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By | June 23, 2020

प्रकृति के उपहार

विष्व वन्यप्राणी दिवस (4 अक्टूबर) के अवसर पर विख्यात वाइल्ड लाइफ़फोटोग्राफ़र विनोद कुमार गोयल हमें पेंच टाइगर रिज़र्व की सैर करा रहे हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि 21वीं सदी के आरंभ तक कुछ ही लोग मध्य प्रदेष में स्थित पेंच टाइगर रिज़र्व के बारे में जानकारी रखते थे। इसके बजाय उसी राज्य में स्थित कान्हा, बांधवगढ़ एवं पन्ना अभयारण्य अधिक लोकप्रिय थे। इन सभी के प्रसिद्ध होने के भी अनेक कारण थ। किंतु वर्श 2008 में पेंच टाइगर रिज़र्व पर एक वृत्तचित्र बनाया गया, जिसका षीर्शक था ‘टाइगर-स्पाइ इन द जंगल‘ और यह 2006 से 2008 के बीच इस अभयारण्य में फ़िल्माया गया था। प्रकृति एवं वन्यप्राणियों में रुचि रखने वालों ने यहां का रुख किया। यहां आकर ही उन्होंने बाघों की विभिन्न गतिविधियां देखीं और अवाक रह गए।

मिली ख्याति

मुझे याद है मैं फरवरी 2007 में पहली बार पेंच टाइगर रिज़र्व देखने गया था। मैं उसके बाहरी क्षेत्र में स्थित बेहद लोकप्रिय गेट के निकट विद्यमान पेंच जंगल कैम्प में ठहरा था। उस समय हममें से अनेक आगंतुकों को बाघ दिखाई दिया था। और यह पार्क के भीतर वन विभाग द्वारा आयोजित टाइगर षो के कारण ही संभव हो सका था। इस यात्रा के दौरान हमने देखा कि बीबीसी नेटवर्क की टीम वहां उपस्थित थी और उस दल के सदस्य ‘टाइगर-स्पाइ इन द जंगल‘ का निर्माण कर रहे थे। यह वृत्तचित्र बहुत चर्चित रहा था। वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट आॅफ़ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) के अनुसार भारत में बाघों की स्थिति से संबंधित एक रिपोर्ट जारी की गई थी। इसका विशय ‘स्टेटस आॅफ़ टाइगर्स, को-प्रिडेषन, प्रे एंड देयर हेबिटेट-2018’ था। इसमें चार वर्शों में आकलन की गई बाघों की संख्या का वर्णन था। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इसे 29 जून, 2019 में जारी किया था। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पेंच टाइगर रिज़र्व देष के बेहतरीन अभयारण्यों में से एक है, जहां बाघों के रहने की उचित व्यवस्था है। वास्तव में 2010 में यह सर्वोच्च स्थान तथा 2014 में कान्हा टाइगर रिज़र्व के बाद यह दूसरे स्थान पर रहा था।

प्रसिद्धि का रहस्य

एक महान उक्ति है कि रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ था। यही कथन इस उद्धान के लिए भी कहा जा सकता है। यद्यपि इसका निर्माण 1982 में किया गया था। किंतु लोगों का ध्यान इस ओर 2002 में ही गया था जब स्थानीय लोगों ने ईको-विकास की प्रक्रिया में अपना अहम योगदान देना आरंभ कियाथा। इस अभयारण्य के आसपास स्थित 170 गांवों में ईको-पर्यटन भी षुरू किया गया। इस अभयारण्य में काम करने वाले गाइड तथा वाहन चालक आसपास के गांवों के ही निवासी हैं। रोचक तथ्य यह है कि इस टाइगर रिज़र्व से होने वाली पर्यटन कमाई का 33 प्रतिषत हिस्सा इन गांवों के कल्याण पर ही खर्च किया जाता है। वन्य प्राणियों एवं मानव में संघर्श न हो, इसलिए सभी गांववासियों को मुख्य स्थली की परिधि से बाहर बसा दिया गया है। कभी-कभी बाघ खाने की तलाष में अपनी परिधि से बाहर निकल आता है। इस कारण, उसका सामना मनुश्य से हो जाता है। अगर कभी कोई व्यक्ति जानवरों के हमले में घायल हो जाता है तो उसे उचित मुआवज़ा भी दिया जाता है।पेंच अभयारण्य में वन्यप्राणियों की विभिन्न गतिविधियां देखने यहां पर देष-विदेष से पर्यटक आते हैं

बाघिन का आकर्शण

प्रकार से जानती है कि जंगल में बच्चों को किस प्रकार से पाला जाता है। जनवरी, 2019 के अंतिम रविवार को वहां उपस्थित लोगों ने देखा कि किस प्रकार से उसने एक-एक करके अपने षावकों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया था। जिन भी पर्यटकों ने यह नज़ारा देखा वह उनके लिए जीवन भर के लिए अनोखा अनुभव साबित हुआ क्योंकि ऐसे दृष्य बार-बार देखने को नहीं मिलते। बाघिन अपने षावकों को मुंह में सावधानीपूर्वक दबाकर एक जगह से दूसरी जगह तक ले गई थी। इस पूरी प्रक्रिया में उसे 40 मिनट का समय लगा था। यह सुपरमाॅम बड़ीमादा नामक उस बाघिन की चार संतानों में से एक है जिसे वृत्तचित्र ‘टाइगर-स्पाइ इन द जंगल‘ में दर्षाया गया था। बड़ीमादा के चार षावकों में से दो मादा तथा दो नर थे। इस बाघिन के गले में काॅलर होने के कारण ही इसका नाम ‘काॅलरवाली’ पड़ा था। इसने अपने षावक को पहली बार 2008 में जन्म दिया था। तीसरी बार इसने 5 षावकों को जन्म दिया था जो मध्य प्रदेष की किसी भी बाघिन के लिए एक कीर्तिमान था। आज तक यह बाघिन 30 षावकों को जन्म दे चुकी है। इनमें से 25 जीवित हैं। बाघों, जंगली कुकुर एवं सियारों के अलावा यहां पर 47 हज़ार से अधिक हिरण भी हैं।
इस उद्यान में आपको पक्षियों की अनेक प्रजातियां देखने को मिलेंगी। बाघों, जंगली कुकुर तथा सियारों के अतिरिक्त यहां पर 47 हज़ार से अधिक हिरण, सैकड़ों सांबर तथा जंगली भालू भी हैं। इसके बीच से पेंच नदी होकर गुज़रती है। इस जंगल में रहने वाले प्राणियों की प्यास यह नदी ही बुझाती है

नियमित यात्रा

इस परिवार के सदस्यों की गतिविधियों को अपने कैमरे में कैद करने के लिए मैं कई बार पेंच टाइगर रिज़र्व जा चुका हूं। मैं उसी लाॅज में ठहरा था, जिसमें बीबीसी टीम रुकी थी। वहां हमें उनके कार्य के संबंध में जानकारी मिली तथा उनके भविश्य के कार्यѓम का पता चला। यह मेरा सौभाग्य रहा है कि मेरे द्वारा खींचे गए कुछ छायाचित्र 2016 तथा 2019 के डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के भारतीय कैलेंडर में छपे।

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