सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 क्या है?

By | February 15, 2021


सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 (RTI) कानून का विस्तृत नाम ‘Right To Information
Act,2005’ अर्थात ‘सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 है। भारत में सूचना
का अधिकार अधिनियम, 15 जून, 2005 को भारतीय संसद द्वारा पारित हुआ और
उसके 120 दिन बाद इसे दिनांक 12 अक्टूबर,2005 से जम्मू-कश्मीर राज्य को
छोड़ कर सम्पूर्ण भारत में तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया। इस अधिनियम
के कुछ प्रावधान अविलंब लागू किए गए जैसे-जन अधिकारियों के उत्तरदायित्व
(धारा 4), जनसूचना पदाधिकारी (PIO) एवं सहायक सूचना पदाधिकारी (APIO)
को अधिसूचित करना (धारा 5), केन्द्रीय सूचना आयोग का गठन (धारा 12 एवं
13), राज्य सूचना आयोग का गठन (धारा 15 एवं 16), केंद्र सरकार द्वारा स्थापित
गुप्तचर विभागों और सुरक्षा संगठनों को अधिनियम से छूट परंतु भ्रष्टाचार और
मानव अधिकारों के अतिक्रमण के अभिकथनों से संबंधित सूचना को छूट नहीं (धारा
24), तथा अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए नियम बनाने की शक्ति
(धारा 27 एवं 28)। सभी नागरिक स्वतंत्र होकर जानकारियाँ लेने हेतु संबंधित जन
प्राधिकार को अथवा जन सूचना अधिकारी को आवेदन दे सकते हैं। 

इस कानून की
व्यवस्था सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार देने के लिए की गई है। यह
कानून सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार पर लगाम और पारदर्शिता बनाए रखनें में अब तक
का सबसे प्रभावी कानून रहा है, जिसकी बागडोर देश की जनता के हाथों में एक
कानूनी अधिकार के रूप में प्रदान की गई है। यह अधिनियम 23 खण्डों में है।
खंड 8 के अनुसार इस कानून के कुछ अपवाद भी हैं, जिनमें सूचना देने पर
प्रतिबंध लगाया जा सकता है। वे हैं-

  1. किसी भी खुफिया एजेंसी की वैसी जानकारियां, जिनके सार्वजनिक होने
    से देश की सुरक्षा और अखंडता को खतरा हो।
  2. संसद के स्वाधिकार राज्य विधान सभा।
  3. विदेशी सरकारों द्वारा प्राप्त गुप्त जानकारियाँ।
  4. व्यापार एवं वाणिज्य से संबंधित रहस्य।
  5. कैबिनेट दस्तावेज।
  6. वह जानकारियाँ जिससे किसी के व्यक्तिगत पहलू पर बिना अधिकारों के
    आक्रमण हो सके।
  7. ऐसी जानकारी जो जांच में अवरोध पैदा करें।
  8. ऐसी जानकारी जो न्यायालय प्रकाशित करने से मना करें।
  9. न्यासधारी संबंध के उपयोग के बारे में सूचना।
  10. थर्ड पार्टी यानी निजी संस्थानों संबंधी जानकारी। लेकिन, सरकार के
    पास उपलब्ध इन संस्थाओं की जानकारी को संबंधित सरकारी विभाग
    के जरिए हासिल कर सकते हैं।

सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 2(1) के अनुसार आम नागरिकों को
निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं-

  1. किसी दस्तावेज, पाण्डुलिपि या अभिलेखों का निरीक्षण।
  2. किसी दस्तावेज, या अभिलेखों के नोट्स, संक्षेपण या सत्यापित प्रतियॉं
    प्राप्त करना।
  3. किसी वस्तु का प्रमाणित नमूना प्राप्त करना।
  4. जहॉं सूचना, कम्प्यूटर या किसी अन्य माध्यम में हो तो-उसे फ्लापी, सी.
    डी., टेप, वीडियो कैसेट आदि रूप में प्राप्त करना। इनमें रिकॉर्ड,
    दस्तावेज, ज्ञापन, आदेश, लॉग-बुक, अनुबन्ध, रिपोर्ट, पत्रक, नमूना,
    प्रतिरूप, इलेक्ट्रॉनिक रूप में डाटा और किसी निजी संस्था से सम्बन्धित
    जानकारी शामिल है।

सूचना का अधिकार अधिनियम हर नागरिक को अधिकार देता है कि वह
नीचे उल्लेखित किसी भी विभागध्कार्यालय संस्था से सम्बंधित जानकारी प्राप्त कर
सके अर्थात सभी इकाइयों, विभागों, जो संविधान या अन्य कानूनों या किसी
सरकारी अधिसूचना के अधीन बने हैं अथवा सरकार द्वारा नियंत्रित या वित्तपोषित
किए जाते हों, वहां से संबंधित सूचना मांगी जा सकती है-

  1. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री दफ्तर
  2. संसद और विधानमंडल
  3. चुनाव आयोग
  4. सभी अदालतें
  5. तमाम सरकारी दफ्तर
  6. सभी सरकारी बैंक
  7. सारे सरकारी अस्पताल
  8. पुलिस महकमा
  9. सेना के तीनों अंग
  10. पीएसयू
  11. सरकारी बीमा कंपनियां
  12. सरकारी फोन कंपनियां
  13. सरकार से फंडिंग पाने वाले एनजीओ इत्यादि।

यह अधिकार भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार के रूप में अनुच्छेद 19
के 1(क) के अधीन भाषण व अभिव्यक्ति से जुड़ा हुआ है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर
मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (1948) के अनुच्छेद 19 में मत रखने एवं
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर दिया गया है। साथ ही नागरिक और राजनैतिक
अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा 1966 के अनुच्छेद 19 में भी मत रखने और
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लेख है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में स्पष्ट शब्दों में लिखा है:-’’किसी
व्यक्ति को उस के प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया
के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है अन्यथा नही’’

तात्पर्य यह कि सूचना प्राप्ति के अधिकार को भारतीय संविधान के दो
मौलिक अधिकार अनुच्छेद 19(1) तथा अनुच्छेद 21, नागरिकों को दो मौलिक
अधिकार उपलब्ध कराते हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अनुच्छेद 22
के अनुसार सूचना का अधिकार कानून अब सभी मौजूदा कानूनों का स्थान ले लेगा
अर्थात सरकारी दस्तावेज गोपनीयता कानून,1923 अब सूचना के अधिकार में
बाधा नहीं है। इस अधिनियम के मुताबिक वह जानकारी जो किसी भी अभिलेख,
स्मारक पत्र, ई-मेल, सुझाव पत्र, परामर्श पत्र, प्रेस विज्ञप्ति, परिपत्र, आदेश लॉगबुक,
कॉन्ट्रेक्ट, प्रतिवेदन, कागजात, नमूने, मॉडलस, किसी भी इलेक्ट्रॅानिक फॉर्म में दर्ज
आँकड़े तथा किसी भी निजी संस्थान से संबंधित सूचना जो कि किसी भी जन
प्राधिकार द्वारा प्राप्त किया जा सकता है (मात्र संचिका टिप्पणी को छोड़कर), सूचना
अधिकार अधिनियम के तहत सूचना कहलायेगा।

सूचना अधिकार के अंतर्गत आवेदक को किसी भी कार्य, दस्तावेज, अभिलेख
का निरीक्षण करने, किसी भी दस्तावेज अथवा अभिलेख का अधिकृत प्रति अथवा
उद्धरण अथवा टिप्पणी लेने, किसी भी सामान का अधिकृत नमूना लेने एवं प्रिंट
आउट, डिस्क, फ्लॉपी, टेप, विडियों कैसेट एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक यंत्र से सूचना
प्राप्त करने का अधिकार है। नागरिक स्वयं सरकारी संगठनों के काम-काज तथा
कार्य-प्रणाली पर नजर रख सकते हैं। वे देख सकते हैं कि ये संगठन निर्धारित
नियमों के अनुसार कार्य कर रहे हैं या नहीं। प्रश्नों के मिले जवाबों के विरूद्ध
आवश्यकतानुसार नागरिक न्यायिक अपील कर सकते हैं। इस अधिनियम का दायरा
वृहत है।

कोई भी व्यक्ति हिंदी या अंग्रेजी में अथवा क्षेत्र विशेष के शासकीय भाषा में
किसी भी विषय पर सूचना प्राप्त करने हेतु जन सूचना पदाधिकारी को आवेदन दे
सकता है। इस आवेदन में कारण देने की आवश्यकता नहीं है। अगर वह व्यक्ति
गरीबी रेखा के नीचे के नहीं हो, तो उन्हें तय किए गए शुल्क अदा करनी होगी।
शुल्क सामान्यत: 10 रूपये तय किया गया है। इसके अलावे, कागजातों अथवा
डिस्कध्टैप्ध्फ्लॉपी इत्यादि के लिए अतिरिक्त शुल्क तय किए गए हैं जो विभिन्न
राज्यों में दस रूपये से लेकर सौ रूपये प्रति प्रार्थना हो सकते हैं। यह एक बहुत
ही सस्ता उपाय है जो आम जनता के लिए महत्वपूर्ण राहत है।

सूचना पाने के लिए 30 दिन का समय दिया गया है जो कि आवेदन की
तिथि से गिना जाएगा। यदि सूचना किसी व्यक्ति के जीवन एवं आजादी से संबंधित
हो तो 48 घंटों के अंदर मिलनी चाहिए। अगर किसी ने सहायक जन सूचना
पदाधिकारी के यहाँ आवेदन दिया हो तो 5 दिनों का समय और जोड़ लेना होगा।
अगर सूचना से संबधित किसी तृतीय पक्ष को अभ्यावेदन देने हेतु मौका देना हो तो
उसके लिए कुछ समय सीमा 40 दिन तय किया गया है। अगर समय सीमा के
अंदर मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं करायी गयी तो यह समझा जाएगा कि जन
सूचना पदाधिकारी ने सूचना देने से मना कर दिया है। तत्पश्चात अपीलीय प्राधिकार
इसे बहुत गम्भीरता से लेते हैं। प्रथम अपील सुनने वाला संगठन के ही अधिकारी
होते हैं। द्वितीय अपील केन्द्रीय अपील केन्द्रीय या राजकीय सूचना आयोग के पास
दायर की जा सकती है। इस अधिनियम की शुरूआत में यह स्पष्ट किया गया है
कि प्रत्येक जन प्राधिकार के कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए उत्तरदायी
बनाने हेतु यह जरूरी है कि नागरिकों को इस प्राधिकारों के बारे में सभी सूचनाएं
उपलब्ध हो। लोकतंत्र के सही संचालन में केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार के जन
प्राधिकारों का ठीक से संचालन होना, लोकहितार्थ कार्य करना, पारदर्शिता बनाए
रखना अत्यन्त आवश्यक है।

हमारे संविधान के अनुच्छेद 19 (1) ए में यह बात पहले से ही सन्निहित है
कि प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि उन्हें जन प्राधिकारों
के कायोर्ं के बारे में सही जानकारी मिले। माननीय उच्चतम न्यायालय ने कई
मामलों में इसका जिक्र किया है। संविधान के अनुच्छेद 16 (1) ए अपनी बात
रखने एवं विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में प्रावधानित किया गया है।
यह प्रावधान किसी भी व्यक्ति को सच्चाई का पता लगाने, किसी भी निर्णय में
भागीदार बनने की शक्ति प्रदत्त करने में तथा स्थिरता एवं सामाजिक बदलाव में
संतुलन बनाने में मदद करता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इसलिए प्रावधानित किया
गया है ताकि कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं विधायिका नागरिकों को भ्रमित नहीं
करें, सरकारी तंत्र अपने कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखे एवं नागरिक को जन
प्राधिकारों के बारे में सभी सूचनाएं सुलभ हो सके।

लोकतंत्र का अर्थ हुआ वह शासन जो किसी देश के लोगों का हो, उन
लोगों के द्वारा हो तथा उन लोगों के लिए हो। भारत में अवश्य ही लोकतंत्र है
किंतु यहाँ की जनता ज्यादातर अनभिज्ञ हैं। उन्हें सरकारी कार्यालयों, पदाधिकारियों
के कामकाज की विशेष जानकारी नहीं होती और न ही न्यायपालिका एवं विधायिका
के बारे में पर्याप्त सूचना होती है। जो लोग जानकार हैं, उनकी संख्या बहुत कम है
इसलिए लोकतंत्र कहलाने के बावजूद, भारत का लोकतंत्र मजबूत नहीं कहलाएगा।

मानव अधिकारों के सार्वभौमिक उद्घोषणा (1948) एवं भारतीय संविधान के भाग
3 एवं भाग 4 में जीवन, आजादी, सम्मान, विकास तथा जीने की समुचित सुविधाओं
को प्राप्त करने के अधिकार दिये गये हैं। किंतु अगर ज्यादातर आबादी को सूचना
ही नहीं हो तो लोकतंत्र मात्र मजाक बनकर रह जाती है। लोगों को मालूम है कि
उन्हें वोट देने का अधिकार है, लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम कि वे कार्यपालिका,
न्यायपालिका एवं विधायिका के कायोर्ं के बारे में प्रश्न कर सकते हैं तथा सूचना
प्राप्त कर सकते हैं। अगर सूचना अधिकार अधिनियम को सख्ती से लागू किया
जाए तो बहुत हद तक इन तीन क्षेत्रों में फैले भ्रष्टाचार को दूर किया जा सकता
है। किसी भी सफल लोकतंत्र के लिए यह उचित है कि उसके नागरिकों को
विभिन्न परामर्श एवं मतों की सूचना मिले। यह तभी हो सकता है जब सूचना
अधिकार अधिनियम के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को इनसे संबंधित सूचनाएं प्राप्त
हो। विभिन्न परामश्र्ाीय मतों, विचारों तथा विचारधाराओं से संबंधित सभी जानकारी
प्राप्त करने पर नागरिक-गण सही तरीके से उनसे संबंधित विषयों पर निर्णय ले
सकेंगे। अपनी बात रखने एवं विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार में,
जानने का अधिकार सन्निहित है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने बार-बार कहा है
कि बोली एवं विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र के लिए
बुनियादी आवश्यकता है जिसे लोकतंत्र से अलग नहीं किया जा सकता। इसमें
सूचना का अधिकार सम्मिलित है।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है, कुछ ही क्षेत्रों में सूचना देने या पाने पर
पांबदी लगाई गई है जो कि राष्ट्र के संप्रभुता एवं सत्यनिष्ठा, राष्ट्र की सुरक्षा, दूसरे
देशों के साथ दोस्ताना संबंध, एवं नैतिकता से संबंधित हो। आम जनता की सूचना
के लिए उन सभी संगठनों की सूची बनाई गई है जिनके कार्यप्रणाली के बारे में
सूचना उपलब्ध नहीं करायी जा सकती है किंतु अगर उनमें भ्रष्टाचार के मामले हो,
तो वह पांबदी लागू नहीं होगी। सूचना का अधिकार एक मौलिक अधिकार
(Fundamental Right) माना जा सकता है क्योंकि यह मौलिक अधिकार भारत
के संविधान के अनुच्छेद 19(i) से प्रवाहित होता है। इस अधिकार को एक मानव
अधिकार (Human Right) भी माना गया है ताकि सरकारी कामकाज पारदश्र्ाी हो
एवं उत्तरदायी हो।

सूचना के अधिकार से सरकारी प्रशासनिक तंत्र में दक्षता लाई जा सकती
है। इससे सरकारी कामकाज, प्रशासनिक दक्षता, नीति की दक्षता एवं सेवा की
दक्षता अवश्य ही बढ़ेगी। इस अधिनियम के तहत अगर जन सूचना पदाधिकारी
द्वारा कोई सूचना देने से मना किया जाता है, तो उसे उसका कारण बताना होगा।
ऐसा प्रावधान इसलिए किया गया है, ताकि बेवजह किसी नागरिक के आवेदन को
प्राधिकारों द्वारा खारिज नहीं किया जा सके। इस अधिनियम में अपील तथा द्वितीय
अपील का प्रावधान किया गया है, और इसके अलावा, संविधान के अनुच्छेद 226
के तहत कोई भी नागरिक माननीय उच्च न्यायालय में मुकदमा
दर्ज कर सकता है और अगर वह कोई मौलिक अधिकार हो, तो अनुच्छेद 32 के
अंतर्गत वह माननीय उच्चतम न्यायालय तक भी जा सकता
है।

सूचनाएं सटीक हो, प्रश्नों के सही उत्तर दिए जाएं तथा समय पर सूचना
मिले, इससे प्रशासनिक कुशलता बहुत बढ़ जाती है। आम जनता के प्रति
प्रशासनिक तंत्र का उत्तरदायित्व भी स्थापित हो जाता है और यह कुप्रशासन के
लिए महत्वपूर्ण बिंदु है। आज इलेक्ट्रॅानिक्स प्रधान युग है, इसलिए वेबसाइट
(Website) का प्रावधान प्रत्येक आधिकारिक कार्यालय के लिए आवश्यक समझा
जाता है। प्रत्येक आधिकारिक कार्यालय चाहे वह कार्यपालिका, न्यायपालिका अथवा
विधायिका का हो, से संबंधित विस्तृत सूचना वेबसाइट पर दे देने से सूचना
अधिकार अधिनियम का बहुत हद तक अपने आप पालन हो जाता है। ऐसा अगर
प्रत्येक कार्यालय करें तो अलग से अधिनियम के अंतर्गत सूचना मांगने की
आवश्यकता न्यूनतम रह जायेगी। इन वेबसाइटों को अद्यतन करते रहना होगा
ताकि किसी भी वक्त किसी भी नागरिक को सही सूचना अपने आप मिल जाए।

कम्प्यूटर के युग में ऐसा करना बहुत ही आसान तरीका है और उचित भी है। जब
से सूचना अधिकार अधिनियम लागू किया गया है, प्रत्येक अधिकारिक कार्यालय के
दस्तावेजों को अद्यतन करने की आवश्यकता बढ़ गई है,अब वह समय गया जब
पंजियाँ अथवा अभिलेख सालों साल तक अद्यतन नहीं किए जाते थे अथवा वित्तीय
मामलों में अंकेक्षण आपत्तियों का निस्तार नहीं किया जाता था। सूचना अधिकार
अधिनियम के तहत अब देश के तीनों क्षेत्रों-कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं
विधायिका को सतर्क होना पड़ गया है। माननीय उच्च न्यायालय एवं उच्चतम
न्यायालय ऐसे कई प्रश्नों से अछूते थे, लेकिन अब नहीं। भारत का लोकतंत्र जाग
उठा है। आम नागरिक अपनी महत्ता को समझने लगा है। वह जान गया है कि यह
लोकतंत्र उन्हीं का है, उन्हीं के द्वारा कार्यान्वित होना है तथा उन्हीं के लिए है।

इसलिए इस देश के आधिकारिक कार्यालयों में क्या हो रहा है, नागरिकों के पैसों
का खर्च किस प्रकार हो रहा है, नियम कानून का कार्यान्वन कैसे हो रहा है इत्यादि
की सटीक जानकारी प्राप्त करने का उन्हें अधिकार है। यह कानून आम नागरिकों
को पर्याप्त अवसर दे रहा है ताकि वे इस लोकतंत्र के मजबूत भागीदार बनें। चूंकि
इस अधिनियम में यह प्रावधान है कि एक समय सीमा के अंदर सही सूचना
आवेदक को उपलब्ध करानी है, इसलिए अब यह नहीं कहा जा सकता कि
दस्तावेज अथवा अभिलेख तैयार नहीं है जिसके चलते सूचना उपलब्ध नहीं कराई
जा सकती। ऐसा करने पर जन सूचना प्राधिकार दंडित हो सकते हैं। जब सभी
दस्तावेजों, अभिलेखों को मात्र एक अधिनियम के भय से अद्यतन करना जरूरी हो
गया है, तो इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह अधिनियम कितना महत्वपूर्ण है
और आम जनता के लिए कितना लाभदायक भी। जहाँ पहले अॉ फिशियल सिक्रेट्स
एक्ट की दुहाई देकर कार्यालय द्वारा सूचना देने से इनकार किया जाता था, अब
परिस्थिति बहुत बदल चुकी है।
शिकायत भी कम नहीं :-

1. आवेदकों को सूचना का अधिकार के तहत आवेदन जमा करवाने तक के
लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।सूचना आयोग में कानून का कड़ाई से
पालन नहीं करने से सरकारी अफसर अपनी मनमानी कर रहे हैं। छोटे-मोटे
मामलों में तो सूचनाएं मिल भी जाती है परन्तु नीतिगत मसलो, बड़ी
योजनाओं या फिर जहां किसी भ्रष्टाचार का अंदेशा हो तो सरकारी
अधिकारी चुप्पी साध लेते हैं।

2. सूचना का अधिकार का प्रचार-प्रसार स्वयंसेवी संस्थाओं या फिर कुछ
कार्यकर्ताओं द्वारा ही किया जा रहा है। सरकार इस अधिकार के
प्रचार-प्रसार की कोई जिम्मेदारी नहीं निभा रही है, सरकार इस अधिकार के
प्रचार-प्रसार में कोई रुचि नहीं ले रही है।

3. इस अधिनियम के तहत तमाम सरकारी विभागों को जनसूचना अधिकार तो
नियुक्त करवा दिए परन्तु सूचना अधिकारियों को आवश्यक सुविधाएं नहीं
दी। कई विभागों में तो अब तक आर.टी.आई. के बारे में विधिवत प्रशिक्षण
तक नहीं दिया गया है।

4. सूचना आयोग में भी अदालतों की तरह केसों का ढेर लगता जा रहा है।
किसी केस की सुनवाई जल्दी नहीं हो पा रही है। वास्तव में सूचना आयोग
में भी पर्याप्त संख्या में न तो आयुक्त है न आवश्यक सुविधाएं।

5. कई दागदार व्यक्तियों को भी सूचना आयुक्त एवं सूचना अधिकारी बना
दिया गया है। जरूरत है कि इन आयोगों के अध्यक्ष एवं सदस्यों का चयन
बिल्कुल निष्पक्ष एवं पारदश्र्ाी हो। यह शायद तभी हो सकता है जब चयन
समिति में माननीय उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति को
शामिल किया जाए। अन्यथा आम जनता को हमेशा संदेह बना रहेगा कि
पक्ष एवं प्रतिपक्ष के नेताओं के चहेतों का ही चयन किया गया।

6. कई सूचना आयुक्त तो न्याय की सामान्य प्रक्रिया तक नहीं जानते। न्याय
करने के लिए दोनों पक्षों की सुनवाई आवश्यक है परन्तु आयुक्त तो सिर्फ
आवेदक को ही बुलाकर कुछ ही मिनटों में सुनवाई पूरी कर देते हैं।
कभी-कभी तो आवेदक के खिलाफ भी फैसला कर डालते हैं।

यह सच है कि, कई बार यदि कोई नागरिक किसी कार्यालय में जाकर कोई
जानकारी या सरकारी दस्तावेज की मॉंग करे तो उसे औपचारिकता पूरी करने के
बाद भी आसानी से सूचना प्राप्त नहीं होती,उसे उपेक्षित होना पड़ता है। जब तक
जानकारी प्रदान करने की समुचित प्रणाली का विकास नहीं किया जायेगा तब तक
यह प्रावधान मूर्त रूप नहीं ले सकेगा। आज लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने वाली
सरकार में यह सबसे बड़ी खामी है कि उसने लोकतंत्र में ‘लोक की सहभागिता’को
उचित स्थान नहीं दिया है। जिसका परिणाम है कि, आम आदमी में सरकारी कार्यो
के प्रति उदासीनता रहती है। तात्पर्य यह है कि सूचना का अधिकार जनता का
अधिकार है और जब तक अपने इस अधिकार का प्रयोग जनता बखूबी नहीं करेगी
तब तक इसकी सार्थकता भी सिद्ध न हो सकेगी। 

सूचना अधिकार अधिनियम का
दुरूपयोग न हो, इसका भी ख्याल रखना चाहिए। कई बार पाया जाता है कि
दुर्भावना से प्रेरित होकर लोग सूचना मांगते हैं तथा उक्त सूचना को प्राप्त करने के
उपरान्त भयादोहन करते हैं। लेकिन जो सबसे तीव्र आलोचना है वह है विलम्ब
का। लोगों का कहना है कि प्रक्रिया का पालन करने में बहुत समय लग जाता है
तथा अंत में कहा जाता है कि उक्त सूचना नहीं दी जा सकती। नागरिकों को
इतना सामथ्र्य नहीं होता कि वे धैर्य से लम्बी समय तक सूचना की प्रतीक्षा करें
तथा एक अपीलीय प्राधिकार से दूसरी अपीलीय प्राधिकार तक पहुंचे। अत: इस
अधिनियम को लागू करने की प्रक्रिया को और आसान बनाना चाहिए।

