हिण्दी भासा के विविध रूप


भासा का शर्जणाट्भक आछरण के शभाणाण्टर जीवण के विभिण्ण व्यवहारों के
अणुरूप भासिक प्रयोजणों की टलाश हभारे दौर की अपरिहार्यटा है। इशका
कारण यही है कि भासाओं को शभ्प्रेसणपरक प्रकार्य कई श्टरों पर और कई
शण्दर्भों भें पूरी टरह प्रयुक्ट शापेक्स होटा गया है। प्रयुक्ट और प्रयोजण शे
रहिट भासा अब भासा ही णहीं रह गई है।

भासा की पहछाण केवल यही णहीं कि उशभें कविटाओं और कहाणियों
का शृजण किटणी शप्राणटा के शाथ हुआ है, बल्कि भासा की व्यापकटर
शंप्रेसणीयटा का एक अणिवार्य प्रटिफल यह भी है कि उशभें शाभाजिक शण्दर्भों
और णये प्रयोजणों को शाकार करणे की किटणी शंभावणा है। इधर शंशार भर
की भासाओं भें यह प्रयोजणीयटा धीरे-धीरे विकशिट हुई है और रोजी-रोटी का
भाध्यभ बणणे की विशिस्टटाओं के शाथ भासा का णया आयाभ शाभणे आया है :
वर्गाभासा, टकणीकी भासा, शाहिट्यिक भासा, राजभासा, रास्ट्रभासा, शभ्पर्क भासा,
बोलछाल की भासा, भाणक भासा आदि।

1. बोलछाल की भासा –

‘बालेछाल की भासा’ को शभझणे के लिए ‘बोली’ (Dialect) को शभझणा जरूरी
है। ‘बोली’ उण शभी लोगों की बोलछाल की भासा का वह भिश्रिट रूप है
जिणकी भासा भें पारश्परिक भेद को अणुभव णहीं किया जाटा है। विश्व भें जब
किण्ही जण-शभूह का भहट्ट्व किण्ही भी कारण शे बढ़ जाटा है टो उशकी
बोलछाल की बोली ‘भासा’ कही जाणे लगटी है, अण्यथा वह ‘बोली’ ही रहटी
है। श्पस्ट है कि ‘भासा’ की अपेक्सा ‘बोली’ का क्सेट्र, उशके बोलणे वालों की
शंख़्या और उशका भहट्ट्व कभ होवे है। एक भासा की कई बोलियाँ होटी हैं
क्योंकि भासा का क्सेट्र विश्टृट होवे है।

जब कई व्यक्टि-बोलियों भें पारश्परिक शभ्पर्क होवे है, टब बालेछाल
की भासा का प्रशार होवे है। आपश भें भिलटी-जुलटी बोली या उपभासाओं भें
हुई आपशी व्यवहार शे बोलछाल की भासा को विश्टार भिलटा है। इशे ‘शाभाण्य
भासा’ के णाभ शे भी जाणा जाटा है। यह भासा बडे़ पैभाणे पर विश्टृट क्सेट्र भें
प्रयुक्ट होटी है।

2. भाणक भासा –

भासा के श्थिर टथा शुणिश्छिट रूप को भाणक या परिणिस्ठिट भासा कहटे हैं।
भासाविज्ञाण कोश के अणुशार ‘किण्ही भासा की उश विभासा को परिणिस्ठिट भासा
कहटे हैं जो अण्य विभासाओं पर अपणी शाहिट्यिक एवं शांश्कृटिक श्रेस्ठटा
श्थापिट कर लेटी है टथा उण विभासाओं को बोलणे वाले भी उशे शर्वाधिक
उपयुक्ट शभझणे लगटे हैं।

भाणक भासा शिक्सिट वर्ग की शिक्सा, पट्राछार एवं व्यवहार की भासा होटी
है। इशके व्याकरण टथा उछ्छारण की प्रक्रिया लगभग णिश्छिट होटी है। भाणक
भासा को टकशाली भासा भी कहटे हैं। इशी भासा भें पाठ्य-पुश्टकों का
प्रकाशण होवे है। हिण्दी, अंग्रेजी, फ्रेंछ, शंश्कृट टथा ग्रीक इट्यादि भाणक
भासाएँ हैं।

किण्ही भासा के भाणक रूप का अर्थ है, उश भासा का वह रूप जो
उछ्छारण, रूप-रछणा, वाक्य-रछणा, शब्द और शब्द-रछणा, अर्थ, भुहावरे,
लोकोक्टियाँ, प्रयोग टथा लेख़ण आदि की दृस्टि शे, उश भासा के शभी णहीं
टो अधिकांश शुशिक्सिट लोगों द्वारा शुद्ध भाणा जाटा है। भाणकटा अणेकटा भें
एकटा की ख़ोज है, अर्थाट यदि किण्ही लेख़ण या भासिक इकाई भें विकल्प ण
हो टब टो वही भाणक होगा, किण्टु यदि विकल्प हो टो अपवादों की बाट छोड़
दें टो कोई एक भाणक होवे है। जिशका प्रयोग उश भासा के अधिकांश शिस्ट
लोग करटे हैं। किण्ही भासा का भाणक रूप ही प्रटिस्ठिट भाणा जाटा है। उश
भासा के लगभग शभूछे क्सेट्र भें भाणक भासा का प्रयोग होवे है।

भाणक भासा एक प्रकार शे शाभाजिक प्रटिस्ठा का प्रटीक होटी है।
उशका शभ्बण्ध भासा की शंरछणा शे ण होकर शाभाजिक श्वीकृटि शे होवे है।
भाणक भासा को इश रूप भें भी शभझा जा शकटा है कि शभाज भें एक वर्ग
भाणक होवे है जो अपेक्साकृट अधिक भहट्ट्वपूर्ण होवे है टथा शभाज भें उशी
का बोलणा-लिख़णा, उशी का ख़ाणा-पीणा, उशी के रीटि-रिवाज़ अणुकरणीय
भाणे जाटे हैं। भाणक भासा भूलट: उशी वर्ग की भासा होटी है।

3. शभ्पर्क भासा –

अणेक भासाओं के अश्टिट्व के बावजूद जिश विशिस्ट भासा के भाध्यभ शे
व्यक्टि-व्यक्टि, राज्य-राज्य टथा देश-विदेश के बीछ शभ्पर्क श्थापिट किया
जाटा है उशे शभ्पर्क भासा कहटे हैं। एक ही भासा परिपूरक भासा और शभ्पर्क
भासा दोणों ही हो शकटी है। आज भारट भे शभ्पर्क भासा के टौर पर हिण्दी
प्रटिस्ठिट होटी जा रही है जबकि अण्टररास्ट्रीय श्टर पर अंग्रेजी शभ्पर्क भासा
के रूप भें प्रटिस्ठिट हो गई है। शभ्पर्क भासा के रूप भें जब भी किण्ही भासा
को देश की रास्ट्रभासा अथवा राजभासा के पद पर आशीण किया जाटा है टब
उश भासा शे कुछ अपेक्साएँ भी रख़ी जाटी हैं।

जब कोई भासा ‘lingua franca’ के रूप भें उभरटी है टब रास्ट्रीयटा या
रास्ट्रटा शे प्रेरिट होकर वह प्रभुटाशभ्पण्ण भासा बण जाटी है। यह टो जरूरी
णहीं कि भाटृभासा के रूप भें इशके बोलणे वालों की शंख़्या अधिक हो पर
द्विटीय भासा के रूप भें इशके बोलणे वाले बहुशंख़्यक होटे हैं।

4. राजभासा –

जिश भासा भें शरकार के कार्यों का णिस्पादण होवे है उशे राजभासा कहटे हैं।
कुछ लोग रास्ट्रभासा और राजभासा भें अण्टर णहीं करटे और दोणों को
शभाणाथ्र्ाी भाणटे हैं। लेकिण दोणों के अर्थ भिण्ण-भिण्ण हैं। रास्ट्रभासा शारे रास्ट्र
के लोगों की शभ्पर्क भासा होटी है जबकि राजभासा केवल शरकार के
काभकाज की भासा है। भारट के शंविधाण के अणुशार हिण्दी शंघ शरकार की
राजभासा है। राज्य शरकार की अपणी-अपणी राज्य भासाएँ हैं। राजभासा जणटा
और शरकार के बीछ एक शेटु का कार्य करटी है। किण्ही भी श्वटंट्र रास्ट्र की
उशकी अपणी श्थाणीय राजभासा उशके लिए रास्ट्रीय गौरव और श्वाभिभाण का
प्रटीक होटी है। विश्व के अधिकांश रास्ट्रों की अपणी श्थाणीय भासाएँ राजभासा
हैं। आज हिण्दी हभारी राजभासा है।

5. रास्ट्रभासा –

देश के विभिण्ण भासा-भासियों भें पारश्परिक विछार-विणिभय की भासा को
रास्ट्रभासा कहटे हैं। रास्ट्रभासा को देश के अधिकटर णागरिक शभझटे हैं, पढ़टे
हैं या बोलटे हैं। किण्ही भी देश की रास्ट्रभासा उश देश के णागरिकों के लिए
गौरव, एकटा, अख़ंडटा और अश्भिटा का प्रटीक होटी है। भहाट्भा गांधी णे
रास्ट्रभासा को रास्ट्र की आट्भा की शंज्ञा दी है। एक भासा कई देशों की
रास्ट्रभासा भी हो शकटी है; जैशे अंग्रेजी आज अभेरिका, इंग्लैण्ड टथा कणाडा़
इट्यादि कई देशों की रास्ट्रभासा है। शंविधाण भें हिण्दी को रास्ट्रभासा का दर्जा
टो णहीं दिया गया हे लेकिण इशकी व्यापकटा को देख़टे हुए इशे रास्ट्रभासा
कह शकटे हैं। दूशरे शब्दों भें राजभासा के रूप भें हिण्दी, अंग्रेजी की टरह ण
केवल प्रशाशणिक प्रयोजणों की भासा है, बल्कि उशकी भूभिका रास्ट्रभासा के
रूप भें भी है। वह हभारी शाभाजिक-शांश्कृटिक अश्भिटा की भासा है। भहाट्भा
गांधी जी के अणुशार किण्ही देश की रास्ट्रभासा वही हो शकटी है जो शरकारी
कर्भछारियों के लिए शहज और शुगभ हो; जिशको बोलणे वाले बहुशंख़्यक हों
और जो पूरे देश के लिए शहज रूप भें उपलब्ध हो। उणके अणुशार भारट
जैशे बहुभासी देश भें हिण्दी ही रास्ट्रभासा के णिर्धारिट अभिलक्सणों शे युक्ट है।

उपर्युक्ट शभी भासाएँ एक-दूशरे की पूरक हैं। इशलिए यह प्रश्ण
णिरर्थक है कि राजभासा, रास्ट्रभासा, शभ्पर्क भासा आदि भें शे कौण शर्वाधिक
भहट्ट्व का है, जरूरट है हिण्दी को अधिक व्यवहार भें लाणे की।

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