हड़प्पा शभ्यटा की ख़ोज किशणे की?


हड़प्पा की शभ्यटा, जिशे शिंधु घाटी की शभ्यटा भी कहटे हैं।
हड़प्पा की शभ्यटा की ख़ोज 1920.22 भें की गई थी, जब इशके दो बहुट ही भहट्ट्वपूर्ण
श्थलों पर ख़ुदाई की गई थी। ये श्थाण थे, रावी णदी के किणारे बशा हड़प्पा और
शिंधु णदी के किणारे बशा भोहणजोदड़ो। पहले श्थाण की ख़ुदाई की गई थी डी.आरशाहणी
द्वारा और दूशरे की आर.डी. बणर्जी द्वारा। पुराटाट्विक ख़ोजों के आधार पर हड़प्पा
की शभ्यटा को 2600 ईशा पूर्व-1900 ईशा पूर्व के कालख़ंड के बीछ भाणा गया है और
ये विश्व की प्राछीणटभ शभ्यटाओं भें शे एक है। बहुट बार इशे ‘शिंधु घाटी शभ्यटा’ भी
कहा जाटा है, क्योंकि प्रारंभ भें इशकी जिटणी भी बश्टियों की ख़ोज हुई, वे शभी शिंधु णदी
या इशकी शहयोगी णदियों के पाश या इशके आशपाश के भैदाणों भें श्थिट थीं। परण्टु
आजकल इशे हड़प्पा शभ्यटा कहा जाटा है, क्योंकि हड़प्पा ही वह पहला श्थाण था,
जिशशे इश शभ्यटा का अश्टिट्व प्रकाश भें आया। 

इशके अटिरिक्ट, हाल ही के
पुराटाट्विक अण्वेसणों शे ये शंकेट भिलटा है कि इश शभ्यटा का विश्टार शिंधु णदी के
पूरे के शुदूर विश्टार टक फैला हुआ था। इशीलिए, ये बेहटर है कि इश शभ्यटा को हभ
हड़प्पा शभ्यटा के णाभ शे ही पुकारें। ये भारट की प्रथभ णागरिक शभ्यटा है और विश्व
की अण्य प्राछीण शभ्यटाओं, जैशे भैशोपोटाभिया और भिश्र की शभकालीण है। हड़प्पाकालीण
लोगों के जीवण और शभ्यटा के शंबंध भें हभारी जाणकारी शिर्फ पुराटाट्विक ख़ुदाइयों पर
ही आधारिट है, क्योंकि उश काल की लिपि को अभी टक पढ़ा णहीं जा शका है। 

हड़प्पा शभ्यटा का उद्भव अछाणक णहीं हुआ। इशका विकाश धीरे-धीरे णवपासाण युग
की ग्राभीण शभ्यटा शे हुआ। ऐशा विश्वाश किया जाटा है कि शिंधु णदी के उपजाऊ
भैदाणी क्सेट्रा शे अधिकटभ उपज लेणे के लिए बेहटर टकणीकों के उपयोग के परिणाभश्वरुप
कृसि उट्पादण भें व द्धि हुई होगी। इशके फलश्वरुप इटणी बढ़टी फशल पैदा हुई होगी,
जिशशे गैर-कृसि आबादी के लोगों और प्रशाशकीय वर्ग इट्यादि के लिए, ख़ाद्यों और
उणके जीवण-यापण के लिए उट्पादण उपलब्ध हुआ होगा। इशशे दूर-दराज के प्रदेशों
के शाथ विणिभय और व्यापारिक शंबंध बढ़ाणे भें भी शहायटा भिली होगी। इशशे हड़प्पा
के लोगों भें शभृद्धि आई होगी और वे शहर बशाणे के योग्य बणे होंगे।

2000 ईशा पूर्व के आशपाश इश उप भहाद्वीप के विभिण्ण भागों भें अणेक प्रादेशिक
शभ्यटाओं का विकाश हुआ और ये भी पट्थर और टांबे के औजारों के उपयोग पर ही
आधारिट थीं। ये टाभ्र पासाण शभ्यटाएं, जो हड़प्पा शभ्यटा के क्सेट्र शे बाहर थीं, अधिक
शभद्ध और फली-फूलीं णहीं थी। बुणियादी टौर पर ये शभ्यटाएं ग्राभीण प्रक टि की थीं।
कालक्रभाणुशार इण शभ्यटाओं के उद्भव और विकाश का काल 2000 ई.पू.-700 ई.पू के
आशपाश भाणा गया है। ये शभ्यटाएं पश्छिभी और भध्य भारट भें भिलीं और इण्हें
गैर-हड़प्पा टाभ्र पासाण (छाल्कोलिथिक) शभ्यटा के रुप भें उल्लिख़िट किया गया है।

हड़प्पा शभ्यटा का उद्भव और विश्टार

पुराटाट्विक अवशेसों शे पटा छलटा है कि हड़प्पा शभ्यटा शे पहले लोग छोटे-छोटे गांवों
भें रहटे थे। शभय बीटणे के शाथ-शाथ छोटे कश्बे बणे और इण कश्बों शे हड़प्पा काल
के दौराण पूर्ण विकशिट शहरों का विकाश हुआ। वाश्टव भें हड़प्पा काल की शंपूर्ण
अवधि को टीण छरणों भें बांटा गया है (1) प्रारंभिक हड़प्पा काल (3500 ई.पू. शे 2600
ई.पू.)। इश काल की विशेसटा का उल्लेख़ भिलटा है, इशके भिट्टी शे बणे ढांछों, प्रारंभिक
व्यापार, कला और शिल्पों इट्यादि भें, (2) परिपक्व हड़प्पा काल ;2600 ई.पू.-1900 ई.पू.) यह
वह छरण है, जब हभें भट्ठे भें पकी ईटों शे बणे ढांछों वाले भली-भांटि विकशिट शहर, श्वदेशी
और विदेशी व्यापार और विविध प्रकार के शिल्प देख़णे को भिले और
(3) उट्टर हड़प्पा काल (1900 ई.पू.-1400 ई.पू.)- यह पटण का काल था, जिशके दौराण
शहर उजड़णे लगे थे और व्यापार शभाप्ट हो गया था, जिशशे धीरे-धीरे शहरीकरण की
भुख़्य विशिस्टटाएं लुप्ट होटी गई।

आइए शर्वप्रथभ हभ, हड़प्पा शभ्यटा के भौगोलिक विश्टार का जायजा लेटे हैं।
पुराटाट्विक ख़ुदाइयों शे पटा छला है कि यह शभ्यटा विश्ट ट क्सेट्रा भें फैली हुई थी, जिशभें
ण शिर्फ भारट के आधुणिक राज्य, जैशे-राजश्थाण, पंजाब, हरियाणा, गुजराट, भहारास्ट्र,
पश्छिभी उट्टर प्रदेश शभ्भिलिट थे, बल्कि पाकिश्टाण और अफगाणिश्टाण के कुछ भाग
भी शाभिल थे। इश शभ्यटा के कुछ भुख़्य श्थाण हैं – जभ्भू और कश्भीर भें भांडा;
अफगाणिश्टाण भें शॉरटुलई; पश्छिभी पंजाब (पाकिश्टाण) भें हड़प्प; शिंध भें भोहणजोदड़ो
और छण्हुदड़ो; राजश्थाण भें कालीबंगण; गुजराट भें लोथल और धौलावीरा; हरियाणा भें
बणवाली और राख़ीगढ़ी; भहारास्ट्र भें दाइभाबाद, जबकि भकराण टट (पाकिश्टाण-ईराण
की शीभा के पाश) पर श्थिट शुटकागेण्दारे हड़प्पा शभ्यटा शुदूर पश्छिभी छोर और
पश्छिभी उट्टर प्रदेश भें आलभग़ीर इशकी शुदूर पूर्वी शीभा है।

आबादियों के श्थाण के शंकेट भिलटे हैं कि हड़प्पा कालीबंगण (घग्गर-हाकरा णदी के
किणारे पर, जिशे आभ टौर पर लुप्ट णदी शरश्वटी के शाथ जोड़ा जाटा है), भोहणजोदड़ो
की धुरी, इश शभ्यटा का प्रभुख़ श्थल था और अधिकांश आबादी इशी क्सेट्रा भें श्थिट थी।
भिट्टी की किश्भ, वाटावरण और रहण-शहण की पद्धटि के परिप्रेक्स्य भें इश क्सेट्र की कुछ
शाभाण्य विशेसटाएं थीं। यहां की भूभि शभटल थी और शिंछाई और जल आपूर्टि के लिए
भाणशूण और हिभालयी णदियों पर णिर्भर थी। यहां की विशिस्ट भौगोलिक विशेसटाएं और
क सि पशुपालण शंबंधी अर्थव्यवश्था इश क्सेट्रा के प्रभुख़ लक्सण थे।

हड़प्पा की शहरी आबादी के अटिरिक्ट अणेक ऐशे श्थल थे, जहां पर पासाण युग के
शिकारी-शंग्रहकर्टा या घुभण्टु छरवाहों वाले प्रागैटिहाशिक काल के शभुदायों के लोग भी
शाथ-शाथ रहटे थे। कुछ श्थल बंदरगाहों या व्यापारिक श्थलों के रुप भें काभ भें लाए
जाटे थे। ध्याण देणे योग्य बाट है कि शहरीकरण को णिर्धारिट करणे के प्रभुख़ कारक
व्यापार, कर प्रणाली और लिपि इट्यादि होटे हैं। शहरी शभ्यटा कहलाए जाणे के लिए
हड़प्पा शभ्यटा इण शभी भाणकों पर ख़री उटरटी है।

हड़प्पा शभ्यटा की णगर योजणा

हड़प्पा शभ्यटा की शबशे दिलछश्प विशिस्टटा है, यहांँ की णगर योजणा। इशभें
अट्यधिक शभरुपटा देख़णे भें आई है, यद्यपि कहीं-कहीं पर प्रादेशिक रुप शे विविधटाएं
भी देख़णे भें आटी हैं। णगरों, गलियों, भकाणों के ढांछों, ईटों के आकार और णालियों
इट्यादि की योजणा भें एकरुपटा दिख़ाई देटी है। लगभग शभी भुख़्य श्थलों (हड़प्पा,
भोहणजोदड़ो, कालीबंगण और अण्य), को दो भागों भें विभाजिट किया गया है-पश्छिभ की
ओर एक ऊंछे छबूटरे पर बणा किला और आबादी के पूर्वी भाग भें बणा णिछला णगर।
किले भें बड़े-बड़े ढांछे बणे हुए हैं जो शायद शाशकीय या धार्भिक अणुस्ठाणों के केण्द्रों
के रुप भें कार्य करटे होंगे। रिहायशी भवण णिछले णगर भें बणे हुए हैं। शड़कों का ढांछा
इश प्रकार बणा था कि ये एक-दूशरे भार्ग को शभकोण पर काटटे हुए णिकलटे थे।
इणशे शहर अणेक रिहायशी ख़ंडों भें बंट जाटा है। भुख़्य भार्ग को छोटी गलियों के
शाथ जोड़ा गया है। घरों के द्वार भुख़्य भार्गों पर ण होकर इण शंकरी गलियों भें
ख़ुलटे थे। अधिकांश भकाण भट्ठी भें पकी ईटों शे बणे थे। बड़े घरों भें कई कभरे
होटे थे, जिशभें एक छौकोर आंगण भी होटा था। इण घरों भें अपणे णिजी कुएं, रशोई
घर और श्णाणागार के छबूटरे होटे थे।

घरों के आकार भें अंटर शे ये शंकेट भिलटा
है कि धणी लोग बड़े घरों भें रहटे थे और एक कभरे के घरों या बैरकों भें शंभवट:
शभाज के णिर्धण वर्ग के लोग रहटे होंगे। हड़प्पा काल के लोगों की जल णिकाशी
व्यवश्था बहुट व्यवश्थिट और विकशिट थी। हर घर भें, णालियां थीं, जो गली की
णाली शे जाकर भिलटी थीं। ये णालियां ईटों शे बणे णरभोख़ों (भैणहोल्श) पर पट्थर
की शिल्लियों शे ढँकी होटी थीं (जिण्हें शफाई के लिए हटाया जा शकटा था) जिण्हें
णियभिट अंटराल पर गलियों के किणारे बणाया जाटा था। इशशे पटा छलटा है कि
उण लोगों को शफाई विज्ञाण की अछ्छी जाणकारी थी।

हड़प्पा के णगरों के कुछ भुख़्य ढांछों के अवशेस

भोहणजोदड़ो का ‘विशाल श्णाणागार’ एक बहुट ही प्रभुख़ श्थल है ।इशके छारों
ओर बराभदे बणे हैं और उट्टरी और दक्सिणी, दोणों छोरों पर शीढ़ियां बणी हैं। श्णाणागार के
फर्श पर बिटूभण कोयले का पलश्टर किया गया था टाकि पाणी का रिशाव ण हो। शाथ के
एक कभरे शे पाणी की आपूर्टि होटी थी और पाणी की णिकाशी के लिए णाली थी।
श्णाणागार के छारों ओर किणारे पर कुछ कभरे बणे थे, जो शायद कपड़े बदलणे के काभ
भें आटे होंगे। विद्वाणों का भट है कि ‘विशाल श्णाणागार’ धार्भिक क्रियाओं के लिए श्णाण
के लिए उपयोग भें लाया जाटा था। ‘विशाल श्णाणागार’ के पश्छिभ की ओर अण्ण भंडारण
के लिए एक धाण्य कोठार श्थिट थी। इशभें अण्ण के भंडारण के लिए ईटों शे बणे कई
छौकोर ख़ंड बणे थे। हड़प्पा भें भी एक कोठार भिला है। इशभें ईटों शे बणे गोल छबूटरों की पंक्टि: हैं, जो शायद अण्ण की कुटाई के लिए उपयोग भें लाए जाटे होंगे। इशकी
जाणकारी यह शे प्राप्ट गेहूं और जौ के भूशों के छिलकों शे भिली है।

भोहणजोदड़ो का विशाल श्णाणागार
भोहणजोदड़ो का विशाल श्णाणागार

लोथल भें ईटों शे बणा एक ढांछा भिला है, जिशे गोदीबाड़ा भाणा जाटा है, जहां जहाजों
के लंगर डाले जाटे होंगे और ये भाल के उटारणे-छढ़ाणे के काभ भें आटा होगा । इशशे ये शंकेट भिलटा है कि लोथल हड़प्पा के लोगों के लिए एक प्रभुख़ बंदरगाह
और व्यापारिक केंद्र था।

लोथल का गोदी बाड़ा
लोथल का गोदी बाड़ा

हड़प्पा शभ्यटा की कृसि

हड़प्पा शभ्यटा की शभृद्धि इशकी फली-फूली विकशिट आर्थिक गटिविधियों पर आधारिट
थी, जैशे कृसि, कला, शिल्प और व्यापार। शिंधु णदी की उपजाऊ कछार भूभि णे यहां की
अट्यधिक कृसि उपज भें अपणा भारी योगदाण किया। इशशे, हड़प्पा के लोगों को
आण्टरिक और बाह्य दोणों श्टरों पर और उद्योगों को विकशिट करणे भें भी शहायटा
भिली। कृसि के शाथ-शाथ पशु-पालण हड़प्पा की अर्थव्यवश्था का आधार था। हड़प्पा,
भोहणजोदड़ो और लोथल जैशे श्थाणों पर भिले कोठार, अण्ण भंडारण के काभ भें लिए
जाटे थे। कृसि के काभों भें प्रयुक्ट औजारों के शंबंध भें हभारे पाश कोई श्पस्ट शाक्स्य णहीं
हैं। फिर भी कालीबांगण के एक ख़ेट भें हल छलाणे या जुटाई के कुछ छिह्ण देख़णे भें
आए हैं। इशशे शंकेट भिलटा है कि हल शे ख़ेटी होटी थी।

हरियाणा के हिशार जिले भें बणवाली शे भिट्टी शे बणे हल के भिलणे की शूछणा भिली
है। कुओं शे पाणी णिकालकर छोटे पैभाणे पर और णदियों के पाणी का णहरों के जरिये
रुख़ भोड़कर ख़ेटों की शिंछाई की जाटी थी। भुख़्य ख़ाद्य फशलों भें गेहूं, जौ, टिल,
शरशों, भटर और राई इट्यादि शाभिल थी। लोथल और रंगपुर भें भिट्टी के बर्टणों भें
छावल की भूशी के बछे हुए कणों शे वहां छावल की बड़ी ख़ेटी के शाक्स्य भी भिले हैं।
कपाश यहां की एक अण्य प्रभुख़ फशल थी। भोहणजोदड़ो भें बुणे हुए कपड़े का एक
टुकड़ा प्राप्ट हुआ है। अणाजों के अटिरिक्ट भछली और पशुओं का भांश भी हड़प्पा के
लोगों के आहार का हिश्शा था।

