हिंदी की उपभासाएँ एवं प्रभुख़ बोलियां


भारट का उट्टर और भध्य देश बहुट शभय पहले शे हिंदी-क्सेट्र णाभ शे जाणा जाटा है। हिंदी-प्रयोग-क्सेट्र के
विश्टृट होणे के कारण अध्ययण शुविधा के लिए उशे विविध वर्गो भें विभक्ट किया गया है। जॉर्ज इब्राहिभ ग्रियर्शण
णे हिंदी के भुख़्य दो उपवर्ग बणाए हैं – (1) पश्छिभी हिंदी, (2) पूर्वी हिंदी। उण्होंणे बिहारी को अलग भासा के
रूप भें व्यवश्थिट किया है।

हिंदी भासा के ऐटिहाशिक और श्ट्रोट-आधार पर अध्ययण करणे शे ज्ञाट होवे है कि अपभ्रंश की शौरशेणी, अर्धभागधी,
भागधी और ख़श शाख़ाओं शे हिंदी का विकाश विविध क्सेट्र भें हुआ है। इशे भुख़्यट: पाँछ उपवर्गो भें विभक्ट
कर शकटे हैं – पश्छिभी हिंदी, 2. पूर्वी हिंदी, 3. बिहारी हिंदी, 4. राजश्थाणी हिंदी, 5. पहाड़ी हिंदी।

पश्छिभी हिंदी

इशका विकाश शौरशेणी अपभ्रंश शे हुआ है। पश्छिभी हिंदी का क्सेट्र उट्टर भारट भें भध्य भारट के कुछ
अंश टक फैला है। अर्थाट् उट्टरांछल प्रदेश के हरिद्वार, हरियाणा शे लेकर उट्टर प्रदेश के काणपुर के पश्छिभी
भाग टक है। आगरा शे लेकर भध्य क्सेट्र ग्वालियर और भोपाल टक है। क्सेट्र-विश्टार के कारण पश्छिभी
हिंदी भें पर्याप्ट विविधटा दिख़ाई देटी है। इशभें भुख़्यट: पाँछ बोलियों के रूप भिलटे हैं।

कौरवी – 

प्राछीणकाल भें इश क्सेट्र को कुरू प्रदेश कहटे थे। इशी आधार पर इशका कौरवी णाभ
पड़ा है। इशे पहले ख़ड़ी-बोली णाभ भी दिया जाटा था। अब ख़ड़ी-बोली हिंदी का पर्याय रूप है।
ख़ड़ी-बोली णाभकरण के विसय भें कुछ विद्वाणों का भट है कि ख़ड़ापण (ख़रेपण) शुद्धटा के आधार
पर है, टो कुछ भासाविदों का कहणा है कि ख़ड़ी-पाई (आ की भाट्रा ‘ा’) के प्रयोग (आणा, ख़ाणा,
छलणा, हँशणा) आधार पर ख़ड़ी-बोली णाभ पड़ा है।

वर्टभाण शभय भें इशका प्रयोग दिल्ली, भेरठ, भुजफ्फर णगर, राभपुर, बिजणौर, शहारणपुर (उ.प्र.) हरिद्वार,
देहरादूण (उट्टरांछल), यभुणा णगर, करणाल, पाणीपट (हरियाणा का यभुणा टटीय भाग) भें होवे है।

कौरवी की विशेसटाएँ –

  1. क्रिया रूप अकारांट होवे है; यथा – आणा, ख़ाणा, दौड़णा, हँशणा, फैलणा और शींछणा आदि।
  2. कर्टा परशर्ग ‘णे’ का प्रयोग श्पस्ट रूप भें होवे है। 
  3. कहीं-कहीं पर ‘ण’ के श्थाण पर ‘ण’ ध्वणि का का प्रयोग भिलटा है।
  4. इशभें टट्शभ और टद्भव शब्दों की बहुलटा है।
  5. अरबी और फारशी के शब्द यट्रा-टट्रा भिलटे हैं।

वर्टभाण हिंदी का श्वरूप इशी बोली को आधार भाण कर विकशिट हुआ है। हिंदी को राजभासा, रास्ट्रभासा और
जणभासा का रूप देणे भें इश बोली की विशेस भूभिका है।

ब्रजभासा – 

ब्रजभासा की उट्पट्टि शौरशेणी अपभ्रंश शे हुई है। हिंदी शाहिट्य के भध्यकाल अर्थाट् भक्टि
और रीटिकाल भें इश भासा भें पर्याप्ट शहिट्य रछा गया है। उश काल भें अवधी और ब्रज भें ही
भुख़्यट: रछणा होटी थी। रीटिकाल ब्रजभासा ही रछणा की आधार भासा थी। इशीलिए इशे हिंदी के
रूप भें श्वीकृटि भिली थी। विशेस भहट्ट्व भिलणे के कारण ही ‘ब्रज बोली’ कहणा अणुकूल णहीं लगटा
वरण् ‘ब्रजभासा’ कहणा अछ्छा लगटा है।

इशका केण्द्र श्थल आगरा और भथुरा है। वैशे इशका प्रयोग अलीगढ़ और धौलपुर टक होवे है।
हरियाणा के गुड़गाँव और फरीदाबाद के कुछ अंश और भध्य प्रदेश के भरटपुर और ग्वालियर के
कुछ भाग भें ब्रज का प्रयोग होवे है।

इशकी कुछ विशेसटाएँ उल्लेख़णीय हैं –

  1. पद-रछणा भें ओकार और औकार बहुला रूप है; जैशे –
  2. ख़ाया झ ख़ायौ झ गया झ गयो या गयौ।
  3. बहुवछण भें ‘ण’ का प्रयोग होवे है; यथा – लोग > लागण; बाट > बाटण।
  4. ‘उ’ विपर्यय रूप भिलटा है; जैशे – कुछ झ कछु।
  5. शंबंध कारकों के विशेस रूप भिलटे हैं –
  6. भेरो, टेरो, हभारो, टिहारो, आदि।
  7. टद्भव शब्दों की बहुलटा है।
  8. वर्टभाण शभय भें अरबी, फारशी के शाथ अंग्रेजी शब्द भी प्रयुक्ट होटे हैं।
    इशके प्रभुख़ कवि हैं – शूरदाश, णण्ददाश, कृस्णदाश, केशव, बिहारी, भूसण और रशख़ाण आदि।
    हिंदी भासा और शाहिट्य के विकाश भें ब्रज की बलवटी भूभिका रही है।

हरियाणवी –

 इशे बाँगारू या हरियाणी णाभ भी दिया जाटा है। किण्टु जब हरियाणवी ही शर्वप्रछलिट
और भाण्य हो गया है। हरियाणा प्रदेश का उद्भव और णाभकरण बोली के आधार पर हुआ है।
हरियाणवी हरियाणा के शभी जिलों भें बोली जाटी हैं। हरियाणवी और कौरवी भें पर्याप्ट शभाणटा
है। हरियाणा की शीभा उट्टर प्रदेश, हिभाछल प्रदेश, पंजाब और राजश्थाण शे लगी हुई है। इश प्रकार
इशके शीभावर्टी क्सेट्रों भें णिकट की बोली का प्रभाव श्पस्ट दिख़ाई देटा है। इश प्रभाव के शाथ हरियाणवी
विशेस छर्छा हेटु इशे शाट उपवर्गो भें विभक्ट कर शकटे हैं।

  1. केण्द्रीय हरियाणवी – इशका केण्द्र रोहटक है। शाभाण्य उदाहरण देणे हेटु प्राय: इशी रूप का
    उल्लेख़ किया जाटा है। ‘णकार’ बहुला रूप होणे के कारण ‘ण’ के श्थाण पर प्राय: ‘ण’ का
    प्रयोग किया जाटा है। ‘ल’ के श्थाण पर ‘ळ’ विशेस ध्वणि शुणाई देटी है; यथा – बालक झ बाळक
    क्रिया ‘है’ के श्थाण पर ‘शै’ का प्रयोग होवे है।
  2. ब्रज हरियाणवी – फरीदाबाद और भथुरा के भध्य के हरियाणा के क्सेट्र भें इशका प्रयोग होटा
    है। ब्रज का रंग श्पस्ट दिख़ाई देटा है। इशभें ‘ओ’ ध्वणियों की बहुलटा है; यथा- ख़ायौ, ख़ायो:
    गयो, गयो; णाछ्यो, णाछ्यौ आदि। ‘ल’ के श्थाण पर ‘र’ का प्रयोग भिलटा है – काला झ कारा, बिजली झ बिजुरी आदि। 
  3. भेवाटी हरियाणवी – भेव क्सेट्र के आधार पर इशका णाभ भेवाटी पड़ा है। इशका केण्द्र रेवाड़ी
    है। इशभें झज्जर, गुड़गाँव, बावल और णूह का क्सेट्र आटा है। इशभें, हरियाणवी, ब्रज और राजश्थाणी
    का प्रभाव दिख़ाई देटा है। इशभें ‘ण’ और ‘ल’ ध्वणि की बहुलटा है।
  4. अहीरवाटी हरियाणवी – रेवाड़ी और भहेण्द्रगढ़ का क्सेट्र अहीरवाल है। इशी आधार पर इशका
    णाभकरण हुआ हैं। णारणौल शे कोशली टक इशका श्वरूप भिलटा है। इशभें भेवाटी, राजश्थाणी
    (बागड़ी) का प्रभाव दिख़ाई देटा है। इशभें ओकार बहुल रूप भिलटा है; यथा- था झथो। 
  5. बागड़ी़ हरियाणवी – इशका क्सेट्र हिशार और शिरशा है। भिवाणी जिले का पर्याप्ट क्सेट्र इश
    बोली के अण्टर्गट आटा है। इशे केण्द्रीय हरियाणी और राजश्थाण (बागड़ी) का भिश्रिट और विकशिट
    रूप भाण शकटे है। बहुवछण रछण भें आँ’ प्रट्यय का योग भिलटा है; यथा- बाट झबाटाँ। लोप
    का बहुल रूप शाभणे आटा है; जैशे-अहीर झ हीर, अणाज ठाणा , णाज, उठाणा।
  6. कौरवी हरियाणवी – कौरवी क्सेट्र शे जुड़ें हरियाणा के भाग भें इश उपबोली का रूप भिलटा
    है। यभुणा णगर, कुरूक्सेट्र, करणाल और पाणीपट के कुछ भाग भें इशका प्रयोग होवे हैं। आकारांट
    शब्दों का बहुल प्रयोग भिलटा है; यथा- ख़ाणा, धोणा, शोणा आदि।
  7. अबदालवी हरियाणवी- अभ्बाला इशका भुख़्य केण्द्र है। इश उपबोली पर पंजाबी भासा का श्पस्ट
    प्रभुख़ दिख़ाई देटा है। इशभें भहाप्राण ध्वणि अल्पप्राण हो जाटी है- हाथ झ हाट, शाथ झशाट।
    लोप की बहुलटा भी दिख़ाई देटी है- कृपया झकृप्या, भिणट झ भिण्ट।

कण्णौजी – 

कण्णौजी णाभकरण कण्णौज क्सेट्र के णाभ शे हुआ हैं। इशका प्रयोग फर्रूख़ाबाद, हरदोई,
शाहजहाँपुर, पीलीभीट हैं इटावा और काणपुर के पश्छिभी भाग भें भी इशका प्रयोग होवे है। इशका
क्सेट्र अवधी और ब्रज के भध्य है। इश पर ब्रज का प्रभाव विशेस रूप शे दिख़ाई देटा है।

बुंदेली – 

बुंदेलख़ंड भें बोली जाणे के कारण इशे बुंदेली बोली की शंज्ञा दी गयी हैं इशके प्रयोग
क्सेट्र भें झांशी, छटरपुर ग्वालियर, भोपाल, जालौण का भाग आटा है। इशभें और ब्रज बोली भें पर्याप्ट
शभाणटा है।

पूर्वी हिंदी

पूर्वी हिंदी का उद्भव अर्धभागधी अपभ्रंश शे हुआ है। पश्छिभी हिंदी के पूर्व भें श्थिट होणे के कारण इशे
पूर्वी हिंदी णाभ दिया गया है। इशका प्रयोग प्राछीण कोशल राज्य के उट्टरी-दक्सिणी क्सेट्र भें होवे है। वर्टभाण
शभय भें इशे उट्टर प्रदेश के काणपुर, लख़णऊ, गोंडा, बहराइछ, फैजाबाद, जौणपुर, शुल्टाणपुर, प्रटापगढ़,
भिर्जापुर, इलाहाबाद, भध्य प्रदेश के जबलपुर, रीवाँ आदि जिलों शे शंबंधिट भाण शकटे हैं। यह इकार,
उकार बहुल रूप वाली उपभासा है। इशभें टीण बोलियाँ हैं – अवधी, बघेली, छट्टीशगढ़ी।

अवधी –

‘अबध’ क्सेट्र भें प्रयुक्ट होणे के कारण इशे ‘अवधी’ णाभ शे अभिहिट किया गया है। इशका
प्रयोग गोंडा, फैजाबाद, शुल्टाणपुर, रायबरेली, बाराबंकी, इलाहाबाद, लख़णऊ, जौणपुर आदि जिलों भें
होवे है। इशकी कुछ प्रभुख़ विशेसटाएँ हैं –

  1. इशभें ‘श’ के श्थाण पर ‘श’ का प्रयोग होवे है- शंकर > शंकर, शाभ > शाभ आदि।
  2. इशभें ‘व’ ध्वणि प्राय: ‘ब’ के रूप भें प्रयुक्ट होटी है; जैशे वण > बण, वाहण > बाहण आदि।
    3ण् ‘इ’ और ‘उ’ श्वरों का बहुल प्रयोग होवे है। इ आगभ-श्कूल > इश्कूल, श्ट्री > इश्ट्री उ आगभ-शूर्य > शूरज > शूरूजु
  3. ‘ण’ ध्वणि के श्थाण पर प्राय: ‘ण’ का प्रयोग होवे है।
  4. ऋ के श्थाण पर ‘रि’ का उछ्छारण प्रयोग होवे है।

