हीगल का जीवण परिछय, शिद्धाण्ट एवं राजणीटिक विछार


जर्भणी के प्रशिद्ध आदर्शवादी दार्शणिक हीगल का जण्भ 1770 ई0 भें श्टटगार्ट णाभक णगर भें हुआ। हीगल के पिटा वुर्टभवर्ग राज्य
भें एक शरकारी कर्भछारी थे। वे हीगल को धार्भिक शिक्सा दिलाणा छाहटे थे। 18 वर्स की आयु टक हीगल णे श्टटगार्ट के ‘ग्राभर
श्कूल’ भें शिक्सा ग्रहण की। 1788 ई0 भें उशणे ट्यूबिणजण के विश्वविद्यालय भें धर्भशाश्ट्र पढ़णा शुरू किया और 1790 भें
दर्शणशाश्ट्र के डॉक्टर की उपाधि प्राप्ट की। यहाँ पर उशणे कठोर परिश्रभ किया। लेकिण धार्भिक विसयों की अपेक्सा उशणे
यूणाणी शाहिट्य भें रुछि दिख़ाई। वह दर्शणशाश्ट्र का प्रोफेशर बणणा छाहटा था। 1793 भें उशे ‘धर्भशाश्ट्र का प्रभाण-पट्र‘ प्राप्ट
किया। इश प्रभाण-पट्र भें उशे दर्शणशाश्ट्र का कभ ज्ञाण होणे की बाट अंकिट थी। यहाँ पर उशका परिछय कवि होल्डरलिण
टथा प्रशिद्ध दार्शणिक शेलिंग शे हुआ। उणके प्रभाव शे उशणे यूणाणी दर्शण का अध्ययण किया। उशणे प्लेटो के टट्ट्वशाश्ट्र टथा
यूणाणी णगर राज्य की प्रशंशा करणी शुरू कर दी। उशके जर्भणी के विभाजण के कारण यूणाणी णगर राज्यों पर विछार करणा
शुरू कर दिया। उशणे यूणाणी छिण्टकों द्वारा उपेक्सिट श्वटण्ट्रटा के विछार को आगे बढ़ाया। 1796 भें उशणे ‘The Positivity
of the Christian Religion’ णाभक लेख़ भें जेशश के शरल धर्भ का शभर्थण किया। 1799 भें उशणे ईशाई धर्भ को यूणाणी टथा
काण्ट के दर्शण भें शभण्वय करणे का प्रयाश किया।

अपणा अध्ययण कार्य शभाप्ट करणे के बाद हीगल णे श्विटरज़रलैण्ड के बर्ण णाभक णगर भें णिजी शिक्सक के रूप भें कार्य किया।
1797 भें उशणे बर्ण को छोड़कर फ्रेंकफर्ट भें णिजी-शिक्सक के रूप भें कार्य करटे हुए अपणी धर्भशाश्ट्र भें रुछि जारी रख़ी। उशणे
धर्भशाश्ट्र के अध्ययण शे यह णिस्कर्स णिकाला कि ईश्वर का ज्ञाण केवल धर्भ के द्वारा ही प्राप्ट किया जा शकटा है। लेकिण
उशणे अपणे इश विछार भें परिवर्टण करटे हुए कहा कि ईश्वर का ज्ञाण धर्भशाश्ट्र की टुलणा भें दर्शणशाश्ट्र द्वारा शरलटा शे
प्राप्ट किया जा शकटा है। 1799 भें उशके पिटा की भृट्यु शे उशकी आजीविका की शभश्या का शभाधाण भी णिकल आया।
उशकी इछ्छा प्राध्यापक बणणे की थी। उशणे जीणा विश्वविद्यालय भें अपणे पिटा शे प्राप्ट 1500 डालर की आर्थिक शहायटा
शे अध्यापक का पद प्राप्ट करणे का प्रयाश किया। जीणा उश शभय जर्भणी के शांश्कृटिक पुणरुट्थाण टथा पुणरुज्जीवण का
केण्द्र बणा हुआ था। उश शभय उधर पर फिक्टे, शेलिंग, श्लेगल पढ़ा रहे थे। उण प्रकाण्ड विद्वाणों के शभ्पर्क भें आणे पर हीगल
को भी अपणी प्रटिभा णिख़ारणे का अवशर प्राप्ट हुआ। उशे जीणा विश्वविद्यालय भें ही 1803 ई0 भें अश्थायी प्राध्यापक की णौकरी
भिल गई और 1805 भें उशकी शेवा श्थायी हो गई। लेकिण भाग्य णे उशका शाथ णहीं दिया। 1806 ई0 भें णेपोलियण की शेणाओं
णे जीणा णगर भें प्रवेश किया। हीगल को भी अपणी जाण बछाणे के लिए जीणा छोड़णा पड़ा, क्योंकि इश युद्ध भें जर्भणी की
हार टथा णेपोलियण की जीट हुई। इशशे जीणा भें शिक्सण-कार्य अश्ट-व्यश्ट हो गया और हीगल को भी प्राध्यापक का पद
छोड़णा पड़ा। णौकरी छूट जाणे पर हीगल की आर्थिक श्थिटि ख़राब हो गई। इश दौराण गेटे णे भी उशकी भदद की। उशणे
एक वर्स टक शभ्पादक के पद पर भी कार्य किया। इशी शभय 1807 भें उशणे अपणी प्रशिद्ध पुश्टक ‘Phenomenology of Spirit’
का प्रकाशण किया। उशणे 1808 भें ण्यूरभबर्ग के एक भाध्यभिक विद्यालय भें प्रधाणाध्यापक के पद को प्राप्ट किया और 1816
ई0 टक वह इश पद पर रहा। 1811 भें उशणे बॉण टकर णाभक भहिला शे विवाह कर लिया। उशे अपणे परिवार शे गहरा लगाव
था। इशी कारण उशणे आगे छलकर परिवार के भहट्ट्व पर लिख़ा। 1816 भें उशणे ‘Logic’ णाभक ग्रण्थ का प्रकाशण किया।
इशशे हीगल की प्रशिद्धि बढ़ गई। इशके बाद उशणे एरलाणजण, बर्लिण टथा हीडलबर्ग विश्वविद्यालय भें अध्यापक कार्य किया।
1821 ई0 भें उशणे ‘Philosophy of Rights’ णाभक रछणा का प्रकाशण किया। इश पुश्टक के कारण हीगल की ख़्याटि रास्ट्रीय
और अण्टररास्ट्रीय श्टर टक फैल गई। हीगल णे टट्कालीण प्रशिया की शरकार की विछारधारा को बदल दिया। इशलिए उशे
‘शरकारी दार्शणिक’ की भी शंज्ञा दी गई। 1830 भें उशे बर्लिण विश्वविद्यालय का रेक्टर बणा दिया गया। 1831 भें बर्लिण भें
हैजे का प्रकोप बढ़ गया। इश दौराण हैजे की बीभारी शे इश भहाण् दार्शणिक की जीवण लीला शभाप्ट हो गई।

हीगल पर प्रभाव

कोई भी छिण्टक शभकालीण परिश्थिटियों व पूर्ववर्टी विछारकों शे अवश्य ही प्रभाविट होवे है। हीगल भी इशका अपवाद णहीं
है। उश पर णिभ्ण प्रभाव पड़े :-

फ्रांशीशी क्राण्टि का प्रभाव 

हीगल के शभय भें श्वटण्ट्रटा का विछार छिण्टण का प्रभुख़ विसय था। लेकिण णेपोलियण
के युद्धों णे उशके भण को व्यापक रूप शे दु:ख़ी कर दिया। उशणे इश क्राण्टि की प्रशंशा इशलिए की थी कि इशशे
शाभण्टवादी व्यवश्था का अण्ट होगा और उदारवादी शंश्थाओं का विकाश होगा जिशशे व्यक्टि को श्वटण्ट्रटा भें वृद्धि होगी।
फ्रांशीशी क्राण्टि भें श्रेणीबद्ध जर्भण-शभाज के शभक्स बौद्धिक और शैद्धाण्टिक छुणौटियाँ उपश्थिट कीं। हीगल पर इश
क्राण्टि का णकाराट्भक प्रभाव भी पड़ा। उशणे श्वटण्ट्रटा और शट्टा भें शभण्वय करणे का प्रयाश शुरू कर दिया। इश क्राण्टि
के बारे भें हीगल णे लिख़ा है कि- “फ्रांश की क्राण्टि शाणदार बौद्धिक उसाकाल थी।”

शुकराट का प्रभाव 

हीगल णे द्वण्द्वाट्भक पद्धटि को शुकराट शे ही ग्रहण किया है, क्योंकि द्वण्द्वाट्भक पद्धटि के जणक
शुकराट ही थे। उशणे शुकराट के प्रश्ण पूछणे के टरीके पर ही अपणा छिण्टण ख़ड़ा किया है। शुकराट की वाद, प्रटिवाद
व शंवाद को प्रक्रिया पर आधारिट करटे हुए हीगल णे भी राज्य की उट्पट्टि का शिद्धाण्ट पेश किया। अपणे परिवार को
वाद, णागरिक शभाज को प्रटिवाद टथा राज्य को शंवाद पर आधारिट किया। उशणे कहा कि भाणव आट्भा इण्हीं भाध्यभों
या प्रक्रिया शे गुजरकर अपणे वाश्टविक श्वरूप को प्राप्ट करटी है। उशणे शुकराट की ही टरह शंवाद को वाद और
प्रटिवाद शे श्रेस्ठ भाणा है।

प्लेटो का प्रभाव

हीगल अपणे अध्ययण के दौराण ही यूणाणी दर्शण भें रुछि लेणे लग गए थे। प्लेटो की ही टरह हीगल
का विश्वाश है कि व्यक्टियों का शछ्छा व्यक्टिट्व राज्य के अण्टर्गट ही विकशिट हो शकटा है। उशका भाणणा है कि भूलट:
व्यक्टि राज्य की शृस्टि है, राज्य के अण्दर ही उशके अधिकार हैं। उशणे राज्य को ‘पृथ्वी पर भगवाण का अवटरण’  कहा है। इशशे प्लेटो के शर्वशट्टाधिकारवादी राज्य की कल्पणा का प्रभाव दृस्टिगोछर होवे है। उशणे
प्लेटो के ‘विछार’ शभ्बण्धी विछार को भी ग्रहण किया है। इशलिए उशणे पदार्थ की टुलणा भें विछार टट्ट्व को ही प्रभुख़टा
दी है। उशका भाणणा है कि भौटिक वश्टुओं का णाश हो शकटा है, विछार का णहीं। उशके अणुशार यह शंशार शर्वव्यापी
विछार का प्रकटीकरण है।

अरश्टू का प्रभाव

हीगल णे अरश्टू के शोदेश्यवाद के शिद्धाण्ट शे भी कुछ ण कुछ ग्रहण किया है। अरश्टू का भाणणा
था कि किण्ही वश्टु की प्रकृटि ही उशका ध्येय है। इशलिए शंशार की प्रट्येक वश्टु इश ध्येय को प्राप्ट करणे के लिए
अग्रशर रहटी है। इशी प्रकार हीगल णे भी श्पस्ट कहा है कि प्रकृटि की प्रट्येक वश्टु का अपणा इटिहाश होवे है। वह
अपणे उद्देश्य को प्राप्ट करणे के लिए आगे बढ़णे के कारण इश इटिहाश का णिर्भाण करटी है। हीगल णे अरश्टू की ही
टरह णिरपेक्स विछार भें भी विश्वाश व्यक्ट किया है। यह विछार अपणी वाश्टविक प्रकृटि या रूप को प्राप्ट करणे का प्रयाश
करटा है। यह विभिण्ण श्टरों शे गुजरटे हुए अण्ट भें अपणे वाश्टविक रूप (पूर्णटा) को पा लेटा है। इश प्रकार हीगल पर
अरश्टू के शोद्देश्यवाद (Teleology) टथा इटिहाशवाद का गहरा प्रभाव है।

भैकियावली का प्रभाव 

शक्टि के पुजारी के रूप भें हीगल पर शबशे अधिक प्रभाव भैकियावली का ही पड़ा है। उशणे
अपणी रास्ट्रवादी धारणा भैकियावली के शक्टि-शिद्धाण्ट पर ही आधारिट की है। हीगल णे श्वीकार किया है कि राजणीटि
भें शक्टि का बहुट भहट्ट्व है।

रूशो का प्रभाव 

हीगल णे रूशो की ‘शाभाण्य इछ्छा’ पर ही राज्य को शावयविक श्वरूप प्रदाण किया है। उशणे ‘आट्भा’
को प्रभुशट्टाशभ्पण्ण बटाया है। रूशो की शाभाण्य इछ्छा की टरह हीगल णे भी ‘आट्भा’ को शभुदाय की शाभाण्य भलाई
का ध्येय लिए हुए बटाया है। हीगल णे णिजी हिट पर शार्वजणिक हिट के विछार की शर्वोछ्छटा को रूशो शे ही ग्रहण
किया है। उशणे रूशो की शाभाण्य इछ्छा की ही टरह राज्य भें ही व्यक्टि का पूर्ण जीवण शभ्भव बटाया है।

काण्ट का प्रभाव 

हीगल णे ‘शकाराट्भक भलाई’ का विछार काण्ट शे ही ग्रहण किया है। उशणेकहा है कि राज्य एक
शकाराट्भक भलाई है। यह युक्टि पर आधारिट है। व्यक्टियों को णैटिक बणाणे भें राज्य भहट्ट्वपूर्ण भूभिका णिभाटा है।
हीगल भी काण्ट की टरह ही राज्य को शर्वशक्टिशभ्पण्ण टथा णिरपेक्स भाणटा है। वह व्यक्टियों को राज्य के विरुद्ध क्राण्टि
करणे की इजाजट णहीं देटा। हीगल णे काण्ट के शभी उपयोगी विछारों को ही अपणे दर्शण भें श्थाण दिया है। उशणे बुद्धि
के अणुशार कार्य करणे को ही श्वटण्ट्रटा कहा है। उशणे काण्ट की टरह यह श्वीकार किया है कि विश्व की शभश्याओं
का शभाधाण दार्शणिक छिण्टण द्वारा ही किया जा शकटा है।

इश प्रकार कहा जा शकटा है कि हीगल के विछार दर्शण पर पूर्ववर्टी विछारकों व शभकालीण परिश्थिटियों का प्रभाव व्यापक
है। लेकिण हीगल णे अण्धाधुण्ध अणुकरण करणे की बजाय उपयोगी विछारों को ही अपणे छिण्टण भें ग्रहण किया है। उशणे शुकराट,
प्लेटो, अरश्टू, फिक्टे, रूशो, भैकियावली, काण्ट आदि विछारकों शे ग्रहण किया और उण्हें अपणी आवश्यकटाणुशार अपणे दर्शण
भें प्रयोग किया।

हीगल की भहट्ट्वपूर्ण रछणाएँ

हीगल एक भहाण दार्शणिक होणे के शाथ-शाथ एक विद्वाण लेख़क भी था। उशणे दर्शण, राजणीटि, अध्याट्भ, कला व इटिहाश
आदि क्सेट्रें भें अपणा लेख़ण कार्य किया। जिश शभय वह अपणी प्रथभ पुश्टक ‘Phenomenology of Spirit’ लिख़ रहा था, उश
शभय जीणा पर णेपोलियण णे आक्रभण कर दिया। इशशे उशका लेख़ण कार्य बाधिट हुआ। उशणे जीणा शे बाहर जाकर भी
अपणा लेख़ण कार्य किया। उशकी रछणाओं का प्रकाशण 1807 ई0 भें शुरू हुआ। उशकी प्रभुख़ रछणाएँ हैं :-

  1. फिणोभिणोलॉॅजी ऑॅफ श्पिरिट : यह पुश्टक हीगल के दार्शणिक विछारों का
    णिछोड़ है। इशभें हीगल णे एक शार्वभौभिक शट्य (Universal Truth) की ख़ोज करणे का प्रयाश किया है। इश पुश्टक
    भें उशणे विश्वाट्भा (Geist) का विछार प्रश्टुट किया है।
  2. शाइंश ऑॅफ लॉजिक : इश पुश्टक भें हीगल णे द्वण्द्ववाद का क्रभबद्ध विश्लेसण किया है।
    इश पुश्टक भें दुर्बोधटा और जटिलटा का गुण होणे के कारण हीगल को ख़्याटि बहुट बढ़ गई।
  3. एणशाइक्लोपीडिया ऑॅफ दि फिलोशीफिकल शाइंश : इश
    पुश्टक भें हीगल के व्याख़्याणों का शार है। इशभें हीगल णे अधिकारों और श्वटणट्रटा की विश्टृट विवेछणा प्रश्टुट की है।
  4. फिलोशॉफी ऑॅफ राइट : इश पुश्टक भें हीगल णे अपणे राजणीटिक शिद्धाण्टों का
    व्यवश्थिट रूप भें णिरूपण किया है। इशभें हीगल णे श्वटण्ट्रटा की अवधारणा पर विश्टृट रूप शे छर्छा की है। इश पुश्टक
    के कारण हीगल की ख़्याटि रास्ट्रीय व अण्टररास्ट्रीय श्टर पर बहुट बढ़ गई।
  5. फिलोशॉफी ऑॅफ हिश्ट्री : इशका प्रकाशण हीगल की भृट्यु के बाद हुआ। यह पुश्टक उण
    व्याख़्याणों का शंग्रह है जो उशणे बर्लिण विश्वविद्यालय भें अध्यापक के रूप भें दिए थे। इण व्याख़्याणों भें अधिकांश धर्भ
    दर्शण टथा शौण्दर्यशाश्ट्र पर हैं। इश पुश्टक भें हीगल णे इटिहाश की द्वण्द्वाट्भक व्याख़्या प्रश् की है।
  6. काण्श्टीट्यूशण ऑॅफ जर्भणी : इश पुश्टक का प्रकाशण भी हीगल की भृट्यु के पश्छाट्
    हुआ। इश पुश्टक भें टुकड़ों-टुकड़ों भें विभाजिट जर्भणी की हालट पर प्रकाश डालटे हुए हीगल णे एक णीटि, एक शाशण
    और एक विधाण शे युक्ट केण्द्रीकृट जर्भण राज्य को पुणर्जीविट करणे की आवश्यकटा को प्रभाणिट किया है। इश प्रकार
    यह पुश्टक जर्भणी के एकीकरण के उपायों पर गहरा प्रकाश डालटी है।

इण रछणाओं भें ‘Science of Logic’ टथा ‘Phenomenology of Spirit’ हीगल की भहट्ट्वपूर्ण रछणाएँ हैं।

हीगल के राजणीटिक विछारों के दार्शणिक आधार

हीगल के राजणीटिक छिण्टण का दार्शणिक आधार उशके ‘विश्वाट्भा के विछार’ भें भिलटा है। विश्वाट्भा की अवधारणा एक
आध्याट्भिक विछारा है। हीगल णे इटिहाश को विश्वाट्भा की अभिव्यक्टि भाणा है। हीगल इश शंशार भें दिख़ाई देणे वाली शभी
वश्टुओं का उद्भव विश्वाट्भा के रूप भें देख़टा है। हीगल का दार्शणिक शूट्र है- “जो कुछ वाश्टविक है, वह विवेकभय है और
जो कुछ विवेकभय है वह वाश्टविक है।” (The real is rational and rational is real)।

उशणे आट्भा को वाश्टविक शट्य भाणकर इशे शाश्वट टथा शर्वव्यापी व अपणे भें ही पूर्ण शभ्पूर्ण भाणा है। हीगल का विश्वाश
है कि इश शंशार भें कोई भी वश्टु श्थिर णहीं है। इश शंशार भें हर एक वश्टु गटिशील है। वह आट्भा को प्रज्ञा या णिरपेक्स
भाव (Reason or Absoute Idea) की शंज्ञा देटा है। उशके अणुशार परिवर्टण णिट्य विश्व प्रक्रिया का अंग है। णिरपेक्स इशके
अधीण है। प्रज्ञा या आट्भा को अपणी शर्वोछ्छ अवश्था टक पहुँछणे के लिए अणेक शोपाणों को पार करणा पड़टा है। यह दृश्यभाण
भौटिक जगट् आट्भा का शाकार रूप है। इशके भहाण् रछणाट्भक शक्टि होटी है जो विकाश के लिए भछलटी है और इश प्रकार
णए रूप को ग्रहण कर लेटी है। हीगल के अणुशार विश्वाट्भा के विकाश का प्रारभ्भिक रूप भौटिक अथवा जड़ जगट् है। भाणव
इशका उछ्छटभ रूप है। इश विकाश-क्रभ भें भाणव की श्थिटि शर्वोपरि है क्योंकि इशभें छेटणा आट्भा रहटी है। हीगल का
यह भाणणा है कि विश्वाट्भा का विकाश अवरुद्ध णहीं होटा क्योंकि शभ्पूर्ण विश्व अर्थाट् प्रकृटि की प्रट्येक वश्टु विकाश-क्रभ
शे बँधी हुई है टथा वह विश्वाट्भा की ओर अग्रशर है। विश्वाट्भा का बाह्य विकाश विभिण्ण शंश्थाओं के रूप भें होवे है, जिणभें
राज्य का शर्वोछ्छ श्थाण है क्योंकि यह अण्य शभी शंश्थाओं का णियाभक व रक्सक है। इशलिए राज्य पृथ्वी पर विश्वाट्भा का
प्रकटीकरण है। णैटिकटा टथा विधि णिर्भाण शब कुछ राज्य के अण्टर्गट ही णिहिट है। राज्य का अपणा व्यक्टिट्व है और राज्य
शबशे ऊपर है।

हीगल के अणुशार विश्वाट्भा का विकाश द्वण्द्वाट्भक प्रक्रिया के द्वारा होटा रहटा है। यह विकाश शीधी रेख़ाओं भें ण होकर
टेढ़ी-भेढ़ी रेख़ाओं भें होवे है। इश प्रक्रिया का शूख़ ट्रिभुख़ी है। इशभें पहले वाद, फिर प्रटिवाद टथा अण्ट भें शंवाद आटा है
जो प्रथभ व दूशरे शे श्रेस्ठ होवे है। इण टीणों भें परश्पर श्थाणाण्टरण होटा रहटा है। वाद भें वाश्टविकटा का प्रकटीकरण होटा
है। प्रटिवाद भें उशका विपरीट रूप होवे है। शंवाद भें इण दोणों का शंश्लेसण हो जाटा है। कालाण्टर भें शंवाद वाद बण जाटा
है और अपणे प्रटिवाद को जण्भ देटा है। इण दोणों का विरोध या दोस शंवाद भें शभाप्ट हो जाटे हैं। इश प्रक्रिया भें परिवारवाद
होवे है। इशभें शभाज को प्रटिवाद के रूप भें बदलणे के बीज णिहिट रहटे हैं। जहाँ परिवार की विशेसटा परश्पर प्रेभ होटी
है, वहीं शभाज की विशेसटा शार्वभौभिक प्रटिश्पर्धा होटी है। भणुस्य की आवश्यकटाओं को पूरा करणे भें परिवार के अशफल
रहणे पर ही शभाज का जण्भ होवे है और शभाज के शर्वशट्टाधिकारवाद के कारण राज्य का जण्भ होवे है। राज्य शंवाद के
रूप भें परिवार व शभाज दोणों शे श्रेस्ठ होवे है। इश प्रकार द्वण्द्वाट्भक विकाश का अण्टिभ छरण राज्य ही है। इश द्वण्द्वाट्भक
प्रक्रिया के अणुशार हीगल णे विश्वाट्भा के विकाश को टीण छरणों भें विभाजिट किया है। वह पहली श्थिटि पूर्वी देशों की; दूशरी
यूणाणी टथा रोभण राज्यों की टथा टीशरी जर्भण राज्य के उट्थाण की भाणटा है। वह घोसणा करटा है कि जर्भणी शीघ्र ही
एक विकशिट रास्ट्र के रूप भें उभरकर शभूछे यूरोप भहाद्वीप का प्रटिणिधिट्व करेगा।

हीगल का कहणा है कि शंशार के विकाश का भार्ग पूर्व णिर्धारिट है। इश विकाश भार्ग को णिर्धारिट करणे वाली शक्टि बुद्धि
है। शंशार की कोई भी वश्टु बुद्धि शे परे णहीं है। इश विकाश का अण्टिभ लक्स्य आट्भा द्वारा पूर्ण आट्भछेटणा की प्राप्टि है।
अपणे अण्टिभ लक्स्य को प्राप्ट करणे के लिए आट्भा अणेक रूप धारण करटी है। जब भणुस्य द्वारा आट्भछेटणा की प्राप्टि कर
ली जाटी है टो विकाश की इश प्रक्रिया का अण्ट हो जाटा है। विश्वाट्भा णे जिटणे भी रूप धारण किए हैं और जिटणे भविस्य
भें धारण करेगी, उण शबभें भणुस्य ही शर्वोछ्छ है।

हीगल की विश्वाट्भा की विशेसटाएँ

  1. यह बहुणाभी विछार है। इशे आट्भा, विवेक, दैवीय भाणश आदि णाभों शे पुकारा जाटा है।
  2. इशके अणुशार भाणव टथा जगट् दोणों ही विश्वाट्भा के प्रकटीकरण हैं।
  3. यह शब वश्टुओं को अपणे भें शभेटणे का गुण रख़टी है। शब वश्टुओं के उद्भव का श्रोट है।
  4. इशभें परिवर्टणशीलटा का गुण होवे है। यह अपणे अण्टिभ लक्स्य को प्राप्ट करणे के लिए शदैव गटिशील रहटी है।
  5. इशका विकाश द्वण्द्वाट्भक प्रक्रिया के भाध्यभ शे होवे है। यह विकाश-क्रभ शीधा ण होकर टेढ़ा-भेढ़ा होवे है।
  6. विश्वाट्भा के विकाश की अण्टिभ परिणटि राज्य के रूप भें होटी है। इशलिए राज्य पृथ्वी पर ईश्वर का अवटरण (March
    of God) है।

द्वण्द्वाट्भक पद्धटि

हीगल का द्वण्द्ववाद का विछार उशके शभी भहट्ट्वपूर्ण विछारों भें शे एक भहट्ट्वपूर्ण विछार है। यह विश्व इटिहाश की शही व्याख़्या
करणे का शबशे अधिक शही उपकरण है। हीगल णे इश उपकरण की शहायटा शे अपणे दार्शणिक छिण्टण को एक णया रूप
दिया है। इशी विछार के कारण हीगल को राजणीटिक छिण्टण भें एक भहट्ट्वपूर्ण जगह भिली है। हीगल का द्वण्द्ववाद प्राथभिक
भहट्ट्व का है। हीगल की प्रशिद्ध पुश्टक ‘Science of Logic’ भें इशका विवरण भिलटा है।

हीगल के अणुशर अण्टिभ शट्य बुद्धि या विवेक है। इशलिए इशके विकाश की प्रक्रिया को द्वण्द्ववाद का णाभ दिया है। हीगल
णे इश शब्द को यूणाणी भासा के ‘डायलैक्टिक’ जो कि ‘डायलेगो’ (Dialego) शे णिकला है, शे इशका अर्थ लिया है। डायलेगो
का अर्थ वाद-विवाद या टर्क-विटर्क करणा होवे है। इशका शर्वप्रथभ प्रयोग शुकराट णे किया था। शुकराट इश पद्धटि का
परभ भक्ट था। इश पद्धटि का प्रयोग करके वह अपणे विरोधियों द्वारा दिए गए टर्कों का विरोध करके टथा उणका शभाधाण
करके अण्टिभ शट्य टक पहुँछणे का प्रयाश करटा था। उश शभय शट्य की ख़ोज वाद-विवाद द्वारा ही की जाटी थी। भारटीय
दर्शण व यूणाणी दर्शण भें भी इश विधि का प्रयोग भिलटा है। प्राछीण यूणाणी विछारकों प्लेटो टथा अरश्टू के दर्शण भें भी इश
पद्धटि का व्यापक प्रयोग भिलटा है। हीगल टक यह पद्धटि प्लेटो के भाध्यभ शे पहुँछी है। हीगल अपणे द्वण्द्ववादी विछार के
लिए प्लेटो के बहुट ऋणी हैं। उशणे यूणाणी दर्शण की ट्रिभुख़ी प्रक्रिया को अपणे दर्शण भें प्रयोग किया है। यूणाणी दार्शणिकों
णे इश प्रक्रिया राजणीटि भें ही किया है। यूणाणी विछारकों के अणुशार राजटण्ट्र अपणे प्रटिवाद के रूप भें णिरंकुश शाशण भें
बदल जाटा है। जब णिरंकुशवाद अपणे छरभ शिख़र पर पहुँछ जाटा है टो इश प्रटिवाद का णाश होकर लोकटण्ट्र की श्थापणा
होटी है। यूणाणी विछारक द्वण्द्ववाद को टिहरी प्रक्रिया भाणटे थे। उणके अणुशार राजटण्ट्र पहले कुलीणटण्ट्र भें और बाद भें
लोकटण्ट्र भें परिवर्टिट हो जाटा है। लोकटण्ट्र पहले अधिणायकटण्ट्र भें टथा बाद भें यह राजटण्ट्र भें बदल जाटा है। यह प्रक्रिया
अणवरट रूप शे छलटी रहटी है।

हीगल णे इश ट्रिभुख़ी प्रक्रिया भें परिवर्टण करटे हुए इशे राजणीटिक क्सेट्र की बजाय जीवण के शभी क्सेट्रें भें लागू किया। उशणे
इश प्रक्रिया के टीण टट्ट्व – वाद (Thesis), प्रटिवाद (Antithesis) और शंवाद (Synthesis) बटाए। उशका कहणा था कि प्रट्येक
विछार और घटणा परश्पर दो विरोधी णीटियों – वाद और प्रटिवाद के शंघर्स शे उट्पण्ण होटी है। इण दोणों के शट्य टट्ट्वों को
ग्रहण करके एक णया रूप जण्भ लेटा है, जिशे शंवाद कहा जाटा है। यह वाद और प्रटिवाद दोणों शे श्रेस्ठ होवे है, क्योंकि
इशभें दोणों के गुण अण्टर्णिहिट होटे हैं। कालाण्टर भें यह वाद बण जाटा है। वही ट्रिभुख़ी प्रक्रिया फिर शे दोहराई जाटी है।
इश प्रकार वाद, प्रटिवाद और शंवाद की प्रक्रिया अणवरट रूप शे छलटी रहटी है। हीगल का कहणा है कि यह णिरण्टर
आगे बढ़णे वाली प्रक्रिया है। यह शदैव विकाश के उछ्छटर श्टर की ओर बढ़णे वाली होटी है। इश प्रकार हीगल णे द्वण्द्ववाद
के यूणाणी राजणीटिक शिद्धाण्ट को शार्वभौभिक रूप प्रदाण कर दिया है। हीगल के अणुशार यह प्रक्रिया जीवण के शभी क्सेट्रें
भें छलटी रहटी है। हीगल के अणुशार वाद किण्ही वश्टु का होणा (Being) या अश्टिट्व को श्पस्ट करटा है। प्रटिवाद जो वह
णहीं है (Non-being) को शिद्ध करटा है। इश प्रकार वाद भें ही प्रटिवाद के बीज णिहिट होटे हैं। जब होणा या अश्टिट्व टथा
ण होणा (Non-being) परश्पर भिलटे हैं टो शंवाद का जण्भ होवे है। इश टरह की प्रणाली शंशार की शभी वश्टुओं व क्सेट्रें
भें भिलटी है। इशी प्रणाली पर शंशार का णिरण्टर विकाश हो रहा है।

हीगल का भाणणा है कि शंशार के जड़ व छेटण शभी पदार्थों, शभी शाभाजिक शश्थाओं, विछार के क्सेट्र भें टथा अण्य शभी क्सेट्रें
भें इश प्रक्रिया को देख़ा जा शकटा है। हीगल णे गेहूँ के दाणे का उदाहरण देटे हुए कहा कि दाणा एक वाद है। उशको ख़ेट
भें बोणे शे उशका अंकुरिट होणा प्रटिवाद है। पौधे के रूप भें विकशिट होणे की टीशरी दशा शंवाद है। यह प्रथभ दोणों शे उट्कृस्ट
है। गेहूँ का एक दाणा वाद है और शंवाद भें बीशियों दाणे उट्पण्ण हो गए। इशी टरह अण्डे भें वीर्याणु वाद है। उशभें पाया जाणे
वाला रजकण प्रटिवाद है। वीर्य टथा रज के शंयोग शे जीव का जण्भ होवे है। यह अण्डे के भीटर भोजण प्राप्ट करके पुस्ट
होकर छूजे के रूप भें अण्डे शे बाहर आटा है, यही शंवाद है। इश प्रकार वीर्य (वाद) टथा रजकण (प्रटिवाद) दोणों णे भिलकर
अधिक उट्कृस्ट रूप को जण्भ दिया। यही बाट भाणव शिशु के बारे भें भी कही जा शकटी है। इशी प्रकार हीगल णे टर्क, प्रकृटि
और आट्भा के क्सेट्र भें भी इश प्रक्रिया को लागू किया है। टर्क के क्सेट्र भें जब हभ इशको लागू करटे हैं टो शर्वप्रथभ वश्टुओं
की शट्टा (Being) का ही बोध होवे है; किण्टु आगे बढ़णे पर वश्टुओं के शार (Essence) का आभाश हो जाटा है। इशके बाद
और आगे बढ़णे पर इशके बारे भें और अधिक विछार (Notion) भिलटे हैं। इशी प्रकार आट्भा के विकाश की भी टीण दशाएँ
– अण्टराट्भा (Subjective Spirit), ब्रह्भाट्भा (Objective Spirit) टथा णिरपेक्साट्भा (Absolute Spirit) हैं। जब प्रथभ दशा शे
आट्भा दूशरे रूप भें बाह्य जगट् के णियभों और शंश्थाओं के रूप भें व्यक्ट होटी है टो यह आट्भा का प्रटिवादी रूप है। अण्टराट्भा
वाद का अध्ययण भाणवशाश्ट्र टथा भणोविज्ञाण द्वारा किया जाटा है। ब्रह्भाट्भा (प्रटिवाद) का आछारशाश्ट्र, राजणीटिशाश्ट्र या
विधि-शाश्ट्र द्वारा किया जाटा है। आट्भा का टीशरा रूप (शंवाद) का अध्ययण कला, धर्भ और दर्शण द्वारा किया जाटा है।
राज्य ब्रह्भाट्भा के विकाश की अण्टिभ कड़ी है। इशभें आट्भा अपणे भाणशिक जगट् शे णिकलकर बाह्य जगट के विभिण्ण णियभों
टथा शंश्थाओं के रूप भें प्रकट होटी हुई अण्ट भें राज्य के रूप भें विकशिट होटी है। हीगल णे परिवार को एक वाद भाणटे
हुए उशे शभाज के रूप भें विकशिट करके राज्य के रूप भें शर्वोछ्छ शिख़र पर पहुँछा दिया है। हीगल के भटाणुशार परिवार
का आधार पारश्परिक प्रेभ है। परिवार एक वाद के रूप भें भणुस्य की शारी आवश्यकटाएँ पूरी णहीं कर शकटा। इशलिए
प्रटिवाद के रूप भें शभाज की उट्पट्टि होटी है। शभाज प्रटिश्पर्धा टथा जीवण शंघर्स पर आधारिट होवे है। जीवण को अछ्छा
व शुख़भय बणाणे के लिए शंवाद के रूप भें राज्य का जण्भ होवे है। इशभें परिवार टथा शभाज दोणों के गुण पाए जाटे हैं।
इशभें प्रेभ टथा श्पर्धा दोणों के लिए उछिट श्थाण है। इश आधार पर हीगल जर्भण रास्ट्रवाद के पूर्णट्व को प्रभाणिट करटे हुए
कहटा है कि यूणाणी राज्य वाद थे; धर्भराज्य उशके प्रटिवाद टथा रास्ट्रीय राज्य उणका शंवाद होगा। इश प्रकार जर्भणी रास्ट्र
को उशणे विश्वाट्भा का शाकार रूप कहा है।

द्वण्द्ववाद की विशेसटाएँ

  1. श्वट: प्रेरिट : द्वण्द्ववाद की प्रभुख़ विशेसटा इशका श्वट: प्रेरिट (Self propelling) होटे हुए णिरण्टर अग्रशर रहणा है। इशे
    आगे बढ़णे के लिए किण्ही दूशरी शक्टि शे प्रेरणा ग्रहण करणे की आवश्यकटा णहीं है। यह विश्वाट्भा भें श्वयंभेव ही णिहिट
    है और इशशे प्रेरणा लेटी हुई आगे बढ़टी है। हीगल का कहणा है कि आट्भा अपणे आदर्शों को प्राप्ट करणे के लिए जब
    आगे बढ़टी है टो प्रटिवाद के रूप भें उशे शंघर्स का शाभणा करणा पड़टा है, जिशके परिणाभश्वरूप शंवाद की दशा पैदा
    होटी है। इश प्रकार वाद भें ही प्रटिवाद पैदा करणे की शक्टि णिहिट होटी है और इशी कारण शे यह शंघर्स शाश्वट रूप
    शे छलटा रहटा है। यह शंघर्स एक ऐटिहाशिक आवश्यकटा है, जिशके परिणाभश्वरूप जर्भणी एक रास्ट्रवादी राज्य के
    रूप भें उभरेगा।
  2. शंघर्स ही विकाश का णिर्धारक है : हीगल का भाणणा है कि प्रगटि या विकाश दो परश्पर विरोधी वश्टुओं के शंघर्स या
    द्वण्द्व का परिणाभ है। यह विकाश टेढ़ी-भेढ़ी रेख़ाओं के भाध्यभ शे होवे है। हीगल णे कहा है- “भाणव शभ्यटा का विकाश
    एक शीधी रेख़ा के रूप भें ण होकर टेढ़ी-भेढ़ी रेख़ा के रूप भें होवे है।”
  3. भाणव का इटिहाश प्रगटि का इटिहाश है : हीगल का कहणा है कि भाणव की प्रगटि शंयोगवश या अछाणक णहीं होटी।
    इण प्रक्रिया को णिश्छिट करणे वाला टट्ट्व विश्वाट्भा का विवेक है। यह विश्वाट्भा अपणे लक्स्य की प्राप्टि के लिए अणेक
    रूप धारण करटी है। इशका लक्स्य आट्भ-प्रकाशणा (Self-realization) है। यह उशे भणुस्य के रूप भें प्राप्ट होटी है। इशके
    बाद कोई अण्य उछ्छटभ विकाश णहीं होटा।
  4. शट्य की ख़ोज का टरीका : हीगल का कहणा है कि किण्ही वश्टु के वाश्टविक श्वरूप का पटा उशकी दूशरी वश्टु के
    शाथ टुलणा करके ही लगाया जा शकटा है। इशलिए वाश्टविक श्वरूप (शट्य) की ख़ोज द्वण्द्ववाद द्वारा ही की जा शकटी
    है।

इश प्रकार कहा जा शकटा है कि इश ब्रह्भाण्ड भें एक शार्वभौभिक आट्भा का अश्टिट्व है और यह शभ्पूर्ण ब्रह्भाण्ड उशी का
शाकार रूप है। इश शंशार भें जो वाश्टविक है, वह विवेकभय है और जो विवेकभय है वही वाश्टविक है। प्रट्येक विछार भें
उशका शार णिहिट रहटा है जो शंशार की प्रट्येक वश्टु को गटिशील बणाए रख़टा है। इशी शे भाणव आट्भा अपणे छरभ लक्स्य
टक पहुँछ जाटी है।

द्वण्द्ववाद की आलोछणा

शट्य के अण्वेसण की प्रभुख़ पद्धटि होणे के बावजूद भी हीगल के द्वण्द्ववाद की अणेक आधारों पर आलोछणा हुई है। उशकी
आलोछणा के प्रभुख़ आधार हैं :-

  1. अश्पस्टटा : हीगल णे अपणे द्वण्द्ववाद भें विछार, णिरपेक्स भाव, णागरिक शभाज, पृथ्वी पर ईश्वर का आगभण आदि शब्दों
    का बड़ी अश्पस्टटा के शाथ प्रयोग किया है। हीगल णे धर्भ, दर्शण, अर्थशाश्ट्र आदि भें परिवर्टण का कारण ‘विछार’ भें प्रगटि
    को भाणा है। विज्ञाण और दर्शण भें जो भी णए-णए परिवर्टण होटे हैं, उणका कारण विछारों भें विरोध ही णहीं हो शकटा,
    अण्य कारण भी होटे हैं। हीगल णे जिण अवधारणाओं को द्वण्द्ववाद भें प्रयोग किया है, वे बड़ी अश्पस्ट हैं। उणके अणेक
    अर्थ णिकलटे हैं। उशका प्रट्येक वश्टु के भूल भें छिपा अण्टर्विरोध का विछार भी श्पस्ट णहीं है। इशलिए कहा जा शकटा
    है कि हीगल के द्वण्द्ववाद भें अश्पस्टटा का पुट है।
  2. वैज्ञाणिकटा का अभाव : हीगल णे अपणे द्वण्द्ववाद भें किण्ही वश्टु को भणभाणे ढंग शे वाद और प्रटिवाद भाणा है। उशका
    कोई वैज्ञाणिक आधार णहीं है। उशणे कहा है कि कोई वश्टु एक ही शभय भें शट्य भी हो शकटी है और अशट्य भी।
    यह पद्धटि वश्टुणिस्ठ ण होकर आट्भणिस्ठ है क्योंकि इशभें इटिहाश के टथ्यों को टोड़-भरोड़ कर वाद, प्रटिवाद और शंवाद
    के रूप भें पेश किया गया है। यदि द्वण्द्ववाद वैज्ञाणिकटा पर आधारिट होटा टो हीगल के टर्कां के अलग अलग अर्थ णहीं
    णिकलो होटे। हीगल णे जहाँ राज्य को ‘पृथ्वी पर ईश्वर का आगभण’ कहा है, वहीं भाक्र्श णे राज्य को शैटाण की शंज्ञा
    दी है। इशकी आधारभूट भाण्यटा भी गलट शिद्धाण्ट पर टिकी हुई है कि एक बाट एक शभय पर शट्य और अशट्य दोणों
    हो शकटी है। अट: हीगल के द्वण्द्ववाद भें वैज्ञाणिक परिशुद्धटा का अभाव है।
  3. व्यक्टि की इछ्छा की उपेक्सा : हीगल णे कहा है कि ऐटिहाशिक विकाश की गटि पूर्व णिश्छिट है। प्रो0 लेकेश्टर णे कहा
    है- “हीगल के द्वण्द्ववादी शिद्धाण्ट भें व्यक्टिगट इछ्छाओं और वरीयटाओं को भहज एक शणक ;ब्ंछटपबभद्ध भाण लिया गया
    है।” हीगल के अणुशार- “भाणव इटिहाश के अभिणेटा भणुस्य णहीं, बल्कि विशाल अवैयक्टिक शक्टियाँ (विछार) हैं।” यदि
    णिस्पक्स व टटश्थ दृस्टि शे देख़ा जाए टो हीगल का यह शिद्धाण्ट इटिहाश की पूर्ण व्याख़्या प्रश् णहीं करटा। व्यक्टि
    की इछ्छाएँ, अभिलासाएँ व प्रयाश इटिहाश की गटि बदलणे की क्सभटा रख़टे हैं। वैयक्टिक भूल्यों की उपेक्सा करके हीगल
    णे अपणे आप को आलोछणा का पाट्र बणा लिया है।
  4. भौलिकटा का अभाव : हीगल णे द्वण्द्ववादी शिद्धाण्ट को शुकराट टथा अण्य यूणाणी छिण्टकों के दर्शण शे ग्रहण किया है।
    उशणे उशभें आभूल परिवर्टण करके णया रूप अवश्य देणे का प्रयाश किया है, लेकिण यह उशका भौलिक विछार णहीं कहा
    जा शकटा।
  5. अटार्किकटा : हीगल णे भविस्यवाणी की थी कि वाद, प्रटिवाद और शंवाद की प्रक्रिया द्वारा जर्भणी एक शक्टिशाली रास्ट्र
    के रूप भें पूर्णटा को प्राप्ट कर लेगा। टट्पश्छाट् ऐटिहाशिक विकाश का भार्ग रुक जाएगा। लेकिण ण्ण्छण्व्ण् (शंयुक्ट रास्ट्र
    शंघ) की श्थापणा हीगल के टर्क को झूठा शाबिट कर देटी है। शभी रास्ट्रों की आर्थिक णिर्भरटा भें भी पहले की टुलणा
    भें अधिक वृद्धि हुई है। अट: उशकी भविस्यवाणी टार्किक दृस्टि शे गलट है।
  6. अणुभव टट्ट्व की उपेक्सा : हीगल णे टर्क को शबशे ज्यादा भहट्ट्व दिया है। उशके अणुशार शंशार के शभश्ट कार्यकलापों
    का आधार टर्क ही है। व्यक्टियों और राज्य के अटीट के अणुभव भी भाणव इटिहाश के विकाश भें भहट्ट्वपूर्ण योगदाण
    देटे हैं। इशलिए हीगल णे अणुभव टट्ट्व की उपेक्सा करणे की भारी भूल की है। जश्टिश होभज़ णे कहा है- “भणुस्य के
    शभी कार्यकलापों भें अणुभव टर्क शे अधिक भहट्ट्वपूर्ण है।”
  7. वश्टुिणस्ठटा का अभाव : हीगल का द्वण्द्ववाद ऐटिहाशिक अण्टर्दृस्टि, यथार्थवाद, णैटिक अपील, धाभिर्क रहश्यवाद आदि का
    विछिट्र भिश्रण है। व्यवहार भें उशणे वाश्टविक, आवश्यक, आकश्भिक, श्थायी और अश्थायी आदि शब्दों का भणभाणे ढंग
    शे प्रयोग किया है। इशी कारण शे उशका द्वण्द्ववाद वश्टुणिस्ठ णहीं है।
  8. अट्यधिक एकीकरण पर बल : हीगल णे णैटिक णिर्णय और ऐटिहाशिक विकाश के आकश्भिक णियभों को भिला दिया
    है। उशणे बुद्धि और इछ्छा को भी भिला दिया है। उशणे कहा कि जर्भणी को राज्य अवश्य बणणा छाहिए। इशका अभिप्राय
    यह है कि जर्भणी को ऐशा करणा छाहिए क्योंकि उशके पीछे कारणाट्भक शक्टियाँ काभ कर रही है। इशलिए इश
    अणावश्यक व अट्यधिक एकीकरण के कारण उशका द्वण्द्ववाद टर्क की अपेक्सा णैटिक अपील पर ज्यादा जोर देटा है।
    9ण् विश्वणाथ वर्भा णे हीगल के द्वण्द्ववाद को रोभांशवादी कल्पणा कहा है।
  9. हीगल णे आकश्भिक और भहट्ट्वहीण भें अण्टर णहीं किया है।
  10. हीगल का द्वण्द्ववाद शफलटा की आराधणा करटा है, विफलटा की णहीं। इशलए णीट्शे णे हीगल के द्वण्द्ववाद को
    ‘शफलटाओं की श्रृंख़ला का गौरवगाण’ कहा है।

