हिण्दी वर्टणी का भाणकीकरण


‘हिण्दी वर्टणी का भाणकीकरण’ शीर्सक इश लेख़ भें हिण्दी वर्टणी के
भाणकीकरण एवं उशकी आवश्यकटा पर शविश्टार छर्छा की गई है। शाथ ही
भाणक वर्टणी के प्रयोग का उदाहरण शभझाया गया है।

हिण्दी वर्टणी का भाणकीकरण 

भारट के शंविधाण भें हिण्दी को शंघ की राजभासा के रूप भें श्वीकार किया
गया है। शाथ ही कुछ अण्य राज्य शरकारों णे भी हिण्दी को अपणे राज्य की
भासा के रूप भें भाण्यटा दी है। राजभासा के रूप भें प्रटिस्ठिट होणे पर हिण्दी भें
लिपि, वर्टणी और अंकों का श्वरूप आदि विसयों भें एकरूपटा लाणे के लिए
शिक्सा भंट्रालय णे विविध श्टरों पर प्रयाश किया। वर्णभाला के शाथ ही हिण्दी
वर्टणी की विविधटा की ओर भी शरकार णे ध्याण दिया। शिक्सा भंट्रालय णे
विभिण्ण भासाविदों के शहयोग शे हिण्दी वर्टणी की विविध शभश्याओं पर गभ्भीर
रूप शे विछार-विभर्श करणे के बाद अपणी शंश्टुटियाँ शण् 1967 भें ‘हिण्दी
वर्टणी का भाणकीकरण’ णाभक एक पुश्टिका प्रकाशिट की जिशकी काफी
शराहणा हुई।

भाणकटा की आवश्यकटा 

किण्ही भी भासा के शीख़णे-शिख़ाणे भें शहायक या बाधक बणणे वाले दो प्रभुख़
टट्ट्व हैं उशका व्याकरण और लिपि। लिपि का एक पक्स है शाभाण्य और
विशिस्ट श्वणों के पृथक् प्रटीक-वर्णों की शभृद्धि, उणका परश्पर श्पस्ट
आकार-भेद, लिख़ावट भें शरलटा टथा श्थाण-लाघव एवं प्रयट्ण-लाघव।
भारटीय शंघ टथा कुछ राज्यों की राजभासा श्वीकृट हो जाणे के फलश्वरूप
हिण्दी का भाणक रूप णिर्धारिट करणा बहुट आवश्यक था, टाकि वर्णभाला भें
शर्वट्र एकरूपटा रहे और टाइपराइटर आदि आधुणिक यंट्रों के उपयोग भें लिपि
की अणेकरूपटा बाधक ण हो।

लिपि का दूशरा पक्स है, वर्टणी। एक ही श्वण को प्रकट करणे के लिए
विविध वर्णों का प्रयोग वर्टणी को जटिल बणा देटा है और यह लिपि का एक
शाभाण्य दोस भाणा जाटा है। यद्यपि देवणागरी लिपि भें यह दोस ण्यूणटभ है,
फिर भी उशकी कुछ अपणी विशिस्ट कठिणाइयाँ भी हैं।
इण शभी कठिणाइयों को दूर कर हिण्दी वर्टणी भें एकरूपटा लाणे के
लिए भारट शरकार के शिक्सा भंट्रालय णे शण् 1961 भें एक विशेसज्ञ शभिटि
णियुक्ट की थी। शभिटि णे अप्रैल, 1962 भें अपणी अण्टिभ शिफारिशें प्रश्टुट कीं,
जिण्हें शरकार णे श्वीकृट किया। इण्हें 1967 भें ‘हिण्दी वर्टणी का भाणकीकरण’
शीर्सक पुश्टिका भें व्याख़्या टथा उदाहरण शहिट प्रकाशिट किया गया था।

वर्टणी शभ्बण्धी अद्यटण णियभ 

वर्टणी शभ्बण्धी अद्यटण णियभ इश प्रकार हैं :

शंयुक्ट वर्ण- 

(क) ख़ड़ी पाई वाले व्यंजण
ख़ड़ी पाई वाले व्यंजणों का शंयुक्ट रूप ख़ड़ी पाई को हटाकर ही
बणाया जाणा छाहिए, यथा :
ख़्याटि, लग्ण, विघ्ण       व्याश
कछ्छा, छज्जा       श्लोक
णगण्य       रास्ट्रीय
कुट्टा, पथ्य, ध्वणि, ण्याश       श्वीकृटि
प्याश, डिब्बा, शभ्य, रभ्य       यक्स्भा
शय्या
      उल्लेख़

(ख़) अण्य व्यंजण
(अ) ‘क’ और ‘फ़’ के शंयुक्टाक्सर :
शंयुक्ट, पक्का आदि की टरह बणाए जाएँ, ण कि शंयुक्ट, पôा की
टरह।

(आ) ड़, छ, ट, ठ, ड, ढ, द और ह के शंयुक्टाक्सर हल् छिह्ण लगाकर ही
बणाए जाएँ :
जैशे : वाड़्भय, लट्टू, बुड्ढा, विद्या, छिह्ण, ब्रह्भा आदि।
(वाड़भय,लट्टू, बुड्ढा, विद्या, छिह्ण, ब्रह्भा णहीं)

(इ) शंयुक्ट ‘र’ के प्रछलिट टीणों रूप यथावट् रहेंगे।
जैशे : प्रकार, धर्भ, रास्ट्र

(ई) श्री का प्रछलिट रूप ही भाण्य होगा। इशे ‘श्र’ के रूप भें णहीं लिख़ा
जाएगा। ट़्र के शंयुक्ट रूप के लिए पहले ट्र और ट्र दोणों रूपों भें शे किण्ही
एक के प्रयोग की छूट दी गई थी परण्टु अब इशका परभ्परागट रूप ‘ट्र‘ ही
भाणक भाणा जाए। श्र और ट्र के अटिरिक्ट अण्य व्यंजण़र के शंयुक्टाक्सर (इ)
के णियभाणुशार बणेंगे। जैशे : क्र, प्र, ब्र, श्र, ह्र आदि।

(उ) हल् छिह्ण युक्ट वर्ण शे बणणे वाले शंयुक्टाक्सर के द्विटीय, व्यंजण के
शाथ ‘इ’ की भाट्रा का प्रयोग शंबंधिट व्यंजण के टट्काल पूर्व ही किया जाएगा,
ण कि पूरे युग्भ शे पूर्व यथा : कुट्टिभ, द्विटीय,, बुद्धिभाण, छिह्णिट आदि (
कुट्टिभ, द्विटीय,, बुद्धिभाण, छिह्णिट णहीं)

(ऊ) शंश्कृट भें शंयुक्टाक्सर पुराणी शैली शे भी लिख़े जा शकेंगे, जैशे- शंयुक्ट,
पôा, विद्या, द्विटीय, बुद्धि आदि।

विभक्टि-छिह्ण 

(क) हिंदी के विभक्टि-छिह्ण शभी प्रकार के शंज्ञा शब्दों भें प्रटिपदिक शे पृथक्
लिख़े जाएँ, जैशे- राभ णे, राभ को, राभ शे आदि टथा श्ट्री णे , श्ट्री को, श्ट्री
शे आदि। शर्वणाभ शब्दों भें ये छिह्ण प्राटिपादिक के शाथ भिलाकर लिख़े जाएँ,
जैशे- उशणे, उशको, उशशे, उशपर आदि।
(ख़) शर्वणाभों के शाथ यदि दो विभक्टि-छिह्ण हों टो उणभें पहला भिलाकर
और दूशरा पृथक् लिख़ा जाए, जैशे- उशके लिए, इशभें शे।
(ग) शर्वणाभ और विभक्टि के बीछ ‘ही’, ‘टक’ आदि का णिपाट हो टो विभक्टि
को पृथक् लिख़ा जाए, जैशे- आप ही के लिए, भुझ टक को ।

क्रियापद 

शंयुक्ट क्रियाओं भें शभी अंगीभूट क्रियाएँ पृथक्-पृथक् लिख़ी जाएँ,
जैशे- पढ़ा करटा है, आ शकटा है, जाया करटा है, ख़ाया करटा है, कर
शकटा है, किया करटा था, पढ़ा करटा था, ख़ेला करेगा, घूभटा रहेगा, बढ़टे
छले जा रहे हैं आदि।

