Category Archives: हिन्दू धर्म

वेदों का महत्व

वैदिक लोगों के आर्थिक और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे थे । पशु-चारण व्यवस्था धीरे-धीरे कृषि अर्थव्यवस्था द्वारा विस्थापित होती जा रही थी, जो नियमित खेती और शिल्प तथा व्यापार के विकास पर आधारित थी । जनजातियों का बटवारा हुआ और वस्तुत: हमें एक सम्पूर्ण वर्ण-व्यवस्था देखने को मिलती है । इस समय… Read More »

मोक्ष का अर्थ

मोक्ष का सामान्य अर्थ दुखों का विनाश है। दुखों के आत्यन्तिक निवृत्ति को ही मोक्ष या कैवल्य कहते हैं। प्राय: सभी भारतीय दर्शन यह मानते हैं कि संसार दुखमय है। दुखों से भरा हुआ है। किन्तु ये दुख अनायास नहीं है, इन दुखों का कारण है। उस कारण को समाप्त करके हम सभी प्रकार के… Read More »

गीता का परिचय

गीता संस्कृत साहित्य काल में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व का अमूल्य ग्रन्थ है। यह भगवान श्री कृष्ण के मुखारबिन्द से निकली दिव्य वाणी है। इसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इसके संकलन कर्ता महर्षि वेद ब्यास को माना जाता है। आज गीता का विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। जिससे… Read More »

आदि शंकराचार्य का जीवन परिचय एवं रचनाऐं

शंकराचार्य का जन्म 788 ई0 में केरल प्रदेश के ‘कालदी’ नामक ग्राम में नम्बूद्री ब्राह्मण परिवार में हुआ था। कालदी ग्राम मालाबार में पेरियार नदी के किनारे वन क्षेत्र में स्थित है। कालदी में विद्याधिराज नामक एक प्रसिद्ध विद्वान थे। उनका पुत्र शिवगुरू था। यह परिवार परम्परागत रूप से शंकर का उपासक था। इन्हीं शिवगुरू… Read More »

ऋग्वेद का समय

ऋग्वैद धार्मिक स्तोत्रों की एक अत्यंत विशाल राशि है, जिसमें नाना देवाताओं की भिन्न-भिन्न ऋषियों ने बड़े ही सुंदर तथा भवाभिव्यंजक शब्दों में स्तुतियों एवं अपने अभीष्ट की सिद्धि के निर्मित पार्थनायें की है। द्वितीय मंडल से लेकर सप्तम मंडल तक एक ही विशिष्ट कुल के ऋषियों की प्रार्थनायें संगृहीत हैं। अष्टम मंडल में अधिकतर… Read More »

यजुर्वेद की शाखाएं, एवं भेद

यजुर्वेद की शाखाएं काण्यसंहिता-  शुक्ल यजुर्वेद की प्रधान शाखायें माध्यन्दिन तथा काण्व है। काण्व शाखा का प्रचार आज कल महाराष्ट्र प्रान् तमें ही है और माध्यन्दिन शाखा का उतर भारत में, परन्तु प्राचीन काल में काण्य शाखा का अपना प्रदेश उत्तर भारत ही था, क्योंकि एक मन्त्र में (11/11) कुरु तथा पच्चालदेशीय राजा का निर्देश… Read More »

सामवेद क्या है?

अथर्ववेद के अनेक स्थलों पर साम की विशिष्ट स्तुति ही नहीं की गई है, प्रत्युत परमात्मभूत ‘उच्छिष्ट’ (परब्रह्म) तथा ‘स्कम्भ’ से इसके आविर्भाव का भी उल्लेख किया गया मिलता है। एक ऋषि पूछ रहा है जिस स्कम्भ के साम लोभ हैं वह स्कम्भ कौन सा है? दूसरे मन्त्र में ऋक् साथ साम का भी आविर्भाव… Read More »

उपनिषद की संख्या, रचनाकाल एवं उनके परिचय

उपनिषद् शब्द ‘उप’ एवं ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक सद् (सदृलृ) धातु में ‘क्विप्’ प्रत्यय लगकर बनता है, जिसका अर्थ होता है ‘समीप में बैठना’ अर्थात् गुरु के समीप बैठकर ज्ञान प्राप्त करना। धातुपाठ में सद् (सद्लृ) धातु के तीन अर्थ निर्दिष्ट हैं – विशरण, (विनाश होना), गति (प्रगति), अवसादन (शिथिल होना)। इस प्रकार जो विद्या समस्त… Read More »

ईश्वर शब्द का अर्थ

शब्द व्युत्पत्ति की दृष्टि से ईश्वर शब्द ईश धातु में वरच् प्रत्यय लगाकर बना है जिसका अर्थ है ऐश्वर्य युक्त, समर्थ, शक्तिशाली, स्वामी, प्रभु, मालिक, राजा, शासक आदि। हिन्दी संस्कृत कोश के अनुसार ईश्वर शब्द का प्रयोग परमेश्वर, जगदीश्वर, परमात्मन, परमेश, स्वामी, शिव आदि अनेक रूपों में किया गया है। ऋग्वेद में ईश धातु का… Read More »

योगवशिष्ठ में योग का स्वरूप

योगवशिष्ठ में योग का स्वरूप  योग वशिष्ठ योग का एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। अन्य योग ग्रन्थों की भाँति योग वशिष्ठ में भी योग के विभिन्न स्वरूप जैसे- चित्तवृत्ति, यम-स्वरूप, नियम-स्वरूप, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, समाधि, मोक्ष आदि का वर्णन वृहद् रूप में किया गया है। योग वशिष्ठ के निर्वाण-प्रकरण में वशिष्ठ मुनि श्री राम जी… Read More »