कैसे करते हैं आर.टी.आई. आवेदन

  1. सादा कागज पर ही आवेदन करें।
  2. निर्धारित शुल्क-नकद, बैंक ड्राफ्ट, बैंकर्स चेक या पोस्टल ऑर्डर से जमा
    करें। जो भी बैंक ड्राफ्ट, बैंकर्स चेक या पोस्टल ऑर्डर बनवाए उन पर उस
    जन सूचना पदाधिकारी का नाम हो जिससे सूचना मॉंगी जानी है।
  3. आवेदन-पत्र सम्बन्धित जन सूचना पदाधिकारीको स्वयं या डाक द्वारा भेजा
    जा सकता है।
  4. आवेदनकर्ता को सूचना मॉंगने का कारण बताना जरूरी नहीं है।
  5. यदि सूचना मॉंगने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा से नीचे का है, तो उसे गरीबी
    रेखा प्रमाणपत्र की छायाप्रति लगानी होगीताकि उसे निर्धारित शुल्क से छूट
    प्राप्त हो सके ।
  6. कोई भी व्यक्ति ग्राम पंचायत से लेकर राष्ट्रपति महोदय तक-किसी भी
    लोगबुक, कान्ट्रैक्ट, रिपोर्ट,आंकड़े आदि की सूचना प्राप्त कर सकता है।
  7. यदि 30 दिनों के भीतर सूचना नहीं मिलती है, तो आप अपील अधिकारी के
    पास प्रथम अपील दाखिल कर सकते हैं।
  8. यदि प्रथम अपील करने के 30 दिनों तक भी सूचना नहीं मिले तो सम्बन्धित
    सूचना आयोग में 90 दिनोंं के भीतर दूसरी अपील दाखिल कर सकते हैं।

कैसे करें शिकायत एवं अपील

  1. यदि आवेदनकर्ता को किसी भी आधार पर कोई सूचना देने से मना किया
    जाता है या 30 दिनों के भीतर सूचना नहीं मिलती है, तो प्रथम अपील
    अधिकारी के पास शिकायत या अपील की जा सकती है।
  2. यदि आवेदनकर्ता प्रथम अपील अधिकारी के निर्णय से भी असंतुष्ट है, तो
    आवेदनकर्ता राज्य सूचना आयोग (State Information Commission)
    के समक्ष द्वितीय अपील कर सकता है।
  3. यदि आवेदनकर्ता को लगता है कि उससे निर्धारित शुल्क के अतरिक्त, प्रिंट
    आउट, फोटोकॉपी, सीडी, फोटो इत्यादि से सम्बंधित मॉंगा गया शुल्क
    अविश्वनीय या मिथ्या है,तो भी सूचना आयोग से शिकायत की जा सकती
    है।
  4. यदि आप साक्षर नहीं है या शारीरिक रूप से अक्षम हैं, तो जन सूचना
    अधिकारी की बाध्यता है कि वह आपकी मदद करें।
  5. यदि जन सूचना अधिकारी (PIO) की लापरवाही की वजह से आपको कोई
    हानि हुई हो अथवा बार-बार राज्य सूचना आयोग (State Information
    Commission) की लापरवाही की वजह से आपको कोई हानि हुई हो
    अथवा बार-बार सूचना आयोग के पास जाना पड़ा हो तो, आप व्यय-भार
    (Expenses) की भरपाई की मॉंगकर सकते हैं। केन्द्रीय सूचना आयोग ने
    इसी तरह के कुछ मामलों में आवेदकों को हरजाना दिलावाया है।
अनुशासनात्मक कार्यवाही धारा 20(2),सम्बन्धी प्रक्रिया :-
यदि किसी शिकायत या अपील की सुनवाई के समय राज्य सूचना आयोग
इस निष्कर्ष पर पहुॅंचता है कि,जन सूचना अधिकारी ने बिना किसी उचित कारण के
सूचना के अनुरोध को स्वीकार करने में लगातार आनाकानी की है या
अनुरोधकर्ताओं को समय पर सूचना उपलब्ध नहीं कराई है, या द्वेषवश सूचना के
अनुरोध को अस्वीकार किया है या जानबूझकर गलत, अपूर्ण अथवा भ्रामक सूचना
दी है, या मांगी गई सूचना को नष्ट किया है या किसी भी तरह सूचना के दिये
जाने के कार्य में व्यवधान डाला है, तो आयोग ऐसे अधिकारी के विरूद्ध सेवा नियमों
के अन्तर्गत उस पर लागू होने वाले सेवा नियमों के अधीन अनुशासनात्मक
कार्यवाही की सिफारिश करेगा।

