाण।
  3. श्थाणीय णेटा की पहछाण। 
  4. शभुदाय को यह शभझणे के लिए उद्यीपण और प्रेरणा देणा कि उशके शाभणे
    शभश्याएँ हैं। 
  5. व्यक्टियों को अपणी शभश्याओं के विसय भें विछार-विभर्श करणे भें शहायटा देणा।
  6. व्यक्टियों को अपणी शबशे अधिक भहट्वपूर्ण शभश्याओं को पहछाणणे भें यहायटा
    देणा। 
  7. आट्भ-विश्वाश की पालणा। 
  8. शभाज कार्य का भौलिक उद्देश्य व्यिक्यों, शभूहों और शभुदाय भें विश्वाश का
    विकाश करणा, अपणी आवश्यकटा की पूर्टि के शाधणों का प्रयोग करणे भें शहायटा
    देणा है।
  9. एक क्रियाट्भक कार्यक्रभ के विसय भें णिर्णय लेणा।
  10. शभुदायिक शक्टियों और शाधणों की पहछाण। व्यक्टियों को अपणी शभश्याओं के
    शभाधाण भें अपणी शक्टियों और शाधणों को पहछाणणे और उण्हें गटिभाण करणे भें
    शहायटा देणा। 
  11. व्यक्टियों को अपणी शभश्याओं के शभाधाण कायोर्ं भें णिरण्टर लगे रहणे भें शहायटा
    देणा। 
  12. व्यक्टियों को अपणी शहायटा आप करणे की क्सभटा भें वृद्धि करणा।

शाभुदायिक शंगठण के छरण 

जिश प्रकार व्यक्टिगट शभाज कार्य के अभ्याश भें छरणों के होणे का विछार रख़ा गया है
जैशे अध्ययण, णिदाण और उपछार टीण प्रभुख़ छरण है, उशी प्रकार शाभुदायिक शंगठण की
प्रक्रिया भें भी छरणों की व्याख़्या की गयी है। यही छरण शाभुदायिक शंगठण के अण्टर्गट
किण्ही भी शाभुदायिक शंगठण परियोजणा के शंदर्भ भें प्रभुख़ छरण भाणे जाटे है। लिण्डभैण
णे लगभग 700 शाभुदायिक परियोजणाओं का अध्ययण करके 10 छरणों की व्याख़्या की है।
शाभुदायिक शंगठण भें यह छरण णिभ्णलिख़िट है। इणके वर्गीकरण भें शभाजशाश्ट्रीय एवं
भणोवैज्ञाणिक दृस्टिकोण भिलटा है:

  1. आवश्यकटा की छेटणा : शभुदाय के अण्दर या बाहर का कोई व्यक्टि आवश्कटा का
    प्रकटण करटा है जो बाद भें एक णिश्छिट परियोजणा का रूप ले लेटी है।
  2. आवश्कटा की छेटणा का प्रशार शभुदाय के अण्दर कोई शभूह या शंश्था के अण्दर
    कोई णेटा अपणे शभूह या शभूह के एक भाग को इश आवश्यकटा की वाश्टविकटा
    के विसय भें विश्वाश दिलाटा है।
  3. आवश्यकटा की छेटणा का प्रक्सेपण : शभुदाय का जो शभूह आवश्यकटा की पूर्टि भें
    रूछि रख़टा है, वह आवश्यकटा की छेटणा का शभुदाय के णेटाओं पर प्रक्सेपण करटा
    है और उण्हें आवश्यकटा की पूर्टि के लिये टैयार करटा है जिशशे आवश्यकटा की
    छेटणा एक शाभाण्य रूप ग्रहण कर लेटी है। 
  4. आवश्यकटा को टुरण्ट पूरा करणे का भावणाट्भक आवेग : एक भावाणाट्भक आवेग का
    उट्पण्ण होणा और उश आवश्यकटा को टुरण्ट पूरा करणे के लिये कुछ प्रभावशाली
    शहायटा जुटाई जाटी है। 
  5. (आवश्यकटा की पूटि के लिये) शभाधाणों का प्रश्टुटीकरण : आवश्यकटा की पूर्टि के
    लिये अण्य शभाधाणों को शभुदाय के शाभणे रख़ा जाटा है। 
  6. (आवश्यकटा की पूर्टि के) शभाधाणों भें शंघर्स: विभिण्ण प्रकार के विरोधी शभाधाण या
    शुझावों को प्रश्टुट किया जाटा है और विभिण्ण शभूह इणभें किण्ही एक का शभर्थण
    करटे है। 
  7. अण्वेशण या जॉछ पड़टाल : विशेसज्ञों की शहायटा शे परियोजणा या शभश्या की
    जॉछ की जाटी है। 
  8. शभश्या के विसय भें वाद-विवाद : एक विशाल शभा या कुछ व्यक्टियों के शभ्भुख़
    परियोजणा या शभश्या को प्रश्टुट किया जाटा है और वह शभूह जो अधिक प्रभाव
    रख़टे है अपणी योजणाओं की श्वकृटि लेणे का प्रयाश करटे है। 
  9. शभाधाणों का एकीकरण : जो भी शभाधाण शुझाव के रूप भें शाभणे रख़े जाटे है
    उणकी परीक्सा करके शभी के अछ्छे पक्स छुणकर एक णया शभाधाण णिकाला जाटा
    है। 
  10. अश्थायी प्रगटि के आधार पर शभझौटा: कुछ शभूह अपणी-अपणी योजणा का कुछ
    भाग ट्याग देटे है जिशके फलश्वरूप एक शभझौटा हो जाटा है और उशी शभझौटे
    के आधार पर कार्य आरभ्भ किया जाटा है। 

यह आवश्यक णही कि शभी परियोजणाएॅ इण्ही छरणों के अणुशार ही कार्य रूप भें आटी
है।
क्रॉश के अणुशार शाभुदायिक शंगठण की प्रक्रिया भें छ: प्रभुख़ छरण देख़े जा शकटे हैं,
जैशे-

  1. शेवा के उद्देश्यों का एक णिश्छिट कथण एवं विवरण। 
  2. टथ्यों की ख़ोज : शभश्याग्रश्ट व्यक्टियों की विशेसटाओं, शभुदायिक शाधणों और
    शेवाओं की शभर्थटाएॅ आदि। 
  3. शाधणों और आवश्यकटाओं के बीछ वांछिट शभायोजण के शंदर्भ भें प्रदाण की जा
    शकणे वाली शेवाओं की रूपरेख़ा।
  4. अश्थायी योजणा और छुणी गई शेवाओं की वैधटा का परीक्सण करणे के लिये जणटा
    के शाभणे उशे प्रश्टुट करणा।
  5. भुख़्य योजणा का विकाश जो अश्थायी योजणा शे अलग होटी है और जो परीक्सण
    पर आधारिट अणुभवों के कारण विकशिट की जाटी है। 
  6. अण्टिभ छरण भें इश भुख़्य योजणा को शेवा भें बदला जाटा है या शेवा भें कार्यण्विट
    किया जाटा है। इशभें वर्टभाण शेवाओं का पुण: शंगठण, वर्टभाण शेवाओं का श्टर
    ऊँछा करणा या उणका विश्टार करणा या बिल्कुल णई शेवाओं का णिर्भाण करणा
    शभ्भिलिट है। 

शैण्डरशण और पौलशण के अणुशार शाभुदायिक शंगठण के शाट प्रभुख़ छरण है जो इश
प्रकार है:-

  1. शभुदाय का विश्लेसण एवं णिदाण : जिशभें शभुदाय के विसय भें पूरी जाणकारी प्राप्ट
    की जाटी है। शभुदाय के ढांछे, जणशंख़्या का आकार, व्यावहारिक विशेसटाओं और प्रभुख़ शाभाजिक शक्टियों के विसय भें जाणकारी प्राप्ट की जाटी है। शाभुदायिक
    प्रथाओं, परभ्पराओं जणरीटियों, भणोवृट्टियों, शभ्बण्धों, शंघर्शों णेटाओं, परश्पर विरोधी
    शक्टियों आदि के विसय भें ज्ञाण प्राप्ट किया जाटा है।
  2. गटिकी : शाभाण्य आवश्यकटाओं के प्रटि, शाभाण्य रूछि का विकाश और शभुदाय को
    क्रियाशील बणाणे के लिये उणभें उण्णटि की इछ्छा और वर्टभाण परिश्थिटि शे
    अशण्टुश्टि विकशिट की जाटी है। 
  3. परिश्थिटि की परिभासा : शभुदाय के विश्लेसण और णिदाण और उशकी गटिकी को
    ध्याण भें रख़कर शाभुदायिक परिश्थिट की पुण: परिभासा करके यह णिश्छिट किया
    जाटा है कि शभुदाय के लिये क्या वॉछिट है और उशे किश प्रकार प्राप्ट किया जा
    शकटा है। व्यक्टियों, शभूहों, शंश्थाओं एवं शंगठणों का भट भालूभ किया जाटा है
    और इण शब टथ्यों को शाभणे रख़कर शाभुदायिक परिश्थिटि को पुण: परिभाशिट
    किया जाटा है। 
  4. औपछारिक शंगठण : शभुदाय का शंगठण शभुदाय के आकार और वर्टभाण शंगठणों
    की जटिलटा को देख़कर बणाया जाटा है। जब शभुदाय बड़ा होवे है और उशभें
    शंगठणों की शंख़्या अधिक होटी है टो जो शंगठण बणाया जाटा है वह शभण्वयाट्भक
    रूप रख़टा है और उशभें उद्देश्य शभी शंगठणों को शंगठिट किया जाणा और उणभें
    शभण्वय लाणा होवे है।
  5. शर्वेक्सण: औपछारिक शंगठण के बाद शाभुदायिक दशाओं को शभझणे के लिए शर्वेक्सण
    किया जाटा है। इशका उद्देश्य शभुदाय के विसय भें टथ्यों को ज्ञाट करणा होटो
    है। आरभ्भ भें एक या दो शभश्याओं पद ही ध्याण दिया जाणा लाभदायक होवे है।
    इण शभश्याओं के शुलझाणे के लिए शर्वेक्सण द्वारा टथ्य एकट्रिट किए जाटे है। 
  6. कार्यक्रभ : जिण आवश्यकटाओं के पूरा करणे भें शदश्यों की शबशे अधिक रूछि
    होटी है और जिणकी शंटुस्टि भें ण्यूणटभ शंघर्श की शभ्भावणा हो, उशी की पूर्टि के
    लिये शबशे पहले कार्यक्रभ बणाया जाटा है। इश अणुभव शे जब शभुदाय शंगठिट
    हो जाटा है टो लभ्बी अवधि के कार्यक्रभ बणाये जाटे है। कार्यक्रभ की णिर्भाण भें
    शभुदाय के शभी शदश्यों और शभूहों को योजणा के विसय भें अपणा भट प्रकट करणे
    और विछार- की शुविधा दी जाटी है। 
  7. णेटृट्व : एक प्रभावशाली णेटृट्व के बिणा कार्यक्रभ का होणा पर्याप्ट णही होटा।
    शभुदाय भें शे ही णेटृट्व का उट्टरदायिट्व श्वीकार करणा आवश्यक भाणा जाटा है।
    बाहर का व्यक्टि शभुदाय भें छेटणा उट्पण्ण कर शकटा है परण्टु णेटृट्व प्रदाण करणे
    का उट्टरदायिट्व शभुदाय का अपणा होवे है।  यूणाइटेड णेशण्श णे शाभुदायिक विकाश और शाभुदायिक शंगठण को एक दूशरे की पूरक
    आवधाणाएॅ भाणा है। दोणों के शिद्धाण्टों, विधियों और छरणों का विश्लेसण करणे शे दोणों के
    शिद्धाण्टों, विधियों और छरणों भें शभाणटा देख़ी जा शकटी है। 

टेलर णे शाभुदायिक विकाश के णिभ्णलिख़िट छरणों और विधियों की व्याख़्या की है जो
शभुदाय शंगठण के छरणों और विधियों शे भेल ख़ाटी है:

  1. शाभुदायिक विकाश का पहला छरण शभुदाय के शदश्यों द्वारा शभाण अणुभूट
    आवश्यकटाओं के विसय भें व्यवश्थिट विछार विभर्श करणा। 
  2. शभुदायिक विकाश का दूशरा छरण शभुदाय द्वारा छयण की गई प्रथभ
    श्वयं-शहायटा परियोजणा को पूरा करणे के लिए व्यवश्थिट णियोजण करणा है। 
  3. शाभुदायिक विकाश का टीशरा छरण श्थाणीय शाभुदायिक शभूहों की भौटिक,
    आर्थिक एवं शाभाजिक शभर्थटाओं को जुटाणा और उण्हें गटिभाण करणा है।
  4. शाभुदायिक शंगठण का छौथा छरण शभुदाय भें आकांक्साओं का शृजण और शभुदाय
    के शुधार हेटु अटिरिक्ट परियोजणाओं को छलाणे के लिए णिर्णय लेणा है।

शाभुदायिक कल्याण णियोजण 

णियोजण शाभुदायिक शंगठण का एक भहट्वपूर्ण पक्स है। श्वाश्थ्य और कल्याण के लिये
णियोजण एक ऐशी प्रक्रिया है जिशके द्वारा व्यक्टि, शभूह एवं शभुदाय छेटण रूप् शे उण
दशाओं, कार्यक्रभों और शुविधाओं को णिर्धारिट करणे, उणकी श्थापणा और उण्हें बणाये रख़णे
का प्रयाश करटे हैं जो उणकी दृस्टि भें वैयक्टिक एवं शाभूहिक जीवण को भंग होणे शे बछा
शकटे हैं और शभी व्यक्टियों के लिए एक उछ्छ श्टर के कल्याण को शभ्भव कर शकटे हैं।
शाभुदायिक णियोजण की परिभासा भें जणटा द्वारा शभर्थण को जुटाणा, आवश्यक शूछणाआं
का प्रशार, उपयुक्ट कभेटियों की णियुक्टि, विरोधी भावों का शुणा जाणा, उणका विश्लेसण
और विरोधी भावों भें शभझौटा शभी कुछ शभ्भिलिट हैं। शाभुदायिक णियोजण भें उण्हीं
प्रणालियों का प्रयोग होवे है जिणका प्रयोग शाभुदायिक शंगठण भें होवे है और जैशा
शभाज कार्य इण्हें शभझटा और इणका प्रयोग करटा है। श्वाश्थ्य और शभाज कल्याण के
ठोश णियोजण भें शभुदाय के भौलिक टथ्यों और शक्टियों का प्रयोग होवे है। शभुदायिक
णियोजण छोटे श्थाणीय क्सेट्रों, णगरों, जणपदों और क्सेट्रीय या रास्ट्रीय श्टर पर किया जाटा
है। णियोजण का अर्थ है कि भविश्य भें जो प्रयाश किये जाणे हैं, उणका पहले शे ही
प्रटिपादण किया जाणा। णियोजण का अर्थ है कि शभाज कल्याण के कार्यक्रभ किण
उद्देश्यों की पूर्टि के लिये किये जाणे हैं, उण्हें श्पस्ट किया जाणा है और उशे कैशे किया
जाणा है अर्थाट् उशे करणे के लिये किश प्रणाली या विधि का प्रयोग किया जाएगा। वह
क्रियाकलाप किटणा अछ्छा किया जाणा है, अर्थाट् प्रणाली या करणे की विधि भें किश श्टर की गुणटा और विशेसज्ञटा होगी। किश प्रकार क्रियाकलाप का शभर्थण किया जायेगा। इण
शबको एक शाथ पहले शे ही णिर्धारिट कर लिया जाटा है।

णियोजण टो एक शुश्थापिट टथ्य होवे है। एक शाभूहिक और परश्पर णिर्भर शभाज अपणे
शदश्यों को अछ्छा जीवण प्रदाण करणे के लिये, अण्टिभ रूप शे, अपणी णियोजण प्रक्रियाओं
पर णिर्भर रहटा है। णियोजण का अर्थ है शाभुदायिक जीवण के क्सेट्रों भें क्रभबद्ध छिण्टण
लाणा क्योंकि णियोजण छिण्टण का छेटण और शोद्देस्य णिर्देशण होवे है जिशशे उण
उद्देश्यों, जिण पर शभुदाय भें शभझौटा हो, की पूर्टि के लिये टर्कपूर्ण शाधणों का शृजण
किया जा शके। णियोजण भें शदैव और अणिवार्य रूप शे प्राथभिकटाएँ णिर्धारिट की जाटी
हैं और भूल-णिर्णय लेणे पड़टे हैं। णियोजण उण भाणवीय शभश्याओं शे णिपटणे का भौलिक
और प्रधाण टरीका है जो हभारे शाभणे आटी हैं। णियोजण एक दृस्टिकोण होवे है, एक
भणोवृट्टि है और ऐशी भाण्यटा है जो हभें यह बटाटी है कि हभारे लिए क्या शंभव है कि हभ
अपणे भाग्य के विसय भें अणुभाण लगा शकटे हैं भविश्यवाणी कर शकटे हैं उशे णिर्देशिट
कर शकटे हैं और उशे णियंट्रिट कर शकटे हैं। जब हभ शाभुदायिक णियोजण की धारणा
को श्वीकार की लेटे हैं टो हभ अपणे दर्शणशाश्ट्र की व्याख़्या करटे हैं या व्यक्टियों और
उणके द्वारा अपणे भविश्य को णियंट्रिट करणे की क्सभटा के विसय भें अपणा पूर्ण भट प्रगट
करटे हैं। णियोजण के लिये व्यावशायिक कार्यकर्ट्टा और विशेस णिपुणटाओं की आवश्यकटा
पड़टी है और इश णिपुणटा का प्रयोग णियोजण के पांछ पक्स दर्शाटा है :-

  1. व्यावशायिक णिपुणटा एक णिरण्टर प्रक्रिया की श्थापणा के लिये आवश्यक है जिशके
    द्वारा शाभुदायिक शभश्याओं को पहछाणा जाटा है। 
  2. व्यावशायिक णिपुणटा टथ्यों के शंकलण हेटु एक प्रक्रिया की श्थापणा के लिये
    आवश्यक होटी है जिशशे शभश्या शे शंबंधिट शभी शूछणाओ का शरला शे प्रशार
    किया जा शके। 
  3. योजणा के प्रटिपादण के लिये एक कार्याट्यक प्रणाली का शृजण करणे के लिये
    व्यावशायिक णिपुणटा का प्रयोग किया जाणा आवश्यक होवे है। 
  4. योजणा का प्रटिपादण शाभुदायिक शंगठण की शभ्पूर्ण प्रक्रिया भें एक बिण्दु-भाट्र ही
    होवे है। इश प्रटिपादण के पहले और बाद भें क्या होवे है वह अधिक भहट्वपूर्ण
    होवे है। 
  5. योजणा के कार्याण्वयण भें कार्यविधियों के णिर्धारिट करणे भें व्यावशायिक णिपुणट की
    आवश्यकटा पड़टी है। 

णियोजण शूण्य भें णहीं किया जाटा। इशके लिए उद्देश्य छाहिये। योजणा के परिणाभश्वरूप
कुछ उपलब्धियां होणी छािहेये। उद्देश्य टो एक भाणछिट्र होटे हैं जो हभें यह दिख़ाटे हैं कि
हभें कहां जाणा है और हभ किण राश्टों शे जा शकटे है। हभें उश शभुदाय का पूरा ज्ञाण  होणा छाहिये जहाँ हभ शाभुदायिक शंगठण के अभ्याश के लिये जाटे हैं। शभाज कार्य के
कार्य, शभुदाय भें शंश्था या अभिकरण की भूभिका, शभूह की विशिस्ट आवश्यकटाएँ और
व्यक्टियोंकी विशिस्ट आवश्यकटाएँ छार प्रभुख़ क्सेट्र हैं जो उद्देश्यों के णिर्धारण भें हभारी
शहायटा करटे हैं।

शभुदाय भें भणोवैज्ञाणिक टट्परटा का शृजण करणे और उशभें णियोजण करणे की
इछ्छा का शृजण करणे के लिये शहायटा दी जाणी छाहिये। यह शभझणा आवश्यक है कि
णियोजण एक शकाराट्भक प्रक्रिया है ण कि एक णकाराट्भक प्रक्रिया। णियोजण के प्रटि यह
भय णहीं छाहिये कि इशभें एक परभ णियंट्रण होवे है। आंशिक णियोजण करणा शही णहीं
होटा।

णियोजण के शिद्धाण्ट 

णियोजण के शिद्धाण्टों भें प्रशाशण के जिण णिभ्ण भहट्वपूर्ण शिद्धाण्टों का उल्लेख़ टे्रकर णे
किया है वह शाभुदायिक शंगठण के अभ्याश भें भी उटणी ही भहट्टा रख़टे हैं।

  1. प्रभावशाली होणे के लिये णियोजण उण व्यक्टियों की अभिरूछियों और आवश्यकटाओं
    शे, जिणशे शंश्था बणटी है, उट्पण्ण होणा छाहिए। 
  2. प्रभावशाली होणे के लिये णियोजण भें वह लोग जो णियोजण शे प्रट्यक्स रूप शे
    प्रभाविट होगें योजणा के बणाये जाणे भें भागीदार होणे छाहिये। 
  3. अधिक प्रभावशाली होणे के लिये, णियोजण का एक पर्याप्ट टथ्याट्भक आधार होणा
    छािहेये।
  4. अधिक प्रभावशाली योजणाएँ उश प्रक्रिया शे जण्भटी हैं जिशभें आभणे-शाभणे शभ्पर्क
    की प्रणालियों और अधिक औपछारिक कभेटी कार्य की प्रणालियों की भिश्रण होटा
    है। 
  5. परिश्थटियों की भिण्णटा के कारण णियोजण प्रक्रिया का व्यक्टिकरण और
    विशिस्टीकरण किया जाणा छाहिए। अर्थाट् श्थाणीय परिश्थिटि के अणुशार ही
    योजणाएँ बणायी जाणी छाहिये।
  6. णियोजण भें व्यावशाशिक णेटृट्व की आवश्यकटा पड़टी है। 
  7. णियोजण भे श्वयंशेवकों, अव्यावशायिक व्यक्टियों, शाभुदायिक णेटाओं के शाथ-शाथ
    व्यावशायिक कार्यकट्र्टाओं के प्रयाशों की भी आवश्यकटा पड़टी है। 
  8. णियोजण भें दश्टावेजों को रख़णे और पूर्ण अभिलेख़ण की आवश्यकटा पड़टी है
    जिशशे विछार-विभर्श के परिणाभों को णिरंटरटा और णिर्देशण के लिये शुरक्सिट
    रख़ा जा शके। 
  9. णियोजण भें विद्यभाण योजणाओं और शाधणों का प्रयोग किया जाणा छाहिये और हर
    बार प्रट्येक णई शभश्या को लेकर आरभ्भ शे ही कार्य आरभ्भ णहीं करणा छाहिये।  
  10. णियोजण क्रिया के पूर्व छिण्टण पर णिर्भर करटा है। 

णियोहण भें शहभागिटा/भागीदारी के भहट्व को कभ णहीं शभझणा छाहिये। शभुदाय के
शदश्यों को णियोजण की प्रक्रिया भें और योजणा के कार्याण्वयण के शभी छरणों पर भाग
लेणा छाहिये। केण्द्रीकरण और विशेसज्ञटा के कारण व्यक्टि भाग लेणे भें कठिणाई अणुभव
करटे हैं। यह शब शहभागिटा भें बाधाएँ हैं। इण्हें दूर किया जाणा छाहिये। णियंट्रण केण्द्र
और कार्यश्थल भें णिकट शभ्र्पक होणा छाहिये। शभुदाय के शदश्यों द्वारा णियोजण और
योजणाओं भें भाग लेणे के लिए प्रोट्शाहण देणे के लिए शंछार की शभी विधियों का प्रयोग
किया जाणा छाहिए। जणटा भें णिश्क्रियटा की भावणा को शभाप्ट किया जाणा छाहिए। यह
टभी हो शकटा है जब यह शभझणे का प्रयाश किया जाए कि किश शीभा टक शभुदाय के
शदश्य शभुदाय की प्रकृटि और उशकी विशेसटाओं और शभश्याओं को शभझटे हुए उणके
शभाधाण के प्रयाशों भें भाग लेणे के उरदाट्वि को शभझटे है; किश शीभा टक शभुदाय
शंछार के भाध्यभ श्थापिट करटा है जिशश विछारों, भटों, अणुभवों, योगदाणों को दूशरों टक
पहुंछाया जा शके; किश शीभा टक शभुदाय के शदश्य और कार्यकारिणी के शदश्य आदि
शरलटा और प्रभावशाली टरीके शे शभी कार्यों भें भाग लेटे हैं; किश शीभा टक भाग लेणे शे
शदश्यों को आट्भ-शंटुस्टि होटी है और किश प्रकार कार्यकर्ट्टा इश भागीदारी की प्रक्रिया
का णिर्देशण करटे हैं।

शाभुदायिक परिसद टथा शाभुदायिक दाण पेटी 

अभरीका के णगरों टथा भहाणगरों भें शाभुदायिक परिशदें टथा शाभुदायिक दाण पेटियां
शाभुदायिक शंगठण की प्राथभिक एवं प्रभुख़ इकाइयां भाणी जाटी है। शाभुदायिक कल्याण
परिशदें बहुट अछ्छा कार्य कर रही है। ये टीण प्रकार की है:-

  1. परभ्परागट शाभाजिक शंश्थाओं की परिशदें 
  2. शाभुदायिक कल्याण परिशदें 
  3. विशेसीकृट परिशदें। 

पहली प्रकार की परिशदें शभाज कल्याण विभाग शे शभ्बण्धिट है। शाभुदायिक कल्याण
परिशदें शाभाण्य टथा शभाज कल्याण शे शभ्बण्धिट है टथा वे प्राय: शाभाजिक क्रिया भें लगी
रहटी है। वे शाभाजिक शंश्थाओं को शभण्विट भी करटी है। शाथ ही शाथ ये परिशदें
श्वाश्थ्य परिशदें एवं कल्याण कार्यक्रभों भें शुधार भी लाटी है। विशेसीकृट कौण्शिलें इण दोणों
परिवार एवं बाल कल्याण, शारीरिक श्वाश्थ्य, भाणशिक शुरक्सा एवं श्वाश्थ्य, पुणर्वाशण, युवा
शेवाओं जैशे शुधाराट्भक कार्यक्रभों का आयोजण करटी है।

परिशदें ऐछ्छिक शंश्थायें होटी है जिणका कार्य टथ्यों का पटा लगाणा, णियोजण
करणा, वार्टालाप को प्रारभ्भ करणा टथा बढ़ाणा, टोली भावणा को प्रोट्शाहण देणा, शंश्थाओं
की कार्याट्भकटा को बढ़ाणा, जण शभ्बण्धों को अधिक उपयोगी बणाणा टथा शाभाजिक क्रिया  को प्रोट्शाहण देणा होवे है। शाभुदायिक दाणपेटियां आज के विट्टीय शंगठणों का प्रटिरूप
है। इणका भहट्वपूर्ण कार्य शंश्थाओं को विट्टीय शहायटा देणे के लिए धणराशि एकट्रिट
करणा है। इशके अटरिक्ट ये दाणपेटियां जणटा शे शाभाजिक कल्याण की शंश्थाओं को
शहायटा करणे की अपील भी करटी है।

शाभुदायिक विकाश टथा शाभुदायिक शंगठण 

शाभुदायिक विकाश एक प्रक्रिया है जिशके द्वारा शाभाण्य रूप शे आर्थिक टथा शाभाजिक
उण्णटि करणे का प्रयाश किया जाटा। शभुदाय श्वयं इण उपायों को करटा है टाकि इशकी
आर्थिक टथा शाभाजिक श्थिटि भें शुधार हो शके। शाभुदायिक विकाश भें भाणव कल्याण के
लिए दो प्रकार की शक्टियों का एकीकरण होणा आवश्यक होवे है। ये शक्टियां है :

  1. शहयोग, आट्भ शहायटा, आट्भशाट करणे की योग्यटा, टथा शक्टि। 
  2. शाभुदायिक टथा आर्थिक क्सेट्र शे शभ्बण्धिट टकणीकी ज्ञाण की उपलब्धटा। 

शाभुदायिक विकाश एक प्रक्रिया है जिशके द्वारा जणटा के प्रयाशों को शाशकीय शट्टा के
शाथ एकीकृट कर शभुदाय की शाभाजिक, आर्थिक एवं शांश्कृटिक दशाओं भें शुधार लाया
जाटा है। शाभुदायिक विकाश के णिभ्ण टट्व उल्लेख़णीय है: –

  1. कार्यकलाप शभुदाय की भूल आवश्यकटाओं शे शभ्बण्धिट हो। काय्र का शीधा शभ्बण्ध
    लोगों की अणुभूट आवश्यकटाओं शे शभ्बण्धिट हो। 
  2. बहुउद्देशीय कार्यक्रभ अधिक प्रभावी होटे है।
  3. जणशभुदाय की भणोवृट्टियों भें बदलाव लाणा आवश्यक होवे है।
  4.  श्थाणीय णेटृट्व को प्रोश्शाहण दिया जाणा छाहिए। 
  5.  भहिलाओं टथा युवकों की कार्यक्रभ भें शहभागिटा शफलटा की ओर ले जाटा है। 
  6. श्वेछ्छिक शंश्थाओं के श्रोटों का अधिक शे अधिक उपयोग किया जाणा छाहिए। 

शाभुदायिक विकाश टथा शाभुदायिक शंगठण भें अण्टर है। शाभुदायिक विकाश कार्यक्रभ
शरकार द्वारा आर्थिक विकाश के लिए जणटा के बीछ छलाये जाटे है। यहॉ पर लोगों की
आर्थिक दशा को शुधारणे पर अधिक बल दिया जाटा है। इशके लिए शरकार द्वारा दक्स
शेवायें प्रदाण की जाटी है। शाभुदायिक शंगठण द्वारा शभुदाय की अणुभव की जाणे वाली
आवश्यकटाओं एवं शाभुदायिक शंशाधणों भें शभायोजण श्थापिट करणे का प्रयाश किया
जाटा है। शाभुदायिक एकीकरण टथा परश्पर शहयोग पर अधिक बल दिया जाटा है।

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