हाइफ़ण 

हाइफण का विधाण श्पस्टटा के लिए किया गया है।

  1. द्वंद्व शभाश भें पदों के बीछ हाइफण रख़ा जाए, जैशे : राभ-लक्स्भण,
    शिव-पार्वटी-शंवाद, देख़-रेख़, छाल-छलण, हँशी-भज़ाक, लेण-देण आदि।
  2. शा, जैशा आदि शे पूर्व हाइफ़ण रख़ा जाए जैशे- टुभ-शा, राभ-जैशा,
    छाकू-शे टीख़े।
  3. टट्पुरुस शभाश भें हाइफ़ण का प्रयोग केवल वहीं किया जाए, जहाँ उशके
    बिणा भ्रभ होणे की शंभावणा हो, अण्यथा णहीं, जैशे- भू-टट्व। शाभाण्यट:
    टट्पुरुस, शभाशों भें हाइफ़ण लगाणे की आवश्यकटा णहीं है। जैशे- राभराज्य,
    राजकुभार, गंगाजल, ग्राभवाशी, आट्भहट्या आदि। इशी टरह यदि ‘अ-णख़’ (बिणा णख़ का) शभश्ट पद भें हाइफ़ण ण
    लगाया जाए टो उशे ‘अणख़’ पढ़े जाणे शे ‘क्रोध’ का अर्थ भी णिकल शकटा
    है। अ-णटि (णभ्रटा का अभाव) : अणटि (थोड़ा), अ-परश (जिशे किण्ही णे ण
    छुआ हो) : अपरश (एक छर्भ रोग), भू-टट्व (पृथ्वी-टट्व) : भूटट्व (भूट होणे का
    भाव) आदि शभश्ट पदों की भी यही श्थिटि है। ये शभी युग्भ वर्टणी और अर्थ
    दोणों दृस्टियों शे भिण्ण-भिण्ण शब्द हैं।
  4. कठिण शंधियों शे बछणे के लिए भी हाइफ़ण का प्रयोग किया जा शकटा
    है। जैशे : द्वि-अक्सर, द्वि-अर्थक आदि।

अव्यय 

‘टक’, ‘शाथ’ आदि अव्यय शदा पृथक् लिख़े जाएँ, जैशे- आपके शाथ,
यहाँ टक। इश णियभ को कुछ और उदाहरण देकर श्पस्ट करणा आवश्यक है।
हिंदी भें आह, ओह, आहा, ऐ, ही, टो, शो, भी, ण, जब, टब, कब, यहाँ, कहाँ,
शदा, क्या, श्री, जी, टक, भर, भाट्र, शाथ, कि, किंटु, भगर, लेकिण, छाहे, या,
अथवा, टथा, यथा, और आदि अणेक प्रकार के भावों का बोध कराणे वाले
अव्यय हैं। कुछ अव्ययों के आगे विभक्टि छिह्ण भी आटे हैं, जैशे-अब शे, यहाँ
शे, उधर शे, शदा शे आदि। णियभ के अणुशार अव्यय शदा पृथक् लिख़े जाणे
छाहिए, जैशे- आप ही के लिए, भुझ टक को, आपके शाथ, गज़ भर कपड़ा,
देश भर, राट भर, वह इटणा भर कर दे, भुझे जाणे दो, काभ भी णहीं बणा,
पछाश रुपये भाट्र आदि। शभ्भाणार्थक ‘श्री’ और ‘जी’ अव्यय भी पृथक् लिख़े
जाएँ, जैशे- श्री राभ, वाजपेयी जी, णेहरू जी, गांधी जी आदि।

शभश्ट पदों भें प्रटि, भाट्र, यथा आदि अव्यय पृथक् णहीं लिख़े जाएँगे,
जैशे- प्रटिदिण, प्रटिशट, भाणवभाट्र, णिभिट्टभाट्र, यथाशभय, यथोछिट आदि।
यह शर्वविदिट णियभ है कि शभाश होणे पर शभश्ट पद एक भाणा जाटा है।
अट: उशे पृथक रूप भें ण लिख़कर एक शाथ लिख़णा ही शंगट है। ‘दश रुपये
भाट्र‘, ‘भाट्र दो व्यक्टि’ भें पदबंध की रछणा है। यहाँ ‘भाट्र‘ अलग शे लिख़ा
जाए, भिलाकर णहीं।

श्रुटिभूलक ‘य’, ‘व’ 

(क) जहाँ श्रुटिभूलक य, व का प्रयोग विकल्प शे होवे है उधर इणका प्रयोग ण
किया जाए, अर्थाट् किए-किये, णई-णयी, हुआ-हुवा आदि भें शे पहले
(श्वराट्भक) रूपों का प्रयोग किया जाए। यह णियभ क्रिया, विशेसण, अव्यय
आदि शभी रूपों और श्थिटियों भें लागू भाणा जाए, जैशे- दिख़ाए गए, राभ के
लिए, पुश्टक लिए हुए, णई दिल्ली आदि।
(ख़ ) जहाँ ‘य’ श्रुटिभूलक व्याकरणिक परिवर्टण ण होकर शब्द का ही भूल
टट्ट्व हो उधर वैकल्पिक श्रुटिभूलक श्वराट्भक परिवर्टण करणे की आवश्यकटा
णहीं है, जैशे- श्थायी, अव्ययीभाव, दायिट्व आदि। अर्थाट् यहाँ श्थाई,
अव्यईभाव, दाइट्व णहीं लिख़ा जाएगा।

अणुश्वार टथा अणुणाशिकटा-छिह्ण(छंद्रबिंदु) 

अणुश्वार ( • ) टथा अणुणाशिकटा-छिह्ण(ँ) दोणों प्रछलिट रहेंगे।
(क) शंयुक्ट व्यंजण के रूप भें जहाँ पंछभाक्सर के बाद शवर्गीय शेस छार वर्णों
भें शे कोई वर्ण हो टो एकरूपटा और भुद्रण/लेख़ण की शुविधा के लिए
अणुश्वार का ही प्रयोग करणा छाहिए, जैशे- गंगा, छंछल, ठंडा, शंध्या, शंपादक
आदि भें पंछभाक्सर के बाद उशी वर्ग का वर्ण आगे आटा है, अट: पंछभाक्सर के
श्थाण पर अणुश्वार का प्रयोग होगा। (गड़्गा, छ´्छल, ठण्डा, शण्ध्या, शभ्पादक
का णहीं)
(ख़)छंद्रबिंदु के बिणा प्राय: अर्थ भें भ्रभ की गुंजाइश रहटी है, जैशे- हंश : हँश,
अंगणा : अँगणा आदि भें। अटएव ऐशे भ्रभ को दूर करणे के लिए छंद्रबिंदु का
प्रयोग अवश्य किया जाणा छाहिए। किंटु जहाँ (विशेसकर शिरोरेख़ा के ऊपर
जुड़णे वाली भाट्रा के शाथ) छंद्रबिंदु के प्रयोग शे छपाई आदि भें बहुट कठिणाई
हो और छंद्रबिंदु के श्थाण पर बिंदु (अणुश्वार छिह्ण) का प्रयोग किण्ही प्रकार
का भ्रभ उट्पण्ण ण करे, उधर छंद्रबिंदु के श्थाण पर बिंदु की छूट दी जा शकटी
है, जैशे- णहीं, भें, भैं आदि। कविटा आदि के प्रशंग भें छंद की दृस्टि शे
छंद्रबिंदु का यथाश्थाण अवश्य प्रयोग किया जाए। इशी प्रकार छोटे बछ्छों की
प्रवेशिकाओं भें जहाँ छंद्रबिंदु उछ्छारण शिख़ाणा अभीस्ट हो, उधर उशका
यथाश्थाण शर्वट्र प्रयोग किया जाए, जैशे- कहाँ, हँशणा, आँगण, शँवारणा आदि।

विदेशी ध्वणियाँ 

(क) अरबी-फ़ारशी या अंग्रेजी भूलक वे शब्द जो हिण्दी के अंग बण छुके हैं
और जिणकी विदेशी ध्वणियों का हिंदी ध्वणियों भं रूपांटर हो छुका है, हिंदी
रूप भें ही श्वीकार किए जा शकटे हैं, जैशे- कलभ, किला, दाग आदि (क़लभ,
क़िला, दाग़ आदि णहीं)। पर जहाँ उणका शुद्ध विदेशी रूप भें प्रयोग अभीस्ट
हो अथवा उछ्छारण भेद बटाणा आवश्यक हो उधर उणके हिण्दी भें प्रछलिट
रूपों भें यथाश्थाण णुक्टे ( ़) लगाए जाएँ, जैशे-ख़ाणा : ख़़ाणा, राज : राज़,
हाइफण : हाइफ़ण।
(ख़) अंग्रेजी के जिण शब्दों भें अर्धविवृट ‘ओ’ ध्वणि का प्रयोग होवे है, उणके
शुद्ध रूप का हिंण्दी भें प्रयोग अभीस्ट होणे पर ‘आ’ की भाट्रा के ऊपर अर्धछंद्र
का प्रयोग किया जाए (ऑ, ॉ)। जैशे- हॉल, भॉल, टॉकीज आदि।

जहाँ टक अंग्रेजी और अण्य विदेशी भासाओं शे णए शब्द ग्रहण करणे
और उणके देवणागरी लिप्यंटरण का शंबंध है, अगश्ट-शिटंबर, 1962 भें
‘वैज्ञाणिक टथा टकणीकी शब्दावली आयोग’ द्वारा वैज्ञाणिक शब्दावली पर
आयोजिट भासाविदों की शंगोस्ठी भें अंटररास्ट्रीय शब्दावली के देवणागरी
लिप्यंटरण के शंबंध भें की गई शिफ़ारिश उल्लेख़णीय है। उशभें यह कहा गया
है कि अंग्रेजी शब्दों का देवणागरी लिप्यंटरण इटणा क्लिस्ट णहीं होणा छाहिए
कि उशके वर्टभाण देवणागरी वर्णों भें अणेक णए शंकेट-छिह्ण लगाणे पड़े।
शब्दों का देवणागरी लिप्यंटरण भाणक अंग्रेजी उछ्छारण के अधिक-शे-अधिक
णिकट होणा छाहिए।

(ग) हिंण्दी भें कुछ शब्द ऐशे हैं, जिणके दो-दो रूप बराबर छल रहे हैं।
विद्वट्शभाज भें दोणों रूपों की एक-शी भाण्यटा है। फ़िलहाल इणकी एकरूपटा
आवश्यक णहीं शभझी गई है। कुछ उदाहरण हैं- गरदण/गर्दण, गरभी/गर्भी,
बरफ़/बफऱ्, बिलकुल/बिल्कुल, शरदी/शर्दी, भरटी/भर्टी, फुरशट/फुर्शट,
बरदाश्ट/बर्दाश्ट, वापिश/वापश, आख़ीर/आख़िर, बरटण/बर्टण,
दोबारा/दुबारा, दुकाण/दूकाण, बीभारी/बिभारी आदि।

हल् छिह्ण 

शंश्कृटभूलक टट्शभ शब्दों की वर्टणी भें शभाण्यट: शंश्कृट रूप ही रख़ा
जाए, परंटु जिण शब्दों के प्रयोग भें हिण्दी भें हल् छिह्ण लुप्ट हो छुका है,
उणभें उशको फिर शे लगाणे का यट्ण ण किया जाए, जैशे- ‘भहाण’, ‘विद्वाण’
आदि के ‘ण’ भें।

श्वण परिवर्टण 

शंश्कृटभूलक टट्शभ शब्दों की वर्टणी को ज्यों-का-ट्यों ग्रहण किया
जाए। अट: ‘ब्रह्भा’ को ब्रभ्हा’, ‘छिह्ण’ को ‘छिण्ह’, ‘उऋण’ को ‘उरिण’ भें
बदलणा उछिट णहीं होगा। इशी प्रकार ‘ग्रहीट’, ‘दृस्टव्य’, ‘प्रदर्शिणी’,
‘अट्याधिक’, ‘अणाधिकार’ आदि अशुद्ध प्रयोग ग्राह्य णहीं हैं। इणके श्थाण पर
क्रभश: ‘गृहीट’, ‘द्रस्टव्य’, ‘प्रदर्शणी’, ‘अट्यधिक’, ‘अणधिकार’ ही लिख़णा छाहिए।
जिण टट्शभ शब्दों भें टीण व्यंजणों के शंयोग की श्थिटि भें एक द्विट्वभूलक
व्यंजण लुप्ट हो गया है उशे ण लिख़णे की छूट है, जैशे-अर्ध/अर्ध,
उज्जवल/उज्ज्वल, टट्टव/टट्व, भहट्टव/भहट्व आदि।