कुछ संस्थाओं ने लोगों को सूचना देने से यह कहकर मना कर दियाथा कि
वे इस अधिनियम के अंतर्गत लोक प्राधिकारी नहीं है। ऐसे कई मामलें केंद्रीय
सूचना आयोग (Central Information Commission) के समक्ष अपील के रूप
में आए। आयोग ने इन अपीलों का निपटारा करते समय लोग प्राधिकारी के
निर्धारण के लिए कुछ मानदण्ड बनाए। इनकॉन एक लोक प्राधिकारी नहीं है। जब
श्री मित्तल ने इसके खिलाफ अपील की तो आयोग ने कई बातों को ध्यान में
रखकर इस मामले की जॉंच की जैसे इनकॉन का वित्त पोषण कौन करता है
उसकी लेखा प्रणाली क्या है उसकी लेखा परीक्षा कौन करता है, उसकी वार्षिक
रिपोर्ट संसद के समक्ष रखने की क्या पद्धति है आदि और उसने यह निर्णय दिया-
‘‘ये तथ्य कि – इनकॉन का निदेशक मंडल केंद्र सरकार द्वारा
नियुक्त किया जाता है, उसके वित्तीय लेखों की समीक्षा भारत के नियंत्रक
एवं महालेखा परीक्षक द्वारा की जाती है और उसकी वार्षिक रिपोर्ट ससंद
में पेश की जाती है स्पष्ट रूप से यह दरशाते है कि इरकॉन अंतत: केंद्र
सरकार के नियंत्रण में है। आयोग इस नतीजे पर पहुॅंचा कि इस मामले में
स्पष्टीकरण मॉंगने के लिए इरकॉन द्वारा रेल मंत्रालय को पत्र लिखना
इरकॉन के अधिकारियों की एक निष्फल कवायद और कार्यवाही में देर
करने की एक चाल थी।’’

केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा यह स्पष्ट किया जा चुका है कि जहॉं अन्य
कानून लागू होते है वहॉं किसी को सूचना का अधिकार एक्ट के तहत प्रमाणित
प्रतियॉं पाने का अधिकार नहीं है। श्री मल्लू राम के एक मामले में आयोग द्वारा
स्पष्ट कियाकि-’’यह बिलकुल साफ है कि सूचना का अधिकार एक्ट के तहत
अपीलकर्ता को किसी लोक प्राधिकारी के पास उपलब्ध किसी दस्तावेज की
प्रमाणित सत्य प्रतिलिपि हासिल करने का अधिकार नहीं है, जहॉं दस्तावेजों
और अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियॉं पाने की पात्रता नियमित करने के लिए
कई कानून बने हुए हैं।’’

लोक प्राधिकारियों को सूचनाओं को स्वैच्छिक जारी करने सम्बन्धी अनुदेश:
प्रत्येक लोक प्राधिकारी निम्न 17 बिन्दुओं पर स्वत: ही सूचना प्रकट करेगा:-

  1. संगठन की विशिष्टयॉं, कृत्य और कर्तव्य।
  2. अधिकारियों और कर्मचारियों की शक्तियों और कर्तव्य।
  3. लोक प्राधिकारी अथवा उसके कर्मियों द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन के लिये
    धारित तथा प्रयोग किये जाने वाले नियम, विनियम, अनुदेश, निर्देशिका और
    अभिलेख की सूचना।
  4. नीति बनाने या उसके कार्यान्वयन के सम्बन्ध में जनता के सदस्यों से
    परामर्श के लिये या उनके प्रतिनिधित्व के लिये विद्यमान व्यवस्था के सम्बन्ध
    में सूचना।
  5. दस्तावेजों, जो लोक प्राधिकारी द्वारा धारित या उसके नियंत्रणाधीन हैं, का
    श्रेणियों के अनुसार विवरण।
  6. बोर्डो,परिषदों, समितियों और अन्य निकायों का विवरण, साथ ही विवरण की
    क्या उन बोर्डो, परिषदों समितियों और निकायों की बैठकें जनता के लिये
    खुली होंगी या नहीं।
  7. बैठकों के कार्यवृत (Minutes) तक जनता की पहुंच।
  8. लोक सूचना अधिकारियों के नाम, पदनाम और अन्य विशिष्टियॉं।
  9. निर्णय करने की प्रक्रिया (पर्यवेक्षण एवं उत्तरदायित्व के स्तर सहित)।
  10. अधिकारियों और कर्मचारियों को निर्देशिका।
  11. अपने प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी द्वारा प्राप्त मासिक पारिश्रमिक और
    उसके निर्धारण की पद्धति।
  12. प्रत्येक अभिकरण को आबंटित बजट (सभी योजनाओं, व्यय प्रस्तावों तथा धन
    वितरण की सूचना सहित)।
  13. अनुदान, राज सहायता कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की रीति, जिसमें आबंटित
    राशि और ऐसे कार्यक्रमों के लाभार्थियों के ब्यौरे सम्मिलित हैं।
  14. रियायतों, अनुज्ञा-पत्रों तथा प्राधिकरण के प्राप्तिकर्ताओं के सम्बन्ध में
    विवरण।
  15. कृत्यों के निर्वहन के लिये स्थापित मानक एवं नियम।
  16. किसी इलेक्ट्रॉनिक रूप में उलब्ध सूचना के सम्बन्ध में ब्यौरे।
  17. सूचना प्राप्त करने के लिये नागरिकों को उपलब्ध सुविधाओं का विवरण।
किसी पुस्तकालय या वाचनालय की यदि लोक उपयोग के लिये व्यवस्था
की गई हो, तो उसका भी विवरण।

जैसा कि पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि, सूचना का अधिकार प्रत्येक
क्रियाकलाप के बारे में सूचना पाने का अप्रतिबंधित अधिकार नहीं है, अर्थात कुछ
ऐसे भी क्षेत्र है जहॉं सरकार सूचना रोक सकती है और कारण बताते हुए लोगों को
सूचना देने से इनकार कर सकती है। इसका स्वर्णिम नियम यह है कि जो सूचना
संसद या राज्य विधानमंडल को नहीं नकारी जा सकती वह लोगों को भी नकारी
नही जाएगी। कुछ ही क्षेत्र ऐसे है जिन्हें देश की सुरक्षा और अखंडता की दृष्टि से
और ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण मामलों को इस एक्ट के प्रयोजन से दूर रखा गया है।
हमारी शिकायतों और अपीलों पर ध्यान देने के लिए सूचना का अधिकार
अधिनियम ने हमें अति शक्तिशाली आयोग दिए है। अपने आयोग गठित करने के
लिए केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों को शक्ति-सम्पन्न बनया गया है। प्रत्येक आयोग
में अधिकतम ग्यारह सदस्य हो सकते है। एक्ट के उचित कार्यान्वयन के लिए इन
अधिकारियों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त/निर्वाचन आयुक्त और मुख्य सचिव के
बराबर की हैसियत प्रदान की गई है। ये आयुक्त विभिन्न क्षेत्रों के लिए निर्दिष्ट
किए जा सकते हैं।

सरकारी निकायों और लोक निधि द्वार वित्त पोषित अन्य संगठनों के
कार्यचालन में पारदर्शिता बढ़ाना सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के मुख्य
उद्देश्य में से एक है। इसका एक उपाय है जितनी अधिक सूचना संभव हो जनता
के सामने रखी जाए। जितनी अधिक मात्रा में सूचना जनता के सामने रखी जाएगी,
पारदर्शिता उतनी ही अधिक होगी और लोगों के लिए सूचना मॉंगने की आवश्यकता
भी उतनी ही कम होगी। आजादी के 69 वर्ष बाद भी एक बड़ी संख्या में लोगों को
यह पता नहीं है कि, सरकारी एजेंसियां किस तरह से संगठित की गई है, उनकी
शक्तियॉं और कर्तव्य क्या है, निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनके द्वारा कौन सी पद्धति
अपनाई जाती है, उनके कार्यो के निर्वहन के लिए क्या मानक तय किए गए है
इत्यादि। इस तरह की बुनियादी जानकारी के अभाव में जनसाधारण को सूचना
प्राप्त करने के लिए एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक दौड़ना पड़ता है। इन
कठिनाइयों को दूर करने के लिए इस अधिनियम में बाध्यकारी प्रावधान किए गए है,
ताकि सभी लोक प्राधिकारी ऐसी बुनियादी सूचना उपलब्ध कराएॅं। सूचना की प्राप्ति
तभी संभव है जब वह व्यवस्थित रूप से रखी जाए। इसलिए इस पक्ष पर विशेष
जोर दिया गया है। रियायत, सब्सिडी आदि पाने वाले लोगों के ब्योरे प्रकाशित
करना आवश्यक है, चूॅंकि ऐसी तालिकाएॅं स्वभाव से परिवर्तनशील है तथा उनका
आकार विशाल है, अत: इस एक्ट में सरकारी अभिलेखों के कप्यूटरीकरण पर जोर
दिया गया है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस अधिनियम ने भारत के प्रत्येक
नागरिक को लोकसभा या विधानसभा के समतुल्य बना दिया है। जो अधिकारी
कर्मचारी आज तक आम लोगों को देरी या अन्य कारणों पर दण्डित करते थे, इस
अधिनियम के आने से आज वही अपने आपको छानबीन के दायरे में पा रहे हैं तथा
जुर्माने के भय का अनुभव कर रहे है।
एक जीते जागते लोकतंत्र के लिए, और वह भी भारत जैसे विशाल लोकतंत्र
के लिए, सूचना का अधिकार नागरिकों को प्राप्त होना सुप्रशासन का महत्पूर्ण कदम
है। लोकतंत्र में नागरिकों की भागीदारी मात्र वोट करने के लिए नहीं बल्कि देश के
सवार्ंगीण विकास के लिए भी आवश्यक है। प्रत्येक क्षेत्र में, सूचना का अधिकार
अधिनियम आम जनता में एक अद्भूत जागरूकता ला रहा है। लोग अब निडर
होकर सूचना मांग रहे है, अपने अधिकारों को जान रहे है और अब कार्यपालिका,
न्यायपालिका एवं विधायिका से गंभीरता से प्रश्न कर रहे हैं। कुछ खामियों के
बावजूद यह अधिनियम नागरिकों को एक अद्भूत शक्ति दे रहा है तथा लोकतंत्र को
मजबूत कर रहा है। जब तक इस अधिनियम का कड़ाई से पालन होता रहेगा, तब
तक यहाँ लोकतंत्र भी जीवित रहेगा। अन्यथा तानाशाही पनपने लगेगी। भारत की
सुरक्षा के लिए यह जरूरी है कि एक स्वस्थ्य लोकतंत्र बना रहे, यहाँ के नागरिक
जागरूक हों, तथा सभी को उचित न्याय एवं विकास के अवसर प्राप्त हों।

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