Category Archives: योग

योग का अर्थ, परिभाषा, महत्व और उद्देश्य

‘मानक अंग्रेजी-हिन्दी कोश’ में योग का अर्थ- चिन्तन, आसन, बतलाया गया है। ‘शब्द कल्पद्रुम’ में योग का अर्थ- उपाय, ध्यान, संगति, है। ‘ए प्रक्टिकल वैदिक डिक्सनरी’ में योग शब्द का अर्थ- जोड़ना है। ‘उर्दू-हिन्दी शब्द कोश’ में योग शब्द का अर्थ- बैल की गर्दन पर रखा जाने वाला जुआ बतलाया गया है। ‘योग’ शब्द का… Read More »

योग का उद्भव एवं विकास

योग भारतीय संस्कृति का एक आधार स्तम्भ हैं । जो प्राचिन काल से आधुनिक काल तक हमारे काल से जुडा हुआ है । इस योग का महत्व प्राचिन काल से भी था तथा आधुनिक काल में भी इसका महत्व और अधिक बडा है। प्रिय पाठको योग एक ऐसी विद्या है जिसके द्वारा मन को अविद्या,अस्मिता… Read More »

योग में साधक एवं बाधक तत्व

योग शब्द का अर्थ संस्कृत भाषा के युज् धातु से निश्पन्न होने के साथ विभिन्न ग्रन्थों के अनुसार योग की परिभाषाओं का अध्ययन किया गया। योग साधना के मार्ग में साधक के लिए साधना में सफलता हेतु सहायक तत्वों तथा साधना में बाधक तत्वों की चर्चा विभन्न ग्रन्थों के अनुसार की गई है। वास्तविकता में… Read More »

गीता में योग का स्वरूप

वही ज्ञान वास्तविक ज्ञान होता है जो ज्ञान मुक्ति के मार्ग की ओर अग्रसरित कराता है। अत: गीता में भी मुक्ति प्रदायक ज्ञान है। इस बात की पुष्टि स्वयं व्यास जी ने महाभारत के शान्तिपर्व में प्रकट किया है। ‘‘विद्या योगेन ऱक्षति’’ अर्थात् ज्ञान की रक्षा योग से होती है। श्रीमद्भगवद् गीता को यदि योग… Read More »

आयुर्वेद में योग, प्राणायाम, ध्यान एवं समाधि

जीवन में सदैव स्वस्थ रहने के लिए मनुष्य को मन, वचन तथा कर्म की पवित्रता आवश्यक होती है। अत: प्रत्येक मनुष्य के लिए स्वस्थ वृत्त के पालन का उपदेश चरक ने किया है। चरक का वचन है कि सौम्य बुद्धि, मधुर वचन, सुखकारक कर्म, निर्मल तथा पापरहित बुद्धि, विवेक, तप तथा यम-नियम प्राणायाम आदि योग… Read More »

भक्ति योग क्या है?

भक्ति शब्द से आप निश्चित परिचित होंगे। आपने-अपने घर के मन्दिर में, उपासना गृहों में तीर्थो में, लोगों को पूजा पाठ करते देखा होगा। भारतीय चिन्तन में ज्ञान तथा कर्म के साथ भक्ति को कैवल्य प्राप्ति का साधन माना है। आपको कुछ प्रश्न अवश्य उत्तर जानने के लिए प्रेरित कर रहे होंगे जैसे भक्ति क्या… Read More »

ज्ञानयोग क्या है?

विवेक का आशय है अच्छे-बुरे, सही-गलत, नित्य-अनित्य का यथार्थ बोध अर्थात ज्ञानयोग के अनुसार नित्य वस्तु को नित्य ओर अनित्य वस्तु को अनित्य मानना ही ‘‘नित्यानित्यवस्तु विवेक’’ है। इसके अनुसार एकमात्र ब्रह्मा ही सत्य एवं नित्य है तथा इसके अलावा अन्यन सभी वस्तुए मिथ्या एवं अनित्य है। जैसा कि कहा गया है- ‘‘नित्य्वस्वेंक ब्रह्मा तद्व्यनिरिक्तं… Read More »

हठयोग का अर्थ, परिभाषा और उद्देश्य

सामान्य रूप से हठयोग का अर्थ व्यक्ति जिदपूर्वक हठपूर्वक किए जाने वाले अभ्यास से लेता है अर्थात किसी अभ्यास को जबरदस्ती करने के अर्थ में हठयोग जिदपूर्वक जबरदस्ती की जाने वाली क्रिया है। हठयोग शब्द पर अगर विचार करें तो दो शब्द हमारे सामने आते है ह और ठ।    ह का अर्थ है- हकार… Read More »

कर्मयोग का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकार

कर्म शब्द कृ धातु से बनता है। कृ धातु में ‘मन’ प्रत्यय लगने से कर्म शब्द की उत्पत्ति होती है। कर्म का अर्थ है क्रिया, व्यापार, भाग्य आदि। हम कह सकते हैं कि जिस कर्म में कर्ता की क्रिया का फल निहित होता है वही कर्म है। कर्म करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। तथा… Read More »

ध्यान का अर्थ, परिभाषा एवं महत्व

जब धारणाभ्यासी देश-विशेष में मन को लगाते हुए मन को ध्येय के विषय पर स्थिर कर लेता है तो उसे ध्यान कहते हैं। यह समाधि-सिद्धि के पूर्व की अवस्था है। ध्यान अष्टांग योग का सातवाँ अंग है। पहले के छ: अंग ध्यान की तैयारी के रूप में किए जाते हैं। ध्यान से आत्म साक्षात्कार होता… Read More »