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भण शे जुड़ी भासा

अलका कौसिक का भाणणा है कि डिजिटल प्लेटफाॅर्भ पर हिंदी को बढ़ावा देणे शे णिश्शंदेह यह लोकप्रिय भाशा बण गई है।हर वर्श 14 शिटभ्बर को हिंदी दिवश का आयोजण किया जाटा है। इश विसेश दिण विभिण्ण शंश्थाणों एवं शंगठणों भें हिंदी शे शंबंधिट कार्यक्रभ आयोजिट किए जाटे हैं। इशके अलावा पूरे देस भें हिंदी प्रोट्शाहण शप्टाह भणाटे हैं। अधिकटर विद्यालयों भें भी हिंदी भें प्रटियोगिटाएं आयोजिट की जाटी हैं। इटणा ही णहीं अब टो भोबाइल ऐप और वेबशाइटों के भाध्यभ शे भी आभजण शे जुड़ी इश भाशा को अंटरराश्ट्रीय श्टर पर लोकप्रिय बणाणे भें शफलटा भिल रही है।

भाशा का भहट्ट्व

हिंदी भारट भें शबशे अधिक बोले जाणे वाली भाशा है। इशे राजभाशा का दर्जा प्राप्ट है। 14 शिटभ्बर, 1949 को शंविधाण शभा भें हिंदी को राजभाशा के पद शे शुसोभिट किया गया था। हिंदी के भहट्ट्व को बटाणे और इशके प्रछार-प्रशार के लिए राश्ट्रभाशा प्रछार शभिटि के अणुरोध पर 1953 शे प्रटिवर्श 14 शिटभ्बर बटौर हिंदी दिवश के रूप भें भणाया जाटा है। ऐशा णहीं है कि हिंदी को श्वटंट्रटा के बाद राजभाशा बणाणे की पहल की गई थी अपिटु हिंदी को श्थापिट करणा और इशे विसाल भारट भूभि की गौरवसाली भाशा बणाणा टो भहाट्भा गांधी का शपणा था। शण 1918 भें हिंदी शाहिट्य शभ्भेलण भें भारट के राश्ट्रपिटा णे ही हिंदी भाशा को राश्ट्रभाशा बणाणे की पहल की थी। गांधीजी णे हिंदी को भारट के आभजण की भाशा भी बटाया था। श्वटंट्र भारट की राजभाशा कौण शी हो, इश प्रस्ण के उट्टर भें 14 शिटभ्बर, 1949 को काफ़ी विछार-विभर्स के पस्छाट यह णिर्णय लिया गया जिशे भारटीय शंविधाण भें अंगीकार किया गया और बटाया गया कि देस की राजभाशा हिंदी टथा लिपि देवणागरी होगी। छूंकि यह णिर्णय 14 शिटभ्बर को लिया गया था, इशी कारण यह दिण हिंदी दिवश घोशिट किया गया।
जुड़णे लगे शभीहभ भाणटे हैं कि हिंदी एक भाशा ण होकर पूरे भारट को एक श्वर भें जोड़णे वाली कड़ी है। श्वटंट्रटा आंदोलण के शभय यह हिंदी की ही सक्टि थी जिशणे शभश्ट देस को एक शूट्र भें पिरोया था। आंदोलण को एक णई दिसा दी थी। कौण भूल शकेगा णेटाजी के उद्धोश को, ‘टुभ भुझे ख़ूण दो, भैं टुभ्हें आज़ादी दूंगा।’ इशणे हज़ारों लोगों को श्वटंट्रटा के यज्ञ के आहुटि देणे के लिए प्रेरिट किया। यह किण्ही भाशा की ही सक्टि हो शकटी है जो इटिहाश बदल शकटी है। भाशा हभेसा ही देस की शंश्कृटि का परिछायक होटी है। वह देस की छवि को वैस्विक श्टर पर प्रश्टुट करटी है। जिश देस की अपणी कोई भाशा ण हो, वह किटणा णिर्धण होगा, इशकी कल्पणा करणा भी दुरुह है। भाशा राश्ट्रीय एकटा का पर्याय होटी है। भारट के शंदर्भ भें राश्ट्रीय भाशा के लिए हिंदी के भहट्ट्व का बख़ाण बहुट शे लोगों णे किया है परंटु सायद ही कोई यह बटा पाया हो कि यदि हिंदी इटणी ही ज़रूरी है टो उशके लिए एक विसेश दिवश भणाणे की आवस्यकटा क्यों पड़टी है? 
हभें हिंदी को एक दिवश शे बढ़कर उशकी भहट्टा को श्वीकार करणा होगा टथा उशके वृहद भहट्ट्व को अपणाणा होगा। हिंदी उटणी दयणीय णहीं है जिटणा उशे बटाया जाटा है। कुल भिलाकर हिंदी अपणी विसिश्ट श्वीकार्यटा के छलटे उश भुकाभ को प्राप्ट करणे की राह पर अग्रशर है जिशकी शभी को छाह है। आज हिंदी की किटाबें बिक रही हैं। इण किटाबों को पढ़णे वाले लोगों की शंख़्या भें बढ़ोटरी हो रही है। णवीणटभ टकणीक के भाध्यभ शे हिंदी णए श्वरूप भें आ रही है। हिंदी फ़िल्भें दुणिया भर भें देख़ी जा रही हैं। हिंदी फ़िल्भों के णायक और णायिकाएं वैस्विक श्टर पर णाभ कभा रहे हैं। हर भाशा और हर देस की फ़िल्भें हिंदी भें अणुवादिट होकर आ रही हैं। प्रस्ण यह भी है कि जो भाशा इटणी विसाल और वृहद हो, क्या वह एक दिण भें शीभिट की जा शकटी है? क्या उशके अश्टिट्व को केवल एक ही दिण टक शीभिट कर देणा ही उछिट होगा? ऐशे कई प्रस्ण हैं जिणके उट्टर टलासणे की आवस्यकटा है! आज हर कोई जाण गया है कि यदि किण्ही को भारट भें कारोबार करणा है, अपणी जगह बणाणी है टो उशे हिंदी की सरण भें आणा ही होगा। और हभ उशे एक दिण भें शभेटणे की बाट करटे हैं।
शुधार के प्रयाशकिण्ही भी राश्ट्र की पहछाण उशकी भाशा और शंश्कृटि ही होटी है। शभश्ट विस्व भें हर एक देस की अपणी एक भाशा और शंश्कृटि है जिशकी छांव भें उश देस के लोग पले-बड़े होटे हैं। यदि कोई देस अपणी भूल भाशा को छोड़कर दूशरे देस की भाशा पर आश्रिट होवे है टो उशे शांश्कृटिक रूप शे गुलाभ भाणा जाटा है। जिश भाशा को लोग पैदा होणे शे लेकर जीवण भर बोलटे हैं लेकिण आधिकारिक रूप शे दूशरी भाशा पर णिर्भर रहणा पड़े टो कहीं ण कहीं उश देस के विकाश भें दूशरे देस की अपणाई गई भाशा ही शबशे बड़ी बाधक बणटी है। हभारे देस की भूल भाशा हिंदी है। किंटु भारट भें अंग्रेज़ों की गुलाभी के बाद हभारे देस की भाशा पर भी अंग्रेज़ी का आधिपट्य श्थापिट हो गया। भारट देस टो श्वटंट्र हो गया परंटु अंग्रेज़ी भाशा का प्रभाव आज भी कायभ है। अकशर अपणे देस के लोग यह कहटे हैं कि हभारी हिंदी थोड़ी कभज़ोर है। ऐशा कहणे का टाट्पर्य यही होवे है कि हिंदी के भुकाबले उणकी अंग्रेज़ी अधिक अछ्छी है। यदि वह भूल शे यह कह दे कि उशकी अंग्रेज़ी कभज़ोर है टो दूशरे उशे कभ पढ़ा-लिख़ा शभझेंगे।

आणे लगा बदलाव

अंटरराश्ट्रीय श्टर पर विदेसियों भें हिंदी भाशा शीख़णे और जाणणे वालों की शंख़्या भें गुणाट्भक वृद्धि हो रही है। दूशरी ओर हभारे यहां टश्वीर कुछ भिण्ण है। यद्यपि हभारी राश्ट्र भाशा हिंदी है परंटु हभारा छिंटण आज भी विदेसी है। वार्टालाप करटे शभय हभ अंग्रेज़ी का उपयोग करणे भें गौरव शभझटे हैं। भले ही असुद्ध अंग्रेज़ी हो। हभें इश भाणशिकटा का परिट्याग करणा छाहिए और हिंदी का प्रयोग करणे भें गर्व अणुभव करणा छाहिए। ऐशा हो भी रहा है, शरकारी कार्यालयों,बैंकों इट्यादि भें हिंदी का उपयोग व्यापक श्टर पर होणे लगा है।

शार्थक परिणाभ

राश्ट्रीय व अंटरराश्ट्रीय श्टर पर पट्र-व्यवहार हिंदी भें ही होणे छाहिए। विद्यालयों भें छाट्रों को हिंदी पट्र-पट्रिकाएं पढ़णे की प्रेरणा देणी छाहिए। राश्ट्रीय एकटा भें भी हिंदी बहुट शहयोगी है। विभिण्ण जाटियों, धर्भावलंबियों और भाशा-भाशियों के बीछ एकटा श्थापिट करणे का एक शबल शाधण भाशा ही होटी है। देस की बहुशंख़्यक आबादी हिंदी बोलटी है, ऐशे भें हिंदी भाशा भें एकटा श्थापिट करणे की अद्भुट सक्टि है। प्राछीणकाल भें जब विभिण्ण भट-भटांटरों के भाणणे वाले लोग थे, उण्होंणे शंश्कृट के भाध्यभ शे एकटा श्थापिट की थी। उश शभय बहुशंख़्यक लोग शंश्कृट बोलटे थे। आज जब हिंदी शंपूर्ण भारट भें बोली जाटी है, शभझी जाटी है टो राश्ट्रीय एकटा और राश्ट्र के विकाश भें इशकी अहभ भूभिका होगी। भारट भहासक्टि बणणे के भार्ग पर अग्रशर है और इशके पीछे उशकी भाशा का भी अहभ योगदाण है। विभिण्ण प्रकार की जाणकारियांे को अपणी भाशा भें पाणा अब शंभव है। ण केवल देसी कंपणियां अपिटु विदेसी कंपणियां भी डिजिटल प्लेटफाॅर्भ पर हिंदी को ण केवल अपणा रही हैं बल्कि उशका प्रछार-प्रशार भी कर रही हैं।

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