Category Archives: लोक वित्त

लोक वित्त का अर्थ, परिभाषा, क्षेत्र, प्रकृति एवं महत्व

लोकवित्त अथवा राजस्व अर्थशास्त्र की वह शाखा है जो सरकार के आय-व्यय का अध्ययन करती है। राजस्व को लोकवित्त के पर्यायवाची शब्द के रूप में किया जाता है। राजस्व, संस्कृत भाषा का शब्द है जो दो अक्षरों-’राजन + स्व’ से मिलकर बना है जिसका अर्थ होता है।- ‘राजा का धन’। राजनैतिक दृष्टि से राजा को… Read More »

लोक वित्त क्या है?

किसी वस्तु, घटना अथवा प्रक्रिया के वैज्ञानिक प्रेक्षण एवं बोध के आधार पर निर्मित सामान्य विचारों को अभिव्यक्त एवं बोध के आधार पर निर्मित सामान्य विचारों को अभिव्यक्त करने हेतु जिन विशिष्ट शब्द संकेतों, परिभाषाओं तथा सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है उसे वैज्ञानिक शब्दावली में अवधारणा कहते हैं । अत: अवधारणायें स्थिर न होकर… Read More »

लोक व्यय के उद्देश्य – आवंटन, वितरण और स्थिरीकरण

लोक व्यय के उद्देश्य किसी भी देश की सरकार जिस उद्देश्य को ध्यान में रखकर लोक व्यय करती है वह उद्देश्य उस उद्देश्य से सदैव अलग पाया जाता है जिसे लेकर निजी व्यक्तियों एवं संस्थाओं द्वारा व्यय किया जाता है। आपको शायद इस तथ्य से ज्ञात हो कि लोक सत्ताओं के व्यय तथा निजी व्यक्तियों के… Read More »

लोक व्यय का प्रभाव

इसमें आप लोक व्यय के अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभावों से परिचित हो सकेंगे। जिससे उत्पादन, बृद्धि, वितरण और स्थिरीकरण पर पड़ने वाले प्रभावों को शामिल किया गया है। लोक व्यय का उत्पादन पर अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। प्रत्यक्ष प्रभावों के साथ परोक्ष रूप से भी प्रभावित करता है। बृद्धि को… Read More »

कार्यात्मक वित्त का अर्थ, परिभाषा एवं उद्देश्य

कार्यात्मक वित्त शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम अमेरिकी अर्थशास्त्री प्रो0 लर्नर ने किया था। परन्तु वित्त को कार्यात्मक बनाने का श्रेय कीन्स को जाता है। कीन्स द्वारा वित्त का उपयोग मन्दी एवं बेरोजगारी को दूर करने के लिये किया गया। जिन सामान्य उपकरणों की कीन्स ने चर्चा की, कार्यात्मक वित्त के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है।… Read More »

करारोपण का अर्थ, परिभाषा, सिद्धांत एवं वर्गीकरण

इसके अन्तर्गत करारोपण के मुख्य सिद्धान्तों के साथ सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक सिद्धान्तों को भी आप भली-भाँति समझ सकेंगे। करारोपण के अन्य सिद्धान्तों का भी आप अध्ययन करेंगे जो एक अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। करारोपण के सिद्धान्तों को भली-भाँति समझने के बाद आप करारोपण के वर्गीकरण को समझेंगे जो करों… Read More »

सार्वजनिक ऋण क्या है?

सरकार जब सार्वजनिक व्यय सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति करारोपण के द्वारा नहीं कर पाती है। (क्योंकि लोगों में एक निश्चित सीमा के बाद करारोपण की ऊँची दर असन्तोष को जन्म देगी तथा कार्य प्रेरणा को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगी) तथा घाटे की वित्त व्यवस्था का भी सहारा नहीं ले पाती है (क्योंकि उसे ‘सुरक्षित… Read More »

घाटे की वित्त-व्यवस्था का अर्थ, औचित्य एवं प्रभाव

वर्तमान शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश तक सन्तुलित और अतिरेक का बजट आदर्श बजट माना जाता था। परन्तु आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में विकास प्रक्रिया की विभिन्न आर्थिक और कल्याणकारी क्रियाओं में राज्य का एक समर्थ अभिकर्ता के रूप में प्रवेश होने के कारण सम्प्रति उसके कार्यक्षेत्र में अत्यन्त प्रसार हो गया है। परिणामत: राजकीय व्यय की मात्रा… Read More »

करापात की अवधारणा, परिभाषा एवं रूप

करापात की अवधारणा को स्पष्ट करने के साथ विभिन्न अर्थशास्त्रियों द्वारा दी गयी करारोपण की परिभाषाओं को भी समझेंगे। करापात के विभिन्न रूपों का अध्ययन करगे । करापात की अवधारणा जब सरकार किसी व्यक्ति या संस्था पर कर लगाती है तो वह व्यक्ति या संस्था उस कर की राशि को स्वयं वहन न करके दूसरों… Read More »

कर विवर्तन की अवधारणा, सिद्धान्त एवं प्रकार

कर विवर्तन की अवधारणा मुख्य रूप से कराघात एवं करापात के मध्य अन्तर से सम्बन्धित है। सामान्य रूप से कर विवर्तन से हमारा आशय करक प्रणाली के उस भाग से लगाया जाता है जिसके अन्तर्गत करदाता कर के भार को दूसरे व्यक्ति या आर्थिक इकाई पर टालने में सफल हो जाता है। करदाता कर के… Read More »