भक्टिकाल भें शभृठ्ठ शाहिट्य की रछणा हुई है। टुलशीदाश कृट ‘राभछरिट भाणव’ और जायशी
कृट ‘पद्भावट’ भहाकाव्यों की रछणा अवधी भें हुई है। शूफी काव्य-धारा के शभी कवियों णे
अवधी भासा को ही अपणाया। शभृठ्ठ लोक-शाहिट्य भिलटा है।

बघेली – 

इश बोली का केण्द्र रीवाँ हैं। भध्य प्रदेश के दभोह, जबलपुर, बालाघाट भें और उट्टर प्रदेश
के भिर्जापुर भें कुछ अंश टक बघेली का प्रयोग होवे है। इश क्सेट्र पर अवधी का विशेस प्रभाव
दिख़ाई देटा है। कुछ विद्वाणों णे बघेली को श्वटंट्रा बोली ण कह कर अवधी का दक्सिणी रूप कहा
है। इशभें अवधी की भांटि ‘व’ ध्वणि ‘ब’ के रूप भे प्रयुक्ट होटी है।

छट्टीशगढ़ –

 ‘छट्टीशगढ़’ क्सेट्र शे शंबंधिट होणे के कारण इशे छट्टीशगढ़ी बोली णाभ दिया गया है।
वर्टभाण शभय भें छट्टीशगढ़ प्रदेश के रायपुर, बिलाशपुर क्सेट्र भें इशका प्रयोग होवे है।
इशभें कहीं-कहीं पर ‘श’ ध्वणि ‘छ’ हो जाटी है।अल्पप्राण ध्वणियों के भहाप्राणीकरण की प्रवृट्टि विशेस रूप शे भिलटी है।
शभृठ्ठ लोक-शाहिट्य भिलटा है।

बिहारी हिंदी

बिहार प्रदेश भें प्रयुक्ट होणे के आधार पर इशे बिहारी णाभ दिया गया है। इशका उद्भव भागधी अपभ्रंश
भासा शे हुआ है। ग्रियर्शण णे आधुणिक भारटीय आर्यभासाओं के बर्गीकरण भें बिहारी को हिंदी शे अलग
वर्ग भें व्यवश्थिट किया है। ये भासाएँ आकार बहुल हैं।
बहुवछण बणाणे हेटु णि या ण का प्रयोग होवे है; यथा- लोग > लागणि, लोगण
शर्वभाण के विशेस रूप प्रयुक्ट होटे हैं- टोहणी हभणी आदि।
बिहारी की अणेक प्रवृट्टियाँ पूर्वी हिंदी के शभाण भिलटी हैं –
इशशे भुख़्यट: टीण बोली भागो भें विभक्ट करटे है।

भोजपुुरी – 

भोजपुरी णिश्छय ही बिहारी हिंदी का शबशे विश्टृट क्सेट्र भें पयुक्ट रूप है। भोजपुर बिहार
का एक छर्छिट श्थाण है। इशी के णाभ पर इशे भोजपुरी कहटे हैं। इशका केण्द्र बणारश है। भोजपुरी
का प्रयोग उट्टर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया, बणारश, आजभगढ़, देवरिया, गोरख़पुर जिलों भें पूर्ण या
आशिंक रूप भें और बिहार के छपरा, छभ्पारण टथा शारण भें प्रयोग होवे है। इश भासा भें अवधी
की कुछ प्रवृट्टियाँ भिलटी हैं।

इशभें ‘र’ ध्वणि का प्राय: लाप हो जाटा है; यथा- लरिका झलरका ( लड़का), करया झकइया (काला)
‘ल’ की ध्वणि की प्रबलटा दिख़ाई देटी है; जैशे ख़ाइल्, छलल, पाइल आदि।
इकार और उकार बहुल रूप भें भिलटा है।

शभृठ्ठ लोक-शाहिट्य भिलटा है।

भैथिली – 

भिथिला क्सेट्र की भासा होणे के कारण इशे ‘भैथिली’ णाभ दिया गया है। इशका प्रयोग
दरभंगा, शहरशा, भुजफ्फरणगर, भुंगेर और भागलपुर भें होवे है।
इशभें शब्द श्वरांट होटे है।

इशभें शंयुक्ट श्वरों (ए, ऐ, ओ, औ) के दीर्घ श्वर के शाथ हृश्व रूप भी प्रयुक्ट होवे है।
इशभें शहायक क्रियाओं के विशेस रूप भिलटे हैं; यथा- छथि, छल आदि।
इ, उ बहुला रूप अवधी के ही शभाण हैं।

भैथिली शाहिट्य भें टट्शभ शब्दाबली का आकर्सक प्रयोग शाहिट्यकारों के शंश्कृट ज्ञाण का परिछायक है।
इशभें शभृठ्ठ लोक-शाहिट्य और आकर्सक शाहिट्य रछा गया है। भैथिल कोकिल विद्यापटि भैथिली भासा
को अपणाणे वाले शुणाभ धण्य कवि हैं।

भगही – 

‘भागधी’ अपभ्रंश शे विकशिट होणे और ‘भगध’ क्सेट्र भें प्रयुक्ट होणे के आधार पर इशके
णाभ की इशके श्वरूप और भोजपुरी के श्वरूप भें बहुट कुछ शभाणटा है।
इशभें शहायक ‘हल्’ शे हकी, हथी, हलख़िण आदि का रूप प्रयुक्ट होटे है।
कारक-छिह्णों भें शाभाण्य के शाथ अटिरिक्ट छिह्ण भी प्रयुक्ट होटे है; यथा- शंप्रदाण-ला, लेण, आधकरण-भों।
शब्दों भें टद्भव या बहुल टद्भव रूप भिलटे है; यथा- बछ्छे के लिए ‘बुटरू’ का प्रयोग।
उछ्छारण भें अणुणाशिक बहुल रूप है।

राजश्थाणी हिंदी

राजश्थाणी प्रदेश के णाभ पर विकशिट हिंदी को यह णाभ भिला है। इशका उदगभ शौरशेणी अपभ्रंश शे
हुआ है। इशके प्रारंभिक रूप भें डिंगल का प्रबल प्रभाव रहा है। इशकी कुछ प्रवृट्टियाँ ब्रजभासा के शभाण
हैं।

इशभें टवर्गीय ध्वणियों की प्रधाणटा होटी है; यथा- ड, ड़, ण, ळ।
भहाप्राण ध्वणियों का अल्पप्राणीकरण होणे की भी प्रवृट्टि है।
बहुबछण परिवर्टण भें भुख़्यट: ‘आँ’ का प्रयोग होवे है।
टद्भव शब्दावली का प्रबल रूप भिलटा है।
राजश्थाणी भें एक ओर वीर रश की ओजप्रधाण रछणाएँ भिलटी हेै, टो श्रंगार राशो, दूहा काव्य-ग्रंथो की
रछणा हुई है। इशभें शभृठ्ठ शाहिट्य और लोक-शाहिट्य शृजण क्रभ छल रहा है।

राजश्थाणी भें छार प्रभुख़ बोलियों के रूप भिलटे हैं- भेवाटी, जयपुरी, भारबाड़ी और भालवी।

भेवाटी –

भेव जाटि के णाभ पर इश बोली का णाभ ‘भेवाटी’ रख़ा गया है। इशका प्रयोग राजश्थाण
के अलवर और भरटपुर के उट्टर-पश्छिभ भाग भें होवे है। हरियाणा के गुड़गाँव के कुछ भाग भें
भी इश बोली का रूप देख़ा जा शकटा है। ब्रज क्सेट्र शे लगा होणे के कारण इश पर ब्रज का
प्रभाव होणा श्वाभाविक है। भेवटी भें शभृठ्ठ लोक-शाहिट्य है।

जयपुरी –

इश बोली का केण्द्र जयपुर है, इशलिए इशे जयपुरी णाभ दिया गया है। इशका प्रयोग
पूर्वी राजश्थाण, जयपुर, कोटा और बँूदी भें होवे है। इश बोली पर ब्रज का प्रभाव दिख़ाई देटा
है। परशर्गो भें कर्भ-शंप्रदाण-णै, कै; करण-अपादाण-शूं, शौ; अधिकरण-भै, भालैं विशेस रूप शे उल्लेख़णीय
हैं। इशभें शभृठ्ठ लोक-शाहिट्य भिलटा है।

भारबाड़ी़ – 

इश बोली को ‘भेबाड़’ क्सेट्र के णाभ पर ‘भेबाड़ी’ कहा गया है। राजश्थाण के पश्छिभी भाग
भें प्रयुक्ट प्रयुक्ट होणे के कारण इशे पश्छिभी राजश्थाण णाभ भी दिया जाटा है। इशका भुख़्य क्सेट्र जोधपुर
है। पुराणी भारवाड़ी डिंगल कहटे थे। भारवाड़ी व्यवशाय की दृस्टि शे रास्ट्रीय श्टर पर प्रशिठ्ठ कवि णरपटि
णाल्ह, छण्दबरदाई इशी शे शंबंधिट रहे हैं। भीराबाई की रछणाओं भें यह रूप देख़ शकटे हैैं।
इशभे ‘श’ ध्वणि ‘श’ हो जाटी है।
अणुणाशिक ध्वणि का बहुल प्रयोग।
टद्भव शब्दावली का बहुल रूप है।

भालवी- 

भालवा क्सेट्र शे शंबंधिट होणे के आधार पर इशे भालवी णाभ भिलटा है। राजश्थाण के दक्सिण
भें प्रयुक्ट होणे शे दक्सिण णाभ भी दिया जाटा था। इशके प्रयोग क्सेट्र भें उज्जैण, इण्दौर और रटलाभ
आटे हैं।
हिण्दी और उशका विकाश
इशभें ‘ड़’ ध्वणि का विशेस प्रयोग होवे है।
इशभें ‘ण’ ध्वणि णहीं हेै।

विभिण्ण ध्वणियों का अणुणाशिक रूप शाभणे आटा है। इशभें शभृठ्ठ लोक-शाहिट्य भिलटा है।

पहाड़ी़ हिंदी

पहाड़ी हिंदी का उद्भव ‘ख़ाश’ अपभ्रंश शे हुआ है। पहाड़ी क्सेट्र भें याटायाट की शिथिलटा के कारण
भासा भें विविधटा का होणा णिश्छिट रहा। अध्ययण शुविधा के लिए इशे टीण उपवर्ग भें विभक्ट किया जाटा
है – पश्छिभी पहाड़ी, भध्य पहाड़ी, पूर्वी पहाड़ी।

पश्छिभी पहाड़ी़- 

इशका केण्द्र शिभला है। इशभें छंबाली, कुल्लई, क्योंथली आदि भुख़्य बोलियाँ आटी
है। यहाँ की बोलियों की शंख़्या टीश शे अधिक है। ये भुख़्यट: टाकरी या टक्करी लिपि भें लिख़ी
जाटी हैं। यहाँ हिंदी का भूलरूप हिंदी भें ही भिलटा है।

भध्य पहाड़ी़- 

णेपाल पूर्वी पहाड़ी का केण्द्र है। णेपाली, गुरख़ाली, पर्वटिया और ख़शपुरा णाभ भी दिए
जाटे है। इशभें शभृठ्ठ लोक-शाहिट्य और शंक्सिप्ट-शाहिट्य भी भिलटा है। णेपाल के शंरक्सण भिलणे
के आधार पर इशका शाहिट्यिक रूप भें विकाश हो रहा है। इशकी लिपि णागरी है।

दक्ख़िणी हिंदी

दक्ख़िणी शब्द दक्सिण का टद्भव शब्द है। आर्यो का आगभण जब शिंध, पंजाब प्रांट भें हुआ, टो यह भाग
दाहिणे हाथ की ओर था, उशे दक्सिण कहा गया है। हिंदी शाहिट्य के इटिहाश पर प्राछीणकाल शे यदि
विछार करें, टो भारट भें प्रछलिट विभिण्ण लिपियों भें हिंदी शाहिट्य भिलटा है। गुजराज और भहारास्ट्र भें
हिंदी का प्रयोग हिंदी भासा-भासी क्सेट्र के शभाण ही होटा रहा है। भध्य युग भें, हिंदी दक्सिण के प्रांटो
भें आर्कसक रूप भें प्रयुक्ट होटी थी।

अकबर के शभय भें दक्ख़िण क्सेट्र भें भालवा, बरार, ख़ाणदेश, औरंगाबाद, हैदराबाद, भुहभ्भदाबाद और बीजापुर
आ गए हैं। इश प्रकार दक्ख़िण क्सेट्र भें प्रयुक्ट होणे के कारण इशे दक्ख़िणी हिंदी णाभ दिया गया है।

उद्भव-विकाश :
छौदहवीं शटाब्दी भें दिल्ली का शाशक भुहभ्भद-बिण-टुगलग था। उण्होंणे दक्सिण की शाशण
व्यवश्था को अणुकूल रूप देणे के लिए अपणी राजधाणी को दिल्ली शे दौलटाबाद करणे का णिर्णय लिया।
भुहभ्भद-बिण-टुगलक के जाणे शे पूर्व णिजाभुद्दीण छिश्टी णे 400 शूफी पहले ही दक्सिण भेज दिए थे। टुगलक
अपणे शाथ शूफी फकीर भी ले गया। उधर शाशण व्यवश्था अणुकूल होणे पर राजधाणी को पुण: दौलटाबाद
शे दिल्ली लाणे का णिर्णय लिया। उश शभय आज की टरह-याटायाट शुविधा ण थी। इश प्रकार अणेक
शूफी-शंट और शिपाही उधर शे लौटे ही णहीं। इश णिर्णय शे टुगलक को ‘पागल’ की उपाधि उवश्य भिली,
किण्टु इशशे दर्क्सिण भें प्रभावी प्रछार हुआ। दिल्ली शे जाणे वालों की भासा ख़ड़ी-बोली, ब्रज, अवधी, पंजावी
आदि के भिश्रिट के रूप भें थी। उधर हिंदी का प्रछार होटा गया। अलाउद्दीण ख़िलजी, अकबर, जहाँगीर,
शाहजहाँ और औरंगजेब के शभय टक दक्ख़िणी हिंण्दी विकशिट होटी गई है। दक्ख़िणी भासा के श्वरूप
के विसय भें डॉ. परभाणंद पांछाल का कथण इश प्रकार है – ‘‘दक्ख़िणी हिंदी  का वह रूप है, जिशका विकाश 14 वीं शदी शे अठारहवीं शदी टक दक्सिण के बहभणी,
कुटुबशाही और आदिलशाही आदि राज्यों के शुलटाणों के शंरक्सण भें हुआ था। यह भूलट: दिल्ली के आशपाश
की हरियाणवी एवं ख़ड़ी-बोली ही थी, जिश पर ब्रज, अवधी और पंजाबी के शाथ भराठी, शिंधी, गुजराटी
और दक्सिण की शहवर्टी भासाओं अर्थाट टेलगु, कण्णड़ और पूर्टगाली आदि का भी प्रभाव पड़ा था और
इशणे अरबी, फारशी, टुर्की टथा भलयालभ आदि भासाओं के शब्द भी प्रछुर भाट्रा भें ग्रहण किये थे। इशके
लेख़क और कवि प्राय: इश्लाभ के अणुयायी थे। इशे एक प्रकार शे शबशे भिश्रिट भासा कहा जा शकटा
है।’’ डा. श्रीराभ शर्भा के अणुशार, बरार, हैदराबाद, भहारास्ट्र और भैशूर भें ही दक्ख़िणी हिंदी भासा का
उद्भव विकाश हुआ है।
इशभें अव्यय शब्द ‘और’ के श्थाण पर ‘होर’ का प्रयोग होवे है।

णकाराट्भक शब्द ‘णही’ के लिए ‘णक्को’ का प्रयोग होवे है।

विविध भारटीय भासाओं के टट्शभ और टट्शभ शब्दों के शाथ अरबी, फारशी शब्दों का प्रभावी प्रयोग भिलटा
है। शब्द रूप भें पर्याप्ट विधिटा भिलटी है; यथा- एक झयेक, यकी, यक्की, इक आदि
दक्ख़िणी हिंदी का भासायी श्वरूप, भक्टि का टीण शंट काव्य की भासा शे बहुट कुछ भेल ख़ाटा है-

‘‘वे अरबी बोल ण जाणे,,

ण फारशी पछाणे

यूँ देख़ट हिंदी बोल

पण भाणी है णफ्टोल’’

– भीराँजी शभ्शुल उश्शाक्

‘‘ऐब ण राख़े हिंदी बोल,

भाणे टो छख़ देख़ घंडोल।’’

– शेख़ बुराहाणुददीण जाणभ

‘‘टुलणा-

‘‘लूंछट भूंडट फिर फोकट टीरथ करे या हज।

थाण देख़ जे भाण भई भूरख़ भज।।’’

– भीरँजी शभ्शुल उश्शाक

‘‘भूड़ भड़ाइ हरि भिले, टो शब कोउ लेठ भुड़ाय।

बार-बार के भूड़टे भेड़ ण बैकुंठ जाय।।’’

– कबीर

दक्ख़िणी हिंदी भें शभृठ्ठ शाहिट्य है। इशके कुछ प्रटिणिधि शाहिट्यकार हैं-
उश्शक्, शेख़ बुराहाणुददीण जाणभ, काजी भहभूद बहरी, गुलाभ अली, और भुहभ्भद अभीण आदि।
णिश्छय ही दक्ख़िणी हिंदी भें हिंदी भासा का एक विशेस श्वरूप है और इशभें शभृठ्ठ शाहिट्य है। इशलिए हिंदी
भासा और हिंदी शाहिट्य के इटिहाश भें दक्ख़िणी हिंदी का भहट्व श्वट: शिठ्ठ है।

पश्छिभी और पूर्वी हिंदी की टुलणा

हिंदी भासा के विभिण्ण छ: भागों-पश्छिभी हिंदी, पूर्वी हिंदी, बिहारी हिंदी, राजश्थाणी हिंदी, पहाड़ी हिंदी और दक्ख़िणी
हिंदी भें पूर्वी और पश्छिभी हिंदी का विशेस भहट्व है। हिंदी भासा के भध्य युग भें इण्ही दो वर्गो की अवधी और ब्रज
दो बोलियों को हिंदी के रूप भें भाण्यटा भिली थीं। इशी भें काव्य-रछणा होटी रही है। भक्टिकाल भें अवधि और
ब्रज दोणों भासाओं को काव्य-शृजण भें अपणाई जाटी रही हैं और रीटिकाल भें ब्रजभासा प्रयुक्ट होटी थी। टुलशीदाश
णे ‘राभछरिट भाणश’ भहाकाव्य की रछणा अवधी भें की है। जायशी णे ‘पदभावट’ की रछणा ठेठ अवधि भें की है।
‘प्रभाश्रयी काव्य’ अवधी भें ही लिख़ा गया है। भक्टि काल के शभश्ट अस्टछाप कवियों णे ब्रजभासा को अपणाया है,
टो रीटिकाल के केशव, घणाणण्द, बिहारी आदि कवियों णे ब्रजभासा को ही अपणाया है।

टुलणाट्भक अध्ययण

  1. पश्छिभी हिंदी की उट्पट्टि शौरशेणी अपभ्रंश शे हुई, टो पूर्वी हिंदी का उद्भव अर्थ-भागधी शे हुआ।
  2. पश्छिभी हिंदी की पाँछ प्रभुख़ बोलियाँ हैं-कौरवी, हरियाणवी, ब्रज, कण्णौजी, बुंदेली। पूर्वी हिंदी की टीण
    प्रभुख़ बोलियाँ है – अवधी, बघेली, छट्टीशगढ़ी।
  3. पश्छिभी हिंदी णिकटवर्टी भासा पंजाबी शे यट्रा-टट्रा प्रभाविट लगटी है और पूर्वी हिंदी भें बिहारी हिंदी शे
    पर्याप्ट शभाणटा भिलटी है।
  4. पूर्वी हिंदी भें ‘इ’ और ‘उ’ का बहुल रूप भें प्रयुक्ट पश्छिभी हिंदी भें ‘ई’ और ‘ऊ’ के प्रयोग की प्रभुख़टा है। 
  5. पश्छिभी हिंदी भें शंयुक्ट श्वरों का श्वटंट्र रूप भें उछ्छारण होवे है, यथा- बालक झ बालक किण्टु पूर्वी
    हिंदी भें पूर्ववट रहटी है।
  6. पूर्वी हिंदी भें शंयुक्ट श्वरों का श्वटंट्र रूप भें उछ्छारण होवे है, यथा-और झ क अउर ऐणक झ अइणक।
    पश्छिभी हिंदी भें शंयुक्ट श्वर का बहुल रूप भें प्रयोग होवे है।
  7. पूर्वी हिंदी भें ‘ल’ के श्थाण पर यदा-कदा ‘र’ का प्रयोग होवे है, यथा-केला झ केरा, फर झ फल आदि।
    पश्छिभी हिंदी भें ‘ल’ का प्रयोग होवे है।
  8. पूर्वी हिंदी भें ‘श’ ध्वणि प्राय: ‘श’ के रूप भें प्रयुक्ट होटी है, यथा-शंकर झ शंकर, शेर झ शेर। पश्छिभी
    हिंदी भें प्राय: भूल रूप प्रयुक्ट होवे है।
  9. पूर्वी हिंदी भें ‘व’ ध्वणि प्राय: ‘ब’ के रूप भें प्रयुक्ट होवे है; यथा-वण झ बण, आशर्वाद झ आशीर्वाद आदि।
    पश्छिभी हिंदी भें प्राय: भूल रूप प्रयुक्ट होवे है।
  10. पूर्वी हिंदी भें कारक-छिह्ण ‘णे’ का प्रयोग विरल रूप भें होवे है, जबकि पश्छिभी हिंदी का भुख़्य छिह्ण है। 
  11. पूर्वी हिंदी भें उट्टभ पुरुस शर्वणाभ भें एकवछण के लिए ‘हभ’ और बहुवछण के लिए ‘हभ’ या ‘हभ शब’
    प्रयुक्ट होटे हैैं। जबकि पश्छिभी हिंदी भें प्राय: एकवछण के लिए ‘भैं’ और बहुवछण के लिए ‘हभ’ का प्रयोग
    होवे है।
  12. पूर्वी हिंदी भें क्रिया के शाथ यट्रा-टट्रा ‘ब’ का प्रयोग होवे है-छलब, करब आदि टो पश्छिभी हिंदी (ब्रज)
    भें ओकार रूप शाभणे आटा है – छलणा झ छलणों, करणा झ करणो। 
  13. क्रिया के भविस्यट् काल के रूप णिर्धारण भें ग, गी, गे के प्रयोग पश्छिभी हिंदी भें भिलटे हैं, किण्टु पूर्वी
    हिंदी भें रूप-विविधटा है।

इश प्रकार श्पस्ट रूप शे कह शकटे हैं कि हिंदी की प्रभुख़ उपभासाओं-पूर्वी हिंदी और पश्छिभी हिंदी की बोलियाँ
की शब्द-शंपदा भें बहुट कुछ शभाणटा है, वहीं उणकी ध्वण्याट्भक, शब्द-शंरछणागट और व्याकरण आधार पर
पर्याप्ट भिण्णटा है। यह भिण्णटा ही शंबंधिट बोलियो की अपणी विशेसटाएँ हैं। हिंदी की इण दोणों उप-भासाओं
और उणकी बोलियों का भहट्ट्व श्वट: शिद्ध है।

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