1857 का विद्रोह के कारण एवं परिणाम

By | February 15, 2021


भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन भारतीयों द्वारा स्वत्रतंता प्राप्ति के लिए किये गये संग्राम का इतिहास
है। यह संग्राम ब्रिटिश सत्ता की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए भारतीयों द्वारा संचालित एवं संगठित
आंदोलन है।

विद्रोह का स्वरूप

भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम

1857 ई. में ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध भारतीयों द्वारा पहली बार संगठित एवं हथियार बंद लड़ाई
हुई। इसे राज्य क्रांति कहना उचित होगा। राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में यह पहला संगठित संघर्ष
था। नि:संदेह इस विप्लव में राष्ट्रवाद के तत्वों का अभाव था। इस विप्लव के नेताओं में उद्देश्यों की
समानता न होने के कारण वे पूर्ण रूप से संगठित न हो सके थे। यद्यपि यह विप्लव असफल रहा, फिर
भी इसने प्राचीन और सामंतवादी परंपराओं को तोड़ने में पर्याप्त सहायता पहुँचायी।

क्रांति का स्वरूप

1857 ई. की क्रांति के विषय में यूरोपीय तथा भारतीय विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं। एक ओर
यूरोपीय विद्वान इसे ‘सिपाही विद्रोह’ की संज्ञा देकर तथा एक आकस्मिक घटना बताकर टाल देते हैं
दूसरी ओर भारतीय विद्वान इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं।

यद्यपि क्रांति के स्वरूप पर अंग्रेज विद्वानों में मतैक्य नहीं है फिर भी वे इस बात पर एकमत हैं
कि क्रांति एक राष्ट्रीय घटना नहीं थी, न तो उसे जनता का समर्थन ही प्राप्त था। सर लारेन्स ने कहा
है कि ‘‘क्रांति का उद्गम स्थल सेना थी और इसका तत्कालीन कारण कारतूस वाली घटना थी। किसी
पूर्वागामी षड्यंत्र से इसका कोई संबंध नहीं था। यद्यपि बाद में कुछ असंतुष्ट व्यक्तियों ने अपने स्वार्थों
की पूर्ति के लिए इससे लाभ उठाया।’’ जबकि इतिहासकार सर जॉन सोले ने कहा है, ‘‘1857 ई. का
गदर केवल सैनिक विद्रोह था। यह पूर्णत: अंतर्राष्ट्रीय स्वार्थी विद्रोह था जिसका न कोई देशी नेता था
और न जिसको संपूर्ण जनता का समर्थन प्राप्त था।’’ इससे भिन्न मत प्रकट करते हुए दूसरे अंग्रेज
विद्वान पर जेम्स ऑटरम ने इसे अंग्रेजों के विरूद्ध मुसलमानों का षड्यंत्र कहा है। मुसलमानों का
उद्देश्य बहादुर शाह के नेतृत्व में पुन: मुसलमानी साम्राज्य की स्थापना करना था। इसी उद्देश्य से उन्होंने
षड्यंत्र रचा और हिन्दुओं को अपना हथकण्डा बनाया। नि:संदेह आंदोलन को बहादुरशाह का नेतृत्व
प्राप्त हुआ लेकिन इसका उद्देश्य यह कभी नहीं था कि मुगल साम्राज्य को फिर से जिलाया जाय। इस
आंदोलन में हिन्दुओं और मुसलमानों ने समान रूप से भाग लिया। इसे कारतूस की घटना का परिणाम
कहना भी अतिश्योक्ति होगें। ब्रिटिश इतिहासकार राबर्टस का भी मत था कि वह एक सैनिक विद्रोह
मात्र नहीं था। लार्ड सैलिसबरी ने कहा था कि ‘‘ऐसा व्यापक और शक्तिशाली आंदोलन चर्बी वाले
कारतूस की घटना का परिणाम नहीं हो सकता। विद्रोह की पृष्ठभूमि में कुछ अधिक बातें थीं जो
अपेक्षाकृत स्पष्ट कारणों से अवश्य ही अधिक महत्वपूर्ण थीं।’’

भारतीय विद्वानों ने स्पष्ट रूप से अंग्रेजी विद्वानों के विचारें का विरोध किया है। उनका मत है
कि 1857 ई. का गदर एक राष्ट्रीय क्रांति था जिसकी तुलना हम विश्व की महान क्रांतियो, जैसे
अमरीकी, फ्रांसीसी और रूस की क्रांतियों से कर सकते हैं। श्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि ‘‘यह
एक सैनिक विद्रोह से बहुत कुछ अधिक था। यह जोरों से फैला और एक जनप्रिय आंदोलन था जिसने
स्वतंत्रता संग्राम का रूप ले लिया।’’ लाला लाजपत राय का भी कहना था कि ‘‘भारतीय राष्ट्रवाद ने
इस आंदोलन को प्रोत्साहित किया जिसके चलते इसने राष्ट्रीय और राजनीतिक रूप धारण कर लिया।’’
आधुनिक भारतीय इतिहासकार वीर सावरकर तथा अशोक मेहता ने इस विप्लव को भारतीय स्वतंत्रता
संग्राम कह कर ही पुकारा है। भूतपूर्व शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने भी बताया था कि
यह विद्रोह न तो इसकी पृष्ठभूमि में किन्हीं उल्लेखनीय व्यक्तियों का हाथ था अपितु यह समस्त जनता
में सदियों से उत्पन्न असंतोष का परिणाम था। इस प्रकार भारतीय विद्वान 1857 ई. के विप्लव को एक
साधारण सैनिक गद मानने से इनकार करते हैं वस्तुत: इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रथम संग्राम
कहना अधिक युक्तिसंगत तथा उचित होगा।

1857 विद्रोह के कारण

1857 ई. के विद्रोह के अनेक कारण थे –

  1. राजनीतिक कारण
    लार्ड डलहौजी ने देशी राज्यों को कंपनी के अधीनस्थ शासन क्षेत्रो में मिलाने की नीति को
    अपनाया। उससे धीरे-धीरे देशी राजे सशंकित होकर विद्रोह करने के लिए संगठित होने लगे। इसके
    अतिरिक्त अंग्रेजों ने भारतीयों को शासन से अलग रखने की नीति को अपनाया। 
  2. सामाजिक कारण
    देशी राज्यों के क्षेत्रों में हड़पने की नीति के चलते राज दरबार पर आजीविका के लिए आधारित
    व्यक्तियों की आर्थिक स्थिति पर बहतु बुरा प्रभाव पड़ा। देशी राज्यों के सहयागे पर आधारित उद्योग
    दस्तकारियों और अन्य निजी व्यवसायों को गहरा धक्का पहुँचा। साधारण जनता में भी असंतोष फैलने
    लगा क्योंकि अंग्रेजों ने जातीय विभेद की नीति को अपनाकर उनकी भावना पर गहरी चोट पहुँचायी। 
  3. धार्मिक कारण
    अंग्रेजों की सुधारवादी नीति ने हिन्दुओं और मुसलमानों की धामिर्क भावनाओं को गहरा ठासे
    पहुँचाया। उदाहरणस्वरूप सती प्रथा का अंत, विधवाओं का पुनर्विवाह, ईसाइयो द्वारा धर्म प्रचार आदि
    घटनाओं ने कट्टर धर्मावलम्बियों को सशंकित बना दिया। लोगों को यह महसूस होने लगा कि भारतीय
    धर्मों का कुछ दिनों में नामाेि नशान मिट जायगा तथा संपूर्ण भारत में ईसाइर् धर्म फलै जायेगा। अंग्रेजों ने
    भी भारतीय संस्कृति को मिटा देना ही राजनीतिक दृष्टिकोण से लाभप्रद समझा क्योंकि इससे भारतीयों
    के हृदय से राष्ट्रीय स्वाभिमान तथा अतीत के गौरव की भावना का अंत हो जायगा। लेकिन अन्य
    उपनिवेशों के विपरीत अंग्रेज यह भूल गये थे कि भारतीय संस्कृति तथा धामिर्क श्रेष्ठता इतनी प्राचीन
    और महान थी कि उसे सहसा दबा सकना असंभव था। 
  4. सैनिक कारण
    अंग्रेजों की सेना में भारतीय सैनिकों की बहुतायत थी। कुछ छावनियों की सेनाओं में दृढ़ एकता
    पाई जाती थी। दूसरी ओर सैनिक अनुशासन बहुत ढीलाढाला था। सैनिकों में कई कारणों से असंतोष  की भावना व्याप्त थी। चर्बी वाले कारतूसो के प्रयागे के विरूद्ध सैनिकों ने हथियार उठा लिये। क्रांति का
    मुख्य दायित्व भारतीय सेना पर था। जहाँ-जहाँ सैनिकों का सहयोग मिला, क्रांति की लहर दौड़ गई।

क्रांति का विस्तार

क्रांति की शुरूआत कलकत्ता के पास बैरकपुर छावनी में 23 जनवरी 1857 ई. को हुई। भारतीय
सैनिकों ने चर्बी वाले कारतूसों के प्रयोग के विरूद्ध हथियार उठाया। तत्पश्चात् 10 मई को मेरठ विद्रोह
आरंभ हुआ जिसका प्रभाव उत्तर भारत के अनेक नगरों और प्रांतों पर पड़ा। दिल्ली, मेरठ, आगरा,
इलाहाबाद, अवध, राहे ले खंड आदि के आस-पास के प्रदेशो में विद्राहे ने काफी जोर पकड़ा और अंग्रेजी
शासन कुछ समय के लिए समाप्त हो गया। नाना साहब, बहादुर शाह, तात्या टोपे, झाँसी की रानी
लक्ष्मीबाई, खान बहादुर खाँ आदि नेताओं ने जगह-जगह पर क्रांति का नेतृत्व किया। सिखों और
राजपूत शासकों ने क्रांति में भाग नहीं लिया। अंत में अंग्रेजों ने सफलतापवू र्क क्रांति को कुचल दिया।

विद्रोह की असफलता के कारण

1857 ई. का विद्रोह इन कारणों से असफल रहा –

  1. विद्रोह केवल कुछ ही प्रदेशों तथा नगरों तक सीमित रहा। 
  2. कई देशी राजे तटस्थ बने रहे। उन्होंने कही-कहीं अंग्रेजों को मदद भी दी। 
  3. विद्रोहियों में संगठन तथा नेतृत्व का अभाव था। 
  4. अंग्रेजों की सेना अधिक संगठित और लड़ाकू थी तथा उनके पास उत्तम हथियार थे। फलत:
    विप्लव को दबाने में वे सफल रहे।

1857 विद्रोह के परिणाम

1857 ई. के गदर का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ा। कुछ अंग्रेज
विद्वानों का मत है कि भारतीय इतिहास पर इस क्रांति का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, यह तथ्य एकदम
गलत है। इस क्रांति के परिणाम उल्लेखनीय हैं –

  1. इस क्रांति के प्रभाव अंग्रेज और भारतीय मस्तिष्क पर बहुत बुरे पड़े। विद्रोह से पूर्व अंग्रेजों और
    भारतीयों का एक-दूसरे के प्रति सामान्य था किन्तु वे एक दूसरे के अपमान के लिए उत्सुक भी थे।
    लेकिन विद्रोह ने उनकी मनोवृत्ति को एकदम बदल दिया। विद्रोह का दमन बहुत अधिक कठोरता तथा
    निर्दयता से किया गया था जिसे भूलना भारतीयों के लिए असंभव था। 
  2. विद्रोह के परिणामस्वरूप अंग्रेजो ने ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति को अपनाया।
    उन्होंने शासन और सेना के पुनर्गठन का आधार धर्म और जाति को बनाया। विद्रोह ने हिन्दु-मुसलमानों
    को एक कर दिया था। लेकिन अब अंग्रेज हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ने का प्रयत्न करने लगे। इस
    दिशा में वे काफी सफल भी हुए। 
  3. 1857 ई. की क्रांति ने भारत में राष्ट्रवाद तथा पुनर्जागरण का बीज बोया। इस क्रांति से
    आंदोलनकारियों को सदैव प्रेरणा मिलती रहती थी और उन्होंने 1857 ई. के शहीदों द्वारा जलाई मशाल
    को अनवरत रूप से ज्योतिर्मय रखने का प्रयास किया। 
  4. विद्रोह का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव भावी ब्रिटिश भारत की शासन व्यवस्था पर पड़ा। कंपनी के
    शासन का अंत हो गया और भारतीय शासन की बागडोर ब्रि.टिश साम्राज्ञी के हाथों में चली गई।
    महारानी विक्टोरिया की राजकीय घोषणा के द्वारा भारत में उदार, मित्रता, न्याय एवं शासन पर आधारित
    राज्य की स्थापना की मनोकामना की गई। 

भारतीय शासन व्यवस्था को उदार बनाने तथा उनमें सुधार
लाने के हेतु आगामी वर्षो में अनेक अधिनियम पारित हएु , जैसे 1861, 1892, 1909, 1919 और 1935 ई. के
अधिनियम।

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