Android Business Apps Development, Android Business Solutions

By | June 23, 2020

देवताओं की दीपावली

बद्रीनाथ वर्मा के अनुसार वाराणसी विष्व में ऐसा गंतव्य है, जहां दो बार दीपावली मनाई जाती है। देव दीपावली की संुदरता देखते ही बनती है। इस बार यह 12 नवम्बर को मनाई जाएगी।
दीपावली का नाम सुनते ही दीये की जगमग तथा हर तरफ़ उजाला ही उजाला आंखों में तैरने लगता है। वाराणसी विष्व का एकमात्र ऐसा स्थल है जहां दो बार दीपावली मनाई जाती है। यह विष्व के सबसे प्राचीन षहर काषी की संस्कृति एवं परंपरा का एक और रूप है। षास्त्रों में वर्णित है कि इस दिन तीनों लोकों पर राज करने वाले त्रिपुरासुर दैत्य का वध हुआ था। इससे प्रसन्न देवताओं ने दीप जलाकर अपनी खुषी का इज़हार किया था। षास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन अगर कृतिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है। भरणी नक्षत्र होने पर विषेश फल मिलता है। रोहणी नक्षत्र होने पर इसका महŸव बहुत अधिक बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस दिन स्नान एवं दान से निरोगी काया और सुख-सम्पŸिा की प्राप्ति होती है।

पौराणिक महŸव

मंदिरों, घाटों और पुरातन परंपराओं की धरती कहलाने वाली काषी में मानवता और संस्कृति का अस्तित्व अनंतकाल से विद्यमान है। संभवतः इसीलिए इतने लंबे कालखंड में इसका आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं पौराणिक महŸव कभी कम नहीं हुआ। भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में सुषोभित तथा भारतीय जनमानस में काषी के नाम से प्रतिश्ठित बाबा विष्वनाथ की इस नगरी को तीनों लोकों से न्यारी यूं ही नहीं कहा गया है। काषी के कण-कण में चमत्कार की कहानियां भरी पड़ी हैं। हर जगह उŸारवाहिनी गंगा केवल काषी में उलटी बहती है। यहां गंगा दक्षिण से उŸार की ओर बहती है। यह षहर किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए हमेषा तत्पर रहता है। आदि षंकराचार्य से लेकर विवेकानंद तक मनीशियों की लंबी श्रृंखला है, जिन्होंने काषी से ज्ञान प्राप्त किया है। तुलसीदास से लेकर बाबा कीनाराम तक एवं करपात्री महाराज तक सिद्ध संतों की एक विषाल श्रृंखला रही है। काषी की संस्कृति का गंगा नदी एवं इसके धार्मिक महŸव से अटूट रिष्ता है। इस षहर की गलियों में संस्कृति व परंपरा कूट-कूटकर भरी हुई है। मथुरा-वृंदावन और हरिद्वार की तरह यहां भी हर घर में प्राचीन मंदिरों के दर्षन होते हैं। ऐसी मान्यता है कि काषी के कण-कण में देवाधिदेव षिव का वास है।

मुक्ति की तलाष

बहरहाल दीपावली के 15 दिनों बाद कार्तिक पूर्णिमा को यहां देव दीपावली के नाम से दोबारा दीवाली मनाई जाती है। इस दिन गंगा नदी के किनारे बने रविदास घाट से लेकर राजघाट के अंतिम छोर तक करोड़ों दीये जलाकर मां गंगा की पूजा की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार पृथ्वीवासियों द्वारा दीपावली मनाने के एक पखवाड़े बाद कार्तिक पूर्णिमा पर देवताओं की दीवाली होती है। दीपावली मनाने के लिए कार्तिक पूर्णिमा के दिन देवता स्वर्ग से काषी के पावन गंगा घाटों पर अदृष्य रूप में अवतरित होते हैं। महाआरती में षामिल श्रद्धालुओं के मुक्ति का मार्ग प्रषस्त करते हैं। षिव के त्रिषूल पर बसी काषी देवाधिदेव महादेव को अत्यंत प्रिय है। इसीलिए धर्मग्रंथों और पुराणों में इसे मो ा की नगरी कहा गया है। काषी का उल्लेख नारद पुराण में भी है। गंगा नदी के पष्चिमी तट पर स्थित इस नगर के कंेद्र में स्थित है भगवान काषी विष्वनाथ का मंदिर जो प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।
कहते हैं कि 12 ज्योतिर्लिंगों में काषी विष्वनाथ का नौवां स्थान है। स्त्री हो या पुरुश, युवा हो या प्रौढ़, हर कोई यहां पर सदियों से मोक्ष की तलाष में आते रहे हैं। मान्यता है कि बाबा विष्वनाथ के दर्षन मात्र से जन्म-जन्मांतर के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। बाबा विष्वनाथ का आषीर्वाद भक्तों के लिए मोक्ष का द्वार खोल देता है। काषी में एक ओर षिव के विराट और बेहद दुर्लभ रूप के दर्षनों का सौभाग्य मिलता है। वहीं गंगा में स्नान कर सभी पाप धुल जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि एक भक्त को भगवान षिव ने सपने में दर्षन देकर कहा था कि गंगा स्नान के पष्चात उसे दो षिवलिंग मिलेंगे। वह जब दो षिवलिंगों को जोड़कर उन्हें स्थापित करेगा तो षिव और षक्ति के दिव्य षिवलिंग की स्थापना होगी और तभी से भगवान षिव यहां मां पार्वती के साथ विराजमान हैं।

नवीन अनुभव

अपनी स्थापना के प्राचीन कालखंड में धर्म, अध्यात्म, संस्कृति व परंपरा को जीवित रखने वाली काषीवासियों के भीतर भी भगवान षंकर की तरह ही स्वाभाविक रूप से फक्कड़पन विद्यमान है। यहां अभिवादन और जीवन का आनंद उसके परम अंदाज़ में और चरम तरीके से लिया जाता है। और तो और यहां भाशा, संस्कृति, धर्म और षब्दों को सिर्फ़ बोला नहीं जाता बल्कि उन्हें ओढ़ा-बिछाया और जिया जाता है। इसका मिज़ाज बिलकुल अलग है।
उदाहरण के लिए एक षब्द है रज़ा बनारस। इस एक षब्द में ही इतनी मिठास है कि उसके बाद कुछ कहने को षेश नहीं बचता। बनारस को अलग-अलग समय पर कई नामों से पुकारा जाता रहा है किंतु इस सबके बीच इसने अपनी आत्मा और स्व को बचाए रखा। अपनी अल्हड़ता से इसने कभी कोई समझौता नहीं किया। अब अगर बात देव दीपावली की हो तो देवताओं के इस उत्सव में काषी, काषी के घाट एवं काषी के लोग परस्पर सहभागी होते हैं। काषीवासियों ने सामाजिक सहयोग से देव दीपावली को महोत्सव में परिवर्तित कर इसे विष्व प्रसिद्ध कर दिया। असंख्य दीपक और झालरों की रोषनी से रविदास घाट से लेकर आदिकेषव घाट व वरुणा नदी के तट एवं घाटों पर स्थित देवालय, महल, भवन, मठ-आश्रम सारा कुछ इस दिन जगमगा उठते हैं मानो काषी में पूरी आकाषगंगा ही उतर आई हो।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *