E-commerce Solutions

By | June 23, 2020

दीघा के दर्शन

षषि गोयला हमें दीघा की सैर करा रही हैं। कोलकाता के निकट स्थित यह षांत एवं रमणीक स्थल सभी को अपनी ओर आकर्शित करता है।
‘‘आमि पृथ्वीर षिषु, बोषे आछी तब उपकुले। सुनितेछी तव ध्वनि।। आदि अंत ताहार कोथाय रे, कोथाय कूल। कोथाय ताहार तल – बोलो कि, के बुझिया, ताहार अपार षांति।।’’ दीघा समुद्र के किनारे बैठे-बैठे कविवर गुरु रविंद्रनाथ टैगोर की ये पंक्तियां अनायास याद आ गईं। सागर की अपार षांति का अनुभव वे सभी प्रकृति प्रेमी कर सकते हैं, जो जीवन की आपाधापी से तंग आकर कभी पर्वतों, कभी वनों तो कभी समुद्र के किनारे ढूंढ़ते हैं। अधिक नहीं तो कुछ दिन का अवकाष अवष्य लें और दीघा घूम आएं। नवजीवन प्राप्त हो जाएगा। हमने भी सप्ताहांत कोलकाता के निकट दीघा में बिताने की योजना बनाई। वाहन द्वारा केवल चार घंटों की यात्रा करके हम वहां जा पहुंचे।

अनोखा अनुभव

सागर के ठीक सामने स्थित ‘सैकताबास’ में हमने डेरा जमाया। रात के दस बज गए थे। खाया-पिया, विश्राम किया ताकि सुबह जल्दी उठकर दीघा के प्रसिद्ध सूर्योदय का भरपूर आनंद ले सकें। मैं भोर का अनुभव लेने अकेले ही तट पर पहुंच गई। सर्दी का आभास हो रहा था और कोहरा छाया हुआ था। सर्द हवा सिहरन उत्पन्न कर रही थी। किनारे पर दूर तक फैले झाऊ और ताल के पेड़ों की सरसराती ध्वनि ने दिल में हिलोर जगा दी। तट पर खड़ी मैं उठती-गिरती लहरें देखने लगी। षाॅल ओढ़कर मैं षांति का अनुभव करने के लिए वहीं पर बैठ गई। तभी प्रकाष की पहली किरण प्रकट हुई। न जाने कब चंचल षिषु की भांति बाल रवि पानी से उछलकर ऊपर उठ गया और सोया सागर जाग गया। उस समय छः बजे थे। चहल-पहल आरंभ हो गई। मित्रगण भी मेरे पास आ गए। मछुआरे जाल से मछलियां निकाल रहे थे। कुछ लोग मछली खरीद रहे थे। सात मील लंबा और एक हज़ार फुट चैड़ा समुद्र से सटा यह पत्थरीला किनारा अपनी तरह का, एषिया में एकमात्र है। बालुई, भुरभुरी मिट्टी वाली ज़मीन इसके बाद है। यहां झाऊ या काॅसेरियन पेड़ों के अलावा काजू के वृक्ष भी हैं। उसके किनारे-किनारे होटल, मोटल तथा बाज़ार हैं, जिसमें खाने-पीने का सामान, षंख, सीप और कौड़ी से बना सजावटी सामान बिकता है। यहां की हाथ से बनी चटाई बहुत लोकप्रिय है। दीघा का तट इतना पक्का है कि इस पर छोटे जलपोत भी ठहर सकते हैं। एक ज़माने में कोलकाता के प्रसिद्ध उद्योगपति सर बीरेन मुखर्जी को उनकी माताजी अपने छोटे से विमान से यहां सागर स्नान करने लाया करती थीं। इस किनारे से जहां एक ओर षंकरपुर एवं मंदारमणि जैसे रमणीक ‘सी-रिज़ाॅर्ट’ दिखाई देते हैं, वहीं दूसरी ओर यह ओडिषा की सीमा को छूता है। इसीलिए यहां के स्थानीय निवासियों की भाशा ओडिषी-बांग्ला मिश्रित है।

नए-पुराने का मिश्रण

दीघा, आज दो भागों ‘ओल्ड’ और ‘न्यू’ में विभाजित है। पुराने तट का कुछ हिस्सा भूमिरक्षण के कारण बंद पड़ा है। इधर सैलानियों की संख्या बढ़ रही है, इसलिए किनारे का विस्तार किया गया। इनके नाम का ही अंतर है। एक तट से टहलते हुए 15-20 मिनट में दूसरे तट तक पहुंचा जा सकता है। सड़क मार्ग से जाने पर पुराना दीघा पहले आता है। यद्यपि बंगाल की खाड़ी के किनारे, मिदनापुर ज़िले में यह ग्राम बहुत पहले से है। किंतु एक ‘बीच रिज़ार्ट’ के रूप में इसकी लोकप्रियता कुछ दषकों ही पुरानी है। इसे पहले बीरकुल के नाम से जाना जाता था। पुराने सरकारी गजट में यही नाम है और ‘टीबी सैनिटोरियम’ के संदर्भ में इसका उल्लेख है। संभवतः अपने निर्जन और स्वास्थ्यवर्धक परिवेष के कारण इसे न केवल यक्ष्मा रोगियों के अनुकूल समझा गया अपितु इसे ‘वर्जिन बीच’ भी कहा गया। दीघा नाम कब और कैसे पड़ा, यह बहुत छानबीन के बाद भी न जान सकी। हो सकता है कि अपने अनोखे और लंबे तट के कारण यह ‘दीर्घ’ से कालांतर में दीघा हो गया हो। इस स्थान के बारे में एक विषेश बात यह है कि इसके सौंदर्य से सम्मोहित होने वाले प्रमुख गणमान्य व्यक्ति भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लाॅर्ड वाॅरेन हेस्टिंग्स थे। उन्होंने एक पत्र में अपनी पत्नी से इसका वर्णन किया था। उन्होंने इसे अपना ‘बीच रिज़ाॅर्ट’ बनाया था। उस समय उनके बंगले के अलावा यहां पर कुछ गिने-चुने पक्के मकान बने थे। तब कलकŸाा से जेटी द्वारा रसूलपुर नदी से होते हुए हिडली पहुंचते थे। वहां से हाथी, घोड़े अथवा पालकी द्वारा दीघा पहुंचा जाता था। अब कई लोग बैटरी-रिक्षा द्वारा गांव एवं षहर की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों की सैर करते दिख जाते हैं। दीघा का समुद्र षांत है। समुद्र में डुबकी लगाना सुरक्षित एवं सुविधाजनक होता है। हमने भी गोता लगाया। उसके बाद हम अपने निवास स्थान पर लौट आए। दोपहर का खाना खाकर सुनहरी धूप में टहलते हुए न्यू दीघा जा पहुंचे।

मुख्य आकर्शण

अमरावती झील यहां का मुख्य आकर्शण है। इसे फन पार्क का रूप दिया गया है। इसी के पास साइंस म्यूज़ियम और जुरासिक पार्क स्थित है। इन्हें देखने के बाद हम एषिया का सबसे बड़ा एक्वेरियम देखने पहुंचे। झील में नौका की सैर की, खाया-पिया और ओल्ड दीघा में सूर्यास्त देखने लौट आए। संध्या हो गई थी। समुद्र में ज्वार उठ रहा था। ऊंची लहरों से जूझते हुए मछुआरे किनारे की ओर आ रहे थे। ये लहरें जब किनारे से टकराती थीं तब दूर मोती जैसी बूंदें फैल जाती थीं। इस समय का परिदृष्य प्रातःकाल से भिन्न था। पहले पानी पर सुनहरा प्रकाष दृश्टिगोचर हुआ, फिर पीला, लाल और बैगनी रंग फैला तथा अचानक से सभी कुछ विलुप्त हो गया। सूर्यदेव जैसे दिन में प्रकट हुए थे, वैसे ही अचानक से जल में समा गए। दिन भर की गतिविधियों से हम बहुत थक गए थे और अपने विश्राम-स्थल पहुंच गए। अगले दिन हम ऐतिहासिक स्थल देखना चाहते थे, अतः षंकरपुर एवं मंदारमणि गए। हम दोपहर को षंकरपुर पहुंचे। यह दीघा से छोटा और निर्जन समुद्री तट है। षंकरपुर ‘फिषिंग प्रोजेक्ट’ के लिए प्रसिद्ध है। वहां से हम मंदारमणि गए, जो कोलकाता-दीघा के रास्ते में ही पड़ता है। परिवेष षंकरपुर जैसा ही है। यहां पर भी छुट्टियां बिताने की सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इनका अवलोकन करके हम अपने-अपने घर लौट आए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *