Category Archives: राजनीति

जनतंत्र का अर्थ, परिभाषा एवं उद्देश्य

आधुनिक युग जनतंत्र व्यवस्था का युग है। जनतांत्रिक शासन व्यवस्था सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। वर्तमान जनतंत्र साम्राज्यवादी प्रशासन के पश्चात् आया जबकि सम्पूर्ण विश्व औद्योगिक एवं भूमण्डलीकरण के प्रभाव में आया तो मनुष्य के अस्तित्व व अधिकारों में सर्वोच्चता आयी और विभिन्न देशों ने जनतंत्र शासन व्यवस्था को सहृदय होकर स्वीकारा। वैसे यह भी सत्य… Read More »

भारत में निर्वाचन प्रणाली विशेषता, गुण या दोष

निर्वाचन प्रक्रिया से तात्पर्य संविधान में वर्णित अवधि के पश्चात पदों एवं संस्थाओं के लिए होने वाले निर्वाचनों की प्रारंभ से अंत तक की प्रक्रिया से है। निर्वाचन प्रक्रिया की प्रकृति भारतीय संविधान के इस उपबंध द्वारा निर्धारित हुई है कि लोकसभा अैार प्रत्येक राज्य की विधानसभा के लिए निर्वाचन 1951, राज्य पुनर्गठन अधिनियम सन… Read More »

क्षेत्र पंचायत का गठन, चुनाव प्रणाली, अधिकार एवं शक्तियां

तिहत्तरवें संविधान संषोधन के अन्र्तगत नई पंचायत राज व्यवस्था में पंचायतें तीन स्तरों पर गठित की गई है। विकेन्द्रीकरण की नीति ही यह कहती है कि सत्ता, शक्ति व संसाधनों का बंटवारा हर स्तर पर हो। तीनों स्तर पर पंचायतों के द्वारा लोगों की प्राथमिकताओं के अनुसार विकास योजनायें बनाइर् जाती है। पंचायतों को इस… Read More »

नगर-निकाय के कार्य एवं शक्तियां

किसी भी संगठन या संस्था के आस्तित्व का कोई औचित्य नहीं है जब तक कि उसे उसके गठन व स्वरूप के अनुरूप कार्यों व शक्तियां प्रदान नहीं की जाती। बिना कार्यों व जिम्मेदारियों के बिना वह संगठन केवल एक ढाँचा मात्र है। 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के अन्र्तगत नगर निकायों को शहरी क्षेत्रों में स्वशासन… Read More »

मताधिकार का अर्थ, महत्व, योग्यता

मताधिकार का अर्थ- जनता के उस अधिकार को मताधिकार या Franchise (फ्रेंसाइज) या Suffrage (सफ्रेज) कहते है, जिनके प्रयोग द्वारा वह अपने प्रतिनिधियों का चुनाव मतदान द्वारा करती है, जो उनके लिए कानून बनाते है। मताधिकार अँग्रेजी के फेस्राइज शब्द पुरानी फ़्रेंच भाषा के ‘फसें ‘ शब्द से बना है जिसका अर्थ है स्वतत्रं और… Read More »

भारतीय विदेश नीति के मूल उद्देश्य एवं सिद्धान्त

प्रत्येक सम्प्रभू देश की एक विदेश नीति होती है। भारत की भी अपनी विदेश नीति है। विदेश नीति के अंतर्गत कुछ सिंद्धात, हित और वे सभी उद्देश्य आते हैं जिन्हें किसी दूसरें राष्ट्र के सम्पर्क के समय बढ़ावा दिया जाता है। यद्यपि विदेश नीति के कुछ मूल गुण हैं परन्तु अन्तर्राष्ट्रीय हालात में बदलाव के… Read More »

न्यायिक सक्रियता क्या है?

न्यायिक सक्रियता की उत्पत्ति प्रजातन्त्र के तीन प्रमुख स्तम्भों न्यायपालिका, विधायिका एवं कार्यपालिका में से जब विधायिका तथा कार्यपालिका स्वयं को प्रदत्त कार्यों को करने में शिथिलता प्रकट करें या असमर्थ हो जाये तो प्रजातंत्र के तीसरे स्तम्भ के रूप में न्यायापालिका इन कार्यों का संपादन करने हेतु आगे आती है। यही अवधारणा न्यायिक सक्रियता… Read More »

राज्य और समाज में अंतर

जैसे कि आप जानते है, राज्य एक राजनीति समाज है, जिसके चार घटक है- जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार, संप्रभुता। आप जानते है कि राज्य कानून के माध्यम से स्वाभाविक रूप से दमनकारी शक्ति का प्रयोग करके सामाजिक आचार-विचार को नियंत्रित रखता है। एक संकल्पना के रूप में समाज एक संगठन भी है और सामाजिक संबंधों… Read More »

राज्य और सरकार

जैसा कि आप जानते हैं कि सरकार राज्य का एक घटक है। यह वह संस्था है जहां पर कानून बनाये और लागू किये जाते हैं और उन नियमों का उल्लंघन करने वालों को दण्ड मिलता है। यही राज्य का प्रत्यक्ष रूप है। इसमें राज्य के सभी लोग, संगठन और संस्थाएँ शामिल हैं जिनके द्वारा राज्य… Read More »

राजनीति का अर्थ एवं परिभाषा

राजनीति शब्द- ‘राज’ और ‘नीति’ दो शब्दों से मिलकर बना है। प्राय: राज से राज्य तथा नीति से नियम, अर्थ लगाया जा सकता है। ‘नीति’ शब्द ‘नी’ धातु से बना है। ‘नी’ का अर्थ है किसी को किसी ओर ले जाना या मार्ग-प्रदर्शन करना। राजनीति के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने समय-समय पर अपनी परिभाषाएँ… Read More »