हड़प्पा शभ्यटा के उद्योग और शिल्प

हड़प्पा के लोग लोहे के अटिरिक्ट लगभग शभी प्रकार की धाटुओं शे परिछिट थे। वे
शोणे और छांदी की वश्टुएँ बणाटे थे। शोणे की वश्टुओं भें भोटी, बाजूबंद, शुइयां और
अण्य गहणे शाभिल थे। परण्टु शोणे शे ज्यादा छांदी का उपयोग अधिक प्रछलण भें था।
बहुट बड़ी शंख़्या भें छांदी के गहणे, टश्टरियां इट्यादि प्राप्ट हुई हैं। टांबे के औजार और
अश्ट्र-शश्ट्र भी बड़ी शंख़्या भें प्राप्ट हुए हैं। शाभाण्य औजारों भें कुल्हाड़ी, आरी, छैणी,
छाकू, भाले की णोकें और टीरों के शीर्स इट्यादि शाभिल हैं। ध्याण देणे की बाट है कि
हड़प्पा के लोगों द्वारा बणाए गए शश्ट्र ज्यादाटर शुरक्साट्भक प्रकृटि के थे, क्योंकि टलवार जैशे शश्ट्रों के भिलणे के कोई प्रभाण णहीं भिले हैं। पट्थर के औजारों का भी
आभ टौर पर उपयोग होटा था। टांबा, राजश्थाण भें ख़ेटड़ी णाभक श्थाण शे आटा था।
शोणा हिभालयी णदियों की टराई और दक्सिण भारट शे आटा था, और छांदी भैशोपोटाभिया
शे। हभें कांशे के उपयोग के प्रभाण भी भिले हैं परण्टु बहुट ही शीभिट श्टर पर। इश
शंबंध भें शबशे प्रशिद्ध णभूणा है भोहणजोदड़ो शे भिली कांशे शे बणी ‘णृट्यांगणा का एक भूर्टि
छिट्र। ये णग्ण णारी की एक भूर्टि है, जिशका एक हाथ णिटभ्ब पर है दूशरा णृट्य की भुद्रा
भें हवा भें झूल रहा है। इशणे बहुट शारी छूड़ियांँ पहण रख़ी हैं।

भोहणजोदड़ो भें भिली णर्टकी का भूर्टि
भोहणजोदड़ो भें भिली णर्टकी का भूर्टि

भणके बणाणे की कला भी प्रभुख़ शिल्पकारी थी। बहुभूल्य पट्थरों और रट्णों शे भोटी
बणाए जाटे थे जैशे गोभेद (अगेट) और कॉर्णेलियण। भोटी बणाणे के लिए श्टिएटाइट
का उपयोग होटा था। छण्हुदड़ों और लोथल भें भोटी बणाणे वालों की दुकाणों के शाक्स्य
भिले हैं। शोणे और छांदी के भणके भी प्राप्ट हुए हैं। हाथी दांट की णक्काशी और भोटि:,
बाजूबंद और अण्य शजावटी शाभणों पर भीणाकारी का काभ भी छलण भें था। अट: हभ
कह शकटे हैं कि हड़प्पा के लोगों को अणेक कलाओं और शिल्पकारी के काभों भें
दक्सटा प्राप्ट थी।

हड़प्पा काल की कलाकृटियां भें एक प्रशिद्ध कलाट्भक भूर्टि है भोहणजोदड़ो भें भिली दाढ़ी
वाले पुरुस की पट्थर शे बणी एक भूर्टि । इशकी आंख़ें अधभुंदी हैं जैशे कि
ये ध्याण भगण भुद्रा भें है।

इशके बाएँ कंधे पर कशीदाकारी किया गया दुशाला है। कुछ विद्वाणों के भट भें ये किण्ही
प्रछारक का धड़ हो शकटा है।

हड़प्पा के अणेक श्थलों शे पुरुसों और भहिलाओं की बहुट बड़ी शंख़्या भें भिट्टी की
भूर्टियां प्राप्ट हुई हैं । भहिलाओं की भूर्टियों की शंख़्या पुरुसों की भूर्टियों शे
अधिक है और ऐशा भाणा जाटा है कि ये भाटहश्देवी की पूजा के शंबंध भें प्रट्यक्स प्रभाण
हैं। इशके अटिरिक्ट पक्सियों, बंदरों, कुट्टों, भेड़ों, पालटू पशुओं, कूबड़ शहिट और
कूबड़-रहिट बैलों के, अणेक प्रकार के भूर्टियों के णभूणे प्राप्ट हुए हैं। फिर भी, इश
शंबंध भें शबशे उल्लेख़णीय णभूणे हैं-पकी भिट्टी की बणी गाड़ियां।

दाढ़ी वाले पुरूस की पट्थर  की भूर्टि
दाढ़ी वाले पुरूस की पट्थर की भूर्टि

भिट्टी के बर्टण बणाणा भी हड़प्पा काल के लोगों का एक प्रभुख़ उद्योग था। ये भुख़्य रुप
शे छाक-पहिये पर बणाए जाटे थे और इण पर लाल रंग करणे के बाद काले रंग शे
शजावट की जाटी थी। ये विभिण्ण आकारों और शक्लों भें पाए गए हैं। छिट्रकारी के
णभूणों भें अलग-अलग भोटाई की आड़ी लकीरेंं, पट्टों के णभूणे, पाभ और पीपल के पेड़,
पक्सी, भछलियां और पशु इट्यादि के छिट्र भी भिट्टी के बर्टणों पर बणाए गए हैं। हड़प्पा
के लोग विभिण्ण प्रकार की भुहरें बणाटे थे। विभिण्ण श्थाणों शे लगभग दो हजार शे भी
ज्यादा भुहरें प्राप्ट हुई हैं। ये भुहरें आभ टौर पर छौकोर शक्ल भें थीं और शेलख़ड़ी शे
बणी थीं। ध्याण देणे की बाट है कि इण भुहरों पर अणेक पशुओं के छिट्र थे परण्टु किण्ही
भी भुहर पर घोड़े का छिट्र णहीं था। इशशे हभारे विद्वाण ये टर्क करटे रहे हैं कि हड़प्पा
के लोग घोड़े शे परिछिट णहीं थे। यद्यपि ऐशे विद्वाण भी हैं जो इश भट शे शहभट णहीं
हैं।

पशु की भिट्टी की भूर्टियां
पशु की भिट्टी की भूर्टियां
भाणव की भिट्टी की भूर्टियां
भाणव की भिट्टी की भूर्टियां 

विभिण्ण प्रकार के पशुओं के अटिरिक्ट, हड़प्पा की भुहरों पर हड़प्पाकाल की लिपि के
कुछ छिण्ह भी बणे हैं परण्टु अभी टक इश लिपि को पढ़ा णहीं जा शका है। शबशे प्रशिद्ध
भुहर वह है, जिश पर शींगों वाले एक पुरुस-देव का छिट्र बणाया
गया है। इशके टीण शिर हैं और ये पद्भाशण की भुद्रा भें बैठा है और ये छारों टरफ शे
हाथी, बाघ, गैंडा और एक भैंश जैशे जाणवरों शे घिरा है। अणेक विद्वाण इशे भगवाण
पशुपटि (पशुओं के देवटा) का प्राछीण रुप भाणटे हैं परण्टु कुछ विद्वाणों का इश विछार
शे भटभेद है।

हड़प्पा शभ्यटा का व्यापार

हड़प्पा के लोगों की णगरीय अर्थव्यवश्था की एक भहट्ट्वपूर्ण विशेसटा थी, उणका
आंटरिक (देश के अंदर) और बाह्य (विदेशों भें) दोणों टरह का व्यापारिक टंट्रा जाल
(णेटवर्क)। णगर की आबादी अपणे ख़ाद्यों और अण्य जरुरी छीजों के लिए अपणे
आशपाश के गांवों पर णिर्भर थी। इशलिए गांवों-शहरों (ग्राभीण-णगरों) के परश्पर
शंबंध विकशिट हुए। इशी प्रकार शहरों के शिल्पकारों को अपणी छीजें बेछणे के लिए
बाजारों की जरूरट थी। इशशे शहरों के बीछ परश्पर शंपर्क श्थापिट हुए। व्यापारियों
णे विदेशी भूभागों, विशेस रुप शे भैशोपोटाभिया के शाथ व्यापारिक शंबंध श्थापिट किए,
जहां इण छीजों की अधिक भांग की। ध्याण देणे की बाट है कि शिल्पकारों को अपणी
छीजें बणाणे के लिए अणेक प्रकार की धाटुओं और बहुभूल्य रट्णों की जरूरट पड़टी थी
परण्टु श्थाणीय रुप शे उपलब्ध ण होणे के कारण इण छीजों को बाहर शे भंगवाणा पड़टा
था। अपणे उद्गभ श्थल शे दूर इश कछ्छे भाल की दूशरे श्थाणों पर उपश्थिटि शे
श्वाभाविक रुप भें ये शंकेट भिलटा है कि ये वश्टुएं णिश्छिट टौर पर उण श्थाणों पर
वश्टुओं के विणियभ की प्रक्रिया के भाध्यभ शे ही वहां पहुंछी होंगी। 

इश प्रकार
राजश्थाण भें टांबे की बहुटायट होणे के कारण हड़प्पा के लोग यहां ख़ेटड़ी श्थिट
टांबे की ख़ाणों शे भुख़्यट: टांबा प्राप्ट करटे थे। कर्णाटक भें कोलार श्थिट शोणे की
ख़ाणों और हिभालयी णदियों के टराई के क्सेट्रों शे शंभवट: शोणे की पूर्टि होटी थी।
छांदी का श्रोट शायद राजश्थाण की ज्वार श्थिट ख़ाणें रही होंगी। ऐशा विश्वाश
किया जाटा है कि छांदी शंभवट: हड़प्पा की वश्टुओं के विणियभ के बदले भें भैशोपोटाभिया शे भी प्राप्ट की जाटी थी। भोटी बणाणे के लिए प्रयुक्ट किए जाणे वाले
बहुभूल्य रट्ण णील वैदूर्य भणि का श्रोट अफगाणिश्टाण के उट्टर-पूर्व भे बदकशाण ख़ाणों भें
श्थिट था। फीरोज़ा और हरिटाश्भ शायद भध्य एशिया शे लाए जाटे थे। गोभेद, श्फटिक
और कार्णेलियण की आपूर्टि पश्छिभी भारट शे होटी थी। शीप-शंख़ इट्यादि गुजराट और
इशके आशपाश के टटीय क्सेट्रों शे आटे होंगे। अछ्छे किश्भ की इभारटी लकड़ी और अण्य
वणोट्पाद शायद जभ्भू जैशे उट्टरी क्सेट्रों शे आटे होंगे। 

हड़प्पा के लोग भैशोपोटाभिया के
शाथ विदेश-व्यापार भी करटे थे। ये व्यापार भुख़्य रुप शे फारश की ख़ाड़ी भें श्थिट ओभाण
और बहरीण के जरिये होटा था। हड़पा के क्सेट्रों भें भिले भोटि, भुहरों, पांशे की गोटियों जैशी
कलाकृटियां इट्यादि की भौजूदगी शे इशकी पुस्टि होटी है। यद्यपि उण क्सेट्रों की कलाकृटि हड़प्पा के श्थलों भें बहुट ही कभ श्थाणों पर भिली हैं, परण्टु पश्छिभी एशिया या पारशी भूल
की एक भुहर लोथल भें प्राप्ट हुई है, जिशशे इश शंबंध की पुस्टि होटी है। शूशा, उर और
भैशोपोटाभिया के णगरों शे लगभग दो दर्जण हड़प्पा की भुहरें भिली हैं। भुहरों के अटिरिक्ट
हड़पा भूल की जो अण्य कलाकृटि वहां भिली हैं, उणभें भिट्टी के बर्टण, उट्कीर्ण कार्य किए
गए कार्णेलियण के भोटी और पांशे शाभिल हैं।

पशुपटि की भुहर
पशुपटि की भुहर

भैशोपोटाभिया शे भिले शिलालेख़ों शे हभें हड़प्पा के शाथ भैशोपोटाभिया के शंपर्क के
शंबंध भें हभें बहुभूल्य शूछणा भिलटी है। इण शिलालेख़ों शे दिलभुण, भगण और भेलुलूह
के शाथ व्यापार के शंकेट भिलटे हैं। विद्वाणों णे भेलुलूह के हड़प्पा के क्सेट्रा के शाथ,
भगण के भकराण टट के शाथ और दिलभुण के बहरीण के शाथ शंपर्कों की पहछाण की
है। इणशे शंकेट भिलटे हैं कि भैशोपोटाभिया भेलुलूह शे टांबा, कार्जेलियण, हाथी दांट,
शीपियां, वैदूर्य भणि, भोटी और आबणूश आयाट करटा था। भैशोपोटाभिया शे हड़प्पा
को णिर्याट की जाणे वाली वश्टुओं भें शाभिल थे टैयार कपड़े, ऊण, इट्र, छभड़े की
वश्टुएं और छांदी। छांदी के अटिरिक्ट ये शभी वश्टुएं णाशवाण हैं। ये भुख़्य कारण रहा
होगा, जिशकी वजह शे हड़प्पा के श्थलों पर हभें इण वश्टुओं के अवशेस णहीं भिलटे।

हड़प्पा शभ्यटा की शाभाजिक विशिस्टटाएं

ऐशा लगटा है कि हड़प्पा के लोगों का शभाज भाट शट्टाट्भक प्रकृटि का था। इश भट
का आधार है भाट देवी की लोकप्रियटा जैशा कि पंजाब और शिंध प्रदेशों भें बड़ी शंख़्या
भें भिली पक्की भिट्टी की बणी णारी भूर्टियां शे भी शंकेट भिलटा है। क्योंकि हड़प्पा की
लिपि को अभी टक पढ़ा णहीं जा शका है, इशलिए हभें इश शंबंध भें भिली शीभिट
शूछणाओं पर ही शंटुस्ट रहणा होगा।

हड़प्पा के शभाज भें विविध व्यवशायों शे जुड़े लोग शाभिल थे। इणभें पुजारी, योद्धा,
किशाण, व्यापारी और कारीगर (राजगीर, बुणकर, शुणार, कुभ्हार इट्यादि) शाभिल थे।
हड़प्पा और लोथल जैशे श्थाणों पर भिले भकाणों के ढांछों शे पटा छलटा है कि विभिण्ण
वर्गों के लोगों द्वारा आवाश के लिए भिण्ण-भिण्ण प्रकार के भवणों का उपयोग किया जाटा
था। हड़प्पा के कोठार के पाश बणे कारीगरों के घरों शे इश वर्ग के कारीगरों की
उपश्थिटि के शंबंध भें पुस्टि होटी है। इशी प्रकार, लोथल भें टांबे का काभ करणे वाले
कारीगरों और भोटी बणाणे वाले काभगारों की कार्यशालाओं और उणके लिए आवाशीय
घरों के भिलणे के भी प्रभाण भिले हैं। वाश्टव भें, हभ ये कह शकटे हैं कि जो लोग बड़े
घरों भें रहटे थे, वे धणी वर्ग शे थे और जो कारीगरों के क्वार्टरों जैशी कोठरियों (बैरकों)
भें रहटे थे, वे भजदूर वर्ग शे शंबंधिट थे।

उणकी वेशभूसा के ढंग के शंबंध भें हभारी शीभिट जाणकारी उश काल के दौराण भिली
पक्की भिट्टी और पट्थर की बणी भहिलाओं की भूर्टियों पर आधारिट है। पुरुसों को
अधिकटर जिश पहणावे भें दर्शाया गया है, उशभें णीछे के आधे भाग भें छारों ओर एक
धोटी-शी बंधी है, जिशका एक शिरा बाएं कंधे और दाएं बाजू के णीछे हैं। एक अण्य
पोशाक है छोगे (ढीला कपड़ा) की टरह का परिधाण, जिशशे शरीर के णिछले भाग को
ढँका गया है। वे लोग शूटी और ऊणी कपड़े उपयोग भें लाटे थे। भोहणजोदड़ो भें बुणाई
किया गया एक कपड़ा भिला है। अणेक श्थाणों पर भिली टकलियों और शुइयों शे ये
शाक्स्य भिलटा है कि उश शभय कटाई और बुणाई का प्रछलण था।

हड़प्पा के लोगों को शजणे-शंवरणे का शौक था। विभिण्ण श्थलों पर भिली पुरुसों और
भहिलाओं की भूर्टियों शे बाल शंवारणे के प्रभाण भिलटे हैं। पुरुस और भहिलाएं अपणे बाल
अलग-अलग टरीके शे शंवारटे थे। लोग आभूसण पहणणे के भी शौकीण थे। इणभें भुख़्य
टौर पर श्ट्राी और पुरुस दोणों द्वारा उपयोग किए जाणे वाले णेकलेश, बाजूबंद, काणों के
बूंदे, भोटी-भणकें, छूड़ियां इट्यादि शाभिल थीं। ऐशा लगटा है कि धणी लोग शोणे, छांदी
और बहुभूल्य रट्णों शे बणे गहणे पहणटे थे, जबकि णिर्धण लोगों को पकी भिट्टी के गहणों
शे ही शंटुस्ट होणा पड़टा था।

हड़प्पा के लोगों के धार्भिक विश्वाश और रीटि-रिवाज

हड़प्पा के लोगों के धार्भिक विश्वाशों और रीटि-रिवाजों के शंबंध भें हभारी जाणकारी,
अधिकटर हभें उपलब्ध

 भूर्टियों पर आधारिट है। हड़प्पा के लोगों के धर्भ को आभ टौर
पर जीवोपाशक याणी पेड़ों व पट्थरों के उपाशक के रुप भें जाणा गया है ।
हड़प्पा के विभिण्ण श्थलों पर भिली पकी भिट्टी की अशंख़्य भणि भूर्टियों को भाट देवी की
उपाशणा के शाथ जोड़कर देख़ा जाटा है। इणभें शे अधिकांश भूर्टियों भें
भहिलाओं णे छौड़ी-शी करधणी, बाघ की ख़ाल का कपड़ा और गले भें हार पहण रख़ा
है। वे पंख़े के आकार का शिरोवश्ट्रा पहणे हुए हैं। कुछ भूर्टियों भें भहिला को गोद भें एक
शिशु लिए दिख़ाया गया है टो एक भूर्टि भें एक भहिला के गर्भ शे एक पौधा उगटा हुआ
दर्शाया गया है। दूशरी भूर्टि शायद भू-देवी की प्रटीक है। बहुट शे विद्वाण भाणटे हैं कि
हड़प्पा वाशी लिंग (पुरुस यौणांग) और योणि (भहिला यौणांग) के उपाशक थे, परण्टु कुछ
इश भट शे अशहभट हैं।

हड़प्पावाशियों का पुरुस देवटा भें आश्था का शाक्स्य भिलटा है। एक भुहर पर बणी एक
आक टि शे, जिशभें एक पुरुस के शिर पर भैंशे के शींग वाला भुकुट है, जो यौगिक भुद्रा
भें बैठा है और इशके आशपाश कई पशु हैं। अणेक विद्वाण इशे भगवाण पशुपटि (पशुओं
के देवटा) या ‘आदि शिव’ के रुप भें देख़टे हैं। यद्यपि कुछ विद्वाणों का इशशे भटभेद है।
एक अण्य भुहर भें एक शींगों वाले देवटा की आक टि है, जिशके बाल हवा भें उड़टे हुए
हैं और वह णग्ण है और पीपल के पेड़ की शाख़ाओं के बीछ ख़ड़ा है, एक उपाशक घुटणों
के बल उशके शभक्स बैठा है। इशशे पेड़ों की उपाशणा का पटा छलटा है। हड़प्पावाशियों
भें पशुओं की उपाशणा के प्रछलण का भी प्रभाण भिलटा है।

ई.पू. के भध्य देख़णे भें आया। आबादी के क्सेट्रा भी शिकुड़णे लगे थे। उदाहरणट:, उट्टर
काल की अवधि के दौराण हड़प्पा, जो भूल रुप शे 85 हैक्टेयर के क्सेट्रा भें फैला था। इश
काल भें शिर्फ टीण हैक्टेयर की आबादी भें शिकुड़ कर रह गया था। ऐशा लगटा है कि
यहां की आबादी किण्हीं दूशरे क्सेट्रों भें श्थाणांटरिट हो गई थी। इशका शंकेट भिलटा है
कालीबंगण और लोथल जैशे कुछ श्थाणों शे अग्णि
की उपाशणा के भी कुछ शाक्स्य भिले हैं। कालीबंगण
भें ईटों शे बणे अणेक छबूटरों की पंक्टियों और
उण पर बणे गड्ढ़ों भें राख़ और पशुओं की
हड्डियां भी भिली हैं। अणेक विद्वाण इण्हें हवण
कुंड भाणटे हैं। इशशे यह भी प्रदर्शिट होवे है कि
विभिण्ण क्सेट्रों के हड़प्पावाशियों भें भिण्ण-भिण्ण
धार्भिक रीटि-रिवाज प्रछलिट थे, क्योंकि हड़प्पा
या भोहणजोदड़ो भें किण्ही भी हवण कुंड के होणे के प्रभाण णहीं भिले हैं। दफण के
रीटि-रिवाज और इणशे शंबंधिट धार्भिक कर्भकांड, किण्ही भी शभ्यटा के धर्भ का बहुट
ही भहट्ट्वपूर्ण पहलू होटे हैं। टथापि इश शंदर्भ भें हड़प्पा-कालीण श्थलों पर भिले भिश्र
पिराभिडों जैशी इभारटों या भैशोपोटाभिया श्थिट दर भें बणी शाही कब्रगाहों की टरह की
कोई भी इभारट णहीं भिली है।

भोहणजोदडो कि भाट देवी
भोहणजोदडो कि भाट देवी

शवों को प्राय: उट्टर-दक्सिण दिशा भें लिटाया जाटा था, जिशभें शिर उट्टर की ओर और
पांव दक्सिण की ओर होटे थे। भृटकों को, अलग-अलग शंख़्या भें, उणके शाथ भिट्टी के
बर्टण रख़कर दफणाया जाटा था। कुछ कब्रों भें शवों के शाथ छूड़ियां, भोटी, टांबे के दर्पण भोहणजोदड़ों शे भिला प्रटीकाट्भक पीपल-वक्स  भोहणजोदड़ों की भाट देवी  भोहणजोदड़ों भें भिली कूबड़ वाले बैल की भुहर
इट्यादि जैशी वश्टुएं रख़कर दफणाया जाटा था। इशशे यह भी शंकेट भिलटा है कि
हड़प्पावाशी पुणर्जण्भ भें विश्वाश रख़टे थे। लोथल भें टीण ऐशी कब्रें भिली हैं, जिणभें
भहिला और पुरुस को इकट्ठे दफणाया गया है। कालीबंगण भें प्रटीकाट्भक रूप शे
दफणाणे का एक शाक्स्य भिला है। याणी एक कब्र भिली है, जिशभें बर्टण रख़े हैं, परण्टु कोई
हड्डियां या कंकाल णहीं है। रीटि-रिवाजों भें पाई गई इण विविधटाओं शे पटा छलटा
है कि हड़प्पा शभ्यटा भें शंभवट: भिण्ण-भिण्ण प्रकार के धार्भिक विश्वाश
प्रछलण भें थे।

भोहणजोदडो भें भिली कूबड वाले बैल की भोहर
भोहणजोदडो भें भिली कूबड वाले बैल की भोहर

हड़प्पा शभ्यटा की लिपि

हड़प्पावाशी शिक्सिट थे। हड़प्पा की भुद्राओं पर अणेक प्रकार के छिह्ण या आक टियां बणी
हैं। हाल ही भें किए गए अध्ययणों शे यह शंकेट भिले हैं कि हड़प्पा की लिपि भें लगभग
400 छिह्ण हैं और इशे दाई शे बाई ओर को लिख़ा जाटा है। परण्टु अभी टक इश लिपि
को पढ़ा णहीं जा शका है। ऐशा शभझा जाटा है कि ये अपणे भावों को शीधे व्यक्ट करणे
के लिए किण्ही भावछिट्र याणी छिट्रकटि, छिह्ण या अक्सर का प्रयोग करटे थे। हभें उणकी
भासा की कोई जाणकारी णहीं है, परण्टु कुछ विद्वाणों को विश्वाश है कि वे ‘ब्राहुई’ भासा
बोलटे थे, जिश बोली को पाकिश्टाण के बलूछी लोग आज भी बोलटे हैं। टथापि अभी इश
बारे भें शाफ़ टौर शे कुछ णहीं कहा जा शकटा।

हड़प्पा शभ्यटा का पटण

हड़प्पा की शभ्यटा 1900 ई.पू. टक फलटी-फूलटी रही। इश शभ्यटा के बाद की
अवधि को णगरी शभ्यटा के बाद के छरण (उट्टरवर्टी हड़प्पावाशी काल) के रूप भें जाणा
जाटा है। इश काल की विशेसटा को इश प्रकार रेख़ांकिट किया गया कि इशभें
णगर-योजण, लेख़ण कला, भाप-टोलों भें एकरूपटा, भिट्टी के बर्टणों भें शभाणटा इट्यादि
जैशे भुख़्य लक्सण धीरे-धीरे लुप्ट होणे लगे थे। यह अधोपटण 1900 ई.पू. -1400
ई.पू. के भध्य देख़णे भें आया। आबादी क्सेट्रा भी शिकुड़णे लगे थे। उदाहरणट:, उट्टर काल
की अवधि के दौराण हड़प्पा, जो भूल रूप शे 85 हैक्टेयर के क्सेट्रा भें फैला था। इश काल
भें शिर्फ टीण हैक्टेयर की आबादी भें शिकुड़ कर रह गया था। ऐशा लगटा है कि यहां
की आबादी किण्हीं दूशरे क्सेट्रों भें श्थाणांटरिट हो गई थी। इशका शंकेट भिलटा है उट्टर
हड़प्पा काल भें गुजराट, पूर्वी पंजाब, हरियाणा और अपर-दोआब क्सेट्रों के बाहरी क्सेट्रों भें
पाई गई णई बश्टियों की अणेक श्थापणाएं।

आपको हैराणी होगी कि हड़प्पा शभ्यटा का अंट कैशे हुआ। इश शंबंध भें विद्वाणों के अणेक
भट हैं।

  1. कुछ विद्वाणों का शुझाव है कि बाढ़ और भूकंप जैशी प्राक टिक आपदाओं णे इश
    शभ्यटा को ख़ट्भ किया होगा। ऐशा विश्वाश किया जाटा है कि भूकंप के
    परिणाभश्वरुप शिंधु णदी के णिछले भैदाणी, बाढ़ वाले क्सेट्रों का श्टर ऊंछा उठ गया
    होगा। इशशे शभुद्र की टरफ जाणे को णदी के टल भार्ग भें रुकावट आ गई होगी,
    जिशशे भोहणजोदड़ो णगर डूब गया होगा। परण्टु इशशे केवल भोहणजोदड़ो के ख़ट्भ
    होणे का उल्लेख़ भिलटा है ण कि पूरी शभ्यटा का।
  2. कुछ विद्वाणों के भटाणुशार घग्गर-हाकरा णदी के भार्ग भें परिवर्टण आणे के कारण
    शुस्क बंजर धरटी बढ़टी गई होगी, जिशकी वजह शे पटण हुआ। इश शिद्धांट के
    अणुशार 2000 ई.पू. के आशपाश बंजरटा की परिश्थिटि बढ़टी गई, इशशे क सि
    उट्पादण पर प्रभाव पड़ा होगा, जिशशे इशका लोप हुआ।
  3. पटण के कारणों भें, आर्यों के आक्रभण के शिद्धांट का भी उल्लेख़ किया गया है,
    लेकिण आंकड़ों के आलोछणाट्भक व गंभीर विश्लेसण के आधार पर अब इश भट को
    पूरी टरह णकार दिया गया है।

इश प्रकार कोई भी एक अकेला ऐशा कारण णहीं है, जिशशे शंपूर्ण शभ्यटा के विणाश का
पटा लग शके। ज्यादा शे ज्यादा इणशे शिर्फ कुछ शिस्ट श्थलों या क्सेट्रों के णस्ट होणे
के शंबंध भें ही पटा छल शकटा है। अट: प्रट्येक शिद्धांट की आलोछणा हुई। फिर भी,
पुराटाट्विक शाक्स्यों शे शंकेट भिलटा है कि हड़प्पा शभ्यटा का पटण अछाणक णहीं हुआ,
बल्कि धीरे-धीरे हुआ और अंट भें ये शभ्यटा अण्य शभ्यटाओं भें घुलटी-
भिलटी छली गई।

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