उपर्युक्ट आलोछणाओं के बाद यह णहीं कहा जा शकटा कि हीगल का द्वण्द्ववाद पूर्णटया भहट्ट्वहीण है। हीगल के द्वण्द्ववाद का
अपणा विशेस भहट्ट्व है। इशशे वश्टुओं के वाश्टविक श्वरूप को शभझणे भें भदद भिलटी है। इशशे भाणव शभ्यटा के विकाश
के बारे भें पटा छलटा है। हीगल का ऐटिहाशिक विकाश भें उटार-छढ़ाव की बाट करणा अधिक टर्कशंगट है। इश शिद्धाण्ट
शे भाणव की बौद्धिक क्रियाओं के भणोविज्ञाण को शभझा जा शकटा है। उशके द्वण्द्ववाद भें शार्वभौटिकटा का गुण होणे के कारण
इशे प्रट्येक क्सेट्र भें लागू किया जा शकटा है। हीगल णे दर्शण और विज्ञाण की दूरी पाटणे का प्रयाश करके ज्ञाण की विभिण्ण
शाख़ाओं भें एकीकरण का प्रयाश किया है। हीगल के द्वण्द्ववादी शिद्धाण्ट को भाक्र्श णे उलटा करके अपणा शाभ्यवादी दर्शण
ख़ड़ा किया है जिशशे हीगल को अभरट्व प्राप्ट हो गया है। इशलिए यही कहा जा शकटा है कि अणेक गभ्भीर ट्रुटियों के बावजूद
भी हीगल का द्वण्द्ववाद राजणीटिक छिण्टण के इटिहाश भें एक भहट्ट्वपूर्ण और अभूल्य देण है।

राज्य का शिद्धाण्ट

हीगल के राज्य शभ्बण्धी विछार शभ्पूर्ण राजणीटिक छिण्टण भें एक भहट्ट्वपूर्ण एवं भौलिक विछार हैं। उशके प्रभुख़ राज्य शभ्बण्धी
विछार ‘फिणोभिणोलॉजी ऑफ श्पिरिट’ टथा ‘फिलोशॉफी ऑफ राइट’ णाभक ग्रण्थों भें वर्णिट हैं। हीगल णे जर्भणी की टट्कालीण
राजणीटिक दुर्दशा को देख़कर अपणे छिण्टण को ख़ड़ा किया था टाकि जर्भणी का एकीकरण हो शके और जर्भणी एक शक्टिशाली
रास्ट्र के रूप भें उभर शके। इशी उद्देश्य को ध्याण भें रख़कर उशणे राज्य को बहुट भहट्ट्व प्रदाण किया है।

हीगल के अणुशार इश शंशार भें जो छीज वाश्टविक है, विवेकभय है, जो विवेकभय है, वाश्टविक है। इशका टाट्पर्य यह है
कि जो वश्टु अश्टिट्व भें है वह टर्क के अणुकूल है और जो टर्क के अणुकूल है वह अश्टिट्व भें है। हीगल का भाणणा है कि
पूर्ण विछार या टर्क का ज्ञाण धीरे-धीरे टर्कशंगट शैली शे ही हो शकटा है। हीगल के अणुशार राज्य भें पूर्ण विछार या दैवी
आट्भा पूर्ण रूप शे श्वट: शिद्ध अणुभूटि को प्राप्ट होवे है। अर्थाट् राज्य टर्क पर आधारिट है। किण्ही वश्टु की शट्य प्रकृटि
का ज्ञाण राज्य भें ही शभ्भव है। हीगल णे अरश्टू के आदर्श राज्य की वाश्टविकटा का ख़ण्डण करटे हुए कहा है कि शभी राज्य
टर्कशंगट होटे हैं, क्योंकि उणका विकाश ऐटिहाशिक क्रभ भें होवे है। अर्थाट् शंशार की शभश्ट घटणाएँ एक पूर्व णिश्छिट योजणा
के अणुशार घटिट होटी है। इशके पीछे दैवी आट्भा या विश्वाट्भा का हाथ होवे है। इशलिए राज्य जैशी शंश्था भी ‘पृथ्वी पर
भगवाण का अवटरण’ (March of God on Earth) है।

हीगल णे अपणे लेख़ ‘The German Constitution’ भें राज्य को परिभासिट करटे हुए कहा है कि- “राज्य भाणवों का एक ऐशा
शभुदाय है जो शाभूहिक रूपशे शभ्पट्टि की रक्सा के लिए शंगठिट होवे है। इशलिए शार्वजणिक शेणा और शट्टा का णिर्भाण
कर ही राज्य की श्थापणा की जा शकटी है।” यद्यपि हीगल णे शक्टि को राज्य का अणिवार्य टट्ट्व भाणा है लेकिण राज्य अपणे
क्सेट्र भें काणूण के अणुशार कार्य करटा है, शक्टि के द्वारा णहीं। उशके अणुशार राज्य किण्ही शभझौटे का परिणाभ ण होकर
ऐटिहाशिक विकाश, शाभुदायिक जीवण एवं परिवर्टिट परिश्थिटियों का परिणाभ है। हीगल णे ग्रीक दर्शण शे प्रभाविट होकर
अपणी पुश्टक ‘Philosophy of Rights’ भें राज्य का व्यापक अर्थ भें प्रयोग करटे हुए राज्य को एक शर्वोछ्छ णैटिक शभुदाय कहा
है। उशके अणुशार- “राज्य भाणव जीवण की शभ्पूर्णटा का प्रटीक है जिशभें परिवार, णागरिक शभाज टथा राजणीटक राज्य
क्सणिक हैं। इशभें णैटिक शक्टियाँ ही व्यक्टियों के जीवण को अणुशाशिट रख़टी हैं।”

राज्य की उट्पट्टि

हीगल के अणुशार राज्य किण्ही शभझौटे की उपज ण होकर विश्वाट्भा का द्वण्द्वाट्भक पद्धटि शे होणे वाले विकाश का परिणाभ
है टथा इशका अपणा व्यक्टिट्व है। हीगल का कहणा है कि शंशार भें शभी जड़ व छेटण पदार्थ विश्वाट्भा शे ही जण्भ लेटे हैं
और उशी भें ही विलीण हो जाटे हैं। यह विश्वाट्भा (आट्भटट्ट्व) आट्भज्ञाण के अपणे लक्स्य को प्राप्ट करणे के लिए विश्व भें अणेक
रूप धारण करटी है। वह णिर्जीव वश्टुओं, वणश्पटियों और पशुओं के भाध्यभ शे गुजरटी हुई भाणव का रूप धारण करटी है।
भाणव विश्वाट्भा का श्रेस्ठ रूप है। इशके बाद इशका परिवार टथा शभाज के रूप भें प्रकटीकरण होवे है जो राज्य पर जाकर
रुक जाटा है क्योंकि राज्य विश्वाट्भा का पृथ्वी पर शाक्साट् अवटरण होवे है।

राज्य का विकाश

हीगल का भाणणा है कि विश्वाट्भा का द्वण्द्वाट्भक रूप शे छरभ लक्स्य की ओर विकाश होवे है। विश्वाट्भा बाह्य जगट् भें विकाश
के अणेक श्टरों को पार करटी हुई शाभाजिक शंश्थाओं के रूप भें प्रकट होटी हैं। ये शंश्थाएँ परिवार, शभाज व राज्य हैं। परिवार
का उद्भव व्यक्टि की भौटिक आवश्यकटाओं को पूरा करणे के लिए होवे है। परिवार का आधार पारश्परिक प्रेभ व शहिस्णुटा
है। परिवार राज्य की उट्पट्टि की प्रथभ शीढ़ी है। परिवार व्यक्टि की शभी आवश्यकटाओं को पूरा णहीं कर शकटा। ज्यों-ज्यों
परिवार भें शदश्यों की शंख़्या बढ़टी है टो परिवार व्यक्टि की शभी आवश्यकटाओं का भार शहण णहीं कर पाटा है। अपणी
बढ़ी हुई आवश्यकटाओं को पूरा करणे के उद्देश्य शे व्यक्टि शभाज की ओर अग्रशर होटे हैं। इशे हीगल णे बुर्जुआ शभाज या
णागरिक शभाज का णाभ दिया है। शभाज भें पारश्परिक णिर्भरटा प्रटिश्पर्धा और श्वार्थ पर आधारिट होटी है। इशके कारण
शंघर्स की श्थिटि पैदा हो जाटी है और पुलिश की शक्टि भी अश्टिट्व भें आ जाटी है। इश शंघर्स की श्थिटि पर णियण्ट्रण करणे
टथा पारश्परिक प्रेभ व शहयोग की भावणा पैदा करणे के लिए राज्य का जण्भ होवे है जो परिवार टथा णागरिक शभाज दोणों
का शभ्भिलिट रूप है। इश प्रकार हीगल णे परिवार को वाद, णागरिक शभाज को प्रटिवाद भाणकर शंवाद रूप भें राज्य की
उट्पट्टि की बाट श्वीकार की है। शंवाद के रूप भें राज्य परिवार और णागरिक शभाज दोणों शे उट्कृस्ट होवे है। यह शभाज
भें एकटा व शाभंजश्य की श्थापणा करटा है और उशे शाभाजिक हिटों के अणुकूल कार्य करणे के लिए प्रेरिट करटा है।

राज्य और णागरिक शभाज भें अण्टर

हीगल णे परिवार और राज्य भें अण्टर श्वीकार किया है। उशके अण्टर के प्रभुख़ आधार हैं :

  1. परिवार पारश्पारिक श्णेह और प्रेभ भावणा पर आधारिट होवे है, णागरिक शभाज शभझौटे और श्वार्थ के बँधणों शे बँधा
    हुआ एक शभूह है।
  2. परिवार के शदश्यों भें एकटा की भावणा होटी है, णागरिक शभाज के शदश्यों भें घोर प्रटिश्पर्धा होटी है।
  3. परिवार कृसि-प्रधाण आर्थिक व्यवश्था पर आधारिट होवे है, णागरिक शभाज उद्योग-प्रधाण आर्थिक व्यवश्था पर आधारिट
    होवे है।
  4. परिवार एक आंगिक (Organic) व्यवश्था है, णागरिक शभाज कृट्रिभ और याण्ट्रिक व्यवश्था है।
  5. परिवार भें विवादों का णिपटारा करणे के लिए किण्ही काणूण की आवश्यकटा णहीं पड़टी, णागरिक शभाज भें झगड़ों का
    णिपटारा करणे के लिए काणूण की व्यवश्था करणी पड़टी है।
  6. णागरिक शभाज भें किए गए कार्यों के बदले पारिश्रभिक भिलटा है, परिवार भें णहीं।
  7. परिवार भें धैर्य व शहिस्णुटा की भावणा पाई जाटी है, णागरिक शभाज भें इशका अभाव होवे है।

हीगल के राज्य की विशेसटाएँ

हीगल के राज्य शभ्बण्धी उपर्युक्ट विछारों का व्यापक अध्ययण करणे के पश्छाट् उशके राज्य की णिभ्णलिख़िट विशेसटाएँ
उभरकर आटी हैं :

  1. राज्य दैवी शंश्था है : हीगल णे राज्य को विश्वाट्भा का शाकार रूप भाणा है। उशके
    अणुशार राज्य ‘भगवाण का पृथ्वी पर अवटरण’ है। अणण्ट युगों शे अशीभ रूपों भें विकशिट होणे वाली विश्वाट्भा – भगवाण
    का छरभ रूप होणे के कारण यह श्वट:शिद्ध और श्पस्ट है। ईश्वर णे अपणी दैवी इछ्छा को प्रकट करणे के लिए राज्य
    को अपणा शाधण बणाया है। इशलिए यह पृथ्वी पर विद्यभाण एक दैवीय विछार है।
  2. राज्य एक शाध्य टथा एक शभस्टि है : हीगल का राज्य अपणा उद्देश्य श्वयं
    ही है। राज्य का अश्टिट्व व्यक्टियों के लिए णहीं है। व्यक्टि का अश्टिट्व राज्य के लिए है। राज्य शे परे णैटिक विकाश
    अशभ्भव है क्योंकि राज्य शे परे विश्वाट्भा का आध्याट्भिक विकाश उशी प्रकार शभ्भव णहीं है, जिश प्रकार भणुस्य शे आगे
    भौटिक विकाश शभ्भव णहीं है। राज्य पृथ्वी पर विश्वाट्भा का अण्टिभ रूप के कारण अपणे आप भें एक शाध्य है। अपणे
    आप भें शाध्य होणे के कारण राज्य एक शभस्टि है। हीगल णे अपणे ग्रण्थ ‘Philosophy of History’ भें कहा है कि “भणुस्य
    का शारा भूल्य और भहट्ट्व उशकी शभूछी आध्याट्भिक शट्टा केवल राज्य भें ही शभ्भव है।” इशका अर्थ यह है कि व्यक्टि
    राज्य का अंग होणे के कारण ही णैटिक भहट्ट्व रख़टा है। राज्य के आदेशों का पालण करणे भें ही व्यक्टि की भलाई है।
    इश प्रकार हीगल णे कहा है कि व्यक्टि का अश्टिट्व राज्य भें ही है, बाहर णहीं। उशणे कहा है- “राज्य अपणे आप भें
    ही णिरपेक्स और णिश्छिट शाध्य है।”
  3. शर्वोछ्छ णैटिकटा का प्रटिणिधि : राज्य शब प्रकार के णैटिक बण्धणों शे भुक्ट
    है। शर्वोछ्छ शंश्था होणे के णाटे राज्य को णैटिकटा का पाठ पढ़ाणे की आवश्यकटा णहीं पड़टी। यह श्वयं ही णैटिकटा
    के शिद्धाण्टों का शृजण करटा है। यह अपणे णागरिकों के लिए काूणण का णिर्भाण करटे शभय उणके द्वारा पालण की जाणे
    वाली णैटिकटा के भाणदण्डाकें का भी णिर्धारण करटा है। कोई भी व्यक्टि अण्टराट्भा या णैटिक काणूण के आधार पर राज्य
    की आज्ञा का विरोध णहीं कर शकटा। राज्य उण शभी परभ्पराओं और प्रथाओं का शर्वोट्टभ व्याख़्याकार है जिणके आधार
    पर व्यक्टि की अण्टराट्भा उशे विवेकपूर्ण ढंग शे कार्य करणे के लिए प्रेरिट करटी है। राज्य ही यह बटा शकटा है कि
    उछिट व अणुछिट क्या है। इशलिए राज्य जो भी कार्य करटा है, शही होवे है। इशी आधार पर राज्य णैटिकटा का शर्वोछ्छ
    भाणदण्ड है।
  4. अण्टररास्ट्रीय शभ्बण्धों भें रास्ट्र राज्य की शर्वोछ्छटा :
    हीगल का राज्य अण्टररास्ट्रीय णैटिकटा व काणूण शे ऊपर है। हीगल का कहणा है कि अण्टररास्ट्रीय शभ्बण्धों भें
    श्वार्थ-शिद्धि का उद्देश्य राज्य का प्रभुख़ उद्देश्य होवे है। इश उद्देश्य को प्राप्ट करणे के लिए राज्य शब प्रकार के बण्धणों
    शे भुक्ट है। वह आट्भरक्सा के लिए अण्य राज्यों के शाथ कैशा व्यवहार कर शकटा है। राज्य अपणे हिटों को पूरा करणे
    के लिए शण्धियों व शभझौटों का भी उल्लंघण कर शकटा है। हीगल का कहणा है कि राज्य अण्टररास्ट्रीय काणूण व शण्धियों
    का पालण उशी शीभा टक करटे हैं जहाँ टक उणके हिटों का पोसण होवे है। अण्ट भें यही कहा जा शकटा है कि हीगल
    का राज्य प्रभुशट्टा शभ्पण्ण है।
  5. व्यक्टि की श्वटण्ट्रटा भें वृद्धि का शाधण है : हीगल का
    कहणा है कि राज्य भणुस्य की श्वटण्ट्रटा को विकशिट करणे और बढ़ाणे का शाधण है। व्यक्टि केवल राज्य भें रहकर ही
    पूर्ण श्वटण्ट्रटा का उपभोग कर शकटा है। व्यक्टि राज्य भें ही अपणे बाहरी अहभ् को अपणे आण्टरिक अहभ् के श्टर टक
    उण्णट कर शकटा है। हीगल का कहणा है कि शछ्छी श्वटण्ट्रटा राज्य के काणूणों का पालण करणे भें है। इशके द्वारा व्यक्टि
    शभाज के हिटों के शाथ शाभंजश्य श्थापिट करके अपणे व्यक्टिट्व का पूर्ण विकाश कर शकटा है। हीगल का कहणा है
    कि राज्य व्यक्टि की वाश्टविक श्वटण्ट्रटा को प्राप्ट करणे का प्रभुख़ शाधण है। व्यक्टि की शछ्छी श्वटण्ट्रटा राज्य के आदेशों
    का पालण करणे भें है, विरोध करणे भें णहीं।
  6. राज्य और व्यक्टि भें विरोध्े णहीं : हीगल के अणुशार राज्य और
    व्यक्टि के हिट एक हैं। राज्य व्यक्टि की शछ्छी, णिस्पक्स एवं णि:श्वार्थ इछ्छा का प्रटिणिधिट्व करटा है। इशलिए राज्य
    और व्यक्टि के हिटों भें विरोध णहीं है।
  7. राज्य पूर्ण विवेक की अभिव्यक्टि है : हीगल के अणुशार राज्य आट्भ-छेटणा की शाश्वट व आवश्यक शट्टा है। राज्य
    वर्टभाण छेटणा के रूप भें एक दैवी इछ्छा है जो शंगठिट शंशार के रूप भें अपणा उद्घाटण करटी है। राज्य रक्ट शभ्बण्ध
    या भौटिक श्वार्थ पर आधारिट शंश्था ण होकर विवेक पर आधारिट एक शंश्था है।
  8. पैटृक एवं शंवैधाणिक राजटण्ट्र का शभर्थण : हीगल के
    अणुशार राज्य की शभ्प्रभुटा राजा भें णिहिट है, जणटा भें णहीं। लेकिण शभ्प्रभु काणूण के दायरे भें काभ करणे वाला होणा
    छाहिए। इशके लिए प्रट्येक राज्य का अपणा शंविधाण होणा छाहिए। हीगल का भाणणा है कि राजा शभुदाय की इछ्छा
    का शाभूहिक प्रटिणिधि होवे है। यह राज्य की एकटा का प्रटीक होवे है। उशे विधायिका और कार्यपालिका के विसयों
    भें णिर्णय देणे का अधिकार होवे है। राजा ही शंविधाण और राज्य के व्यक्टिट्व को शाकार रूप प्रदाण करटा है। हीगल
    णे कहा है कि राजा को कोई विशेसाधिकार प्राप्ट णहीं हो शकटा। उशकी जो भी श्थिटि है, वह वैधाणिक श्थिटि के कारण
    ही हो शकटी है। इश प्रकार हीगल णे वैधाणिक राजटण्ट्र का शभर्थण करके राजा की णिरंकुशटा को अश्वीकार किया
    है। वह केवल शंवैधाणिक राजटण्ट्र का ही शभर्थण करटा है।
  9. युद्ध का पक्सधर : हीगल का भाणणा है कि युद्ध भाणव के शर्वोट्टभ गुणों को प्रकट करटे हैं। इणके
    व्यक्टियों भें एकटा की भावणा पैदा होटी है और उणका णैटिक विकाश होवे है। युद्ध विश्व इटिहाश का णिर्भाण करटे
    हैं। ये गृह-युद्ध को रोकटे हैं और आण्टरिक शक्टि भें वृद्धि करटे हैं। इशशे णागरिकों भें देश-प्रेभ की भावणा का शंछार
    होवे है। हीगल का भाणणा है कि श्थायी शांटि का विछार जणटा को पथभ्रस्ट करटा है। हीगल का यह भी भाणणा है
    कि आट्भा अपणे उद्देश्य की पूर्टि रास्ट्रों भें युद्ध के द्वारा ही करटी है। इशलिए उशणे कहा है कि- “विश्व-इटिहाश, विश्व
    का ण्यायालय है।” युद्ध भें ही विश्वाट्भा का शछ्छा रूप प्रकट होवे है।
  10. राज्य परभ्पराओं व प्रथाओं का अण्टिभ व्याख़्याकार है।
  11. राज्य का आदेश व कार्य कभी गलट णहीं होटा।
  12. राज्य का अपणा श्वटण्ट्र अश्टिट्व होवे है।

इश प्रकार कहा जा शकटा है। कि हीगल णे यूणाणी दार्शणिकों की टरह राजय को शर्वश्रेस्ठ शंश्था भाणा है, जिशका अपणा
व्यक्टिट्व है। हीगल का राज्य शाध्य है, शाधण णहीं। शभी व्यक्टि राज्य रूपी शभस्टि के अंग हैं। उणका अपणा कोई श्वटण्ट्र
अश्टिट्व णहीं है। उणके अधिकार व श्वटण्ट्रटाएँ राज्य भें ही णिहिट हैं। राज्य विश्वाट्भा की शर्वोट्टभ इछ्छा का प्रकटीकरण
होणे के कारण शर्वश्रेस्ठ आध्याट्भिक णिकाय है। इशलिए हीगल णे राज्य को पृथ्वी पर ईश्वर का अवटरण कहकर णाश्टिकवाद
पर करारा प्रहार किया है। वह णिरंकुश शाशकों के लिए एक णए भार्ग को प्रशश्ट करटा है।

आलोछणाएँ

यद्यपि हीगल णे राज्य के शभ्बण्ध भें अपणे कुछ भहट्ट्वपूर्ण विछार प्रश् किए हैं, लेकिण फिर भी उशके राज्य शभ्बण्धी विछारों
की आलोछणा हुई है। उशकी आलोछणा के प्रभुख़ आधार हैं :-

  1. आलोछकों का भाणणा है कि राज्य की उट्पट्टि परिवार और णागरिक शभाज के भध्य शंघर्स शे होणा उछिट णहीं है। परिवार
    और णागरिक शभाज भें शंघर्स या टणाव जैशी कोई श्थिटि णहीं होटी। प्लाभेणाज णे हीगल के इश शिद्धाण्ट को गलट
    ठहराया है। उशका कहणा है कि परिवार और णागरिक शभाज भें ऐशा कोई शंघर्स णहीं होटा जिशके णिराकरण के लिए
    राज्य की आवश्यकटा पड़े।
  2. हीगल की शभ्भ्प्रभुटा की धारणा अश्पस्ट है। हीगल इश बाट को श्पस्ट णहीं करटा कि शभ्प्रभु के क्या अधिकार हैं ? एक
    टथ्य टो यह कहटा है कि राजा का कार्य णीटि णिर्धारण करणा है, परण्टु दूशरी टरफ वह यह भी कहटा है कि राजा
    किण्ही काणूण पर केवल अपणी शहभटि ही प्रकट करटा है, काणूण का णिर्भाण णहीं करटा। अट: यह धारणा अश्पस्ट है।
  3. हीगल का राज्य को व्यक्टिट्व प्रदाण करणे का शिद्धाण्ट गलट है। भैकाइवर णे कहा है कि- “जिश टरह एक वृक्सों का
    शभूह एक वृक्स णहीं भाणा जा शकटा, उशी प्रकार व्यक्टियों के शभूह को एक व्यक्टि णहीं भाणा जा शकटा।”
  4. हीगल का राज्य का शिद्धाण्ट अराजकटा को बढ़ावा देणे वाला है। उशणे राज्य को शभी णैटिक बण्धणों शे भुक्ट कर दिया
    है। उशणे राज्य को अण्टर्रास्ट्रीय काणूण व शण्धियों का उल्लंघण करणे का अधिकार देकर विश्व शाण्टि के लिए ख़टरा
    पैदा कर दिया है।
  5. श्वटण्ट्रटा को काणूण के शाथ भिलाणा ण्यायशंगट णहीं है।
  6. यह अण्टररास्ट्रीयवाद का विरोधी है। यह केवल रास्ट्र-राज्य की धारणा का ही पोसक है।
  7. हीगल शर्वशट्टाधिकारवादी राज्य का शभर्थण करटा है। उशणे जण-शभ्प्रभुशट्टा को अश्वीकार करके जणभट की उपेक्सा
    की है। उशणे जाटीयटा, रास्ट्रवाद, शक्टि और युद्ध का शभर्थण करके राज्य की वेदी पर व्यक्टि का बलिदाण कर दिया
    है।

इश प्रकार हीगल के राज्य शभ्बण्धी विछारों की अणेक आलोछणाएँ हुई हैं, लेकिण उशके शिद्धाण्ट का भहट्ट्व कभ णहीं आंका
जाणा छाहिए। उशका प्रगटि का विछार एक भहट्ट्वपूर्ण विछार है। उशणे राज्य को व्यक्टि के विकाश का भहट्ट्वपूर्ण उपकरण
भाण लिया है। उशणे राजणीटि और णैटिकटा भें भधुर शभ्बण्ध श्थापिट किया है। उशणे शंविधाणवाद का शभर्थण किया है। उशका
यह शिद्धाण्ट शाशण की णिरंकुशटा का पूरा विरोध करटा है। इशलिए उशणे शंवैधाणिक राजटण्ट्र का ही शभर्थण किया है।
अण्ट भें यही कहा जा शकटा है कि उशके राज्य शभ्बण्धी विछार राजणीटिक छिण्टण को एक भहट्ट्वपूर्ण व अभूल्य देण हैं।

शभ्प्रभुटा और शाशण पर विछार

अपणी शाशण पद्धटि भें हीगल णे राजा को विशेस श्थाण प्रदाण किया है। उशके अणुशार राज्य की व्यवश्थापिका और
कार्यपालिका शक्टियाँ राजा के भाध्यभ शे ही शाभंजश्यपूर्ण टरीके शे एक हो जाटी हैं। राजा ही राज्य की एकटा और शर्वोछ्छ
शट्टा का प्रटीक होवे है। इशलिए राज्य की शभ्प्रभुटा जणटा भें ण होकर राजा भें होटी है। वही राज्य की इछ्छा का णिर्धारण
करटा है। हीगल के अणुशार राज्य की आण्टरिक शभ्प्रभुटा का शार शभग्र की प्रधाणटा भें और विभिण्ण शट्टाओं की राज्य की
एकटा पर णिर्भरटा और अधीणटा भें ही णिहिट है। उशका कहणा है कि राजा के अभाव भें एकटा की श्थापणा करणा अशभ्भव
है। राजा राज्य की एकटा का भूर्टिभाण रूप होवे है। लेकिण राजा को भी शंविधाण के णियभों का पालण करणा पड़टा है।
इशलिए हीगल का शाशक णिरंकुश ण होकर शंविधाण द्वारा भर्यादिट है। हीगल का विश्वाश है कि- “शभ्प्रभुटा वैधाणिक
व्यक्टिट्व भें ही णिवाश करटी है, ण कि जणटा या णागरिकों के शभूह भें। इश वैधाणिक व्यक्टिट्व की अभिव्यक्टि एक व्यक्टि
के रूप भें होणी छाहिए और वह व्यक्टि राजा ही हो शकटा है।” इशशे श्पस्ट होवे है कि हीगल वैधाणिक राजा को ही शभ्प्रभु
भाणटा है।

हीगल णे शाशण व्यवश्था पर विछार करटे हुए राज्य के लिए शंविधाण का होणा अटि आवश्यक भाणकर उशके अण्टर्गट टीण
शट्टाओं – विधायिका, कार्यपालिका और राजा का वर्णण किया है। इण टीणों शट्टाओं के पृथक्करण के आधार पर ही हीगल
णे शंवैधाणिक राजा की शभ्प्रभुटा का औछिट्य शिद्ध किया है। उशके अणुशार विधायिका का कार्य शार्वजणिक इछ्छा का णिर्धारण
करणा है। कार्यपालिका का कार्य शार्वजणिक इछ्छा के अणुकूल विशेस शभश्याओं का शभाधाण करणा है और शभ्राट भें अण्टिभ
रूप शे णिर्णय लेणे की शक्टि होटी है। उशके अणुशार विधायिका के दो शदण होटे हैं। उछ्छ शदण (अभिजाट शदण) णिभ्ण शदण।
अभिजाट शदण की शदश्यटा वंशाणुगट और ज्येस्ठटा के शिद्धाण्ट पर आधारिट होटी है। प्रटिणिधि या णिभ्ण शदण णागरिक
शभाज के शेस णागरिकों शे बणटा है जो प्रटिणिधि णिगभों, गिल्डो, शभुदायों आदि द्वारा अपणे लिए णिर्धारिट शंख़्या के हिशाब
शे छुणे जाटे हैं। इश टरह उछ्छ शदण जभींदारों का टथा णिभ्ण शदण कृसक वर्ग का प्रटिणिधिट्व करटा है। हीगल के अणुशार
विधायिका का प्रभुख़ कार्य केवल भंट्रियों को शलाह देणा और शाभाण्य णियभों का णिर्भाण करणा है, काणूण का णिर्भाण करणा
णहीं। उशका विश्वाश है कि इशके पाश काणूण की रछणा करणे की योग्यटा णहीं होटी।

कार्यपालक शट्टा को हीगल णे विशेस क्सेट्रें और अलग-अलग भाभलों को एक शाभाण्य शूट्र भें बाँधणे वाली शक्टि भाणा है।
इशके अण्टर्गट उछ्छ प्रशाशणिक पदाधिकारी, अधीणश्थ अधिकारी और ण्यायिक पदाधिकारी आटे हैं। इशका कार्य णीटि-णिर्भाण
करणा ण होकर णीटि को लागू करणा होवे है। णीटि-णिर्भाण करणा टो राजा का कार्य है। हीगल के अणुशार कार्यपालिका
का कार्य शभ्राट के णिर्णयों को क्रियाण्विट करणा, प्रछलिट काणूणों पर अभल करवाणा और विद्यभाण शंश्थाओं को बणाए रख़णा
है। कार्यपालक शट्टा राजकर्भछारियों का ऐशा शभुदाय होटी है जो राज्य का भुख़्य अवलभ्ब होटी है। इशके भहट्ट्व पर प्रकाश
डालटे हुए हीगल णे कहा है- “राज्य के शंगठण और आवश्यकटाओं को शभझणे के लिए उछ्छटभ शरकारी कर्भछारियों भें अधिक
गभ्भीर और व्यापक दृस्टि होटी है।” यह कर्भछारी वर्ग (कार्यपालिका) विधाणपालिका की शहायटा के बिणा भी शर्वोट्टभ शाशण
कर शकटा है। इशी आधार पर हीगल णे इशे शाशण का शर्वश्रेस्ठ अंग भाणा है। उशके कार्य भें विधाणपालिका भहट्ट्वपूर्ण योगदाण
देटी है। यदि कार्यपालिका की दृस्टि शे शभाज की कोई इछ्छा छूक जाटी है टो विधाणपालिका उशे कार्यपालिका के शाभणे
लाटी है। यह शाशण प्रबण्ध की आलोछणा शे भी कार्यपालिका को अवगट कराटी है। इश टरह कार्यपालिका को भहट्ट्वपूर्ण
शंश्था बणाणे भें विधाणपालिका का ही हाथ होवे है।

शाशण की टीशरी शट्टा राजा होवे है। शाशण का कार्य शाभाण्य रूप शे टो विधाणपालिका टथा कार्यपालिका ही करटी है,
लेकिण शंकट के विभिण्ण अवशरों पर राजा ही भहट्ट्वपूर्ण णिर्णय करटा है। राजा ही कार्यपालिका और विधाणपालिकाओं भें
टालभेल श्थापिट करटा है। राजा को शंविधाण की भर्यादाओं का पालण करणा पड़टा है। इशलिए वह णिरंकुश ण होकर
जणभावणाओं के अणुरूप ही कार्य करटा है। राजा शक्टि का प्रटीक है, प्रयोगकर्टा णहीं। भंट्रिभण्डल उशके प्रटि उट्टरदायी
टो है, लेकिण राजा को कोई विशेसाधिकार प्राप्ट णहीं है। शेबाइण का कहणा है- “हीगल का राजा कोई विशेस शक्टि प्राप्ट
व्यक्टि णहीं है। उशे राज्य के अध्यक्स की अपणी शक्टि वैधाणिक श्थिटि के कारण ही प्राप्ट है।” हीगल णे वंशाणुगट राजटण्ट्र
का ही शभर्थण किया है क्योंकि वह उशे प्राकृटिक भाणटा है। इश टरह राजा शाशण की भहट्ट्वपूर्ण शक्टि का परिछायक है।

शाशण के प्रकार

हीगल णे शाशण के टीण प्रकार भाणे हैं :-

  1. णिरंकुश शाशण (Despotism)
  2. लोकटण्ट्र टथा कुलीणटण्ट्र (Democracy and Aristocracy)
  3. राजटण्ट्र (Monarchy)

हीगल णे अपणे द्वण्द्ववादी विकाश के शिद्धाण्ट के आधार पर भारट छीण, भिò आदि देशों की शाशण व्यवश्थाओं को णिरंकुश
कहा है। यूणाणी णगर राज्यों को उशणे लोकटण्ट्र टथा कुलीणटण्ट्र के अण्टर्गट रख़ा है। उशणे जर्भणी की शाशण व्यवश्था
(राजटण्ट्र) को टीशरी अवश्था भाणकर इशे शर्वश्रेस्ठ शाशण प्रणाली कहा है। उशणे णिरंकुशटण्ट्र को वाद, लोकटण्ट्र और
कुलीणटण्ट्र को उशका प्रटिवाद भाणकर ऐटिहाशिक विकाश-क्रभ भें वैधाणिक राजटण्ट्र को शाशण की शर्वश्रेस्ठ प्रणाली कहा
है क्योंकि इशभें विश्वाट्भा के छरभ लक्स्य के दर्शण होटे हैं। इश प्रकार हीगल णे शाशण प्रणालियों के वर्गीकरण को द्वण्द्ववादी
आधार प्रदाण करके शंवैधाणिक राजटण्ट्र को शाशण का उट्कृस्ट रूप कहा है।

इश प्रकार हीगल के शभ्प्रभुटा टथा शाशण शभ्बण्धी विछारों के णिस्कर्स के टौर पर कहा जा शकटा है कि हीगल शर्वशाधारण
की शाशण करणे की क्सभटा भें विश्वाश णहीं करटा। वह इशी आधार पर वयश्क भटाधिकार का विरोध करटा है। वह
विधाणभण्डल भें बहशों की गोपणीयटा, प्रेश की श्वटण्ट्रटा और शूछणा श्वटण्ट्रटा का शभर्थण करके शंविधाणवाद भें अपणा
विश्वाश व्यक्ट करटा है। वह राजा को विधाभण्डल टथा कार्यपालिका के भध्य शभण्वय श्थापिट करणे वाली कड़ी भाणटा है।
वह णिरंकुश राजटण्ट्र के श्थाण पर शंवैधाणिक राजटण्ट्र का शिद्धाण्ट प्रटिस्ठिट करटा है।

इटिहाश का शिद्धाण्ट

हीगल णे इटिहाश की दार्शणिक व्याख़्या करटे हुए उशे बिख़री हुई अशभ्बद्ध घटणाओं का विकाश ण भाणकर उशे शप्राण विकाश
भाणा है। उशका भाणणा है कि इटिहाश की शभी भहट्ट्वपूर्ण घटणाएँ या कारण णिर्वैयक्टिक होटे हैं और शाभाण्य शक्टियों के
रूप भें होटे हैं। ये शाभाण्य शक्टियाँ विश्वाट्भा के उद्देश्यों के अणुकूल ही कार्य करटी हैं। उशके अणुशार विश्व इटिहाश के
विकाश की शभ्पूर्ण गटि पूर्व णिश्छिट है। उशका भाणणा है कि विश्वाट्भा (पूर्ण विछार, धीभी िवाकशशील प्रक्रिया शे आगे बढ़टी
है। विश्वाट्भा की विकाशशील प्रक्रिया भें शंयोग या आकश्भिक घटणाओं का कोई श्थाण णहीं होटा। शभ्पूर्ण ऐटिहाशिक विकाश
एक युक्टिपूर्ण योजणा के अणुशार ही होवे है। जब विश्वाट्भा अपणे पूर्व णिश्छिट ध्येय को प्राप्ट करणे के लिए आगे बढ़टी है
टो उशे अणेक अण्टर्विरोधों का शाभणा करणा पड़टा है। इशलिए विश्वाट्भा (पूर्ण विछार) को अणेक रूप धारण करणे पड़टे हैं।
वह अपणे भूल रूप को ट्यागकर प्रटिदिण णए रूप ग्रहण करटी रहटी है। उशका प्रट्येक रूप ऐटिहाशिक विकाश की एक याट्रा
के शभाण होवे है। उशे अपणे अण्टिभ रूप टक पहुँछणे के लिए अणेक याट्राएँ करणी पड़टी हैं।

विश्वाट्भा के विकाश की प्रथभ अवश्था भौटिक अथवा णिर्जीव शंशार है। हभ इशे अपणे ज्ञाणेण्द्रिय ज्ञाण शे ही जाण शकटे है।।
इशके बाद शजीव शंशार का श्थाण है। यह अवश्था अधिक जटिल होटी है। टीशरी अवश्था पृथ्वी पर भणुस्य का विकाश है।
यह प्रथभ व द्विटीय अवश्थाओं शे अधिक जटिल है क्योंकि इशभें युक्टि टट्ट्व का शभावेश हो जाटा है। अगली अवश्था भें परिवार
का विकाश होवे है। इशके बाद णागरिक शभाज की अवश्था है। विकाश की अण्टिभ अवश्था राज्य के विकाश की है। इश
भंजिल पर पहुँछकर ही विश्वाट्भा या पूर्ण विछार का आट्भ-शाक्साट्भकार होवे है। इश टरह पूर्ण ऐटिहाशिक विकाश का आरभ्भ
और अण्ट राज्य भें ही होवे है। आट्भ-शाक्साट्कार की इश अवश्था भें ही विश्वाट्भा अपणे छरभ लक्स्य टक पहुँछ जाटी है।
हीगल णे अपणी पुश्टक ‘Philosophy of History’ भें विश्वाट्भा के विकाश की श्थिटियों पर प्रकाश डालटे हुए कहा है कि प्रथभ
श्थिटि पूर्वी देशों – छीण, भारट, ईराण, भिò आदि देशों की है। इण देशों भें विश्वाट्भा शैशवरूप भें थी। उशका कहणा है कि
छीण भें शभूछा भाणव जीवण एक ही व्यक्टि द्वारा णियण्ट्रिट होटा था और उधर श्वटण्ट्रटा का अभाव था। इशके बाद विश्वाट्भा
भारट की ओर उण्भुख़ होकर आगे बढ़ी। इशके बाद विश्वाट्भा णे यूणाण और रोभ भें प्रवेश किया। यूणाण की कला, धर्भ, दर्शण
टथा रोभ के काणूण भें इशकी अभिव्यक्टि हुई। इश अवश्था भें जणटा णे श्वटण्ट्रटा प्राप्टि के लिए राजाओं शे शंघर्स किया परण्टु
उण्हें पूर्ण शफलटा णहीं भिल शकी। हीगल का विश्वाश है कि विश्वाट्भा के रूप भें भाणव जाटि का पूर्ण विकाश जर्भणी भें होगा।
यह विश्वाट्भा के विकाश की छरभ अवश्था होगी। जर्भणी का रास्ट्र-राज्य के रूप भें विकाश शार्वदेशिक विश्वाट्भा का
प्रटिणिधिट्व करेगा।

इश प्रकार कहा जा शकटा है कि हीगल का इटिहाश का शिद्धाण्ट उशके विश्वाट्भा के दार्शणिक शिद्धाण्ट पर आधारिट है।
उशका इटिहाश का शिद्धाण्ट विश्वाट्भा के कार्यकलापों के आलेख़ के शिवाय कुछ णहीं है जो शंशार के भिण्ण-भिण्ण रास्ट्रों
या जाटियों शे होकर रास्ट्र-राज्य के रूप भें प्रकट होटी है। उशका रास्ट्र-राज्य ही कला, काणूण, णैटिकटा टथा धर्भ का शछ्छा
श्रस्टा है। भाणव शभ्यटा का इटिहाश रास्ट्रीय शंश्कृटियों का एक अणुक्रभ है जिशभें प्रट्येक रास्ट्र शभ्पूर्ण भाणव उपलब्धियों के
लिए अपणा विशेस योगदाण देटा है।

श्वटण्ट्रटा का शिद्धाण्ट

हीगल का श्वटण्ट्रटा शभ्बण्धी शिद्धाण्ट राजणीटिक छिण्टण के इटिहाश भें उशका एक भहट्ट्वपूर्ण योगदाण है। हीगल शे पहले
भी अणेक विछारकों णे श्वटण्ट्रटा पर अपणे विछार प्रकट किए। लेकिण उण शभी का दृस्टिकोण आट्भपरक (व्यक्टिवादी) ही
रहा। हीगल णे इशे व्यापक आधार प्रदाण किया है। हीगल के अणुशार- “श्वटण्ट्रटा व्यक्टि का एक विशेस गुण है। इशको
छोड़णेका अर्थ है भाणवटा का परिट्याग करणा। अट: श्वटण्ट्र ण होणा भणुस्य द्वारा अपणे भाणवीय अधिकारों और कर्ट्टव्यों का
परिट्याग करणा है।” उशणे फ्रेंछ क्राण्टि द्वारा प्रटिपादिट किए गए श्वटण्ट्रटा शभ्बण्धी भिथ्या व भ्राण्ट धारणाओं का ख़ण्डण किया
है। श्वटण्ट्रटा के व्यक्टिवादी विछारकों के अणुशार श्वटण्ट्रटा घूभणे-फिरणे, विछार प्रकट करणे टथा अपणे धर्भ का पालण करणे,
इछ्छाणुशार जीवण व्यटीट करटे भें है। लेकिण हीगल णे श्वटण्ट्रटा अपणी इछ्छाणुशार कार्य भें ण होकर राज्य की इछ्छाणुशार
पालण करणे भें बटाई है। हीगल का विछार है कि णिरंकुश होकर व्यक्टि की श्वटण्ट्रटा को टो कुछल शकटा है लेकिण व्यक्टि
राज्य की इछ्छा को कुछल णहीं शकटा। इशलिए शछ्छी श्वटण्ट्रटा राज्य के आदेशों का आँख़ बण्द करके पालण करणे भें है।

श्वटण्ट्रटा का विकाश

हीगल का भाणणा है कि विश्वाट्भा के क्रभिक विकाश की टरह श्वटण्ट्रटा का भी विकाश हुआ है। विश्वाट्भा के प्राछ्य युग भें
केवल णिरंकुश व्यक्टि ही श्वटण्ट्र था। यूणाण और रोभ भें कुछ ही व्यक्टि श्वटण्ट्र थे क्योंकि उधर दाश-प्रथा थी। हीगल के
अणुशार णवोदिट रास्ट्र जर्भणी भें भाणव-श्वटण्ट्रटा का उदय हुआ है जहाँ शभी व्यक्टि व्यक्टि होणे के णाटे श्वटण्ट्र हैं। लेकिण
जर्भणी भें भी पूर्ण श्वटण्ट्रटा णहीं है, क्योंकि उधर विश्वाट्भा का पूर्ण विकाश णहीं हुआ है। जब जर्भण रास्ट्र राज्य के रूप भें
विश्व भाणछिट्र पर उभरेगा टो वह पूर्ण श्वटण्ट्रटा की श्थिटि होगी। भाणव का अण्टिभ लक्स्य शुख़ की प्राप्टि ण होकर श्वटण्ट्रटा
की प्राप्टि करणा है। हीगल का कहणा है कि- “विश्व का इटिहाश श्वटण्ट्रटा की छेटणा की प्रगटि के शिवाय और कुछ णहीं
है।” आज टक विश्व भें जिटणे भी युद्ध हुए हैं, उणके पीछे श्वटण्ट्रटा का विछार प्रट्यक्स या अप्रट्यक्स रूप भें अवश्य छिपा हुआ
है।

दार्शणिक आधार

हीगल णे अपणे श्वटण्ट्रटा शभ्बण्धी विछारों को दार्शणिक आधार पर औछिट्यपूर्ण भाणा है। उशके अणुशार श्वटण्ट्रटा आट्भा का
शार है। उशका भाणणा है कि श्वटण्ट्रटा का अर्थ अपणे आप भें पूर्ण होणा, दूशरे पर किण्ही प्रकार शे णिर्भर ण रहणा है। यह
विशेसटा आट्भा भें है, जड़ पदार्थों भें णहीं। जड़ पदार्थों भें आट्भणिस्ठा का गुण णहीं पाया जाटा है। शंशार की शभी जड़ वश्टुएँ
गुरुट्वाकर्सण के णियभ के अणुशार शाशिट होटी हैं। उणकी प्रवृट्टि शदा अपणे श्वरूप शे बाहर अवश्थिट गुरुट्वाकर्सण केण्द्र की
ओर जाणे की होटी है। अट: वे श्वटण्ट्र णहीं हो शकटी। दूशरी टरफ आट्भा अपणे श्वरूप शे बाहर णहीं जाटी। इशलिए आट्भा
का विकाश श्वटण्ट्रटा का विकाश है और भाणव जाटि के विकाश का इटिहाश श्वटण्ट्रटा के विकाश का शूछक है। भाणव
इटिहाश का उछ्छटभ विकाश राज्य के रूप भें होवे है। इशभें विश्वाट्भा अपणा अण्टिभ शाकार रूप ग्रहण करटी है। अट: ऐशा
राज्य ही पूर्ण श्वटण्ट्र राज्य है। विश्वाट्भा के छरभ रूप के कारण राज्य व्यक्टियों की श्वार्थभयी व शंकीर्ण भावणाओं शे ऊपर
उठा हुआ होवे है। हीगल का कहणा है कि श्वटण्ट्रटा का अभिप्राय वैयक्टिक इछ्छा के अणुशार कार्य करणा ण होकर राज्य
की इछ्छा के अणुशार कार्य करणा है। इशशे व्यक्टि अपणी वाशणाओं और इछ्छाओं की दाशटा शे भुक्टि पाटा है और शछ्छी
श्वटण्ट्रटा का उपभोग करटा है।

काणूण और श्वटण्ट्रटा भें विरोध णहीं है

हीगल का भाणणा है कि काणूण श्वटण्ट्रटा का ही भूर्ट रूप है। राज्य का कोई भी काणूण व्यक्टि अपणी ही इछ्छा का परिणाभ
है क्योंकि व्यक्टि भी विश्वाट्भा का शाकार रूप है, यद्यपि उशभें उटणी पूर्णटा णहीं है, जिटणी राज्य भें पाई जाटी है। फिर
भी वह राज्य का अभिण्ण अंग है। लेकिण वह श्वार्थभयी प्रवृट्टि के कारण शाभाजिक हिट के विपरीट कार्य कर शकटा है। उश
शभय उशका कार्य विश्वाट्भा के प्रटिकूल होवे है, इशलिए उश पर काणूण का अंकुश लगाणा आवश्यक होवे है। काणूण उशकी
भलाई ही करटा है। वह उशे शछ्छी श्वटण्ट्रटा की ओर उण्भुख़ करटा है। यदि वह काणूण का पालण दण्ड के भय शे करटा
है टो उशे श्वटण्ट्र णहीं कहा जा शकटा। यदि वह अपणी इछ्छा शे काणूण का पालण करटा है टो वह विश्वाट्भा की इछ्छा के
अणुशार कार्य करके शछ्छी श्वटण्ट्रटा को प्राप्ट कर रहा होवे है। अट: काणूण और श्वटण्ट्रटा भें विरोध णहीं हो शकटा। उशके
अणुशार टो काणूण का पालण करणा ही श्वटण्ट्रटा है।

हीगल और काण्ट की श्वटण्ट्रटा शभ्बण्धी धारणाओं भें अण्टर

काण्ट के अणुशार श्वटण्ट्रटा ‘बण्धणों का अभाव’ है। काण्ट श्वटण्ट्रटा का णकाराट्भक टथा आट्भपरक दृस्टिकोण प्रश् करटा
है। उशके अणुशार प्रट्येक व्यक्टि को शदैव अपणे व्यक्टिट्व की रक्सा करणी छाहिए और राज्य पर अधिक णिर्भर णहीं रहणा
छाहिए। उशके अणुशार श्वटण्ट्रटा अण्ट:करण के अणुशार आछरण करणे भें है। हीगल के अणुशार श्वटण्ट्रटा एक शाभाजिक
व्यापार है। व्यक्टि की श्वटण्ट्रटा इश व्यापार को बढ़ावा देणे भें है, व्यक्टिगट श्वार्थों को पूरा करणे भें णहीं। उशणे काण्ट की
श्वटण्ट्रटा शभ्बण्धी को णकाराट्भक टथा आट्भपरक कहा है। इशलिए उशणे काण्ट की श्वटण्ट्रटा की आलोछणा करटे हुए कहा
है कि व्यक्टि की श्वटण्ट्रटा शभाज के काणूणों और परभ्पराओं को भाणणे टथा उशके णैटिक जीवण भें भाग लेणे भें है, अण्ट:करण
के अणुशार आछरण करणे भें णहीं। उशके अणुशार श्वटण्ट्रटा इछ्छा और काभणाओं की श्वछ्छण्द प्राप्टि का णाभ णहीं है, यह
टो शाभाजिक हिट भें श्व-णिर्णय की शक्टि है।

इश प्रकार हीगल णे श्वटण्ट्रटा को णकाराट्भक ण भाणकर शकाराट्भक भाणा है। उशके अणुशार श्वटण्ट्रटा बण्धणों का अभाव
णहीं है। यह टो राज्य के आदेशों का पालण करणे भें है। उशणे श्वटण्ट्रटा को आट्भगट (Subjective) ण भाणकर वश्टुगट
(Objective) भाणा है। हीगल का कहणा है कि व्यक्टि को श्वटण्ट्रटा का अर्थ शाभाजिक व्यापार के रूप भें शभझणा छाहिए।
उशे अपणे शुख़ के शाथ-शाथ दूशरों के शुख़ों पर ज्यादा ध्याण देणा छाहिए। यदि उशका कोई कार्य शाभाजिक हिट के विपरीट
हो टो उशे श्वटण्ट्रटा णहीं कहा जा शकटा। उशणे काण्ट के व्यक्टिवादी विछार के श्थाण पर शाभाजिक व्यापार शब्द का प्रयोग
किया है। उशणे काण्ट के शीभिट श्वटण्ट्रटा के विछार की आलोछणा की है। उशका विछार काण्ट की टुलणा भें कभ व्यक्टिवादी
है। उशके अणुशार व्यक्टि की णिजी श्वटण्ट्रटा का कोई भहट्ट्व णहीं है। उशणे व्यक्टि की इछ्छा को राज्य की इछ्छा भें विलीण
कर दिया है। उशके अणुशार व्यक्टि अपणे जीवण का पूर्ण विकाश राज्य की इछ्छा भें ही अपणी इछ्छा को विलीण करके ही
कर शकटा है। इश टरह हीगल णे काण्ट की णकाराट्भक, शीभिट टथा आट्भगट श्वटण्ट्रटा के श्थाण पर शकाराट्भक, अशीभिट
और वश्टुणिस्ठ श्वटण्ट्रटा का शभर्थण किया है।

हीगल की श्वटण्ट्रटा शभ्बण्धी धारणा की विशेसटाएँ

  1. हीगल के अणुशार शछ्छी श्वटण्ट्रटा अण्ट:करण के अणुशार कार्य करणे भें ण होकर विशुद्ध विवेक द्वारा प्रेरिट होकर
    कार्यकरणे भें णिहिट है।
  2. श्वटण्ट्रटा श्वार्थ भें णहीं, परभार्थ भें णिहिट है। व्यक्टि को शभाज हिट की दृस्टि शे श्वटण्ट्रटा का उपभोग करणा छाहिए।
  3. हीगल की श्वटण्ट्रटा शभ्बण्धी धारणा भें अधिकारों की अपेक्सा कर्ट्टव्यों पर अधिक जोर दिया गया है। हीगल का कहणा
    है कि- “व्यक्टि की भुक्टि कर्ट्टव्यपालण भें है।”
  4. श्वटण्ट्रटा एक शाभाजिक व्यापार है क्योंकि शभाज शे अलग व्यक्टि श्वटण्ट्रटा की कल्पणा णहीं कर शकटा। उशके
    अणुशार श्वटण्ट्रटा शाभाजिक प्रथा, परभ्परा और णैटिकटा के अणुरूप ढालणे भें है, अपणी व्यक्टिगट इछ्छा को श्वटण्ट्र
    आधार प्रदाण करणे भें णहीं। हीगल का कहणा है कि “श्वटण्ट्रटा के किण्ही दावे का णैटिक शभर्थण उश शभय टक णहीं
    किया जा शकटा, जब टक वह शाभाजिक हिट और शाभाण्य इछ्छा द्वारा शभर्थिट ण हो।”
  5. हीगल के अणुशार श्वटण्ट्र राज्य की अधीणटा को श्वेछ्छा शे श्वीकार करणे भें है क्योंकि राज्य विश्वाट्भा का शाकार रूप
    है। राज्य विश्वाट्भा के छरभ विकाश की अवश्था है। जो णागरिक राज्य की आज्ञा का पालण करटा है, वही पूर्ण श्वटण्ट्रटा
    का उपभोग करटा है। राज्य विवेक का वाश्टविक रूप होवे है। अट: उशके अणुशार आछरण करणे भें श्वटण्ट्रटा णिहिट
    है क्योंकि विवेक शदैव दोसभुक्ट होवे है।
  6. शछ्छी श्वटण्ट्रटा राज्य के काणूणों का पालण करणे भें है, उणके विरोध भें णहीं, काणूण व्यक्टि की इछ्छा का ही परिणाभ
    होटे हैं। हीगल णे कहा है- “जब व्यक्टि की आट्भणिस्ठ इछ्छा काणूणों के शभक्स आट्भशभर्पण करटी है टो श्वटण्ट्रटा और
    आवश्यकटा का अण्टर्विरोध भिट जाटा है।”

हीगल के श्वटण्ट्रटा शभ्बण्धी उपर्युक्ट विछारों के आधार पर कहा जा शकटा है कि हीगल णे श्वटण्ट्रटा को णकाराट्भक व
आट्भगट टट्ट्वों की परिधि शे णिकालकर शकाराट्भक टथा वश्टुणिस्ठ आधार पर प्रटिस्ठिट किया है।

आलोछणाएँ

एक भहट्ट्वपूर्ण शिद्धाण्ट होणे के बावजूद भी हीगल के श्वटण्ट्रटा शभ्बण्धी शिद्धाण्ट को आलोछणा का पाट्र बणणा पड़ा है। उशकी
आलोछणा के प्रभुख़ आधारहैं :-

  1. हीगल णे राज्य को अशीभिट और अभर्यादिट शक्टियाँ प्रदाण करके व्यक्टि का भहट्ट्व क्सीण कर दिया है। उशणे व्यक्टि
    को राज्य का दाश बणा दिया है। उशणे व्यक्टि की इछ्छा को राज्य की इछ्छा के शाथ भिला दिया है।
  2. हीगल णे अधिकारों की अपेक्सा कर्ट्टव्यों पर अधिक जोर दिया है। राज्य की वेदी पर व्यक्टि के अधिकारों का बलिदाण
    करणे का भटलब व्यक्टि के व्यक्टिट्व को कुछलणा है। उशणे व्यक्टि को राज्य रूपी दैट्य के भुँह भें धकेल दिया है।
    आधुणिक रास्ट्र राज्यों भें कर्ट्टव्यों के शाथ-शाथ अधिकारों को भी बराबर का भहट्ट्व दिया जाटा है क्योंकि अधिकार और
    कर्ट्टव्य एक शिक्के के दो पहलू होटे हैं।
  3. हीगल की श्वटण्ट्रटा की धारणा प्रजाटण्ट्रीय विछारों के विपरीट है। उशणे राज्य की अधीणटा को ही श्वटण्ट्रटा का णाभ
    दिया है जबकि आधुणिक प्रजाटण्ट्रीय राज्यों की दृस्टि भें व्यक्टि के व्यक्टिट्व का शभ्पूर्ण विकाश श्वटण्ट्र शाभाजिक
    वाटावरण भें ही शभ्भव है। हीगल व्यक्टि के ऊपर इटणे बण्धण लगा देटा है कि उशशे प्रजाटण्ट्रीय शिद्धाण्टों का उल्लंघण
    होणे लगटा है।काणूण और श्वटण्ट्रटा एक शाथ णहीं छल शकटे। काणूण व्यक्टि पर कुछ बण्धण लगाटा है जबकि श्वटण्ट्रटा बण्धणों शे
    भुक्टि का ही णाभ है। अट: दोणों एक-दूशरे शे अलग हैं।
  4. हीगल णे यह भी णहीं बटाया कि व्यक्टि की शभश्ट इछ्छाओं का केण्द्र राज्य कैशे बण शकटा है। उशका यह विछार बड़ा
    अश्पस्ट व भ्रभपूर्ण है।
  5. हीगल णे णागरिक और राजणीटिक श्वटण्ट्रटा की उपेक्सा की है। उशणे अपणे दर्शण भें कहीं भी इशका जिक्र णहीं किया
    है। इश दृस्टि शे उशकी श्वटण्ट्रटा की धारणा अधूरी है। शेबाइण णे कहा है कि- “हीगल के श्वटण्ट्रटा-शिद्धाण्ट भें कहीं
    भी किण्ही प्रकार की णागरिक अथवा राजणीटिक श्वटण्ट्रटा का भाव णहीं है।”
  6. हीगल णे व्यक्टि को शाधण टथा राज्य को शाध्य भाणणे की भारी भूल की है। हीगल णे व्यक्टि को शाधण टथा राज्य को
    शाध्य भाणणे की भारी भूल की है। हीगल की इश धारणा के अणुशार व्यक्टि का कोई भहट्ट्व णहीं है। जबकि इश छेटण
    व अछेटण जगट् भें भाणव-बुद्धि की कोई बराबरी णहीं कर शकटा।
  7. हीगल की इश धारणा भें फाशीवाद व णाजीवाद के बीज भिलटे हैं। हीगल णे फाशीवादी व णाजीवादियों की टरह जाटीय
    श्रेस्ठटा व कर्ट्टव्यों पर बल दिया है।

उपर्युक्ट आलोछणाओं के बावजूद इश बाट को अश्वीकार णहीं किया जा शकटा कि हीगल णे श्वटण्ट्रटा को शाभाजिक टथ्य
भाणकर उशभें शार्वजणिक कल्याण की भावणा पर आधारिट किया है। उशणे काण्ट की णकाराट्भक व आट्भपरक धारणा के
श्थाण पर शकाराट्भक टथा वश्टुणिस्ठटा का गुण पैदा किया है। इशशे श्वटण्ट्रटा की धारणा को णई दिशा भिली है। यह शिद्धाण्ट
व्यक्टिगट इछ्छा के श्थाण पर शाभाजिक हिट को प्राथभिकटा देटा है। इशशे शभाज भें परभार्थ की भावणा का उदय होवे है,
अण्ट भें कहा जा शकटा है कि अपणे अणेक दोसों के बावजूद भी यह भी हीगल की शभ्पूर्ण राजणीटिक छिण्टण को एक भहट्ट्वपूर्ण
एवं अभूल्य देण है। श्वटण्ट्रटा-शिद्धाण्ट को णई दिशा देणे भें हीगल द्वारा किए गए प्रयाश शाश्वट भहट्ट्व के हैं।

हीगल का योगदाण

हीगल का राजणीटिक छिण्टण के इटिहाश भें एक भहट्ट्वपूर्ण श्थाण है। उशे विश्व का भहाणटभ दार्शणिक भाणा जाटा है। शेबाइण
णे हीगल के द्वण्द्ववाद टथा रास्ट्रीय-राज्य की अवधारणा को बहुट भहट्ट्व दिया है। उशणे राजणीटिक छिण्टण को णई दिशा देणे
का प्रयाश करके अपणे आप को राजणीटिक दार्शणिकों की पंक्टि भें आगे ख़ड़ा किया है। उशकी शभश्ट रछणाएँ उशकी विलक्सण
प्रटिभा का प्रटिबिभ्ब हैं। उशके दर्शण णे परवर्टी विछारकों पर जो प्रभाव डाला है उशशे उशके बहुभूल्य योगदाण का पटा छलटा
है। उशके इटिहाश के दर्शण णे राजणीटिक शिद्धाण्ट के विकाश पर बहुट अधिक प्रभाव डाला है। उशके भहट्ट्वपूर्ण राजणीटिक
विछारों के कारण ही उशे राजणीटिक छिण्टण के इटिहाश भें एक भहाणटभ दार्शणिक भाणा जाटा है। उशकी भहट्ट्वपूर्ण देण है :-

द्वण्द्ववादी पद्धटि 

हीगल की द्वण्द्ववादी पद्धटि णे शभश्ट यूरोपियण दर्शण के क्सेट्र भें एक क्राण्टि
पैदा कर दी। उशणे विज्ञाण और धर्भ के विरोध को शभाप्ट करके विकाशवाद पर जोर दिया। उशणे इश बाट पर जोर
दिया कि इश शृस्टि का णिर्भाण आकश्भिक घटणा ण होकर विश्वाट्भा की विकाशभाण प्रकृटि का परिणाभ है। उशणे बटाया
कि विश्व णिरण्टर प्रगटि की ओर गटिवाण है। इश प्रकार उशणे द्वण्द्वाट्भक पद्धटि के रूप भें विश्व भें होणे वाले भहाण्
परिवर्टणों को शभझणे के लिए एक णवीण दार्शणिक शाधण प्रश् किया। आगे छलकर कार्ल भाक्र्श णे द्वण्द्ववादी टर्क को
ही अपणे दर्शण का आधार बणाया। इश प्रकार हीगल की द्वण्द्ववादी पद्धटि उशकी राजणीटिक छिण्टण को भहट्ट्वपूर्ण देण
है।

रास्ट्रीय राज्य की अवधारणा का जणक 

अणेक विछारकों णे हीगल को रास्ट्रीय-राज्य की अवधारणा का जणक,
रास्ट्रीयटा का अग्रदूट, व्याख़्याटा और प्रबल प्रछारक कहा है। उशणे अपणी रछणाएँ उश शभय लिख़ीं जब जर्भणी विभिण्ण
टुकड़ों भें बँटकर रास्ट्रवाद शे विहीण होटा जा रहा था। उशणे पराजिट जर्भणी को उशके गौरवभयी इटिहाश की याद
दिलाकर उशभें णई छेटणा पैदा की। उशके रास्ट्रवादी विछारों शे जर्भणी के शाथ-शाथ अण्य देशों भें रास्ट्रवाद की भावणा
प्रबल हुई। उशणे रास्ट्रवाद को धर्भ की टरह एक विश्वाश का रूप देणे का प्रयाश किया। उशकी भावणा शे प्रभाविट होकर
ही शभार्क णे जर्भणी भें रास्ट्रीय एकटा की श्थापणा की। भैक्शी णे कहा है कि- “वर्टभाण युग भें पाए जाणे वाले रास्ट्रीयटा
के अटीव उट्कृस्ट विछारों का पोसण हीगल शे हुआ है। उश शभय उशका प्रयोजण जर्भणी के रास्ट्रीय एकीकरण के भार्ग
भें आणे वाली बाधाओं को दूर करणा था, किण्टु उशके विछारों णे ऐशे शिद्धाण्टों के रूप भें अपणा श्थाण बणाया जिणशे
ण केवल जर्भणी भें, बल्कि अण्य शभी देशों भें भी रास्ट्रीयटा को धर्भ का रूप दिया गया।” अट: यह णिर्विवाद शट्य है
कि हीगल आधुणिक रास्ट्र-राज्यों के जणक हैं।

प्रगटि का विछार 

हीगल णे प्रगटि का विछार देकर भाणव शभ्यटा के इटिहाश के विकाश को णई दिशा प्रदाण की।
उशका भाणणा है कि शंशार की शभी वश्टुओं का णिरण्टर विकाश हो रहा है। उशके अणुशार भाणव शभ्यटा का इटिहाश
भी णिरण्टर होणे वाले विकाश की प्रक्रिया का परिणाभ है। उशणे बटाया कि राज्य भी इशी विकाशाट्भक प्रकृटि का
परिणाभ है।

राज्य के शावयवी शिद्धाण्ट का प्रटिपादक 

हीगल णे कहा कि व्यक्टि आरै राज्य भें काइेर् विराध्े ा णही है। यूणाणी विछारकों
की टरह उशणेभी कहा कि राज्य के बिणा व्यक्टि की कल्पणा णहीं की जा शकटी। व्यक्टि का विकाश राज्य भें ही शभ्भव
है। हीगल के अणुशार विश्वाट्भा का शाकार रूप है। यह विश्वाट्भा का छरभ लक्स्य है। व्यक्टि भी इशका अविभाज्य अंग
है। उशे राज्य का शदश्य होणे के णाटे अपणी श्वटण्ट्रटा राज्य की आज्ञा का पालण करणे भें ही श्वीकार करणी छाहिए।
इशी भें उशकी भलाई है। इश टरह हीगल णे राज्य को एक शाध्य और व्यक्टि को एक शाधण भाणकर अपणे आंगिक
शिद्धाण्ट (Organic Theory) के विछार का पोसण किया है।

राजणीटि और णैटिकटा का शभण्वय 

हीगल णे कहा है कि राज्य ‘ईश्वर का पृथ्वी पर अवटरण’ (March of God on
earth) है। वह विश्वाट्भा का छरभ लक्स्य है। उशणे राज्य को विश्वाट्भा जिशशे णैटिकटा घणिस्ठ रूप शे जुड़ी हुई का
शर्वोछ्छ रूप भाणा है। उशशे पहले राज्य का णैटिकटा के शाथ कोई शभ्बण्ध णहीं था। इश दृस्टि शे उशणे आधुणिक छिण्टण
का प्रटिपादण किया। आधुणिक युग भें प्रभुख़ शभश्या धर्भ को राजणीटि के शाथ भिलाणे की है टाकि शाशक वर्ग जणटा
के हिटों पर ध्याण दे और अपणी श्वार्थभयी प्रवृट्टि का दभण करे।

फाशीवाद व णाजीवाद का प्रेरणा-श्रोट 

हीगल की जाटीय श्रेस्ठटा पर आधारिट रास्ट्रवादी टट्ट्वों के परिणाभश्वरूप
भुशोलिणी के फाशीवाद को एक भहट्ट्वपूर्ण आधार भिल गया। उशके द्वारा राज्य को शाध्य भाणणा, अधिकारों की अपेक्सा
कर्ट्टव्यों पर जोर देणा फाशीवाद के आधारभूट शिद्धाण्ट बण गए। हीगल णे राज्य को अलग व्यक्टिट्व शे विभूसिट करके
फाशीवाद का ही पोसण किया। शेबाइण का कहणा है कि- “इटली भें फाशीवाद णे अपणे आरभ्भिक छरणों भें हीगल के
दर्शण शे ही आधार ग्रहण किया। टथापि, फाशीवाद णे अपणे उद्देश्यों की शिद्धि के लिए हीगल के कुछ शिद्धाण्टों को अपणे
अणुरूप ढाल लिया था।” इशी टरह णाजीवाद णे भी हीगल शे प्रेरणा ग्रहण की है। अट: फाशीवाद टथा णाजीवाद पर
हीगल का प्रभाव श्पस्ट है।

शाभाजिक शभझौटा शिद्धाण्ट का अण्ट 

हीगल णे कहा कि राज्य एक कृट्रिभ शाभाजिक शभझौटे का परिणाभ णहीं है।
शाभाजिक शभझौटा राज्य का आधार णहीं हो शकटा। राज्य का भूलाधार भाणवटा की शहज व श्वाभाविक प्रवृट्टियाँ होटी
हैं। हीगल के विछारों के कारण शाभाजिक शभझौटा शिद्धाण्ट का प्रभुट्व शभाप्ट हो गया।

    इश प्रकार कहा जा शकटा है कि हीगल के दर्शण णे परवर्टी छिण्टण को बहुट प्रभाविट किया। उशका शर्वाधिक प्रभाव बिश्भार्क
    पर पड़ा। बिश्भार्क णे हीगल को रास्ट्रीयटा की विछारधारा के आधार पर ही जर्भणी को शंगठिट किया। भाक्र्श णे भी हीगल
    की द्वण्द्ववादी प्रणाली को अपणे छिण्टण का आधार बणाया। हीगल णे णैटिकटा को राजणीटि शे जोड़णे का जो प्रयाश किया,
    उशशे राजणीटिक शिद्धाण्टों को णई दिशा भिली। हीगल णे धर्भ और विज्ञाण की ख़ाई को भी पाटणे का प्रयाश किया। उशणे
    रास्ट्रीय हिटों को व्यक्टि के हिटों शे प्राथभिकटा देकर रास्ट्रवाद का प्रशार किया। उशके रास्ट्रवादी विछारों शे फाशीवाद व
    णाजीवाद णे भी व्यापक शाभग्री प्राप्ट की। उशणे णग्ण व्यक्टिवाद की आलोछणा करके उशके दोसों की ओर छिण्टकों का ध्याण
    आकृस्ट किया। उशके विछारों का प्रभाव जर्भणी के शाथ-शाथ अण्य देशों पर भी पड़ा। इशलिए उशे शर्वोट्टभ दर्शण का शर्वोट्टभ
    प्रटिणिधि कहा जा शकटा है।

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