Category Archives: शैक्षिक निर्देशन

कैरियर या वृत्तिक निर्देशन एवम स्थापन्न

वृत्तिक विकास वास्तव में मानसिक विकास के समानान्तर चलता है। बूलर (1933) द्वारा किये गये वृत्तिक विकास के सिद्धान्तों को सुपर (1957) ने प्रयोग किया। सम्पूर्ण वृत्तिक विकास के चरणों में उत्पित्त, व्यवस्थित, रख-रखरखाव एवं पतन की अवस्था मुख्य केन्द्र बिन्दु हैं। जिन्जबर्ग (1951) ने वृत्तिक चयन की अवस्था को निम्न चरणों में बांटा। 1) कल्पना… Read More »

निर्देशन का अर्थ, परिभाषा, प्रकृति, क्षेत्र एवं उद्देश्य

मानव अपने जीवन काल में व्यक्तिगत व सामाजिक दोनों ही पक्षों में अधिकतम विकास लाने के लिए सदैव सचेष्ट रहता है इसके लिये वह अपने आस पास के पर्यावरण को समझता है और अपनी सीमाओं व सम्भावनाओं, हितों व अनहितों गुणों व दोषों को तय कर लेता है। परन्तु जीवन की इस चेष्टा में कभी… Read More »

निर्देशन के प्रतिमान

निर्देशन के प्रतिमान का अभिप्राय वह प्रारूप है जिसके अन्तर्गत निर्देशन की प्रक्रिया को संचालित किया जाता है। निर्देशक के विविध प्रतिमानों का स्वरूप समय-समय पर निर्देशन प्रक्रिया में हो रहे परिवर्तनों के कारण ही निकलकर आया है। प्रतिमानों की प्रमुख भूमिका निर्देशन प्रक्रिया को वस्तुनिषठ एवं सार्वभौमिक स्वरूप प्रदान करना है। शर्टजर एण्ड स्टोन… Read More »

निर्देशन के सिद्धान्त एवं तकनीकी

निर्देशन की मान्यतायें आज के भौतिकवादी जीवन में हताशा, निराशा एवं कुसमायोजन की समस्याओं ने भयावह रूप ले लिया है। इन सभी समस्याओं ने जीवन के प्रत्येक चरण में निर्देशन की आवश्यकता को जन्म दिया। निर्देशन प्रक्रिया कुछ परम्परागत मान्यताओं पर निहित होता है। ये मान्यतायें हैं- व्यक्ति भिन्नताओं का होना-व्यक्ति अपनी जन्मजात योग्यता, क्षमता,… Read More »

शैक्षिक निर्देशन क्या है?

जौन्स ने शैक्षिक निर्देशन को चयन एवं समायोजन की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्वीकार करते हुए लिखा है कि- शिक्षा निर्देशन वह व्यक्तिगत सहायता है जो छात्रों को इसलिए प्रदान की जाती है कि वे अपने लिए उपयुक्त विद्यालय पाठ्यक्रम, पाठ्य-विषय तथा पाठ्यातिरिक्त क्रियाओं का चयन कर सके तथा उनमें समायोजित कर सकें। आर्थर जे. जोन्स… Read More »