Category Archives: श्रम

संघर्ष सम्बन्धी अधिनियम

यदि हम भारत में औद्योगिक संघर्षों के विधानों का अवलोकन करें, तो स्पष्ट होता है कि यह पुराना नहीं है। इसका कारण यह है कि भारत में औद्योगिक जीवन में संघर्ष का प्रारम्भ 1914-18 के बाद हुआ। इससे पहले मालिक और मजदूरों के विवादों का निबटारा 1860 के मालिक एवं श्रमिक (विवाद) अधिनियम द्वारा होता… Read More »

प्रबंध में श्रमिकों की सहभागिता का अर्थ

औद्योगिक संबंध के दो महत्वपूर्ण पहलू होते है। ये है- संघर्ष तथा सहयोग के पहलू। आधुनिक उद्योग प्रबंध और श्रम के सहयोग के कारण ही चलते रहते हैं यह सहयोग नियोजन में अनौपचारिक रूप से स्वत: होता रहता है। उद्योगों का चलते रहना दोनों के हितों में आवश्यक है। साथ ही, नियोजन और श्रमिकों के… Read More »

सामूहिक सौदेबाजी का अर्थ एवं परिभाषा

ऐतिहासिक दृष्टि से सामूहिक सौदेबाजी की अवधारणा का विकास सामूहिक सम्बन्धों के विकास के तृतीय चरण में हुआ। उत्पादन कार्य को प्रारम्भिक स्थिति में फल की प्राप्ति शक्ति के आधार पर की जाती थी दूसरी स्थिति में सामाजिक विधान के आधार पर और तीसरे तीसरी स्थिति में पारस्परिक विचार-विमर्श एवं समझौते के आधार पर सामूहिक… Read More »

श्रम का अर्थ, परिभाषा, प्रकार एवं विशेषताएँ

शारीरिक या मानसिक रुप से किया गया कोई भी कार्य श्रम ही है, जिसके बदले में मजदूरी की प्राप्ति होती है। यदि कोई प्राणी अगर किसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए मानसिक या शारीरिक कार्य किया जाता है, तो वह श्रम कहलाता हैं।  श्रम की परिभाषा थामस के अनुसार :- “श्रम से मानव के उन… Read More »

श्रम कल्याण क्या है?

कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के कल्याण, उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न पहलुओं को नियमित करने का दायित्व सरकार अपने ऊपर लेती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद औद्योगिक विकास को गति प्रदान करने के लिए भारत सरकार ने कारखाना अधिनियम, 1948 (Factory Act, 1948) प्रतिपादित किया। इसका उद्देश्य श्रमिकों को औद्योगिक और व्यावसायिक… Read More »

श्रमिक शिक्षा क्या है?

किसी भी विकासशील देश में आर्थिक विकास को तेजी से बढ़ाने के एक साधन के रूप में श्रमिकों की शिक्षा के महत्व को कम नहीं किया जा सकता। यह ठीक ही कहा गया है कि ‘‘किसी औ़द्योगिक दृष्टि से विकसित देश का बड़ा पूंजी भण्डार इसकी भौतिक सामग्री में नहीं वरन् जांचे हुए निष्कर्शो से… Read More »

औद्योगिक संबंध की अवधारणा, प्रकृति व अर्थ

औद्योगिक श्रम, वास्तव में, वृहत् समाज का ही एक अंग है। श्रमिक के रूप में वह उत्पादन का सक्रिय साधन है, किन्तु साथ ही, वह उपभोक्ता भी है। समाज में भी उसकी प्रतिष्ठा व भूमिका है। अस्तु, उसे उद्योग, परिवार व बृहत् समाज के अंग के रूप में एक ही साथ भूमिका का निर्वाह करना… Read More »

श्रम विधान क्या है?

आधुनिक प्रचलन में ‘विधान’ शब्द से उच्च प्राधिकार से युक्त तथा जनता का प्रचुरता से प्रतिनिधित्व करने वाले विशिष्ट राजकीय अभिकरणों द्वारा बनाए गए विधि के नियमों का बोध होता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, विधान के अन्तर्गत मुख्यत: जनता के समर्थन प्राप्त विधानमंडलों तथा अन्य मान्यता प्राप्त सक्षम प्राधिकारियों द्वारा बनाए गए कानून सम्मिलित… Read More »

संघर्ष प्रबंधन क्या है?

पूंजीवादी औद्योगिक अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता औद्योगिक संघर्ष है। इसका तात्पर्य मालिकों और श्रमिकों के मध्य होने वाले मतभेदों से है जिनका परिणाम हड़ताल, तालाबंदी, काम की धीमी गति, घेराव तथा इस प्रकार की अन्य समस्याओं के रूप में सामने आता है। अत: औद्योगिक संघर्ष वह मतभेद है जो रोजगार देने या न देने… Read More »

श्रम कल्याण के सिद्धान्त एवं प्रशासन

कोई भी श्रम कल्याण सम्बन्धी योजना अथवा कार्यक्रम तब तक प्रभावपूर्ण रूप से नही बनाया जा सकता जब तक कि समाज के नीति निर्धारक श्रम कल्याण की आवश्यकता को स्वीकार करते हुये इसके सम्बन्ध में उपयुक्त नीति बनाते हुए अपने इरादे की स्पष्ट घोषणा न करें और इसे कार्यान्वित कराने की दृष्टि से राज्य का… Read More »