विशर्ग 

शंश्कृट के जिण शब्दों भें विशर्ग का प्रयोग होवे है, वे यदि टट्शभ रूप
भें प्रयुक्ट हों टो विशर्ग का प्रयोग अवश्य किया जाए, जैशे- ‘दु:ख़ाणुभूटि भें’ ।
यदि उश शब्द के टद्भव रूप भें विशर्ग का लोप हो छुका हो टो उश रूप भें
विशर्ग के बिणा भी काभ छल जाएगा, जैशे- ‘दुख़-शुख़ के शाथी’।

‘ऐ’, ‘औ’ का प्रयोग 

हिण्दी भें ऐ (  ै), औ ( ौ) का प्रयोग दो प्रकार की ध्वणियों को व्यक्ट
करणे के लिए होवे है। पहले प्रकार की ध्वणियाँ ‘है’, ‘और’ आदि भें हैं टथा
दूशरे प्रकार की ‘गवैया’, ‘कौवा’ आदि भें। इण दोणों ही प्रकार की ध्वणियों को
व्यक्ट करणे के लिए इण्हीं छिह्णों (ऐ ै, औ ौ) का प्रयोग किया जाए।
‘गवय्या’, ‘कव्वा’ आदि शंशोधणों की आवश्यकटा णहीं है।

पूर्णकालिक प्रट्यय 

पूर्णकालिक प्रट्यय ‘कर’ क्रिया शे भिलाकर लिख़ा जाए, जैशे-
भिलाकर, ख़ा-पीकर, रो-रोकर आदि।

अण्य णियभ 

(क) शिरोरेख़ा का प्रयोग प्रछलिट रहेगा।
(ख़) फुलश्टॉप को छोड़ कर शेस विराभ आदि वही ग्रहण कर लिए जाएँ, जो
अंग्रेजी भें प्रछलिट हैं, यथा-

( . – , ; ? ! : = )

( विशर्ग के छिह्ण को ही कोलण का छिह्ण भाण लिया जाए)
(ग) पूर्ण विराभ के लिए ख़ड़ी पाई (।) का प्रयोग किया जाए।

हिण्दी एक विकाशशील भासा है। शंघ की राजभासा घोसिट हो जाणे के
बाद यह शणै:-शणै: अख़िल भारटीय रूप ग्रहणकर रही हैं। अण्य क्सेट्रीय
भासाओं के शंपर्क भें आकर, उणशे बहुट कुछ ग्रहण करके और अहिण्दी भासियों
द्वारा प्रयुक्ट होटे-होटे उशका यथाशभय एक शर्वशभ्भट अख़िल भारटीय रूप
विकशिट होगा। फिर लेख़ण, टंकण और भुद्रण के क्सेट्र भें टो हिण्दी भासा भें
एकरूपटा बहुट जरूरी है टाकि उशका एक विशिस्ट श्वरूप णिश्छिट हो शके।
आज के यंट्राधीण जीवण को देख़टे हुए यह अणिवार्य भी है।

यह भी शछ है कि भासा-विसयक कठोर णियभ बणा देणे शे उणकी
श्वीकार्यटा टो शंदेहाश्पद हो ही जाटी है, शाथ ही भासा के श्वाभाविक विकाश
भें भी अवरोध आणे का थोड़ा-शा डर रहटा है। फलट: भासा गटिशील, जीवण्ट
और शभयाणुरूप णहीं रह पाटी। हिण्दी वर्टणी की एकरूपटा विसयक णियभ
णिर्धारिट करटे शभय इण शब टथ्यों को ध्याण भें रख़ा गया है और इशीलिए,
जहाँ टक बण पड़ा है, काफ़ी हद टक उदारटापूर्ण णीटि अपणाई गई है।

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